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सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

बासंती कविता: ऋतुराज नव रंग भर जाये नीरजा द्विवेदी

कविता बसंत की :
ऋतुराज नव रंग भर जाये
नीरजा द्विवेदी
*
 
ऋतुराज नव रंग भर जाये

प्रकृति दे रही मूक निमन्त्रण,
बसन्त ने रंगमन्च सजाया.
युवा प्रकृति का पा सन्देशा,
ऋतुराजा प्रियतम है आया.

तजी निशा की श्याम चूनरी,
हुई पूर्व की दिशा सिन्दूरी.
मन्द-सुगन्ध बयार बह रही,
मन आल्हादित, श्वांसें गहरी.

पुष्पित वल्लरि हैं झूम रहीं,
ज्यूं हौले-हौले शीश हिलायें,
मधुमक्खियां हैं घूम रहीं,
मदांध पुष्पों से पराग चुरायें.

कोयल हैं करें अन्ताक्षरी,
लगता जैसे हों होड़ लगायें.
श्यामा आ बैठे वृक्ष पर,
कोयल सा है मन भरमाये.

आम औ जामुन हैं बौराये,
भीनी-भीनी सुगन्ध बहाते.
आलिंगन को आतुर केले,
वायु वेग संग बांह फ़ैलाते.

हिल-हिल पीपल के पल्लव,
खड़-खड़ कर खड़ताल बजायें.
नवयौवना सी आम्रमन्जरी,
लजा-सकुचा कर नम जाये.

जीर्ण-शीर्ण सब पत्र हटाकर,
वृक्षों में नव कोंपल है आई.
प्रकृति सुन्दरी वस्त्र बदलकर,
दुल्हन सी बन ठन है आई.

गौरैया करती स्तुति-वन्दन,
पपीहा पिउ-पिउ टेर लगाते,
महोप करते हैं श्लोक पाठ,
कौए हैं कां-कां शोर मचाते.

बगिया में पुष्प खिले हैं 
श्वेत, लाल, नीले औ पीले.
पुष्प पराग से हैं आकर्षित,
तितली और भौंरे गर्वीले.

नेवले घूम रहे आल्हादित,
प्रेयसि की खोज कर रहे.
दो पैरों पर हो खड़े देखते,
मित्र-शत्रु का भेद ले रहे.

प्रकृति खड़ी है थाम तूलिका,
पल-पल अभिनव चित्र बनाये.
धूमिल चित्र मिटा-मिटा कर,
ऋतुराज नव रंग भर जाये.
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neerja dewedy <neerjadewedy@gmail.com>

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