रविवार, 5 जून 2016

नवगीत

एक रचना 
*
दिखते कोमल सिरस, 
न समझो 
दुर्बल होगी भूल जी 
*
संसद में जाए शिरीष यदि 
ले पलाश को साथ 
करतल ध्वनि से अमलतास  
हो साथ उठाकर माथ  
नेताओं पर डालें मिलकर 
उद्यानों की धूल जी 
पाप नाश हो, महक सकें तब 
राजनीति में फूल जी 
*
परिमल से महकायेंगे मिल 
सुमन समूचा देश 
कहीं कलुषता नहीं रहेगी 
किसी ह्रदय में शेष 
रिश्वतखोरों के हाथों में 
चुभें नुकीले शूल जी 
अनाचार के संग सोएंगे 
गोखरू और बबूल जी 
*
अंकुर, पल्लव, कलियाँ महकें 
चहकें कोयल कूक 
सदा सुहागन हो कोशिश हर 
सपने हों बंधूक 
गगनबिहारी रहे न शासन 
याद रखे निज मूल जी 
माली बरगद कस पाएगा 
हर दिन ढीली चूल जी 


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