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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

श्री बल्लभाचार्य संप्रदाय- = नवीन सी. चतुर्वेदी

श्री वल्लभाचार्य संप्रदाय :                 

स्रोत - स्व. श्री बाल मुकुन्द चतुर्वेदी जी द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक दस्तावेज़ "माथुर चतुर्वेदियों का इतिहास"

1336 वि0, में प्रादुर्भावित श्री बाल गोपाल सेवा के प्रवर्तक श्री विष्णु स्वामी संप्रदाय की परम्परा को लेकर श्री बल्लभाचार्य महाप्रभु का अविर्भाव 1535 वि0, में हुआ । ये 1549 वि0 में मथुरा पधारे । इन्होंने 1550 वि0 में अपने विश्राम घाट निवास में यमुनाष्टक की रचना करने के बाद 6 बार श्री उद्धवाचार्य जी के उपदेश से तथा श्री उजागरजी के पौरोहित्य निर्देशन में ब्रज यात्रायें कीं जिनके विषद वर्णन का ग्रंथ श्री उद्धवाचार्य देव जू द्वारा लिखित 650 पृष्ठों में वर्णित हमारे संग्रह में सुरक्षित है । श्री महाप्रभु ने मथुरा ब्रज महात्म और यात्रा पद्धति का 'ब्रज मथुरा प्रकाश' नाम का ग्रंथ भी रचा है जाते हमारे ही यहाँ हैं । उनकी 6 ब्रज यात्राओं में-1-1550 वि0 ग्वालियर से पधारे तब, 2-1555 वि0 में पुष्कर से पधारे तब, 3-1571 वि0 अडैल से पधारे तब, 4-1573 वि0 पुन:, 5-1585 वि0 द्वारिकापुरी से पधारे तब और 6-1586 वि0 गोपलापुर (जतीपुरा) निवास करते तब इस प्रकार 6 ब्रज यात्राओं को सम्पन्न कर ब्रज रस की सिद्धि करने का महा मनोर्थ वर्णित है । ब्रज के प्रमुख स्थलों में इनकी भागवत परायण की 24 बैठकैं सर्व विदित हैं । 1571 वि0 की बृजयात्रा सिकन्दर लोदी काल में जब बहुला बन में पहुंची तो वहाँ के कट्टर इस्लामी फौजदार ने बहुलावन कीं पाषाण गौर की पूजा रोकदी तब माथुर श्री उद्धवदेव जी के ऋग्वेदीय गो सूक्त के पाठ से गौ ने घास खायी और हाकिम चमत्कृत और लज्जित पराजित हुआ । 1565 वि0 में कवि सम्राट सूरदास जी इनकी शरण में आये, इनके समीप ही मणि कर्णिका की एक कोठरी में रहे । 1623 वि0 में जब श्री नाथ जी मथुरा में सतघरा में विराजे थे उस फाग अवसर पर बादशाह अकबर सूरदास जी के दर्शन को आया किंन्तु सूरदास जी ने दर्शन नहीं दिये । श्री आचार्यजी का आसुर व्यामोह 1587 वि0 में हुआ ।                                                      
                गो0 श्री बिठ्टलनाथजी- 1572 वि0 में जन्मे श्री बिठ्टलनाथजी का मथुरा बास 1622 से 1627 वि0 तब रहा । रानी दुर्गावती ने उनके और उनके 7 पुत्रों के लिये सतघरा महुल्ले में सात हवेलियां युक्त विशाल भवन बनवाया । 1623 वि0 में उनके पुत्र गो0 गिरधर जी श्री नाथ जी को जतीपुरा से मथुरा ले आये इस होली उत्सव में बादशाह अकबर आया । श्री गोसांई जी ने अपने समय में श्रीनाथ जी की सेवा का नियमित विस्तार कर कीर्तन साहित्य और कीर्तन की राग पद्धति का विकास करने को अष्ट छाप के कवियों की स्थापना की । 1600 वि0 में गो0 विठ्टलनाथजी ने ब्रजयात्रा की तब श्री उजागरवंश को पौरोहित्य का वृत्ति पत्र लिखा-
'स्वस्ति श्री मद्विट्ठल दीक्षितानां मथुरा क्षेत्रे तीर्थ पुरोहितो उजागर शर्मा माथुरोस्ति- वि0 संवत 1600 ।
इस लेख की फोटो प्रति 1989 वि0 में कांकरौली के गोस्वामी श्री ब्रजभूषण लाल ने अपनी ब्रज यात्रा के अवसर पर ली थी जो अब काँकरौली विद्या विभाग के ग्रंथागार में है । इस सम्बन्ध में प्राचीन मर्यादा के अनुसार श्रीराधाचन्द ने लिखा है- चतुर्णा संप्रदायाणां माचार्ये धर्म वित्तमै: , उद्धवोजागरौ पादौ पूजितानिश्च भक्तित: ।
1644 वि0 में गोस्वामीजी को गोकुल की भूमि का पट्टा मिला और तब से वे गोकुल में रहने लगे । श्री उद्धवाचार्य देवजी ने ही 1559 वि0 में पूरनमलखत्री के द्रव्य से श्रीनाथजी का मन्दिर हीरामन मिस्त्री से तैयार कराया और अनेक विध सेवाओं और उत्सवों के बाद औरंगजेब के प्रहार से रक्षा हेतु श्री नाथजी को 1726 वि0 में मेवाड़ ले जाया गया । 
                    इस वंश में गो0 श्री गोकुलनाथजी, श्री हरिरामजी, श्री गोपेश्वरजी , तिलकायत श्री गोवर्धननाथजी, श्री दाऊजी, श्री यदुनाथजी, श्री रमणप्रभु जी, श्रीमधुसूदनलालजी, श्रीद्वारकेशलालजी, श्री माधवरायजी, श्री गोपाललालजी, आदि अनेक आदरणीय महापुरूष हुए हैं । जिनके हस्तलेख चौबों के यहाँ हैं । चैतन्य महाप्रभु- इनका माध्व गौडीय संप्रदाय है । 1572 वि0 में श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरा पधारे । यमुना देखकर प्रेमोन्मत्त हुए जल में कूद पड़े और हरिकीर्तन नृत्य करने लगे । उस समय श्री उद्धवाचार्य देवजी के पौत्र विरक्त वृत्तिधारी श्री दामोदरजी मिहारी वहाँ थे, वे भी अपनी माधवेन्द्र पुरी जी से प्राप्त दीक्षा के अनुसार कीर्तन नृत्य करने लगे । श्री चैतन्य देव ने उन्हें आलिंगन किया और गुरु भाई तथा तीर्थ गुरु की तरह मान दिया चरणों में गिर गये ।

मथुरा आइया केल विश्राम स्नान । 
यमुना तट चव्वीस घाटे प्रभु केल स्नान ।।
सेई विप्र प्रभु केल दिखायतीर्थ स्थान । 
स्वायंभू विश्रान्त दीर्घविष्णु भूतेश्वर ।।
महाविद्या गोकर्ण देखला निस्तर । 
सेई ब्राह्मण प्रभु संग ते लाइल ।।
मधुबन तालबन कुमुदबन गेइला । 
देखला बारह बने ब्रज धाम ।। 

                    विश्रान्त से श्री दामोदर जी उन्हें घर ले गये, प्रसाद अर्पण आदि करके प्रभु का सस्नेह सत्कार किया । प्रभु ने उनके साथ मथुरा परिक्रमा के सभी तीर्थ दर्शन किये, मथुरा के केशव देव दीर्घविष्णु महाविद्या भूतेश्वर गोकर्ण आदि तीर्थ दर्शन किये फिर उन्हीं के साथ 12 बनोंयुक्त ब्रज की यात्रा की । श्री दामोदर देव ने उन्हैं तीर्थों कुंडों में स्नान आचमन देव दर्शन महात्म श्रवण कराया । अक्रूर घाट पर कुछ दिन निवास कर जब उनके साथी उन्हैं अपने देश ले जाने का विचार करने लगे तो महाप्रभु ने उन्हीं दामोदर जी से इसकी आज्ञा चाही । आज्ञा मिलने पर वे जब चलने लगे तो श्री दामोदर जी ने उनका साथ नहीं छोड़ा । वह मथुरिया माथुर विप्र दामोदर देव प्रयाग तक उनके साथ गये । रास्ते में महाबन के समीप अलीपुर खानपुर के बन में पठानों से संघर्ष हुआ और श्री दामोदरजी ने पठानों से मुक्ति दिलायी । वे सभी कीर्तन भक्त होकर वैश्नव पठान बन गये । बंगाल से फिर महाप्रभु ने ब्रज रसानुभव के लिय भी सनातन रूप जीव मधु रधुनाथ रघुनाथ भट्ट आदि अनेक अपने भक्त ब्रज में भेजे । 1574 वि0 में श्री सनातन और रूप गोस्वामी मथुरा आये । श्री रूप जी ने 1600 वि0 में श्री भगवान देवजी के यहाँ से ब्रज का ग्रंथ तथ अन्य अनेक ग्रंथ अवलोकन कर अपना 'मथुरा महात्म' ग्रंन्थ लिखा । सनातन जी नित्य मथुरा में पवित्र पूजनीक माथुर ब्राह्मणों के घरों से भिक्षा लेने आते थे । उन्हैं चौबे जी नारायण अझुमियाँ के घर से पहिले मदना नाम का बालक और फिर मोर मुकटवारों श्याम सुन्दर विग्रह जिसे उन्होंने मदनमोहन ही माना प्राप्त हुआ । ये घटनायें बहुत विस्तार से वर्णित हैं जिन्हें यहाँ संक्षेप में दिया जा रहा है । श्री नारायण जी अझुमियाँ की पत्नी किशोरी देवी थीं जो अपने ठाकुर मोर मुकटवारे को बड़े लाढ से लढाकर सेवा करती थीं । उनके विषय में कुछ पद्य मिले हैं – 
सनातन चरनन लोटत डोलै, पदरज सीस चढावै ।
जसुधा जैसी लाढ़ लढ़ाती, माता के गुन गावै ।
भक्त सिरोमनि ध्न्य किसोरी, श्यामसुन्दर प्रिय दीन्हों ।
जन्म सुफल करदियौ सनातन, सुजस लोक में लीन्हों ।।
मेरौ लाल सम्हार राखियो, बड़े जतन ते पाल्यौ ।
मेरौ घर सूनों भयौ बाबा, तू कछू जादू डार्यो ।।
जनम-जनम जस गांऊरी मैया, सेवा सिद्ध करूंगो ।
मदन मोहन मेरैं प्रानन प्यारौ, तन मन धन अरपूंगो ।।
तेरे घर तौ सदां रहैं है, मेरैंहू कुटी में खेलैं ।।
दूध मलाई माखन रबड़ी, भक्तन छाक सकेलै ।।
उर लिपटाइ मदनमोहन कौ, भाग्यौ रस मदमांतौ ।
रही किसोरी मौंन देखती, बस कछु नहीं जु चलातौ ।। 

                    ये ठाकुर मदन मोहन जी अब करौली में विराजते हैं जो जैपुर रहकर करौली नरेश की याचना पर जैपुर महाराज ने उन्हें अर्पित किये हैं । चौबों को वृन्दावन में मन्दिर बन जाने पर श्री सनातन जी ने यच्छव भेंट के रूप में 1 घोड़ा दुशाला जोड़ी, कड़े सिरपेच नगद दक्षिणा और जब तक वहाँ रहें नित्य मधुर प्रसाद दिये जाने का नेग बांधा जो अभी भी करौली में मान्य है ।

मल्ल विद्या

                    माथुर चौबों की मल्ल श्रेष्ठता भारत प्रसिद्ध हैं । मधु कैटभ माधव केशव बलदाऊ जी भीमसेन कंसराज चांडूल मुष्टिक शल तोशल कूट आदि परम्परा प्राचीन थी, किन्तु समय की मांग के अनुसार चौवों ने औरंगजेब काल में इसको विशेष विस्तार दिया । इस काल में हरएक घर में रोगी दुर्बल को छोड़कर प्राय: सभी पुरूष पहलवान बन गयें थे । मथुरा के इन मल्ल सम्राटों ने पंजाब, दिल्ली हरियाणा महाराष्ट्र मध्य प्रदेश बिहार दक्षिण देश सभी खण्डों के नामी-नामी पहलवानों को धूल चटायी थी । इनकी संख्या हज़ारों में है, अत: सूची न देकर कुछ ख़ास-ख़ास गुरुओं के नाम ही देना पर्याप्त होगा- अलीदत्त कुलीदत्त, रमजीलैया, हौआ चौवे, हरिगुरु, खूंगसिंह, दाऊगुरु, भंग्गाजी, उद्धवसिंह, खैला पांड़े, भगवंतचौवे, बिलासा जी, खौनाबाबा, गिल्हरगुरु, चंके बंके, खुनखुन पाई, धीरा फ़कीरा, नत्थू, पीनूरसका, बंदर सिकन्दर, जगन्नाथ उस्ताद, गलगलजी, भंवरजी, माखनजी, लछमनजी, चूंचू, गेसीलाल, देविया, महादेवा, मोथा जी, द्वारा जी, माखनजी, सिरियागुरु, जौहरी, मेघा, दंगी गुरु, मेघाजी, तपियां, खुश्याला, हिंम्मां, भौंदा, टैंउआं, गोपीनाथजी, विशनजी, बल्देवजी, विसंभरजी (सप्पे), गुलची, गुमानी, हनुमान मिश्र पिनाहट, कल्यान जोनमाने चंदपुर, कन्हईसिंह कमतरी, रौनभौंन मैंनपुरी, बेचेलाल मैंनपुरी, जै गोपाल धौलपुर आदि आदि ।

काव्य साहित्य

                    चतुर्वेदियों में कवियों की परम्परा ख़ूब फली फूली है सैकड़ों कवि हरेक शताद्धियों में हुए हैं । उन सभी का विवरण प्रस्तुत करना संभव नहीं है इनमें से कुछ प्रमुख और ज्ञातव्य जनों के नाम देना उर्चित होगा । इनमें महाकवि बिहारी लाल विश्वख्याति के शीर्षस्थ कवि हैं जो हमारी उपेक्षा के अन्ध कूप में पड़े हैं । माथुर चतुर्वेदी कवि सूची-
                    (1400-1500वि0,) जैनन्द मिहारी 1485, पद्माचारी 1489, (1500-1600 वि,) परसोत्तम बट्ठिया, परसा, 1518, मलूक चौबे 1538, छीत स्वामी 1572, छीहल 1575, विट्ठलदास चीत्तौड़ 1586, कान्हरदास चित्तौड़ 1599, कृपाराम 1598, (1600-1700 वि0), मोहन चौबे निर्गुण काव्य, केशव उचाढ़ा महाकवि बिहारी के पिता 1620, दामोदर चौवे 1622 समय प्रबन्ध, सुलखान चौवे 1620, सुखदेव माथुर 1615 (नील वानर का सेतुशास्त्र 4330 वि0पू0 रचित का अब्दुलरहीम खानखाना के लिय काव्यानुवाद), गंगाधर 1627, चतुर्भुज मिश्र 1624, मोहन चौबे 1630 सहज सनेही, माना 1631, राधा मोहन रावत 1632 मैनपुरी के राजदीवान, दत्तूकवि 1648 केशव माला, कान्हर चौवे 1657, महाकवि बिहारीलाल सतसईकर्ता 1660, उदैराम माथुर, 1660, माथुर नरसिंह 1665 मथुरा महात्म बीकानेर अनूप लाइब्रेरी में, वाण पाठक 1674 कवि चरित्र अकबर काल, चौबेलाल 1687, कवीन्द्र पाठक चन्दपुर 1668, नीलकंठ मिश्र 1648, गोविन्द अटल 1670, बूंदी के (सालिगंराम, हीरालाल, अमरकृष्ण, कृष्णदास 1615) जीवाराम चौवे मथुरा महात्म 1627, (1700-1800 वि0,) हरीबल्लभ 1701, गो0 हरिवंश शिष्य 30 हज़ार पद, हरदत्त चौब 1715 महाविद्या रत्न, कुलपति मिश्र 1717 संग्राम सार, सुखदेव मिश्र 1728, हरदेव मिश्र 1760, चन्द्रभान चौबे 1731, अखैराम मिश्र 1730, चौबेलाल ककोर 1740, कृष्ण कवि ककोर 1740 बिहार के मानजे सत सई पर छंद युक्त टीका, श्यामलाल मिश्र 1738, गणपति मिश्र 1756, कृष्णदेव कृष्ण 1750 भागवत प्रबन्ध, लच्छीराम 1756 करूणा भरण, नीलकंठ मिश्र (सोमनाथ के पिता) 1755, प्रभू 1757, रामकृष्ण 1754, लोकनाथ मिश्र बून्दी 1752, पत्नी रानी चौबे 1754, श्रीधर मिश्र 1756, भोजा मिश्र 1768, मनीराम मिश्र 1778, गंगेश मिश्र 1773, रत्तीराम मिश्र 1780, सोमनाथ मिश्र 1694 (रस पीयूष निधि रासपवाध्यायी) (1800-1900 वि0) ब्रजलाल 1807, आनंद कवि 1821 कोकसार, बालकृष्ण बसुआ 1826 बिहारी के वंशज, सूदन 1801-1812 सुसजान चरित्र, जीवाराम बूंदी 1814, मधुसूदन चौबे हाथरस 1839, रामाश्वमेध, विक्रम 1830 सांझी बत्ती सी, मधुसूदन इटावा 1839, जुगल चौबे 1836 दोहावली, कृष्ण कवि चर्चरी मैनपुरी 1853 तिमिर प्रदीप, मुरली सौरौं 1843 रत्नाबली चरित्र, राधाकिशन चित्र कूट 1849, प्यारे मिश्र 1841, वसींधर पांड़े 1804, हरप्रसाद मिश्र 1856 भाषा तिलक, धांधू चौबे 1860, गुमन कवि 1861 गुमान गढ (भरतपुर युद्ध), जवाहर तिवारी 1862 ब्रज वर्ण, सीतल दास (टटिया स्थान वृन्दावन) 1860 गुलजार चमन आदि, नाथूराम 1874, पिरभू रामकिसन छबीले चौबे 1873, बनमालजी 1882-1976, कल्याण 1880, कलीराम 1884 सुदामा चरित्र, नारायण पंडित 1882, गंगदत्त 1870, चतुर्भुज मिश्र 1880 अलंकार अमी भरतपुर बल्देवसिंह के राज कवि, डिब्बाराम पांड़े दिवेस 1897 ब्रजराज रसामृत, लालजी मिहारी 1897, शीलचन्द्र शील 1893, (1900-2000 वि0) घासीराम चन्दपुर 1908 रतलाम के राज कवि छगन मगन छंगालाल मिहारी 1132 गोविन्द माला, गंगाराम चौबे 1932 संगीत सेतु कश्मीर नरेश के लिये, प्रताप जोनमाने 1937, सभा विनोद, चौबे दत्तराम 1938 दानलीला, चतुर्भुज पाठक 'कंज' 1930-1977 यमक मंजरी, उदैराम 1934 जोग लीला, हनुमान 1930, भोलांराम मालाधारी 1930 काशीनरेश की मुहरैं दान, नवनीत कविनीत 1932 गोपीप्रेम पीयूष प्रवाह मूर्खशतक आदि, माखनचौबे पांड़े 1930 पूरनमासी लीला (करहला के रासधारियों के गुरु), हरदेवा 1934 मोहज्ञान संग्रह, गंगाधर चौबे दूसरे 1944 नागलीला, ऋषीकेश चतु0 आगरा 1998-2030 राम कृष्ण काव्य भंग का लोटा आदि अनेक, मानिक पाठक 1950 मानिक बोध, पुरूषोत्तम दास पुरा कन्हैरा 1967, खड़ग कवि 1884-1935 (दतिया के राजा भवानीसिंह के दरबार में) खड़गवानी, खरखरे छंद आदि, हितराम माथुर 1950, हरीप्रसाद चौबे 1969 महाविद्या रत्न संस्कृत वि0 वि0 बनारस के पुस्तकालय में, अमृतलाल चतुर्वेदी आगरा 1962, गोविन्द तिवारी 1967 रेल पच्चीसी, हीरालाल बूंदी 1916, चतुर्भुज रावत मैनपुरी 1960 पानांजलि आदि 65 ग्रंथ, (ख्याललावनी के उस्ताद अखाड़ा झंडासिंह मथुरा)1958 देवीलाल ककोर, भैरौसिंह ककोर, (रिसाल गिर अखाड़ा) बंसीगुरु गणेश चौवे, हरदेवा, गुलवा अझुमियाँ, मोहन पाँड़े दीवान जी मुकदम आदि, कवि भगवानदत्त 1957-2031 सुपर्णा, रामदयाल उचाढ़ा 2013 काव्य कालिंदी, क्याख़ूब चौबे रामप्रशाद 1953 दानलीला रंगीली होली, बालमुकुन्द 'मुकुन्द' मुदित मुकुन्द 1984 यमुना लहरी ब्रजभागवत आदि 84 रचनायें, विदुर देव वैद्य 1959-1992 जवकुश नाटक संगीत, जुगादी राम चौबे 1980 काव्य संग्रह मथुरा महात्म, उमरावसिंह पाँड़े 1959, गयादत्त शास्त्री गया 1974 कंस वध, गोकुलचन्द चन्दजी 2010, गोविन्द 2043 ब्रजवानी कमल सतसई, श्री नारायण चतुर्वेदी श्रीवर 1998, बालकृष्ण खिलाखिल जहाँगीर पुर एटा 1989, सीजीराम उचाढ़ा 1989 यमुनाष्टक छंद, वैजनाथ चौबे बैजू इटावा 1994 भजन पुष्पाँ जलि, बालकृष्ण हाथरस 1997, ओमीनन्द 1990, नरेन्द्रनाथ लखनऊ 1992, नवीनचन्द्र पुराकन्हैरा 1997, बिहारीलाल हीरालाल 1995 गणेश विरूदावली, घनश्याम निर्भीक 2040 समुद्रमंथन उद्धव गोपी संवाद, दीनानाथी सुमनेश 1997, (2000 से आगे 2043 तक) दूधाधारी 2000, नाथा पाठक 2010, बनमाली शास्त्री 2020, धीरजलाल जाटवारे 2010, अमृतलाल चतु0 आगरा 2005, हालस्यरसावतार जगन्नाथ प्रशाद चतु0 मलयपुर 2002, चन्द्रशेखर शास्त्री 2020, महेन्द्र 2000, राजन्द्र रंजन 2040, महेन्द्र नेह 2041, बमवटुक 2030, शैल चतुर्वेदी 2043, रामकुमार चंचल 2015, डा॰ बरसाने लाल 2043 हाथी के पंख, सुरेश हाथरस 2043,छेदालाल छेदभरतपुर 2043, घनश्याम घनश्री 225, राजेन्द्र खट्टो 2010, मनमोहन चतु0 2027, विष्णु विराट 2043, शंकरलाल काहौ 2043, विजय कवि 2043 व्यंग हास्य, कैलाशनाथ मस्त (पान वाले) 2025, गोवर्धन पुरा कन्हैरा 2010, महादेव प्रशाद वैद्य 2042, उग्रसेन निर्मल कानपुर 2042 सत्यनारायण कथा, मकुन्द महल वारे 2043, गोर्धन बुदौआ 2043 (पोरबंदर),

संगीत नृत्य अभिनय

                    संगीत- मथुरा के चौबों में संगीत के बड़े नामी कलाकार हुए हैं । चौबों को इस कला से स्वाभाविक प्रेम रहा है । इन कलाओं के कुछ विशिष्ट गुणीजन श्री छीत स्वामी 1572-1642 वि0 (अष्टछाप के कीर्तन कार), श्रीस्वामी ललित किशोरी जी 1758, श्रीस्वामी हरिदास टटिया स्थान के नित्य विहार गायक आचार्य, रागी पागी चौवे 1876, बालो चौवे हाथरस 1898, अंवाराम खंबाराम छिनोजी 1900, चन्दनजी गनपतजी 1929-30,बालजी 1970, जमना दास 1930, हरदेव बाबा 1937, बुलबुल मनोहर औघड़ 1970 (अलगोजा), रामचन्द पाठक 1860 (गणेशीलालजी के संगीत गुरु दत्तराम जी के पितामह), लालन जी 1988 (इसराज बादक), छैया नचैया गनपतजी 1980 (तबला के अद्वितीयवादक), गणेशीलालजी संगीत सम्राट 1903-1968 वि0 विश्व विख्यात संगीत आचार्य, इनके भाई चौखेलाल अजुद्धी मुकुंदी 1907 वि0, बंसीधर 1887 वि0 धनीराम 1904, भगवानदास सारंगीवादक कछपुरा 1998, चंदनजी के शिष्यवासुदेव (घुर्रेजी), शिवकुमार लछमनजी बालजी रंछोर पांड़े 1960-2010 तक, अच्चा-पच्चा, मोतीवारौ, सोहनलाल पारूआ, 1986 आदि । बर्तमान 2043 वि0 में- सुखदेव, मुरारीलाल, श्रीकांत, बिहारीलाल, लव, कुश, रमेशराजा, भोला पाठक, मधुसूदन, कृपानाथ, हरदेव, छगनलाल, मदन लाल, बिहारी मुंशी, जगदीश बंसरीवाला, भगवानदास सारंगी वादक कछपुरा, गोविन्दराम (पुच्चड़जी) इसराज मास्टर, नगरा, फगड़ा, बिदुर, केशवदेव आदि । नृत्य- नृत्य चौबे समुदाय की एक विशिष्ट कला है । इसमें विरनृत्य (नरसिंह लीला), श्रृगार नृत्य चौपाई होली की, हास्य नृत्य स्वांग भगत, अद्भुद भगत, भक्ति शांत रस रामलीला में आयोजित होते हैं । नृत्य के प्रभावी कलाकार रीछा टोली श्री गनपतजी (छैयानचैया) मानिकलाल पाठक, फैली मनोरथा दुमियाँ जगन्नाथ नन्दू चट्ठा चाऊचाचा रघुवर कंचन छोटे, नीतलाल (गनपतजी), गरूड़ पाठक, विटना पाठक, केदार, भैयालाल, आदि हुए हैं ।

                    अभिनय- भगत अब समाप्त हो चुकी हैं । संगीत नौंटंकी के सवांग यदा कदा होते रहते हैं , नाटक लवकुश नाटक के बाद नहीं हुआ । कृष्ण लीला की प्रस्तुति कुछ अधिकार लोलुप लोगों ने विखंडित कर दी । रामलीला का उद्योग बढ़ रहा है ।
रामलीला- 
                    चतुर्वेदी समाज के लिये यह एक कमाऊ उद्योग है । लगभग 32 मंडलियाँ प्रति वर्ष आश्विनमास में देश के कोने-कोने में जाकर लीला प्रदर्शन करतीं और धन तथा यश अर्जित करती हैं । अनुमान है कि प्रति वर्ष 3 लाख रुपया इस उद्योग से जो केवल 10-15 दिन ही में समाप्त हो जाता है चतुर्वेदी किशोर कलाकारों को बट जाता है । कुछ मंडल साल भर तक भी जहाँ तहाँ जाते रहते हैं । इस कला उद्योग को और अधिक ऊँचा उठाने और सुसंगठित किये जाने की आवश्यकता है ।

                    रामलीला का आंरभ मथुरा के चतुर्वेदी सुप्रसिद्ध रामभक्त श्री गिरराजदत्त जी (खपाटाचाचे बाद में ज्ञानानन्दजी कार्ष्णि) के द्वारा 1900 वि0 के लगभग हुआ इनके पुत्र श्री वैकुंठदत्तजी तथा प्रधान शिष्य श्री गोविन्दजी नायक हनुमानजी द्वारा रामलीला का परमोत्कर्ष हुआ । इनके परिवारों की मण्डली अभी भी श्रेष्ठ मण्डली मानी जाती है । इस परम्पराओं को और आगे श्री गंगेजी विष्णुजी वैजनाथ जी मथु रेशदत्तजी बासुदेव जी हरदेवजी बढ़ाते जा रहे हैं।

हर्षोल्लास और मेले

                    आमोद प्रमोद और विनोद माथुरों के जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं । यहाँ अनेक अवसरों पर उत्सवों और मेलों का सरस आयोजन होता ही रहता है । इनमें से कुछ प्रमुख हैं –
1. कंस का मेला- कार्तिक शु0 10 को होने वाला यह मेला चौबे समाज का प्रमुख मेला है । इसमें कागज का बड़ा कंस का पुतला बनाकर कंस टीले पर ले जाया जाता है- कृष्ण बलराम की सुसज्जित सवारी हाथी पर वहाँ जाती है । चतुर्वेदी समुदाय के सभी नर नारी किशोर युवक वृद्ध राजा महाराजाओं की प्रदत्त अदभुद पोषाकों शस्त्रों विशाल लट्ठों को लेकर उन्माद के साथ नाचते कूदते गाते हुए इसमें भाग लेते हैं । बाहर कार्यकरत उद्योगी बन्धु भी इस अवसर पर आते हैं । मथुरा के वायु मंडल में इस समय बड़ा आनन्द और उत्साह रहता है । कुछ सांस्कृतिक झांकियों और सजावट रोशनी से भी वर्तमान में मेला का रूप भव्य बना है । कंस का मेला वज्रनाभ काल 3042 वि0 पू0 से है । हरिवंश पुराण के अनुसार मथुरा के यादव गण माथुरों के साथ नृत्य गान उल्लास के उत्सव मनाते थे, जिन्हें द्वारिका प्रयाण के बाद वे द्वारिकापुरी में तथा माथुर प्रजा मथुरा में मनाती थी । प्राणिनी ने अष्टध्यायी 1143 वि0 पू0 में तथा कंस वध नाटक में इसका प्रस्तुतिकरण किया है । इसमें उद्घोष की जाने वाली साखी भी शौरसेनी प्राकृत से किंचित ही रूपांतरित हैं यथा-'कंस्स बलरम्मा लै आम्मैं सखा सूरसेन '(हम) सूरसेन '।' कंस्सा मारू मधुप्पुरी आए कंसा के घर केह घव्वराए आदि । भारयुक्त हैं- इनमें मानिक
2. नृसिंह लीला- यह वीर नृत्न प्रदर्शन माथुरों के पुरूषार्थ परिक्षण का महान महोत्सव है । वैशाख शु0 14 से 3-4 तक यह मेला अनेक चौबों के मुहल्लों में चलता रहता है । यह अयोध्या पति भगवान राम के समय 4044 वि0पू0 से यहाँ स्थापित है, जब शत्रुहन द्वारा लवणासुर का वध किये जाने पर नवनिर्मित मथुरा में वे पधारे, विश्रान्ततीर्थ पर तीर्थस्नान रात्रिजागरण ब्रत किया तब निशा काल यापन के लिये मथुरा के चतुर्वेदियों ने इस वीर विजय शास्त्रीय द्वंद युद्ध शैली में प्रवर्तित इस लीला का उनके सन्मुख प्रस्तुतीकरण किया । एतिहासिक प्रमाण तथ्य यह हैं कि इस लीला में विनायक गणेश से सिंधुर दैत्य, देवी से मर्हिषासुर, हनुमान से अहिरावण अधकट्, ब्रत्तासुर से इन्द्र श्रीबाराहदेव से हिरण्याक्ष का द्वंद रात्रि में तथा निशान्त में ब्रह्मा से शंकर युद्ध पांचवा ब्रह्मा का मुख छेदन शिव से ताड़कारसुर का तथा अन्त में भगवान नृसिंह का प्रादुर्भाव होकर हिरयकशिपु का संहार होता है । त्रेता का मरू बाजा, बाराहों का वर्हा वाद्य भर्रा झांझ, नृसिंह का सिंह प्रहार मुद्राओं में शौर्य नृत्य इसकी विशेषतायें हैं तथा लीला में राम रावण, शत्रुघ्न लवण, कृष्ण कंस का युद्ध अनुपस्थित होने से इसे राम कालीन मानने की विंचार धारा को दृढ़ बल मिलता है । नृसिंह भगवान के चेहरे (मुखौटे) भी पर्याप्त भारयुक्त हैं- इनमें मानिक चौक का 15 सेर चौबच्चा का 10 सेर मारू गली का 8 सेर गोलपारे का 5 सेर बताये जाते हैं । चौबच्चा का चेहरा मुलतान से 1710 वि0 में शाहजहाँ काल में चौबे खड़गराम पाठक लाये थे । कहते हैं । मुलतान के हाकिम अबुल फ़तह ने हिन्दुओं के देवता नरसिंह की असलियत की परिक्षा करनी चाही । उसके निर्देश से पंजाबी पहलवान गवरू को हिरण्याक्ष बनाने के लिये ख़ूब बादाम घी आदि खुराक खिलाकर नरसिंह को पराजित करने को तैयार किया गया । उस समय नरसिंह के स्वरूप के लिये उससे भी अधिक बलवान पहलवान की खोज हुई पंजाब में सिख औरंगजेब विरोधी थे, वे पहलवानों योद्धाओं पटेवाजों का बड़ा सम्मान और पोषण करते थे, मथुरा के चौबे पहलवान इसी आधार से पंजाब जाते रहते थे । खड़गराम पाठक भी वहीं थे, वे बुलाये गये और उन्हें नरसिंह का लीला पद अर्पित किया गया । लाखों दर्शकों की अति उत्सुक भीड़ में चौबेजी ने देव आवेश में आकर हिरण्याक्ष को चिड़िया की तरह मरोड़ कर उछाल कर गोद में ले लिया और उसका तीक्ष्ण नखों से उदर विदीर्ण कर डाला । यह देख उसके पक्ष के गुंडे पहलवानों ने चौबे को मार डालने का गिरोह बनाया, ज्ञात होते ही खड़गजी रातों रात उस मुखौटे को कपड़े में लपेट पीठ से बांध वहाँ से मथुरा भाग आये और यहाँ अगले वर्ष से उसी चेहरे से लीला प्रदर्शित की । ये मथुरा से चन्दपुर जाकर भी कुछ काल अपने परिवार के पाठकों के साथ रहे थे । वर्तमान में इनके वंश के 'खरगराम के पाठक' मथुरा में चौबच्चा मुहल्ला में अभी रहते हैं । अन्य मेलों में- होली की चौपई (नृत्य गान), संवत्सर के फूल डोल, यमुना छट, रामनवमी, आषाढी दंगल, राधा अष्टमी वृन्दावन टटिया स्थान, रामलीला, यमदुतिया, गोचारन, अखैनौमी, देव उठान (परिक्रमायें), आदि हैं । प्राय: सभी मेले सुरीली भांग ठंडाई, उत्तम मिष्टान्न भोजन, चीज चट्टोंनी, सैर सपाटे के लिये आकर्षण के केन्द्र हैं जिन्हें आज की नई पाश्चात्य सभ्यता में पिकनिक का खोल उढाया जा रहा है ।समय की मार से मधुवन, सतोहा, गरूड़-गोविन्द, करौटनी गोर्धन, द्वारिकाधीश के होरी खेल के दर्शन, बन विहार आदि मेले मंहगाई के पेट में समा गये हैं ।

विव्दद्वर्ग और विशिष्टजन

                    माथुरों में विद्वानों और गुणीजनों की बहुत संख्या है । चतुर्वेद विद्यालय के द्वारा संस्कृत पण्डितों की बहुत बृद्धि हुई है, तथा ये मथुरा बृन्दावन गोकुल दाऊजी जतीपुरा, गोवर्धन बरसाना नन्दगाँव आदि अनेक क्षेत्रों के संस्कृत विद्यालयों में प्रधानाध्यापक और अध्यापक हैं । इनमें वेदपाठी, कथा वाचक, कर्मकाँडी, ज्यौतिषी, आयुर्वेदज्ञ, सिद्ध महात्मा, तंत्रमंत्रज्ञ, अंग्रेजी शिक्षा पारंगत, प्रोफेसर, डाकटर, एडवोकेट, वैरिष्टर, इंजनीयर, राजकीय सेवा नियुक्त, व्यापारी, उद्योग पति, वित्तीय प्रबन्धक, निर्देशक और सलाहकार, वैज्ञानिक तकनीशियन, सैनिक व पुलिस उच्चाधिकारी , मुनीम, मेनेजर, कार्याधिकारी कुशल और प्रतिष्ठा प्राप्तजनों की संख्या हज़ारों की संख्या में है । अस्तु कुछ अतिविशिष्ट उल्लेखनीय महानुभावों के नाम निर्देश ही यहाँ पर्याप्त होंगे ।
विद्वद्वर्ग- श्री महाप्रभु उद्धवाचार्यदेव, भगवान जी मिहारी, श्री शंकर मुनिजी, श्री शीलचंदजी, श्री नन्दजी, श्री वासुदेवजी, श्रीकेशवदेवजी, रंगदत्त गंगदत्त, बन्नाजी, बनमालजी, गयादत्तजी शास्त्री, गुलवा पंडित, श्रीवरजी, हरिहरजी, रंछोरजी, केशवदेव पांड़े, श्री जंगीरामजी (भागवत कंठाग्र पढाने वालेद्ध, बिहारी लाल शास्त्री, बिदुरजी पाठक, हरदेवजी (हाबू पंडित), बाला मौरे (भागवत वक्ता), बनमाली शास्त्री, जगनजी, गोर्धनजी शास्त्री, मगन पंडित, सैंतीरामजी, मदननरसीजी, अर्जुनजी, सोहनलालजी पांड़े, मालीराम, छंगालालजी, जनार्दनजी, वामनजी, वासुदेव शास्त्री, अनंतरामजी, पं0 छप्पाराम, विश्वनाथ शास्त्री, रिषीराम रामायणी, गोपालचन्द जी बड़े चौबे, राधाचन्दजी, अलवेली चन्दजी, वर्तमान में भी सैकड़ों की संख्या में चतुर्वेदी विद्वान हैं । भगावत और रामायण पाठियों की तो कोई गिनती ही नहीं- सहस्त्र भागवत पाठ कराने वाले श्रद्धावान को सहस्त्र से, भी अधिक पंडित केवल माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों में ही मिल सकते हैं । चतुर्वेद विद्यालय की छत्र-छाया में यहाँ संस्कृत विद्वानों की अभूत पूर्व बृद्धि हुई है ।
ज्योतिष- ज्योतिष विद्या के अनेक धुरंधर मनीषि माथुरों में हुए हैं जिनमें कुछ नाम यहाँ दिये जा रहे हैं- नृसिंह दैवज्ञ भानुचन्द दैवज्ञ अकबर के दरवारी ज्योतिषी, रमामेला पंडित, भगवानजी (इनने ज्योतिषी के अनेक दुर्लभ ग्रंथ लिखे हैं विदेशी यूनानी ओलंपिया देश की ज्योतिष का ओलंपिक शास्त्र, अरवी का रमलशास्त्र इनका लिखा तथा अनेक ग्रंथ-यंत्र आदि हमने पंडित प्रयागदत्त के पास स्वयं देखे हैं) ज्योतिर्विद पं0 शंभूरामजी (महान गणितज्ञ), नारायण पंडित, चन्द्रशेखर शास्त्री, जगन्नाथ पंडित ग्वालियर राज ज्योतिषी, प्रेमसिंह पांड़े, तालगांव, नरोत्तम मिश्र, नीकंठमिश्र, (ताजिक नीकंठीकर्ता) घंघलजी, गणेशी (तपियाँ) आदि ।
आयुर्वेद-आयुर्वेद भी हमारी सिद्ध विद्या है । इसमें प्रमुख विद्वानों के नाम हैं- हरप्रसाद जी (1822 अनूप शहर में हकीम अफजल अली से शिक्षा) इनके पुत्र सुआलाल हकीम (राजा अलवर को पुत्रोत्पत्ति), मोहन, सोहन (हिकमतप्रकाश हिकमत प्रदीप रचना), डोरा से नाड़ी निदान भैंस का उचित निदान बतलाया, घोलम मोलम, अच्चा बच्चा जी वैद, कूकाजी, नटवर जी, तप्पीराम, तपियाजी, चौबे गणेशीलाल संगीतज्ञ (चिकित्सा सागर विशाल ग्रंथ लेखक), विदुरदेव, बाबूदेव शास्त्री (चतु0 विद्यालय) लालाराम वैद्य, झूपारामजी, चक्रपाणि शास्त्री, राधाचन्द्र, मदनमोहन मुन्शी, गोपालजी, गरूड़ध्वज आदि । यंत्रमंत्र- श्री शंकर मुनिजी, श्री शीलचन्दजी महाराज, श्री बासुदेवजी, श्री केशवदेवजी, श्री करूणा शंकरजी, श्री वृन्दावनजी, बटुकनाथजी, तुलारामजी, विष्णुजी, गणेश दीक्षित, गंगदत्त, कवि नवनीत, श्री बद्रीदत्तजी महाराज, कामेश्वरनाथजी, मूसरा धार चौबे, शिंभूराम चौधरी, लक्ष्मणदादा (गंगदत्त रंगदत्त के पिता), आदि ।
                    कर्मकांड वेद यज्ञ-विशिष्टजन नरोत्तमजी, सोहनलालजी, भगवानदत्तजी, याज्ञिक, लक्ष्मणदत्त शास्त्री, बिहारीलाल याज्ञिक, लड्डूगोपाल शास्त्री, लक्ष्मीनारायण वदेनिधि, प्रहलादजी, कन्हैयालालजी, धीरजजी सामवेदी, गोकुलचंदजी, हेलाचेला, बालाजी मौरे, धीरजजी प्रयाग घाट, कैलाशनाथ, ब्रह्मदत्त (लिंगाजी), टिम्माजी, गिरिराज शास्त्री, हुदनाजी, सैंगरजी, आदि ।

गुरुगादी पदासीन ग्रहस्थ आचार्य

                    श्री गोपाल मन्दिर पीठ के – आचार्यों में श्री मौजीरामजी, मठोलजी, बंशाजी, श्री नन्दनजी महाराज (इनसे शास्त्रार्थ में पराजय के भय से स्वामीदयानंद रातोंरात भाग गये थे), श्री योगीराज बाबा रज्जूजी, 1920 वि0 जन्म (योगचर्या सिद्ध दिव्य दृष्ठा), श्री विष्णुजी महाराज जन्म 1956 वि0 )गोपाल वेद पाठशाला संस्थापक) तथा वर्तमान में श्री विठ्ठलेशजी महाराज इस गादी के सरल शुद्ध विद्वान इष्ट सेवी और आदर्श चरित्र हैं । चौबों में इनके हज़ारों शिष्य हैं ।
                    श्री विद्या आदि पीठके – लोक वंदित सिद्ध आचार्यों में दक्ष गो़त्रिय श्री मकरंदजी महाराज 1742 वि0, श्री पतिजी 1772, श्री मोहनजी 1794, श्री गुरुशंकर मुनिजी 1822, श्री चेतरामजी 1850, स्वनामधन्य श्री शीलचंदजी बाबा गुरु 1861-1905, श्री वासुदेवजी 1887, श्री केशवदेवजी (भैयाजी) 1928, श्री शिवप्रकाशजी 1960, श्री करूणा शंकरजी 1968 वि0, आदि महानुभाव हुए हैं ।
                    श्री शंकर मुनिजी को जयपुर के जगन्नाथ पंडितराज सम्राट दीक्षित ने श्री विद्या यंत्रराज तथा पूजारत्न ग्रंथ समर्पित किया । इन्होंने ही श्री महाविद्यादेवी मन्दिर का शिखरबन्ध निर्माणकरा कर दीक्षित महोदय को महाविद्या उपासना की सिद्धि उपलब्ध करायी । श्री शीलचन्दजी की जिव्हा पर वाग्भज बीज मंत्र अनूप शहर में गंगा तट पर श्री गंगा माता ने स्वयं प्रगट होकर स्थापित कर बाणी सिद्ध महापुरूष बना दिया था। इनके सैकड़ों शिष्य चौबों में तथा अन्यत्र हुए है । श्री महाविद्या जी की नव पीठ प्रतिष्ठा, दशभुजी गणेश स्थापना, विश्रान्त मुकट मन्दिर तथा श्री द्वारिकाधीश स्थापना आदि अनेक महान कार्य इनके द्वारा हुए हैं । गंगदत्त रंगदत्त, ब्रह्मानन्द सरस्वती, बूंटी सिद्ध, गणेशीलाल संगीत मार्तड इनके शिष्य थे । श्री गोपाल सुन्दरी और पीतांबरा तथा वाला पद्धतियाँ इनकी रचित हैं । श्री वासुदेव बबुआजी की जिव्हा पर बाग्वादिनी सरस्वती माता विराजती थी अर्कीमन्डी के राजाध्यानसिंह, काम बन के गो0 देवकीनन्दनजी, काशी नरेश आदि इनके अनेक भक्त और शिष्य थे । श्री केशवदेव भैयाजी असाधारण तेजस्वी और शास्त्र प्रवक्ता थे । इनका नित्य आन्हिक बहुत विस्तृत तथा ग्रंथ प्रणयन अति गहन चिंतनमय था । आपकी कृपा से गो0 गोपाललालजी कठिन रोग से मुक्त तथा भरतपुर के धाऊजी को बृद्ध अवस्था में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । आपकी अनेक उपासना पद्धति श्री बालात्रिपुरसुन्दरी, बगलामुखी, भुवनेश्वरी, माता आदि की रचित हैं । श्री शिवप्रकाशजी लाल बाबा गम्भीर अल्पभाषी विद्वान थे । कलकत्ता के कार्पालक आचार्य चांवर्दिया ओझा को आपने तंत्र शास्त्र में नतमस्तक कर उससे श्री यंत्र भेंट में प्राप्त किया । श्री करूणा शंकरजी सार्वदेशिक विद्वान थे- राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रशादजी उप राष्ट्रपति बासप्पादानप्पा जत्ती राजपाल कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी महोदय तथा मथुरा विद्वत्सभा, काशी तांत्रिक सम्मेलन, संस्कृत अकादमी उ0प्र0, गायत्रीयागदतिया, ललितात्रिपुरसुन्दरी पीठ उरई, गंगेश्वरानन्द वेद पीठ आदि से आप सम्मानित किये गये । आपके रचित तंत्र के अनेक ग्रंथ हैं । बर्तमान में इनकी गादी पर श्री पृथ्वीधरणजी विराजमान हैं जो सीधे सरल सौम्य और संकोची गम्भीर प्रकृति के हैं । श्री लालबाबा महाराज की प्रधान गादी पर श्री लक्ष्मी पतिजी (मुन्ना बाबा) विराजमान हैं, जो एकनिष्ठ उपासना तंत्र-ज्ञान और तेजस्विता की मूर्ति हैं । स्नेह भाव और सौहार्द्र इनने स्वाभाविक ही पाया है । श्री लालबाबा की पूज्य मातु श्री माया देवी (महारानीजी) भी परम बिदुषी कृपानिष्ठ और सर्व कल्याण भावना मयी महान आत्मा थीं, जिनके आशीर्वाद प्राय: सिद्ध और मंगलकारी ही होते थे । इस गादी के हज़ारों शिष्य चौबे तथा अन्य लोग हैं । इस गादी के शिष्य धूजी चौबे ने घोर अकाल की आशंका वाले अवर्षण काल में मंत्र बल से इन्द्र लोक जाकर इन्द्रदेव द्वारा मूसलाधार वर्षा करायी जिससे उनका नाम ही मूसराधार चौबे पड़ गया ।
श्री यमुनाजी धर्मराज पीठ-श्री शंकर मुनिजी के वंश की दूसरी गादी में श्री आसारामजी, हरिदत्तजी, दामोदरजी, (टुन्नौजी) श्री बद्रीदत्तजी श्री पूर्णानन्दजी तथा अब इस वंश में श्री कामेश्वरनाथ जी (दिल्ली गौरीशंकर मन्दिर) तथा श्री नित्यानन्दजी (दिल्ली राम मन्दिर) के व्यवस्था आचार्य हैं । यहाँ भी प्राचीन श्री शंकर मुनिजी द्वारा अर्चित श्री यंत्र की तांत्रिक उपासना है ।
                    श्री पीठ रत्न कुंड- इस शक्ति पीठ के प्रथम आचार्य श्री गंगारामजी (घघलजी) 1820 वि0 थे जो रीवांनरेश नघुराज सिंह के तीर्थ गुरु थे । अपनी श्री विद्या साधना से इनने राजा का अधमकुष्ट रोग दूर किया और भेंट में 2 गाँव पाये । इनके पुत्र सूरतरामजी 1853, तुलारामजी 1881, श्री बृन्दावनजी 1912 बहिन श्री यशोदादेवी 1914, श्री बटुकनाथजी 1944 भाई श्री भगवानजी 1946 तथा वर्तमान में तंत्र शास्त्र के मान्य विद्वान श्री विष्णुजी हैं । इस परिवार के प्राय: सभी महानुभाव तंत्र शास्त्र श्री यंत्र के एक निष्ठ आराधक ज्योतिविंद पुराणविद् तथा शाक्त संप्रदाय के प्रभाव शाली आचार्य रहे हैं । श्री विष्णुजी ने काशी के तांत्रिक सम्मेलन में मथुरा के विद्वन्मंडल का नेत्रिटत्व किया तथा यमुना पार की पैंठ बस्ती में जड़िया परिवार द्वारा श्री विद्यापीठ की स्थापना करायी है । श्री भगवानजी के कुल रत्न सपूत वर्तमान में टटिया स्थान की गादी पर हैं । जिनके हज़ारौं माथुर शिष्य प्रशिष्य हैं। विदुर जी तांत्रिक की बैठक-इस स्थान के आचार्य सुप्रसिद्ध भारत विख्यात विद्वान श्री गंगदत्त रंगदत्त के वंशज श्री विदुर दत्तजी तांत्रिक थे । ये श्री यंत्र उपासक एक चमत्कारी सिद्ध पुरूष थे । इनने अनेक लोगों को संकटमुक्त और दुर्गाभक्त बनाकर मंत्र दीक्षित किया था । वर्तमान में इस स्थान पर कोई प्रभाव शाली आराधक नहीं हैं ।

माथुर समाज के विशिष्टजन

                    दानवीर श्री बैजनाथजी इटावा (चतुर्वेद विद्यालय को अपना लाखों का सर्वस्वदान), चौबे रामदासजी, श्री डिब्बारामजी (जगद गुरु श्री शंकराचार्य स्वामी के पूज्य, चतुर्वेद परिषद के प्रथम अध्यक्ष) , श्री नन्दजी महाराज, श्री शीलचंदजी वासुदेवजी केशवदेवजी, महामहोपाध्याय श्री गिरधर शर्मा जी, राजा जय कृष्णदास, कुंवर जगदीशप्रशाद परमानन्द जी कृष्णानन्दजी, श्री ऋषीकेश चतुर्वेदी, बन्नाजी बंसाजी पाठक, छप्पारामजी, गजाधर प्रशादजी (चतुर्वेदी महासभा अध्यक्ष), तपस्वीराम लालगंजवारे, चतुर्भुजजी जाटवारे, गणेशी लाल जी चौधरी, गैंदाजी ककोर सर्दार, अलखूराम मिहारी, सर्दाररामलाल मिहारी, शम्भूनाथजी मैम्बर, होली पांड़े, झाऊ दामोदर चौबे, बुचईसिंह, बिक्रमाजीत कमलाकर पांड़े काजीमार, हरगोविन्द श्री वैष्णव, श्री मन्नारायणजी, चौबे द्वारिकानाथजी (द्वारिकाधीश संस्थापक), द्वारिकाप्रशादजी ।

राजकीय सन्मानित जन

                    रोहनलाल चतु0 केन्द्रीय उप रेल मंत्री, कुंवर जगदीशप्रसाद आई0सी0एस0 मुख्य सचिव वायसराय की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के मैम्बर उ0 प्र0, श्री नारायण जी भू0 पू0 शिक्षा निर्देशक उ0 प्र0 आकाशवाणी उप महानिदेशक, दीवान परमानन्दजी झालावाड़ के, रघुनाथदासजी कोटा राज्य दीवान, रा0 ब0 विश्वम्भरनाथ कोटा राज्य दीवान, यादराम चौबे भरतपुर राज्य मंत्री, मुन्नालालजी सूवा ग्वालियर, पृथ्वीनाथजी आई0 ए0एस0 शिक्षा सचिव उ0 प्र0, चंपाराम गिरीशचन्द्र आई0 ए0 एस0 चांसलर गोरखपुर विश्व विद्यालय, भरतचंद्र म0 प्र0 राज्य उपसचिव, मनोहरदास डिवाई जंगलात के सर्वोच्च अधिकारी, शम्भूनाथजी एस0 पी0 पद त्याग वर्तमान संसद सदस्य, भूपेन्द्रनाथ थर्ड सिक्योरिटी फोर्स के डी0 आई0 मनोहरलाल सिक्योरिटी आफीसर, त्रिलोकीनाथ चतु0 केन्द्रीय लेखा निरीक्षक, सचिव केन्द्रीय गृह विभाग, डिप्टी राधेलाल रजि0 कोआपरेटिव सोसाइटी उ0 प्र0, देवकी नन्दनजी बूंदी दीवान, सर लक्ष्मीपति जी सर्वोच्च चीफ कमिश्नर रेल विभाग, जनरल मैनेजर हिन्दमोटर्स, सतीशचन्द्र सदस्य केन्द्रीय रेलवे बोर्ड, कैलाशचन्द पाठक सीनियर गवर्मेंट रेलवे इन्सपेक्टर, प्रभातचंद्र मिश्र महाप्रबन्धक उत्तर रेलवे, मृगेन्द्र नाथ आई0 ए0 एस0 अधिकारी केन्द्र सरकार, रा0 व0 विश्वंश्वरदयाल रेवेन्यू कमिश्नर, बद्रीनाथ आई0 ए0 एस0 पुरातत्व अधिकारी मद्रास, ललित किशोरजी राजस्थान, मंत्री, सतीशचन्द्रजी मंत्री महाराष्ट्र प्रदेश ।
                    सेना पुलिस विभाग- डी0 पी0 मिश्र मेजर जनरल, मोहनस्वरूप एयर मार्शल, सोहनलाल मिश्र नौसेना कमांडर, जगदीश पाठक एयर इन्डिया फ्लाइट, ज्वालाप्रशादजी जटवारे मथुरा के ऐसे विद्वान थे जिन्होंने सर्वप्रथम अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भरतपुर नरेशों और उनके राजकुमारों को अंग्रेजी पढ़ाई । नरोत्तमदास आई0 जी0 हैद्राबाद, जयेन्द्रनाथ पुलिस कमिश्नर दिल्ली, डाइरेक्टर जनरल पुलिस उ0प्र0 ,सुशीलकुमार आई0 जी0, भरतचन्द मिश्र आई0 जी0 प्र0, फणीचन्द्र नाथ आई0 जी0 मध्य प्रदेश ।
न्याय- न्याय मूर्ति प्यारेलालजी जज बीकानेर, श्री ब्रजकिशोरजी इन्दौर, श्री मिश्रीलालजी प्रयाग उच्च न्यायालय, श्री शम्भूरामजी जज मध्यप्रदेश, संपादक उच्चन्यायालय निर्णय पत्रिका, समाज में बैरिष्टर वकील एडवोकेटों की संख्या भी बहुत विस्तृत है । इंजनीयर और तकनीकविद्- चंद्रसेन चौबे कलकत्ता यंत्र आविष्कारक हिन्दीबंगवासी, में, मुक्ताप्रसाद, अविनाशचन्द्र, उजागरलाल, रामस्वरूप, दिनेश चन्द्र, राकेशकुमार । 30 वि0 पू0 में माथुर भीमसेन ने मथुरा में विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र का 1 लाख 18 हज़ार श्लोकों में प्राक्रत से पाली में अनुवाद शुंगकाल में किया जो 12 विभागों में था । सुखदेव माथुर के 1615 वि0- के राम काल के नलनील बानरों के सेतु शास्त्र का अब्दुलरहीम खानखाना के अनुरोध पर 15, 480 श्लोकों में अनुवाद किया इस पर खानखाना 16 हज़ार मुहरैं उन्हें भेटकीं । इस ग्रंथ में सेतु, जलवंध, सरिता, नहरें, तड़ाग कूपवापी आदि निर्माण का विधान था । चिकित्सा- डा॰ संपतराम, डा॰ कृष्णचन्द्र, बालस्वरूप (नागपुर), उमेशचन्द्र महावीरप्रशाद (कनाडा में), राजीव रंजन, बीणांदेवी ।
शिक्षा- श्री नारायणजी, सालिगराम, दीनानाथ, बरसानेलाल, ओंकारनाथ, प्रयागनाथ, प्रो0 चंपाराम, विश्व विद्यालयों में अनेकों डीन रीडर चान्सलर प्राध्यापक हैं ।

साहित्यकार लेखक सम्पादक- श्री नारायणजी, बनारसीदास, जवाहरलालचतु0, दत्तराम चौबे, नारायण दत्तपाठक, द्वारिका प्रशादजी, चन्द्रशेखर शास्त्री, राधाचन्दजी, जगदीशप्रशाद, रामेश्वरप्रसाद, हास्य रसावातार जगन्नाथप्रशाद, प्रभु दयाल पांड़े प्रथम पत्रकार सम्पादक हिन्दी बंगवाली कलकत्ता, मदनलाल पत्रकार, युगलकिशोरजी, रघुनाथप्रशाद शास्त्री, सबल किशोरजी, बासुदेव कृष्ण, रामस्वरूप, बालमुकुन्द, माला रविन्दम्, राजेन्द्र रंजन ।

श्री विश्रान्त तीर्थराज

                    ब्रजमंडल की राजधानी श्री मथुरापुरी में विश्रान्त तीर्थ विश्व के तीर्थों का मुकुटमणि सब तीर्थों का पिता परम पुरातन तीर्थ हैं । सतयुग के आरंभकाल में भगवान श्री आदि नारायण (गतश्रम नारायण) प्रभु ने अपने दो अंगभूत देवों केशव माधव के द्वारा महामल्ल मधु कैटभ का संहार कराकर चतुर्मास की विश्राम निद्रा के साथ यहाँ विश्राम किया- सूर्य सुता श्री यमुना महारानीजी ने अपने भाई यमराज के सत्कार में उनके साथ स्नान किया तथा महामान्य श्री बसुदेव जी ने अपने लाढ़ले पुत्रों श्री कृष्ण बालराम के घर आने पर पूर्व संकल्पित 10 हज़ार गोऐं माथुर ब्राह्मणों को दान में दीं । वे यहीं यादवों की कुकुरपुरी (ककोरन) में कंस के कारागार में बन्द रहे थे अस्तु यहीं समीप में कारामहल नाम की प्राचीन काराग्रह स्थली में श्रीकृष्ण के जन्म स्थान की स्थली है । जिसे लोग आज भी नहीं जानते ।
                    काल पुरूष का दान- विश्रान्त के महादानों के संदर्भ में काल पुरूष दान की प्राचीन चर्चा है । दक्षिण देश का राजा गौथमां यह दान करने सुवर्ण निर्मित काल पुरूष मूर्ति को लेकर मथुरा आया बात बहुत पुरानी है । इतिहास विमर्ष से ज्ञात हुआ है कि यह 170 विक्रम संवत में हुआ । तब गोदावरी तट की काकुलमपुरी और दक्षिण पैंठण में सात वाहन (शालि वाहन) बंशी गौत्तमीपुत्र, शातकर्णी का विशाल साम्राज्य था । उसके लाढ़ले राजकुमार वाशिष्ठीपुत्र पुलुमायी को आसाध्यरोग लगा दक्षिणी पंडितों ने उसे काल ग्रास योग बताया और उसका उपाय एकमात्र काल पुरूष का दान ही ऐसा निश्चित किया । तब 21 मन सुवर्ण की रत्नों से जड़ी काल पुरूष की मूर्ति बनवाई, गयी, और पंडितों ने उसमें विधिवत काल पुरूष की प्राण प्रतिष्ठा की ।
                    प्रथम यह काल पुरूष काशी ले जाया गया- एक महीने तक वह भयानक दुर्जय मूर्ति काशी के गंगा तट पर खड़ी रही- कोई ब्राह्मण उसका दान न ले सका । लोग दूर से ही उसका कराल भयोत्पादक रूप देखकर कांप उठते थे तथा जो सामने आकर आँख मिलाता वह मूर्छित होकर प्राण हीन हो जाता था । तब काशी से यह महाकाल मथुरा लाया गया उस समय मथुरा के माथुर ब्राह्मणों के तप तेज की सारे देश में प्रसिद्धि थी । महाराज गौत्तमीपुत्र ने कहा- 'ब्राह्मणों के ब्रह्मतेज की आज कठिन परिक्षा है' । 15 दिवस यहाँ भी किसी का इस दान को लेने का साहस नहीं हुआ, तब माथुरों ने बिचार किया-'मथुरा की बात जाती है, इस समय सिद्धपति गुरु को किसी तरह लाना चाहिये- उन्होंने 24 गायत्री मंत्र के कठिन अनुष्ठान किये हैं ।' बहुत प्रयत्नों के बाद किसी तरह वे महात्मा पधारे । उन्होंने राज से संकल्प लिया और गायत्री मंत्र से प्रथम बार जल छिड़का तो मूर्ति का रंग श्याम पड़ गया-दूसरी बार में काल पुरूष का सीस नीचे झुक गया और तीसरे मार्जन में उसके खंड खंड होकर बिखर गये । राजा और दर्शक लोग चकित रह गये और भारी जय जय कार होने लगी । माथुर मुकुट मणि धौम्य गोत्री श्री सिद्धपतिजी ने यमुना जल से मूर्ति खण्डों को धुलवाया और उससे 3 महासंभार युक्त गायत्री माता के अनुष्ठान गायत्री तीर्थ (गायत्री टीला) पर किये । इसी स्थान पर पीछे तपस्वी रूप बूटी सिद्ध ने गायत्री मंत्र सिद्ध किया । यह स्थान अभी भी माथुरों की सेवा साधना के अन्तर्गत है ।
                    1584 वि0 में उदयपुर चित्तोड़ के राना सांगा (संग्रामसिंह) ने बावर की मुग़ल दासता से मातृभूमि का उद्धार करने को स्वाधीनता प्रेमी राजपूत राजाओं का संघ मथुरा में बनाया, और एक बिशाल सेना संगठित कर फ़तेहपुर सीकरी के पास बावर से लोहा लिया । वास्तव में भारतीय स्वाधीनता का यह सबसे पहिला एतिहासिक अभियान था राणा सांगा ने तब मथुरा में विश्रांत पर प्रभूत द्रव्य दान किया और उससे विश्रान्त तीर्थ पर शोडष दल कमल चौकी, आरती की चौंतरी तथा ककइयाईष्टों की घाट की सीढियों एवं कुछ तिवारियाँ बनवाई, जिनके कारण विश्राम घाट का नाम सांगा नाम तीर्थ कहा जाने लगा । 1622 वि0 में जैपुर के महाराज मानसिंह ने अपने पिता बिहारीमल का तुला दान कराने को जैपुर का तुला द्वार बनवाया जो कालांतर में ढह गया । जैपुर के राजा कंसखार के समीप हाथीघोड़ा बारी लाल पत्थर की विशाल हवेली में रहते थे और बिहारी मल की रानी के सती होने का सतीबुर्ज निकट ही यमुना तट पर है ।
                    1671 वि0 में ओरछा नरेश बुन्देले बीरसिंह ने अपार सुवर्ण राशि (81 मन) से विश्रान्त पर तुला दान किया । इस सुवर्ण राशि को उनके तीर्थ पुरोहित गोविन्द जी ने ठुकरा दिया । किंबदंती है कि राज ने दान देते समय कुछ गर्वाक्ति पूर्ण कटु शब्द कहे जिससे पुरोहितजी रुष्ट हो गये और द्रव्य राशि का त्याग कर दिया । परन्तु एतिहासिक साक्षी कुछ और ही चित्र प्रस्तुत करती है । बीरसिंह बुंदेला शाहजादे जहाँगीर का कृपा पात्र था उसकी अकबर से नहीं बनती थी । अकबर का विश्वस्त बजीर अबुलफजल इन दोनों के प्रतिकूल बादशाह के कान भरता रहता था । इस काल में अबुलफजल दक्षिण से सुलतानी राज्यों को सम्हालता अपार सुवर्ण और रत्न राशि लेकर आगरा आ रहा था । जहाँगीर ने बुंदेले को संकेत दिया और राजा ने ग्वालियर केसमीप अबुलफजल की सैनिक टुकड़ी को खदेड़ कर बड़ी निर्दयता से बृद्ध अबुलफजल को कत्ल कर दिया । सारा अटूट सुवर्ण उसके हाथ लगा । धन लूट कर बुन्देला बहुत चिंतित हुआ- विद्वान धार्मिक शांत चित्त निरपराध विनय करते बुजुर्ग की हत्या उसे रह कर कचोट रही थी । नींद में अकसर उसे सिर नीचा किये कराहते अबुलफजल की रूह सामने दीखती थी । उसने वह द्रव्य अपने खजाने में नहीं रखा । पंडितों से पूछा तो उनने भी इस धन को 'सत्यानाशी कौड़ी' बताया और इसे किसी तीर्थ में लगादेने की सलाह दी । 
                    राजा तब सारा सोना लेकर सप्तपुरी शिरोमणि मथुरापुरी में आया । उसने तुलादान के प्रयास से सारा सोना दान कर अपने शरीर में व्याप्त बृद्ध हत्या को शमन करने का संकल्प लिया । गुरु गोविन्दचन्ददेव जी को यह जब ज्ञात हुआ कि यह 'हत्या की कौड़ी' है तो उन्होंने बहाना पाकर उस सारे द्रव्य को सहज ही ठुकरा दिया । तब राजा के उस द्रव्य को किसी चौबे ने भी नहीं लिया, और राजा ने केशव मन्दिर, बरसाना मंदिर, भानोखर, पान सरोवर (नन्द गाँव) गोपाल सागर समुद्र सागर नाम के बिशाल तालाब बनवाकर उस द्रव्य को ठिकाने लगाया । गोविदचन्दजी के इस त्याग की प्रशंसा में चतुर्वेदियों के कवियों ने कई कवितायें रची हैं ।
1908 वि0 में रीवाँ नरेश श्री रघुराजसिंह जी ने तुलाद्वार निर्माण कर रजत तुलादान किया । 1902 वि0 में शिंदे माधव राव (महादजी) रघुनाथ राव सीतावाई ने मुकट मंडल का मंदिर बनाया जिसके कागज परिशिष्ट में हैं । 1962 वि0 में काशी नरेश श्री प्रभु नारायण सिंहजी ने तुला द्वार बनाकर 3।। मन सुवर्ण से तुला दान किया तथा 1969 वि0 में उनकी पत्नी महारानी साहिबा ने अपना पृथक तुला द्वार बनवाकर तुला दान किया । इस तुला दान की मुहरैं समस्त चतुर्वेदियों को घर घर बाँटी गई ।

***********

गीत : आशियाना ... संजीव 'सलिल'

गीत :
आशियाना ...
संजीव 'सलिल'
*
धरा की शैया सुखद है,
नील नभ का आशियाना ...
संग लेकिन मनुज तेरे
कभी भी कुछ भी न जाना ...
*
जोड़ता तू फिर रहा है,
मोह-मद में घिर रहा है।
पुत्र है परब्रम्ह का पर
वासना में तिर रहा है।
पंक में पंकज सदृश रह-
सीख पगले मुस्कुराना ...
*
उग रहा है सूर्य नित प्रति,
चाँद संध्या खिल रहा है।
पालता है जो किसी को,
वह किसी से पल रहा है।
मिले उतना ही लिखा है-
जहाँ जिसका आब-दाना ...
*
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या??,
कौन जाता संग किसके?
संग सब आनंद में हों,
दर्द-विपदा देख खिसकें।
भावना भरमा रहीं मन,
कामना कर क्यों ठगाना?...
*
रहे जिसमें ढाई आखर,
खुशनुमा है वही बाखर।
सुन खन-खन सतत जो-
कौन है उससे बड़ा खर?
छोड़ पद-मद की सियासत
ओढ़ भगवा-पीत बाना ...
*
कब भरी है बोल गागर?,
रीतता क्या कभी सागर??
पाई जैसी त्याग वैसी
'सलिल' निर्मल श्वास चादर।
हंस उड़ चल बस वही तू
जहाँ है अंतिम ठिकाना ...
***** 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

संस्कृत बीज से अंग्रेज़ी शब्द डॉ. मधुसूदन

एक संस्कृत बीज से ७८ अंग्रेज़ी शब्द
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डॉ. मधुसूदन
अभागा(?) भारत

संसार का, कोई भी देश, भाषा की दृष्टि से भारत जैसा भाग्यवान नहीं है; पर साथ-साथ यह भी जान ले कि संसार का कोई भी देश भारत जैसा अभागा भी नहीं है, मानसिक गुलाम नहीं है, मतिभ्रमित नहीं है, हीन ग्रंथि से पीडित नहीं है, और पश्चिमी रंग में रँगा नहीं है। हम केवल आर्थिक दृष्टि से ही भ्रष्ट नहीं है, हमारी बुद्धि भी भ्रष्ट हो चुकी है। हम मूर्ख है, पागल है, इतने पागल कि, उसी पागलपन को बुद्धिमानी मानते हैं; और विवेकानंद जी के शब्दो में, उस पागलपन से छुडवाने के लिए हमें जो दवा पिलाने आता है, उसी को हम थप्पड मारते हैं।

जापान, इज़्राएल, चीन

जिसके पास कठिनातिकठिन चित्रमय भाषा है, वह जापान हमसे आगे है, जहाँ संसार भर के ३६ देशों से, अलग अलग भाषी लोग आकर बसे हैं, वह इसराएल भी, हम से आगे हैं। हिब्रु जानने से ही वहाँ नौकरी मिलती है। अब चीन भी हमसे आगे ही जा रहा है, आजकल ब्रह्मपुत्र पर बांध जो बना रहा है।
क्या भारत दुबारा परतंत्र हो जाएगा?
पर सच में, वैसे, अब भी हम स्वतंत्र कहाँ है?

Hebrew: If you speak it the jobs will come

Central Bureau of Statistics
According to data from the Central Bureau of Statistics, employment figures rise according to one’s level of Hebrew • 27 percent of the population struggle to fill out forms or write official letters in Hebrew • 36 languages spoken in Israel.

अंग्रेज़ी से अभिभूत गुलाम

अंग्रेज़ी से अभिभूत गुलाम भारतीयों की हीनता ग्रंथि पर प्रहार करने की दृष्टि से यह आलेख लिखा गया है। यदि यह विदित हो कि ७० से भी अधिक अंग्रेज़ी के शब्द संकृत की केवल एक ही धातु से निकले हैं, तो शायद अंगरेजी-भक्तों की हीनता की गठान ढीली होना प्रारंभ हो। ऐसी २०१२ धातु है। उनमें से, प्रायः ५०० से ७०० पर्याप्त उपयोगी है।

धातु स्था
कई धातु  हैं, जिनका संचार अंग्रेज़ी भाषा में सहज दिखता है। ऐसा ही अन्य युरोपीय भाषाओं में भी होगा  पर मुझे अन्य भाषाओं का ज्ञान विशेष नहीं है। आज एक ही धातु-बीज स्थालेते हैं, और उसका अंग्रेज़ी पर कितना गहरा प्रभाव है, वो देखने का प्रयास करते हैं।

अर्थ विस्तार की प्रक्रिया:

स्था तिष्ठति —-> का साधारण अर्थ है,खडा रहना–>एक जगह खडा रहने के लिए स्थिरता की आवश्यकता होने से,—> स्थिर रहना भी अर्थ में जुड गया। उसके लिए फिर परिश्रम पूर्वक–> डटे रहना भी अपेक्षित है। इसी प्रकार डटे रहने से आखिर तक—> बचे रहने का भी भाव जुड गया।—>प्रतीक्षा करने के लिए भी खडा रहना पडता है। साथ में—->विलम्ब करना तो साथ ही जुडा। ऐसे ही सोचते सोचते सभी अर्थ निष्पादित हो जाते हैं। उपर्युक्त १६ अर्थ तो संस्कृत के शब्दकोषों में ही दिए गए हैं।

स्था (१ उ. ) तिष्ठति-ते, के १६ अर्थ
१ खडा होना,
२ ठहरना, डटे रहना, बसना, रहना,
३ शेष बचना,
४ विलम्ब करना, प्रतीक्षा करना,
५ रूकना, उपरत होना, निश्चेष्ट होना,
६ एक ओर रह जाना
७ होना, विद्यमान होना, किसी भी स्थिति में होना
८ डटे रहना, आज्ञा मानना, अनुरूप होना
९. प्रतिबद्ध होना
१० निकट होना,
११ जीवित रहना, सांस लेना
१२ साथ देना, सहायता करना,
१३ आश्रित होना, निर्भर होना
१४ करना, अनुष्ठान करना, अपने आपको व्यस्त करना
१५ सहारा लेना, मध्यस्थ मान कर उसके पास जाना, मार्ग दर्शन पाना
१६ (सुरतालिंगन के लिए) प्रस्तुत करना, उपस्थित होना

अंग्रेज़ी शब्दों के उदाहरण
अंग्रेज़ी शब्दों के निम्न उदाहरण देखिए। 'स्थ' का 'st' बन चुका है। रोमन लिपि में 'थ' तो है नहींइस लिए उच्चारण 'स्थ' से 'स्ट' बना होगा, ऐसा तर्क असंगत नहीं है। निम्न प्रत्येक शब्द में ST देखिए, और उनके साथ उपर्युक्त १६ में से जुडा हुआ, कोई न कोई अर्थ देखिए।
(0१) Stable स्थिर
(0२) Stake=खूंटा जो स्थिर रहता है, अपनी जगह छोडता नहीं।
(0३) Stack =थप्पी, ढेर एक जगह पर लगाई जाती है।
(0४) Stage =मंच जो एक जगह पर स्थिर बनाया गया है।
(0५) Stability स्थिरता
(0६) Stackable = एक जगह पर ढेर, थप्पी, राशि.
(0७) Stagnancy= रुकाव, अटकाव, (स्थिरता से जुडा अर्थ)
(0८) Stagnate = एक जगह स्थिर रोक रखना।
(0९) Stageable =स्थित मंच पर मंचन योग्य
(१०)   stager= मंच पर अभिनय करने वाले।
(११)    Stabilize स्थिरीकरण
(१२)   Stand= एक जगह बनाया हुआ मंच,
(१३)   Stadium= एक जगह का, क्रीडांगण ,
(१४)   Stillroom= रसोई के साथ छोटा रसोई की सामग्री संग्रह करने का कक्ष।
(१५)   State= विशेष निश्चित भूमि (राज्य)
(१६)   Street= गली, जो विशेष स्थायी पता रखती है।
(१७)   Stand= स्थिर रूपमें सीधा खडा रहना। स्थापित होना, टिकना, एक स्थान पर खडा होना।
(१८) Standards= स्थापित शाश्वत आदर्श मापदंड
(१९) Staid स्थिर, गम्भीर,
mjhaveri@umassd.edu;

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

मगजपच्ची : हम - तुम संजीव 'सलिल'

मगजपच्ची :
हम - तुम

संजीव 'सलिल'

नवगीत: समय पर अहसान अपना... संजीव 'सलिल'

नवगीत:

समय पर अहसान अपना...

संजीव 'सलिल'
*
समय पर अहसान अपना
कर रहे पहचान,
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हम समय का मान करते,
युगों पल का ध्यान धरते.
नहीं असमय कुछ करें हम-
समय को भगवान करते..
अमिय हो या गरल- पीकर
जिए मर म्रियमाण.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हमीं जड़, चेतन हमीं हैं.
सुर-असुर केतन यहीं हैं..
कंत वह है, तंत हम हैं-
नियति की रेतन नहीं हैं.
गह न गहते, रह न रहते-
समय-सुत इंसान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
पीर हैं, बेपीर हैं हम,
हमीं चंचल-धीर हैं हम.
हम शिला-पग, तरें-तारें-
द्रौपदी के चीर हैं हम..
समय दीपक की शिखा हम
करें तम का पान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*

मुक्तिका: तुम क्या जानो ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

तुम क्या जानो ----

संजीव 'सलिल'

*
तुम क्या जानो कितना सुख है दर्दों की पहुनाई में.
नाम हुआ करता आशिक का गली-गली रुसवाई में..

उषा और संझा की लाली अनायास ही साथ मिली.
कली कमल की खिली-अधखिली नैनों में, अंगड़ाई में..

चने चबाते थे लोहे के, किन्तु न अब वे दाँत रहे.
कहे बुढ़ापा किससे क्या-क्या कर गुजरा तरुणाई में..

सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.
चैन रूह को मिलते देखा गजलों में, रूबाई में..

'सलिल' उजाला सभी चाहते, लेकिन वह खलता भी है.
तृषित पथिक को राहत मिलती अमराई - परछाँई में

***************
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com

अभिनव प्रयोग- उल्लाला मुक्तक: संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग-
उल्लाला मुक्तक:
संजीव 'सलिल'
*
उल्लाला है लहर सा,
किसी उनींदे शहर सा.
खुद को खुद दोहरा रहा-
दोपहरी के प्रहर सा.
*
झरते पीपल पात सा,
श्वेत कुमुदनी गात सा.
उल्लाला मन मोहता-
शरतचंद्र मय रात सा..
*
दीप तले अँधियार है,
ज्यों असार संसार है.
कोशिश प्रबल प्रहार है-
दीपशिखा उजियार है..
*
मौसम करवट बदलता,
ज्यों गुमसुम दिल मचलता.
प्रेमी की आहट सुने -
चुप प्रेयसी की विकलता..
*
दिल ने करी गुहार है,
दिल ने सुनी पुकार है.
दिल पर दिलकश वार या-
दिलवर की मनुहार है..
*
शीत सिसकती जा रही,
ग्रीष्म ठिठकती आ रही.
मन ही मन में नवोढ़ा-
संक्रांति कुछ गा रही..
*
श्वास-आस रसधार है,
हर प्रयास गुंजार है.
भ्रमरों की गुन्जार पर-
तितली हुई निसार है..
*
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
वह प्रभु तारणहार है,
उस पर जग बलिहार है.
वह थामे पतवार है.
करता भव से पार है..
*

उल्लाला मुक्तिका: दिल पर दिल बलिहार है -संजीव 'सलिल'

 
उल्लाला मुक्तिका:
दिल पर दिल बलिहार है
संजीव 'सलिल'
*
दिल पर दिल बलिहार है,
हर सूं नवल निखार है..

प्यार चुकाया है नगद,
नफरत रखी उधार है..

कहीं हार में जीत है,
कहीं जीत में हार है..

आसों ने पल-पल किया
साँसों का सिंगार है..

सपना जीवन-ज्योत है,
अपनापन अंगार है..

कलशों से जाकर कहो,
जीवन गर्द-गुबार है..

स्नेह-'सलिल' कब थम सका,
बना नर्मदा धार है..

******

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

उल्लाला गीत: जीवन सुख का धाम है संजीव 'सलिल'


अभिनव प्रयोग-
उल्लाला गीत:
जीवन सुख का धाम है
संजीव 'सलिल'

*
जीवन सुख का धाम है,
ऊषा-साँझ ललाम है.
कभी छाँह शीतल रहा-
कभी धूप अविराम है...*
दर्पण निर्मल नीर सा,
वारिद, गगन, समीर सा,
प्रेमी युवा अधीर सा-
हर्ष, उदासी, पीर सा.
हरी का नाम अनाम है
जीवन सुख का धाम है...
*
बाँका राँझा-हीर सा,
बुद्ध-सुजाता-खीर सा,
हर उर-वेधी तीर सा-
बृज के चपल अहीर सा.
अनुरागी निष्काम है
जीवन सुख का धाम है...
*
वागी आलमगीर सा,
तुलसी की मंजीर सा,
संयम की प्राचीर सा-
राई, फाग, कबीर सा.
स्नेह-'सलिल' गुमनाम है
जीवन सुख का धाम है...
***

सोमवार, 28 जनवरी 2013

छंद सलिला: उल्लाला संजीव 'सलिल'

छंद सलिला: 
उल्लाला 
संजीव 'सलिल'
*
उल्लाला हिंदी छंद शास्त्र का पुरातन छंद है। वीर गाथा काल में उल्लाला तथा रोल को मिलकर छप्पय छंद की रचना की जाने से इसकी प्राचीनता प्रमाणित है। उल्लाला छंद को स्वतंत्र रूप से कम ही रचा गया है। अधिकांशतः छप्पय में रोला के 4  चरणों के पश्चात् उल्लाला के 2 दल (पद या पंक्ति) रचे जाते हैं। प्राकृत पैन्गलम तथा अन्य ग्रंथों में उल्लाला का उल्लेख छप्पय के अंतर्गत ही है।
जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' रचित छंद प्रभाकर तथा ॐप्रकाश 'ॐकार' रचित छंद क्षीरधि के अनुसार उल्लाल तथा उल्लाला दो अलग-अलग छंद हैं। नारायण दास लिखित हिंदी छन्दोलक्षण में इन्हें उल्लाला के 2 रूप कहा गया है। उल्लाला 13-13 मात्राओं के 2 सम चरणों का छंद है। उल्लाल 15-13 मात्राओं का विषम चरणी छंद है जिसे हेमचंद्राचार्य ने 'कर्पूर' नाम से वर्णित किया है। डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल इन्हें एक छंद के दो भेद मानते हैं। हम इनका अध्ययन अलग-अलग ही करेंगे।
'भानु' के अनुसार:
उल्लाला तेरा ला, दश्नंतर इक लघु ला।
सेवहु नित हरि हर रण, गुण गण गावहु हो रण।।
अर्थात उल्लाला में 13 कलाएं (मात्राएँ) होती हैं दस मात्राओं के अंतर पर ( अर्थात 11 वीं मात्रा) एक लघु होना अच्छा है।

दोहा के 4 विषम चरणों से उल्लाला छंद बनता है। यह 13-13 मात्राओं का सम पाद मात्रिक छन्द है जिसके चरणान्त में यति है। सम चरणान्त में सम तुकांतता आवश्यक है। विषम चरण के अंत में ऐसा बंधन नहीं है। शेष नियम दोहा के समान हैं। इसका मात्रा विभाजन 8+3+2 है अंत में 1 गुरु या 2 लघु का विधान है।
सारतः उल्लाला के लक्षण निम्न हैं-
1. 2 पदों में तेरह-तेरह मात्राओं के 4 चरण
2. सभी चरणों में ग्यारहवीं मात्रा लघु
3. चरण के अंत में यति (विराम) अर्थात सम तथा विषम चरण को एक शब्द से न जोड़ा जाए।
4. चरणान्त में एक गुरु या 2 लघु हों।
5. सम चरणों (2, 4) के अंत में समान तुक हो।
6. सामान्यतः सम चरणों के अंत एक जैसी मात्रा तथा विषम चरणों के अंत में एक सी मात्रा हो। अपवाद स्वरुप प्रथम पद के दोनों चरणों में एक जैसी तथा दूसरे पद के दोनों चरणों में
 उदाहरण :
1.नारायण दास वैष्णव
रे मन हरि भज विष तजि, सजि सत संगति रै दिनु।
काटत भव के फन् को, और न कोऊ रा बिनु।।
2. घनानंद
प्रेम नेम हित चतुई, जे न बिचारतु नेकु मन।
सपनेहू न विलम्बियै, छिन तिन ढिग आनंघन।
3. ॐ प्रकाश बरसैंया 'ॐकार'
राष्ट्र हितैषी धन् हैं, निर्वाहा औचित् को।
नमन करूँ उनको दा, उनके शुचि साहित् को।।
प्रथम चरण 14 मात्राएँ,
4.

संजीव 'सलिल'

काव्य कुञ्ज: कितना - क्या एस. एन. शर्मा 'कमल'

काव्य कुञ्ज:
कितना  - क्याएस. एन. शर्मा 'कमल'
*

किसको कितनी ममता बाँटी
कितना मौन मुखर कर  पाया
कितने मिले सफ़र में साथी
कितना किसने साथ निभाया 
लेखाजोखा क्या अतीत का
क्या खोया कितना पाया

जीवन  यात्रा के समीकरण
कितने सुलझे कितने उलझे
कितनी बार कहाँ पर अटका
रही न गिनती याद मुझे
जब  आँगन में भीड़ लगी
कितना प्यार किसे  दे पाया

कितने सपने रहे कुवाँरे 
कितने विधुर बने जो  ब्याहे
कितनी साँसें  रहीं अधूरी
कितनी बीत  गईं अनचाहे 
उमर ढल गई शाम हो गई
उलझी गाँठ न सुलझा पाया

सजी  रह गई  द्वार अल्पना 
पल छिन पागल मन भरमाये 
रही जोहती बाट  तुम्हारी
लेकिन प्रीतम तुम ना आये
प्राण-पखेरू उड़े  छोड़  सब
धरी रह गई माया   काया 

जितनी साँसें ले कर  आया 
उन्हें  सजा लूं  गीतों में भर
मुझे  उठा लेना जग-माली
पीड़ा-रहित क्षणों में आ  कर
जग की रीति नीति ने अबतक
मन को  बहुतै नाच नचाया


*****

हास्य पद: जाको प्रिय न घूस-घोटाला संजीव 'सलिल'

हास्य पद:

जाको प्रिय न घूस-घोटाला


संजीव 'सलिल'


*
जाको प्रिय न घूस-घोटाला...
वाको तजो एक ही पल में, मातु, पिता, सुत, साला.
ईमां की नर्मदा त्यागकर,  न्हाओ रिश्वत नाला..
नहीं चूकियो कोऊ औसर, कहियो लाला ला-ला.
शक्कर, चारा, तोप, खाद हर सौदा करियो काला..
नेता, अफसर, व्यापारी, वकील, संत वह आला.
जिसने लियो डकार रुपैया, डाल सत्य पर ताला..
'रिश्वतरत्न' गिनी-बुक में भी नाम दर्ज कर डाला.
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, मठ तज, शरण देत मधुशाला..
वही सफल जिसने हक छीना,भुला फ़र्ज़ को टाला.
सत्ता खातिर गिरगिट बन, नित रहो बदलते पाला..
वह गर्दभ भी शेर कहाता बिल्ली जिसकी खाला.
अख़बारों में चित्र छपा, नित करके गड़बड़ झाला..
निकट चुनाव, बाँट बन नेता फरसा, लाठी, भाला.
हाथ ताप झुलसा पड़ोस का घर धधकाकर ज्वाला..
सौ चूहे खा हज यात्रा कर, हाथ थाम ले माला.
बेईमानी ईमान से कर, 'सलिल' पान कर हाला..
है आराम ही राम, मिले जब चैन से बैठा-ठाला.
परमानंद तभी पाये जब 'सलिल' हाथ ले प्याला..

                           ****************
(महाकवि तुलसीदास से क्षमाप्रार्थना सहित)

मुक्तिका: है तो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
है तो...
संजीव 'सलिल'
*
गर्दन दबा दें अगर दर्द है तो।
आगी लगा दें अगर सर्द है तो।।

हाकिम से शिकवा न कोई शिकायत
गले से लगा लें गो बेदर्द है तो।।

यही है इनायत न दिल है अकेला
बेदिल भले पर कोई फर्द है तो।।

यादों के चेहरे भी झाड़ो बुहारो
तुम-हम  नहीं पर यहाँ गर्द है तो।।

यूँ मुँह न मोड़ो, न नाते ही तोड़ो,
गुलाबी न चेहरा, मगर जर्द है तो।।

गर्मी दिलों की न दिल तक रहेगी
मौसम मिलन का रहे सर्द है तो।।

गैरों के आगे भले हों नुमाया
अपनों से हमको 'सलिल' पर्द है तो।।
***
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com



रविवार, 27 जनवरी 2013

कृति-चर्चा काल के गाल पर ढुलका आँसू मुमताजमहल संजीव वर्मा 'सलिल'

book review: mumtaj mahal, novel, writer- dr. suresh verma, critic- sanjiv verma 'salil'

कृति-चर्चा
काल के गाल पर ढुलका आँसू मुमताजमहल
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(विवरण: मुमताजमहल, उपन्यास, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, डिमाई आकार, पृष्ठ 350, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, मूल्य 150 रु., प्रकाशक: वाणी प्रकाशन दिल्ली।)
*
                         हिंदी-गद्य लेखन का श्री गणेश संवत 1855 के आसपास इंशा अल्ला खां रचित 'रानी केतकी  की कहानी' से तथा एतिहासिक प्रसंगों पर लेखन का आरम्भ भारतेंदु हरिश्चन्द्र द्वारा (संवत 1907-संवत1941) द्वारा 'कश्मीर कुसुम' तथा 'बादशाह दर्पण' से हुआ। इसके पूर्व अधिकतर लेखन धार्मिक अथवा साहित्यिक प्रसंगों पर केन्द्रित रहा। ऐतिहासिक चरित्रों में शासकों को अधिकतर लेखकों ने कृतियों का केंद्र बनाया। विगत 161 वर्षों के कालखंड में रचनाकारों ने माँ सरस्वती के साहित्य-कोषागार को असंख्य ग्रन्थ-रत्नों से समृद्ध किया। आरंभ से ही संस्कृत, प्राकृत, आंचलिक बोलिओँ तथा अरबी-फ़ारसी की चुनौतियाँ झेलती रही हिंदी क्रमशः अपने मार्ग पर बढ़ती गयी और आज विश्व-वाणी बनने की दावेदार है।
                    इस काल-खंड में अनेक लोकप्रिय सत्ताधारी औपन्यासिक कृतियों के नायक बने किन्तु जनमानस में प्रतिष्ठित मुमताज महल अदेखी रह गयीं। सन 1978 में श्री हरिप्रसाद थपलियाल  तथा  सन 2011 में सनातन सलिला नर्मदा के तीर पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर के समर्पित हिंदीविद, निष्णात प्राध्यापक, निपुण नाटककार, कुशल कहानीकार डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने औपन्यासिक कृतियों का सर्जन कर मुमताज के व्यक्तित्व, कृतित्व तथा अवदान का मूल्यांकन किया। डॉ. वर्मा अपनी प्रथम औपन्यासिक कृति की नायिका के रूप में मुमताज़ के चयन का औचित्य उसके दुर्लभ गुणों ठण्ड की सुबह की खिली धूप सा दमकता चेहरा, बातचीत का अनोखा गुलरेज़ अंदाज़, फिरदौस की जुही सी मसीही मुस्कान, माँ की सजीव गुडिया सी मख्खनी काया, सबकी फ़िक्र करने वाले मिजाज़ और दुर्लभ गुणों से संवलित व्यक्तित्व कहकर  सिद्ध करते हैं। उनके अनुसार ताजमहल जैसी इमारत उसी के लिए बन सकती है जो 'डिजर्व' करती हो... आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही यकीन कर पाएंगी कि  इन गुणों से आरास्ता कोई एक बदीउज्ज़मां खानम हिन्दुस्तान की सरजमीं पर जलवानशीं रहीं होंगी...उसने अपनी सेवा और सूझ-बूझ, सौजन्य और समर्पण, सहस और संकल्प द्वारा प्रमाणित किया की पुरुष के लिए स्त्री से बढ़कर कोई औषधि नहीं है।संभवतः मुमताज़ की असाधारणता का अनुमान न कर सकना ही उस पर कृति न रचे जाने का कारण हो।
                        हिंदी साहित्य भाव पक्ष तथा विचार पक्ष की प्रमुखता के आधार पर लक्ष्य ग्रंथों तथा लक्षण ग्रंथों में सुवर्गीकृत किया जाता है।  लक्ष्य ग्रन्थ दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य में तथा लक्षण ग्रन्थ आलोचना और साहित्य शास्त्र में विभाजित किये जाते हैं। दृश्य काव्य में रूपक, उपरूपक अर्थात नाटक और श्रव्य काव्य गद्य, पद्य व चम्पू में बांटे गए हैं। पद्य में महाकाव्य, खंडकाव्य व एकार्थ काव्य तथा गद्य में उपन्यास, कहानी, निबन्ध, जीवनी आदि समाहित किये गए हैं।  यथार्थ, कल्पना, कुतूहल, भावना तथा विचार के पंचतत्वों से बनी कथा ही उपन्यास का मूल होती है। उपन्यास जीवन की प्रतिकृति होता है। उपन्यास की कथावस्तु का आधार मानव जीवन और उसके क्रिया कलाप ही होते हैं। वातावरण की पृष्ठभूमि पात्रों के चरित्र का आधार होती है। पाश्चात्य समालोचकों ने कथावस्तु, संवाद, वातावरण, शैली व  उद्देश्य उपन्यास के  तत्व कहे हैं।
 कथावस्तु:
                        प्रो.वर्मा ने ''art lies in concealment'' अर्थात 'कला छिपाव में ही निहित है' के सिद्धांतानुसार मुमताज़ को नायिका ठीक ही चुना है कि उसके विषय में जितना ज्ञात है उससे अधिक अज्ञात है। इस अज्ञात को कल्पना से जानने की स्वतंत्रता है जबकि जिसके विषय में सब ज्ञात हो वहाँ कल्पना से काम लेने की स्वतंत्रता नहीं होती। मानव मन की प्रत्येक भावना को सत्य की कसौटी पर कस सकना किसी उपन्यासकार के लिए संभव नहीं है और न यह ही संभव है कि मानव मन की हर संवेदना की अनुभूति रचनाकार कर सके। कई बार दुहराए जा चुके चरित्रों के संबंध में कुछ नया और मौलिक कह पाना कठिन होता है तथा मान्य धारणा से हटते ही प्रामाणिकता का प्रश्न खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति में उपन्यासकार के लिए मन के तारों को झनझनाने वाले चरित्र का चयन करना उचित होता है। डॉ. वर्मा ने मुमताज़ को केंद्र में रखकर उसके अल्पज्ञात गुणों के ताने-बाने से कथावस्तु को रोचक बनाया है। नूरजहाँ के प्रति जहाँगीर के दुर्निवार आकर्षण, मुमताज़ के निकाह, सलीम के निरंतर युद्धों और यात्राओं, सियासी षड्यंत्रों और सत्ताप्रेम, रिश्तों के बनने और टूटने की विडंबना, लगातार प्रसव, गिरता स्वास्थ्य व अयाचित अंत... कथावस्तु का निरंतर बदलता घटनाक्रम पाठक को बांधे रखने में सफल है।
                         कथा वस्तु के दो अंग मूल कथावस्तु तथा प्रासंगिक कथावस्तु होते हैं। आलोच्य कृति में मुग़ल साम्राज्ञी मुमताजमहल की कथा मूल है जिसके विकास के लिए खुसरो द्वारा विद्रोह, नूरजहाँ के प्रति जहाँगीर की आसक्ति, खुर्रम की सगाई-विवाह, युद्ध, विद्रोह,  समर्पण तथा तख़्तपोशी, शहरयार, मेवाड़ युद्ध,  दक्खन की समस्या, खानखाना, दरबार के षड्यंत्र, महावत खां का पराक्रम और विद्रोह आदि प्रसंगों का सहारा उपन्यासकार ने यथास्थान लिया है। इन प्रसंगों और कारकों का एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी के रूप में न होकर सहायक के रूप में होना उपन्यासकार की कथा  प्रसंगों पर पकड़ और विषय में गहन पैठ का प्रमाण है।
चरित्र चित्रण:
                         उपन्यासकार चरित्रों का विकास सत्य और कल्पना के मिश्रण की नीव पर करता है। सत्य प्रतीत होती कल्पना और काल्पनिक अनुभव होता सत्य चरित्रों में इंद्रधनुषी रंग भरकर उन्हें चित्ताकर्षक बनाते हैं। इस तथ्य से भलीभांति अवगत डॉ. वर्मा ने श्रेयत्व के साथ प्रेयत्व का संगुफन  इस तरह किया है कि  वह सायास किया गया प्रतीत नहीं होता। मुमताज़, शाहजहाँ, जहाँगीर, नूरजहाँ, औरंगजेब, महाबत खां आदि प्रमुख  चरित्र  सहृदयतापूर्वक चित्रित किये गए हैं। औरंगजेब को छोड़कर सभी चरित्र सकारात्मकता लिए हैं। मुमताज़ का चरित्र रूपवती होने पर भी गर्व न करने, पिता-पुत्र के बीच की दूरी को कम करने, पति को प्रेरित कर सफलता के पथ पर ले जाने, स्वयं तकलीफ सहकर भी युद्धों और यात्राओं में लगातार साथ देने, पराजय के बाद क्षमा-प्रार्थना का दाँव की तरह उपयोग, सत्ता मिलने पर भी विनम्रता और इंसानियत तथा वैद्य की चेतावनी को अनसुना कर पति के लक्ष्य को पाने के लिए आत्माहुति से न केवल आकर्षक अपितु अनुकरणीय भी बना है। शेष चरित्रों पर सत्ता-मद हावी है। गियासबेग, अबुलहसन, महाबत खां आदि के चरित्र राज्यभक्ति से सराबोर हैं। एक महत्वपूर्ण चरित्र सतीउननिसा का है, यह मुमताज की परिचारिका भी है बाल मित्र भी और सलाहकार भी। उसकी स्वामिभक्ति तथा समझ कथा विकास में सहायक है।
                          चरित्र चित्रण की शब्दचित्र (sketch) प्रणाली के अंतर्गत उपन्यासकार पात्रों के शारीरिक गठन, वर्ण, प्रभाव, रहन-सहन, गुण-दोष आदि का वर्णन करता है जबकि प्रत्यक्ष या विश्लेषणात्मक (direct / analytical) प्रणाली में  पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर पाठक के समक्ष गुण-दोषों को बिना कहे उद्घाटित होने देता है। परोक्ष या नाटकीय प्रणाली के अंतर्गत उपन्यासकार पात्र की सृष्टि कर नेपथ्य में चला जाता है तथा पात्र स्वयमेव वार्तालापों, क्रिया-कलापों और विचारों से चरित्र के ताने-बाने बुनते जाते हैं। डॉ. वर्मा ने तीनों विधियों का यथावश्यक प्रसंगानुकूल बखूबी प्रयोग किया है। अपेक्षाकृत कम मुखर व  अति समर्पित मुमताज़, उसकी सखी सतीउननिसा के सन्दर्भ में शब्द चित्र प्रणाली, नूरजहाँ के चरित्र चित्रण में प्रत्यक्ष प्रणाली तथा जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि के चरित्र चित्रण में परोक्ष प्रणाली का प्रयोग ठीक ही किया है।                               
                          उपन्यास का सम्बन्ध जीवन से होता है। उसके पात्र पाठक को अपने चारों ओर के व्यक्तित्वों से मेल खाते प्रतीत हों तो वह पात्रों के सुख-दुःख के साथ तादात्म्य स्थापित कर पाता है। पात्रों के चरित्रों को कम से कम शब्दों में कथा प्रसंग के विकास हेतु निखारने-उभरने में ही उपन्यासकार की कला है। विश्लेषणात्मक पद्धति में उपन्यासकार पात्रों के भावों, विचारों और मानसिक-शारीरिक अवस्थाओं का विश्लेषण कर पाठक को कथावस्तु के साथ जोड़ता है। डॉ. वर्मा ने कहीं-कहीं प्रसंग की आवश्यकता के अनुसार यथासंभव न्यूनतम शब्दों में पात्रों की मनःस्थितियों का वर्णन कर कथ्य की रोचकता बनाये रखने में सफलता प्राप्त की है। इन स्थलों में उपन्यासकार द्वारा प्रयुक्त भाषा खडी हिंदी है तथा शब्द चयन संस्कृतनिष्ठ है। नाटकीय पद्धति का अनुसरण करते हुए कृतिकार के मानस पुत्र अर्थात उपन्यास के पात्र अधिकांश स्थलों पर अपनी शिक्षा तथा परिवेश के अनुकूल अरबी-फ़ारसी के शब्द से युक्त उर्दू का प्रयोग करते हैं। ये पात्र अपने क्रिया कलापों तथा संवादों से घटनाक्रम के विकास में न केवल सहायक होते हैं उसे रोचक बनाये रखते हुए पूर्णता तक पहुंचाते हैं। सामान्यतः पात्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी पात्र नायकत्व का श्रेय पाता है।
पात्र : 
                          प्रस्तुत कृति में आदि से सर्वाधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी चरित शाहजहाँ का है किन्तु वह कृति-नायक नहीं है जबकि कृति का केंद्र मुमताज आरंभ में निरीह बालिका तथा अदना वधु मात्र है। वह कहीं भी स्वतंत्र निर्णय लेकर क्रियान्वित करती नहीं दिखती, अपितु पति की अनुगामिनी मात्र है। अतः उसे कृति-नायिका कहने पर प्रश्न उठ सकता है। उपन्यासकार संभवतः इसीलिए उसके कथा प्रवेश से पूर्व और अंत के बाद के प्रसंग जोड़ता है ताकि उसके प्रभाव का आकलन किया जा सके। उपन्यासकार ने एतिहासिक घटनाक्रम के अनुसार पात्रों को स्वयमेव विकसित होने दिया है। कहीं किसी पात्र पर महत्ता आरोपित नहीं की है। जहाँगीर, नूरजहाँ, शाहजहाँ और अंत में औरंगजेब के चरित्र उभरते गए हैं किन्तु मुमताज़ का चरित्र कहीं भी सर्वाधिक प्रभावी नहीं दिखता। वह निर्णायक न होने पर भी निर्णय के मूर्त रूप लेने में सहायक होता है।एक ओर नूरजहाँ सम्राट जहाँगीर के नाम पर शासन करती है दूसरी ओर उसकी मानस सृष्टि मुमताज़ पृष्ठभूमि में रहकर शाहजहाँ को आवश्यकतानुसार वांछित परामर्श दे-देकर सम्राट  के तख़्त तक पहुँचाती है। वह पति के प्रति इतनी समर्पित है कि अस्वस्थ्य होने तथा वैद्य द्वारा प्राणों पर संकट होने की चेतावनी दिए जाने पर भी पति की कामना पूर्तिकर बार-बार मातृत्व धारण करती है। शारीरिक कमजोरी को छिपाकर पति के साथ निरंतर युद्ध-यात्राओं पर जाती है। भोजन में पानी की तरह सर्वत्र रहकर कहीं भी न होने प्रतीति करता यह चरित्र पाठक को उसके अपने घर में माता या पत्नी की तरह स्वाभाविक प्रतीत होता है। 
                           चेतन (concious), अचेतन (un concious) तथा अवचेतन (sub concious) के अंतर्द्वंद चरित्रों के टकराव तथा उत्थान-पतन के कारण बनते हैं। कथावस्तु  पात्रों के चरित्रों के अनुकूल विकसित होती है। समीक्ष्य कृति के चरित्रों में दरबारियों, परिवारजनों तथा अनुचरों के चरित्र  स्थिर (static) हैं। वे आदेश या परंपरा के वाहक / पालक मात्र हैं तथा किसी परिवर्तन के कारक नहीं होते। जहाँगीर, नूरजहाँ, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि चरित गतिशील (dynamic) हैं। वे अपना रास्ता खुद बनाते हैं, अपने 'स्व' से  परिचालित होते हैं। उपन्यास नायिका मुमताज़ अपवाद है। वह स्थिर होते हुए भी गतिशील है तथा गतिशील होते हुए भी स्वार्थी या आत्मकेंद्रित न होकर संयमित है।
संवाद:
                          कथावस्तु के विकास हेतु पात्रों के वार्तालाप संवादों के माध्यम से ही होते हैं। संवादों का कार्य 1. कथावस्तु का विकास, 2. पात्रों के व्यक्तित्व का निखार तथा 3. उपन्यासकार के विचारों या आदर्शों का अभिव्यक्तिकरण होता है। मानव अपनी विचार तथा अभिव्यक्ति क्षमता के कारण ही अन्य प्राणियों से अधिक उन्नत व विकसित है। वैचारिक साम्य प्रेम व सहयोग तथा विचार वैभिन्न्य संघर्ष व द्वेष का कारक होता है। जहाँगीर तथा शाहजहाँ का विचार वैभिन्न्य शाहजहाँ तथा मुमताज़ महल का विचार साम्य,  नूरजहाँ तथा औरंगजेब का स्वविचार को सर्वोपरि रक्कने का स्वभाव उपन्यास के घटनाक्रम को गति देता है। उपन्यासकार समान विचार के संवादों के माध्यम से नव घटनाक्रम की तथा विरोधी विचार के संवादों के माध्यम से द्वेष की सृष्टि करता है। डॉ. वर्मा का विषयवस्तु के गहन अध्ययन, पात्रों  की मानसिकता की सटीक अनुभूति, वातावरण एवं घटनाक्रम की प्रमाणिक जानकारी से संवादों को प्रभावी  है। वे संवादों को अनावश्यक विस्तार नहीं देते। जहाँगीर-नूरजहाँ के आरंभिक टकराव, नूरजहाँ के समर्पण, नूरजहाँ-शाहजहाँ के बीच की दूरी, शाहजहाँ-मुमताजमहल  के नैकट्य तथा कथाक्रम के महत्वपूर्ण मोड़ों को संवाद उभारते हैं। डॉ .वृन्दावन लाल वर्मा, अमृत लाल नागर तथा भगवती चरण वर्मा की तरह लंबे अख्यन डॉ. सुरेश वर्मा की प्राथमिकता नहीं हैं। वे कम शब्दों में मन को स्पर्श करनेवाले मार्मिक संवाद रचते हैं, मानो घटनाओं के चश्मदीद गवाह हों :
                           मेहरुन्निसा को लगा वातावरण भारी हो गया है। उसे हल्का करने के मकसद से कहा: 'आप लोग मेरी तारीफ भी करते हैं और धिक्कारते भी हैं।'
                          अबुलहसन ने उसे उसी के सिक्के में जवाब देते हुए कहा: 'तू बहुत अच्छी है कि महारानी बनने लायक है। तू बहुत ख़राब है कि महारानी बनना नहीं चाहती।'
भाषा: 
                           पात्रों व घटनाओं के अनुकूल भाषा संवादों को प्रभावी और जीवंत बनाती है। जयशंकर  प्रसाद, राहुल सांकृत्यायन आदि की शुद्ध साहित्यिक भाषा की अपेक्षा प्रेमचंद की जन सामान्य में बोली जानेवाली उर्दू शब्दों से युक्त भाषा डॉ. वर्मा के अधिक निकट है किन्तु वे अभिजात्य वर्ग में बोले जानेवाली शब्दावली का प्रयोग करते हैं। संभवतः इसका कारण उपन्यास के कथानक का शाही परिवार से जुड़ा होना है। डॉ. वर्मा संस्कृत शब्दों की प्रांजलता-माधुर्य तथा अरबी-फ़ारसी के शब्दों की  नजाकत-नफासत  का  गंगो- जमुनी मिश्रण इस खूबसूरती से पेश करते हैं कि पाठक आनंद में डूब जाता है। यथा: तदुपरांत सम्राट खड़ा हुआ। उसने सभासदों के मध्य मंद स्वर में घोषणा की- ''माबदौलत माह्ताबेजहाँ बेगम मेहरुन्निसा के लिए 'मलिका-ए-हिंदुस्तान' का लकब करार देते हैं तथा उन्हें बाइज्ज़त 'नूर-ए-महल' का ख़िताब अता करते हैं।'' सभाकक्ष देर तक 'मरहबा मरहबा' के नारों से गूंजता रहा।
                    अंतर्सौन्दर्य, अस्तमित, आज्ञानुवर्तन, पर्यंक, वातास, पुष्पांगना, पश्चद्वार, जयोच्चार, प्रातिका, रक्ताभ, आत्मविमुग्धता आदि संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ वफ़ाआश्ना, अदलो-उसूल, निस्बानियत, सितमगिर्वीदा, बूते-माहविश, नाकदखुदाई, साफ़-शफ्फाक, अदलपर्वर, दिलबस्तगी, खुद सिताई, खुद शिनासी आदि लफ्जों का मेल इतनी सहजता-सरलता और अपनेपन से हुआ है कि वे गलबहियाँ डाले गपियाते प्रतीत होते हैं। इन शब्दों के सटीक प्रयोग से उपन्यासकार की शब्द सामर्थ्य और बहु भाषाई पकड़ की प्रतीति होती है, साथ ही पाठक के शब्द-भंडार में भी वृद्धि होती है। 
                           हिंदी के दिग्गज विद्वान डॉ. वर्मा शब्द युगलों के प्रयोग में दक्ष हों,  यह स्वाभाविक है। ऐसे प्रयोग उपन्यास की भाषा की आलंकारिक सज्जा कर उसे रुचिकर बनाते हैं। यथा: मुख-मंडल, सरापा सौंदर्य, प्रथम प्रशंसा, गुलाक गौफे, मनमाफ़िक, मादक मुस्कान, मौके के मुताबिक, खोज-खबर, कामना के कफ़स की कैद, मुक़र्रर मुक़ाम, जंगजू जोधा, बिदाई की बेला, मन की मंजूषा, दुल्हिन के दिल, तौर-तरीकों, निको नाम, हिस्ने हसीन, पाक परवरदिगार, साजो-सामान, दरवाजे-दरीचे, रंग-रंजित, रूप-राशि, बीचों-बीच, गहमा-गहमी, नवोढ़ा नायिका, अतुलनीय अपरूप, मौके के मुताबिक़, अवश अनुभव, सिकुड़ी-सिमटी, नफ़े-नुकसान, तराजू पर तौल, सूरज को सलाम, ताज़ो-तख़्त, हमराज़-हमसफ़र-हमपहलू, सुभाव से सुखी, मोहब्बत की मिसाल, धूम-धाम, धूम-धड़ाका, चहल-पहल, रस और रहस, आका को आराम, खुशखुल्कखानम, कल का किस्सा, आलीशान और अजीमुश्शान, दरो-दीवार, लाज की लालिमा, मजेमीन। कशाकश, नश्बोनमा आदि। इन शब्द-प्रयोगों से बोझिल, त्रासद और अफसोसनाक वाकये भी आनुप्रासिक मुहावरेदारी की वजह से बोझिलता से मुक्त हो सके हैं। गद्य में ऐसे प्रयोगों से अनुप्रास, उपमा, यमक, श्लेष आदि  अलंकारों के लक्षण  द्रष्टव्य हैं। गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया है। डॉ. वर्मा इस कसौटी पर खरे उतरे हैं।
                         कहावतों और मुहावरों के मुक्त प्रयोग से उपन्यास की भाषा बलखाती नदी की तरंगित लहरों की तरह कलकल निनाद करती प्रतीत होती है। कानों में मिसरी घोलना, असंभव सी बात सम्भावना की देहलीज़ पर घुटने टेक सकती है, ख्वाब में आने की दावत देकर, दिल के दर्पण में दीदार कर ले, मधुमासी सौन्दर्य की आभा बिखेरती आभिजात्य  और गरिमा की प्रतिकृति नवलवधु, मदमाती सुगंध से कक्ष महमहा रहा था जैसी कोमलकांत पदावली पाठक के मन को प्रफुल्लित करती है।                       
वातावरण: 
                          वातावरण से अभिप्राय देश, काल, प्रकृति, आचार-विचार, रीति-रिवाज़, रहन-सहन तथा राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के चित्रण से होता है। ऐतिहासिक उपन्यासों में तात्कालिक वातावरण ही प्रामाणिकता का परिचायक होता है। वातावरण आधुनिक हो तो घटित घटनाएँ काल्पनिक और अप्रासंगिक प्रतीत होंगी। मुमताजमहल का किरदार जिस दौर का है उसमें भारतीय और मुगल सभ्यताओं का मेल-जोल हो रहा था। अतः, मुग़ल दरबारों के षड्यंत्रों, महलों की अंतर्कलहों, सत्ता के संघर्ष, चापलूसी, जी हुजूरी, स्वामिभक्ति, गद्दारी, बगावत, भोग-विलास, युद्ध और लूट आदि का चित्रण अप्रासंगिक होने पर भी अपरिहार्य हो जाता है। जिस तरह वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में व्याप्त 'बुन्देली' माटी की सौंधी गंध उन्हें प्राणवंत बनाती है, अमृत लाल नागर के उपन्यासों में 'अवधी' की मिठास प्रसंगों को जीवंत करती है, अंग्रेजी साहित्य में 'स्कोटिश' तथा 'आयरिश' कथानकों पर केन्द्रित उपन्यासों को उन अंचलों के नाम से ही जाना जाता है उसी तरह डॉ. वर्मा की यह कृति हिन्दू-मुग़ल काल की परिचायक है और वही वातावरण कृति में व्याप्त है। 
शैली:   
                        शैली उपन्यासकार की अपनी ईजाद होती है। शैली से उपन्यासकार को पहचाना जा सकता है। जयशंकर प्रसाद, यशपाल, अमृतलाल नागर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राहुल संकृत्यायन, भगवतीचरण वर्मा, वृन्दावनलाल वर्मा, प्रेमचन्द, उपेन्द्रनाथ 'अश्क' आदि की शैली ही उनकी पहचान है। उपन्यासकार न प्रगट होता है, न छिपता है। वह अपनी शैली के माध्यम से बादलों से आँख मिचौली करते चाँद, या नदी के प्रवाह में छिपी लहरों की तरह अपनी उपस्थिति झलकाता है। डॉ. वर्मा ने अपनी इस प्रथा औपन्यासिक कृति में अपनी शैली निर्मित की है जिसकी पहचान आगामी कृतियों से पुष्ट होगी। 
उद्देश्य: 
                        उपन्यास रचना का मूल उद्देश्य निस्संदेह मनोरंजन होता है किन्तु सक्षम उपन्यासकार घटनाओं एवं पात्रों के माध्यम से पाठक को शिक्षित, सचेत, जागृत तथा संवेदनशील भी बनाता है। प्रेमचंद अपने पात्रों के माध्यम से पाठक को सामाजिक विसंगतियों के प्रति सचेत कर परिवर्तन हेतु प्रेरित करते हैं। यशपाल के उपन्यास क्रांतिकारियों के बलिदान को रेखांकित करते हैं। जैनेन्द्र की औपन्यासिक कृतियाँ गांधीवादी परिवर्तनों से उज्जवल भविष्य निर्माण का सन्देश देते हैं। आचार्य चतुरसेन सांस्कृतिक घटनाओं का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उद्घाटन करते हैं। गुरुदत्त सामाजिक परिवर्तन और पारिवारिक ढांचे की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। रवीन्द्रनाथ का गोरा लम्बे बोझिल संवादों से  दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। विवेच्य कृति में डॉ. वर्मा भारतीय राजाओं की फूट, मुगलों आक्रामकता, सम्राटों की निरंकुशता की  आधारशिला पर निर्मित सहिष्णुता, सद्भाव की श्रेष्ठता तथा प्रेम की उदात्तता का संदेश देते हैं। शाहजहाँ के अंत के माध्यम से उपन्यासकार संदेश देता है कि सत्ता, धन या बल अंत में कुछ साथ नहीं रहता, साथ रहती हैं  यादें और भावनाएं। उपन्यास नायिका के माध्यम से इस्लाम में स्त्री की स्थिति उद्घाटित हुई है कि साम्राज्ञी तथा पति की प्रिय होकर भी वह स्वतंत्र चेता नहीं हो सकी तथा पति की इच्छा को सर्वोपरि मानकर संतानों को जन्म देने में ही जीवन की सार्थकता मानती रही। 
                        स्त्रीविमर्शवादियों को 'खाविंद के पैरों से जूते उतारकर अपने दमन से साफ़ करनेवाली यह साम्राज्ञी किस तरह स्वीकार्य होगी? सम्राट के इशारे पर निकाह तय होना, रुकना, होना निकाह के बाद अन्य शौहर के साथ लगातार यात्राएं, युद्ध और संतानों को जन्म देने के मध्य प्रेम के कितने पल उसे नसीब हुए होंगे? उसकी क़ाबलियत शौहर को मुश्किलों और मुसीबतों में सलाह देने तक सीमित है। वह बच्चों को कैसी तालीम दे सकी यह सत्ता के लिए भाई  के हाथों भाई की हत्या और पुत्र के हाथों पिता की कैद से ज़ाहिर हुई। जिस फूफी की गोद में खेली, जिससे बहुत कुछ सीखा, जो उसे शाही खानदान में विवाहित कराने का जरिया बनी, उसको अपने पति के विरोध में देखकर भी वह कुछ न कर सकी। अपनी अप्रतिम रूपराशि से वह पति का मन मोह सकी किन्तु कैकेयी की तरह रण-संगिनी नहीं बन सकी। यहाँ तक की गर्भ धारण करने पर जान को संकट होने का सत्य भी वह पति को नहीं बता सकी। यद्यपि उपन्यासकार ने इसका कारण उसकी पति के प्रति समर्पण भावना को बताया है। दो जिस्म एक जान होने का दावा करनेवाले शौहर को बीबी की ही खबर न हो तो उसे सम्राट के रूप में या शौहर के रूप में कितना काबिल माना जाए? कई सवाल पाठक के मन को मथते हैं। उसके प्रेम की याद में बादशाह ने ताजमहल तामीर कराया, यह उपन्यासकार का मत है। इसे मान्य करें तो भी दो नजरिये सामने आते हैं जिन्हें शायरों ने इस तरह बयां किया है:
1. एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल 
    सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है ...
2. एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल 
    हम गरीबों की मोहब्बत का उडाया है मजाक ... 
  
                        
भारतीय सर्वेक्षण विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक डॉ. पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तक 'ताजमहल राजपूती महल था' में प्रामाणिक रूप से सिद्ध किया है कि यह इमारत शाहजहाँ के जन्म से पूर्व से थी। ताजमहल के दरवाजों की लकड़ी की कार्बन डेटिंग पद्धति से जांच में भी यह शाहजहाँ से लगभग 300 वर्ष पूर्व सन 1359 की पाई गयी है तथापि डॉ. वर्मा इसे प्रचलित कथानुसार न केवल शाहजहाँ द्वारा मुमताज की स्मृति में बनवाया गया माना है इस मान्यता के समर्थन में तर्क भी गढ़े हैं। जैसे: इस सम्बन्ध में शाहजहाँ व् मुमताज में चर्चा, इमारत में हिन्दू मांगलिक प्रतीकों व भवन के नाम में साम्राज्ञी के नाम का भाग का पूर्व योजनानुसार होना आदि। 
                          ऐतिहासिक कथानकों में रूचि रखन वाले पाठको को डॉ. वर्मा का यह उपन्यास न केवल लुभाएगा, उनके शब्द भण्डार की वृद्धि भी करेगा। डॉ. वर्मा की मुहावरेदार संस्कृत-उर्दू मिश्रित हिंदी साहित्य और भाषा के प्रेमियों को और जानने के लिए प्रेरित करेगी। भाषाविद, समीक्षक, नाटककार के रूप में पूर्व प्रतिष्ठित डॉ. वर्मा का उपन्यासकार पहले पहल सामने आया है। उनकी प्रौढ़ कलम से हिंदी के सारस्वत कोष को और भी नगीने मिलें, यही कामना है। इस रोचक, सर्वोपयोगी ऐतिहासिक कृति से सहिष्णुता, सद्भाव, सहकारिता तथा सर्व धर्म समभाव को प्रोत्साहन मिलेगा। इस कृति की नायिका मुमताज महल पर श्री हरिमोहन थपलियाल के उपन्यास की तुलना में डॉ. वर्मा की यह कृति अधिक प्रामाणिक, प्रौढ़, रुचिकर तथा पठनीय है।
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एक कुंडली संजीव 'सलिल'

एक कुंडली
संजीव 'सलिल'
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मंगलमय हो हर दिवस, दें मुझको आशीष.
'सलिल'-धार निर्मल रखें, हों प्रसन्न जगदीश..
हों प्रसन्न जगदीश, न पानी बहे आँख से.
अधरों की मुस्कान न घटती अगर बाँट दें..
दंगल कर दें बंद, धरा से कटे न जंगल
मंगल क्यों जाएँ, भू का हम कर दें मंगल..

Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com