मंगलवार, 21 जनवरी 2014

shatpadee: sanjiv

​​
षट्पदी :
संजीव 
*
सु मन कु मन से दूर रह, रचता मनहर काव्य
झाड़ू मन हर कर कहे,  निर्मलता संभाव्य
निर्मलता संभाव्य, सुमन से बगिया शोभित
पा सुगंध सब जग, होता है बरबस मोहित
कहे 'सलिल' श्रम सीकर से जो करे आचमन
उसकी जीवन बगिया में हों सुमन ही सुमन

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

कोई टिप्पणी नहीं: