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रविवार, 14 जून 2020

लघुकथा: एकलव्य

लघुकथा:
एकलव्य
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
*****
- आचार्य संजीव 'सलिल' संपादक दिव्य नर्मदा समन्वयम , २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ वार्ता:०७६१ २४१११३१ / ९४२५१ ८३२४४

नवगीत

नवगीत 
*
पर्वत-पीछे झाँके ऊषा
हाथ पकड़कर आया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
धूप संग इठलाया सूरज।
*
योग कर रहा संग पवन के
करे प्रार्थना भँवरे के सँग।
पैर पटकता मचल-मचलकर
धरती मैडम हुईं बहुत तँग।
तितली देखी आँखमिचौली
खेल-जीत इतराया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
नाक बहाता आया सूरज।
*
भाता है 'जन गण मन' गाना
चाहे दोहा-गीत सुनाना।
झूला झूले किरणों के सँग
सुने न, कोयल मारे ताना।
मेघा देख, मोर सँग नाचे
वर्षा-भीग नहाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
झूला पा मुस्काया सूरज।
*
खाँसा-छींका, आई रुलाई
मैया दिशा झींक-खिसियाई।
बापू गगन डॉक्टर लाया
डरा सूर्य जब सुई लगाई।
कड़वी गोली खा, संध्या का
सपना देख न पाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
कॉमिक पढ़ हर्षाया सूरज।
***
१४-६-२०१६ 

मुक्तक

मुक्तक 
पलकें भिगाते तुम अगर बरसात हो जाती
रोते अगर तो ज़िंदगी की मात हो जाती
ख्वाबों में अगर देखते मंज़िल को नहीं तुम
सच कहता हूँ मैं हौसलों की मात हो जाती
*

मुक्तक

चंद मुक्तक
संजीव 'सलिल'
*
*
कलम
तलवार से ज्यादा, कहा सच वार करती है.
जुबां नारी की लेकिन सबसे
ज्यादा धार धरती है.
महाभारत कराया द्रौपदी के व्यंग बाणों ने-
नयन
के तीर छेदें तो न दिल की हार खलती है..
*
कलम नीलाम होती रोज
ही अखबार में देखो.
खबर बेची-खरीदी जा रही बाज़ार में लेखो.

माखनलाल जी ही हैं, नहीं विद्यार्थी जी हैं-
रखे अख़बार सब गिरवी
स्वयं सरकार ने देखो.

कविता

कविता
*
जो
सत्ता पा गए हैं बस चला तो देश बेचेंगे.
ये अपनी माँ के फाड़ें
वस्त्र, तन का चीर खीचेंगे.
यही तो हैं असुर जो देश से गद्दारियाँ
करते-
कहो कब हम जागेंगे और इनको दूर फेंकेंगे?
*
तराजू
न्याय की थामे हुए हो जब कोई अंधा.
तो काले कोट क्यों करने से चूकें
सत्य का धंधा.
खरीदी और बेची जा रही है न्याय की मूरत-
'सलिल'
कोई न सूरत है न हो वातावरण गन्दा.
*
*
बहाते हैं वो आँसू छद्म, छलते जो रहे
अब तक.
हजारों मर गए पर शर्म इनको आयी ना अब तक.
करो जूतों से
पूजा देश के नेताओं की मिलकर-
करें गद्दारियाँ जो 'सलिल' पायें एक भी
ना मत..
*
वसन हैं श्वेत-भगवा किन्तु मन काले लिये नेता.
सभी
को सत्य मालुम, पर अधर अब तक सिये नेता.
सभी दोषी हैं इनको दंड दो,
मत माफ़ तुम करना-
'सलिल' पी स्वार्थ की मदिरा सतत, अब तक जिए नेता..
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

अभियान ४२ - १४-६-२०२०

ॐ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर : सारस्वत अनुष्ठान ४२ : १४-६-२०२०
आज गूगल मीट हेतु लिंक   https://meet.google.com/dxe-zndm-tex 
*
गूगल मीट से जुड़ें...... 
तकनीकी परामर्श- इंजी. विवेकरंजन श्रीवास्तव। 
गूगल मीट से जुड़ने हेतु विमर्श-
१. अपना अंतर्जाल और चलभाष की बैटरी जाँचकर गूगल गूगल मीट ऐप को डाउनलोड करें। माँगी गयी जानकारी देकर खुद को जोड़ें (रजिस्टर करें)। २. दी गयी लिंक को छुएँ (क्लिक करें) तथा बैठक से जुड़ने के लिए स्क्रीन को छुएँ। आपकी मुखछवि मोबाइल पर दिखने लगेगी। 
३. ईयर फोन उपलब्ध हो तो कान में लगा लें, इससे आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है। 
४. परदे (स्क्रीन) को छुएँ, लाल रंग का माइक दिखेगा। जब आपको बोलना हो तो इसे छुएँ, माइक सफ़ेद होने (चालू होने) पर बात कहें, इसे सब सहभागी सुन सकेंगे। बात पूरी होते ही माइक को फिर छुएँ। माइक लाल (बंद) हो जाएगा अब आपकी बात चलभाष पर नहीं सुनी जा सकेगी। 
५. सहभागियों के चित्र पर माइक देखें। जिनके माइक लाल हैं, वे सुन रहे हैं। जिसका माइक सफ़ेद है, वह बोल रहा है।उसका चित्र छुएँ तो वह ऊपर आधे परदे पर आ जाएगा। 
६. माइक के विपरीत दिशा में एक चिन्ह आपके चित्र के लिए है। इसे छूने पर आपका चित्र अदृश्य हो जायेगा, दुबारा छूने पर चित्र फिर दिखने लगेगा।
७. तीसरा चिन्ह अन्य सहभागियों हेतु है। 
***
सारस्वत अनुष्ठान ४२ : १४-६-२०२० 
काव्य गोष्ठी : समय : ६ बजे से ७ बजे 
हर सहभागी ३ मिनिट में अपना काव्य पाठ पूर्ण करना सुनिश्चित करे।
संचालन : इंजी. अरुण भटनागर 
सहभागिता हेतु लिंक : https://meet.google.com/hdg-cxtr-chz  
मुखिया : इंजी अमरेंद्र नारायण
मुख्य अतिथि : कांता रॉय, भोपाल
प्रो०डाॅ०श्री बृज कुमार मिश्र, हिंदी विभागाध्यक्ष, एस.एस.जे.एस.एन.कॉलेज, गढ़वानी.पी.वि.वि.पलामू।
शारद वंदन : गायत्री शर्मा, कोरबा 
आभार : मिथलेश बड़गैया 
सम्मिलित कविगण :
सर्व श्री / श्रीमती
०१. राजीव नामदेव राना लिघौरी, टीकमगढ़
०२. प्रो रेखा कुमारी सिंह, जपला, झारखण्ड
०३. पुष्पा चिले, दमोह
०४. राम कुमार चतुर्वेदी, सिवनी
०५. अखिलेश सक्सेना, कासगंज
०६. कामना श्रीवास्तव सुमित्र
०७. गायत्री शर्मा कोरबा
०८. बबिता चौबे, दमोह
०९. बसंत शर्मा
१०. मिथलेश बड़गैया
११. भावना दीक्षित
१२. सारांश गौतम
१३. उदयभानु तिवारी 'मधुकर'
१४. डॉ. रघुनंदन चिले
१५. अमरेंद्र नारायण
१६. संजीव वर्मा 'सलिल'
१७. डॉ. आलोक रंजन
१८. डॉ. बृजकुमार मिश्रा, हिंदी विभागाध्यक्ष, एस.एस.जे.एस.एन.कॉलेज, गढ़वा,नी.पी.वि.वि.पलामू।
=================
०१. इंजी अमरेंद्र नारायण
०२. अरविन्द श्रीवास्तव, दतिया
०३. अरुण अर्णव श्रीवास्तव, भोपाल 
०४. ग्रुपकैप्टन श्यामल सिन्हा, गुड़गांव
०५. कांता रॉय, भोपाल 
०६. प्रो०डाॅ०श्री बृज कुमार मिश्र, हिंदी विभागाध्यक्ष, एस.एस.जे.एस.एन.कॉलेज, गढ़वा,नी.पी.वि.वि.पलामू।
०७. गायत्री शर्मा, कोरबा 
०८. अखिलेश सक्सेना, कासगंज  
०९. रेखा सिंह जपला, झारखंड 
१०. राना लिघौरी, टीकमगढ़ 
११. विनोद जैन 'वाग्वर', सागवाड़ा 
११. पुनीता भारद्वाज, भीलवाड़ा  
१२. मनोरमा पाखी भिंड  
१३. सुषमा शैली दिल्ली
१४. मनोरमा रतले, दमोह 
१५. पुष्पा चिले, दमोह 
१६. इंजी. विवेकरंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' 
१७. इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार  
१८. प्रभा विश्वकर्मा 'शील' 
१९. मीना भट्ट  
२०. कामना श्रीवास्तव सुमित्र 
२१. मिथलेश बड़गैया 
२२. प्रीति मिश्रा  
२३. कंचनलता स्वर्णकार   
२४. शोभित वर्मा 
२५. इंद्रबहादुर श्रीवास्तव  
२६. यूनुस अदीब 
२७. भारती नरेश पाराशर
२८. विनीता श्रीवास्तव 
२९. मीनाक्षी शर्मा 'तारिका'
३०. अविनाश ब्योहार   
*** 

शनिवार, 13 जून 2020

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया 
*
पैर जमा कर भूमि पर, छू सकते आकाश
बाधाओं के तोड़ दो, संकल्पों से पाश

*
बाधाओं से रुक सकी, आभा कभी न मीत
बादल आकर दूर हों, कोशिश गाए गीत

*
१३-६-२०१८ 

नवगीत

नवगीत
*
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार,
व्यथा-कथा का है नहीं
कोई पारावार।
*
लोरी सुनकर कब हँसी?
कब खेली बाबुल गोद?
कब मैया की कैयां चढ़ी
कर आमोद-प्रमोद?
मलिन दृष्टि से भीत है
रुचता नहीं दुलार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
*
पर्वत - जंगल हो गए
नष्ट, न पक्षी शेष हैं
पशुधन भी है लापता
नहीं शांति का लेश है
दानववत मानव करे
अनगिन अत्याचार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
*
कलकल धारा सूखकर
हाय! हो गयी मंद
धरती की छाती फ़टी
कौन सुनाए छंद
पछताए, सुधरे नहीं
पैर कुल्हाड़ी मार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
***
१०-६-२०१६
तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी
जबलपुर

त्रिपदियाँ

सामयिक त्रिपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*
खोज कहाँ उनकी कमर,
कमरा ही आता नज़र,
लेकिन हैं वे बेफिकर..
*
विस्मय होता देखकर.
अमृतघट समझा जिसे
विषमय है वह सियासत..
*
दुर्घटना में कै मरे?
गैस रिसी भोपाल में-
बतलाते हैं कैमरे..
*
एंडरसन को छोड़कर
की गद्दारी देश से
नेताओं ने स्वार्थ वश..
*
भाग गया भोपाल से
दूर कैरवां जा छिपा
अर्जुन दोषी देश का..
*

जनक छंद / त्रिपदियाँ

जनक छंद / त्रिपदियाँ  
*
ब्यूटी पार्लर में गयी
वृद्धा बाहर निकलकर
युवा रूपसी लग रही..
*
नश्वर है यह देह रे!
बता रहे जो भक्त को
रीझे भक्तिन-देह पे..
*
संत न करते परिश्रम
भोग लगाते रात-दिन
सर्वाधिक वे ही अधम..
*
गिद्ध भोज बारात में
टूटो भूखें की तरह
अब न मान-मनुहार है..
*
पितृ-देहरी छीन गयी
विदा होटलों से हुईं
हाय! हमारी बेटियाँ..
*
करते कन्या-दान जो
पाते हैं वर-दान वे
दे दहेज़ वर-पिता को..
*
१३-६-२०१० 

रवींद्रनाथ ठाकुर : भावानुवाद

कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक
रचना का भावानुवाद:
संजीव 'सलिल'
*
*
रुद्ध अगर पाओ कभी, प्रभु! तोड़ो हृद-द्वार.
कभी लौटना तुम नहीं, विनय करो स्वीकार..
*
मन-वीणा-झंकार में, अगर न हो तव नाम.
कभी लौटना हरि! नहीं, लेना वीणा थाम..
*
सुन न सकूँ आवाज़ तव, गर मैं निद्रा-ग्रस्त.
कभी लौटना प्रभु! नहीं, रहे शीश पर हस्त..
*
हृद-आसन पर गर मिले, अन्य कभी आसीन.
कभी लौटना प्रिय! नहीं, करना निज-आधीन..
१३-६-२०१० 

शुक्रवार, 12 जून 2020

मुक्तक

मुक्तक
नेह नर्मदा में अवगाहो, तन-मन निर्मल हो जाएगा।
रोम-रोम पुलकित होगा प्रिय!, अपनेपन की जय गाएगा।।
हर अभिलाषा क्षिप्रा होगी, कुंभ लगेगा संकल्पों का,
कोशिश का जनगण तट आकर, फल पा-देकर तर जाएगा।।
७-६-२०१६

विधाता/शुद्धगा छंद

छंद सलिला:
विधाता/शुद्धगा छंद
संजीव
*
छंद लक्षण: जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा,
यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है.
लक्षण छंद:
विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले
रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले
सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर
न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले
संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७
सिद्धि = ८, तिथि = १५
उदाहरण:
१. न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?
न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?
न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?
न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में?
जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात
२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक
गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?
न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम
३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी
बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?
कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी
४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम
जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम
कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम
यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम
*********
१२-६-२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

एक रचना ठेंगा

एक रचना
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया उमा सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
नहीं किसी से एक सम्हलती, चार-चार को विहँस सम्हाले
ठेंगे का पुरुषार्थ गज़ब है, चारों हो हँस साथ दबा ले
'ही' हो या 'शी' रूप न बदले ठेंगा कभी न ठेंगी होता
है समाजवादी पक्का यह, कभी ना अपना धीरज खोता
बाप-चचा रह गए देखते, पूत-भतीजे के ठेंगे को
पंजे ने पंचर की सैकिल, सैकिल ने पटका पंजे को
अन्शंबाज मुख्यमंत्री ने कृषकों को ठेंगा दिखलाया
आश्वासन से करी आरती, नव वादों का भोग लगाया
ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
***

नवगीत - शिरीष के फूल

एक रचना









शिरीष के फूल
*
फूल-फूल कर बजा रहे हैं
बीहड़ में रमतूल,
धूप-रूप पर मुग्ध, पेंग भर
छेड़ें झूला झूल
न सुधरेंगे
शिरीष के फूल।
*
तापमान का पान कर रहे
किन्तु न बहता स्वेद,
असरहीन करते सूरज को
तनिक नहीं है खेद।
थर्मामीटर नाप न पाये
ताप, गर्व निर्मूल
कर रहे हँस
शिरीष के फूल।।
*
भारत की जनसँख्या जैसे
खिल-झरते हैं खूब,
अनगिन दुःख, हँस सहे न लेकिन
है किंचित भी ऊब।
माथे लग चन्दन सी सोहे
तप्त जेठ की धूल
तार देंगे
शिरीष के फूल।।
*
हो हताश एकाकी रहकर
वन में कभी पलाश,
मार पालथी, तुरत फेंट-गिन
बाँटे-खेले ताश।
भंग-ठंडाई छान फली संग
पीकर रहते कूल,
हमेशा ही
शिरीष के फूल।।
*
जंगल में मंगल करते हैं
दंगल नहीं पसंद,
फाग, बटोही, राई भाते
छन्नपकैया छंद।
ताल-थाप, गति-यति-लय साधें
करें न किंचित भूल,
नाचते सँग
शिरीष के फूल।।
*
संसद में भेजो हल कर दें
पल में सभी सवाल,
भ्रमर-तितलियाँ गीत रचें नव
मेटें सभी बबाल।
चीन-पाक को रोज चुभायें
पैने शूल-बबूल
बदल रँग-ढँग
शिरीष के फूल।।
*****

गुरुवार, 11 जून 2020

बाल गीत जाह्नवी

बाल गीत
जाह्नवी
*
बाल अरुण की सखी जाह्नवी
भू पर उतरी परी जाह्नवी
नेह नर्मदा निर्मल-चंचल
लोक कहे सुरसरी जाह्नवी
स्वप्न सलौने अनगिन देखे
बिन सोए, जग रही जाह्नवी
रूठे-मचले धरे शीश पर
नभ ही बात न सुने जाह्नवी
शारद-रमा-उमा की छवि ले
भव तारे खुद तरे जाह्नवी
है सब दुनिया खोटी लेकिन
सौ प्रतिशत है खरी जाह्नवी
मान सको तो बिटिया है यह
लाड़ करे ज्यों जननी जाह्नवी
जान बसी है इसमें सबकी
जान सभी को रही जाह्नवी
***
संजीव
११-६-२०१९
९४२५१८३२४४

कार्यशाला: रचना-प्रतिरचना राकेश खंडेलवाल-संजीव

कार्यशाला:
रचना-प्रतिरचना राकेश खंडेलवाल-संजीव
*
गीत
संस्कार तो बंदी लोक कथाओं में
रिश्ते-नातों का निभना लाचारी है
*
जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये
सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है
*
तुलसी का चौरा, अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से ब​हना-भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहे
दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
और औपचारिकता सी व्यवहारी हैं
*
जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए
बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है
***
प्रतिगीत:
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
*
भाव भूलकर क्यों शब्दों में सिमट गए?
शिव बिसराकर, शव से ही क्यों लिपट गए?
फ़िक्र पर्व की, कर पर्वों को ठुकराया-
खुशी-खुशी खुशियों से दबकर चिपट गए।
व्यथा-कथा के बने पुरोहित हम खुद ही-
तिनका हो, कहते: "पर्वत पर भारी" क्यों?
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
*
किसकी इच्छा है वह सच को सही कहे?
कौन यहाँ पर जो न स्वार्थ की बाँह गहे?
देख रहे सब अपनेपन के किले ढहे-
किंतु न बदले, द्वेष-घृणा के वसन तहे।
यक्ष-प्रश्न का उत्तर, कहो! कौन देगा-
हुई निराशा हावी, आशा हारी क्यों?
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
*
क्षणभंगुर है सृष्टि सत्य यह जान लिया।
अचल-अटल निज सत्ता-संतति मान लिया।
पानी नहीं आँख में किंचित शेष रहा-
धानी रहे न धरती, हठ यह ठान लिया।
पूज्या रही न प्रकृति, भोग्या मान उसे
शोषण कर बनते हैं हमीं पुजारी क्यों?
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
*
कक्का-मम्मा, मौसा-फूफा हार गए,
'अंकल' बिना लड़े रण सबको मार गए।
काकी-मामी, मौसी-फूफी भी न रहीं-
'आंटी' के पाँसे नातों को तार गए।
हलो-हाय से हाय-हाय के पथ पर चल-
वाह-वाह की सोचें चाह बिसारी क्यों?.
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
*
मुखपोथी से जुड़े, न आँखों में देखा
नेह निमंत्रण का करते कैसे लेखा?
देह देह को वर हँस पुलक विदेह हुई-
अंतर्मन की भूल गयी लछमन रेखा।
घर ही जिसमें जलकर ख़ाक हुआ पल में-
उन शोलों को कहा कहो अग्यारी क्यों?
संस्कार क्यों बंदी लोक कथाओं के?
रिश्तों-नातों का निभना लाचारी क्यों?
***
११.६.२०१८, ७९९९५५९६१८

कुण्डलिया

कुण्डलिया 
नारी पर नर मर मिटे, है जीवन का सत्य
मरता हो तो जी उठा, यह भी नहीं असत्य
यह भी नहीं असत्य, जान पर जान लुटाता
जान जान को सात जन्म तक जान न पाता
कहे सलिल कविराय, मानिये माया आरी
छाया दे या धूप, नरों पर भारी नारी  

***

मुकतक

मुकतक
*
खिलखिलाते रहें, मुस्कुराते रहें
पंछियों की तरह चहचहाते रहें
हाथ में हाथ लेकर रहें साथ में-
ज़िंदगी भर मधुर गीत गाते रहें
khilkhilate rahen, muskurate rahen
panchiyon ki tarah chahchahate rahe
hath men hath lekar rahen sath men
zindgi bhar madhur geet gate rahen

नवगीत क्यों??

नवगीत
क्यों??...
- संजीव सलिल
*
कहीं धूप क्यों?,
कहीं छाँव क्यों??...
*
सबमें तेरा
अंश समाया,
फ़िर क्यों
भरमाती है काया?
जब पाते तब-
खोते हैं क्यों?
जब खोते
तब पाते पाया।
अपने चलते
सतत दाँव क्यों?...
*
नीचे-ऊपर,
ऊपर-नीचे।
झूलें सब
तू डोरी खींचे,
कोई डरता,
कोई हँसता।
कोई रोये
अँखियाँ मींचे।
चंचल-घायल
हुए पाँव क्यों?...
*
तन पिंजरे में
मन बेगाना।
श्वास-आस का
ताना-बाना।
बुनता-गुनता
चुप सर धुनता।
तू परखे,
दे संकट नाना।
सूना पनघट,
मौन गाँव क्यों?...
***