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बुधवार, 16 जुलाई 2014

चित्र-चित्र कविता- ःसंजीव

चित्र-चित्र कविता
संजीव
*
बंद आँख में स्वप्न अनेकों, पलक उठें तो जग देखे.
कहो किसी को क्यों रखने दूँ, अपने ख्वाबों के लेखे?

नयन मूँदकर क्यों बैठूँ मैं, स्वप्न न क्यों साकार करूँ?
निराकार सरकार मिले तो, गले लगा साकार करूँ

मिलन युग पल में कटे हैं, विरह-पल युग-सम न कटते
भू तपे या मेघ बरसे, दर्द मन के नहीं घटते

 
हेरती हूँ राह पल-छिन, आ गये पर तुम न आये
अगर बरसे नहीं बदरा,व्यर्थ ही नभ क्यों बुलाये?
धरा गुमसुम धरे धीरज, मौन व्रत धारे हुए है-
हुई है मायूस गौरा, हाय बौरा क्यों न आये??


अठ्खेली करता अल्हड़पन, चन्चल अँखियाँ हिरनी सी 
वाक प्रवाहित कलकल निर्झर, नयन पुतलियाँ घिरनी सी
मुक्तामणि सी दंतपंक्ति है, रक्तकमल से अधर पटल
भाल-क्षितिज पर दिप-दिप दिनकर, केश लटा है नागिन सी
निरख नशीला होता मौसम, होश नहीं है बादल को
पवन झूमता, क्षितिज थामता लपक चन्द्र से पागल को


हूँ अवाक चुप देख दिवानापन अपने बेबस मनका
चला गया मुँह फेर पथिक जो उसका ही फेरे मनका
कैसे समझाऊँ इसको मैं राम न मिलते सीता को?
कह्ता फर्ज निभा चुप अपना, मत बिसराना गीता को

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

हास्य रचनाः संजीव

हास्य रचनाः नियति संजीव * सहते मम्मी जी का भाषण, पूज्य पिताश्री का फिर शासन भैया जीजी नयन तरेरें, सखी खूब लगवाये फेरे बंदा हलाकान हो जाए, एक अदद तब बीबी पाए सोचे धौन्स जमाऊँ इस पर, नचवाए वह आँसू भरकर चुन्नू-मुन्नू बाल नोच लें, मुन्नी को बहलाए गोद ले कही पड़ोसी कहें न द्ब्बू, लड़ता सिर्फ इसलिये बब्बू ***

दोहा

एक दोहाः
संजीव
*
बसता रूप अरूप में, या अरूप में रूप 
जो रह्स्य यह जानता, उसका मन हो भूप 

ओशो उवाच

आज्ञा चक्र की संभावना :-

छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, कास्मिक बॉडी है; और छठवां केंद्र आज्ञा है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा, अस्तित्व का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा--एक्झिस्टेंस का, बीइंग का। अस्मिता खो जाएगी छठवें शरीर पर। 'हूं', यह भी चला जाएगा--है! मैं हूं--तो 'मैं' चला जाएगा पांचवें शरीर पर, 'हूं' चला जाएगा पांचवें को पार करते ही। है! इज़नेस का बोध होगा, तथाता का बोध होगा--ऐसा है। उसमें मैं कहीं भी नहीं आऊंगा, उसमें अस्मिता कहीं नहीं आएगी। जो है, दैट व्हिच इज़, बस वही हो जाएगा। 
तो यहां सत् का बोध होगा, बीइंग का होगा; चित् का बोध होगा, कांशसनेस का बोध होगा। लेकिन यहां चित् मुझसे मुक्त हो गया। ऐसा नहीं कि मेरी चेतना। चेतना! मेरा अस्तित्व--ऐसा नहीं। अस्तित्व!

ब्रह्म का भी अतिक्रमण करने पर निर्वाण काया में प्रवेश 
और कुछ लोग छठवें पर रुक जाएंगे। क्योंकि कास्मिक बॉडी आ गई, ब्रह्म हो गया मैं, अहं ब्रह्मास्मि की हालत आ गई। अब मैं नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और कहां खोज? अब कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं बचा; अब तो सब पा लिया; क्योंकि ब्रह्म का मतलब है--दि टोटल; सब।

इस जगह से खड़े होकर जिन्होंने कहा है, वे कहेंगे कि ब्रह्म अंतिम सत्य है, वह एब्सोल्यूट है, उसके आगे फिर कुछ भी नहीं। और इसलिए इस पर तो अनंत जन्म रुक सकता है कोई आदमी। आमतौर से रुक जाता है; क्योंकि इसके आगे तो सूझ में ही नहीं आता कि इसके आगे भी कुछ हो सकता है। 

तो ब्रह्मज्ञानी इस पर अटक जाएगा, इसके आगे वह नहीं जाएगा। और यह इतना कठिन है इसको पार करना--इस जगह को पार करना--क्योंकि अब बचती ही नहीं कोई जगह जहां इसको पार करो। सब तो घेर लिया, जगह भी चाहिए न! अगर मैं इस कमरे के बाहर जाऊं, तो बाहर जगह भी तो चाहिए! अब यह कमरा इतना विराट हो गया--अंतहीन, अनंत हो गया; असीम, अनादि हो गया; अब जाने को भी कोई जगह नहीं, नो व्हेयर टु गो। तो अब खोजने भी कहां जाओगे? अब खोजने को भी कुछ नहीं बचा, सब आ गया। तो यहां अनंत जन्म तक रुकना हो सकता है।

परम खोज में आखिरी बाधा ब्रह्म:- 

तो ब्रह्म आखिरी बाधा है--दि लास्ट बैरियर। साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है। बीइंग रह गया है अब, लेकिन अभी भी नॉन-बीइंग भी है शेष; 'अस्ति' तो जान ली, 'है' तो जान लिया, लेकिन 'नहीं है', अभी वह जानने को शेष रह गया। इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्रार। और उसके संबंध में कोई बात नहीं हो सकती। ब्रह्म तक बात जा सकती है--खींचत्तानकर; गलत हो जाएगी बहुत।

छठवें शरीर में तीसरी आंख का खुलना :- 

पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है; सारी बात साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती हैं, शब्द अर्थहीन होने लगता है, लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं। लेकिन अब अंगुली भी टूट जाती है, अब इशारे गिर जाते हैं; क्योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है। 
तो एब्सोल्यूट बीइंग को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है। 
इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में हैं, आज्ञा चक्र पर ध्यान करेंगे। वह उसका चक्र है। इसलिए भृकुटी-मध्य में आज्ञा चक्र पर वे ध्यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है उस शरीर का। और वहां जो उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्हें जो दिखाई पड़ना शुरू होगा विस्तार अनंत का, उसको वे तृतीय नेत्र और थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे। वहां से वह तीसरी आंख उनके पास आई, जहां से वे अनंत को, कास्मिक को देखना शुरू कर देते हैं। 

सहस्रार चक्र की संभावना :-

लेकिन अभी एक और शेष रह गया--न होना, नॉन-बीइंग, नास्ति। अस्तित्व जो है वह आधी बात है, अनस्तित्व भी है; प्रकाश जो है वह आधी बात है, अंधकार भी है; जीवन जो है वह आधी बात है, मृत्यु भी है। इसलिए आखिरी अनस्तित्व को, शून्य को भी जानने की...क्योंकि परम सत्य तभी पता चलेगा जब दोनों जान लिए--अस्ति भी और नास्ति भी; आस्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में और नास्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में; होना भी जाना उसकी संपूर्णता में और न होना भी जाना उसकी संपूर्णता में; तभी हम पूरे को जान पाए, अन्यथा यह भी अधूरा है। ब्रह्मज्ञान में एक अधूरापन है कि वह 'न होने' को नहीं जान पाएगा। इसलिए ब्रह्मज्ञानी 'न होने' को इनकार ही कर देता है; वह कहता है: वह माया है, वह है ही नहीं। वह कहता है: होना सत्य है, न होना झूठ है, मिथ्या है; वह है ही नहीं; उसको जानने का सवाल कहां है! 

निर्वाण काया का मतलब है शून्य काया, जहां हम 'होने' से 'न होने' में छलांग लगा जाते हैं। क्योंकि वह और जानने को शेष रह गया; उसे भी जान लेना जरूरी है कि न होना क्या है? मिट जाना क्या है? इसलिए सातवां शरीर जो है, वह एक अर्थ में महामृत्यु है। और निर्वाण का, जैसा मैंने कल अर्थ कहा, वह दीये का बुझ जाना है। वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा 'मैं' था, मिट गया; वह जो हमारी अस्मिता थी, मिट गई। लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गए हैं, अब हम ब्रह्म हो गए हैं, अब इसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और इतनी जिसकी छलांग की तैयारी है, वह जो है, उसे तो जान ही लेता; जो नहीं है, उसे भी जान लेता है। 

और ये सात शरीर और सात चक्र हैं हमारे। और इन सात चक्रों के भीतर ही हमारी सारी बाधाएं और साधन हैं। कहीं किसी बाहरी रास्ते पर कोई बाधा नहीं है। इसलिए किसी से पूछने जाने का उतना सवाल नहीं है।

खोजने निकलो, मांगने नहीं
और अगर किसी से पूछने भी गए हो, और किसी के पास समझने भी गए हो, तो मांगने मत जाना। मांगना और बात है; समझना और बात है; पूछना और बात है। खोज अपनी जारी रखना। और जो समझकर आए हो, उसको भी अपनी खोज ही बनाना, उसको अपना विश्वास मत बनाना। नहीं तो वह मांगना हो जाएगा। 
मुझसे एक बात तुमने की, और मैंने तुम्हें कुछ कहा। अगर तुम मांगने आए थे, तो तुमको जो मैंने कहा, तुम इसे अपनी थैली में बंद करके सम्हालकर रख लोगे, इसकी संपत्ति बना लोगे। तब तुम साधक नहीं, भिखारी ही रह जाते हो। नहीं, मैंने तुमसे कुछ कहा, यह तुम्हारी खोज बना, इसने तुम्हारी खोज को गतिमान किया, इसने तुम्हारी जिज्ञासा को दौड़ाया और जगाया, इससे तुम्हें और मुश्किल और बेचैनी हुई, इसने तुम्हें और नये सवाल खड़े किए, और नई दिशाएं खोलीं, और तुम नई खोज पर निकले, तब तुमने मुझसे मांगा नहीं, तब तुमने मुझसे समझा। और मुझसे तुमने जो समझा, वह अगर तुम्हें स्वयं को समझने में सहयोगी हो गया, तब मांगना नहीं है। 
तो समझने निकलो, खोजने निकलो। तुम अकेले नहीं खोज रहे, और बहुत लोग खोज रहे हैं। बहुत लोगों ने खोजा है, बहुत लोगों ने पाया है। उन सबको क्या हुआ है, क्या नहीं हुआ है, उस सबको समझो। लेकिन उस सबको समझकर तुम अपने को समझना बंद मत कर देना; उसको समझकर तुम यह मत समझ लेना कि यह मेरा ज्ञान बन गया। उसको तुम विश्वास मत बनाना, उस पर तुम भरोसा मत करना, उस सबसे तुम प्रश्न बनाना, उस सबको तुम समस्या बनाना, उसको समाधान मत बनाना, तो फिर तुम्हारी यात्रा जारी रहेगी। और तब फिर मांगना नहीं है, तब तुम्हारी खोज है। और तुम्हारी खोज ही तुम्हें अंत तक ले जा सकती है। और जैसे-जैसे तुम भीतर खोजोगे, तो जो मैंने तुमसे बातें कही हैं, प्रत्येक केंद्र पर दो तत्व तुमको दिखाई पड़ेंगे--एक जो तुम्हें मिला है, और एक जो तुम्हें खोजना है। क्रोध तुम्हें मिला है, क्षमा तुम्हें खोजनी है; सेक्स तुम्हें मिला है, ब्रह्मचर्य तुम्हें खोजना है; स्वप्न तुम्हें मिला है, विज़न तुम्हें खोजना है, दर्शन तुम्हें खोजना है।
चार शरीरों तक तुम्हारी द्वैत की खोज चलेगी, पांचवें शरीर से तुम्हारी अद्वैत की खोज शुरू होगी। 
पांचवें शरीर में तुम्हें जो मिल जाए, उससे भिन्न को खोजना जारी रखना। आनंद मिल जाए तो तुम खोजना कि और आनंद के अतिरिक्त क्या है? छठवें शरीर पर तुम्हें ब्रह्म मिल जाए तो तुम खोज जारी रखना कि ब्रह्म के अतिरिक्त क्या है? तब एक दिन तुम उस सातवें शरीर पर पहुंचोगे, जहां होना और न होना, प्रकाश और अंधकार, जीवन और मृत्यु, दोनों एक साथ ही घटित हो जाते हैं। और तब परम, दि अल्टिमेट...और उसके बाबत फिर कोई उपाय नहीं कहने का। 

पांचवें शरीर के बाद रहस्य ही रहस्य है
इसलिए हमारे सब शास्त्र या तो पांचवें पर पूरे हो जाते हैं। जो बहुत वैज्ञानिक बुद्धि के लोग हैं, वे पांचवें के आगे बात नहीं करते; क्योंकि उसके बाद कास्मिक शुरू होता है, जिसका कोई अंत नहीं है विस्तार का। 
पर जो मिस्टिक किस्म के लोग हैं--जो रहस्यवादी हैं, सूफी हैं, इस तरह के लोग हैं--वे उसकी भी बात करते हैं। हालांकि उसकी बात करने में उन्हें बड़ी कठिनाई होती है, और उन्हें अपने को ही हर बार कंट्राडिक्ट करना पड़ता है, खुद को ही विरोध करना पड़ता है। और अगर एक सूफी फकीर की या एक मिस्टिक की पूरी बातें सुनो, तो तुम कहोगे कि यह आदमी पागल है! क्योंकि कभी यह यह कहता है, कभी यह यह कहता है! यह कहता है: ईश्वर है भी; और यह कहता है: ईश्वर नहीं भी है। और यह यह कहता है कि मैंने उसे देखा। और दूसरे ही वाक्य में कहता है कि उसे तुम देख कैसे सकते हो! क्योंकि वह कोई आंखों का विषय है? यह ऐसे सवाल उठाता है कि तुम्हें हैरानी होगी कि किसी दूसरे से सवाल उठा रहा है कि अपने से उठा रहा है! छठवें शरीर से मिस्टिसिज्म...
इसलिए जिस धर्म में मिस्टिसिज्म नहीं है, समझना वह पांचवें पर रुक गया। लेकिन मिस्टिसिज्म भी आखिरी बात नहीं है, रहस्य आखिरी बात नहीं है। आखिरी बात शून्य है; निहिलिज्म है आखिरी बात। 
तो जो धर्म रहस्य पर रुक गया, समझना वह छठवें पर रुक गया। आखिरी बात तो आखिरी है। और उस शून्य के अतिरिक्त आखिरी कोई बात हो नहीं सकती। 
राह के पत्थर को भी सीढ़ी बना लेना
तो पांचवें शरीर से अद्वैत की खोज शुरू होती है, चौथे शरीर तक द्वैत की खोज खत्म हो जाती है। और सब बाधाएं तुम्हारे भीतर हैं। और बाधाएं बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हें उपलब्ध हैं। और प्रत्येक बाधा का रूपांतरण होकर वही तुम्हारा साधन बन जाती है। रास्ते पर एक पत्थर पड़ा है; वह, जब तक तुमने समझा नहीं है उसे, तब तक तुम्हें रोक रहा है। जिस दिन तुमने समझा उसी दिन तुम्हारी सीढ़ी बन जाता है। पत्थर वहीं पड़ा रहता है। जब तक तुम नहीं समझे थे, तुम चिल्ला रहे थे कि यह पत्थर मुझे रोक रहा है, मैं आगे कैसे जाऊं! जब तुम इस पत्थर को समझ लिए, तुम इस पर चढ़ गए और आगे चले गए। और अब तुम उस पत्थर को धन्यवाद दे रहे हो कि तेरी बड़ी कृपा है, क्योंकि जिस तल पर मैं चल रहा था, तुझ पर चढ़कर मेरा तल बदल गया, अब मैं दूसरे तल पर चल रहा हूं। तू साधन था, लेकिन मैं समझ रहा था बाधा है; मैं सोचता था रास्ता रुक गया, यह पत्थर बीच में आ गया, अब क्या होगा! 
क्रोध बीच में आ गया। अगर क्रोध पर चढ़ गए तो क्षमा को उपलब्ध हो जाएंगे, जो कि बहुत दूसरा तल है। सेक्स बीच में आ गया। अगर सेक्स पर चढ़ गए तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो जाएगा, जो कि बिलकुल ही दूसरा तल है। और तब सेक्स को धन्यवाद दे सकोगे, और तब क्रोध को भी धन्यवाद दे सकोगे।

जिस वृत्ति से लड़ेंगे, उससे ही बंध जाएंगे
प्रत्येक राह का पत्थर बाधा बन सकता है और साधन बन सकता है। वह तुम पर निर्भर है कि उस पत्थर के साथ क्या करते हो। हां, भूलकर भी पत्थर से लड़ना मत, नहीं तो सिर फूट सकता है और वह साधन नहीं बनेगा। और अगर कोई पत्थर से लड़ने लगा तो वह पत्थर रोक लेगा; क्योंकि जहां हम लड़ते हैं वहीं हम रुक जाते हैं। क्योंकि जिससे लड़ना है उसके पास रुकना पड़ता है; जिससे हम लड़ते हैं उससे दूर नहीं जा सकते हम कभी भी। 
इसलिए अगर कोई सेक्स से लड़ने लगा, तो वह सेक्स के आसपास ही घूमता रहेगा। उतना ही आसपास घूमेगा जितना सेक्स में डूबनेवाला घूमता है। बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा घूमेगा। क्योंकि डूबनेवाला ऊब भी जाता है, बाहर भी होता है; यह ऊब भी नहीं पाता, यह आसपास ही घूमता रहता है।
अगर तुम क्रोध से लड़े तो तुम क्रोध ही हो जाओगे; तुम्हारा सारा व्यक्तित्व क्रोध से भर जाएगा; और तुम्हारे रग-रग, रेशे-रेशे से क्रोध की ध्वनियां निकलने लगेंगी; और तुम्हारे चारों तरफ क्रोध की तरंगें प्रवाहित होने लगेंगी। इसलिए ऋषि-मुनियों की जो हम कहानियां पढ़ते हैं--महाक्रोधी, उसका कारण है; उसका कारण है वे क्रोध से लड़नेवाले लोग हैं। कोई दुर्वासा है, कोई कोई है। उनको सिवाय अभिशाप के कुछ सूझता ही नहीं है। उनका सारा व्यक्तित्व आग हो गया है। वे पत्थर से लड़ गए हैं, वे मुश्किल में पड़ गए हैं; वे जिससे लड़े हैं, वही हो गए हैं। 
तुम ऐसे ऋषि-मुनियों की कहानियां पढ़ोगे जिन्हें कि स्वर्ग से कोई अप्सरा आकर बड़े तत्काल भ्रष्ट कर देती है। आश्चर्य की बात है! यह तभी संभव है जब वे सेक्स से लड़े हों, नहीं तो संभव नहीं है। वे इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं कि लड़-लड़कर खुद ही कमजोर हो गए हैं। और सेक्स अपनी जगह खड़ा है; अब वह प्रतीक्षा कर रहा है; वह किसी भी द्वार से फूट पड़ेगा। और कम संभावना है कि अप्सरा आई हो, संभावना तो यही है कि कोई साधारण स्त्री निकली हो, लेकिन इसको अप्सरा दिखाई पड़ी हो। क्योंकि अप्सराओं ने कोई ठेका ले रखा है कि ऋषि-मुनियों को सताने के लिए आती रहें। लेकिन अगर सेक्स को बहुत सप्रेस किया गया हो, तो साधारण स्त्री भी अप्सरा हो जाती है; क्योंकि हमारा चित्त प्रोजेक्ट करने लगता है। रात वही सपने देखता है, दिन वही विचार करता है, फिर हमारा चित्त पूरा का पूरा उसी से भर जाता है। फिर कोई भी चीज...कोई भी चीज अतिमोहक हो जाती है, जो कि नहीं थी। 
लड़ना नहीं, समझना
तो साधक के लिए लड़ने भर से सावधान रहना है, और समझने की कोशिश करनी है। और समझने की कोशिश का मतलब ही यह है कि तुम्हें जो मिला है प्रकृति से उसको समझना। तो तुम्हें जो नहीं मिला है, उसी मिले हुए के मार्ग से तुम्हें वह भी मिल जाएगा जो नहीं मिला है; वह पहला छोर है। अगर तुम उसी से भाग गए तो तुम दूसरे छोर पर कभी न पहुंच पाओगे। अगर सेक्स से ही घबराकर भाग गए तो ब्रह्मचर्य तक कैसे पहुंचोगे? सेक्स तो द्वार था जो प्रकृति से मिला था। ब्रह्मचर्य उसी द्वार से खोज थी जो अंत में तुम खोद पाओगे। 
तो ऐसा अगर देखोगे तो मांगने जाने की कोई जरूरत नहीं, समझने जाने की तो बहुत जरूरत है; और पूरी जिंदगी समझने के लिए है--किसी से भी समझो, सब तरफ से समझो और अंततः अपने भीतर समझो।

व्यक्तियों को तौलने से बचना 
प्रश्न: अभी आप सात शरीरों की चर्चा करते हैं, तो उसमें सातवें या छठवें या पांचवें शरीर--निर्वाण बॉडी, कास्मिक बॉडी और स्प्रिचुअल बॉडी को क्रमशः उपलब्ध हुए कुछ प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात एंशिएंट और माडर्न व्यक्तियों के नाम लेने की कृपा करें।

इस झंझट में न पड़ो तो अच्छा है। इसका कोई सार नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। और अगर मैं कहूं भी, तो तुम्हारे पास उसकी जांच के लिए कोई प्रमाण नहीं होगा। और जहां तक बने व्यक्तियों को तौलने से बचना अच्छा है। उनसे कोई प्रयोजन भी नहीं है। उनसे कोई प्रयोजन नहीं है। उसका कोई अर्थ ही नहीं है। उनको जाने दो। 
 - ओशो....
विचार मन्थनः
- ओशो....
आज्ञा चक्र की संभावना :-
छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, कास्मिक बॉडी है; और छठवां केंद्र आज्ञा है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा, अस्तित्व का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा--एक्झिस्टेंस का, बीइंग का। अस्मिता खो जाएगी छठवें शरीर पर। 'हूं', यह भी चला जाएगा--है! मैं हूं--तो 'मैं' चला जाएगा पांचवें शरीर पर, 'हूं' चला जाएगा पांचवें को पार करते ही। है! इज़नेस का बोध होगा, तथाता का बोध होगा--ऐसा है। उसमें मैं कहीं भी नहीं आऊंगा, उसमें अस्मिता कहीं नहीं आएगी। जो है, दैट व्हिच इज़, बस वही हो जाएगा।
तो यहां सत् का बोध होगा, बीइंग का होगा; चित् का बोध होगा, कांशसनेस का बोध होगा। लेकिन यहां चित् मुझसे मुक्त हो गया। ऐसा नहीं कि मेरी चेतना। चेतना! मेरा अस्तित्व--ऐसा नहीं। अस्तित्व!
ब्रह्म का भी अतिक्रमण करने पर निर्वाण काया में प्रवेश
और कुछ लोग छठवें पर रुक जाएंगे। क्योंकि कास्मिक बॉडी आ गई, ब्रह्म हो गया मैं, अहं ब्रह्मास्मि की हालत आ गई। अब मैं नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और कहां खोज? अब कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं बचा; अब तो सब पा लिया; क्योंकि ब्रह्म का मतलब है--दि टोटल; सब।
इस जगह से खड़े होकर जिन्होंने कहा है, वे कहेंगे कि ब्रह्म अंतिम सत्य है, वह एब्सोल्यूट है, उसके आगे फिर कुछ भी नहीं। और इसलिए इस पर तो अनंत जन्म रुक सकता है कोई आदमी। आमतौर से रुक जाता है; क्योंकि इसके आगे तो सूझ में ही नहीं आता कि इसके आगे भी कुछ हो सकता है।
तो ब्रह्मज्ञानी इस पर अटक जाएगा, इसके आगे वह नहीं जाएगा। और यह इतना कठिन है इसको पार करना--इस जगह को पार करना--क्योंकि अब बचती ही नहीं कोई जगह जहां इसको पार करो। सब तो घेर लिया, जगह भी चाहिए न! अगर मैं इस कमरे के बाहर जाऊं, तो बाहर जगह भी तो चाहिए! अब यह कमरा इतना विराट हो गया--अंतहीन, अनंत हो गया; असीम, अनादि हो गया; अब जाने को भी कोई जगह नहीं, नो व्हेयर टु गो। तो अब खोजने भी कहां जाओगे? अब खोजने को भी कुछ नहीं बचा, सब आ गया। तो यहां अनंत जन्म तक रुकना हो सकता है।
परम खोज में आखिरी बाधा ब्रह्म:-
तो ब्रह्म आखिरी बाधा है--दि लास्ट बैरियर। साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है। बीइंग रह गया है अब, लेकिन अभी भी नॉन-बीइंग भी है शेष; 'अस्ति' तो जान ली, 'है' तो जान लिया, लेकिन 'नहीं है', अभी वह जानने को शेष रह गया। इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्रार। और उसके संबंध में कोई बात नहीं हो सकती। ब्रह्म तक बात जा सकती है--खींचत्तानकर; गलत हो जाएगी बहुत।
छठवें शरीर में तीसरी आंख का खुलना :-
पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है; सारी बात साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती हैं, शब्द अर्थहीन होने लगता है, लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं। लेकिन अब अंगुली भी टूट जाती है, अब इशारे गिर जाते हैं; क्योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है।
तो एब्सोल्यूट बीइंग को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है।
इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में हैं, आज्ञा चक्र पर ध्यान करेंगे। वह उसका चक्र है। इसलिए भृकुटी-मध्य में आज्ञा चक्र पर वे ध्यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है उस शरीर का। और वहां जो उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्हें जो दिखाई पड़ना शुरू होगा विस्तार अनंत का, उसको वे तृतीय नेत्र और थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे। वहां से वह तीसरी आंख उनके पास आई, जहां से वे अनंत को, कास्मिक को देखना शुरू कर देते हैं।
सहस्रार चक्र की संभावना :-
लेकिन अभी एक और शेष रह गया--न होना, नॉन-बीइंग, नास्ति। अस्तित्व जो है वह आधी बात है, अनस्तित्व भी है; प्रकाश जो है वह आधी बात है, अंधकार भी है; जीवन जो है वह आधी बात है, मृत्यु भी है। इसलिए आखिरी अनस्तित्व को, शून्य को भी जानने की...क्योंकि परम सत्य तभी पता चलेगा जब दोनों जान लिए--अस्ति भी और नास्ति भी; आस्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में और नास्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में; होना भी जाना उसकी संपूर्णता में और न होना भी जाना उसकी संपूर्णता में; तभी हम पूरे को जान पाए, अन्यथा यह भी अधूरा है। ब्रह्मज्ञान में एक अधूरापन है कि वह 'न होने' को नहीं जान पाएगा। इसलिए ब्रह्मज्ञानी 'न होने' को इनकार ही कर देता है; वह कहता है: वह माया है, वह है ही नहीं। वह कहता है: होना सत्य है, न होना झूठ है, मिथ्या है; वह है ही नहीं; उसको जानने का सवाल कहां है!
निर्वाण काया का मतलब है शून्य काया, जहां हम 'होने' से 'न होने' में छलांग लगा जाते हैं। क्योंकि वह और जानने को शेष रह गया; उसे भी जान लेना जरूरी है कि न होना क्या है? मिट जाना क्या है? इसलिए सातवां शरीर जो है, वह एक अर्थ में महामृत्यु है। और निर्वाण का, जैसा मैंने कल अर्थ कहा, वह दीये का बुझ जाना है। वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा 'मैं' था, मिट गया; वह जो हमारी अस्मिता थी, मिट गई। लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गए हैं, अब हम ब्रह्म हो गए हैं, अब इसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और इतनी जिसकी छलांग की तैयारी है, वह जो है, उसे तो जान ही लेता; जो नहीं है, उसे भी जान लेता है।
और ये सात शरीर और सात चक्र हैं हमारे। और इन सात चक्रों के भीतर ही हमारी सारी बाधाएं और साधन हैं। कहीं किसी बाहरी रास्ते पर कोई बाधा नहीं है। इसलिए किसी से पूछने जाने का उतना सवाल नहीं है।
खोजने निकलो, मांगने नहीं
और अगर किसी से पूछने भी गए हो, और किसी के पास समझने भी गए हो, तो मांगने मत जाना। मांगना और बात है; समझना और बात है; पूछना और बात है। खोज अपनी जारी रखना। और जो समझकर आए हो, उसको भी अपनी खोज ही बनाना, उसको अपना विश्वास मत बनाना। नहीं तो वह मांगना हो जाएगा।
मुझसे एक बात तुमने की, और मैंने तुम्हें कुछ कहा। अगर तुम मांगने आए थे, तो तुमको जो मैंने कहा, तुम इसे अपनी थैली में बंद करके सम्हालकर रख लोगे, इसकी संपत्ति बना लोगे। तब तुम साधक नहीं, भिखारी ही रह जाते हो। नहीं, मैंने तुमसे कुछ कहा, यह तुम्हारी खोज बना, इसने तुम्हारी खोज को गतिमान किया, इसने तुम्हारी जिज्ञासा को दौड़ाया और जगाया, इससे तुम्हें और मुश्किल और बेचैनी हुई, इसने तुम्हें और नये सवाल खड़े किए, और नई दिशाएं खोलीं, और तुम नई खोज पर निकले, तब तुमने मुझसे मांगा नहीं, तब तुमने मुझसे समझा। और मुझसे तुमने जो समझा, वह अगर तुम्हें स्वयं को समझने में सहयोगी हो गया, तब मांगना नहीं है।
तो समझने निकलो, खोजने निकलो। तुम अकेले नहीं खोज रहे, और बहुत लोग खोज रहे हैं। बहुत लोगों ने खोजा है, बहुत लोगों ने पाया है। उन सबको क्या हुआ है, क्या नहीं हुआ है, उस सबको समझो। लेकिन उस सबको समझकर तुम अपने को समझना बंद मत कर देना; उसको समझकर तुम यह मत समझ लेना कि यह मेरा ज्ञान बन गया। उसको तुम विश्वास मत बनाना, उस पर तुम भरोसा मत करना, उस सबसे तुम प्रश्न बनाना, उस सबको तुम समस्या बनाना, उसको समाधान मत बनाना, तो फिर तुम्हारी यात्रा जारी रहेगी। और तब फिर मांगना नहीं है, तब तुम्हारी खोज है। और तुम्हारी खोज ही तुम्हें अंत तक ले जा सकती है। और जैसे-जैसे तुम भीतर खोजोगे, तो जो मैंने तुमसे बातें कही हैं, प्रत्येक केंद्र पर दो तत्व तुमको दिखाई पड़ेंगे--एक जो तुम्हें मिला है, और एक जो तुम्हें खोजना है। क्रोध तुम्हें मिला है, क्षमा तुम्हें खोजनी है; सेक्स तुम्हें मिला है, ब्रह्मचर्य तुम्हें खोजना है; स्वप्न तुम्हें मिला है, विज़न तुम्हें खोजना है, दर्शन तुम्हें खोजना है।
चार शरीरों तक तुम्हारी द्वैत की खोज चलेगी, पांचवें शरीर से तुम्हारी अद्वैत की खोज शुरू होगी।
पांचवें शरीर में तुम्हें जो मिल जाए, उससे भिन्न को खोजना जारी रखना। आनंद मिल जाए तो तुम खोजना कि और आनंद के अतिरिक्त क्या है? छठवें शरीर पर तुम्हें ब्रह्म मिल जाए तो तुम खोज जारी रखना कि ब्रह्म के अतिरिक्त क्या है? तब एक दिन तुम उस सातवें शरीर पर पहुंचोगे, जहां होना और न होना, प्रकाश और अंधकार, जीवन और मृत्यु, दोनों एक साथ ही घटित हो जाते हैं। और तब परम, दि अल्टिमेट...और उसके बाबत फिर कोई उपाय नहीं कहने का।
पांचवें शरीर के बाद रहस्य ही रहस्य है
इसलिए हमारे सब शास्त्र या तो पांचवें पर पूरे हो जाते हैं। जो बहुत वैज्ञानिक बुद्धि के लोग हैं, वे पांचवें के आगे बात नहीं करते; क्योंकि उसके बाद कास्मिक शुरू होता है, जिसका कोई अंत नहीं है विस्तार का।
पर जो मिस्टिक किस्म के लोग हैं--जो रहस्यवादी हैं, सूफी हैं, इस तरह के लोग हैं--वे उसकी भी बात करते हैं। हालांकि उसकी बात करने में उन्हें बड़ी कठिनाई होती है, और उन्हें अपने को ही हर बार कंट्राडिक्ट करना पड़ता है, खुद को ही विरोध करना पड़ता है। और अगर एक सूफी फकीर की या एक मिस्टिक की पूरी बातें सुनो, तो तुम कहोगे कि यह आदमी पागल है! क्योंकि कभी यह यह कहता है, कभी यह यह कहता है! यह कहता है: ईश्वर है भी; और यह कहता है: ईश्वर नहीं भी है। और यह यह कहता है कि मैंने उसे देखा। और दूसरे ही वाक्य में कहता है कि उसे तुम देख कैसे सकते हो! क्योंकि वह कोई आंखों का विषय है? यह ऐसे सवाल उठाता है कि तुम्हें हैरानी होगी कि किसी दूसरे से सवाल उठा रहा है कि अपने से उठा रहा है! छठवें शरीर से मिस्टिसिज्म...
इसलिए जिस धर्म में मिस्टिसिज्म नहीं है, समझना वह पांचवें पर रुक गया। लेकिन मिस्टिसिज्म भी आखिरी बात नहीं है, रहस्य आखिरी बात नहीं है। आखिरी बात शून्य है; निहिलिज्म है आखिरी बात।
तो जो धर्म रहस्य पर रुक गया, समझना वह छठवें पर रुक गया। आखिरी बात तो आखिरी है। और उस शून्य के अतिरिक्त आखिरी कोई बात हो नहीं सकती।
राह के पत्थर को भी सीढ़ी बना लेना
तो पांचवें शरीर से अद्वैत की खोज शुरू होती है, चौथे शरीर तक द्वैत की खोज खत्म हो जाती है। और सब बाधाएं तुम्हारे भीतर हैं। और बाधाएं बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हें उपलब्ध हैं। और प्रत्येक बाधा का रूपांतरण होकर वही तुम्हारा साधन बन जाती है। रास्ते पर एक पत्थर पड़ा है; वह, जब तक तुमने समझा नहीं है उसे, तब तक तुम्हें रोक रहा है। जिस दिन तुमने समझा उसी दिन तुम्हारी सीढ़ी बन जाता है। पत्थर वहीं पड़ा रहता है। जब तक तुम नहीं समझे थे, तुम चिल्ला रहे थे कि यह पत्थर मुझे रोक रहा है, मैं आगे कैसे जाऊं! जब तुम इस पत्थर को समझ लिए, तुम इस पर चढ़ गए और आगे चले गए। और अब तुम उस पत्थर को धन्यवाद दे रहे हो कि तेरी बड़ी कृपा है, क्योंकि जिस तल पर मैं चल रहा था, तुझ पर चढ़कर मेरा तल बदल गया, अब मैं दूसरे तल पर चल रहा हूं। तू साधन था, लेकिन मैं समझ रहा था बाधा है; मैं सोचता था रास्ता रुक गया, यह पत्थर बीच में आ गया, अब क्या होगा!
क्रोध बीच में आ गया। अगर क्रोध पर चढ़ गए तो क्षमा को उपलब्ध हो जाएंगे, जो कि बहुत दूसरा तल है। सेक्स बीच में आ गया। अगर सेक्स पर चढ़ गए तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो जाएगा, जो कि बिलकुल ही दूसरा तल है। और तब सेक्स को धन्यवाद दे सकोगे, और तब क्रोध को भी धन्यवाद दे सकोगे।
जिस वृत्ति से लड़ेंगे, उससे ही बंध जाएंगे
प्रत्येक राह का पत्थर बाधा बन सकता है और साधन बन सकता है। वह तुम पर निर्भर है कि उस पत्थर के साथ क्या करते हो। हां, भूलकर भी पत्थर से लड़ना मत, नहीं तो सिर फूट सकता है और वह साधन नहीं बनेगा। और अगर कोई पत्थर से लड़ने लगा तो वह पत्थर रोक लेगा; क्योंकि जहां हम लड़ते हैं वहीं हम रुक जाते हैं। क्योंकि जिससे लड़ना है उसके पास रुकना पड़ता है; जिससे हम लड़ते हैं उससे दूर नहीं जा सकते हम कभी भी।
इसलिए अगर कोई सेक्स से लड़ने लगा, तो वह सेक्स के आसपास ही घूमता रहेगा। उतना ही आसपास घूमेगा जितना सेक्स में डूबनेवाला घूमता है। बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा घूमेगा। क्योंकि डूबनेवाला ऊब भी जाता है, बाहर भी होता है; यह ऊब भी नहीं पाता, यह आसपास ही घूमता रहता है।
अगर तुम क्रोध से लड़े तो तुम क्रोध ही हो जाओगे; तुम्हारा सारा व्यक्तित्व क्रोध से भर जाएगा; और तुम्हारे रग-रग, रेशे-रेशे से क्रोध की ध्वनियां निकलने लगेंगी; और तुम्हारे चारों तरफ क्रोध की तरंगें प्रवाहित होने लगेंगी। इसलिए ऋषि-मुनियों की जो हम कहानियां पढ़ते हैं--महाक्रोधी, उसका कारण है; उसका कारण है वे क्रोध से लड़नेवाले लोग हैं। कोई दुर्वासा है, कोई कोई है। उनको सिवाय अभिशाप के कुछ सूझता ही नहीं है। उनका सारा व्यक्तित्व आग हो गया है। वे पत्थर से लड़ गए हैं, वे मुश्किल में पड़ गए हैं; वे जिससे लड़े हैं, वही हो गए हैं।
तुम ऐसे ऋषि-मुनियों की कहानियां पढ़ोगे जिन्हें कि स्वर्ग से कोई अप्सरा आकर बड़े तत्काल भ्रष्ट कर देती है। आश्चर्य की बात है! यह तभी संभव है जब वे सेक्स से लड़े हों, नहीं तो संभव नहीं है। वे इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं कि लड़-लड़कर खुद ही कमजोर हो गए हैं। और सेक्स अपनी जगह खड़ा है; अब वह प्रतीक्षा कर रहा है; वह किसी भी द्वार से फूट पड़ेगा। और कम संभावना है कि अप्सरा आई हो, संभावना तो यही है कि कोई साधारण स्त्री निकली हो, लेकिन इसको अप्सरा दिखाई पड़ी हो। क्योंकि अप्सराओं ने कोई ठेका ले रखा है कि ऋषि-मुनियों को सताने के लिए आती रहें। लेकिन अगर सेक्स को बहुत सप्रेस किया गया हो, तो साधारण स्त्री भी अप्सरा हो जाती है; क्योंकि हमारा चित्त प्रोजेक्ट करने लगता है। रात वही सपने देखता है, दिन वही विचार करता है, फिर हमारा चित्त पूरा का पूरा उसी से भर जाता है। फिर कोई भी चीज...कोई भी चीज अतिमोहक हो जाती है, जो कि नहीं थी।
लड़ना नहीं, समझना
तो साधक के लिए लड़ने भर से सावधान रहना है, और समझने की कोशिश करनी है। और समझने की कोशिश का मतलब ही यह है कि तुम्हें जो मिला है प्रकृति से उसको समझना। तो तुम्हें जो नहीं मिला है, उसी मिले हुए के मार्ग से तुम्हें वह भी मिल जाएगा जो नहीं मिला है; वह पहला छोर है। अगर तुम उसी से भाग गए तो तुम दूसरे छोर पर कभी न पहुंच पाओगे। अगर सेक्स से ही घबराकर भाग गए तो ब्रह्मचर्य तक कैसे पहुंचोगे? सेक्स तो द्वार था जो प्रकृति से मिला था। ब्रह्मचर्य उसी द्वार से खोज थी जो अंत में तुम खोद पाओगे।
तो ऐसा अगर देखोगे तो मांगने जाने की कोई जरूरत नहीं, समझने जाने की तो बहुत जरूरत है; और पूरी जिंदगी समझने के लिए है--किसी से भी समझो, सब तरफ से समझो और अंततः अपने भीतर समझो।
व्यक्तियों को तौलने से बचना
प्रश्न: अभी आप सात शरीरों की चर्चा करते हैं, तो उसमें सातवें या छठवें या पांचवें शरीर--निर्वाण बॉडी, कास्मिक बॉडी और स्प्रिचुअल बॉडी को क्रमशः उपलब्ध हुए कुछ प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात एंशिएंट और माडर्न व्यक्तियों के नाम लेने की कृपा करें।
इस झंझट में न पड़ो तो अच्छा है। इसका कोई सार नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। और अगर मैं कहूं भी, तो तुम्हारे पास उसकी जांच के लिए कोई प्रमाण नहीं होगा। और जहां तक बने व्यक्तियों को तौलने से बचना अच्छा है। उनसे कोई प्रयोजन भी नहीं है। उनसे कोई प्रयोजन नहीं है। उसका कोई अर्थ ही नहीं है। उनको जाने दो।

रविवार, 13 जुलाई 2014

गीतः सुग्गा बोलो -संजीव

गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
सन्जीव
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्‍ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*

geet: kaha suna... sanjiv

गीत:
हम मिले… 
संजीव
*
हम मिले बिछुड़ने को   
कहा-सुना माफ़ करो...
*
पल भर ही साथ रहे
हाथों में हाथ रहे.
फूल शूल धूल लिये-
पग-तल में पाथ रहे
गिरे, उठे, सँभल बढ़े 
उन्नत माथ रहे 
गैरों से चाहो क्योँ? 
खुद ही इन्साफ करो... 
*
दूर देश से आया
दूर देश में आया
अपनों सा अपनापन 
औरों में है पाया
क्षर ने अक्षर पूजा 
अक्षर ने क्षर गाया 
का खा गा, ए बी सी 
सीन अलिफ काफ़ करो… 
*
नर्मदा मचलती है 
गोमती सिहरती है 
बाँहों में बाँह लिये 
चाह जब ठिठकती है  
डाह तब फिसलती है 
वाह तब सँभलती है 
लहर-लहर घहर-घहर 
कहे नदी साफ़ करो...

हुल्लड़ जी गए।

 अब हुल्लड़ कौन करेगा???

अशोक चक्रधर 
ओह! हुल्लड़ जी गए।
सहज हास्य के ऐसे रचनाकार जल्दी जन्म नहीं लेते।
मैंने उनके साथ कम से कम हज़ार कविसम्मेलनों में तो भाग लिया ही होगा। यादें रह रह कर घुमड़ रहीहैं। आंखें नम हैं। देशभर के अनेक शहरों-कस्बों और बैंकाक, नेपाल, हांगकांग की यात्राओं के अनंत संस्मरण हैं मेरे पास। कल से स्मृतियों का चलचित्र जारी है।
चित्र न होते तो भरोसा मुझे भी नहीं होता कि मैंने 'हज्जाम की हजामत' के रचनाकार की तसल्लीबक्श हजामत की थी एक बार। छायाकार मीनाक्षी पायल से मुझे कुछ चित्र मिले हैं। ये सिर्फ़ फोटो शूट नहीं है दोस्तो। दोस्ती की अनन्यता है। मैं उन्हें किसी कविसम्मेलन के लिए तैयार कर रहा था। उनके बहाने अपना एक छिपा हुआ कौशल दिखा रहा हूं। वैसे साहस उनका था कि एक अनाड़ी से ब्लेड फिरवा लिया। यादों के आफ्टरशेव कोलोन सा एक शेर है उनका--
मैयत पे मेरी आके
कुछ लोग ये कहेंगे
सचमुच मरा है हुल्लड़
या ये भी चुटकुला है!
काश! चुटकुला ही होता।
जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि उनकी मशहूर कृतियां हैं--
हज्जाम की हजामत
इतनी ऊंची मत छोडो
क्या करेगी चांदनी
यह अंदर की बात है
त्रिवेणी
हुल्लड़ का हुल्लड़
तथाकथित भगवानों के नाम
अच्छा है पर कभी कभी
हुल्ल्ड के कहकहे
हुल्लड की हरकतें
हुल्लड की श्रेष्ठ हास्य व्यंग रचनायें
उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले, जैसे--
कलाश्री पुरस्कार
ठिठोली पुरस्कार
महाकवि निराला सम्मान
अट्टहास साहित्यकार सम्मान
काका हाथरसी सम्मान हास्य रत्न
पुत्र नवनीत ने उनकी बहुत सेवा की। पिता काफी समय से बीमार चल रहे थे लेकिन पिछले माह उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से उन्होंने अंतिम विदाई ली।
वह 72 वर्ष के थे। भाभी कृष्णा चड्ढा. प्रिय नवनीत, सोनिया और मनीषा और पूरे परिवार के दुख में मेरी पूरी भागीदारी है। मन मुंबई में है। जल्दी आता हूं नवनीत। सबको धीर बंधाना।
उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

शनिवार, 12 जुलाई 2014

ARTICLE 370

some interesting facts on ARTICLE370.
Raman Malik 
Dr BR Ambedkar was against Article 370 in Kashmir as he wanted the state to equally progress. Thus, he exchanged words with Abdullah. Thereafter, Abdullah approached Nehru who directed him to Ayyangar, the drafter of Article 370.

Ayyangar then went to Sardar Patel asking him to advise something over the matter concerning Nehru's prestige. Thus, Patel got it passed when Nehru was on foreign tour. On the day this article came up for discussion, Dr. Ambedkar did not reply to questions on it though he did participate on other articles. All arguments were done by Krishna Swami Ayyangar.

However, Article 1 of the Constitution of Jammu and Kashmir states that the State of Jammu and Kashmir is and shall be an integral part of the Union of India.

Article 370 is drafted in Amendment of the Constitution section, in Part XXI, under Temporary and Transitional Provisions.

Due to constant ceasefires, the situation was critical and abnormal in Kashmir as a part of state's territory was still in charge of enemies. The law did not discriminate between the male and female permanent residents of the state. But the females were considered the PRs only until they got married. Thereafter, they had to seek for fresh PR.
In 2004, the state high court, in the case of State of J&K Vs Sheela Sawhney, declared that there was no provision in the existing law dealing with the status of a female PR who married a non-resident. The provision of women losing their PR status after marrying outside the state, therefore, did not have any legal basis. It brought relief to women marrying outside the state.
Thereafter, People's Democratic Party led by Mehbooba Mufti passed a law to overturn the court judgment by introducing a Bill styled “Permanent Residents (Disqualification) Bill, 2004 which was further backed up by Omar Abdullah's political party National Conference.
Sheikh Mohammed Abdullah.
Charismatic Kashmiri leader who never let go of his dream of ruling an independent Kashmir even while masquerading as a secularist — architect of Article 370 along with Nehru. He must share with Nehru the grave consequences. Lion of Kashmir brought Nehru under his spell from 1938 onwards to the extent that in May 1947 when he was arrested by the Maharaja for sedition, Nehru represented Sheikh as his lawyer and was even arrested in Jun 1947 by the Maharaja while trying to enter J&K. Finally Nehru had to eat the humble pie by arresting Sheikh Abdullah for sedition on 9 Aug 1953.

Nehru Lie & sardars statement : “Jawaharlal Royega”..
Having finalized the text of Article 370 with Sheikh Abdullah, Nehru brought in Gopalaswamy Ayyangar, IAS, as a minister without portfolio to help him deal with Kashmir portfolio and plead the case of Article 370 in the Constituent Assembly. Gopalaswamy Ayyangar had been prime minister of Kashmir for six years with Maharaja Hari Singh. When Sardar Patel expressed his misgivings, this is what Nehru had to say on Dec 27, 1947.
“Gopalaswamy Ayyangar has been especially asked to help in Kashmir matters. Both for this reason and because of his intimate knowledge and experience of Kashmir, he had to be given full latitude. I really do not know where the States Ministry (Sardar Patel’s ministry) comes into the picture except that it should be kept informed for the steps taken. All this was done at my instance and I do not propose to abdicate my functions in regard to matters for which I consider myself responsible. May I say that the manner of approach to Gopalaswamy was hardly in keeping with the courtesy due to a colleague.”
It speaks volumes of Patel’s loyalty to a colleague that despite his own and others misgivings, he managed to convince the members of Constituent Assembly and Congress Party Executive. But to V Shankar he said “Jawaharlal Royega”.
The Sardar thereupon resigned and the matter fell in Gandhiji’s lap to bring the two colleagues together. During this period, V Shankar, IAS was the personal secretary to Patel and had maintained a record of all events. It is clear from these records that Nehru finalized the draft of Article 370 alongwith Sheikh Abdullah without even informing Patel. Thereafter it fell to Gopalaswamy Ayyangar to get the draft passed in the Constituent Assembly discussions. The proposal was torn to pieces by the Constituent Assembly and also Congress Party Executive.
Nehru, who was abroad at the time, swallowed his pride and rang up Patel and requested him to get the Article 370 approved It speaks volumes of Patel’s loyalty to a colleague that despite his own and others misgivings, he managed to convince the members of Constituent Assembly and Congress Party Executive. But to V Shankar he said “Jawaharlal Royega”. V Shankar, in his record has described the meeting of the Congress Executive Committee “The meeting was one of the stormiest I have ever witnessed barring the party meeting which discussed the proposition relating to Rajaji becoming the first President of Indian Republic. The opinion in opposition to Gopalaswamy’s formula was forcefully and even militantly expressed and the issue even brought in the sovereignty of the Constituent Assembly to draw up the Constitution without being tied down to the apron-strings of the Kashmir State Constituent Assembly. In such a situation even Maulana Azad was shouted down.
The Party was in uproar. The Sardar had to plead that because of the international complications, a provisional approach alone could be made leaving the question of final relationship to be worked out according to the exigencies of the situation and mutual feelings and confidence that would have been by then created. Once the Sardar had taken charge, all opposition to the draft was silenced” And how Nehru responded to this great act of loyalty on part of Sardar? On 24 July 1952, after Sardar was no more, Nehru made a detailed statement on Kashmir in the Parliament on slow integration of Kashmir into India Union and mentioned that “Sardar Patel was all the time dealing with these matters.” Even Gopalaswami Ayyangar was dismayed at this blatant lie and mentioned to V Shankar “It is an ill return to the Sardar for the magnanimity he had shown in accepting Panditji’s point of view against his better judgment.”

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

chhand salila: durmila chhand -sanjiv

Rose
छंद सलिला:
दुर्मिला छंद   
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-१४, पदांत  गुरु गुरु, चौकल में लघु गुरु लघु (पयोधर या जगण) वर्जित।

लक्षण छंद
दिशा योग विद्या / पर यति हो, पद / आखिर हरदम दो गुरु हों
छंद दुर्मिला रच / कवि खुश हो, पर / जगण चौकलों में हों 
(संकेत: दिशा = १०, योग = ८, विद्या = १४)  
उदाहरण
. बहुत रहे हम, अब / न रहेंगे दू/र मिलाओ हाथ मिलो भी 
    बगिया में हो धू/ल - शूल कुछ फू/ल सरीखे साथ खिलो भी 
    कितनी भी आफत / आये पर भू/ल नहीं डट रहो हिलो भी 
    जिसको जो कहना / है कह ले, मुँह / मत खोलो अधर सिलो भी     

     
२. समय कह रहा है / चेतो अनुशा/सित होकर देश बचाओ         
    सुविधा-छूट-लूट / का पथ तज कद/म कड़े कुछ आज उठाओ  
    घपलों-घोटालों / ने किया कबा/ड़ा जन-विश्वास डिगाया   
    कमजोरी जीतो / न पड़ोसी आँ/ख दिखाये- धाक जमाओ    

३. आसमान पर भा/व आम जनता/  का जीवन कठिन हो रहा 
    त्राहिमाम सब ओ/र सँभल शासन, / जनता का धैर्य खो रहा      
    पूंजीपतियों! धन / लिप्सा तज भा/व् घटा जन को राहत दो       
    पेट भर सके मे/हनतकश भी, र/हे न भूखा, स्वप्न बो रहा  
  
                        ----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया,  तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दुर्मिला, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, समान, सरस, सवाई, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
chhand salila: durmila chhand    -sanjiv
chhand, durmila chhand, acharya sanjiv verma 'salil',

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

chhand salila: sawai/saman chhand -sanjiv

छंद सलिला:
सवाई /समान Roseछंद 

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत  गुरु लघु लघु ।

लक्षण छंद
हर चरण समान रख सवाई /  झूम झूमकर रहा मोह मन
गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन  

उदाहरण
. राय प्रवीण सुनारी विदुषी / चंपकवर्णी तन-मन भावन
    वाक् कूक सी, केश मेघवत / नैना मानसरोवर पावन
    सुता शारदा की अनुपम वह / नृत्य-गान, शत छंद विशारद
    सदाचार की प्रतिमा नर्तन / करे लगे हर्षाया सावन   

     
२. केशवदास काव्य गुरु पूजित,/ नीति धर्म व्यवहार कलानिधि        
    रामलला-नटराज पुजारी / लोकपूज्य नृप-मान्य सभी विधि 
    भाषा-पिंगल शास्त्र निपुण वे / इंद्रजीत नृप के उद्धारक  
   दिल्लीपति के कपटजाल के / भंजक- त्वरित बुद्धि के साधक   

३. दिल्लीपति आदेश: 'प्रवीणा भेजो' नृप करते मन मंथन
    प्रेयसि भेजें तो दिल टूटे / अगर न भेजें_ रण, सुख भंजन     
    देश बचाने गये प्रवीणा /-केशव संग करो प्रभु रक्षण     
    'बारी कुत्ता काग मात्र ही / करें और का जूठा भक्षण 
    कहा प्रवीणा ने लज्जा से / शीश झुका खिसयाया था नृप 
    छिपा रहे मुख हँस दरबारी / दे उपहार पठाया वापिस  
                        ----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया,  तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, समान, सरस, सवाई, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)


chhand salila: tribhngi chhand -sanjiv

छंद सलिला:
त्रिभंगी Roseछंद 

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत  गुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध।

लक्षण छंद
रच छंद त्रिभंगी / रस अनुषंगी / जन-मन संगी / कलम सदा
दस आठ आठ छह / यति गति मति सह / गुरु पदांत कह / सुकवि सदा

उदाहरण
. भारत माँ परायी / जग से न्यारी / सब संसारी नमन करें
    सुंदर फुलवारी / महके क्यारी / सत आगारी / चमन करें
    मत हों व्यापारी / नगद-उधारी / स्वार्थविहारी / तनिक डरें
    हों सद आचारी /  नीति पुजारी / भू सिंगारी / धर्म धरें  

     
२. मिल कदम बढ़ायें / नग़मे गायें / मंज़िल पायें / बिना थके     
    'मिल सकें हम गले / नील नभ तले / ऊग रवि ढ़ले / बिना रुके 
    नित नमन सत्य को / नाद नृत्य को / सुकृत कृत्य को / बिना चुके 
    शत दीप जलाएं / तिमिर हटायें / भोर उगायें / बिना झुके 

३. वैराग-राग जी / तुहिन-आग जी / भजन-फाग जी / अविचल हो 
    कर दे मन्वन्तर / दुःख छूमंतर / शुचि अभ्यंतर अविकल हो     
    बन दीप जलेंगे / स्वप्न पलेंगे / कर न मलेंगे / उन्मन हो    
    मिल स्वेद बहाने / लगन लगाने / अमिय बनाने / मंथन हो 
                        ----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया,  तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

lekh: sai, swaroopanand aur main -sanjiv

साईं, स्वरूपानंद और मैं 

संजीव 

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स्वामी स्वरूपानंद द्वारा उठायी गयी साईं संबंधी आपत्ति मुझे बिलकुल ठीक प्रतीत होती है। एक सामान्य व्यक्ति के नाते मेरी जानकारी और चिंतन के आधार पर मेरा मत निम्न है:

१. सनातन: वह जिसका आदि अंत नहीं है अर्थात जो देश, काल, परिस्थिति का नियंत्रण-मार्गदर्शन करने के साथ-साथ खुद को भी चेतन होने के नाते परिवर्तित करता रहता है, जड़ नहीं होता इसी लोए सनातन धर्म में समय-समय पर देवी-देवता , पूजा-पद्धतियाँ, गुरु, स्वामी ही नहीं दार्शनिक विचार धाराएं और संप्रदाय भी पनपते और मान्य होते रहे हैं। 

२. देवता: वेदों में ३३ प्रकार के देवता (१२ आदित्य, १८ रूद्र, ८ वसु, १ इंद्र, और प्रजापति) ही नहीं श्री देवी, उषा, गायत्री आदि अन्य अनेक और भी वर्णित हैं। आत्मा सो परमात्मा, अयमात्मा ब्रम्ह, कंकर सो शंकर, कंकर-कंकर में शंकर, शिवोहं, अहम ब्रम्हास्मि जैसी उक्तियाँ तो हर कण को ईश्वर कहती हैं।  आचार्य रजनीश ने खुद को ओशो कहा और आपत्तिकर्ताओं को उत्तर दिया कि तुम भी ओशो हो अंतर यह है की मैं जानता हूँ कि मैं ओशो हूँ, तुम नहीं जानते। अतः साईं को कोई साईं भक्त भगवान माँने और पूजे इसमें किसी सनातन धर्मी को आपत्ति नहीं हो सकती। 

३. रामायण महाभारत ही नहीं अन्य वेद, पुराण, उपनिषद, आगम, निगम, ब्राम्हण ग्रन्थ आदि भी न केवल इतिहास हैं न आख्यान या गल्प।  भारत में सृजन दार्शनिक चिंतन पर आधारित रहा है।  ग्रंथों में पश्चिम की तरह व्यक्तिपरकता नहीं है, यहाँ मूल्यात्मक चिंतन प्रमुख है। दृष्टान्तों या कथाओं का प्रयोग किसी चिंतनधारा को आम लोगों तक प्रत्यक्ष या परोक्षतः पहुँचाने के लिए किया गया है।  अतः सभी ग्रंथों में इतिहास, आख्यान, दर्शन और अन्य शाखाओं का मिश्रण है। 
देवताओं को विविध आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है।  यथा: जन्मा - अजन्मा, आर्य - अनार्य, वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक, सतयुगीन - त्रेतायुगीन - द्वापरयुगीन कलियुगीन, पुरुष देवता - स्त्री देवता आदि

४. बाली, शंबूक, बर्बरीक, अश्वत्थामा, दुर्योधन जैसे अन्य भी अनेक प्रसंग हैं किन्तु इनका साईं से कुछ लेना-देना नहीं है। इनपर अलग-अलग चर्चा हो सकती है। राम और कृष्ण का देवत्व इन पर निर्भर नहीं है

५. बुद्ध और महावीर का सनातन धर्म से विरोध और नव पंथों की स्थापना लगभग समकालिक  होते हुए भी  बुद्ध को अवतार मानना और महावीर को अवतार न मानना अर्थात बौद्धों को सनातनधर्मी माना जाना और जैनियों को सनातन धर्मी न माना जाना भी साईं से जुड़ा विषय नहीं है और पृथक विवेचन चाहता है

६. अवतारवाद के अनुसार देवी - देवता कारण विशेष से प्रगट होते हैं फिर अदृश्य हो जाते हैं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे नष्ट हो जाते हैं। वे किसी वाहन से नहीं आते - जाते, वे शक्तियां रूपांतरित या स्थानांतरित होकर भी पुनः प्रगट होती हैं, एक साथ अनेक स्थानों पर भी प्रगट हो सकती हैं। यह केवल सनातन धर्म नहीं इस्लाम, ईसाई आय अन्य धर्मों में भी वर्णित है। हरि अनंत हरि कथा अनंता, उनके रूप भी अनंत हैं, प्रभु एक हैं वे भक्त की भावनानुसार प्रगट होते हैं, इसीलिए एक ईश्वर के भी अनेक रूप हैं गोपाल, मधुसूदन, श्याम, कान्हा, मुरारी आदि। इनके मन्त्र, पूजन विधि, साहित्य, कथाएं, माहात्म्य भी अलग हैं पर इनमें अंतर्विरोध नहीं है। सत्यनारायण, शालिग्राम, नृसिंह और अन्य विष्णु के ही अवतार कहे गये हैं

७. गौतमी, सरस्वती और ऐसे ही अनेक अन्य प्रकरण यही स्थापित करते हैं की सर्व शक्तिमान होने के बाद भी देवता आम जनों से ऊपर विशेषधिकार प्राप्त नहीं हैं, जब वे देह धारण करते हैं तो उनसे भी सामान्य मनुष्यों की तरह गलतियां होती हैं और उन्हें भी इसका दंड भोगना होता है। 'to err is human' का सिद्धांत ही यहाँ बिम्बित है। कर्मफलवाद गीता में भी वर्णित है

८. रामानंद, नानक, कबीर, चैतन्य, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, मीरा या अन्य सूफी फकीर सभी अपने इष्ट के उपासक हैं। 'राम ते अधिक राम के दासा'… सनातन धर्मी किसी देव के भाकर से द्वेष नहीं करता। सिख का अस्तित्व ही सनातन की रक्षा के लिए है, उसे धर्म, पंथ, सम्प्रदाय कुछ भी कहें वह "ॐ" ओंकार का ही पूजक है। एक अकाल पुरुख परमब्रम्ह ही है। सनातन धर्मी गुरुद्वारों को पूजास्थली ही मानता है। गुरुओं ने भी राम,कृष्णादि को देवता मन कर वंदना की है और उनपर साहित्य रचा है

९. वाल्मीकि को रामभक्त और आदिकवि के नाते हर सनातनधर्मी पूज्य मानता है। कोई उनका मंदिर बनाकर पूजे तो किसी को क्या आपत्ति? कबीर, तुलसी, मीरा की मूर्तियां भी पूजा ग्रहों और मंदिरों में मिल जायेंगी

१०. साईं  ईश्वरतत्व के प्रति नहीं साईं को अन्य धर्मावलम्बियों के मंदिरों, पूजाविधियों और मन्त्रों में घुसेड़े जाने का विरोध है। नमाज की आयात में, ग्रंथसाहब के सबद में, बाइबल के किसी अंश में साईं नाम रखकर देखें आपको उनकी प्रतिक्रिया मिल जाएगी। सनातन धर्मी ही सर्वाधिक सहिष्णु है इसलिए इतने दिनों तक झेलता रहा किन्तु कमशः साईं के नाम पर अन्य देवी-देवताओं के स्थानों पर बेजा कब्ज़ा तथा मूल स्थान पर अति व्यावसायिकता के कारन यह स्वर उठा है

अंत में एक सत्य और स्वरूपानंद जी के प्रति उनके कांग्रेस मोह और दिग्विजय सिंग जैसे भ्रष्ट नेताओं के प्रति स्नेह भाव के कारण सनातनधर्मियों की बहुत श्रद्धा नहीं रही। मैं जबलपुर में रहते हुए भी आज तक उन तक नहीं गया। किन्तु एक प्रसंग में असहमति से व्यक्ति हमेशा के लिए और पूरी तरह गलत नहीं होता। साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी ने सनातनधर्मियों के मन में छिपे आक्रोश, क्षोभ और असंतोष को  वाणी देकर उनका सम्मान पाया है। यह दायित्व साइभक्तों का है की वे अपने स्थानों से अन्य देवी-देवताओं के नाम हटाकर उन्हें साईं को इष्ट सादगी, सरलता और शुचितापरक कार्यपद्धति अपनाकर अन्यों का विश्वास जीतें। चढोत्री में आये धन का उपयोग स्थान को स्वर्ण से मरहने के स्थान पर उन दरिद्रों के कल्याण के लिए हो जिनकी सेवा करने का साईं ने उपदेश दिया। अनेक इत्रों के बयां पढ़े हैं की वे स्वरूपानंद जी के बीसियों वर्षों से भक्त हैं पर साईं सम्बन्धी वक्तव्य से उनकी श्रद्धा नष्ट हो गयी ये कैसा शिष्यत्व है जो दोहरी निष्ठां ही नहीं रखता गुरु की कोई बात समझ न आने पर गुरु से मार्गदर्शन नहीं लेता, सत्य नहीं समझता और उसकी बरसों की श्रद्धा पल में नष्ट हो जाती है? 

अस्तु साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी द्वारा उठाई गयी आपत्ति से सहमत हूँ

(यशवंत राणा तथा अवधेश कुमार की टीप के प्रसंग में)