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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

सोमवार, 4 अगस्त 2014

doha salila: kuchh dohe barsat ke... -sanjiv

चित्र पर कविता:
संजीव
*

चित्र: सुमन कपूर 

मेघदूत संदेश ले, आये भू के द्वार 
स्नेह-रश्मि पा सु-मन हँस, उमड़े बन जल-धार    

*
पल्लव झूमे गले मिल, कभी करें तकरार
कभी गले मिलकर 'सलिल', करें मान मनुहार 
*
आदम दुबका नीड़ में, हुआ प्रकृति से दूर 
वर्षा-मंगल भूलकर, कोसे प्रभु को सूर 

रविवार, 3 अगस्त 2014

lekh: kundali men mangal dosh: abhilasha


कुंडली में मंगल दोष 
अभिलाषा 
*
मंगल-दोष एक प्रमुख दोष माना जाता रहा है हमारे कुंडली के दोषों में.आजकल के शादी-बयाह में इसकी प्रमुखता देखि जा रही है,पर इस दोष के बहुत सारे परिहार भी है.ऐसा माना जाता रहा है की मांगलिक'दोषयुक्त कुंडली का मिलान मांगलिक-दोषयुक्त' कुंडली से ही बैठना चाहिए,या ऐसे कहना चाहिए की मांगलिक वर की शादी मांगलिक वधु से होनी चाहिए,पर ये कुछ मायनो में गलत है,कई बार ऐसा करने से ये दोष दुगना हो जाता है जिसके फलस्वरूप वर-वधु का जीवन कष्टमय हो जाता है.अत्तः यहाँ कुछ बातें ध्यान देने योग्य हो जाती है जैसे की अगर वर-वधु की उमर अगर ३० वर्ष से अधिक हो 'या' जिस स्थान पर वर या वधु का मंगल स्थित हो उसी स्थान पर दुसरे के कुंडली में शनि-राहु-केतु या' सूर्य हो तो भी मंगल-दोष विचारनीय नहीं रह जाता अगर दूसरी कुंडली मंगल-दोषयुक्त न भी हो तो.या वर-वधु के गुण-मिलान में गुंणों की संख्या ३० से उपर आती है तो भी मंगल-दोष विचारनीय नहीं रह जाता.
ये तो थी परिहार की बात,इसके अलावा अगर ये स्थिति भी न हो अर्थात कुंडली के योगों के द्वारा अगर परिहार संभव न हो तो इसके कुछ उपाए है जिसके की करने के बाद मंगल-दोष' को बहुत हद तक कम किया जा सकता है,जैसे की कुम्भ-विवाह,विष्णु-विवाह और अश्वाथा-विवाह.'अर्थात अगर ऐसे जातको के विवाह से पहले जिसमे किसी एक की कुंडली जो की मांगलिक'दोषयुक्त हो उसका विवाह इन पद्धतियों में से किसी एक से कर के पुनः फिर उसका विवाह गैर-मांगलिक'दोषयुक्त कुंडली वाले के साथ किया जा सकता है.कुम्भ-विवाह' में वर या वधु की शादी एक घड़े के साथ कर दी जाती है और उसके पश्चात उस घड़े को तोड़ दिया जाता है.उसी प्रकार अश्वाथा-विवाह' में में वर या वधु की शादी एक केले के पेड़ के साथ कर दी जाती है और उसके पश्चात उस पेड़ को काट दिय जाता है.विष्णु-विवाह में वधु की शादी विष्णु-जी की प्रतिमा से की जाती है ,फिर उसका विवाह जिस वर से उसकी शादी तय हो उससे कर देनी चाहिए.
इसके अलावा और भी कुछ बातें ध्यान देने योग्य है जैसे की अगर वर-वधु' दोनों की कुण्डलियाँ मांगलिक'दोषयुक्त हो पर किसी एक का मंगल 'उ़च्च' का और दुसरे का ‘नीच’ का हो तो भी विवाह नहीं होना चाहिए.या दोनों की कुण्डलियाँ मांगलिक'दोषयुक्त न हो पर किसी एक का मंगल 29' डिग्री से ०' डिग्री के बीच का हो तो भी मंगल-दोष' बहुत हद्द तक प्रभावहीन हो जाता है.
अतः मेरे विचार से विवाह के समय इन बातों को विचार में रख के हम आने वाले भविष्य को सुखमय बना सकते है.

lekh: naag ko naman -sanjiv

लेख :
नागको नमन :
संजीव
*
नागपंचमी आयी और गयी... वन विभागकर्मियों और पुलिसवालोंने वन्य जीव रक्षाके नामपर सपेरों को पकड़ा, आजीविका कमानेसे वंचित किया और वसूले बिना तो छोड़ा नहीं होगा। उनकी चांदी हो गयी.  

पारम्परिक पेशेसे वंचित किये गए ये सपेरे अब आजीविका कहाँसे कमाएंगे? वे शिक्षित-प्रशिक्षित तो हैं नहीं, खेती या उद्योग भी नहीं हैं. अतः, उन्हें अपराध करनेकी राह पर ला खड़ा करनेका कार्य शासन-प्रशासन और तथाकथित जीवरक्षणके पक्षधरताओंने किया है. 

जिस देशमें पूज्य गाय, उपयोगी बैल, भैंस, बकरी आदिका निर्दयतापूर्वक कत्ल कर उनका मांस लटकाने, बेचने और खाने पर प्रतिबंध नहीं है वहाँ जहरीले और प्रतिवर्ष लगभग ५०,००० मृत्युओंका कारण बननेवाले साँपोंको मात्र एक दिन पूजनेपर दुग्धपानसे उनकी मृत्युकी बात तिलको ताड़ बनाकर कही गयी. दूरदर्शनी चैनलों पर विशेषज्ञ और पत्रकार टी.आर.पी. के चक्करमें तथाकथित विशेषज्ञों और पंडितों के साथ बैठकर घंटों निरर्थक बहसें करते रहे. इस चर्चाओंमें सर्प पूजाके मूल आर्य और नाग सभ्यताओंके सम्मिलनकी कोई बात नहीं की गयी. आदिवासियों और शहरवासियों के बीच सांस्कृतिक सेतुके रूपमें नाग की भूमिका, चूहोंके विनाश में नागके उपयोगिता, जन-मन से नागके प्रति भय कम कर नागको बचाने में नागपंचमी जैसे पर्वोंकी उपयोगिता को एकतरफा नकार दिया गया. 

संयोगवश इसी समय दूरदर्शन पर महाभारत श्रृंखला में पांडवों द्वारा नागों की भूमि छीनने, फलतः नागों द्वारा विद्रोह, नागराजा द्वारा दुर्योधन का साथ देने जैसे प्रसंग दर्शाये गये किन्तु इन तथाकथित विद्वानों और पत्रकारों ने नागपंचमी, नागप्रजाजनों (सपेरों - आदिवासियों) के साथ विकास के नाम पर अब तक हुए अत्याचार की और नहीं गया तो उसके प्रतिकार की बात कैसे करते? 

इस प्रसंग में एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इस देशमें बुद्धिजीवी माने जानेवाले कायस्थ समाज ने भी यह भुला दिया कि नागराजा वासुकि की कन्या उनके मूलपुरुष चित्रगुप्त जी की पत्नी हैं तथा चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों के विवाह भी नाग कन्याओं से ही हुए हैं जिनसे कायस्थों की उत्पत्ति हुई. इस पौराणिक कथा का वर्ष में कई बार पाठ करने के बाद भी कायस्थ आदिवासी समाज से अपने ननिहाल होने के संबंध को याद नहीं रख सके. फलतः। खुद राजसत्ता गंवाकर आमजन हो गए और आदिवासी भी शिक्षित हुआ. इस दृष्टि से देखें तो नागपंचमी कायस्थ समाज का भी महापर्व है और नाग पूजन उनकी अपनी परमरा है जहां विष को भी अमृत में बदलकर उपयोगी बनाने की सामर्थ्य पैदा की जाती है. 

शिवभक्तों और शैव संतों को भी नागपंचमी पर्व की कोई उपयोगिता नज़र नहीं आयी. 

यह पर्व मल्ल विद्या साधकों का महापर्व है लेकिन तमाम अखाड़े मौन हैं बावजूद इस सत्य के कि विश्व स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिताएं में मल्लों की दम पर ही भारत सर उठाकर खड़ा हो पाता है. वैलेंटाइन जैसे विदेशी पर्व के समर्थक इससे दूर हैं यह तो समझा जा सकता है किन्तु वेलेंटाइन का  विरोध करनेवाले समूह कहाँ हैं? वे नागपंचमी को यवा शौर्य-पराक्रम का महापर्व क्यों नहीं बना देते जबकि उन्हीं के समर्थक राजनैतिक दल राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज हैं?  

महाराष्ट्र से अन्य राज्यवासियों को बाहर करनेके प्रति उत्सुक नेता और दल नागपंचमई को महाराष्ट्र की मल्लखम्ब विधा का महापर्व क्यों कहीं बनाते? क्यों नहीं यह खेल भी विश्व प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाए और भारत के खाते में कुछ और पदक आएं? 

अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिन सपेरों को अनावश्यक और अपराधी कहा जा रहा है, उनके नागरिक अधिकार की रक्षा कर उन्हें पारम्परिक पेशे से वंचित करने के स्थान पर उनके ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग कर हर शहर में सर्प संरक्षण केंद्र खोले जाए जहाँ सर्प पालन कर औषधि निर्माण हेतु सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन हो. सपेरों को यहाँ रोजगार मिले, वे दर-दर भटकने के बजाय सम्मनित नागरिक का जीवन जियें। सर्प विष से बचाव के उनके पारम्परिक ज्ञान मन्त्रों और जड़ी-बूटियों पर शोध हो. 

क्या माननीय नरेंद्र मोदी जी इस और ध्यान देंगे?

*******

            

शनिवार, 2 अगस्त 2014

baal geet: barase paani -sanjiv

बाल गीत:

बरसे पानी

संजीव 'सलिल'
*


रिमझिम रिमझिम बरसे पानी.
आओ, हम कर लें मनमानी.



बड़े नासमझ कहते हमसे
मत भीगो यह है नादानी.



वे क्या जानें बहुतई अच्छा
लगे खेलना हमको पानी.



छाते में छिप नाव बहा ले.
जब तक देख बुलाये नानी.



कितनी सुन्दर धरा लग रही,
जैसे ओढ़े चूनर धानी.



काश कहीं झूला मिल जाता,
सुनते-गाते कजरी-बानी.

'सलिल' बालपन फिर मिल पाये.
बिसराऊँ सब अकल सयानी.

subhadra jayati par: sanjiv

आज नाग पन्चमी सुभद्रा जयन्ती


सुभद्रा जी के निवास पर रखी आवक्ष प्रतिमा

नाग पंचमी पर विधना ने विष हरने तुमको भेजा
साथ महादेवी ने देकर कहाः 'सौख्य मेरा लेजा'

'वीरों के वसंत' की गाथा, 'मर्दानी' की कथा कही 
शिशुओं को घर छोड़ जेल जा, मन ही मन थीं खूब दहीं

तीक्ष्ण लेखनी से डरता था राज्य फिरंगी, भारत माँ
गर्व किया करती थी तुम पर, सत्याग्रह में फूँकी जां

वज्र सरीखे माखन दादा, कुसुम सदृश केशव का संग
रामानुज नर्मदा भवानी कवि पुंगव सुन दुनिया दंग

देश हुआ आजाद न तुम गुटबाजों को किन्चित भायीं
गाँधी-पथ की अनुगामिनी तुम, महलों से थीं टकरायीं

शुभाशीष सरदार ने दिया, जनसेवा की राह चलीं
निहित स्वार्थरत नेताओं को तनिक न भायीं खूब खलीं

आम आदमी की वाणी बन, दीन दुखी की हरने पीर
सत्ता को प्रेरित करने सक्रिय थीं मन में धरकर धीर

नियति नटी ने देख तुम्हारी कर्मठता यम को भेजा
सुरपुर में सत्याग्रहचाहा कहा- 'सुभद्रा को ले आ'

जनपथ पर चलनेवाली ने राजमार्ग पर प्राण तजे   
भू ने अश्रु बहाये, सुरपुर में थे स्वागत द्वार सजे

खुद गोविन्द द्वारिका तुम पर अश्रु चढ़ाकर रोये थे
अगणित जनगण ने निज नयना, खोकर तुम्हें भिगोये थे 

दीप प्रेरणा का अनुपम तुम, हम प्रकाश अब भी पाते
मन ही मन करते प्रणाम शत, विष पीकर भी जी जाते
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

Lekh: kayasthon ka mahaaparv naag panchami -sanjiv

विचारोत्तेजक लेख:
कायस्थों का महापर्व नागपंचमी
संजीव
*
कायस्थोंके उद्भव की पौराणिक कथाके अनुसार उनके मूल पुरुष श्री चित्रगुप्तके २ विवाह सूर्य ऋषिकी कन्या नंदिनी और नागराजकी कन्या इरावती  हुए थे। सूर्य ऋषि हिमालय की तराईके निवासी और आर्य ब्राम्हण थे जबकि नागराज अनार्य और वनवासी थे। इसके अनुसार चित्रगुप्त जी ब्राम्हणों तथा आदिवासियों दोनों के जामाता और पूज्य हुए। इसी कथा में चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों  नागराज वासुकि की १२ कन्याओं से साथ किये जाने का वर्णन है जिनसे कायस्थों की १२ उपजातियों का श्री गणेश हुआ।  पुत्रों को एक ही वंश में ब्याहना और अगली पीढ़ी में कोई ब्राम्हण कन्या न आना दर्शाता है कि वनवासी नागों से संबंध को ब्राम्हणों ने नहीं स्वीकारा। 

इससे यह भी स्पष्ट है कि नागों के साथ कायस्थॉ का निकट संबंध (ननिहाल) है। आर्यों के पूर्व नाग संस्कृति सत्ता में थी। नागों को विष्णु ने छ्ल से हराया। नाग राजा का वेश धारण कर रानी का सतीत्व भंग कर नाग राजा के प्राण हरने, राम, कृष्ण (कालिया नाग प्रसंग) तथा पान्ड्वों द्वारा नाग राजाओं और प्रजा का वध करने, उनकी जमीन छीनने,  तक्षक द्वारा दुर्योधन की सहायता करने, जन्मेजय द्वारा नागों का कत्लेआम किये जाने, नागराज तक्षक द्वारा फल की टोकनी में घुसकर उसे मारने के प्रसंग सर्व ज्ञात हैं। महाभारत में अंगराज कर्ण हमेशा कुरु राज्य सभा में देखे जाते हैं तब उनके अंग देश का राज्य संचालन कौन करता था? वास्तव में कायस्थ ही उनका राज-काज इतनी दक्षता से देखते रहे कि वे निश्चिन्त रह सके। कर्ण के रपतिनिधि के नाते वे भी कर्ण या 'करण कायस्थ' (कार्यस्थ = कर्ण के राज्य कार्य पर स्थित) कहे गये और आज भी 'करण' कहे जाते हैं।

दमन की यह सब घटनायें कायस्थों के ननिहाल पक्ष के साथ घटीं तो क्या कायस्थों पर इसका कोई असर नहीं हुआ? वास्तव में नागों और आर्यों के साथ समानता के आधार पर संबंध स्थापित करने का प्रयास आर्यों को नहीं भाया और उन्होंने नागों के साथ उनके संबंधियों के नाते कायस्थों को भी नष्ट किया। महाभारत युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्षों से कायस्थ नरेश लड़े और नष्ट हुए। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना.... कायस्थ राजा और उनकी सेनाएं मारी गयीं सिर्फ वृद्ध, महिलाऐं, बच्चे और आम जान बचे। सत्ता काल में जिन्हें रोक वे बदला लेने पर उतर आये तो कायस्थ परिवार संरक्षण के अभाव में भागे और सुदूर बसे।

कालान्तर में शान्ति स्थापना के प्रयासों में  असंतोष को शांत करने के लिए पंचमी पर नागों का पूजनकर उन्हें मान्यता तो दी गयी किन्तु ब्राम्हण को सर्वोच्च मानने की मनुवादी मानसिकता ने आजतक कार्य  पर जाति का निर्धारण करने के सिद्धांत को लोकाचार और परंपरा नहीं बनने दिया । श्री कृष्ण को विष्णु का अवतार मानने के बाद भी गीता में उनका वचन 'चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुण कर्म विभागष:' को कार्य रूप में नहीं  आने दिया गया तथा ब्राम्हण आज भी श्रेष्ठता का निराधार दावा करते हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप सेवाकार्य में जुटे वर्ग एकत्र होकर आरक्षण की माँग करते हैं।

कायस्थों को सनातन सत्य को समझना होगा तथा आदिवासियों से अपने मूल संबंध को स्मरण और पुनर्स्थापित कर खुद को मजबूत बनाना होगा। कायस्थ और आदिवासी समाज मिलकर कार्य करें तो जन्मना ब्राम्हणवाद और छद्म श्रेष्ठता की नींव धसक सकती है। कायस्थ और आदिवासी एक होकर राजनीति में प्रमुखता पा सकते हैं। जिस देश में गाय काटने और पशु-पक्षियों के मांस को खुले आम लटकाकर भेचने पर प्रतिबन्ध नहीं है वहीं नागपंचमी के दिन सर्प-पूजन कराकर जनगण के मन से सर्पों के प्रति भय दूर करनेमें मददगार सपेरों को सर्प पर अत्याचार का अपराधी करार दिया जाए यह कितना न्यायोचित है?

सभी सनातनधर्मी योग्यता वृद्धि हेतु समान अवसर पायें, अर्जित योग्यतानुसार आजीविका पायें तथा पारस्परिक पसंद के आधार पर विवाह संबंध में बँधने का अवसर पा सकें तो एक समरस समाज का निर्माण हो सकेगा। इसके लिए कायस्थों को अज्ञानता के घेरे से बाहर आकर सत्य को समझना और खुद को बदलना होगा। 

नागों  संबंध की कथा पढ़ने मात्र से कुछ नहीं होगा। कथा के पीछे का सत्य जानना और मानना होगा। संबंधों को फिर जोड़ना होगा। नागपंचमी के समाप्त होते पर्व को कायस्थ अपना राष्ट्रीय पर्व बना लें तो आदिवासियों और सवर्णों के बीच नया सेतु बन सकेगा। 

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sansmaran: neem ke neeche premchand -mahadevi

संस्मरणः

नीम के नीचे प्रेमचंद की चौपाल

- महादेवी वर्मा
*
"प्रेमचंदजी से मेरा प्रथम परिचय पत्र के द्वारा ही हुआ। तब मैं 8 वीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी । उन्होंने 'चाँद' में प्रकाशित मेरी कविता 'दीपक' पर स्वयं होकर पत्र भेजा था । मैं गर्व महसूस करती रही कि वाह कथाकार भी कविता बाँचते हैं ।
उनका प्रत्यक्ष दर्शन तो विद्यापीठ आने के उपरांत हुआ। उसकी भी एक कहानी है :
एक दोपहर को जब प्रेमचंद उपस्थित हुए तो मेरी भक्तिन ने उनकी वेशभूषा से उन्हें भी अपने समान ग्रामीण या ग्राम निवासी समझा और सगर्व उन्हें सूचना दी - "गुरुजी काम कर रही हैं।"
प्रेमचंदजी ने अपने अट्टहास के साथ उत्तर दिया - "तुम तो ख़ाली हो । घड़ी-दो घड़ी बैठकर बात करो ।"
और तब, जब कुछ समय के उपरांत मैं किसी कार्यवश बाहर आयी तो देखा - नीम के नीचे चौपाल बन गई है । विद्यापीठ के चपरासी, चौकीदार, भक्तिन के नेतृत्व में उनके चारों ओर बैठे हैं और लोक-चर्चा आरंभ है ।
तो इतने सहज थे प्रेमचंद ।"

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बुधवार, 30 जुलाई 2014

doha salila: teej sanjiv

दोहा सलिलाः
संजीव
*
नेह वॄष्टि नभ ने करी, धरा-मन गया भींज
हरियायी भू लाज से, 'सलिल' मन गयी तीज
*
हिना सजी ले हथेली, हरी चूड़ियाँ संग
हरी चुनरिया ने हरी, शान्ति पिया मन दंग
*
तंग गली है प्रीति की, तंग प्रियतमा भाग
आँखें चार न हो कहें, जो न कहा अनुराग
*

राष्ट्र्भाषा हिन्दी

समाचारः बाड़्मेर में अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता समिति की बैठक में राजस्थानी को हिंदी से अधिक पुरानी भाषा होने के आधार पर राष्ट्र्भाषा बनाने की माँग की गयी है. मेरा नजरिया निम्न है. आप भी अपनी बात कहें-

१. राजस्थानी, कन्नौजी, बॄज, अवधी, मगही, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका और अन्य शताधिक भाषायें आधुनिक हिंदी के पहले प्रचलित रही हैं. क्या इन सबको राष्ट्र्भाषा बनाया जा सकता है?
२. राजस्थानी कौन सी भाषा है? राजस्थान में मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावाटी, हाड़ौती आदि सौ से अधिक भाषायें बोली जा रही हैं. क्या इन सबका मिश्रित रूप राजस्थानी है?
३. हिंदी ने कभी किसी भाषा का विरोध नहीं किया. अंग्रेजी का भी नहीं. हिन्दी की अपनी विशेषतायें हैं. राजस्थानी को हिंदी का स्थान दिया जाए तो क्या देश के अन्य राज्य उसे मान लेंगे? क्या विश्व स्तर पर राजस्थानी भारत की भाषा के तौर पर स्वीकार्य होगी?
जैसे घर में दादी सास, चाची सास, सास आदि के रहने पर भी बहू अधिक सक्रिय होती है वैसे ही हिन्दी अपने पहले की सब भाषाओं का सम्मान करते हुए भी व्यवहार में अधिक लायी जा रही है.
४. निस्संदेह हिन्दी ने शब्द संपदा सभी पूर्व भाषाओं से ग्रहण की
है.
५. आज आवश्यकता हिन्दी में सभी भाषाओं के साहित्य को जोड़्ने की है.
६. म. गांधी ने क्रमशः भारत की सभी भाषाओं को देवनागरी में लिखे जाने का सुझाव दिया था. राजनीतिक स्वार्थों ने उनके निधन की बाद ऐसा नहीं होने दिया और भाषाई विवाद पैदा किये. अब भी ऐसा हो सके तो सभी भारतीय भाषायें संस्कृत की प्रृष्ठ भूमि और समान शब्द संपदा के कारण समझी जा सकेंगी.

ईद मुबारक

द्विपदियाँ

संजीव

*

जब समय के पार झाँकें, नयन तब देखें अदेखा
तुम न जानो ग्रह बतायें, कहाँ कैसी भाग्य रेखा?
*
चाँद जब उसको कहा, रूठ गयी वह मुझसे
दाग चेहरे पे नहीं मेरे, मैं न नेता हूँ..
*
चाँद से जब भी मिले, रजनी पूर्णिमा हो तभी
सफर का अन्त ही, शुरुआत नयी होती है.
*
जात मजहब धर्म बोली, चाँद अपनी कह जरा
पुज रहा तू ईद में भी, संग करवा चौथ के.
*
चाँद तनहा है ईद हो कैसे? चाँदनी उसकी मीत हो कैसे??
मेघ छाये घने दहेजों के, रेप पर उसकी जीत हो कैसे??
*
एक मुक्तक
कोशिशें करती रहो, बात बन ही जायेगी
जिन्दगी आज नहीं, कल तो मुस्कुरायेगी
हारते जो नहीं गिरने से, वो ही चल पाते-
मंजिलें आज नहीं कल तो रास आयेंगी.
*
संकलितः ईद मुबारक
रात कल ख्वाब में मुझको तेरी दीद हुई
ईद हो या कि ना हो ,मेरे लिए ईद हुई .
*
कमाल-ऐ-ज़ब्त मोहब्बत इसी को कहते है,
चाँद दिख भी गया और हम उसे अपना न कह सके.
*
जिनका चाँद वक़्त के आसमां में खो गया
उनके हाथों पे भी कभी कोई ईद रख ज़रा -अशोक जमनानी
*
ईद की सबको मुबारक ईद का त्योंहार है,
दोस्तों और दुश्मनों में आज देखो प्यार है,
ईद की पुरज़ोर ख़ुशियों का ये मंज़र देखिये,
हिन्दू-मुस्लिम एक हैं हाइल कहाँ दीवार है -नासिर ज़ैदी
*

साल भर के बाद आया दिन मुबारक ईद का,
भर के खुशियाँ साथ लाया दिन मुबारक ईद का। -प्रो. सरन घई
*
ईद वालों को ईद मुबारक, तीज वालों को तीज मुबारक
प्यार से नफरत हारे यादव', रोप दें ऐसे बीज मुबारक -रघुविन्द्र यादव
*
ईद मुबारक हो हर हाल मुबारक हो.
खुशियों से भरे झोली हर साल मुबारक हो| -प्रभुदयाल श्रीवस्तव
*
आज बधायां ईद री, सावण तीज सुहाय.
रळमिल रैवां माेकळा, रूं- रूं खिलताै जाय..- दीनदयाल शर्मा
*
छाेड़ पुरानी रंजिशें, ईद मनाएं साथ.
गले लगा ले आज ताे,सिर्फ मिला मत हाथ..- विजेन्द्र
*

ईद

एक मुक्तक
संजीव
*
कोशिशें करते रहो, बात बन ही जायेगी
जिन्दगी आज नहीं, कल तो मुस्कुरायेगी
हारते जो नहीं गिरने से, वो ही चल पाते-
मंजिलें आज नहीं कल तो रास आयेंगी.
***
दो द्विपदियाँ
जात मजहब धर्म बोली, चाँद अपनी कह जरा
पुज रहा तू ईद में भी, संग करवा चौथ के.
*
चाँद तनहा है ईद हो कैसे? चाँदनी उसकी मीत हो कैसे??
मेघ छाये घने दहेजों के, रेप पर उसकी जीत हो कैसे??
*

सोमवार, 28 जुलाई 2014

नजरिया अपना अपना

नजरिया अपना अपना
*
नन्दिता मेहता

मंजिल की मुझको तलब नहीं
मुझे रास्तों से ही प्यार है
न कुबूल मुझको वो ज़िन्दगी
जिसके सफ़र का सिरा भी है
*
संजीव वर्मा 'सलिल'

रास्तों से न प्यार कर, 
जाते कहीं न रास्ते
करते सफर पग तय सदा, 
बस मंजिलों के वास्ते.
***

चौपाल चर्चाः जाति और कायस्थ -्संजीव

चौपाल चर्चाः
अनुगूँजा सिन्हाः मैं आपके प्रति पूरे सम्मान के साथ आपको एक बात बताना चाहती हूँ कि मैं जाति में यकीन नही रखती हूँ और मैं कायस्थ नहीं हूँ।

अनुगून्जा जी! 
आपसे सविनय निवेदन है कि- 
'जात' क्रिया (जना/जाया=जन्म दिया, जाया=जगजननी का एक नाम) से आशय 'जन्मना' होता है, जन्म देने की क्रिया को 'जातक कर्म', जन्म लिये बच्चे को 'जातक', जन्म देनेवाली को 'जच्चा' कह्ते हैं. जन्मे बच्चे के गुण-अवगुण उसकी जाति निर्धारित करते हैं. बुद्ध की जातक कथाओं में विविध योनियों में जन्म लिये बुद्ध के ईश्वरत्व की चर्चा है. जाति जन्मना नहीं कर्मणा होती है. जब कोई सज्जन दिखनेवाला व्यक्ति कुछ निम्न हर्कात कर दे तो बुंदेली में एक लोकोक्ति कही जाती है ' जात दिखा गया'. यहाँ भी जात का अर्थ उसकी असलियत या सच्चाई से है.सामान्यतः समान जाति का अर्थ समान गुणों, योग्यता या अभिरुचि से है.
आप ही नहीं हर जीव कायस्थ है. पुराणकार के अनुसार "कायास्थितः सः कायस्थः"
अर्थात वह (निराकार परम्ब्रम्ह) जब किसी काया का निर्माण कर अपने अन्शरूप (आत्मा) से उसमें स्थित होता है, तब कायस्थ कहा जाता है. व्यावहारिक अर्थ में जो इस सत्य को जानते-मानते हैं वे खुद को कायस्थ कहने लगे, शेष कायस्थ होते हुए भी खुद को अन्य जाति का कहते रहे. दुर्भाग्य से लंबे आपदा काल में कायस्थ भी इस सच को भूल गये या आचरण में नहीं ला सके. कंकर-कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान, आत्मा सो परमात्मा आदि इसी सत्य की घोषणा करते हैं.
जातिवाद का वास्तविक अर्थ अपने गुणों-ग्यान आदि अन्यों को सिखाना है ताकि वह भी समान योग्यता या जाति का हो सके. समय और परिस्थितियों ने शब्दों के अर्थ भुला दिये, अर्थ का अनर्थ अज्ञानता के दौर में हुआ. अब ज्ञान सुलभ है, हम शब्दों को सही अर्थ में प्रयोग करें तो समरसता स्थापित करने में सहायक होंगे। दुर्भाग्य से जन प्रतिनिधि इसमें बाधक और दलीय स्वार्थों के साधक है. 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

aawhaan gaan: sanjiv

आव्हान गान संजीव * जागो, जागो, जागो रे!
कायस्थों अब जागो रे!!
हम खुद से ही हारे हैं
अब मिल निज हक माँगो रे!!....
*
बारह रहो न, एक बनो
खूब मेहनती, नेक बनो.
जमा रखो धरती पर पैर
आसमान को फिर छू लो.
मिले मार्ग में जो बाधा
उससे डर मत भागो रे!!...
*
जो चाहोगे, पा सकते,
गीत शौर्य के गा सकते.
कोई हरा न पायेगा
हँस मंजिल तक जा सकते.
सूर्य, चंद्र्मा तारों को
ला आँगन में टाँगो रे!!...
*
चित्रगुप्त प्रभु जी संदेश,
कार्य न कोई छोटा लेश.
हर भाषा-विद्या सीखो
पहुँच शीर्ष पर हँसो हमेश.
कर्म कुशलता का झंडा
सब दुनिया पर गाड़ो रे!!...
*

दोह सलिलाः -संजीव

दोहा सलिलाः
संजीव
*
प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अन्तर्मन जागृत करें, सन्त बन सकें सन्त
*
आशा पर आकाश टंगा है, कहते हैं सब लोग
आशा जीवन श्वास है, ईश्वर हो न वियोग
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
*

गाल टमाटर की तरह, अब न बोलना आप
प्रेयसि के नखरे बढ़ें, प्रेमी पाये शाप.

*
प्याज कुमारी से करे, युवा टमाटर प्यार
किसके ज्यादा भाव हैं?, हुई मुई तकरार
*


बुधवार, 23 जुलाई 2014

achchhe din: bhagwant maan

आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान की संसद में सुनाई गई कविता :
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पहले किराया बढ़ाया रेल का,
फिर नम्बर आया तेल का
खुद ही दस साल करते रहे नुक्ता-चीनी,
आते ही 2 रुपये किलो महंगी कर दी चीनी
हर कोई सपने दिखाकर 
आम आदमी को ठग रहा है,
आम लोगों को डर अब चीन से नहीं, 
चीनी से लग रहा है
दुनिया मून पर,
सरकार हनीमून पर
पूछ रहे पूरे देश के चाय वाले हैं,
महंगाई की वज़ह से 
खाली चाय के प्याले हैं
लोगों को तो बस 
दो वक्त की रोटी के लाले हैं
सरकार जी बता दीजिये - 
अच्छे दिन कब आने वाले हैं?

शायद पता नहीं है कि 
ईराक है किस इलाके में
भारतीय ईराक में फंसे हैं 
विदेश मंत्री सुषमा जी गईं थीं ढाके में
बंगला देश को ये विदेश मंत्रालय 
क्या दस दिन बाद नहीं जा सकता था ?
क्या कंधार की तर्ज़ पर  
विदेश मंत्री का जहाज बगदाद नहीं जा सकता था
हमारे देश के लोग बहुत हिम्मत वाले हैं
जिन्होंने इस महंगाई के दौर में भी बच्चे पाले हैं
लूटने वाले ज़्यादा, 
बस गिनती के रखवाले हैं
प्लीज़ सरकार जी बता दीजिये- 
अच्छे दिन कब आने वाले हैं ?

मेरे सपने में 
कल रात बुलेट ट्रेन आई,
मैंने कहा: 'जी बधाई हो बधाई !
सुना है तुम मेरे देश आ रही हो ?
मेरे देश की तरक्की की स्पीड बढ़ा रही हो ?
बुलेट ट्रेन बोली- 
मेरा शिकवा किसी गाय या भैंस से नहीं
अरे! मैं बिजली से चलती हूँ, 
गोबर गैस से नहीं.
प्रधानमंत्री मोदी जी के भाषण, 
लोगों को खूब जंचे हैं
एक ही राहत की बात है 
कि विदेशों से काला धन वापस आने में 
मात्र 50 दिन बचे हैं
हम तो आम आदमी पार्टी वाले हैं
हमने तो हर सरकार से डण्डॆ खाले हैं
हमने तो सड़कों पर और पार्लियामेंट में
ये पूछने के लिए ही मोर्चे सम्हाले हैं
कि अ..च्छे दि..न क..ब आ..ने वा..ले हैं?
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mahabharat kaal ka vimaan : sanjiv

५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान !अफगानिस्तान में 


रामायन और रामचरित मानस में पुष्पक विमान का उल्लेख है महाभारत का में अदृश्य होने और भस्म होने के कई प्रसंग हैं  हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक ५००० साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतकालीन हो सकता है।
 
वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक 'टाइम वेल' में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि 'टाइम वेल' इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने २१ दिसंबर २०१० को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में..
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप ४० सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है।

द्विपदीः संजीव

एक द्विपदी

संजीव
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तलियों की चाह में भटको न तुम
फूल बन महको तो खुद आयेंगी ये.