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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

अप्रैल ५, रामकिंकर, खुसरो, लघुकथा, दोहा यमक, माखन लाल, ममता शर्मा, शिरीष,

सलिल सृजन अप्रैल ५
*
स्मरण युग तुलसी
युगतुलसी की गहो विरासत,
कर शिव-प्रीति, उमा पग वंदन,
वर जीवन-पथ सत्-सुंदर नित,
राम नाम हो माथे चंदन।
युगतुलसी हैं श्रद्धा अविचल,
सिया-राम-हनुमंत उपासक,
नेह नर्मदा प्रवहित अविरल,
सर-सरयू निर्मलता साधक।
युगतुलसी विश्वास अखंडित,
एक साधते, सब सध जाते,
गुरु-प्रभु को कर महिमा मंडित,
पल-पल राम नाम गुंजाते।
युगतुलसी सम करें आचरण,
सिया-राम को सुमिरें हर क्षण।।
५.४.२०२४
•••
आज की रचना
जागो माँ
*
जागो माँ! जागो माँ!!
*
सीमा पर अरिदल ने भारत को घेरा है
सत्ता पर स्वार्थों ने जमा लिया डेरा है
जनमत की अनदेखी, चिंतन पर पहरा है
भक्तों ने गाली का पढ़ लिया ककहरा है
सैनिक का खून अब न बहे मौन त्यागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जनगण है दीन-हीन, रोटी के लाले हैं
चिड़ियों की रखवाली, बाज मिल सम्हाले हैं
नेता के वसन श्वेत, अंतर्मन काले हैं
सेठों के स्वार्थ भ्रष्ट तंत्र के हवाले हैं
रिश्वत-मँहगाई पर ब्रम्ह अस्त्र दागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जन जैसे प्रतिनिधि को औसत ही वेतन हो
मेहनत का मोल मिले, खुश मजूर का मन हो
नेता-अफसर सुत के हाथों में भी गन हो
मेहनत कर सेठ पले, जन नायक सज्जन हो
राजनीति नैतिकता एक साथ पागो माँ
*
सीमा पर अरिदल ने भारत को घेरा है
सत्ता पर स्वार्थों ने जमा लिया डेरा है
जनमत की अनदेखी, चिंतन पर पहरा है
भक्तों ने गाली का पढ़ लिया ककहरा है
सैनिक का खून अब न बहे मौन त्यागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
नवसंवत्सर, ५.४.२०१९
***
नवगीत
.
पूज रहे हैं
मूरत
कहते चित्र गुप्त है
.
है आराध्य हमारा जो
वह है अविनाशी
कहते फिर बतलाते कैसा
मनुज विनाशी
पैदा हुआ-मरा कैसे-कब
कहाँ? कह रहे
झगड़े-झंझट खड़े कर रहे
काबा-काशी
शिव वैरागी को अर्पित
करते हैं राशी
कहते कंकर-कंकर शंकर
छिपा-सुप्त है.
.
तुमने उसे बनाया या
वह तुम्हें बनाता?
तुम आते-जाते हो या
वह आता-जाता?
गढ़ते-मढ़ते, तोड़-फाड़ते
बिना विचारे
देख हमारी करनी वह
छिप-छिप मुस्काता
कैसा है यह बुद्धिमान
जो आप ठगाता?
मैंने दिया विवेक, कहाँ वह
हुआ लुप्त है?
५.४.२०१४
...
कार्यशाला काव्यानुवाद  
ग़ज़ल - अमीर खुसरो  
*
काफ़िरे-इश्कम मुसलमानी मरा दरकार नीस्त
हर रगे मन तार गश्ता हाजते जुन्नार नीस्त
अज़ सरे बालिने मन बर खेज ऐ नादाँ तबीब
दर्द मन्द इश्क़ रा दारो- बख़ैर दीदार नीस्त
मा व इश्क़ यार,अगर पर किब्ला ,गर दर बुतकदा
आशिकान दोस्त रा बक़ुफ़्रो- इमां कार नीस्त
ख़ल्क़ मी गोयद के खुसरो बुत परस्ती मी कुनद
आरे -आरे मी कुनम बा ख़लको-दुनिया कार नीस्त।
*
भावानुवाद 
नास्तिक हूँ मैं प्रेम पूजता, नहीं चाहिए मुझे सुमिरनी 
नस नस तार बन गई मेरी, नहीं जरूरत है जनेऊ की 
मेरे सिरहाने से उठ जा, अब तो ऐ नादां हकीम तू 
प्रेम-रोग जिसको इलाज है, उसका केवल प्रिय-दर्शन ही 
चाह प्रेम प्रेमी की केवल, काबा हो या हो देवालय 
काम प्रेमिका से है केवल,कुफ़्र और ईमान से नहीं
कहती है तो कह ले दुनिया, खसरो करता मूरत-पूजन  
हाँ हाँ मूरत पूज रहा मैं, परवा नहीं मुझे दुनिया की  
५.४.२०१४ 
***
दोहा
डैड रहें रिच या पुअर, तनिक न पड़ता फर्क।
योग्य बनो आगे बढ़ो, छोड़ी तर्क-वितर्क।।
५-४-२०२३
***
लघुकथा:
अकल के अंधे
*
२ अप्रैल २०२० एक सामान्य दिन और तारीख, बिलकुल अन्य दिनों की तरह।
पोंगा पंडित को बहुत दिनों से अपने लोगों द्वारा अनदेखा किया जा रहा था। चर्चा में न बने रहना उनका शगल तो था ही, राजनीति में बने रहने के लिए चर्चित होना भी जरूरी था। क्या करें कि नाम चर्चा में आ जाए। कुछ सूझ ही नहीं रहा था, तभी प्रधान मंत्री जी ने ५ अप्रैल को रात ९ बजे ९ मिनिट के लिए बिजली बंद कर बालकनी या दरवाजे पर दिया. मोमबत्ती, लालटेन आदि जलाने की अपील जनता जनार्दन से की।
उन्हें लगा यही मौका है, इसे तुरन्त भुनाना चाहिए पर कैसे?
संयोगवश ५ और ४ का योग ९ होने पर उनका ध्यान गया। दिमाग पर जोर दिया तारीख और माह का योग ९, समय ९ बजे, दिया जलने की अवधि ९ मिनिट, बचपन में शिक्षक द्वारा बताये गए ९ के पहाड़े की विशेषताएं याद हो आईं। पोंगा पंडित मुस्कुराये चलो. काम बन गया। तुरंत एक लेख बनाया। महान पंडितों की गणना के आधार पर घोषणा, ९ पूर्णता का प्रतीक...
रात नौ बजे ९ मिनिट ९ x ९ = ८१ = ८ + १ = ९
माह और तारीख का योग ४ + ५ + ९
तीनों को जोड़ें ९ + ९ + ९ = २७ = २ + ७ = ९
तीनों का गुणा करें ९ x ९ x ९ = ७२९ = ७ + २ + ९ = १ + ८ = ९
महापूर्ण योग , महा मंगलकारी, किस राशि पर कैसा प्रभाव? जानने के लिए संपर्क करें और अपना चलभाष क्रमांक, फीस और एटीएम नंबर दे दिया।
अपने अलग-अलग नंबरों से कई वॉट्सऐप समूहों, फेसबुक पटलों, आदि में डालने में जुट गए।
'निठल्लों की तरह क्या मोबाइल से चिपके हो, कुछ करते क्यों नहीं? चलो झाड़ू ही लगा लो, मैं तब तक बर्तन माँज लूँ। नहीं तो चाय-वाय कुछ नहीं मिलेगी' पंडिताइन ने घुड़की दी।
पंडित जी ने सोचा इसे खुश कर दूँ तो दिन भर चैन रहेगा, सो बोले 'डार्लिंग! देखो तो कितनी बढ़िया गणना की है अब चारों तरफ चर्चा तो होगी ही, कुंडली मिलवाने वालों से कमाई भी हो जाएगी। पंडितानी पंडित जी से ज्यादा पढ़ी-लिखी थीं, तुरंत बोलीं "ये क्या आधा-अधूरा गया बघारते हो? वर्ष २०२० का क्या हुआ? मुहूर्त की बात करते हो चैत्र माह का अंक १ हुआ, विक्रम संवत २०७७ = १६ = ७, तिथि है द्वादशी = ३ सबका योग ११ = २ , सबका गुणा २१ = ३। अब क्या होगा तुम्हारी ९ के फंडे का?"
"ए भागवान! बंद रखो अपनी जबान। भगवान् अक्लमंद पत्नी किसी को न दे। तुम तो मेरी खटिया ही खड़ी करा दोगी। बना बनाया काम बिगाड़ दोगी। तय मानो कमाई तो होंगई ही, नाम भी उछल जायेगा, तुम चाय बनाने का जुगाड़ करों, मैं तुम्हारे हुकुम का पालन करता हूँ। ये भारत है, यहाँ कम नहीं हैं अकल के अंधे।"
***
गले मिले दोहा यमक
*
काहे को रोना मचा, जीना किया हराम
कोरोना परदेश से, लाये ख़ास न आम
बिना सिया-सत सियासत, है हर काम सकाम
काम तमाम न काम का, बाकि काम तमाम
हेमा की तस्वीर से, रोज लड़ाते नैन
बीबी दीखते झट कहें हे माँ, मन बेचैन
बौरा-गौरा को नमन, करता बौरा आम.
खास बन सके, आम हर, हे हरि-उमा प्रणाम..
देख रहा चलभाष पर, कल की झलकी आज.
नन्हा पग सपने बड़े, कल हो कल का राज..
५.४.२०२०
***
गीत
सबसे पहले देश
*
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
रक्षा करी विदेशी से लड़
शस्त्र हाथ में लेकर
बापू के सत्याग्रह से जुड़
जूझे कमल उठाकर
पत्रकार-कवि तेजस्वी हे!
कसर न छोड़ी लेश
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
विद्यार्थी जी के पथ पर चल
जान हथेली पर ले
लक्ष्मण सिंह-सुभद्रा को पथ दिखलाया आशिष दे
हिम तरंगिणी, हिम किरीटनी
ने दी कीर्ति अशेष
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
सत्ता दल पद कभी न चाहा
करी स्वार्थ बिन सेवा
शर्म करें दल नेता चमचे
चाह रहे जो मेवा
नोटा चुने हराओ इनको
जागृत रहो विशेष
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
करी पुष्प ने अभिलाषा यह
बिछे राह पर जाकर
गुजरें माँ के सेवक पग धर
चाह नहीं प्रभु का सिर
त्यागी-बलिदानी अजरामर
कमी न छोड़ी लेश
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
***
कृति चर्चा:
मैं हूँ एक भाग हिमालय का : मन मंदाकिनी का काव्य प्रवाह
*
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
(कृति विवरण: मैं हूँ एक भाग हिमालय का, काव्य संग्रह, ममता शर्मा, प्रथम संस्करण २०१८, आईएसबीएन ९७८०४६३६४४९६६, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १२०, मूल्य१८५ रु., प्रकाशक वर्जिन साहित्य पीठ दिल्ली)
*
कविता की नहीं जाती, हो जाती है। अनुभूति के शिखर से अभिव्यक्ति सलिला प्रवाहित होकर कलकल निनाद करे तो कविता हो जाती है। मानव जीवन पल-पल परिवर्तन का साक्षी बनता है। भावात्म शब्द-तन मे वास कर परिवर्तनजनित प्रतिक्रिया के प्रागट्य का साक्षी बनता है। यह निर्विवाद सत्य है कि नारी मन पुरुष मन की तुलना में अधिक भाव प्रवण और ममतामय होता है। 'मैं हूँ भाग हिमालय का' की कविताएँ व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंध की प्रतीति से उद्भूत हैं।
'आज धरा के आँगन में फिर
सूरज ऊषा लेकर आया
देख अचानक संग उन्हें
रजनी-नेत्रों में जल भर आया।
फट ले अपनी काली चूनर
झटपट वो विभावरी भागी
तभी अचानक पाँखें खोले
चिड़िया भी चूँ-चूँ कर जागी।'
प्रकृति के साथ तादात्म्य-स्थापन ब्रह्म-साक्षात का प्रथम चरण है। रंग उड़ा, रंग उड़ा, हर दिशा ही रंग उड़ा' हर दिशा में रंग दिखना लगे तो कबीर सब कुछ लुटा देता है पर लोई को घर में ही ब्रह्म का पारा पाँव पसारे मिल जाता है। उसे मम्मी के भाल, पूजा के थाल, गणपति और हाथी, मोती के बैल और पकवानों का कतारों में अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र रंग ही रंग दिखता है। निराकुल मीरा कहती हैं 'मैं तो साँवरी के रँग राँची' ममता की प्रतीति भिन्न होना स्वाभाविक है। 'मन को लगाएँ किससे / मैं बतियाऊँ किससे' के गिले-शिकवे भुलाकर 'चंपकवन में एक रूपसी / गर्वीली मतवाली आली' होकर स्वरूप निहारती वह जान ही नहीं पाती 'आया कौन मन के दर्पण में....बिना रोके-टोके' लेकिन आ ही गया तो जाने का द्वार नहीं है। 'यही तो जीवन है अभिराम / यही तो जीवन है सुखधाम।' रंगरसिया साथ हो तो 'पीली-पीली सरसों फैली / फैली चारों ओर' का प्रतीति होनी ही है। यह प्रतीति संकुचन नहीं विस्तार और नव सृजन के पथ पर पग धरती है- 'है बस नियमों थोड़ा सा अहसास जागा / हाँ, मैं भी हूँ हिस्सा धरा का जरा सा', कामना जागती है 'भूमि पा अब बीज जाए / हो उजाला सूर्य का / चंदा का किरणें गुनगुनाएँ'।
सृजनाकांक्षी चेतना 'मुसाफिर हूँ मैं / हर क्षण चलती ही रहती हूँ' कहते हुए भी गंतव्य के प्रति सचेत रहती है-'रहा बचपन जवानी, सब में बेसुध / कुछ खबर ले-ले'।
'काठ का हाँडी चढ़ी तो पल में बात समझ गई'। कौन सी बात? यही कि 'जो करना आज ही कर लो'। क्योंकि 'हम क्या हैं? / केवल सितारों की राख / या हैं हम / संपूर्ण ब्रह्मांड'।
अनुभूतियों का इंद्रधनुषी रंग 'मैं हूँ एक भाग हिमालय का' में सर्वत्र व्याप्त है। गीत-सागर राकेश खंडेलवाल लिखित आमुख से समृद्ध
यह कृति कवयित्री की काव्य-सृजन प्रतिभा की प्रथम पुष्प है जो पूत के पाँव पालने में दिखते हैं कहावत को चरितार्थ करती है।
'ठुमुक चलत रामचंद्र' का पैंजनियों का रुनझुन ले आनंदित होते समय पुष्प-वाटिका, पंचवटी या लंकापुरी में राम की छवि न खोजें तो विवेच्य कृति बालारुणी ऊषा की रम्य छवि-दर्शन का सा आनंद देती है। कवयित्री की प्रतिभा आगामी काव्य संग्रहों में परवान पर चढ़कर विश्ववाणी हिंदी के साहित्य कोष को समृद्ध करेगी, यह विश्वास किया जा सकता है।
५-४-२०१९
***
आनुप्रासिक दोहे
*
दया-दफीना दे दिया, दस्तफ्शां को दान
दरा-दमामा दाद दे, दल्कपोश हैरान
(दरा = घंटा-घड़ियाल, दफीना = खज़ाना, दस्तफ्शां = विरक्त, दमामा = नक्कारा, दल्कपोश = भिखारी)
*
दर पर था दरवेश पर, दरपै था दज्जाल
दरहम-बरहम दामनी, दूर देश था दाल
(दर= द्वार, दरवेश = फकीर, दरपै = घात में, दज्जाल = मायावी भावार्थ रावण, दरहम-बरहम = अस्त-व्यस्त, दामनी = आँचल भावार्थ सीता, दाल = पथ प्रदर्शक भावार्थ राम )
*
दिलावरी दिल हारकर, जीत लिया दिलदार
दिलफरेब-दीप्तान्गिनी, दिलाराम करतार
(दिलावरी = वीरता, दिलफरेब = नायिका, दिलदार / दिलाराम = प्रेमपात्र)
५-४-२०१७
***
नवगीत:
.
क्षुब्ध पहाड़ी
विजन झुरमुट
झाँकता शिरीष
.
गगनचुम्बी वृक्ष-शिखर
कब-कहाँ गये बिखर
विमल धार मलिन हुई
रश्मिरथी तप्त-प्रखर
व्यथित झाड़ी
लुप्त वनचर
काँपता शिरीष
.
सभ्य वनचर, जंगली नर
देख दंग शिरीष
कुल्हाड़ी से हारता है
रोज जंग शिरीष
कली सिसके
पुष्प रोये
झुलसता शिरीष
.
कर भला तो हो भला
आदम गया है भूल
कर बुरा पाता बुरा है
जिंदगी है शूल
वन मिटे
बीहड़ बचे हैं
सिमटता शिरीष
.
बीज खोजो और रोपो
सींच दो पानी
उग अंकुर वृक्ष हो
हो छाँव मनमानी
जान पायें
शिशु हमारे
महकता शिरीष
***
नवगीत:
.
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
महाकाव्य बब्बा की मूँछें, उजली पगड़ी
खण्डकाव्य नाना के नाना किस्से रोचक
दादी-नानी बन प्रबंध काव्य करती हैं बतरस
सुन अंग्रेजी-गिटपिट करते बच्चे भौंचक
ईंट कहीं की, रोड़ा आया और कहीं से
अपना
आप विधाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
लक्षाधिक है छंद सरस जो चाहें रचिए
छंदहीन नीरस शब्दों को काव्य न कहिए
कथ्य सरस लययुक्त सारगर्भित मन मोहे
फिर-फिर मुड़कर अलंकार का रूप निरखिए
बिम्ब-प्रतीक सलोने कमसिन सपनों जैसे
निश-दिन
खूब दिखाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
दृश्य-श्रव्य-चंपू काव्यों से भाई-भतीजे
द्विपदी, त्रिपदी, मुक्तक अपनेपन से भीजे
ऊषा, दुपहर, संध्या, निशा करें बरजोरी
पुरवैया-पछुवा कुण्डलि का फल सुन खीजे
बौद्धिकता से बोझिल कविता
पढ़ता
पर बिसराता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
गीत प्रगीत अगीत नाम कितने भी धर लो
रच अनुगीत मुक्तिका युग-पीड़ा को स्वर दो
तेवरी या नवगीत शाख सब एक वृक्ष की
जड़ को सींचों, माँ शारद से रचना-वर लो
खुद से
खुद बतियाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
५-४-२०१५
***
नवगीत:
.
रचनाओं की हर रामायण
अक्षर-अक्षर मिलकर गढ़ते
कथ्य भाव रस बिम्ब बनाते
क्षर शब्दों की सार्थक दुनिया
.
शब्द-शब्द मिल वाक्य बनाते
वाक्य अनुच्छेदों में ढलते
अनुच्छेद मिल कथा-कहानी
बन जाते तो सपने पलते
बनते सपने युग के नपने
लगे पतीले ऊपर ढकने
पुरुषार्थी कोशिश कर हारे
लगे राम की माला जपने
दे जाती है साँझ सलोने
सपने लेकिन ढलते-ढलते
नानी के अधरों पर लाती
हँसी शरारत करती मुनिया
.
किसने जीवन यहाँ बिताया
केवल सुख पा, सहा न दुखड़ा
किसने आँसू नहीं बहाये
किसका सुख से खिला न मुखड़ा
किस अंतर में नहीं अंतरा
इश्क-मुश्क का गूँजा कहिए
सम आकारिक पंक्ति-लहरियाँ
बन नवगीत बह रही गहिए
होते तब जीवंत खिलौने
शिशु-नयनों में पलते-पलते
खेले हास-रास के सँग जब
श्वास-आस की जीवित गुड़िया
.
गीतकार पाठक श्रोता का
नाता होता बहुत अनूठा
पल में खुश हो जाता बच्चा
पल भर पहले था जो रूठा
टटकापन-देशजता रुचती
अधुनातानता भी मन भाती
बन्ना-गारी के सँग डी जे
सुनते-नाचें झूम बराती
दिखे क्षितिज पर देखे चंदा
धवल चाँदनी हँसते-खिलते
घूँघट डाले हनीमून पर
जाती इठलाकर दुलहनिया
४.४.२०१५
...
*
PAN Card explained:-
PAN is a 10 digit alpha numeric number,
where the first 5 characters are letters,
the next 4 numbers and the last one a letter again.
These 10 characters can be divided in five parts as can be seen below.
The meaning of each number has been explained further.
1. First three characters are alphabetic series running from AAA to ZZZ
2. Fourth character of PAN represents the status of the PAN holder. • C — Company • P — Person • H — HUF(Hindu Undivided Family) • F — Firm • A — Association of Persons (AOP) • T — AOP (Trust) • B — Body of Individuals (BOI) • L — Local Authority • J — Artificial Juridical Person • G — Government
3. Fifth character represents first character of the PAN holder’s last name/surname.
4. Next four characters are sequential number running from 0001 to 9999.
5. Last character in the PAN is an alphabetic check digit.
Nowadays, the DOI (Date of Issue) of PAN card is mentioned at the right (vertical) hand side of the photo on the PAN card.
***
दोहा सलिला
ठिठुर रहा था तुम मिलीं, जीवन हुआ बसंत.
दूर हुईं पतझड़ हुआ, हेरूँ हर पल कन्त..
तुम मैके मैं सासरे, हों तो हो आनंद.
मैं मैके तुम सासरे, हों तो गाएँ छन्द.
तू-तू मैं-मैं तभी तक, जब तक हों मन दूर.
तू-मैं ज्यों ही हम हुए, साँस हुई संतूर..
*
दो हाथों में हाथ या, लो हाथों में हाथ.
अधरों पर मुस्कान हो, तभी सार्थक साथ..
*
नयन मिला छवि बंदकर, मून्दे नयना-द्वार.
जयी चार, दो रह गये, नयना खुद को हार..
५-४-२०१३
***
खबरदार कविता:
खबर: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है.
दोहा गजल:
असरकार सरकार क्यों?, हुई न अब तक यार.
करता है कमजोर जो, 'सलिल' वही गद्दार..
*
अफसरशाही राह का, रोड़ा- क्यों दरकार?
क्यों सेना में सियासत, रोके है हथियार..
*
दें जवाब हम ईंट का, पत्थर से हर बार.
तभी देश बच पायेगा, चेते अब सरकार..
*
मानवता के नाम पर, रंग जाते अखबार.
आतंकी मजबूत हों, थम जाते हथियार..
*
५-४-२०१०

फरवरी ९, सलिल, अन्नपूर्णा

 सलिल सृजन ९ फरवरी 

*

अन्नपूर्णा

आईने से पूछिए तो कहेगा वह

ख्वाब तेरे देखते हैं श्याम निश-दिन

राधिका तू बावरी मत हो सम्हाल जा

चुन उसे दिल देख जिसको कहे तक-धिन

लक्ष्मी तू है सुनिश्चित हरि मिलेंगे

शिवा हो तो शिव न अब तुझको तजेंगे

शारदा हो रमेगी तू जब जहाँ पर

ब्रह्म थामे हाथ तेरा वहीं आकर

करेगी संकल्प जो वह पा सकेगी

धन्य वह घर तू जहाँ पर पग धरेगी

शाद हो तू साथ जिसके वर उसे ही

अन्नपूर्णा है सदा मंगल करेगी

*

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

अप्रैल ४, रामकिंकर, लावणी, सॉनेट, माखन, नोटा, कुण्डलिया, लघुकथा, गीत, पैरोडी, लौकिक छन्द,

सलिल सृजन अप्रैल ४
*
स्मरण युगतुलसी 
• 
मन हर पल तू राम नाम 
भज मोह वासना क्रोध काम तज 
• 
युगतुलसी सम ध्यान लीन हो 
सिया-राम छवि बसा हृदय में 
जग के सम्मुख नहीं दीन हो 
रमे राम में श्वास विलय हो। 
मस्तक धर किंकर की पद-रज 
मन हर पल तू राम नाम भज 
• 
राम रमापति के पग धो ले 
केवट हो पी ले चरणामृत 
बन निषाद, प्रभु पाहुन हो ले 
पंचेंद्रिय नित पी नामामृत। 
टेर राम जी को होकर गज 
मन हर पल तू राम नाम भज 
• 
हनुमत को भज राम-दास हो 
भोग लगा प्रभु को शबरी बन 
क्यों न रामबोला निवास हो 
युगतुलसी नर्मदा निमज्जन। 
किंकर-चरण-शरण गह मत लज 
मन हर पल तू राम नाम भज 
४.४.२०२४ 
•••

मुक्तिका
याद आ रही याद फिर।
या आए हैं मेघ घिर?
देख रहे वर्तुल अगिन।
जल में कंकर फेंककर।।
जब छूता सुरभित पवन।
'आया' सोचे मन सिहर।।
प्राची में छवि दिख कहे- पकड़,
किरण बनकर निखर।।
दस दिश में सुधियाँ ही सुधियाँ।
हाथ न आतीं, बिखर बिखर।।
•••
मुक्तक
लावणी छंद
महलों में सन्नाटा छाया, कलरव है फुटपाथों पे
हाथों की रेखाएँ हँसकर, आ बैठी हैं माथों में
चाहों में है एक बसा तो दूजा क्यों है बाँहों में
कौन बताए किससे पूछें, किसकी कौन पनाहों में?
४-४-२०२३
सॉनेट
दादा
*
दादा माखनलाल प्रणाम।
खासुलखास, रहे बन आम।
सदा देश के आए काम।।
दसों दिशा में गूँजा नाम।।
शस्त्र उठा विद्रोह किया।
अमिय अहिंसा विहँस पिया।।
शब्द-बाण जब चला दिया।।
अँग्रेजों का हिला जिया।।
'प्रभा','प्रताप' मशाल बना।
कर्मवीर' युग-नाद घना।
'हिम किरीटिनी' दर्द घना।
रखे 'युग चरण' ख्वाब बुना।
जीवन जिया नर्मदा सम।
सुदृढ़ वज्र, माखन सम नम।।
४-४-२०२२
•••
सॉनेट
विनय
विनय सुनें हे तारणहार!
ले भावों का बंदनवार।
आया तव आत्मज सब हार।।
लाया है अँजुरी भर प्यार।।
करी बहुत तज दी तकरार।
किया बहुत त्यागा श्रंगार।
है समान अब हिम-अंगार।।
तुम पर बरबस ही दिल हार।।
पल भर तो लो ईश! निहार।
स्वीकारो हँसकर सत्कार।
मैं कैसे बिसरे सरकार!
युक्ति बता दो प्रभु! पुचकार।।
हारा, हरि! अब हो दीदार।
करुणा कर मेरे करतार!!
४•४•२०२२
•••
कुण्डलिया
नोटा
नोटा तो ब्रह्मास्त्र है, समझ लीजिए आप।
अनाचार पर चलाकर, मिटा दीजिए पाप।।
मिटा दीजिए पाप, न भ्रष्टाचार सहो अब।
जो प्रत्याशी गलत, उसे मिल दूर करो सब।।
कहे 'सलिल' कविराय, न जाए तुमको पोटा।
सजग मौन रह आप, मात दें चुनकर नोटा।।
***
एक द्विपदी
करें न शिकवा, नहीं शिकायत, तुमने जात दिखा दी है।
अश्क़ बहकर मौन-दूर हम, तुमको यही सजा दी है।।
४-४-२०२१
***
लघुकथा
*
अँधा बाँटे रेवड़ी
*
जंगल में भीषण गर्मी पड़ रही थी। नदियों, झरनों, तालाबों, कुओं आदि में पानी लगातार कम हो रहा था। दोपहर में गरम लू चलती तो वनराज से लेकर भालू और लोमड़ी तक गुफाओं और बिलों में घुसकर ए.सी., पंखे आदि चलाते रहते। हाथी और बंदर जैसे पशु अपने कानों और वृक्षों की पत्तियों से हवा करते रहते फिर भी चैन न पड़ता।
जंगल के प्रमुख विद्युत् मंत्री चीते की चिंता का ठिकाना नहीं था। हर दिन बढ़ता विद्युत् भार सम्हालते-सम्हालते उसके दल को न दिन में चैन था, न रात में। लगातार चलती टरबाइनें ओवरहालिंग माँग रही थीं। विवश होकर उसने वनराज शेर से परामर्श किया। वनराज ने समस्या को समझा पर समस्या यह थी कोई भी वनवासी सुधार कार्य के लिए स्वेच्छा से बिजली कटौती के लिए तैयार नहीं था और जबरदस्ती बिजली बंद करने पर जन असंतोष भड़कने की संभावना थी।
महामंत्री गजराज ने गहन मंथन के बाद एक समाधान सुझाया। तदनुसार एक योजना बनाई गयी। वनराज ने जंगल के सभी निवासियों से अपील की कि वे एक दिन निर्धारित समय पर बिजली बंद कर सिर्फ मोमबत्ती, दिया, लालटेन, चिमनी आदि जलाकर इंद्र देवता को प्रसन्न करें ताकि आगामी वर्ष वर्षा अच्छी हो। संचार मंत्री वानर सब प्राणियों को सूचित करने के लिए अपने दल-बल के साथ जुट गए।
वनराज के साथ के साथ विद्युत् मंत्री, विद्युत सचिव, प्रमुख विद्युत् अभियंता आदि कार्य योजना को अंतिम रूप देनेके लिए बैठे। अभियंता के अनुसार गंभीर समस्या यह थी कि जंगल के भिन्न-भिन्न हिस्सों में बिजली प्रदाय ग्रिड बनाकर किया जा रहा था। एकाएक ग्रिडों में बिजली की माँग घटने के कारण फ्रीक्वेंसी संतुलन बिगड़ने, रिले , कंडक्टर आदि पर असामान्य विद्युत् भार के कारण प्रणाली जर्क और ग्रिड फेल होने की संभावना थी। ऐसा होने पर सुधार कार्य में अधिक समय लगता। मंत्री, सचिव आदि घंटों सिर खपकर भी कोई समाधान नहीं निकल सके। प्रमुख अभियंता के साथ आये एक फील्ड इंजीनियर ने सँकुचाते हुए कुछ कहने के लिए हाथ उठाया। सचिव ने उसे घूरकर देखा तो उसने झट हाथ नीचे कर लिया पर वनराज ने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा 'रुक क्यों गए? बेझिझक कहो, जो कहना है।"
फील्ड इंजीनियर ने कहा यदि हम लोगों को केवल बल्ब-ट्यूबलाइट आदि बंद करने के लिए कहें और पंखे, ए.सी. आदि बंद न करने के लिए कहें तो ग्रिड में फ्रीक्वेंसी संतुलन बिगड़ने की संभावना न्यूनतम हो जायेगी। विचार-विमर्श के बाद इस योजना को स्वीकार कर तदनुसार लागू किया गया। वन्य प्रजा को बिजली कम खर्च करने की प्रेरणा मिली। ग्रिड फेल नहीं हुआ। इस सफलता के लिए मंत्री और सचिव को सम्मान मिले, किसी को याद न रहा कि अभियंता की भी कोई भूमिका था। सम्मान समारोह में आया काला कौआ बोलै पड़ा 'अँधा बाँटे रेवड़ी"
***
गीत
*
रक्तबीज था हुआ कभी जो
लौट आया है।
राक्षस ने कोरोना का
नाम पाया है।
गिरेगी विष बूँद
जिस भी सतह पर
उसे छूकर मनुज जो
आगे बढ़ेगा
उसीको माध्यम बनाकर
यह चढ़ेगा
बढ़ा तन का ताप
देगा पीर थोड़ी
किन्तु लेगा रोक श्वासा
आस छोड़ी
अंतत: स्वर्गीय हो
चाहे न भाया है।
सीख दुर्गा माई से
हम भी तनिक लें
कोरोना जी बच सकें
वह जगह मत दें
रहें घर में, घर बने घर
कोरोना से कहें: 'जा मर'
दूरियाँ मन में न हों पर
बदन रक्खें दूर ही हम
हवा में जो वायरस हैं
तोड़ पंद्रह मिनिट में दम
मर-मिटें मानव न यदि
आधार पाया है।
जलाएँ मिल दीप
आशा के नए हम
भगाएँ जीवन-धरा से
भय, न हो तम
एकता की भावधारा
हो सबल अब
स्वच्छता आधार
जीवन का बने अब
न्यून कर आवश्यकताएँ
सर तनें सब
विपद को जय कर
नया वरदान पाया है
रक्तबीज था हुआ कभी जो
लौट आया है।
राक्षस ने कोरोना का
नाम पाया है।
४.४.२०२०
***
एक गीत -एक पैरोडी
*
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा ३१
कहा दो दिलों ने, कि मिलकर कभी हम ना होंगे जुदा ३०
*
ये क्या बात है, आज की चाँदनी में २१
कि हम खो गये, प्यार की रागनी में २१
ये बाँहों में बाँहें, ये बहकी निगाहें २३
लो आने लगा जिंदगी का मज़ा १९
*
सितारों की महफ़िल ने कर के इशारा २२
कहा अब तो सारा, जहां है तुम्हारा २१
मोहब्बत जवां हो, खुला आसमां हो २१
करे कोई दिल आरजू और क्या १९
*
कसम है तुम्हे, तुम अगर मुझ से रूठे २१
रहे सांस जब तक ये बंधन न टूटे २२
तुम्हे दिल दिया है, ये वादा किया है २१
सनम मैं तुम्हारी रहूंगी सदा १८
फिल्म –‘दिल्ली का ठग’ 1958
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पैरोडी
है कश्मीर जन्नत, हमें जां से प्यारी, हुए हम फ़िदा ३०
ये सीमा पे दहशत, ये आतंकवादी, चलो दें मिटा ३१
*
ये कश्यप की धरती, सतीसर हमारा २२
यहाँ शैव मत ने, पसारा पसारा २०
न अखरोट-कहवा, न पश्मीना भूले २१
फहराये हरदम तिरंगी ध्वजा १८
*
अमरनाथ हमको, हैं जां से भी प्यारा २२
मैया ने हमको पुकारा-दुलारा २०
हज़रत मेहरबां, ये डल झील मोहे २१
ये केसर की क्यारी रहे चिर जवां २०
*
लो खाते कसम हैं, इन्हीं वादियों की २१
सुरक्षा करेंगे, हसीं घाटियों की २०
सजाएँ, सँवारें, निखारेंगे इनको २१
ज़न्नत जमीं की हँसेगी सदा १७
४-४-२०१९
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एक दोहा
परेशान होते बहुत, छोटे ग्राहक रोज
चुरा करोड़ों भागते, मोदी कैसे खोज??
*
कार्यशाला:
दोहा से कुंडली
*
ऊँची-ऊँची ख्वाहिशें, बनी पतन का द्वार।
इनके नीचे दब गया, सपनों का संसार।।
दोहा: तृप्ति अग्निहोत्री,लखीमपुर खीरी
सपनों का संसार न लेकिन तृप्ति मिल रही
अग्निहोत्र बिन हवा विषैली आस ढल रही
सलिल' लहर गिरि नद सागर तक बहती नीची
कैसे हरती प्यास अगर वह बहती ऊँची
रोला: संजीव वर्मा सलिल
४-४-२०१९
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मुक्तक: अर्पण
मैला-चटका है, मेरा मन दर्पण
बतलाओ तो किसको कर दू अर्पण?
जो स्वीकारे सहज भाव से इसको
होकर क्रुद्ध न कर दे मेरा तर्पण
४-४-२०१८
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विमर्श
सात लोक और लौकिक छन्द
*
अध्यात्म शास्त्र में वर्णित सात लोक भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, तपः लोक, महः लोक, जनः लोक और सत्य लोक हैं। ये किसी ग्रह, नक्षत्र में स्थित अथवा अधर में लटके हुए स्थान नहीं, स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर बढ़ने की स्थिति मात्र हैं। पिंगल शास्त्र में सप्त लोकों के आधार पर सात मात्राओं के छंदों को 'लौकिक छंद' कहा गया है।
सामान्य दृष्टि से भूलोक में रेत, पत्थर, वृक्ष, वनस्पति, खनिज, प्राणी, जल आदि पदार्थ हैं। इसके भीतर की स्थिति है आँखों से नहीं, सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखी-समझी जा सकती है। हवा में मिली गैसें, जीवाणु आदि इस श्रेणी में हैं। इससे गहरी अणु सत्ता के विश्लेषण में उतरने पर विभिन्न अणुओं-परमाणुओं के उड़ते हुए अन्धड़ और अदलते-बदलते गुच्छक हैं। अणु सत्ता का विश्लेषण करने पर उसके सूक्ष्म घटक पदार्थ नहीं,विद्युत स्फुल्लिंग मात्र दृष्टिगोचर होते हैं। तदनुसार ऊर्जा प्रवाह ही संसार में एकमात्र विद्यमान सत्ता प्रतीत होती है। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं किंतु स्थान परिवर्तन नहीं होता। अपने इसी स्थान में यह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से अति सूक्ष्म, अति सूक्ष्म से महा सूक्ष्म की स्थिति बनती जाती है।
सात लोकों का स्थान कहीं बाहर या अलग-अलग नहीं है। वे एक शरीर के भीतर अवयव, अवयवों के भीतर माँस-पेशियाँ, माँस-पेशियों के भीतर ज्ञान-तंतु, ज्ञान-तन्तुओं के भीतर मस्तिष्कीय विद्युत आदि की तरह हैं। वे एक के भीतर एक के क्रम से क्रमशः भीतर के भीतर-समाये, अनुभव किये जा सकते हैं। सात लोकों की सत्ता स्थूल लोक के भीतर ही सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम और अति सूक्ष्म होती गई है। सबका स्थान वही है जिसमें हम स्थित हैं। ब्रह्मांड के भीतर ब्रह्मांड की सत्ता परमाणु की मध्यवर्ती नाभिक के अन्तर्गत प्राप्त अति सूक्ष्म किन्तु विशाल ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करनेवाले ब्रह्म-बीज में प्राप्य है।
जीव की देह भी ब्रह्म शरीर का प्रतीक प्रतिनिधि (बीज) है। उसके भीतर भी सात लोक हैं। इन्हें सात शरीर (सप्त धातु-रस, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओजस) कहा जाता है। भौतिक तन में छह धातुएँ हैं, सातवीं ओजस् तो आत्मा की ऊर्जा मात्र है। इनके स्थान अलग-अलग नहीं हैं। वे एक के भीतर एक समाये हैं। इसी तरह चेतना शरीर भी सात शरीरों का समुच्चय है। वे भी एक के भीतर एक के क्रम से अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं।
योग शास्त्र में इन्हें चक्रों का नाम दिया गया है। छह चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सातवाँ सहस्रार कमल। कहीं छह, कहीं सात की गणना से भ्रमित न हों। सातवाँ लोक सत्यलोक है। सत्य अर्थात् पूर्ण परमात्मा । इससे नीचे के लोक भी तथा साधना में प्रयुक्त होने वाले चक्र छ:-छ: ही हैं। सातवाँ सहस्रार कमल ब्रह्मलोक है। उस में शेष ६ लोक लय होते है। सात या छह के भेद-भाव को इस तरह समझा जा सकता है। देवालय सात मील दूर है। बीच में छह मील के पत्थर और सातवाँ मील पत्थर प्रत्यक्ष देवालय। छह गिने या सात इससे वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मनुष्य के सात शरीरों का वर्णन तत्ववेत्ताओं ने इस प्रकार किया हैं- (१) स्थूल शरीर-फिजिकल बाड़ी (२) सूक्ष्म शरीर इथरिक बॉडी (३) कारण शरीर-एस्ट्रल बॉडी (४)मानस शरीर-मेन्टल बॉडी (५) आत्मिक शरीर-स्प्रिचुअल बॉडी (६) देव शरीर -कॉस्मिक बॉडी (७) ब्रह्म शरीर-वाडीलेस बॉडी।
सप्त धातुओं का बना भौतिक शरीर प्रत्यक्ष है। इसे देखा, छुआ और इन्द्रिय सहित अनुभव किया जा सकता है। जन्मतः प्राणी इसी कलेवर को धारण किये होता है। उनमें प्रायः इन्द्रिय चेतना जागृत होती है। भूख, सर्दी-गर्मी जैसी शरीरगत अनुभूतियाँ सक्षम रहती हैं। पशु शरीर आजीवन इसी स्थिति में रहते हैं। मनुष्य के सातों शरीर क्रमशः विकसित होते हैं। भ्रूण पड़ते ही सूक्ष्म मानव शरीर जागृत होने लगता है। इच्छाओं और सम्वेदनाओं के रूप में इसका विकास होता है। मानापमान, अपना-पराया, राग-द्वेष, सन्तोष-असन्तोष, मिलन-वियोग जैसे अनुभव भाव (सूक्ष्म) शरीर को होते हैं। बीज में से पहले अंकुर निकलता है, तब उसका विकास पत्तों के रूप में होता है। स्थूल शरीर को अंकुर और सूक्ष्म शरीर पत्ता कह सकते हैं। फिजिकल बॉडी यथास्थान बनी रहती है, पर उसमें नई शाखा भाव शरीर एस्ट्रल बॉडी के रूप में विकसित होती है।सातों शरीरों का अस्तित्व आत्मा के साथ-साथ ही है, पर उनका विकास आयु और परिस्थितियों के आधार पर धीमे अथवा तीव्र गति से स्वल्प-अधिक मात्रा में होता है।
तीसरा कारण शरीर विचार, तर्क, बुद्धि से सम्बन्धित है। इसका विकास, व्यावहारिक, सभ्यता और मान्यतापरक संस्कृति के आधार पर होता है। यह किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते आरम्भ होता है और वयस्क होने तक अपने अस्तित्व का परिचय देने लगता है। बालक को मताधिकार १८ वर्ष की आयु में मिलता है। अल्प वयस्कता इसी अवधि में पहुँचने पर पूरी होती है। बारह से लेकर अठारह वर्ष की आयु में शरीर का काम चलाऊ विकास हो जाता है। यौन सम्वेदनाएँ इसी अवधि में जागृत होती हैं। सामान्य मनुष्य इतनी ही ऊँचाई तक बढ़ते हैं। फिजिकल-इथरिक और एस्ट्रल बॉडी के तीन वस्त्र पहनकर ही सामान्य लोग दरिद्रता में जीवन बिताते हैं। इसलिए सामान्यत: तीन शरीरों की ही चर्चा होती है। स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों की व्याख्या कर बात पूरी कर ली जाती है। प्रथम शरीर में शरीरगत अनुभूतियों का सुख-दुःख, दूसरे में भाव सम्वेदनाएँ और तीसरे में लोकाचार एवं यौनाचार की प्रौढ़ता विकसित होकर एक कामचलाऊ मनुष्य का ढाँचा खड़ा हो जाता है।
तीन शरीरों के बाद मनुष्य की विशिष्टताएँ आरम्भ होती हैं। मनस् शरीर में कलात्मक रसानुभूति होती है। कवित्व जगता है। कोमल सम्वेदनाएँ उभरती हैं। कलाकार, कवि, सम्वेदनाओं के भाव लोक में विचरण करने वाले भक्त-जन, दार्शनिक, करुणार्द्र, उदार, देश-भक्त इसी स्तर के विकसित होने से बनते हैं। यह स्तर उभरे तो पर विकृत बन चले तो व्यसन और व्याभिचार जन्य क्रीड़ा-कौतुकों में रस लेने लगता है। विकसित मनस् क्षेत्र के व्यक्ति असामान्य होते हैं। इस स्तर के लोग कामुक-रसिक हो सकते हैं। सूरदास, तुलसीदास जैसे सन्त अपने आरम्भिक दिनों में कामुक थे। वही ऊर्जा जब भिन्न दिशा में प्रवाहित हो तो सम्वेदनाएँ कुछ से कुछ करके दिखाने लगीं। महत्वाकाँक्षाएँ (अहंकार) इसी क्षेत्र में जागृत होती हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति भौतिक जीवन में तरह-तरह के महत्वपूर्ण प्रयास कर असाधारण प्रतिभाशाली कहलाते हैं। प्रतिभागी लोगों का मनस् तत्व प्रबल होता है। उन्हें मनस्वी भी कहा जा सकता है। बाल्मीक, अँगुलिमाल, अशोक जैसे महत्वाकांक्षी विकृत मनःस्थिति में घोर आतंकवादी रहे, पर जब सही दिशा में मुड़ गये तो उन्हें चोटी की सफलता प्राप्त करने में देर नहीं लगी। इसे मेन्टल बॉडी की प्रखरता एवं चमत्कारिता कहा जा सकता है।
पाँचवाँ शरीर-आत्मिक शरीर स्प्रिचुअल बॉडी अतीन्द्रिय शक्तियों का आवास होता है। अचेतन मन की गहरी परतें जिनमें दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। इसी पाँचवें शरीर से सम्बन्धित हैं। मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, क्लैरेहवाइंस जैसे प्रयोग इसी स्तर के विकसित होने पर होते हैं । कठोर तन्त्र साधनाएँ एवं उग्र तपश्चर्याएँ इसी शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए की जाती हैं। संक्षेप में इसे ‘दैत्य’ सत्ता कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएँ- संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होते हैं। सामान्य सपने सभी देखते हैं पर जब चेतना इस पाँचवे शरीर में जमी होती है तो किसी घटना का सन्देश देने वाले सपने भी दीख सकते हैं। उनमें भूत, भविष्य की जानकारियों तथा किन्हीं रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन भी होता है। भविष्यवक्ताओं, तान्त्रिकों एवं चमत्कारी सिद्धि पुरुषों की गणना पाँचवे शरीर की जागृति से ही सम्भव होती है। ऊँची मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य जमीन पर खड़े मनुष्य की तुलना में अधिक दूर की स्थिति देख सकता है। जमीन पर खड़ा आदमी आँधी का अनुभव तब करेगा जब वह बिलकुल सामने आ जायगी। पर मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य कई मील दूर जब आँधी होंगी तभी उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। इतने मील दूर वर्षा हो रही है। अथवा अमुक स्थान पर इतने लोग इकट्ठे हैं। इसका वर्णन वह कर सकता जो ऊँचे पर खड़ा है और आँखों पर दूरबीन चढ़ाये है, नीचे खड़े व्यक्ति के लिए यह सिद्धि चमत्कार है, पर मीनार पर बैठे व्यक्ति के लिए यह दूरदर्शन नितान्त सरल और स्वाभाविक है।
छठे शरीर को देव शरीर कहते हैं-यही कॉस्मिक बाड़ी है। ऋषि , तपस्वी, योगी इसी स्तर पर पहुँचने पर बना जा सकता है। ब्राह्मणों और सन्तों का भू-देव, भू-सुर नामकरण उनकी दैवी अन्तःस्थिति के आधार पर है। स्वर्ग और मुक्ति इस स्थिति में पहुँचने पर मिलनेवाला मधुर फल है। सामान्य मनुष्य चर्म-चक्षुओं से देखता है, पर देव शरीर में दिव्य चक्षु खुलते हैं और “सियाराम मय सब जग जानी” के विराट ब्रह्मदर्शन की मनःस्थिति बन जाती है। कण-कण में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं और इस दिव्य उद्यान में सर्वत्र सुगंध महकती प्रतीत होती हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ही स्वर्ग है। स्वर्ग में देवता रहते हैं। देव शरीर में जागृत मनुष्यों के अन्दर उत्कृष्ट चिन्तन और बाहर आदर्श कर्तृत्व सक्रिय रहता है। तदनुसार भीतर शान्ति की मनःस्थिति और बाहर सुख भरी परिस्थिति भरी-पूरी दृष्टिगोचर होती है। स्वर्ग इसी स्थिति का नाम है। जो ऐसी भूमिका में निर्वाह करते हैं। उन्हें देव कहते हैं। असुर मनुष्य और देव यह आकृति से तो एक किन्तु प्रकृति से भिन्न होते हैं।
भौतिकवादी लोक-मान्यताओं का ऐसे देव मानवों पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ता । वे निन्दा-स्तुति की, संयोग-वियोग की, हानि-लाभ की, मानापमान की लौकिक सम्वेदनाओं से बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। लोक मान्यताओं को वे बाल-बुद्धि की दृष्टि से देखते हैं। लोभ-मोह, वासना-तृष्णा के भव-बन्धन सामान्य मनुष्यों को बेतरह जकड़कर कठपुतली की तरह नचाते हैं। छठवीं देव भूमिका में पहुँची देव आत्माएँ आदर्श और कर्त्तव्य मात्र को पर्याप्त मानती हैं। आत्मा और परमात्मा को सन्तोष देना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। वे अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करते समय लोक मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देते वरन् उच्चस्तरीय चेतना से प्रकाश ग्रहण करते हैं। इन्हें भव-बन्धनों से मुक्त-जीवन मुक्त कहा जाता है। मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लेना इसी स्थिति का नाम है। यह छोटे शरीर में देव स्थिति में कॉस्मिक बॉडी में विकसित आत्माओं को उपलब्ध होता है।
सातवाँ ब्रह्म शरीर है। इसमें आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होता है। वे शरीर झड़ जाते हैं जो किसी न किसी प्रकार भौतिक जगत से सम्बन्धित थे। उनका आदान-प्रदान प्रत्यक्ष संसार से चलता है। वे उससे प्रभावित होते और प्रभावित करते हैं। ब्रह्म शरीर का सीधा सम्बन्ध परमात्मा से होता है। उसकी स्थिति लगभग ब्रह्म स्तर की हो जाती है। अवतार इसी स्तर पर पहुँची हुई आत्माएँ हैं। लीला अवतरण में उनकी अपनी कोई इच्छा आकाँक्षा नहीं होती, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। ब्राह्मी चेतना किसी सृष्टि सन्तुलन के लिए भेजती है तो उस प्रयोजन को पूरा करके पुनः अपने लोक वापस लौट जाते हैं। ऐसे अवतार भारत में १० या २४ मान्य है। वस्तुतः उनकी गणना करना कठिन है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए वे समय-समय पर विलक्षण व्यक्तित्व सहित उतरते हैं और अपना कार्य पूरा करके वापिस चले जाते हैं। यह स्थिति ‘अहम् ब्रह्मोसि’ सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् सोऽहम्, कहने की होती है। उस चरम लक्ष्य स्थल पर पहुँचने की स्थिति को चेतना क्षेत्र में बिजली की तरह कोंधाने के लिए इन वेदान्त मन्त्रों का जप, उच्चारण एवं चिन्तन, मनन किया जाता है।
पाँचवें शरीर तक स्त्री-पुरुष का भेद, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तथा अगले जन्म में उसी लिंग का शरीर बनने की प्रक्रिया चलती है। उससे आगे के छठे और सातवें शरीर में विकसित होने पर यह भेदभाव मिट जाता है। तब मात्र एक आत्मा की अनुभूति होती है। स्त्री-पुरुष का आकर्षण-विकर्षण समाप्त हो जाता है। सर्वत्र एक ही आत्मा की अनुभूति होती है। अपने आपकी अन्तः स्थिति लिंग भेद से ऊपर उठी होती है यद्यपि जननेंद्रिय चिन्ह शरीर में यथावत् बने रहते हैं। यही बात साँसारिक स्थिति बदलने के कारण मन पर पड़ने वाली भली-बुरी प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में भी होती है। समुद्र में लहरें उठती-गिरती रहती हैं। नाविक उनके लिए हर्ष-शोक नहीं करता, समुद्री हलचलों का आनन्द लेता है। छठे शरीर में विकसित देवात्माएँ इस स्थिति से ऊपर उठ जाती हैं। उनका चेतना स्तर गीता में कहे गये 'स्थित प्रज्ञ ज्ञानी' की और उपनिषदों में वर्णित 'तत्वदर्शी' की बन जाती है। उसके आत्म सुख से संसार के किसी परिवर्तन में विक्षेप नहीं पड़ता। लोकाचार हेतु उपयुक्त लीला प्रदर्शन हेतु उसका व्यवहार चलता रहता है। यह छठे शरीर तक की बात है। सातवें शरीर वाले अवतारी (भगवान) संज्ञा से विभूषित होते हैं। इन्हें ब्रह्मात्मा, ब्रह्म पुरुष का सकते हैं। उन्हें ब्रह्म साक्षात्कार, ब्रह्म निर्वाण प्राप्त भी कहा जा सकता है।
छठे शरीर में स्थित देव मानव स्थितिवश शाप और वरदान देते हैं, पर सातवें शरीर वाले के पास शुभेच्छा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। उनके लिए पराया एवं बैरी कोई रहता ही नहीं। दोष, अपराधों को वे बाल बुद्धि मानते हैं और द्वेष दण्ड के स्थान पर करुणा और सुधार की बात भर सोचते हैं।
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार पृथ्वी के नीचे सात पाताल लोक वर्णित हैं जिनमें पाताल अंतिम है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में पाताल लोक से सम्बन्धित असंख्य कहानियाँ, घटनायें तथा पौराणिक विवरण मिलते हैं। पाताल लोक को नागलोक का मध्य भाग बताया गया है, क्योंकि जल-स्वरूप जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब वहाँ पर्याप्त रूप से गिरती हैं। पाताल लोक में दैत्य तथा दानव निवास करते हैं। जल का आहार करने वाली आसुर अग्नि सदा वहाँ उद्दीप्त रहती है। वह अपने को देवताओं से नियंत्रित मानती है, क्योंकि देवताओं ने दैत्यों का नाश कर अमृतपान कर शेष भाग वहीं रख दिया था। अत: वह अग्नि अपने स्थान के आस-पास नहीं फैलती। अमृतमय सोम की हानि और वृद्धि निरंतर दिखाई पड़ती है। सूर्य की किरणों से मृतप्राय पाताल निवासी चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से पुन: जी उठते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार पूरे भू-मण्डल का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन है। इसकी ऊँचाई सत्तर सहस्र योजन है। इसके नीचे सात लोक इस प्रकार हैं-१. अतल, २. वितल, ३. सुतल, ४. रसातल, ५. तलातल, ६. महातल, ७. पाताल।
पौराणिक उल्लेख
पुराणों में पाताल लोक के बारे में सबसे लोकप्रिय प्रसंग भगवान विष्णु के अवतार वामन और पाताल सम्राट बलि का है। रामायण में अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल लोक ले जाने पर श्री हनुमान के वहाँ जाकर अहिरावण वध करने का प्रसंग आता है। इसके अलावा भी ब्रह्माण्ड के तीन लोकों में पाताल लोक का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
***
मुक्तक: अर्पण
मैला-चटका है, मेरा मन दर्पण
बतलाओ तो किसको कर दू अर्पण?
जो स्वीकारे सहज भाव से इसको
होकर क्रुद्ध न कर दे मेरा तर्पण
***
जनक छंद
हरी दूब सा मन हुआ
जब भी संकट ने छुआ
'सलिल' रहा मन अनछुआ..
*
४-४-२०११
शे'र
पत्थर से हर शहर में, मिलते मकां हज़ारों।
मैं खोज-खोज हारा, घर एक नहीं मिलता..

बुधवार, 3 अप्रैल 2024

अप्रैल ३, गीत, तुम, युगतुलसी, क्षणिका, बुन्देली दोहे, माहिया, पर्यावरण, पंच यज्ञ, रागी छंद, यमक, सॉनेट, पैरोडी

सलिल सृजन ३ अप्रैल
*
स्मरण युग तुलसी
कंकर किस विधि बनता शंकर?
युगतुलसी ने हमें बताया,
बनें सहायक खुद प्रलयंकर,
यदि विश्वास न किया पराया।
श्रद्धा की पर्याय श्वास हो,
मैया बिछुड़ी महामंत्र दे,
राम-कृपा सुख या कि त्रास हो,
हनुमत प्रगटे राम यंत्र ले।
जीवन संगिन ने उपकारा,
रत्ना बन गार्हस्थ न थोपा,
उड़िया बाबा ने उच्चारा,
शुभ गुरुमंत्र भक्ति वट रोपा।
जिए हमेशा ही अकाम में
मिला अखंडानंद राम में।
३.३.२०२४
•••
मुक्तक
दुआ
दुआ करिए दुआ से ही दवा का काम हो जाए।
दुआ करिए दबा सच को न कोई झूठ जय पाए।।
करे वादा बता जुमला न नेता लोक को ठग ले-
नहीं फिर तंत्र रौंदे लोक को निज कीर्ति खुद गाए।।
३-४-२०२३
नौ दोहा दीप
दिन की देहरी पर खड़ी, संध्या ले शशि-दीप
गगन सिंधु मोती अगिन, तारे रजनी सीप
दीप जला त्राटक करें, पाएँ आत्म-प्रकाश
तारक अनगिन धरा को, उतर करें आकाश
दीप जलाकर कीजिए, हाथ जोड़ नत माथ
दसों दिशा की आरती, भाग्य देव हों साथ
जीवन ज्योतिर्मय करे, दीपक बाती ज्योत
आशंका तूफ़ान पर, जीते आशा पोत
नौ-नौ की नव माल से, कोरोना को मार
नौ का दीपक करेगा, तम-सागर को पार
नौ नौ नौ की ज्योति से, अन्धकार को भेद
हँसे ठठा भारत करे, चीनी झालर खेद
आत्म दीप सब बालिये, नहीं रहें मतभेद
अतिरेकी हों अल्पमत, बहुमत में श्रम - स्वेद
तन माटी माटी दिया, लौ - आत्मा दो ज्योत
द्वैत मिटा अद्वैत वर, रवि सम हो खद्योत
जन-मन वरण प्रकाश का, करे तिमिर को जीत
वंदन भारत-भारती कहे, बढ़े तब प्रीत
***
मुक्तिका
*
सलिल बूँद मिल स्वाति से, बन जाती अनमोल
तृषा पपीहे की बुझे, जब टेरे बिन मोल
मन मुकुलित ममतामयी!, हो दो यह वरदान
सलिल न पंकिल हो तनिक, बहे मधुरता घोल
मनुज छोर की खोज में, भटक रहा दिन-रैन
कौन बताये है नहीं, छोर जगत है गोल
रहे शिष्य की छाँह से, शिक्षक हरदम दूर
गुरु कह गुरुघंटाल बन, परखें स्वारथ तोल
झूम बजाएँ नाचिए, किंतु न दीजै फाड़
अटल सत्य हर ढोल में, रही हमेशा पोल
सगा न कोई किसी का, सब मतलब के मीत
सरस सत्य हँस कह सलिल, अप्रिय सत्य मत बोल
अगर मधुरता अत्यधिक, तब रह सजग-सतर्क
छिप अमृत की आड़ में, गरल न करे किलोल
***
मुक्तिका -
सूत्र - रगण गुरु
ध्वनिखंड - फाइलातुं
*
सत्य बोलें
या न बोलें।
वाक् द्वारा
प्रेम घोलें।
क्यों न भैये
बात तोलें?
आदमी के
साथ होलें।
आँसुओं की
माल पो लें।
वायदों की
नस्ल बो लें।
कायदे से
साँस तो लें
३-४-२०२०
***
कुण्डलिया
*
कहता साहूकार क्यों, मैं हूँ चौकीदार?
स्वांग रचाकर चाहता, बना सके सरकार
बना सके सरकार, न चाहे चूके मौका
बुआ भतीजा मिले, लगाने फिर से चौका
भैया-बहिना संग, बंधु को बंधु न सहता
दगाबाज दे दगा, चोर औरों को कहता
*
आवारा मन ने कहा, लड़ ले आम चुनाव
खास-खास हैं सड़क पर, सम हैं भाव-अभाव
सम हैं भाव-अभाव, माँग लो माँग न चूको
नोटा में मतदान, करो हर दल पर भूँको
अब तक ठगता रहा, ठगाया अब बेचारा
मन की कहे तरंग, न हो जन-गण बेचारा
***
एक दोहा
खास-ख़ास बतला रहे, आया आम चुनाव।
ताव-भाव मत माँगते, मत दें भूख-अभाव।।
***
कार्य शाला :
दोहा प्रश्नोत्तर
*
सरोज सिंह परिहार 'सूरज' नागौद
नीर भरे नैना रहें,लिये दरस की प्यास।
प्यासे नैना जल भरे,अजब विरोधाभास।।
*
संजीव वर्मा 'सलिल'
स्नेह सलिल नैना लिए, करें दरस की प्यास।
नेह नर्मदा मिल बहे, नहीं विरोधाभास।।
***
३.४.२०१९
पैरोडी- हवाई दोस्ती है ये
ई मित्रता पर पैरोडी:
*
(बतर्ज़: अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...)
*
हवाई दोस्ती है ये,
निभाई जाए किस तरह?
मिलें तो किस तरह मिलें-
मिली नहीं हो जब वज़ह?
हवाई दोस्ती है ये...
*
सवाल इससे कीजिए?
जवाब उससे लीजिए.
नहीं है जिनसे वास्ता-
उन्हीं पे आप रीझिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
जमीं से आसमां मिले,
कली बिना ही गुल खिले.
न जिसका अंत है कहीं-
शुरू वहीं हैं सिलसिले.
हवाई दोस्ती है ये...
*
दुआ-सलाम कीजिए,
अनाम नाम लीजिए.
न पाइए न खोइए-
'सलिल' न ख्वाब देखिए.
हवाई दोस्ती है ये...
***
छंद- दोहा
अलंकार- यमक
*
मिला भाग से भाग, गुणा-भाग कर भाग मत।
ले जो भाग सुभाग, उससे दूर न भागता।।
*
भाग = किस्मत, हिस्सा, हिसाब-किताब, दूर जाना, भाग लेना, सौभाग्य, अलग होता।
संवस, ३-४-२०१९
***
स्मरणांजलि:
कमला देवी चट्टोपाध्याय
*
कमला देवी चट्टोपाध्याय भारतीय नारी के नवजागरण काल ही अविस्मरणीय विभूति रहीं हैं। स्वतंत्रता सत्याग्रही, समाज सुधारक, नाट्य कला उन्नायक, हथकरघा विकासक तथा हस्त शिल्प संरक्षक के रूप में उनका योगदान असाधारण और उल्लेखनीय रहा है। उनका जीवनकाल (३ अप्रैल १९०३, मैंगलोर - २९ अक्टूबर १९८८) विशेषकर सवातंत्र्योपरांत अवधि भारतीय नारी के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन हेतु सहकारिता आंदोलन को समर्पित रहा। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, संगीत-नाटक अकादमी, सेन्ट्रल कोटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम, क्राफ्ट्स कौंसिल ऑफ़ इंडिया जैसी अनेक संस्थाएँ उनकी दूरदृष्टि के फलस्वरूप अस्तित्व में आईं। प्रबल विरोध सहकर भी उनहोंने हस्तशिल्प तथा सहकारिता को आम जनों के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन के लिए प्रभावी अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। उन्हें १९७४ में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (संगीत-नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान) से अलंकृत किया गया।
कमलादेवी अपने पिता अनंथ्य धारेश्वर (जिला कलेक्टर मैंगलोर) तथा माता गिरिजाबाई (कर्णाटक के संभ्रांत परिवार कन्या) की चौथी संतान थीं। उन्हें साहित्यिक-सांस्कृतिक मूल्यों की समझ और देश सेवा का संस्कार अपनी विदुषी दादी और माँ से विरासत में मिला। कमलादेवी मेधावी विद्यार्थी थीं जिन्होंने बचपन से ही साहस और आत्म विश्वास का परिचय दिया। महादेव गोविन्द रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, रमाबाई रानाडे, एनी बेसेंट, जैसे राष्ट्रवादी नेता परिवार के अन्तरंग मित्र थे, उनके आवागमन से तरुणी कमलादेवी को राष्ट्रीय आन्दोलन को समझने और उससे जुड़ने की प्रेरणा मिली। उनहोंने केरल की संस्कृत नाट्य परंपरा 'केरल-कुट्टीयट्टम' का शिक्षण महान गुरु पद्म श्री मणि माधव चक्यार किल्लीकुरुसिमंगलम में उनके निवास पर रहकर प्राप्त किया।
दुर्योगवश उनकी आदर्श बड़ी बहन सगुना का विवाह के अल्प काल बाद तरुणाई में ही निधन हो गया। कमला देवी ७ वर्ष की ही थीं कि उनके पिता नहीं रहे। तत्कालीन कानूनों के अनुसार पिता की विशाल संपत्ति कमला देवी के माँ गिरिजाबाई के सौतेले पुत्रों को मिली। गिरिजा बाई को नाममात्र की भरणपोषण निधि मिली जिसे उस स्वाभिमानी महिला ने ठुकराते हुए अपने दहेज़ में मिली संपत्ति से अपनी बेटियों का पालन-पोषण करने का निर्णय लिया। कमलादेवी ने साहस और संघर्ष के गुण अपनी माँ से पाए। मात्र १४ वर्ष की आयु में १९१७ में उनका विवाह कृष्ण राव के साथ हुआ किन्तु दुर्भाग्यवश दो वर्ष बाद ही १९१९ में वे विधवा हो गईं।
क्वीन मेरी कोलेज चेन्नई में पढ़ते समय वे सरोजिनी नायडू की छोटी बहिन सुहासिनी चट्टोपाध्याय तथा उनके प्रतिभाशाली भाई हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (कालांतर में प्रसिद्ध कवि, लेखक, अभिनेता) के संपर्क में आईं। कला के प्रति लगाव इन दोनों के मिलन में सहायक हुआ। २० वर्ष की होने पर १९२३ में कमलादेवी, तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के घोर विरोध के बाद भी हरिन्द्रनाथ के साथ विवाह बंधन में बंध गईं। विवाह के शीघ्र बाद हरिन प्रथम विदेश यात्रा पर लंदन प्रस्थित हो गए, कुछ माह बाद कमला देवी भी उनसे जा मिलीं और उनहोंने बेडफ़ोर्ड कोलेज लन्दन से समाजशास्त्र में डिप्लोमा प्राप्त किया। उन्हें एक पुत्र हुआ जिसका नाम रामकृष्ण चट्टोपाध्याय रख गया।
१९२३ में महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन का समाचार मिलाने पर वे तत्काल भारत लौटीं और समाज के उत्थान हेतु गठित गांधीवादी संस्था 'सेवा दल' में जुड़ गईं तथा शीघ्र ही महिला प्रकोष्ठ प्रभारी बना दी गईं। उनहोंने पूरे देश से दक्ल के लिए सभी आयु वर्गों की महलों का चयन 'सेविका; हेतु किया तथा उन्हें प्रशिक्षण भी दिया। वर्ष १९२६ में उनकी भेंट सफ्रागेट मार्ग्रेट ई. कूजीन, आल इंडिया वीमन कोंफेरेंस के संस्थापक से हुई, जिन्होंने कमलादेवी को मद्रास प्रविन्शिअल लेजिस्लेटिव असेम्बली के चुनाव में भागीदारी हेतु हेतु प्रेरित किया। वे भारत की प्रथम महिला उम्मीदवार बनीं, उन्हें प्रचार हेतु अत्यल्प समय मिला तथापि वे केवल ५५ मतों से पराजित हुईं।
आल इंडिया वीमन कोंफेरेंस की स्थापना के पश्चात् वे इसकी प्रथम महिला संगठन सचिव हुईं। कालांतर में यह संस्था देशव्यापी संगठन के रूप में विकसित हुई, पूरे देश में इसकी शाखाएँ आरम्भ हुईं। कमलादेवी ने सघन दौरे कर संवैधानिक सुधारों की जमीन तैयार की। उनहोंने कई यूरोपीय देशों की यात्रा की तथा वहाँ से प्रेरणा प्राप्त कर भारत में महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की। इसका शानदार उदाहरण लेडी इरविन गृह विज्ञान महाविद्यालय दिल्ली जैसी सर्वकालिक श्रेष्ठ संस्था है। १९३० में महात्मा गांधी द्वारा नमक सत्त्याग्रह हेतु गठित सात सदस्यीय दल की के सदस्य कमलादेवी भी थीं जिन्होंने मुम्बई बीच फोर्ट पर नमक बनाया।इस समिति में दूसरी महिला अवन्तिका बी गोखले थीं। कमलादेवी यहीं नहीं रुकीं। उनहोंने साहस की मिसाल कायम करते हुए समीपस्थ उच्च न्यायालय में जाकर उपस्थित न्यायाधीश से पूछा कि क्या वह उनके द्वारा तुरंत तैयार किया गया नमक खरीदना चाहेगा? २६ जनवरी १९३० को भारतीय तिरंगे झंडे से लिपटकर उसकी रक्षा करने पर वे देशव्यापी चर्चा औरए सराहना की पात्र हुईं। १९३० में ही मुम्बई स्टोक एक्सचेज में घुसकर देशी नमक के पैकेट बेचने पर उन्हें गिरफ्तार कर एक साल का कारावास दिया गया।
हरिन और कमला ने अनेक कलात्मक प्रयोग किए और ख्यति अर्जित की, उन्हें एक पुत्र रामा प्राप्त हुआ। उस समय संभ्रांत परिवारों की महिलाओं के लिए अभिनय का निषेध होने पर भी कमला देवी ने कुछ चलचित्रों में अभिनय किया और अपनी प्रतिभा की छाप छोडी। वर्ष १९३१ में शूद्रक के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित प्रथम कन्नड़ मूक चलचित्र मृच्छकटिक (वसंतसेना) जिसके नायक येनाक्षी रामाराव, निदेशक कन्नड़ फिल्मों के पितामह मोहन दयाराम भवानी थे, में अभिनय कर कमलादेवी ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। तत्पश्चात अपनी दूसरी पारी में वर्ष १९४३ में हिंदी चलचित्र तानसेन (नायक के.एल.सहगल, सहनायिका खुर्शीद), शंकर-पारवती (१९४३), तथा धन्ना भगत (१९४५) में कमलादेवी ने जीवंत अभिनय किया। विवाह के कई वर्षों बाद एक और परंपरा को तोड़ते हुए कमलादेवी ने 'तलाक' का वाद स्थापित कर १९५५ में विवाह का अंत किया।
वर्ष १९३६ में कमला देवी कोंग्रेस समाजवादी दल की अध्यक्ष चुनी गईं जहाँ उनके सहयोगी जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और मीनू मसानी जैसे प्रखर नेता थे। १९४० में द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ होते समय कमलादेवी लन्दन में थीं। उनहोंने तुरंत विश्व भ्रमण कर भारत की परिस्थिति और विश्व युद्ध के पश्चात स्वाधीनता हेतु वातावरण बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया।
भारत की स्वतंत्रता के साथ आई विभाजन की त्रसदी से दात्कार्जूझते हुए कमला देवी ने शरणार्थियों के पुनर्वास के कार्य में खुद को झोंक दिया। उनहोंने इन्डियन कोओपरेटिव यूनियन की स्थापना कर पुनर्वास तथा सहकारिता आधारित नगर निर्माण की संकल्पना को मूर्त रूप दिया। भारत सरकार विशेषकर जवाहरलाल नेहरु ने इस शर्त पर अनुमति दी कि वे सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मांगेंगी। कमलादेवी ने असाधारण जीवत का परिचय देते हुए नार्थ वेस्ट फ्रंटीयार से आये ५०.००० से अधिक शरणार्थियों के लिए दिल्ली की सीमा पर फरीदाबाद नगर का निर्माण कराया। उनहोंने शरणार्थियों को रहने के लिए घर तथा आजीविका चलाने के लिए नया काम-धंधा सिखाने, तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करने के लिए खुद को झोंक दिया।
जीवन के उत्तरार्ध में भारतीय हस्तशिल्प तथा हस्तकलाओं के संरक्षण, उन्नयन तथा आजीविका-साधन के रूप में विकास के प्रति कमला देवी समर्पित रहीं। उनहोंने नेहरू जी द्वारा पश्चिमी देशों से विशाल उत्पादन तकनीक को उद्योग जगत में लाने के प्रयासों से हत्शिल्प और हस्तकलाओं पर संभावित दुष्प्रभावों से बचाने का सफल प्रयास लगातार किया। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के लिए क्राफ्ट म्यूजियम स्थापित कर उन्हें पारंपरिक कलाओं के भण्डार ग्रहों और विक्रय केन्द्रों के रूप में विकसित किया। इसक श्रेष्ठ उदाहरण थियेटर क्राफ्ट्स म्यूजियम दिल्ली है।उन्होंने शिल्प और कलाओं को उन्नत करने के साथ-साथ श्रेष्ठ कलाकारों-शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने के लिए, उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करने, उन्हें पुरस्कृत करने तथा उनकी कलाकृतियों को पारंपरिक गौरव के साथ जोड़कर क्रय करने की मानसिकता पूरे देश में विकसित की। १९६४ में कमला देवी ने भारतीय नाट्य संघ के अंतर्गत नाट्य इन्स्टीट्यट ऑफ़ कत्थक एंड कोरिओग्राफी बेंगलुरु का श्री गणेश किया तथा यूनेस्को से सम्बद्ध कराया। इसकी वर्तमान निदेशक श्रीमती माया राव हैं।
कमलादेवी अपने समय से बहुत आगे रहने वाली महिला रत्न थीं। वे आल इण्डिया हिन्दी क्राफ्ट बोर्ड की स्थापना के मूल में थीं तथा इसकी प्रथम अध्यक्ष रहीं। क्राफ्ट कौंसिल ऑफ़ इंडिया, को विश्व क्राफ्ट्स कौंसिल एशिया-पेसिफिक रीजन का प्रथम अध्यक्ष होने का गौरव कमलादेवी ने ही दिलाया। कालांतर में उनहोंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा की स्थापना, संगीत-नाटक अकादमी की अध्यक्षता तथा यूनेस्को के सदस्य के रूप में महती भूमिका का निर्वहन किया। १९८६ में उनकी आत्मकथा 'इनर रिसेसेस एंड आउटर स्पेसेस' प्रकाशित हुई।
पुरस्कार-सम्मान:
वर्ष १९५५ में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' तथा १९८७ में द्वितीय सर्वोच्च नागरिक अलंकरण 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया। उन्हें वर्ष १९६६ में सामुदायिक नेतृत्व हेतु विश्व विख्यात रमनमैगसाय्साय पुरस्कार, संगीत-नाटक अकादमी से संगीत-नाटक अकादमी फेलोशिप व रत्न सदस्य तथा इंडियास नेशनल अकादमी ऑफ़ म्यूजिक, डांस एंड ड्रामा के लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड जैसे सर्वोच्च पुरस्कार देकर संस्थाएं गौरंवान्वित हुईं। यूनेस्को ने १९७७ में उन्हें हस्तशिल्प के उन्नयन हेतु पुरस्कृत किया। शान्तिनिकेतन ने अपना सर्वोच्च 'देशिकोत्तम' पुरस्कार समर्पित किया।
भारत सरकार की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा मार्च २०१७ में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला बुनकरों एवं शिल्पियों के लिए ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार’ शुरू करने की घोषणा की गई है।
साहित्य:
कमला देवी ने अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया है। प्रमुख है: १. The Awakening of Indian women, Everyman's Press, 1939. २. Japan-its weakness and strength, Padma Publications 1943.३. Uncle Sam's empire, Padma publications Ltd, 1944.४. In war-torn China, Padma Publications, 1944.५. Towards a National theatre, (All India Women's Conference, Cultural Section. Cultural books), Aundh Pub. Trust, 1945.६. America,: The land of superlatives, Phoenix Publications, 1946.७. At the Cross Roads, National Information and Publications, 1947.८. Socialism and Society, Chetana, 1950.९. Tribalism in India, Brill Academic Pub, 1978, ISBN 0706906527.१०. Handicrafts of India, Indian Council for Cultural Relations & New Age International Pub. Ltd., New Delhi, India, 1995. ISBN 99936-12-78-2.११. Indian Women's Battle for Freedom. South Asia Books, 1983. ISBN 0-8364-0948-5.१२. Indian Carpets and Floor Coverings, All India Handicrafts Board, 1974.१३. Indian embroidery, Wiley Eastern, 1977.१४. India's Craft Tradition, Publications Division, Ministry of I & B, Govt. of India, 2000. ISBN 81-230-0774-4.१५. Indian Handicrafts, Allied Publishers Pvt. Ltd, Bombay India, 1963.१६. Traditions of Indian Folk Dance.१७. The Glory of Indian Handicrafts, New Delhi, India: Clarion Books, 1985.१८. Inner Recesses, Outer Spaces: Memoirs, 1986. ISBN 81-7013-038-7.
कमलादेवी चट्टोपाध्याय पर पुस्तकें: १.. Sakuntala Narasimhan, Kamaladevi Chattopadhyay. New Dawn Books, 1999. ISBN 81-207-2120-9. २. S.R. Bakshi, Kamaladevi Chattopadhyaya : Role for Women’s Welfare, Om, 2000, ISBN 81-86867-34-1.३. Reena Nanda, Kamaladevi Chattopadhyaya: A Biography (Modern Indian Greats), Oxford University Press, USA, 2002, ISBN 0-19-565364-5.४. Jamila Brij Bhushan, Kamaladevi Chattopadhyaya – Portrait of a Rebel, Abhinav Pub, 2003. ISBN 81-7017-033-8. ५. M.V. Narayana Rao (Ed.), Kamaladevi Chattopadhyay: A True Karmayogi. The Crafts Council of Karnataka: Bangalore. 2003 ६. Malvika Singh, The Iconic Women of Modern India – Freeing the Spirit. Penguin, 2006, ISBN 0-14-310082-3.७. Jasleen Dhamija, Kamaladevi Chattopadhyay, National Book Trust, 2007. ISBN 8123748825 ८. . Indra Gupta , India’s 50 Most Illustrious Women. ISBN 81-88086-19-3.
***
छंद सलिला :
राग और रागी जातीय छंद
*
हिंदी पिंगल में छ: रागों के आधार पर छ: मात्रिक छंद को 'रागी जातीय' छंद कहा गया है। 'षटराग' का अभ्यासी अपनी धुन में मस्त रहा और जन सामान्य उसे न 'खटरागी' कहकर उपहास करता रहा।
रागों के वर्गीकरण की परंपरागत पद्धति (१९वीं सदी तक) के अनुसार हर एक राग का परिवार है। मुख्य छः राग हैं पर विविध मतों के अनुसार उनके नामों व पारिवारिक सदस्यों की संख्या में अन्तर है। इस पद्धति को मानने वालों के चार मत हैं।
१. शिव मत इसके अनुसार छः राग माने जाते थे, प्रत्येक की छः-छः रागिनियाँ तथा आठ पुत्र हैं। इस मत में मान्य छः राग- १. राग भैरव, २. राग श्री, ३. राग मेघ, ४. राग बसंत, ५. राग पंचम, ६. राग नट नारायण हैं।
कल्लिनाथ मत- इसमें भी वही छः राग माने गए हैं जो शिव मत के हैं, पर रागिनियाँ व पुत्र-रागों में अन्तर है।
भरत मत- के अनुसार छः राग, प्रत्येक की पाँच-पाँच रागिनियाँ आठ पुत्र-राग तथा आठ पुत्र वधू हैं। इस मत में मान्य छः राग निम्नलिखित हैं- १. राग भैरव, २. राग मालकोश, ३. राग मेघ, ४. राग दीपक, ५. राग श्री, ६. राग हिंडोल।
हनुमान मत- इस मत के अनुसार भी छः राग वही हैं जो 'भरत मत' के हैं, परन्तु इनकी रागिनियाँ, पुत्र-रागों तथा पुत्र-वधुओं में अन्तर है।
ये चारों पद्धति १८१३ ई. तक चलीं तत्पश्चात पं॰ भातखंडे जी ने 'थाट राग' पद्धति का प्रचार व प्रसार किया।
*
विमर्श :
पंच यज्ञ
हर मनुष्य को ५ श्रेष्ठ कर्ण नियमित रूप से करना चाहिए. इन्हीं कर्मो का नाम यज्ञ है। ५ यज्ञों के आधार पर ५ मात्राओं के छंदों को याज्ञिक जातीय कहा गया है। ५ यज्ञ निम्न हैं-
१. ब्रह्मयज्ञ- प्रातः सूर्योदय से पूर्व तथा सायं सूर्यास्त के बाद जब आकाश में लालिमा हो तब एकांत स्थान में बैठ कर ईश्वर का ध्यान करना ब्रह्मयज्ञ (संध्या) है।
२. देवयज्ञ- अग्निहोत्र (हवन) देवयज्ञ है। हम अपने शरीर द्वारा वायु, जल और पृथ्वी को निरंतर प्रदूषित करते हैं। मानव निर्मित यंत्र भी प्रदूषणफैलाते हैं जिसे रोक वायु,जल और पृथ्वी को पवित्र करने हेतु हवन करना हमारा परम कर्तव्य है।
हवन में बोले मन्त्रों से मानसिक - आत्मिक पवित्रता एवं शान्ति प्राप्त होती है।
३. पितृ यज्ञ- जीवित माता पिता गुरुजनो और अन्य बड़ो की सेवा एवं आज्ञा पालन करना ही पितृ यज्ञ है।
४. अतिथि यज्ञ- घर आये विद्वान्,धर्मात्मा, स्नेही स्वजन आदि का सत्कार कर ज्ञान पाना अतिथि यज्ञ है।
५. बलिवैश्वदेव यज्ञ- पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि पर दया कर खाना-पानी देना बलिवैश्वदेव यज्ञ है।
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।। वेदोक्त रात्रि सूक्त।।
*
। ॐ रजनी! जग प्रकाशें, शुभ-अशुभ हर कर्म फल दें।
।। विश्व-व्यापें देवी अमरा,ज्योति से तम नष्ट कर दें।।
*
। रात्रि देवी! भगिनी ऊषा को प्रगट कर मिटा दें तम।
।। मुदित हों माँ पखेरू सम, नीड़ में जा सो सकें हम ।।
*
। मनुज, पशु, पक्षी, पतंगे, पथिक आंचल में सकें सो।
।। काम वृक वासना वृकी को, दूर कर सुखदायिनी हो।।
*
। घेरता अज्ञान तम है, उषा!ऋणवत दूर कर दो।
।। पयप्रदा गौ सदृश रजनी!, व्योमपुत्रि!! हविष्य ले लो।।
***
***
दोहे पर्यावरण के
भारत की जय बोल
*
वृक्ष देव देते सदा, प्राणवायु अनमोल.
पौधारोपण कीजिए, भारत की जय बोल..
*
पौधारोपण से मिले, पुत्र-यज्ञ का पुण्य.
पेड़ काटने से अधिक, पाप नहीं है अन्य..
*
माँ धरती के लिये हैं, पत्ते वस्त्र समान.
आभूषण फल-फूल हैं, सर पर छत्र वितान..
*
तरु-हत्या दुष्कर्म है, रह नर इससे दूर.
पौधारोपण कर मिले, तुझे पुण्य भरपूर..
*
पेड़ कटे, वर्षा घटे, जल का रहे अभाव.
पशु-पक्षी हों नष्ट तो, धरती तप्त अलाव..
*
जीवनदाता जल सदा, उपजाता है पौध.
कलकल कलरव से लगे, सारी दुनिया सौध..
*
पौधे बढ़कर पेड़ हों, मिलें फूल,फल, नीड़.
फुदक-फुदक शुक-सारिका, नाचें देखें भीड़..
*
पेड़ों पर झूले लगें, नभ छू लो तुम झूल.
बसें देवता-देवियाँ. काटो मत तुम भूल..
*
पीपल में हरि, नीम में, माता करें निवास.
शिव बसते हैं बेल में, पूजो रख विश्वास..
*
दुर्गा को जासौन प्रिय, हरि को हरसिंगार.
गणपति चाहें दूब को, करिए सबसे प्यार..
*
शारद-लक्ष्मी कमल पर, 'सलिल' रहें आसीन.
पाट रहा तालाब नर, तभी हो रहा दीन..
३-४-२०१७
***
माहिया (त्रिपदियाँ)
*
हर मंच अखाडा है
लड़ने की कला गायब
माहौल बिगाड़ा है.
*
सपनों की होली में
हैं रंग अनूठे ही
सांसों की झोली में.
*
भावी जीवन के ख्वाब
बिटिया ने देखे हैं
महके हैं सुर्ख गुलाब
*
चूनर ओढ़ी है लाल
सपने साकार हुए
फिर गाल गुलाल हुए
*
मासूम हँसी प्यारी
बिखरी यमुना तट पर
सँग राधा-बनवारी
*
पत्तों ने पतझड़ से
बरबस सच बोल दिया
अब जाने की बारी
*
चुभने वाली यादें
पूँजी हैं जीवन की
ज्यों घर की बुनियादें
*
देखे बिटिया सपने
घर-आँगन छूट रहा
हैं कौन-कहाँअपने?
*
है कैसी अनहोनी?
सँग फूल लिये काँटे
ज्यों गूंगे की बोली
३-४-२०१६
***
बुन्देली दोहे
महुआ फूरन सों चढ़ो, गौर धना पे रंग।
भाग सराहें पवन के, चूम रहो अॅंग-अंग।।
मादल-थापों सॅंग परंे, जब गैला में पैर।
धड़कन बाॅंकों की बढ़े, राम राखियो खैर।।
हमें सुमिर तुम हो रईं, गोरी लाल गुलाल।
तुमें देख हम हो रए, कैसें कएॅं निहाल।।
मन म्रिदंग सम झूम रौ, सुन पायल झंकार।
रूप छटा नें छेड़ दै, दिल सितार कें तार।।
नेह नरमदा में परे, कंकर घाईं बोल।
चाह पखेरू कूक दौ, बानी-मिसरी घोल।।
सैन धनुस लै बेधते, लच्छ नैन बन बान।
निकरन चाहें पै नईं, निकर पा रए प्रान।।
तड़प रई मन मछरिया, नेह-नरमदा चाह।
तन भरमाना घाट पे, जल जल दे रौ दाह।।
अंग-अंग अलसा रओ, पोर-पोर में पीर।
बैरन ननदी बलम सें, चिपटी छूटत धीर।।
कोयल कूके चैत मा, देख बरे बैसाख।
जेठ जिठानी बिन तपे, सूरज फेंके आग।।
३-४-२०१६
***
क्षणिका
कानून और आदमी
*
क़ानून को
आम आदमी तोड़े
तो बदमाश
निर्बल तोड़े
तो शैतान
असहाय तोड़े
तो गुंडा
समर्थ या नेता
तोड़े तो निर्दोष
और अभिनेता
तोड़े तो
सहानुभूति का पात्र.
३-४-२-१३
***
गीत:
बिन तुम्हारे...
*
बिन तुम्हारे सूर्य उगता, पर नहीं होता सवेरा.
चहचहाते पखेरू पर डालता कोई न डेरा.
उषा की अरुणाई मोहे, द्वार पर कुंडी खटकती.
भरम मन का जानकर भी, दृष्टि राहों पर अटकती..
अनमने मन चाय की ले चाह जगकर नहीं जगना.
दूध का गंजी में फटना या उफन गिरना-बिखरना..
साथियों से बिना कारण उलझना, कुछ भूल जाना.
अकेले में गीत कोई पुराना फिर गुनगुनाना..
साँझ बोझिल पाँव, तन का श्रांत, मन का क्लांत होना
याद के बागों में कुछ कलमें लगाना, बीज बोना..
विगत पल्लव के तले, इस आज को फिर-फिर भुलाना.
कान बजना, कभी खुद पर खुद लुभाना-मुस्कुराना..
बिन तुम्हारे निशा का लगता अँधेरा क्यों घनेरा?
बिन तुम्हारे सूर्य उगता, पर नहीं होता सवेरा.
३-४-२०११
***