एक गीत :
*
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
तुम ही नहीं सयाने जग में
तुम से कई समय के मग में
धूल धूसरित पड़े हुए हैं
शमशानों में गड़े हुए हैं
अवसर पाया काम करो कुछ
मिलकर जग में नाम करो कुछ
रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही
झिल रहे हो, झेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
दलबंदी का दलदल घटक
राजनीति है गर्हित पातक
अपना पानी खून बतायें
खून और का व्यर्थ बहायें
सच को झूठ, झूठ को सच कह
मैली चादर रखते हो तह
देशहितों की अनदेखी कर
अपनी नाक नकेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
२२-१२-२०१७
*
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020
कुंडलिया, दोहे, नवगीत, मुक्तक, क्षणिका, सवैया, बाल गीत, षट्पदी, लघुकथा
*
कुंडलिया
वादे कर जो भुला दे, वह खोता विश्वास.
ऐसे नेता से नहीं, जनता को कुछ आस.
जनता को कुछ आस, स्वार्थ ही वह साधेगा.
भूल देश-हित दल का हित ही आराधेगा.
सलिल कहे क्यों दल-हित को जनता पर लादे.
वह खोता विश्वास भला दे जो कर वादे
१९-१२-२०१७
*
शिवमय दोहे
लोभ, मोह, मद शूल हैं, शिव जी लिए त्रिशूल.
मुक्त हुए, सब को करें, मनुज न करना भूल.
.
जो त्रिशूल के लक्ष्य पर, निश्चय होता नष्ट.
बाणासुर से पूछिए, भ्रष्ट भोगता कष्ट.
.
तीन लोक रख सामने, रहता मौन त्रिशूल.
अत्याचारी को मिले, दंड हिला दे चूल.
.
जर जमीन जोरू 'सलिल', झगड़े की जड़ तीन.
शिव त्रिशूल छोड़े नहीं, भूल अगर संगीन.
.
शिव-त्रिशूल से काँपते, देव दनुज नर प्रेत.
जो सम्मुख आया, हुआ शिव प्रहार से खेत.
२२-१२-२०१७
शिव न सहज ही रुष्ट हों, लेकिन सहज प्रसन्न.
रुष्ट सहज, खुश हो न जो, उस सा कौन विपन्न?
.
आप अनाहद नाद शिव, जग जाने ओंकार,
जो जपता श्रद्धा सहित, उसके मिटें विकार.
.
नंदी बैठा ताल दे, शिव हों नृत्य-विभोर.
लिपट कंठ से झूमता, नागराज कह और.
.
शशि सिर पर शशिनाथ के, बैठा ले आनंद.
गणपति रचते नित नए, उमा सुनातीं छ्न्द.
.
अमृत-विष का संतुलन, सुख-दुख सह समभाव.
शिव त्रिशूल ले हाथ में, हँसकर करें निभाव.
१९-१२-२०१७
.
शिव को बाहर खोज मत, मन के भीतर झाँक.
सत्-सुंदर ही शिवा हैं, आँक सके तो आँक.
.
शिवा कार्य-कारण बनें, शिव हों सहज निमित्त.
परि-सम्पूरक जानिए, जैसे हों तन-चित्त.
.
शिव तो देहातीत हैं, उन्हें देह मत मान.
शिव से सच कब छिप सका?, तुरत हरें अभिमान.
.
शिव भोले भाले दिखें, किंतु चतुर हैं खूब.
हैं भोले भाले लिए, सजग ध्यान में डूब.
.
अहंकार गिरि पर बसें, शिव रखकर निज पैर,
अहं गला ममता बना, शिवा रहें निर्वैर.
.
१८-१२-२०१७
*
नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
.
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
.
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
.
३-१२-२०१७
*
अपनी अपनी ढपलियाँ, अपने-अपने राग.
कोयल-कंठी मौन है, सुरमणि होते काग.
वैतालिक कवि विचरते, मनोलोक में खूब.
नभ ले आते धरा पर, कर कल्पना अजूब.
*
दोहा
राम-राम सब से करें,या कहिए जय राम.
कह आ राम विराम तज, काम करें तज काम.
२-१२-२०१७
मुक्तक
नमन तुमको कर रहा सोया हुआ ही मैं
राह दिखाता रहा, खोया हुआ ही मैं
आँख बंद की तो हुआ सच से सामना
जाना कि नहीं दूध का धोया हुआ हूँ मैं
१-१२-२०१७
*
क्षणिका
उस्ताद अखाड़ा नहीं,
दंगल हुआ?, हुआ.
बाकी न वृक्ष एक भी,
जंगल हुआ? हुआ.
दस्तूर जमाने का अजब,
गजब ढा रहा
पूछते-
हाय-हाय कर
मंगल हुआ? हुआ.
*
मुक्तक
घर-घर में गान्धारियाँ हैं, कोई क्या करे?
करती न रफ़ू आरियाँ हैं, कोई क्या करे?
कुन्ती, विदुर न धर्मराज शेष रहे हैं-
शकुनी-अशेष पारियाँ हैं, कोई क्या करे?
३०-११-२०१७
*
क्षणिका
भोर भई जागो
*
चीर तम का चीर आता,
रवि उषा के साथ.
दस दिशाएँ करें वंदन
भले आए नाथ.
करें करतल-ध्वनि बिरछ मिल,
सलिल-लहर हिलोर.
'भोर भई जागो' गाती है
प्रात-पवन झकझोर.
१५-११-२०१७
*
दोहे
जब तक मन में चाह थी,
तब तक मिली न राह.
राह मिली अब तो नहीं,
शेष रही है चाह.
.
राम नाम की चाह कर,
आप मिलेगी राह.
राम नाम की राह चल,
कभी न मिटती चाह.
.
दुनिया कहती युक्ति कर,
तभी मिलेगी राह.
दिल कहता प्रभु-भक्ति कर,
मिल मुक्ति बिन चाह.
.
भटक रहे बिन राह ही,
जग में सारे जीव.
राम-नाम की राह पर,
चले जीव संजीव.
.१४-११-२०१७
*
जनक छंद
श्रीगणेश रुचिकर हुआ
जनकछंद काकातुआ
कलरव कर मन हर रहा.
८-११-२०१७
*
सवैया
रचना विधान- (गुरु लघु लघु x ७)
.
कार्य व कारण भिन्न दिखें पर भिन्न नहीं दिखते भर हैं
साध्य व साधन एक नहीं पर एक बने फ़लते तब हैं
तीर व लक्ष्य न एक हुए यदि तो न धनुर्धर जीत सके
ज्यों विधि विष्णु व शंकर हैं त्रय एक नहीं पर एक सखे!
रचना विधान - (लघु लघु गुरु) x ८
.
चलते - चलते, घुलते - मिलते, सद्भाव बढ़ा, हम एक बने.
हर धर्म कहे, यह मर्म सखे!, कर कर्म सभी हम नेक बने.
मतिमान बने, गुणवान बने, रसखान बने, सुविवेक बने.
चल यार! चलें, मिल प्यार करें, मनुहार बने, शुभ टेक बने.
२४-१०-२०१७
*
बाल गीत
रूठ खीझकर नोचिए
बाल, लिखें तब गीत.
बाल गीत सुन सहमकर,
सनम रहें भयभीत.
बाल बाल बचते रहे,
जो न रच सके गीत.
कलम उठा लो तो करें,
गीत आप आ प्रीत.
श्यामल घुँघताले मिले,
बाल गीत हैं संग.
क्यों भरमाती सलिल को,
नाहक करती तंग.
१५-१०-२०१७
*
मुक्तक
आह भरें श्रोता सभी कवि जी समझें वाह
शेष सभी यह देखकर करें आपसे डाह
करें आपसे डाह, ठठाकर हँसिए जीभर
चिंता-फ़िक्र न हो बाकी अबसे रत्ती भर
४-१०-२०१७
*
षट्पदी
नित मनमानी कीजिए, तनिक न रहे तनाव
पागल हों प्राचार्य जी, ऐसा पड़े प्रभाव
ऐसा पड़े प्रभाव, शिष्य बन माँगे शिक्षा
करें कृपा यदि आप, मिल सके उनको भिक्षा
देखें हीरा-प्रखर, तमाशा आप रहें चित
तनिक न रहे तनाव, कीजिए मनमानी नित.
*
लघु कथा:
मैया
*
भिखारियों को दुत्कारकर, संपन्नों को प्रसाद प्रसाद वितरण कर पुजारी ने थाली रखी ही थी कि उसने लाड़ से कहा: 'काए? हमाये पैले आरती कर लई? मैया तनकऊ खुस न हुइहैं। हमाये हींसा का परसाद किते गओ?'
'हओ मैया! पधारो, कउनौ की सामत आई है जो तुमाए भाग के
परसाद खों हात लगाए? बिराजो और भोग लगाओ। हम अब्बइ आउत हैं, तब लौं देखत रहियो परसाद की थाली कूकुर न जुठार दे.'
'अइसे कइसे जुठार दैहे हम बाको मूँड न फोर देबी, जा तो धरो है लट्ठ।' कोने में रखी डंडी को इंगित करते हुए बालिका बोली।
पुजारी गया तो बालिका मुस्तैद हो गयी. कुछ देर बाद भिखारियों का झुण्ड निकला।'काए? दरसन नई किए? चलो, इतै आओ.… परसाद छोड़ कहूँ और
गए तो लापता हो जैहो जैसे लीलावती-कलावती के घरवारे हो गए हते. पंडत जी सें कथा नई सुनी का?'
भिखारियों को दरवाजे पर ठिठकता देख उसने फिर पुकार लगाई: 'दरवज्जे पे काए ठांड़े हो? इते लौ आउत मां गोड़ पिरात हैं का?' जा गरू थाल हमसें नई उठात बनें। लेओ' कहते हुए प्रसाद की पुड़िया उठाकर उसने हाथ बढ़ा दिया तो भिखारियों ने हिम्मतकर पुड़िया ली और पुजारी को आते देख दहशत में जाने को उद्यत हुए तो बालिका फिर बोल पड़ी: 'इनखें सींग उगे हैं का जो बाग़ रए हो? परसाद लए बिना कउनौ नें जाए। ठीक है ना पंडज्जी?'
'हओ मैया!' अनदेखी करते हुए पुजारी ने कहा।
२१-९-२०१७
*
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शिवमय दोहे
शिवमय दोहे
लोभ, मोह, मद शूल हैं, शिव जी लिए त्रिशूल.
मुक्त हुए, सब को करें, मनुज न करना भूल.
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जो त्रिशूल के लक्ष्य पर, निश्चय होता नष्ट.
बाणासुर से पूछिए, भ्रष्ट भोगता कष्ट.
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तीन लोक रख सामने, रहता मौन त्रिशूल.
अत्याचारी को मिले, दंड हिला दे चूल.
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जर जमीन जोरू 'सलिल', झगड़े की जड़ तीन.
शिव त्रिशूल छोड़े नहीं, भूल अगर संगीन.
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शिव-त्रिशूल से काँपते, देव दनुज नर प्रेत.
जो सम्मुख आया, हुआ शिव प्रहार से खेत.
२२-१२-२०१७
शिव न सहज ही रुष्ट हों, लेकिन सहज प्रसन्न.
रुष्ट सहज, खुश हो न जो, उस सा कौन विपन्न?
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आप अनाहद नाद शिव, जग जाने ओंकार,
जो जपता श्रद्धा सहित, उसके मिटें विकार.
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नंदी बैठा ताल दे, शिव हों नृत्य-विभोर.
लिपट कंठ से झूमता, नागराज कह और.
.
शशि सिर पर शशिनाथ के, बैठा ले आनंद.
गणपति रचते नित नए, उमा सुनातीं छ्न्द.
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अमृत-विष का संतुलन, सुख-दुख सह समभाव.
शिव त्रिशूल ले हाथ में, हँसकर करें निभाव.
१९-१२-२०१७
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शिव को बाहर खोज मत, मन के भीतर झाँक.
सत्-सुंदर ही शिवा हैं, आँक सके तो आँक.
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शिवा कार्य-कारण बनें, शिव हों सहज निमित्त.
परि-सम्पूरक जानिए, जैसे हों तन-चित्त.
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शिव तो देहातीत हैं, उन्हें देह मत मान.
शिव से सच कब छिप सका?, तुरत हरें अभिमान.
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शिव भोले भाले दिखें, किंतु चतुर हैं खूब.
हैं भोले भाले लिए, सजग ध्यान में डूब.
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अहंकार गिरि पर बसें, शिव रखकर निज पैर,
अहं गला ममता बना, शिवा रहें निर्वैर.
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१८-१२-२०१७
कार्य शाला - कुण्डलिया
कुण्डलिया
कार्य शाला
*
नैनों से मुखरित हुआ, प्रियतम का अनुराग।। -मिथिलेश बड़गैयाँ
प्रियतम का अनुराग, सलिल सम प्रवहित होता।
श्वास-श्वास में प्रवह, सतत नव आशा बोता।।
जान रहे मिथिलेश, चाह सिय-रघुवर-मन की।
तज सिंहासन राह, गहेंगे हँसकर वन की।। - संजीव
***
११.१२.२०१८
कार्य शाला
*
*
कुंडलिया
वादे कर जो भुला दे, वह खोता विश्वास.
ऐसे नेता से नहीं, जनता को कुछ आस.
जनता को कुछ आस, स्वार्थ ही वह साधेगा.
भूल देश-हित दल का हित ही आराधेगा.
सलिल कहे क्यों दल-हित को जनता पर लादे.
वह खोता विश्वास भला दे जो कर वादे
१९-१२-२०१७
तन की मनहर बाँसुरी, मन का मधुरिम राग।नैनों से मुखरित हुआ, प्रियतम का अनुराग।। -मिथिलेश बड़गैयाँ
प्रियतम का अनुराग, सलिल सम प्रवहित होता।
श्वास-श्वास में प्रवह, सतत नव आशा बोता।।
जान रहे मिथिलेश, चाह सिय-रघुवर-मन की।
तज सिंहासन राह, गहेंगे हँसकर वन की।। - संजीव
***
११.१२.२०१८
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कार्य शाला - कुण्डलिया
तीन काल खंड तीन लघु कथाएँ
तीन काल खंड तीन लघु कथाएँ :
१. जंगल में जनतंत्र
जंगल में चुनाव होनेवाले थे।
मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।'
' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ। ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया। मंत्री जी खुश हुए।
तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धाँसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिएरखिए' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।
विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी।समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद। '
१९९४
***
२. समरसता
*
भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।
कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।
अगली बैठक में अभियंताओं और प्राध्यापकों पर हो रहे व्यय को अनावश्यक मानते हुए सेवा निवृत्ति से रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ न कर दैनिक वेतन के आधार पर कार्य कराने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया और स्थापित हो गयी समरसता।
७-१२-२०१५
***
३. मी टू
वे लगातार कई दिनों से कवी की रचनाओं की प्रशंसा कर रही थीं। आरंभ में अनदेखी करने करने के बाद कवि ने शालीनतावश उत्तर देना आवश्यक समझा। अब उन्होंने कवि से कविता लिखना सिखाने का आग्रह किया। कवि जब भी भाषा के व्याकरण या पिंगल की बात करता वे अपने नए चित्र के साथ अपनी उपेक्षा और शोषण की व्यथा-कथा बताने लगतीं।
एक दिन उन्होंने कविता सीखने स्वयं आने की इच्छा व्यक्त की। कवि ने कोई उत्तर नहीं दिया। इससे नाराज होकर उन्होंने कवि पर स्त्री की अवमानना करने का आरोप जड़ दिया। कवि फिर भी मौन रहा।
ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करते हुए उन्होंने अपने निर्वसन चित्र भेजते हुए कवि को अपने निवास पर या कवि के चाहे स्थान पर रात गुजारने का आमंत्रण देते हुए कुछ गज़लें देने की माँग कर दी, जिन्हें वे मंचों पर पढ़ सकें।
कवि ने उन्हें प्रतिबंधित कर दिया। अब वे किसी अन्य द्वारा दी गयीं ३-४ गज़लें पढ़ते हुए मंचों पर धूम मचाए हुए हैं। कवि स्तब्ध जब एक साक्षात्कार में उन्होंने 'मी टू' का शिकार होने की बात कही। कवि समय की माँग पर लिख रहा है स्त्री-विमर्श की रचनाएँ पर उसका जमीर चीख-चीख कर कह रहा है 'मी टू'।
११.१२.२०१८
***
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तीन काल खंड तीन लघु कथाएँ
लघुकथा
लघुकथा -
समरसता
*
भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।
कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।
अगली बैठक में अभियंताओं और प्राध्यापकों पर हो रहे व्यय को अनावश्यक मानते हुए सेवा निवृत्ति से रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ न कर दैनिक वेतन के आधार पर कार्य कराने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया और स्थापित हो गयी समरसता।
७-१२-२०१५
***
मुक्तक
मुक्तक
चोट खाते हैं जवांदिल, बचाते हैं और को
खुद न बदलें, बदलते हैं वे तरीके-तौर को
मर्द को कब दर्द होता, सर्द मौसम दिल गरम
आजमाते हैं हमेशा हालतों को, दौर को
९.१२.२०१६
***
शब्दों का जादू हिंदी में अमित सृजन कर देखो ना
छन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो ना
पढ़ो सीख लिख आत्मानंदित होकर सबको सुख बाँटो
मानव जीवन कि सार्थकता यही 'सलिल' अवरेखो ना
१०.१२.२०१६
***
दोहा दुनिया
दोहा दुनिया
*
आलम आलमगीर की, मर्जी का मोहताज
मेरे-तेरे बीच में, उसका क्या है काज?
*
नयन मूँद देखूं उसे, जो छीने सुख-चैन
गुम हो जाता क्यों कहो, ज्यों ही खोलूँ नैन
*
पल-पल बीते बरस सा, अपने लगते गैर
खुद को भूला माँगता, मन तेरी ही खैर
*
साया भी अपना नहीं, दे न तिमिर में साथ
अपना जीते जी नहीं, 'सलिल' छोड़ता हाथ
*
रहे हाथ में हाथ तो, उन्नत होता माथ
खुद से आँखे चुराता, मन तू अगर न साथ
*
११-१२-२०१६
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दोहा दुनिया
नवगीत
नवगीत:
जिजीविषा अंकुर की
पत्थर का भी दिल
दहला देती है
*
धरती धरती धीरज
बनी अहल्या गुमसुम
बंजर-पड़ती लोग कहें
ताने दे-देकर
सिसकी सुनता समय
मौन देता है अवसर
हरियाती है कोख
धरा हो जाती सक्षम
तब तक जलती धूप
झेलकर घाव आप
सहला लेती है
*
जग करता उपहास
मारती ताने दुनिया
पल्लव ध्यान न देते
कोशिश शाखा बढ़ती
द्वैत भुला अद्वैत राह पर
चिड़िया चढ़ती
रचती अपनी सृष्टि आप
बन अद्भुत गुनिया
हार न माने कभी
ज़िंदगी खुद को खुद
बहला लेती है
*
छाती फाड़ पत्थरों की
बहता है पानी
विद्रोहों का बीज
उठाता शीश, न झुकता
तंत्र शिला सा निठुर
लगे जब निष्ठुर चुकता
याद दिलाना तभी
जरूरी उसको नानी
जन-पीड़ा बन रोष
दिशाओं को भी तब
दहला देती है
*
लघुकथा: जंगल में जनतंत्र
लघुकथा:
जंगल में जनतंत्र
-आचार्य संजीव 'सलिल'
*
जंगल में चुनाव होनेवाले थे।
मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।'
' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ। ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया। मंत्री जी खुश हुए।
तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।
विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी।
समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद। '
********************
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लघुकथा: जंगल में जनतंत्र
द्विपदियाँ - दोहे चाँद
द्विपदियाँ - दोहे
चाँद
संजीव
*
सुबह के इन्तिज़ार में बेकल
चाँदनी रात चाँद साथ लिए
सुबह के इन्तिज़ार में बेकल
चाँदनी रात चाँद साथ लिए
*
चाँद आकाश में घूँघट में भी
कौन ज्यादा हसीन?; कौन कहे?
*
चाँद ने चाँद में चेहरा देखा
खोपड़ी आइना है मान लिया
*
चाँद पर चाँद हाथ फेर रहा
चाँद खिड़की से झाँक देख रहा
*
चाँद पे यान चीन का जो गया
चाँद दहशत में हो न कोरोना
*
ग्रहण लग गया चाँद को राहु-केतु को देख
डाइवोर्स ले चाँदनी,हुई दूर दुःख लेख
*
छप् -छपाक् अवगाहते चाँद-चाँदनी संग
आग लगी जलधार में, देख गगन है दंग
*
चिप्पियाँ Labels:
चाँद,
दोहे,
द्विपदियाँ
गुरुवार, 10 दिसंबर 2020
मुक्तिका
मुक्तिका
*
जो है अपना, वही पराया है? १८
ठेंगा सबने हमें बताया है १८
*
वक्त पर याद किया शिद्दत से १७
बाद में झट हमें भुलाया है
*
पाक दामन जो कह रहा खुदको
पंक में वह मिला नहाया है
*
जोड़ लीं दौलतें ज़माने ने
अंत में संग कुछ न पाया है
*
श्वास चलती रहे संजीव तभी
पाठ सच ने यही पढ़ाया है
***
१०-१२-२०१६
*
जो है अपना, वही पराया है? १८
ठेंगा सबने हमें बताया है १८
*
वक्त पर याद किया शिद्दत से १७
बाद में झट हमें भुलाया है
*
पाक दामन जो कह रहा खुदको
पंक में वह मिला नहाया है
*
जोड़ लीं दौलतें ज़माने ने
अंत में संग कुछ न पाया है
*
श्वास चलती रहे संजीव तभी
पाठ सच ने यही पढ़ाया है
***
१०-१२-२०१६
मुक्तक सलिला
मुक्तक सलिला:
छन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो ना
पढ़ो सीख लिख आत्मानंदित होकर सबको सुख बाँटो
मानव जीवन कि सार्थकता यही 'सलिल' अवरेखो ना
*
नारी अबला हो या सबला, बला न उसको मानो रे
दो-दो मात्रा नर से भारी, नर से बेहतर जानो रे
जड़ हो बीज धरा निज रस से, सिंचन कर जीवन देती-
प्रगटे नारी से, नारी में हो विलीन तर-तारो रे
*
उषा दुपहरी संध्या रजनी जहाँ देखिए नारी है
शारद रमा शक्ति नारी ही नर नाहर पर भारी है
श्वास-आस मति-गति कविता की नारी ही चिंगारी हैं-
नर होता होता है लेकिन नारी तो अग्यारी है
*
नेकी-बदी रूप नारी के, धूप-छाँव भी नारी है
गति-यति पगडंडी मंज़िल में नारी की छवि न्यारी है
कृपा, क्षमा, ममता, करुणा, माया, काया या चैन बिना
जननी, बहिना, सखी, भार्या, भौजी, बिटिया प्यारी है
*
१०-१२-२०१३
चिप्पियाँ Labels:
नारी मुक्तक,
मुक्तक नारी
बुधवार, 9 दिसंबर 2020
घुटना वंदन
एक रचना
घुटना वंदन
*
घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।
घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।
जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।
गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।
छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।
घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।
*
मेदांता अस्पताल दिल्ली में डॉ. यायावर के घुटना ऑपरेशन पर भेंट
९.१२.२०१८
घुटना वंदन
*
घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।
घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।
जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।
गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।
छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।
घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।
*
मेदांता अस्पताल दिल्ली में डॉ. यायावर के घुटना ऑपरेशन पर भेंट
९.१२.२०१८
चिप्पियाँ Labels:
घुटना वंदन,
व्यंग्य कविता,
हास्य
दोहा, द्विपदी, मुक्तक
दोहा सलिला
सबखों कुरसी चाइए,बिन कुरसी जग सून.
राजनीति खा रई रे, आदर्सन खें भून.
*
करें वंदना शब्द की ले अक्षर के हार
सलिल-नाद सम छंद हो, जैसे मंत्रोच्चार
*
पौधों, पत्तों, फूल को, निगल गया इंसान
मैं तितली निज पीर का, कैसे करूँ बखान?
*
मन में का? के से कहें? सुन हँस लैहें लोग.
मन की मन में ही धरी नदी-नाव संजोग.
*
लोकतंत्र का हो रहा, भरी दुपहरी खून.
सद्भावों का निगलते, नेता भर्ता भून.
*
द्विपदी,
जितने भी दाना हैं, स्वार्थ घिरे बैठे हैं
नादां ही बेहतर जो, अहं से न ऐंठे हैं.
*
मुक्तक
शिखर पर रहो सूर्य जैसे सदा तुम
हटा दो तिमिर, रौशनी दो जरा तुम
खुशी हो या गम देन है उस पिता की
जिसे चाहते हम, जिसे पूजते तुम
*
क्षणिका
क्षणिका
*
बहुत सुनी औरों की
अब तो
मनमानी कुछ की जाए.
दुनिया ने परखा अब तक
अब दुनिया भी परखी जाए
*
*
बहुत सुनी औरों की
अब तो
मनमानी कुछ की जाए.
दुनिया ने परखा अब तक
अब दुनिया भी परखी जाए
*
कार्यशाला
कार्यशाला
छंद बहर दोउ एक है - ९
रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २
सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद
बहर- फाइलुं मुफाईलुं
*
मुक्तक
मेघ ने लुभाया है
मोर नाच-गाया है
जो सगा नहीं भाया
वह गया भुलाया है
*
मौन मौन होता है
शोर शोर बोटा है
साफ़-साफ़ बोले जो
जार-जार रोता है
*
राजनीति धंधा है
शीशहीन कंधा है
न्याय कौन कैसे दे?
क्यों प्रतीक अँधा है
*
सूर्य के उजाले हैं
सेठ के शिवाले हैं
काव्य के सभी प्रेमी
आदमी निराले हैं
*
आपने बिसरा है
या किया इशारा है?
होंठ तो नहीं बोला
नैन ने पुकारा है
*
कौन-कौन आएगा?
देश-राग गायेगा
शीश जो कटाएगा
कीर्ति खूब पायेगा
*
नवगीत
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
वायवी हुए रिश्ते
कागज़ी हुए नाते
गैर बैर पाले जो
वो रहे सदा भाते
संसदीय तूफां की
है नहीं रही रेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
लोकतंत्र पूछेगा
तंत्र क्यों दरिंदा है?
जिंदगी रही जीती
क्यों मरी न जिंदा है?
आनुशासिकी कीला
क्यों यहाँ नहीं मेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
क्यारियाँ कभी सींचें
बागबान ही भूले
फूल को किया रुस्वा
शूल को मिले झूले
मौसमी किए वादे
फायदा नहीं सदा पेखा
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
***
मेखा = ठोंका, पेखा = देखा
छंद बहर दोउ एक है - ९
रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २
सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद
बहर- फाइलुं मुफाईलुं
*
मुक्तक
मेघ ने लुभाया है
मोर नाच-गाया है
जो सगा नहीं भाया
वह गया भुलाया है
*
मौन मौन होता है
शोर शोर बोटा है
साफ़-साफ़ बोले जो
जार-जार रोता है
*
राजनीति धंधा है
शीशहीन कंधा है
न्याय कौन कैसे दे?
क्यों प्रतीक अँधा है
*
सूर्य के उजाले हैं
सेठ के शिवाले हैं
काव्य के सभी प्रेमी
आदमी निराले हैं
*
आपने बिसरा है
या किया इशारा है?
होंठ तो नहीं बोला
नैन ने पुकारा है
*
कौन-कौन आएगा?
देश-राग गायेगा
शीश जो कटाएगा
कीर्ति खूब पायेगा
*
नवगीत
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
वायवी हुए रिश्ते
कागज़ी हुए नाते
गैर बैर पाले जो
वो रहे सदा भाते
संसदीय तूफां की
है नहीं रही रेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
लोकतंत्र पूछेगा
तंत्र क्यों दरिंदा है?
जिंदगी रही जीती
क्यों मरी न जिंदा है?
आनुशासिकी कीला
क्यों यहाँ नहीं मेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
क्यारियाँ कभी सींचें
बागबान ही भूले
फूल को किया रुस्वा
शूल को मिले झूले
मौसमी किए वादे
फायदा नहीं सदा पेखा
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
***
मेखा = ठोंका, पेखा = देखा
मुक्तक
मुक्तक
दंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसना
दलदल दल का दल देता है जनमत को सत्ता पाकर-
लोक शक्ति नित रहे जागृत नहीं सजगता को तजना।
*
परिवर्तन की हवा बह रही इसे दिशा-गति उचित मिले
बने न अंधड़, कुसुम न जिसमें जन-आशा का 'सलिल' खिले।
मतदाता कर्तव्यों को अधिकारों पर दे वरीयता-
खुद भ्रष्टाचारी होकर नेता से कैसे करें गिले?
*
ममो सोनिया राहुल डूबे, हुई नमो की जय-जयकार
कमल संग अरविन्द न लेकिन हाल एक सा देखो यार
जनता ने दे दिया समर्थन पर न बना सकते सरकार-
कैसी जीत मिली दोनों को जिसमें प्रतिबिंबित है हार
*
वसुंधरा शिव रमन न भूलें आगे कठिन परीक्षा है
मँहगाई, कर-भार, रिश्वती चलन दे रहा शिक्षा है
दूर करो जन गण की पीड़ा, जन-प्रतिनिधि सुविधा छोडो-
मतदाता जैसा जीवन जी, सत्ता को जन से जोड़ो
*
९-१२-२०१३
मुक्तक
चोट खाते हैं जवांदिल, बचाते हैं और को
खुद न बदलें, बदलते हैं वे तरीके-तौर को
मर्द को कब दर्द होता, सर्द मौसम दिल गरम
आजमाते हैं हमेशा हालतों को, दौर को
***
नाग नाथ को बिदा किया तो साँप नाथ से भी बचनादंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसना
दलदल दल का दल देता है जनमत को सत्ता पाकर-
लोक शक्ति नित रहे जागृत नहीं सजगता को तजना।
*
परिवर्तन की हवा बह रही इसे दिशा-गति उचित मिले
बने न अंधड़, कुसुम न जिसमें जन-आशा का 'सलिल' खिले।
मतदाता कर्तव्यों को अधिकारों पर दे वरीयता-
खुद भ्रष्टाचारी होकर नेता से कैसे करें गिले?
*
ममो सोनिया राहुल डूबे, हुई नमो की जय-जयकार
कमल संग अरविन्द न लेकिन हाल एक सा देखो यार
जनता ने दे दिया समर्थन पर न बना सकते सरकार-
कैसी जीत मिली दोनों को जिसमें प्रतिबिंबित है हार
*
वसुंधरा शिव रमन न भूलें आगे कठिन परीक्षा है
मँहगाई, कर-भार, रिश्वती चलन दे रहा शिक्षा है
दूर करो जन गण की पीड़ा, जन-प्रतिनिधि सुविधा छोडो-
मतदाता जैसा जीवन जी, सत्ता को जन से जोड़ो
*
९-१२-२०१३
मुक्तक सलिला
मुक्तक सलिला
संजीव
*
नाग नाथ को बिदा किया तो साँप नाथ से भी बचना
दंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसना
दलदल दल का दल देता है जनमत को सत्ता पाकर-
लोक शक्ति नित रहे जागृत नहीं सजगता को तजना।
*
परिवर्तन की हवा बह रही इसे दिशा-गति उचित मिले
बने न अंधड़, कुसुम न जिसमें जन-आशा का 'सलिल' खिले।
मतदाता कर्तव्यों को अधिकारों पर दे वरीयता-
खुद भ्रष्टाचारी होकर नेता से कैसे करें गिले?
*
ममो सोनिया राहुल डूबे, हुई नमो की जय-जयकार
कमल संग अरविन्द न लेकिन हाल एक सा देखो यार
जनता ने दे दिया समर्थन पर न बना सकते सरकार-
कैसी जीत मिली दोनों को जिसमें प्रतिबिंबित है हार
*
वसुंधरा शिव रमन न भूलें आगे कठिन परीक्षा है
मँहगाई, कर-भार, रिश्वती चलन दे रहा शिक्षा है
दूर करो जन गण की पीड़ा, जन-प्रतिनिधि सुविधा छोडो-
संजीव
*
नाग नाथ को बिदा किया तो साँप नाथ से भी बचना
दंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसना
दलदल दल का दल देता है जनमत को सत्ता पाकर-
लोक शक्ति नित रहे जागृत नहीं सजगता को तजना।
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परिवर्तन की हवा बह रही इसे दिशा-गति उचित मिले
बने न अंधड़, कुसुम न जिसमें जन-आशा का 'सलिल' खिले।
मतदाता कर्तव्यों को अधिकारों पर दे वरीयता-
खुद भ्रष्टाचारी होकर नेता से कैसे करें गिले?
*
ममो सोनिया राहुल डूबे, हुई नमो की जय-जयकार
कमल संग अरविन्द न लेकिन हाल एक सा देखो यार
जनता ने दे दिया समर्थन पर न बना सकते सरकार-
कैसी जीत मिली दोनों को जिसमें प्रतिबिंबित है हार
*
वसुंधरा शिव रमन न भूलें आगे कठिन परीक्षा है
मँहगाई, कर-भार, रिश्वती चलन दे रहा शिक्षा है
दूर करो जन गण की पीड़ा, जन-प्रतिनिधि सुविधा छोडो-
मतदाता जैसा जीवन जी, सत्ता को जन से जोड़ो
*
९-१२-२०१३
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मुक्तक सलिला
मंगलवार, 8 दिसंबर 2020
युगपरिधि समीक्षा सलिल
कृति चर्चा:
युगपरिधि : कृष्णात्मज प्रद्युम्न की अलौकिक गाथा
-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[ कृति विवरण : युगपरिधि, उपन्यास, डॉ. चंद्रा चतुर्वेदी, प्रथम संस्करण, वर्ष २०१९, पृष्ठ ३६३, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी., मूल्य ६५०/-, नमन प्रकाशन नई दिल्ली]
*
कृष्ण-कथा का एक महत्वपूर्ण किन्तु अपेक्षाकृत अल्पचर्चित पक्ष है प्रद्युम्न प्रसंग। वर्तमान संक्रमण काल में जब समयाभाव को कारण बताकर लघुकथा, हाइकु और नवगीत जैसी लघ्वाकारी विधाओं का चलन बढ़ रहा है, त्रेता के अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय चरित्र से संबंधित सामग्री का संकलन, अध्ययन, मनन कर उस पर एक महत्तम ग्रंथ रचना श्रम और समय साध्य तो है ही, साहस का कार्य भी है। पाञ्चरात्र आगम की अध्येता विदुषी डॉ. चंद्रा चतुर्वेदी ने वार्धक्य (जन्म १८ दिसंबर १९४५) को चुनौती देते हुए महर्षि सांदीपनि वेद-विद्या प्रतिष्ठान उज्जयिनी द्वारा प्रदत्त पंचवर्षीय यू.जी.सी. पोस्ट डॉक्टरल फेलोशिप के अंतर्गत इस दुरूह कार्य को कृष्ण-कृपा से इस तरह पूर्ण किया है कि यह इस दशक की महत्वपूर्ण औपन्यासिक कृतियों में गणनीय है। संस्कृत में पी-एच. डी. तथा एम्.डी.एस. कर १५ वर्ष से अधिक काल तक महाविद्यालयीन प्राध्यापक व् प्रवाचक रह चुकी चंद्रा जी द्वारा रचित ३ महत्वपूर्ण कृतियाँ 'कालिदास एवं अश्वघोष के दार्शनिक तत्व', 'वैष्णव आगम के वैदिक आधार' तथा 'उन्मेष' इसके पूर्व प्रकाशित-चर्चित हो चुकी हैं। विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा 'महीयसी' सम्मानोपाधि से अलंकृत चंद्रा जी इस कृति को निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी द्वारा आशीषित किया जाना इसकी गुणवत्ता का प्रमाण है।
वैष्णव दर्शन में चतुर्व्यूह सिद्धांत का विशेष महत्व है। इस चतुर्व्यूह के चार अंग श्री कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं। सृष्टि के आरंभ में शिव तप-भंग के दुस्साहस हेतु भस्म किये गए कामदेव की निर्दोष प्रिया रति विधवा होकर करुण प्रार्थना कर वरदान पाती है कि त्रेता में कामदेव कृष्णात्मज होकर जन्म लेंगे और तब उनका पुनर्मिलन हो सकेगा। सतही दृष्टि से पत्नी का सृष्टि आरंभ काल से त्रेता तक जीवित रहना और त्रेता में जन्में पति (करोड़ों वर्ष छोटे) से फिर विवाह होना कपोल कल्पना प्रतीत होता है किन्तु चित्र जी ने इसे तर्क की कसौटी पर खरा रखने का सफल प्रयास किया है।
उपन्यास में भगवान संकर्षण का कथन 'सृष्टि में प्रलय काल के पहले कुछ भी नष्ट नहीं होता, रूपांतरण होता है, एक सोपान से दूसरे सोपान तक। इस सृष्टि में पृथ्वी से व्योम तक तरंग ही लय के रूप में काम करती है। गति का यह आंतरिक स्वरूप परस्पर संबद्धता बनाये रखता है।'' पूर्णत: वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि ऊर्जा न उत्पन्न की जा सकती है, न नष्ट की जा सकती है केवल रूपांतरित की जा सकती है।
महाभारत, हरिवंश पुराण, विष्णुपुराण, गर्गसंहिता, नारदभक्ति सूत्र आदि ग्रंथों से प्राप्त विवरणों को सर्वथा मौलिक कथा सूत्र में गूँथना और हर पात्र के साथ न्याय करते हुए, कथा सूत्र का विकास इस तरह करना कि वैचारिक, दार्शनिक, व्यावहारिक और सर्वकालिक निकष पर खरी प्रतीत हो, दुष्कर कार्य है। लेखिका के अनुसार इस कृति का प्रणयन आरंभ करने के पूर्व उसने नरेंद्र कोहली, चित्र चतुर्वेदी, मनुशर्मा आधी के पौराणिक इतिहास आधारित उपन्यासों को पाठन कर उनकी रचनाधर्मिता से साक्षात किया। इस कृति में कहीं भी किसी अन्य उपन्यासकार का प्रभाव नहीं है। चंद्र जी ने शैली और तथ्य प्रस्तुति अपने मौलिक अंदाज़ में की है। सामान्यत: प्रद्युम्न को रतिपति के रूप में सौंदर्य और कमनीयता के लिए जाना जाता है किंतु उनके महावीर-महाबली योद्धा रूप को यह कृति उद्घाटित करती है।
रति (रूपांतरित मायावती) कथा सूत्रों को संयोजित करते हुए काम दहन प्रसंग के पूर्व व् पश्चात् का घटना क्रम, त्रेता पूर्व से द्वापर तक अपनी व्यथा-कथा अत्यंत व्याकुल देख शिव द्वारा काम को जीवित करना किन्तु देह कृष्ण के पुत्र में मिलने का वर देने, नारद द्वारा यह बताने पर कि पुनर्जन्म पश्चात् कृष्णपुत्र के रूप में कामदेव शंबरासुर के पास मिलने, दैत्यराज शंबर के कोप और वासना से बचते हुए उसकी पाकशाला में कार्य करते हुए उचित समय के प्रतीक्षा करने, रुक्मिणी-पुत्र का शंबरासुर द्वारा हरण कर समुद्र में फेंक देने, मत्स्य द्वारा उसे निगलने, मछेरे द्वारा उस मत्स्य को पकड़कर शंबरासुर की रसोई में पहुँचाने, मत्स्य के उदर से मानव पुत्र के निकलने, उसे पाल-पोसकर बड़ा करने, उन्हें युद्ध कला व माया युद्ध सिखाने, पूर्व जन्म और इस जन्म का सत्य बताकर शंबरासुर का वध करने और अंत में आकाश मार्ग से द्वारका पहुँचकर कृष्ण परिवार से मिलकर सत्य बताकर विवाह संपन्न होने तक का कथा-क्रम कहती चलती है।
चंद्रा जी ने देविका की पोषिता चित्रा (मालिन कुब्जा की भतीजी) का मौलिक चरित्र गढ़ा है जो किसी पूर्व ग्रंथ में नहीं है। सात-आठ वर्ष की बाल्यावस्था से वृन्दावन के करील कुंजों में राधा-कृष्ण की बाँकी छवि तथा दिवा लीलाओं की साक्षी रही चित्रा राधारमणविहारी गोपीबल्लभ को अन्तस् में गहरे उतार बैठी है। वह उन्हें कृष्ण को महायोगी, महाप्राण, परतत्व परमात्मा नहीं, भक्ति का आश्रय मानती है। उसकी भावग्राहिता देखकर देवकी मैया भी कह उठती हैं - ‘मेरा मन भी तेरे जैसा हो जाए, तो क्या नहीं कहना!’ उद्धव प्रसंग में बृज वनिताएँ कृष्ण को जिस भक्ति भाव से भजती हैं वह चित्रा के माध्यम से प्रस्तुत हुआ है। संस्कृत साहित्य की एक अन्य हस्ताक्षर विदुषी डॉ. सुमन लता श्रीवास्तव के मतानुसार ''लेखिका स्वयं चित्रा के उपलक्ष्य से द्वारिका में राजमाता देवकी के भव्य भवन में रत्नजटित झूले में विराजे पीताम्बर स्वर्णमुकुट और मोरपंख धारण किये बाल कृष्ण लाल के विग्रह और स्वर्ण वंशी की पूजा-अर्चना सेवा करती हैं, भक्ति-पूरित भजन गाती हैं, उनके गुणों का संकीर्तन करती हैं, ब्रज की लीलाओं का स्मरण करती हैं, चरण-ंसुश्रुषा करती हैं, वन्दन करती हैं और उनसे सख्यभाव भी स्थापित कर लेती हैं।''
इस पौराणिक कथा प्रसंग को सनातन चिंतन, वैष्णव दर्शन सूत्रों गूँथकर सरस, सहज तथा विश्वसनीय बनाते हुए प्रस्तुत कर चंद्रा जी ने हिंदी उपन्यास साहित्य में एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। यह औपन्यासिक कृति सत्साहित्य में रूचि रखनेवाले पाठकों हेतु पठनीय, मननीय तथा संग्रहणीय है। शुद्ध, सहज, सरस भाषा शैली कथानक में जान फूँकती है। अनावश्यक विस्तार से बचते हुए युगों की गाथा को सीमित पृष्ठों में मौलिकता और प्रामाणिकता के साथ औपन्यासिक कथा सूत्र में गूँथकर चंद्रा जी ने कृष्ण लीला के रसिकों पर उपकार किया है।
***
समीक्षक संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, ४८२००१,
चलभाष ९४२५१ ८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmailcom
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