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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

हरिहर झा, पुरोवाक्,



पुरोवाक्
दृष्टि : सत्य शोधक विचारों की वृष्टि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                    भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार साहित्य में सबका हित समाहित होन आवश्यक है किसी एक वर्ग, समूह या विचारधारा का नहीं। संस्कृत में 'साहित्य' शब्द की व्युत्पत्ति "सहितस्य भावः साहित्यम्" (हितकारी भाव भरी रचना) के रूप में हुई है। ''साहित्यस्य कर्म साहित्यम्'' अर्थात सबके लिए हितकर कर्म (लेखन) ही साहित्य है। ''हितेन सह सहितं, तस्य भाव: साहित्यम्'' अर्थात् हित या कल्याण से युक्त अथवा अथवा कल्याणकारी भाव वाला लेखन साहित्य है।साहित्य सत्य, शिव और सुंदर  को अभिव्यक्त कर सत्-चित्- आनंद की प्राप्ति में सहायक होता है। राजशेखर के अनुसार साहित्य पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र इन चार विद्याओं का निचोड़ अर्थात पंचमी विद्या है।

                प्राच्य से भिन्न पाश्चात्य चितन में साहित्य कोई भी लिखित रचना है। लैटिन शब्द litaritura/litteratura का अर्थ है "अक्षरों द्वारा किया गया साहित्यिक गुणों से युक्त लेखन" जिसमें वाचिक पाठ भी शामिल हैं। 

                साहित्य को मुख्यत: लौकिक (सांसारिक) - अलौकिक (वैदिक/आध्यात्मिक) तथा गद्य ( निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, लघुकथा, समालोचना आदि) - पद्य (कविता, गीत, महाकाव्य, खंडकाव्य आदि) में वर्गीकृत किया जाता है। विषयों (अभियांत्रिकी, कृषि, चिकित्सा, विधि, संगीत, चित्रकला, वाणिज्य आदि) के आधार पर भी साहित्य को वर्गीकृत किया जा सकता है। लक्ष्य पाठक वर्ग के आधार पर साहित्य को बाल, प्रौढ़, तरुण आदि, कथ्य के आधार पर राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि वर्ग की जा सकते हैं। 

            वर्तमान में भारतीय शिक्षा तथा चितन पर पश्चिम का व्यापक प्रभाव है। भारत में सर्व कल्याण का भाव प्रमुख है जबकि पश्चिम में वर्ग विशेष का। इस कारण आजकल साहित्य में वैचारिक प्रतिबद्धता को महत्व मिल रहा है। अखंड को खंड उसे प्रकार बाहर कर रहा है जैसे बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है। इसका परिणाम स्त्री विमर्श, प्रवासी साहित्य, ग्राम्य साहित्य, लोक साहित्य आदि विभाजनों के रूप में सामने आ रहा है। 

                श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार हरिहर झा की नवीनतम कृति ''दृष्टि'' भारतीय साहित्यिक चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खंडित दृष्टि पर अखंडित दृष्टि को वरीयता देती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा किन्तु वास्तव में साहित्य को समाज का दर्पण कहना भी खंड-सत्य है। दर्पण किसी बिम्ब का हू- ब-हू प्रतिबिंब तो दिखाता है किंतु दाहिने को बायाँ और बाएँ को दाहिना कर देता है। दर्पण बिम्ब का प्रतिबिंब दिखाते समय कोई परिवर्तन नहीं कर सकता जबकि साहित्य सामाजिक परिवर्तनों / क्रांतियों और नव अनुसंधानों का कारक होता है। साहित्य में बिम्ब के साथ भाव, रस, अलंकार, मिथक, रुपक आदि अनेक तत्व अंतर्निहित होते हैं जबकि दर्पण केवल और केवल बिम्ब तक सीमित होता है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहना सही नहीं है। 

                ''दृष्टि'' में आलेख/शोधालेख, संस्मरण/रेखाचित्र, व्यंग्य, समीक्षा तथा यात्रा वृत्तान्त आदि का सारगर्भित संकलन किया गया है। शोधालेखों के विषय स़ीता का व्यक्तित्व, धर्म के सरोकार, कृत्रिम बुद्धि, गांधी तथा संत साहित्य भारतीय तथा वैश्विक दोनों परिदृश्यों में सामयिक और उपयोगी हैं। शोधसलेखों में 'मौलिकता' का बहुत महत्व है। यह मौलिकता है क्या? किसी विषय या कथानक में जो कुछ कहा या लिखा जा चुका है उससे हटकर कुछ 'नया' कहना। यह नयापन काल्पनिक ही होता है। युगों पहले की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी तो हुआ नहीं जा सकता। रचनाकार पूर्वलिखित सब कुछ पढ़ भी नहीं सकता। उपलब्ध साहित्य का अध्ययन कर उस पर मन-चिंतन कर अपनी राय बनाना और उसे पूर्व ज्ञात तथ्यों के निकष पर कसकर रचनाबद्ध करना ही 'नयापन' है। राम कथा ही नहीं, कृष्ण कथा, शिव-आख्यान जैसे पौराणिक ही नहीं ऐतिहासिक और सम-सामयिक विषयों पर भी 'नयापन' विमर्श और विवाद का विषय बनता रहा है। उत्तर रामायण को प्रक्षिप्त या प्रामाणिक मानना भी नयेपन को अपने विवेक के निकष पर कसना ही है। उत्तर रामायण- डॉ. किशोर काबरा, उत्तर कथा - डॉ. प्रतिभा सक्सेना, महिजा - डॉ. सुशीला कपूर, वैदेही के राम - डॉ. चित्रा चतुर्वेदी, राम का मनस्ताप - डॉ. एम.एल.खरे, स्वयं धरित्री ही थी - रमाकान्त श्रीवास्तव, मर्यादा पुरुषोत्तम - डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, कैकेयी के राम -जयसिंह व्यथित, महाकाव्य कैकेयी - डॉ. इंदु सक्सेना, महारानी कैकेयी -पं. रामकिंकर उपाध्याय आदि में राम कथा संबंधी 'नवता' मत वैभिन्नय से युक्त है। इस कृति में डॉ. साहू प्रणीत महाकाव्य 'सीता' को लेकर लेखक ने तर्क सम्मत विमर्श किया है।  कृत्रिम बुद्धि जैसे सामयिक विषय पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। लेखक की परिपक्व कलम विविध तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों पर लेखन कर हिन्दी वांगमय को समृद्ध कर सकती है। 

                    'प्रवासी साहित्य' शीर्षक के अंतर्गत अमेरिका-आस्ट्रेलियन संस्कृति, आस्ट्रेलिया की लोक भाषाओं, आस्ट्रेलिया में भारतीय-आस्ट्रेलियन महिलाओं, आस्ट्रेलिया में शिक्षा और धर्म, भारत वंशियों पर हमले और पहचान का संकट जैसे विचारोत्तेजक विषयों पर संयमित-गंभीर विमर्श सर्वोपायोगी है। 'चर्च और नास्तिकता में संघर्ष', 'कांट और सार्त्र' पर जितनी चर्चा की जाए, काम है किन्तु लेखक ने गागर में सागर संहित कर दिया है। आस्ट्रेलिया जाने के इच्छुक पर्यटकों को आस्ट्रेलिया जाने के पहले हरिहर जी द्वारा लिखे गए आलेख पढ़ना चाहिए। इन्हें भारतव आस्ट्रेलिया की सरकारॉन/दूतावासों द्वारा पर्यटकों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। 

                    'आलेख' शीर्षक में समाहित  कबीर, तुलसी, कुँवर नारायण जैसे प्रेरक व्यक्तित्वों के साथ जीवन मूल्यों, पुरुषार्थ, कानून, न्याय, बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धि, राजधर्म, भाषाई विवाद आदि विषयों पर स्वस्थ्य चिंतनपरक लोकोपयोगी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। समकालीन जीवन मूल्यों तथा चार पुरुषार्थ जैसे लेख नव पीढ़ी ही नहीं वार्धक्य की ओर कदम बढ़ा रहे पाठकों के लिए भी उपयोगी है। हरिहर झा जी विषयों अपर विचार अभिव्यक्त करते समय आक्रामक नहीं होते, वे पूरी सह्रदयता के साथ सरल-सहज प्रसाद गुण संपन्न शैली में जटिल और कठिन विषयों पर इस तरह बात कहते हैं कि असहमति को भी सद्भाव पूर्वक विचारकरना रुचिकर लगे। 

                    संस्मरण तथा रेखाचित्र अपेक्षाकृत कम चर्चित विधाएँ हैं किन्तु हरिहर झा जी ने इन दोनों विधाओं को समृद्ध करते हुए व्यंग्य लेख भी कृति में सम्मिलित की है। व्यंग्य लेखों की भाषा चुटीली और सरस है।  समीक्षाएँ, भूमिकाएँ, रिपोर्ताज तथा यात्रा संस्मरण सममूलित करने से कृति समृद्ध हुई है। हरिहर झा जी की यह कृति समय साक्षी बनते हुए तीन पीढ़ियों को एक साथ बाँधती है। हिन्दी के सजग पाठकों को चिंतन-मनन के लिए बहुविषयी सामग्री लिए 'दृष्टि' उनकी दृष्टि की समर्थ्य बढ़ाने में सक्षम है। एक उत्तम कृति प्रस्तुत करने के लिए लेखक को साधुवाद दिया ही जाना चाहिए। दृष्टि को पढ़ने के बाद आस्ट्रेलिया घूमने का मन बनना स्वाभाविक है। भाई हरिहर झा ने इस कृति के माध्यम से एक अभाव की पूर्ति की है। इसका विमोचन/लोकार्पण भारत में आस्ट्रेलिया दूतावास और आस्ट्रेलिया में भारतीय के माध्यम से हो तो बेहतर होगा। दोनों देशों में घनिष्ठ संबंध हैं उन्हें और अधिक निकट करने में ऐसे ग्रंथ सहायक होते हैं। हरिहर झ जी को बहुत बधाई। 
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संपर्क: विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ भारत 
चल भाष ९१ ९४२५२ ८३२४४, ईमेल salil.sanjv@gmail.com          
     


 

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