बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

 

मुक्तिका
नित्य प्रिय :
संजीव 'सलिल'
*
काव्य रचना कर सुधारें नित्य प्रिय!
कसौटी पर कस निहारें नित्य प्रिय!!

यथास्थिति चुप सहन मत कीजिए                                                               
तोड़ सन्नाटा गुहारें नित्य प्रिय!!

आपमें सामर्थ्य है तो चुप न हों.
जो निबल उनको दुलारें नित्य प्रिय!!

आपदाएं परखतीं धीरज 'सलिल'.
राह नाहक मत निहारें नित्य प्रिय!!

अँधेरा घर किसे भाता है कहें?
दीप बन जग को उजारें नित्य प्रिय!!

तनिक अंतर में 'सलिल' अंतर न हो.
दूरियाँ मन से बुहारें नित्य प्रिय!!

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मुक्तिका

तितलियाँ

संजीव 'सलिल'
*
यादों की बारात तितलियाँ.

कुदरत की सौगात तितलियाँ..

बिरले जिनके कद्रदान हैं.

दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..

नाच रहीं हैं ये बिटियों सी

शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..

बद से बदतर होते जाते.

जो, हैं वे हालात तितलियाँ..

कली-कली का रस लेती पर

करें न धोखा-घात तितलियाँ..

हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं

क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..

'सलिल' भरोसा कर ले इन पर

हुईं न आदम-जात तितलियाँ..

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स्मृतियों का वातायन :
संजीव 'सलिल'
*
स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग...
*
पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन.
मुझमें छिपे हुए हुए हैं, जैसे भोजन में हो नौन..
चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग...
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ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान.
शत वन्दन उनको, दी सीख- 'न कर मूरख अभिमान'.
पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग...
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टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक.
जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति-पथ को रोक.
उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग...
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मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार.
कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार.
मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग...
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बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम.
मित्र-सखा मेरे जो उनको, सौ-सौ बार सलाम.
दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए, मम मानस के रोग...
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ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढ़ी ने नित्य.
मुझे बताया नव रचना से, थका न अभी अनित्य.
'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग...
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स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल.
यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ शूल.
लेकर आया नया साल, मिल इसे लगायें भोग...
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