कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

१६ फरवरी, सॉनेट, नवगीत, लघुकथा, वैलेंटाइन, उपेन्द्रवज्रा, प्रदोष, प्रेम गीत, छंद, मुक्तिका, सुभ्रामर, दोहा, कुण्डलिया,

सलिल सृजन १६ फरवरी
*
हिंगलिश सॉनेट 
Never ask what your country can do for you. 
Always ask what you can do for your country. 
You can shelter others only if you are a tree.
Be greatful to those who sheltered you. 
काम निकल जाने के बाद न हो जाएँ उड़न छू,
याद हमेशा रखें कब-किसने आपकी मदद की,
जिस तिस को देखकर कभी मत बजाइए सीटी,
हो जाएँगे बदनाम सब लोग देखेंगे करेंगे थू थू। 

मनाइए वेलेंटाइन या आयोजित करें बसंतोत्सव, 
किंतु कभी मत भूलिए मर्यादा और शालीनता, 
पर्वों पर मस्ती करिए इस तरह न रंग में भंग हो। 
Remember no playboy make eternal love, 
Enjoys willfully and very soon say tata. 
Step always firmly whenever whereever you go.  
•••
सोरठा सलिला 
सूरज नित्य प्रणाम, किरण करों से कर रहा।
मनु की किस्मत वाम, वसुधा को मैला करे।।
भोगे दुष्परिणाम, तनिक न लेकिन चेतता।
दौड़ रहा अविराम, ठोकर खा सँभले नहीं।।
भली करेंगे राम, कह खाता प्रभु भोग भी।
है आराम हराम, भूल न करता परिश्रम।।
किसको प्यारा चाम, जाहिर जग है काम प्रिय।
काम करो निष्काम, कृष्ण वचन माने नहीं।।
सभी चाहते दाम, ज्यादा से ज्यादा मिले।
माया जोड़ तमाम, जाते खाली हाथ सब।।
१६.२.२०२४
•••
सॉनेट
धीर धरकर
पीर सहिए, धीर धरिए।
आह को भी वाह कहिए।
बात मन में छिपा रहिए।।
हवा के सँग मौन बहिए।।
मधुर सुधियों सँग महकिए।
स्नेहियों को चुप सुमिरिए।
कहाँ क्या शुभ लेख तहिए।।
दर्द हो बेदर्द सहिए।।
श्वास इंजिन, आस पहिए।
देह वाहन ठीक रखिए।
बनें दिनकर, नहीं रुकिए।।
असत् के आगे न झुकिए।।
शिला पर सिर मत पटकिए।
मान सुख-दुख सम विहँसिए।।
१६-२-२०२२
•••
नवगीत:
.
मफलर की जय
सूट-बूट की मात हुई.
चमरौधों में जागी आशा
शीश उठे,
मुट्ठियाँ तनीं,
कुछ कदम बढ़े.
.
मेहनतकश हाथों ने बढ़
मतदान किया.
झुकाते माथों ने
गौरव का भान किया.
पंजे ने बढ़
बटन दबाया
स्वप्न बुने.
आशाओं के
कमल खिले
जयकार हुआ.
अवसर की जय
रात हटी तो प्रात हुई.
आसमान में आयी ऊषा.
पौध जगे,
पत्तियाँ हँसी,
कुछ कुसुम खिले.
मफलर की जय
सूट-बूट की मात हुई.
चमरौधों में जागी आशा
शीश उठे,
मुट्ठियाँ तनीं,
कुछ कदम बढ़े.
.
आम आदमी ने
खुद को
पहचान लिया.
एक साथ मिल
फिर कोइ अरमान जिया.
अपने जैसा,
अपनों जैसा
नेता हो,
गड़बड़ियों से लड़कर
जयी विजेता हो.
अलग-अलग पगडंडी
मिलकर राह बनें
केंद्र-राज्य हों सँग
सृजन का छत्र तने
जग सिरमौर पुनः जग
भारत बना सकें
मफलर की जय
सूट-बूट की मात हुई.
चमरौधों में जागी आशा
शीश उठे,
मुट्ठियाँ तनीं,
कुछ कदम बढ़े.
११.२.२०१५
...

नवगीत:
.
आम आदमी
हर्ष हुलास
हक्का-बक्का
खासमखास
रपटे
धारों-धार गये
.
चित-पट, पट चित, ठेलमठेल
जोड़-घटाकर हार गये
लेना- देना, खेलमखेल
खुद को खुद ही मार गये
आश्वासन या
जुमला खास
हाय! कर गया
आज उदास
नगदी?
नहीं, उधार गये
.
छोडो-पकड़ो, देकर-माँग
इक-दूजे की खींचो टाँग
छत पानी शौचालय भूल
फाग सुनाओ पीकर भाँग
जितना देना
पाना त्रास
बिखर गया क्यों
मोद उजास?
लोटा ले
हरि द्वार गये
...
दोहा गीत: धरती ने हरिय...
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार.,
दिल पर लोटा सांप
हो गया सूरज तप्त अंगार...
*
नेह नर्मदा तीर हुलसकर
बतला रहा पलाश.
आया है ऋतुराज काटने
शीत काल के पाश.
गौरा बौराकर बौरा की
करती है मनुहार.
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार.
*
निज स्वार्थों के वशीभूत हो
छले न मानव काश.
रूठे नहीं बसंत, न फागुन
छिपता फिरे हताश.
ऊसर-बंजर धरा न हो,
न दूषित मलय-बयार.
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार....
*
अपनों-सपनों का त्रिभुवन
हम खुद ना सके तराश.
प्रकृति का शोषण कर अपना
खुद ही करते नाश.
जन्म दिवस को बना रहे क्यों
'सलिल' मरण-त्यौहार?
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार....
***
नवगीत:
*
फागुन फगुनाई फगुनाहट
फगुनौटी त्यौहार.
रश्मिरथी हो विनत कर रहा
वसुधा की मनुहार.....
*
किरण-करों से कर आलिंगित
पोर-पोर ले चूम.
बौर खिलें तब आम्र-कुञ्ज में
विहँसे भू मासूम.
चंचल बरसाती सलिला भी
हुई सलज्जा नार.
कुलाचार तट-बंधन में बंध
चली पिया के द्वार.
वर्षा-मेघ न संग दीखते
मौन राग मल्हार.....
*
प्रकृति-सुंदरी का सिंगार लख
मोहित है ऋतुराज.
सदा लुभाता है बनिए को
अधिक मूल से ब्याज.
संध्या-रजनी-उषा त्रयी के
बीच फँसा है चंद.
मंद हुआ पर नहीं रच सका
अचल प्रणय का छंद.
पूनम-'मावस मिलन-विरह का
करा रहीं दीदार.....
*
अमराई, पनघट, पगडंडी,
रहीं लगाये आस.
पर तरुणाई की अरुणाई
तनिक न फटकी पास.
वैलेंटाइन वाइन शाइन
डेट गिफ्ट प्रेजेंट.
नवाचार में कदाचार का
मिश्रण है डीसेंट.
विस्मित तके बसंत नज़ारा
'सलिल' भटकता प्यार.....
***
लघु कथा
वैलेंटाइन
*
'तुझे कितना समझाती हूँ, सुनता ही नहीं. उस छोरी को किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ देता ही रहता है. इतने दिनों में तो बात आगे बढ़ी नहीं. अब तो उसका पीछा छोड़ दे'
"क्यों छोड़ दूँ? तेरे कहने से रोज सूर्य को जल देता हूँ न? फिर कैसे छोड़ दूँ?"
'सूर्य को जल देने से इसका क्या संबंध?'
"हैं न, देख सूर्य धरती को धूप की गिफ्ट देकर प्रोपोज करता हैं न?धरती माने या न माने सूरज धूप देना बंद तो नहीं करता. मैं सूरज की रोज पूजा करूं और उससे इतनी सी सीख भी न लूँ कि किसी को चाहो तो बदले में कुछ न चाहो, तो रोज जल चढ़ाना व्यर्थ हो जायेगा न? सूरज और धरती की तरह मुझे भी मनाते रहना है वैलेंटाइन."
***

दोहा सलिला
*
कौर त्रिलोचन के हुए, गत अब आगत मीत.
उमा मौन हो देखतीं, जगत्पिता की प्रीत.
*
यह अनुपम वह निरुपमा, गौरा-बौरा साथ.
'सलिल' धन्य दर्शन मिले, जुड़े हाथ नत माथ.
*
क्या दूँ कैसे मैं इन्हें, सोच रहे मिथलेश?
त्रिपग नापते पग खड़े, बन दामाद रमेश.
*
रमा दे रहे शेष क्या, रहा कहीं भी तात?
राम जोड़ कर नत हुए, वंदन करे प्रभात
*
श्यामल विश्वंभर प्रभा, गौर उमा की कांति
इन्हें लुभाती उग्रता, उन्हें सुहाती शांति
*
थामे लता यशोधरा, तनिक नहीं भयभीत
सिंह अखंड पीड़ा लखे, अश्रु बहाए प्रीत
१६.२.२०१८

***
एक दोहा
*
लाड़ शब्द से कीजिए, शब्द जताते प्यार
जान लुटाई शब्द पर, शब्द हुए बलिहार
***
कार्यशाला
दो कवि एक कुण्डलिया
*
शब्दों ने मिलकर किया , शब्दों का श्रंगार।
शब्दों की दुल्हन सजी , शब्दों के गलहार।। -मिथलेश
शब्दों के गलहार, छंद गहने-पहनाए।
आनन्दित मिथलेश, विनीता सिय मुस्काए।।
सुलभ प्रेरणा करी, कल्पना-प्रारब्धों ने।
'सलिल' राय दी सत्य, कांता के शब्दों ने।। -संजीव
***
मुक्तिका
वार्णिक छंद उपेन्द्रवज्रा –
मापनी- १२१ २२१ १२१ २२
सूत्र- जगण तगण जगण दो गुरु
तुकांत गुरु, पदांत गुरु गुरु
*
पलाश आकाश तले खड़ा है
उदास-खो हास, नहीं झुका है
हजार वादे कर आप भूले
नहीं निभाए, जुमला कहा है
सियासती है मनुआ हमारा
चचा न भाए, कर में छुरा है
पड़ोस में ही पलते रहे हो
मिलो न साँपों, अब मारना है
तुम्हें दई सौं, अब तो बताओ
बसंत में कंत कहाँ छिपा है
***
सुभ्रामर दोहा
[२७ वर्ण, ६ लघु, २१ गुरु]
*
छोटी मात्रा छै रहें, दोहा ले जी जीत
सुभ्रामर बोलें इसे, जैसे मन का मीत
*
मैया राधा द्रौपदी, हेरें-टेरें खूब
आता जाता सताता, बजा बाँसुरी खूब
*
दादा दादी से कहें, पोते हैं नादान
दादी बोलीं- 'पोतियाँ, शील-गुणों की खान
*
कृष्णा सी मानी नहीं, दानी कर्ण समान
मीरा सी साध्वी कहाँ, कान्हा सी संतान
*
क्या लाया?, ले जाय क्या?, क्यों जोड़ा है व्यर्थ?
ज्यों का त्यों है छोड़ना, तो क्यों किया अनर्थ??
*
पाना खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय
हा-हा ही-ही ही नहीं, है साँसों का ध्येय
*
टोटा है क्यों टकों का, टकसालों में आज?
छोटा-खोटा मूँड़ पे, बैठा पाए राज
*
भोला-भाला देव है, भोला-भाला भक्त
दोनों दोनों से कहें, मैं तुझसे संयुक्त
*
देवी देवी पूजती, 'माँगो' माँगे माँग
क्या माँगे कोई कहे?, भरी हुई है माँग
*
माँ की माँ से माँ मिली, माँ से पाया लाड़
लाड़ो की लाड़ो लड़ी, कौन लड़ाए लाड़?
१६.२.२०१७
***
एक रचना-
आदमी
*
हमने जहाँ
जब भी लिखा
बस आदमी लिखा
*
मेहनत लिखी
कोशिश लिखी
मुस्कान भी लिखी
ठोकर लिखी
आहें लिखीं
नव तान भी लिखी
पीड़ा लिखी
आँसू लिखे
पहचान भी लिखी
ऐसा नहीं कि
कुछ न कहीं
वायवी लिखा
*
कुछ चाहतें
कुछ राहतें
मधुगान भी लिखा
पनघट लिखा
नुक्कड़ लिखा
खलिहान भी लिखा
हुक्का लिखा
हाकिम लिखा
फरमान भी लिखा
पत्थर लिखा
ठोकर लिखी
मधुगान भी लिखा
*
गेंती लिखी
छाले लिखे
प्याले नहीं लिखे
उपले लिखे
टिक्कड़ लिखे
निवाले भी लिखे
अपने लिखे
सपने लिखे
यश-मान भी लिखा
अमुआ लिखा
महुआ लिखा
बेचारगी लिखा
***
एक रचना
बरगद बब्बा
*
बरगद बब्बा
खड़े दिख रहे
जड़ें न लेकिन
अब मजबूत
*
बदलावों की घातक बारिश
संस्कार की माटी बहती।
जटा न दे पाती मजबूती
पात गिर रहे, डालें ढहतीं।
बेपेंदी के
लोटों जैसे
लुढकें घबरा
पंछी-पूत
*
रक्षक मानव छाया पाता
भक्षक बन फिर काट गिराता
सिर पर धूप पड़े जब सहनी
हाय-हाय तब खूब मचाता
सावन-झूला
गिल्ली-डंडा
मोबाइल को
लगे अछूत
*
मिटा दिये चौपाल-चौंतरे
भूले पूजा-व्रत-फेरे
तोता-मैना तोड़ रहे दम
घिरे चतुर्दिक बाँझ अँधेरे
बरगद बब्बा
अड़े दिख रहे
टूटी हिम्मत
मगर अकूत
***
दोहा-
जिस थाली में खा रहे, करें उसी में छेद
नर-विषधर में रह गया, कहिए अब क्या भेद?
*
द्विपदी
खोजा बाहर न मिला, हार के मैं बैठ गया
मन में झाँका तो आनंद को पाया मैंने
*
खोजा बाहर न मिला, हार के मैं बैठ गया
मन में झाँका तो आनंद को पाया मैंने
***
पुस्तक सलिला:
परिंदे संवेदना के : गीत नव सुख-वेदना के
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: परिंदे संवेदना के, गीत-नवगीत संग्रह, जयप्रकाश श्रीवास्तव, वर्ष २०१५, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, जैकेटयुक्त, बहुरंगी, पृष्ठ ७०, मूल्य १५०/-, पहले पहल प्रकाशन, २५ ए प्रेस कॉम्प्लेक्स, भोपाल ०७६१ २५५५७८९, गीतकार संपर्क- आई. सी. ५ सैनिक सोसायटी, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ०७८६९१९३९२७, ईमेल- jaiprakash09.shrivastava@gmail.com]
*
गीत-नवगीत के मानकों, स्वीकार्यताओ-अस्वीकार्यताओं को लेकर तथाकथित मठाधीशों द्वारा छेड़ी गयी निरर्थक कवायद से दूर रहते हुए जिन नवगीतकारों ने अपनी कृति गीत संग्रह के रूप में प्रकाशित करना बेहतर समझा जयप्रकाश श्रीवास्तव उनमें से एक हैं। हिंदी साहित्य में स्नाकोत्तर उपाधि प्राप्त रचनाकार गीत-नवगीत को भली-भाँति समझता है, उनके वैशिष्ट्य, साम्य और अंतर पर चर्चा भी करता है किन्तु अपने रचनाकर्म को आलोचकीय छीछालेदर से दूर रखने के लिये गीत संग्रह के रूप में प्रकाशित कर संतुष्ट है। इस कारण नवगीत के समीक्षकों - शोधछात्रों की दृष्टि से ऐसे नवगीतकार तथा उनका रचना कर्म ओझल हो जाना स्वाभाविक है।
'परिंदे संवेदना के' शीर्षक चौंकाता है परिंदे अनेक, संवेदना एक अर्थात एक संवेदना विशेष से प्रभावित अनेक भाव पक्षियों की चहचहाहट किन्तु संग्रह में संकलित गीत-नवगीत जीवन की विविध संवेदनाओं सुख-दुःख, प्रीति-घृणा, सर्जन-शोषण, राग-विराग, संकल्प-विकल्प आदि को अभिव्यक्त करते हैं। अत:, 'परिंदे संवेदनाओं के' शीर्षक उपयुक्त होता। जयप्रकाश आत्मानंदी रचनाकार हैं, वे छंद के शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हैं। उनके सभी गीत-नवगीत जय हैं किन्तु विविध अंतरों में समान संख्या अथवा मात्रा भार की पंक्तियों की सामान्यत: प्रचलित प्रथा का अनुकरण वे हमेशा नहीं करते। हर अंतरे के पश्चात मुखड़े के समान तुकांती पंक्तियों की प्रथा का वे पालन करते हैं। उनके नवगीत कथ्य-केंद्रित हैं। प्रकृति-पर्यावरण, शासन-प्रशासन, शोषण-विलास, गिराव-उठाव, आशा-निराशा आदि उनके इन ५८ नवगीतों में अन्तर्निहित हैं।
इन नवगीतों की भाषा सामान्यत: बोली जा रही शब्दावली से संपन्न है, जयप्रकाश अलंकरण पर स्वाभाविक सादगी को वरीयता देते हैं। वे शब्द चुनते नहीं, नदी के जलप्रवाह में स्वयमेव आती लहरियों के तरह शब्द अपने आप आते हैं।
आश्वासन के घर / खुशियों का डेरा
विश्वासों के / दीपक तले अँधेरा
बीज बचा / रक्खा है हमने
गाढ़े वक़्त अकाल का
हर संध्या / झंझावातों में बीते
स्नेह-प्यार के / सारे घट हैं रीते
संबंधों की /पगडंडी पर
रिश्ता सही कुदाल का
जाड़े के सूरज को अँगीठी की उपमा देता कवि दृश्य को सहजता से शब्दित करता है-
एक जलती अँगीठी सा / सूर्य धरकर भेष
ले खड़ा पूरब दिशा में / भोर का सन्देश
कुनकुनी सी धूप / पत्ते पेड़ के उजले
जागकर पंछी / निवाले खोजने निकले
नदी धोकर मुँह खड़ी / तट पर बिखेरे केश
जयप्रकाश मन में उमड़ते भावों को सीधे कागज़ पर उतार देते हैं। वे शिल्ल्प पर अधिक ध्यान नहीं देते। गीतीय मात्रात्मक संतुलन जनित माधुर्य के स्थान पर वे अभिव्यक्ति की सहजता को साधते हैं। फलत:, कहीं-कहीं कविता की अनुभूति देते हैं नवगीत। अँतरे के पश्चात मुखड़े की संतुकान्ति-समभारीय पंक्तिया ही रचनाओं को गीत में सम्मिलित कराती हैं-
संवेदनायें / हुईं खारिज, पड़ी हैं / अर्ज़ियाँ (९-१२-५)
बद से बदतर / हो गये हालात (८-१०)
वेदनाएँ हैं मुखर / चुप हुए ज़ज़्बात (१२-१०)
आश्वासनों की / बाँटी गईं बस / पर्चियाँ (९-९-५)
सोच के आगे / अधिक कुछ भी नहीं (९-१०)
न्याय की फ़ाइल / रुकी है बस वहीं (९-१०)
व्यवस्थाओं ने / बयानों की उड़ाईं / धज्जियाँ (१०-१२-५)
प्रतिष्ठित अपराध / बिक चुकी है शर्म (१०-१०)
हाथ में कानून/ हो रहे दुष्कर्म (१०-१०)
मठाधीशों से / सुरक्षित अब नहीं / मूर्तियाँ (९-१०-५)
स्पष्ट है कि मुखड़ा तथा उसकी आवृत्ति ९-१२-५ = २६ मात्रीय अथवा ५-८-३ के वर्णिक बंधन में आसानी से ढली जा सकती हैं किंतु अभिव्यक्ति को मूल रूप में रख दिया गया है। इस कारण नवगीतों में नादीय पुनरावृत्ति जनित सौंदर्य में न्यूनता स्वाभाविक है।
जयप्रकाश जी के नवगीतों का वैशिष्ट्य बिना किसी प्रयास के आंग्ल शब्दों का प्रयोग न होना है। केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक होने के नाते उनके कोष में अनेक आंग्ल शब्द हैं किंतु भाषा पर उनका अधिकार उन्हें आंग्ल शब्दों का मुहताज नईं बनाने देता जबकि संस्कृत मूल के शिरा, अवशेष, वातायनों, शतदल, अनुत्तरित, नर्तन, प्रतिमान, उत्पीड़न, यंत्रणाएँ, श्रमफल आदि, देशज बुंदेली के समंदर, मीड़, दीवट, बिचरें, दुराव, दिहाड़ी, तलक, ऊसर आदि और उर्दू के खारिज, अर्जियाँ, बदतर, हालात, ज़ज़्बात, बयानों, बहावों, वज़ीर, ज़मीर, दरख्तों, दुशाले, निवाले, दुश्वारियों, मंज़िल, ज़ख्म, बेनूर, ख्याल. दहलीज़ आदि शब्द वे सहजता से प्रयोग करते हैं। शब्दों को एकवचन से बहुवचन बनाते समय वे ज़ज़्बा - ज़ज़्बात, हालत - हालात में उर्दू व्याकरण का अनुकरण करते हैं तो बयान - बयानों में हिंदी व्याकरण के अनुरूप चलते हैं। काले-गोरे, शह-मात, फूल-पत्ते, अस्त्र-शस्त्र, आड़ी-तिरछी जैसे शब्द युग्म भाषा को सरसता देते हैं।
इस संग्रह के मुद्रण में पथ्य-शुद्धि पर काम ध्यान दिया गया है। फलत: आहूति (आहुति), दर्पन (दर्पण), उपरी (ऊपरी), रुप (रूप), बिचरते (विचरते), खड़ताल (करताल), उँचा (ऊँचा), सोंपकर (सौंपकर), बज़ीर (वज़ीर), झंझाबातों (झंझावातों) जैसी त्रुटियाँ हो गयी हैं।
जयप्रकाश के ये नवगीत आम आदमी के दर्द और पीड़ा की अभिव्यक्ति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। श्री शिवकुमार अर्चन ने ठीक ही आकलित किया है- इन 'गीतों की लयात्मक अभिव्यक्ति के वलय में प्रेम, प्रकृति, परिवार, रिश्ते, सामाजिक सरोकार, राजनैतिक विद्रूप, असंगतियों का कुछ जाना, कुछ अनजाना कोलाज है'।
जयप्रकाश जी पद्य साहित्य में छंदबद्धता से उत्पन्न लय और संप्रेषणीयता से न केवल सुपरिचित है उसे जानते और मानते भी हैं, इसलिए उनके गीतों में छान्दस अनुशासन में शैथिल्य अयाचित नहीं सुविचारित है जिससे गीत में रस-भंग नहीं होता। उनका यह संग्रह उनकी प्रतिबद्धता और रचनाधर्मिता के प्रति आश्वस्त करता है। उनके आगामी संग्रह को पढ़ने की उत्सुकता जगाता है यह संग्रह।
१६.२.२०१६
***
नवगीत:
.
चिन्तन करें,
न चिंता करिए
.
सघन कोहरा
छटना ही है.
आज न कल
सच दिखना ही है.
श्रम सूरज
निष्ठा की आशा
नव परिभाषा
लिखना ही है.
संत्रासों की कब्र खोदने
कोशिश गेंती
साथ चलायें
घटे विषमता,
समता वरिए
चिन्तन करें,
न चिंता करिए
.
दल ने दलदल
बहुत कर दिया.
दलविहीन जो
ऐक्य हर लिया.
दीन-हीन को
नहीं स्वर दिया.
अमिया पिया
विष हमें दे दिया.
दलविहीन
निर्वाचन करिए.
नव निर्माणों
का पथ वरिए.
निज से पहले
जन हित धरिए.
चिन्तन करें,
न चिंता करिए
१६.२.२०१५, भांड़ई
***
नवगीत:
*
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
झाड़ू लेकर
राजनीति की
बात करें.
संप्रदाय की
द्वेष-नीति की
मात करें.
आश्वासन की
मृग-मरीचिका
ख़त्म करो.
उन्हें हराओ
जो निर्बल से
घात करें.
मैदानों में
शपथ लोक-
सेवा की लो.
मतदाता क्या चाहे
पूछो जा द्वारे
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
मन्दिर-मस्जिद
से पहले
शौचालय हो.
गाँव-मुहल्ले
में उत्तम
विद्यालय हो.
पंडित-मुल्ला
संत, पादरी
मेहनत कर-
स्वेद बहायें,
पूज्य खेत
देवालय हों.
हरियाली संवर्धन हित
आगे आ रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
जाती जन्म से
नहीं, कर्म से
बनती है.
उत्पादक अन-
उत्पादक में
ठनती है.
यह उपजाता
वह खाता
बिन उपजाये-
भू उसकी
जिसके श्रम-
सीकर सनती है.
अन-उत्पादक खर्च घटे
वह विधि ला रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
श्रम की
सबसे अधिक
प्रतिष्ठा करना है.
शोषक पूँजी को
श्रम का हित
वरना है.
चौपालों पर
संसद-ग्राम
सभाएँ हों-
अफसरशाही
को उन्मूलित
करना है.
बहुत हुआ द्लतंत्र
न इसकी जय गा रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
बिना बात की
बहसें रोको,
बात करो.
केवल अपनी
कहकर तुम मत
घात करो.
जिम्मेवारी
प्रेस-प्रशासन
की भारी-
सिर्फ सनसनी
फैला मत
आघात करो.
विज्ञापन की पोल खोल
सच बतला रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
१५-१६.२.२०१५
*
छंद सलिला:
प्रदोष छंद
संजीव
*
दो पदी, चार चरणीय, १२ मात्राओं के मात्रिक प्रदोष छंद में दो चतुष्कल एक पंचकल होते हैं तथा चरणान्त में गुरु-लघु (तगण, जगण) वर्जित हैं.
उदाहरण:
१. प्रदोष व्रत दे शांति सुख, उमेश हर लें भ्रान्ति-दुःख
त्रिदोष मेंटें गजानन, वर दें दुर्गे-षडानन
२. भारत भू है पुरातन, धरती है यह सनातन
जां से प्यारा है वतन, चिन्तन-दर्शन चिरंतन
३. झण्डा ऊंचा तिरंगा, नभ को छूता तिरंगा
अपना सपना तिरंगा, जनगण वरना तिरंगा
*
१. लक्षण संकेत: उमेश = १२ ज्योतिर्लिंग = १२ मात्रायें
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, मधुभार, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१६.२.२०१४
***
विमर्श :
प्रेम गीत
सलिल
*
स्थापना और प्रतिस्थापना के मध्य संघात, संघर्ष, स्वीकार्यता, सहकार और सृजन सृष्टि विकास का मूल है। विज्ञान बिग बैंग थ्योरी से उत्पन्न ध्वनि तरंग जनित ऊर्जा और पदार्थ की सापेक्षिक विविधता का अध्ययन करता है तो दर्शन और साहित्य अनाहद नाद की तरंगों से उपजे अग्नि और सोम के चांचल्य को जीवन-मृत्यु का कारक कहता है। प्राणमय सृष्टि की गतिशीलता ही जीवन का लक्षण है। यह गतिशीलता वेदना, करुणा, सौन्दर्यानुभूति, हर्ष और श्रृंगार के पञ्चतात्विक वृत्तीय सोपानों पर जीवनयात्रा को मूर्तित करती है।
'जीवन अनुभूतियों की संसृति है। मानव का अपने परिवेश से संपर्क किसी न किसी सुखात्मक या दुखात्मक अनुभूति को जन्म देता है और इन संवेदनों पर बुद्धि की क्रिया-प्रतिक्रिया मूल्यात्मक चिंतन के संस्कार बनती चलती है। विकास की दृष्टि से संवेदन चिंतन के अग्रज रहे हैं क्योंकि बुद्धि की क्रियाशीलता से पहले ही मनुष्य की रागात्मक वृत्ति सक्रिय हो जाती है।'-महादेवी वर्मा, संधिनी, पृष्ठ ११
इस रागात्मक वृत्ति की प्रतीति, अनुभूति और अभिव्यक्ति की प्रेम गीतों का उत्स है। गीत में भावना, कल्पना और सांगीतिकता की त्रिवेणी का प्रवाह स्वयमेव होता है। गीतात्मकता जल प्रवाह, समीरण और चहचहाहट में भी विद्यमान है। मानव समाज की सार्वजनीन और सरकालिक अनुभूतियों को कारलायल ने 'म्यूजिकल थॉट' कहा है. अनुभूतियों के अभिव्यमति कि मौखिक परंपरा से नि:सृत लोक गीत और वैदिक छान्दस पाठ कहने-सुनने की प्रक्रिया से कंठ से कंठ तक गतिमान और प्राणवंत होता रहा। आदिम मनुष्य के कंठ से नि:सृत नाद ब्रम्ह व्यष्टि और समष्टि के मध्य प्रवाहमान होकर लोकगीत और गीत परंपरा का जनक बना। इस जीवन संगीत के बिना संसार असार, लयहीन और बेतुक प्रतीत होने लगता है। अतः जीवन में तुक, लय और सार का संधान ही गीत रचना है। काव्य और गद्य में क्रमशः क्यों, कब, कैसे की चिंतनप्रधानता है जबकि गीत में अनुभूति और भावना की रागात्मकता मुख्य है। गीत को अगीत, प्रगीत, नवगीत कुछ भी क्यों न कहें या गीत की मृत्यु की घोषणा ही क्यों न कर दें गीत राग के कारण मरता नहीं, विरह और शोक में भी जी जाता है। इस राग के बिना तो विराग भी सम्भव नहीं होता।
आम भाषा में राग को प्रेम कहा जाता है और राग-प्रधान गीतों को प्रेम गीत।
१६.२.२०१४
***
क्षणिका
याद बन पाथेय
जीवन को नये
नित अर्थ देती.
यदि नहीं तो
भाव की
होती 'सलिल'
सब व्यर्थ खेती..
***
मुक्तिका
खुद से ही
*
खुद से ही हारे हैं हम.
क्यों केवल नारे हैं हम..

जंग लगी है, धार नहीं
व्यर्थ मौन धारे हैं हम..

श्रम हमको प्यारा न हुआ.
पर श्रम को प्यारे हैं हम..

ऐक्य नहीं हम वर पाये.
भेद बहुत सारे हैं हम..

अधरों की स्मित न हुए.
विपुल अश्रु खारे हैं हम..

मार न सकता कोई हमें.
निज मन के मारे हैं हम..

बाँहों में नभ को भर लें.
बादल बंजारे हैं हम..

चिबुक सजे नन्हे तिल हैं.
नयना रतनारे हैं हम..

धवल हंस सा जनगण-मन.
पर नेता करे हैं हम..

कंकर-कंकर जोड़ रहे.
शंकर सम, गारे हैं हम..

पाषाणों को मोम करें.
स्नेह-'सलिल'-धारे हैं हम..
***
मुक्तिका:
हाथ में हाथ रहे...
*
हाथ में हाथ रहे, दिल में दूरियाँ आईं.
दूर होकर ना हुए दूर- हिचकियाँ आईं..

चाह जिसकी न थी, उस घर से चूड़ियाँ आईं..
धूप इठलाई तनिक, तब ही बदलियाँ आईं..

गिर के बर्बाद ही होने को बिजलियाँ आईं.
बाद तूफ़ान के फूलों पे तितलियाँ आईं..

जीते जी जिद ने हमें एक तो होने न दिया.
खाप में तेरे-मेरे घर से पूड़ियाँ आईं..

धूप ने मेरा पता जाने किस तरह पाया?
बदलियाँ जबके हमेशा ही दरमियाँ आईं..

कह रही दुनिया बड़ा, पर मैं रहा बच्चा ही.
सबसे पहले मुझे ही दो, जो बरफियाँ आईं..

दिल मिला जिससे, बिना उसके कुछ नहीं भाता.
बिना खुसरो के न फिर लौट मुरकियाँ आईं..

नेह की नर्मदा बहती है गुसल तो कर लो.
फिर न कहना कि नहीं लौट लहरियाँ आईं..
१६.२.२०११
***
गीत
*
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
मनहर किया सिंगार.,
दिल पर लोटा साँप
हो गया सूरज तप्त अंगार...
*
नेह नर्मदा तीर हुलसकर
बतला रहा पलाश.
आया है ऋतुराज काटने
शीत काल के पाश.
गौरा बौराकर बौरा की
करती है मनुहार.
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार.
*
निज स्वार्थों के वशीभूत हो
छले न मानव काश.

रूठे नहीं बसंत, न फागुन
छिपता फिरे हताश.

ऊसर-बंजर धरा न हो,
न दूषित मलय-बयार.
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार....
*
अपनों-सपनों का त्रिभुवन
हम खुद ना सके तराश.
प्रकृति का शोषण कर अपना
खुद ही करते नाश.
जन्म दिवस को बना रहे क्यों
'सलिल' मरण-त्यौहार?
धरती ने हरियाली ओढी,
मनहर किया सिंगार....
***
नवगीत:
*
फागुन फगुनाई फगुनाहट
फगुनौटी त्यौहार.
रश्मिरथी हो विनत कर रहा
वसुधा की मनुहार.....
*
किरण-करों से कर आलिंगित
पोर-पोर ले चूम.
बौर खिलें तब आम्र-कुञ्ज में
विहँसे भू मासूम.
चंचल बरसाती सलिला भी
हुई सलज्जा नार.
कुलाचार तट-बंधन में बंध
चली पिया के द्वार.
वर्षा-मेघ न संग दीखते
मौन राग मल्हार.....
*
प्रकृति-सुंदरी का सिंगार लख
मोहित है ऋतुराज.
सदा लुभाता है बनिए को
अधिक मूल से ब्याज.
संध्या-रजनी-उषा त्रयी के
बीच फँसा है चंद.
मंद हुआ पर नहीं रच सका
अचल प्रणय का छंद.
पूनम-'मावस मिलन-विरह का
करा रहीं दीदार.....
*
अमराई, पनघट, पगडंडी,
रहीं लगाये आस.
पर तरुणाई की अरुणाई
तनिक न फटकी पास.
वैलेंटाइन वाइन शाइन
डेट गिफ्ट प्रेजेंट.
नवाचार में कदाचार का
मिश्रण है डीसेंट.
विस्मित तके बसंत नज़ारा
'सलिल' भटकता प्यार.....
१६.२.२०१०
***

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

पुरोवाक्, चुनाव चकल्लस, गुरु सक्सेना, हास्य, पिंगल, छंद, घनाक्षरी, सवैया

पुरोवाक्:
'चुनाव चकल्लस' : हास्य रस से लबालब छंद कलश 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                    'सर्वोत्तम जिंदा रहे' ('सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट') ही सृष्टि में जीवन का मूल सूत्र है। मानवेतर प्राणियों में सर्वोत्तम की पहचान दैहिक बल से होती है। मानव में बुद्धितत्व की प्रधानता तथा भाषा का विकास होने के कारण जीवन का निर्धारण तन, मन तथा मति तीन  आधार पर भी होता है। बुद्धि की प्रधानता विकल्पों को पहचानकर सर्वोत्तम के चयन की कसौटी की दो विधियों संघर्ष और चयन में से दूसरे को प्राथमिकता देती है। इसका कारण संघर्ष से जन-धन की हानि तथा चयन से शांति व विकास होना है। 

                    जीव और जीवन में सामंजस्य, अनुशासन, सुव्यवस्था, विकास तथा शांति के लिए शासक और शासित का होना अपरिहार्य है। मानवेतर जीवों में शासक का चयन संघर्ष से हत्या है जिसमें पर्याय: पराजित के समक्ष प्राणहनी या पलायन के अलावा अन्य विकल्प नहीं होता किंतु बुद्धिजीवी मनुष्य शासक का चयन शांतिपूर्ण तरीके से करने को प्रमुखता दे रहा है। राजनीति शास्त्र में वर्णित विविध शासन पद्धतियों में से लोकतंत्र, प्रजातन्त्र या गणतंत्र (डेमोक्रेसी) शांतिमे शासन व्यवस्था परिवर्तन की श्रेष्ठ और लोकप्रिय पद्धति है। भारत में यह पद्धति वैदिक काल से यत्र-तत्र प्रचलित रही है। वर्तमान में भारत विश्व का सबसे अधिक बड़ा और सबसे अधिक सफल लोकतन्त्र है जिसमें प्रति पाँच वर्ष बाद अगले पाँच वर्षों के लिए चयनित जनप्रतिनिधियों से सबड़े अधिक बड़े समूह द्वारा बहुमत से अगले शासक का चुनाव किया जाता है। अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। इस विशेषता, वृहद आकार तथा विशाल जनसंख्या के कारण चुनाव का अनुष्ठान विविध रोचक दृश्य उपस्थित करता है।

                   मानव भाव्यभिव्यक्ति के लिए गद्य तथा पद्य दो माध्यमों का उपयोग करता है। पद्य की सरसता, सहजता, सरलता, संक्षिप्तता तथा लोकप्रियता रोचक प्रसंगों की अभिव्यक्ति हेतु अधिक उपयुक्त है। हिंदी भाषी काव्य के ९ रसों ( श्रृंगार, हास्य, वीर, भयानक, बीभत्स, रौद्र, अद्भुत, शांत और करुण) में से सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य रस है। किसी पदार्थ या व्यक्ति की असाधारण आकृति, वेशभूषा, चेष्टा आदि को देखकर अथवा किसी काव्य को सुनकर हृदय में जो विनोद का भाव जाग्रत होता है, उसे हास्य कहा जाता है। हास्यजनित आनंद या भाव की  अनुभूति ही हास्य रस है। किसी विचार, व्यक्ति, वस्तु व घटना का स्वरूप वैचित्र्य ही हास्य का जनक है। यह वैचित्र्य विस्मय या आश्चर्य उत्पन्न कार लक्षित व्यक्ति को गुदगुदा जाता है। भरतमुनि के अनुसार 'दूसरों की चेष्टा से अनुकरण से' ‘हास’ की उत्पत्ति तथा स्मित, हास एवं अतिहसित द्वारा अभिव्यक्ति होती है।' पण्डितराज 'वाणी एवं अंगों के विकारों को देखने आदि से हास ही उत्पत्ति मानते हैं।' डॉ. गणेश दत्त सारस्वत के मत में'हास्य जीवन की वह शैली है, जिससे मनुष्य के मन के भावों की सुंदरता झलक उठती है।' हास्य वास्तव में निच्छल मन से निकला, मानव मन का वह कवच है जो उद्दात्त भावों को नियंत्रण कर हमें पृथ्वी पर रहने योग्य बनाता है। विश्वप्रसिद्ध लेखक "वाल्तेयर" ने कहा था' जो हँसता नहीं वो लेखक नहीं हो सकता।' मार्क ट्वेन के अनुसार समाज की सही तस्वीर उतारने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी व्यंगकार पर ही है।


                   हास्य रस के दो प्रकार आत्मस्थ हास्य रस (किसी व्यक्ति या विषय की विचित्र वेशभूषा, वाणी, आकृति तथा चेष्टा आदि को देखने  से उत्पन्न) तथा परस्थ हास्य रस (हँसते हुए व्यक्ति को देखकर जो उत्पन्न हास्य) हैं। आचार्य केशवदास ने हास के ४ प्रकार मन्दहास, कलहास, अतिहास एवं परिहास माने हैं। आधुनिक काव्यशास्त्र ने हास्य के छ: प्रकार स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित तथा अतिहसित बताए हैं। हास्य रस का  स्थाई भाव- हास (हास्य), आलंबन विभाव-  विकृत वेशभूषा, आकार, क्रियाएँ, चेष्टाएँ आदि,  उद्दीपन विभाव- अनोखा पहनावा और आकार, बातचीत और क्रिया-कलाप, अनुभाव- आश्रय की मुस्कान, आँखों का मिचमिचाना, ठहाका, अट्ठहास आदि  तथा संचारी भाव हँसी, उत्सुकता, चपलता, कंपन, आलस्य आदि हैं। अमिधा-लक्षणा से हास्य तथा लक्षण-व्यंजना से व्यंग्य का सृजन होता है। 

                   भारतीय लोक साहित्य तथा हिंदी साहित्य में पुरातन काल हास्य की समृद्ध परंपरा है। नौटंकी, लोकनृत्य, लोकगीत, लोककथा,  आख्यायिका, नाटक, गीत, महाकाव्य, पंचतंत्र, जातक कथाएँ, अभिज्ञान शाकुन्तलम् आदि में हास्य चिर काल से है। उपनिषदों, पंचतंत्र, जातक कथाओं, पर्व कथाओं, बोध कथाओं, सूर रचित कृष्ण लीला के पदों, पृथ्वीराज रासो में चंदरबरदाई और जयचंद की वार्ता, भारतेंदु हरिश्चंद (अंधेर नगरी, ताजीराते शौहर), गोपालराम 'गहमरी', प्रताप नारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त, बालकृष्ण भट्ट, शिवपूजनसहाय, विश्वभरनाथ शर्मा 'कौशिक', बाबू गुलाबराय, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी',  मुंशी प्रेमचन्द, काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, झलकन लाल वर्मा छैल, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, पद्मश्री के.पी. सक्सेना, गुरु सक्सेना (साँड़ नरसिंहपुरी), सुरेश उपाध्याय, सुरेन्द्र शर्मा, हुल्लड़ मुरादाबादी, अशोक चक्रधर, अनूप श्रीवास्तव, संजीव वर्मा 'सलिल', राजेंद्र वर्मा, अरुण अर्णव खरे, इन्द्रबहादुर श्रीवास्तव आदि अगिन साहित्यकारों ने हास्य-व्यंग्य की श्रेष्ठ गाड़ी-पद्य रचनाओं के द्वारा हिंदी साहित्य को और समृद्ध किया। 

                   हास्य-व्यंगकार हँसते-हँसते सब कुछ कह जाता है और सुनने वाले भी बिना बुरा माने हँसते- हँसते सुनते हैं और फिर सोचने के लिए बाध्य भी होते हैं कि हम खुद की कारस्तानियों , खुद के द्वारा उत्पन्न की हुई परिस्थिति पर स्वयं ही हँस रहे हैं। वास्तव में जो बात क्रोध से, शांति से कहने में समझ नहीं आती वो इंसान हँसी -हँसी में समझ लेता है चूँकि उसका अहम् आहत नहीं होता। इसलिए हास्य-व्यंग्य प्रधान साहित्य से समाज को स्वास्थ्य दिशा दिखाकर सामाजिक परिवर्तन करना संभव हो पाता है।

                   इस पृष्ठ भूमि में सनातन सलिला नर्मदा के तट पर भारत के हृद प्रदेश के निवासी गुरु सक्सेना जी की नवीनतम कृति 'चुनाव चकल्लस' भारतीय राजनीति, लोकतंत्र तथा जन सामान्य के लिए पथ प्रदर्शक कृति है। गुरु सक्सेना ग्रामीण और नगरीय जीवनशैली, कृषक और शिक्षक वृत्ति, चिंतक और व्यंगकार मनोवृत्ति के कॉकटेल हैं। मसिजीवी कायस्थ कुल (मैं कायस्थ कुलोद्भव मेरे पुरखों ने इतना ढाला, मेरे लोहू में मिश्रित है पचहत्तर प्रतिशत हाला) उत्पन्न गुरु जी शुद्ध शाकाहार और सात्विक आचार-आहार के पक्षधर हैं। गुरु जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को 'विचित्र किंतु सत्य' ही कहा जा सकता है।

                   १६ प्रकार के घनाक्षरी छंद (मनहरण, जनहरण, जलहरण, कलाधर, रूप, डमरू, कृपाण, विजया, देव, महीधर, सूर, नीलचक्र अशोक पुष्प मंजरी, सुधा निधि, अनंगशेखर व मत्त मातंग लीलाधर), १० प्रकार के सवैए (सुमुखी, वाम, मुक्तहरा, लवंगलता, मत्तगयंद, मदिरा, मंदारमाला, चकोर अरसात व किरीट)  तथा २१ अन्य छंद रत्नों (सरसी, कनकमंजरी, राधा, विजात, गीतिका, अहीर, दीनबंधु, चंद्र, दिग्पाल, मानव, हाकलि, प्रदीप, लावणी, ताटंक, शिव, भानु, राधिका, सुमेरु, तोटक, द्वि मनोरमा) के छंद विधान एवं उदाहरणों से समृद्ध 'चुनाव चकल्लस' 'एक के साथ एक फ्री' के समय में मनोरंजन के साथ-साथ छंद शास्त्र की पर्याप्त जानकारी भी देती है।   

                   'चुनाव चकल्लस' का रचनाकार कुशल छंदज्ञ, गंभीर विचारक, ओजस्वी मंचीय कवि तथा सहज-सरल व्यक्तित्व का धनी है। अपने आप पर हँसने का माद्दा कम ही लोगों में होता है। गुरु उन्हीं कम लोगों में से एक हैं। वे खुद अपना ही परिचय इस तरह देते हैं- 

करने को कोई काम नहीं
अण्टी में बिलकुल दाम नहीं
भारत माता के नूर हैं हम
हर हालत में मजबूर हैं हम

                   यह 'भारत माता का नूर' देश के राजनैतिक आकाओं को उनकी औकात निम्न पंक्तियों के आईने में दिखाता है-

नदियों से रेत साफ,जंगलों से पेड़ साफ, लड़कियों के भ्रूण साफ, भारत महान है ।
कविता से छंद साफ, नेह के संबंध साफ, सफाई का साफ साफ, हो रहा ऐलान है।
शांति के लगाव साफ, सारे सद्भाव साफ, धरने को देख संविधान परेशान है।
लगता है पूरा देश साफ करके रहेंगे, सड़क सड़क सफाई का अभियान है।

                   कवि गुरु सक्सेना की कलम सच कहने से न तो डरती है, न हिचकती है। सिर पर कफन बाँधकर, शासन-प्रशासन की बखिया उधेड़ने की कला का साहस और परिस्थितियों की विद्रूपता पर करारी चोट करने का कौशल गुरु को 'गुरु' बनाता है। शासन-प्रशासन द्वारा विधि के शासन की परवाह न कर बुलडोजर संस्कृति अपनाने के दौर में सत्य कहने का दुस्साहस करनेवाले अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकार जगत सत्ता-स्तुति को ही लक्ष्य बना चुका है किंतु गुरु का गुरुत्व सत्ता को आईना दिखने से नहीं चूकता - 

यह चुनाव का पर्व मिला है पाँच साल के बाद। 
हे चुनाव का क्षेत्र बना है कुंभ इलाहाबाद।। 
जो भी घाट सामने आया गहरी डुबकी मार। 
पूजा नगद नरायण की कर हो जा सागर पार।। 
रंग रूप दल से क्या मतलब, किसमें क्या है खोट?
कुछ मत देख देखना है तो देख नोट ही नोट।। 
सारे ऐब सहज ढँक जाते जहाँ नोट की छाँव।
नोट बिछाकर सब निकले हैं पड़ने कुर्सी-पाँव।।
                   
                   वर्तमान बाजार संस्कृति 'एक के साथ एक फ्री' के पाखंड रचकर आमजन की जेब खाली कराने को ठगी नहीं, प्रबंध कौशल की संज्ञा देकार जेब खाली करा लेती है। गुरु की छांदस रचनाएँ 'एक (मनोरंजन) के साथ तीन (पिंगल-ज्ञान, कर्तव्य बोध तथा स्वस्थ्य चिंतन) फ्री देकर लोकतंत्र की नींव दृढ़ करने के लिए सजग जनमत बनाने का काम करती हैं। मतदान करने की प्रेरणा देने के साथ-साथ नवोढ़ा कुलवधुओं को कर्तव्य की सीख देती निम्न घनाक्षरी कवि गुरु जी के सामर्थ्य के परिचायक है-   

रखा रख फट नहीं जाए इस कारण से समय से दूध को उबालना जरूरी है। 
बहू बन घर में आ जाना बड़ी  बात नहीं, तरीके से घर को सम्हालना जरूरी है।।
बच्चे पैदा कर देना कोई बड़ी बात नहीं, फिकर के साथ उन्हें पालना जरूरी है। 
लोकतंत्र मजबूत रहे देश ठीक चले, हर आदमी को वोट डालना जरूरी है।।   

                वर्ण और मात्रा को लक्ष्मण रेखा मानकर किताबी यांत्रिक विधि से नीरस छंद रचे जाने के वर्तमान कल में गुरु जमीन से जुड़कर, छंद सृजन की वाचिक परंपरा के अग्रदूत की तरह सरस छंद रच रहे हैं। भाषा की तथाकथित शुद्धता के पत्थर उछालने-मारनेवाले नासामझों को तर्क नहीं सृजन से उत्तर देते हैं। गुरु के छंदों की भाषा देशज-तद्भव शब्दावली संपन्न है। कथ्य की पतली रस्सी पर गति-यति का बाँस थामे गुरु नट की तरह संतुलन कौशल साधकर श्रोता-पाठक को करतल ध्वनि और वाह वाह करने के लिए विवश कर देते हैं। मुझे भरोसा है कि कॉनवेंटी नई पीढ़ी, नगरीय अपसंस्कृति को जी रहे बाबू साहबों- नव धनाढ्य सेठों तथा ग्राम्य और वन्य क्षेत्रों में रह रहे कुशकों-श्रमिकों  को गुरु जी के इन छंदों से दायित्व बोध होगा तथा वे नकली दूरदर्शनी और मोबाइली दुनिया से निकलकार अपनी माटी से जुड़ने की दिशा ग्रहण कर सकेंगे। इस लोकोपयोगी कृति से विश्ववाणी हिंदी के सारस्वत कोश को समृद्ध करने के लिए गुरु सक्सेना साधुवाद के पात्र हैं। 
***
संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल- salil.sanjiv@gmail.com 

१५ फरवरी, गीत, आशियाना, बाल गीत, द्विपदि, नित छंद, लघुकथा, कृष्ण , सॉनेट, वसुधा, सुभद्रा, सरस्वती

 सलिल सृजन १५ फरवरी 

*

सॉनेट
शारद वंदना
शारदे! दे सुमति कर्म कर।
हम जलें जन्म भर दीप बन।
जी सकें जिंदगी धर्म कर।।
हो सुखी लोक, कर कुछ जतन।।
हार ले माँ! सुमन अरु सुमन।
हार दे माँ! क्षणिक, जय सदा।
हो सकल सृष्टि हमको स्वजन।।
बेहतर कर सकें जो बदा।।
तार दे जो न टूटें कभी।
श्वास वीणा बजे अनहदी।
प्यार दे, कल न कल, नित अभी।।
तोड़ बंधन सभी सरहदी।।
क्षर न अक्षर रहित हम रहें।
नर्मदा नेह की बन बहें।।
१५-२-२०२२
•••
मुक्तिका
सुभद्रा
*
वीरों का कैसा हो बसंत तुमने हमको बतलाया था।
बुंदेली मर्दानी का यश दस दिश में गुंजाया था।।
'बिखरे मोती', 'सीधे सादे चित्र', 'मुकुल' हैं कालजयी।
'उन्मादिनी', 'त्रिधारा' से सम्मान अपरिमित पाया था।।
रामनाथ सिंह सुता, लक्ष्मण सिंह भार्या तेजस्वी थीं।
महीयसी से बहनापा भी तुमने खूब निभाया था।।
यह 'कदंब का पेड़' देश के बच्चों को प्रिय सदा रही।
'मिला तेज से तेज' धन्य वह जिसने दर्शन पाया था।।
'माखन दादा' का आशीष मिला तुमने आकाश छुआ।
सत्याग्रह-कारागृह को नव भारत तीर्थ बनाया था।।
देश स्वतंत्र कराया तुमने, करती रहीं लोक कल्याण।
है दुर्भाग्य हमारा, प्रभु ने तुमको शीघ्र बुलाया था।।
जाकर भी तुम गयी नहीं हो; हम सबमें तुम ज़िंदा हो।
आजादी के महायज्ञ को तुमने सफल बनाया था।।
जबलपुर की जान सुभद्रा, हिन्दुस्तां की शान थीं।
दर्शन हुए न लेकिन तुमको सदा साथ ही पाया था।।
१५-२-२०२२
***
सॉनेट
वसुधा
वसुधा धीरजवान गगन सी।
सखी पीर को गले लगाती।
चुप सह लेती, फिर मुसकाती।।
रही गुनगुना आप मगन सी।।
करें कनुप्रिया का हरि वंदन।
साथ रहें गोवर्धन पूजें।
दूर रहें सुधियों में डूबें।।
विरह व्यथा हो शीतल चंदन।
सुख मेहमां, दुख रहवासी हम।
विपिन विहारी, वनवासी हम।
भोग-योगकर सन्यासी हम।।
वसुधा पर्वत-सागर जंगल।
वसुधा खातिर होते दंगल।
वसुधा करती सबका मंगल।।
१४-२-२०२२
•••
एक रचना
कृष्ण कौन हैं?
*
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
समय साक्षी; स्वयं मौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
*
कृष्ण पीर हैं,
दर्द-व्यथा की अकथ कथा हैं।
कष्ट-समुद ही गया मथा हैं।
जननि-जनक से दूर हुए थे,
विवश पूतना, दुष्ट बकासुर,
तृणावर्त, यमलार्जुन, कालिय,
दंभी इंद्र, कंस से निर्भय
निपट अकेले जूझ रहे थे,
नग्न-स्नान कुप्रथा-रूढ़ि से,
अंधभक्ति-श्रद्धा विमूढ़ से,
लडे-भिड़े, खुद गाय चराई,
वेणु बजाई, रास रचाई।
छूम छनन छन, ता-ता-थैया,
बलिहारी हों बाबा-मैया,
उभर सके जननायक बनकर,
मिटा विपद ठांड़े थे तनकर,
बंधु-सखा, निज भूमि छोड़ क्या
आँखें रहते सूर हुए थे?
या फिर लोभस्वार्थ के कारण
तजी भूमि; मजबूर हुए थे?
नहीं 'लोकहित' साध्य उन्हें था,
सत्-शिव ही आराध्य उन्हें था,
इसीलिए तो वे सुंदर थे,
मनभावन मोहक मनहर थे।
थे कान्हा गोपाल मुरारी
थे घनश्याम; जगत बलिहारी
पौ फटती लालिमा भौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
समय साक्षी; स्वयं मौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
*
कृष्ण दीन हैं,
आम आदमी पर न हीन हैं।
निश-दिन जनहित हेतु लीन हैं।
प्राणाधिक प्रिय गोकुल छोड़ा,
बन रणछोड़ विमुख; मुख मोड़ा,
जरासंध कह हँसा 'भगोड़ा',
समुद तीर पर बसा द्वारिका
प्रश्न अनेकों बूझ रहे थे।
कालयवन से जा टकराए,
आक्रांता मय दनु चकराए,
नहीं अनीति सहन कर पाए,
कर्म-पंथ पर कदम बढ़ाए।
द्रुपदसुता की लाज न जाए,
मान रुक्मिणी का रह पाए,
पार्थ-सुभद्रा शक्ति-संतुलन,
धर्म वरें, कर अरि-भय-भंजन,
चक्र सुदर्शन लिए हाथ में
शीश काटते क्रूर हुए थे?
या फिर अहं-द्वेष-जड़ता वर
अहंकार से चूर हुए थे?
नहीं 'देशहित' साध्य उन्हें था,
सुख तजना आराध्य उन्हें था,
इसीलिए वे नटनागर थे,
सत्य कहूँ तो भट नागर थे।
चक्र सुदर्शन के धारक थे,
शिशुपालों को ग्रह मारक थे,
धर्म-पथिक के लिए पौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
समय साक्षी; स्वयं मौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
*
कृष्ण छली हैं,
जो जग सोचे कभी न करते।
जो न रीति है; वह पथ वरते।
बढ़ें अकेले; तनिक न डरते,
साथ अनेकों पग चल पड़ते।
माधव को कंकर में शंकर,
विवश पाण्डवों में प्रलयंकर,
दिखे; प्रश्न-हल सूझ रहे थे।
कर्म करो फल की चिंता बिन,
लड़ो मिटा अन्यायी गिन-गिन,
होने दो ताण्डव ता तिक धिन,
भीष्म-द्रोण के गए बीत दिन।
नवयुग; नवनिर्माण राह नव,
मिटे पुरानी; मिले छाँह नव,
सबके हित की पले चाह नव,
हो न सुदामा सी विपन्नता,
और न केवल कुछ में धनता।
क्या हरि सच से दूर हुए थे?
सुख समृद्धि यशयुक्त द्वारिका
पाकर खुद मगरूर हुए थे?
नहीं 'प्रजा हित' साध्य उन्हें था,
मिटना भी आराध्य उन्हें था,
इसीलिए वे उन्नायक थे,
जगतारक शुभ के गायक थे।
थे जसुदासुत-देवकीनंदन
मनुज माथ पर शोभित चंदन
जीवनसत्व सुस्वादु नौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
समय साक्षी; स्वयं मौन हैं।
कौन बताए
कृष्ण कौन हैं?
१५-२-२०२१
***
एक रचना :
समा गया तुम में
---------------------
समा गया है तुममें
यह विश्व सारा
भरम पाल तुमने
पसारा पसारा
*
जो आया, गया वह
बचा है न कोई
अजर कौन कहिये?
अमर है न कोई
जनम बीज ने ही
मरण बेल बोई
बनाया गया तुमसे
यह विश्व सारा
भरम पाल तुमने
पसारा पसारा
*
किसे, किस तरह, कब
कहाँ पकड़ फाँसे
यही सोच खुद को
दिये व्यर्थ झाँसे
सम्हाले तो पाया
नहीं शेष साँसें
तुम्हारी ही खातिर है
यह विश्व सारा
वहम पाल तुमने
पसारा पसारा
***
लघुकथा
संदेश और माफी
*
जब आपको माफी ही माँगनी थी तो आपने आतंकवादी के नाम के साथ 'जी' क्यों जोड़ा? पूछा पत्रकार ने।
इतना समझ पाते तो तुम भी नेता न बन जाते। 'जी' जोड़ने से आतंकवादियों, अल्पसंख्यकों और विदेशी आकाओं तक सन्देश पहुँच गया और माफी माँगकर आपत्ति उठानेवालों को जवाब तो दिया ही उनके नेताओं के नाम लेकर उन्हें आतंवादियों से समक्ष भी खड़ा कर दिया।
लेकिन इससे तो संतोष भड़केगा, आन्दोलन होंगे, जुलूस निकलेंगे, अशांति फैलेगी, तोड़-फोड़ से देश का नुकसान होगा।
हाँ, यह सब अपने आप होगा, न हुआ तो हम कराएँगे और उसके लिये सरकार को दोषी और देश को असहिष्णु बताकर अपने अगले चुनाव के लिये जमीन तैयार करेंगे।
१५.२.२०१६
***
नवगीत:
*
अहंकार का
सिर नीचा
.
अपनेपन की
जीत है
करिए सबसे प्रीत
सहनशीलता
हमेशा
है सर्वोत्तम रीत
सद्भावों के
बाग़ में
पले सृजन की नीत
कलमकार को
भुज-भींचा
अहंकार का
सिर नीचा
.
पद-मद का
जिस पर चढ़ा
उतरा शीघ्र बुखार
जो जमीन से
जुड़ रहा
उसको मिला निखार
दोष न
औरों का कहो
खुद को रखो सँवार
रखो मनोबल
निज ऊँचा
अहंकार का
सिर नीचा
.
पर्यावरण
न मलिन कर
पवन-salilसलिल रख साफ
करता दरिया-
दिल सदा
दोष अन्य के माफ़
निबल-सबल को
एक सा
मिले सदा इन्साफ
गुलशन हो
मरु गर सींचा
अहंकार का
सिर नीचा
१५.२.२०१५
***
नित छंद
*
दो पदी, चार चरणीय, १२ मात्राओं के मात्रिक नित छंद में चरणान्त में रगण, सगण या नगण होते हैं.
उदाहरण:
१. नित जहाँ होगा नमन, सत वहाँ होगा रसन
राशियाँ ले गंग जल, कर रहीं हँस आचमन
२. जां लुटाते देश पर, जो वही होते अमर
तिरंगा जब लहरता, गीत गाता आसमां
३. नित गगन में रातभर, खेलते तारे नखत
निशा सँग शशि नाचता, देखकर नभ विहँसता
*
१. लक्षण संकेत: नित = छंद का नाम, रसन = चरणान्त में रगण, सगण या नगण, राशियाँ = १२ मात्रायें
१५-२-२०१४
***
द्विपदि सलिला:
*
जब तक था दूर कोई इसे जानता न था.
तुमको छुआ तो लोहे से सोना हुआ 'सलिल'.
*
वीरानगी का क्या रहा आलम न पूछिए.
दिल ले लिया तुमने तभी आबाद यह हुआ..
*
जाता है कहाँ रास्ता? कैसे बताऊँ मैं??
मुझ से कई गए न तनिक रास्ता हिला..
*
बस में नहीं दिल के, कि बस के फिर निकल सके.
परबस न जो हुए तो तुम्हीं आ निकाल दो..
*
जो दिल जला है उसके दिल से दिल मिला 'सलिल'
कुछ आग अपने दिल में लगा- जग उजार दे.. ..
***
बाल गीत:
लँगड़ी खेलें.....
*
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
***
गीत :
आशियाना ...
*
धरा की शैया सुखद है,
नील नभ का आशियाना ...
संग लेकिन मनुज तेरे
कभी भी कुछ भी न जाना ...
*
जोड़ता तू फिर रहा है,
मोह-मद में घिर रहा है।
पुत्र है परब्रम्ह का पर
वासना में तिर रहा है।
पंक में पंकज सदृश रह-
सीख पगले मुस्कुराना ...
*
उग रहा है सूर्य नित प्रति,
चाँद संध्या खिल रहा है।
पालता है जो किसी को,
वह किसी से पल रहा है।
मिले उतना ही लिखा है-
जहाँ जिसका आब-दाना ...
*
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या??,
कौन जाता संग किसके?
संग सब आनंद में हों,
दर्द-विपदा देख खिसकें।
भावना भरमा रहीं मन,
कामना कर क्यों ठगाना?...
*
रहे जिसमें ढाई आखर,
खुशनुमा है वही बाखर।
सुन खन-खन सतत जो-
कौन है उससे बड़ा खर?
छोड़ पद-मद की सियासत
ओढ़ भगवा-पीत बाना ...
*
कब भरी है बोल गागर?,
रीतता क्या कभी सागर??
पाई जैसी त्याग वैसी
'सलिल' निर्मल श्वास चादर।
हंस उड़ चल बस वही तू
जहाँ है अंतिम ठिकाना ...
१५-२-२०१३
***

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

१४ फरवरी, त्रिभंगी, बसंत, वेलेंटाइन, हाइकु, रौद्राक छंद, हरिगीतिका, लघुकथा, नवगीत, सोनेट, हास्य, दोहा

सलिल सृजन १४ फरवरी
*
सॉनेट
सदा सुहागिन
खिलती-हँसती सदा सुहागिन।
प्रिय-बाहों में रहे चहकती।
वर्षा-गर्मी हँसकर सहती।।
करे मकां-घर सदा सुहागिन।।
गमला; क्यारी या वन-उपवन।
जड़ें जमा ले, नहीं भटकती।
बाधाओं से नहीं अटकती।।
कहीं न होती किंचित उन्मन।।
दूर व्याधियाँ अगिन भगाती।
अपनों को संबल दे-पाती।
जीवट की जय जय गुंजाती।।
है अविनाशी सदा सुहागिन।
प्रिय-मन-वासी सदा सुहागिन।
बारहमासी सदा सुहागिन
•••
सॉनेट
रामजी
मन की बातें करें रामजी।
वादे कर जुमला बतला दें।
जन से घातें करें रामजी।।
गले मिलें, ठेंगा दिखला दे।।
अपनी छवि पर आप रीझते।
बात-बात में आग उगलते।
सत्य देख-सुन रूठ-खीजते।।
कड़वा थूकें, मधुर निगलते।।
टैक्स बढ़ाएँ, रोजी छीने।
चीन्ह-चीन्ह रेवड़ियाँ बाँटें।
ख्वाब दिखाते कहें नगीने।।
काम कराकर मारें चाँटे।।
सिय जंगल में पठा रामजी।
सत्ता सुख लें ठठा रामजी।।
१४-२-२०२२
•••
सॉनेट
वसुधा
वसुधा धीरजवान गगन सी।
सखी पीर को गले लगाती।
चुप सह लेती, फिर मुसकाती।।
रही गुनगुना आप मगन सी।।
करें कनुप्रिया का हरि वंदन।
साथ रहें गोवर्धन पूजें।
दूर रहें सुधियों में डूबें।।
विरह व्यथा हो शीतल चंदन।
सुख मेहमां, दुख रहवासी हम।
विपिन विहारी, वनवासी हम।
भोग-योगकर सन्यासी हम।।
वसुधा पर्वत-सागर जंगल।
वसुधा खातिर होते दंगल।
वसुधा करती सबका मंगल।।
१४-२-२०२२
•••
मुक्तिका
*
बात करिए तो बात बनती है
बात बेबात हो तो खलती है
बात कह मत कहें उसे जुमला-
बात भूलें तो नाक कटती है
बात सच्ची तो मूँछ ऊँची हो
बात कच्ची न तुझ पे फबती है
बात की बात में जो बात बने
बात सौगात होती रचती है
बात का जो धनी भला मानुस
बात से जात पता चलती है
बात सदानंद दे मिटाए गम
बात दुनिया में तभी पुजती है
बात करता 'सलिल' कवीश्वर से
होती करताल जिह्वा भजती है
१४-२-२०२१
***
कार्यशाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
*
"बाधाओं से भागना, हिम्मत का अपमान।
बाधाओं का सामना, वीरों की पहचान।" -पुष्पा जोशी
वीरों की पहचान, रखें पुष्पा मन अपना
जोशीली मन-वृत्ति, करें पूरा हर सपना
बने जीव संजीव, जीतकर विपदाओं से
सलिल मिटा जग तृषा, जूझकर बाधाओं से।।' - सलिल
***
हास्य रचना
मिली रूपसी मर मिटा, मैं न करी फिर देर।
आँख मिला झट से कहा, ''है किस्मत का फेर।।
एक दूसरे के लिए, हैं हम मेरी जान।
अधिक जान से 'आप' को, मैं चाहूँ लें मान।।"
"माना लेकिन 'भाजपा', मुझको भाती खूब।
'आप' छोड़ विश्वास को, हो न सके महबूब।।"
जीभ चिढ़ा ठेंगा दिखा, दूर हुई हो लाल।
कमलमुखी मैं पीटता, हाय! 'आप' कह भाल।।
१४-२-२०१८
***
दोहा सलिला
*
[भ्रमर दोहा- २६ वर्ण, ४ लघु, २२ गुरु]
मात्राएँ हों दीर्घ ही, दोहा में बाईस
भौंरे की गुंजार से, हो भौंरी को टीस
*
फैलुं फैलुं फायलुं, फैलुं फैलुं फाय
चोखा दोहा भ्रामरी, गुं-गुं-गुं गुंजाय
*
श्वासें श्वासों में समा, दो हो पूरा काज,
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज?
*
जीते-हारे क्यों कहो?, पूछें कृष्णा नैन
पाँचों बैठे मौन हो, क्या बोलें बेचैन?
*
तोलो-बोलो ही सही, सीधी सच्ची रीत
पाया-खोने से नहीं, होते हीरो भीत
*
नेता देता है सदा, वादों की सौगात
भूले से माने नहीं, जो बोली थी बात
*
शीशा देखे सुंदरी, रीझे-खीझे मुग्ध
सैंया हेरे दूर से, अंगारे सा दग्ध
*
बोले कैसे बींदड़ी, पाती पाई आज
सिंदूरी हो गाल ने, खोला सारा राज
*
चच्चा को गच्चा दिया, बच्चा ऐंठा खूब
सच्ची लुच्चा हो गया, बप्पा बैठा डूब
*
बुन्देली आल्हा सुनो, फागें भी विख्यात
राई का सानी नहीं, गाओ जी सें तात
***
दोहा सलिला:
वैलेंटाइन
संजीव
*
उषा न संध्या-वंदना, करें खाप-चौपाल
मौसम का विक्षेप ही, बजा रहा करताल
*
लेन-देन ही प्रेम का मानक मानें आप
किसको कितना प्रेम है?, रहे गिफ्ट से नाप
*
बेलन टाइम आगया, हेलमेट धर शीश
घर में घुसिए मित्रवर, रहें सहायक ईश
*
पर्व स्वदेशी बिसरकर, मना विदेशी पर्व
नकद संस्कृति त्याग दी, है उधार पर गर्व
*
उषा गुलाबी गाल पर, लेकर आई गुलाब
प्रेमी सूरज कह रहा, प्रोमिस कर तत्काल
*
धूप गिफ्ट दे धरा को, दिनकर करे प्रपोज
देख रहा नभ मन रहा, वैलेंटाइन रोज
*
रवि-शशि से उपहार ले, संध्या दोनों हाथ
मिले गगन से चाहती, बादल का भी साथ
*
चंदा रजनी-चाँदनी, को भेजे पैगाम
मैंने दिल कर दिया है, दिलवर तेरे नाम
*
पुरवैया-पछुआ कहें, चखो प्रेम का डोज
मौसम करवट बदलता, जब-जब करे प्रपोज
***
लघु कथा
वैलेंटाइन
*
'तुझे कितना समझती हूँ, सुनता ही नहीं. उस छोरी को किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ देता रहता है. इतने दिनों में तो बात आगे बढ़ी नहीं. अब तो उसका पीछा छोड़ दे'
"क्यों छोड़ दूँ? तेरे कहने से रोज सूर्य को जल देता हूँ न? फिर कैसे छोड़ दूँ?"
'सूर्य को जल देने से इसका क्या संबंध?'
"हैं न, देख सूर्य धरती को धू की गिफ्ट देकर प्रोपोज करता हैं न. धरती माने या न माने सोराज धुप देना बंद तो नहीं करता. मैं सूरज की रोज पूजा करून और उससे इतनी सी सीख भी न लूँ की किसी को चाहो तो बदले में कुछ न चाहो, तो रोज जल चढ़ाना व्यर्थ हो जायेगा न? सूरज और धरती की तरह मुझे भी मनाते रहना है वैलेंटाइन."
***
कार्यशाला
कुंडलिया
साजन हैं मन में बसे, भले नजर से दूर
सजनी प्रिय के नाम से, हुई जगत मशहूर -मिथलेश
हुई जगत मशहूर, तड़पती रहे रात दिन
अमन चैन है दूर, सजनि का साजन के बिन
निकट रहे या दूर, नहीं प्रिय है दूजा जन
सजनी के मन बसे, हमेशा से ही साजन - संजीव
***
मुक्तक
महिमा है हिंदी की, गरिमा है हिंदी की, हिंदी बोलिए तो, पूजा हो जाती है
जो न हिंदी बोलते हैं, अंतर्मन न खोलते हैं, अनजाने उनसे ही, भूल हो जाती है
भारती की आरती, उतारते हैं पुण्यवान, नेह नर्मदा आप, उनके घर आती है
रात हो प्रभात, सूर्य कीर्ति का चमकता है, लेखनी आप ही, गंगा में नहाती है
१४-२-२०१७
***
लघुकथा
गद्दार कौन
*
कुछ युवा साथियों के बहकावे में चंद लोगों के बीच एक झंडा दिखाने और कुछ नारों को लगाने का प्रतिफल, पुलिस की लाठी, कैद और गद्दार का कलंक किन्तु उसी घटना को हजारों बार,लाखों दर्शकों और पाठकों तक पहुँचाने का प्रतिफल देशभक्त होने का तमगा क्यों?
यदि ऐसी दुर्घटना प्रचार न किया जाए तो वह चंद क्षणों में चंद लोगों के बीच अपनी मौत आप न मर जाए? हम देश विरोधियों पर कठोर कार्यवाही न कर उन्हें प्रचारित-प्रसारित कर उनके प्रति आकर्षण बढ़ाने में मदद क्यों करते हैं? गद्दार कौन है नासमझी या बहकावे में एक बार गलती करने वाले या उस गलती का करोड़ गुना प्रसार कर उसकी वृद्धि में सहायक होने वाले?
***
रसानंद दे छंद नर्मदा १५ : हरिगीतिका
दोहा, आल्हा, सार ताटंक,रूपमाला (मदन),चौपाई, छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए हरिगीतिका से.
हरिगीतिका मात्रिक सम छंद हैं जिसके प्रत्येक चरण में २८ मात्राएँ होती हैं । यति १६ और १२ मात्राओं पर होती है। पंक्ति के अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है। भिखारीदास ने छन्दार्णव में गीतिका नाम से 'चार सगुण धुज गीतिका' कहकर हरिगीतिका का वर्णन किया है। हरिगीतिका के पारम्परिक उदाहरणों के साथ कुछ अभिनव प्रयोग, मुक्तक, नवगीत, समस्यापूर्ति (शीर्षक पर रचना) आदि नीचे प्रस्तुत हैं।
छंद विधान: हरिगीतिका X 4 = 11212 की चार बार आवृत्ति
०१. हरिगीतिका २८ मात्रा का ४ समपाद मात्रिक छंद है।
०२. हरिगीतिका में हर पद के अंत में लघु-गुरु ( छब्बीसवी लघु, सत्ताइसवी-अट्ठाइसवी गुरु ) अनिवार्य है।
०३. हरिगीतिका में १६-१२ या १४-१४ पर यति का प्रावधान है।
०४. सामान्यतः दो-दो पदों में समान तुक होती है किन्तु चारों पदों में समान तुक, प्रथम-तृतीय-चतुर्थ पद में समान तुक भी हरिगीतिका में देखी गयी है।
०५. काव्य प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के अनुसार हर सतकल अर्थात चरण में (11212) पाँचवी, बारहवीं, उन्नीसवीं तथा छब्बीसवीं मात्रा लघु होना चाहिए। कविगण लघु को आगे-पीछे के अक्षर से मिलकर दीर्घ करने की तथा हर सातवीं मात्रा के पश्चात् चरण पूर्ण होने के स्थान पर पूर्व के चरण काअंतिम दीर्घ अक्षर अगले चरण के पहले अक्षर या अधिक अक्षरों से संयुक्त होकर शब्द में प्रयोग करने की छूट लेते रहे हैं किन्तु चतुर्थ चरण की पाँचवी मात्रा का लघु होना आवश्यक है।
मात्रा बाँट: I I S IS S SI S S S IS S I I IS या ।। ऽ। ऽ ऽ ऽ।ऽ।।ऽ। ऽ ऽ ऽ। ऽ
कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए ।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥
उदाहरण :
०१. मम मातृभूमिः भारतं धनधान्यपूर्णं स्यात् सदा।
नग्नो न क्षुधितो कोऽपि स्यादिह वर्धतां सुख-सन्ततिः।
स्युर्ज्ञानिनो गुणशालिनो ह्युपकार-निरता मानवः,
अपकारकर्ता कोऽपि न स्याद् दुष्टवृत्तिर्दांवः ॥
०२. निज गिरा पावन करन कारन, राम जस तुलसी कह्यो. (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०३. दुन्दुभी जय धुनि वेद धुनि, नभ नगर कौतूहल भले. (रामचरित मानस)
(यति १४-१४ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०४. अति किधौं सरित सुदेस मेरी, करी दिवि खेलति भली। (रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५वी-१९ वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०५. जननिहि बहुरि मिलि चलीं उचित असीस सब काहू दई। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, १२ वी, २६ वी मात्राएँ दीर्घ, ५ वी, १९ वी मात्राएँ लघु)
०६. करुना निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०७. इहि के ह्रदय बस जानकी जानकी उर मम बास है। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १९ वी मात्रा दीर्घ)
०८. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
०९. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
१०. जिसको न निज / गौरव तथा / निज देश का / अभिमान है।
वह नर नहीं / नर-पशु निरा / है और मृतक समान है। (मैथिलीशरण गुप्त )
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
११. जब ज्ञान दें / गुरु तभी नर/ निज स्वार्थ से/ मुँह मोड़ता।
तब आत्म को / परमात्म से / आध्यात्म भी / है जोड़ता।।(संजीव 'सलिल')
अभिनव प्रयोग:
हरिगीतिका मुक्तक:
पथ कर वरण, धर कर चरण, थक मत चला, चल सफल हो.
श्रम-स्वेद अपना नित बहा कर, नव सृजन की फसल बो..
संचय न तेरा साध्य, कर संचय न मन की शांति खो-
निर्मल रहे चादर, मलिन हो तो 'सलिल' चुपचाप धो..
*
करता नहीं, यदि देश-भाषा-धर्म का, सम्मान तू.
धन-सम्पदा, पर कर रहा, नाहक अगर, अभिमान तू..
अभिशाप जीवन बने तेरा, खो रहा वरदान तू-
मन से असुर, है तू भले, ही जन्म से इंसान तू..
*
करनी रही, जैसी मिले, परिणाम वैसा ही सदा.
कर लोभ तूने ही बुलाई शीश अपने आपदा..
संयम-नियम, सुविचार से ही शांति मिलती है 'सलिल'-
निस्वार्थ करते प्रेम जो, पाते वही श्री-संपदा..
*
धन तो नहीं, आराध्य साधन मात्र है, सुख-शांति का.
अति भोग सत्ता लोभ से, हो नाश पथ तज भ्रान्ति का..
संयम-नियम, श्रम-त्याग वर, संतोष कर, चलते रहो-
तन तो नहीं, है परम सत्ता उपकरण, शुचि क्रांति का..
*
करवट बदल ऋतुराज जागा विहँस अगवानी करो.
मत वृक्ष काटो, खोद पर्वत, नहीं मनमानी करो..
ओजोन है क्षतिग्रस्त पौधे लगा हरियाली करो.
पर्यावरण दूषित सुधारो अब न नादानी करो..
*
उत्सव मनोहर द्वार पर हैं, प्यार से मनुहारिए.
पथ भोर-भूला गहे संध्या, विहँसकर अनुरागिए ..
सबसे गले मिल स्नेहमय, जग सुखद-सुगढ़ बनाइए.
नेकी विहँसकर कीजिए, फिर स्वर्ग भू पर लाइए..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
जलसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें अनवरत, लय सधे सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
त्यौहार पर दिल मिल खिलें तो, बज उठें शहनाइयाँ.
मड़ई मेले फेसटिवल या हाट की पहुनाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या संग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप निज प्रतिमान को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियाँ अनुमान को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यही है, इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध विनती निवेदन है व्यर्थ मत टकराइए.
हर इल्तिजा इसरार सुनिए, अर्ज मत ठुकराइए..
कर वंदना या प्रार्थना हों अजित उत्तम युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
*
समस्यापूर्ति
बाँस (हरिगीतिका)
*
रहते सदा झुककर जगत में सबल जन श्री राम से
भयभीत रहते दनुज सारे त्रस्त प्रभु के नाम से
कोदंड बनता बाँस प्रभु का तीर भी पैना बने
पतवार बन नौका लगाता पार जब अवसर पड़े
*
बँधना सदा हँस प्रीत में, हँसना सदा तकलीफ में
रखना सदा पग सीध में, चलना सदा पग लीक में
प्रभु! बाँस सा मन हो हरा, हो तीर तो अरि हो डरा
नित रीत कर भी हो भरा, कस लें कसौटी हो खरा
*
नवगीत:
*
पहले गुना
तब ही चुना
जिसको ताजा
वह था घुना
*
सपना वही
सबने बना
जिसके लिए
सिर था धुना
*
अरि जो बना
जल वो भुना
वह था कहा
सच जो सुना
.
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका)
नवगीत:
*
करना सदा
वह जो सही
*
तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं मन भी खिले
वरना सदा
वह जो सही
भरना सदा
वह जो सही
*
गिरता रहा, उठता रहा
मिलता रहा, छिनता रहा
सुनता रहा, कहता रहा
तरता रहा, मरता रहा
लिखना सदा
वह जो सही
दिखना सदा
वह जो सही
*
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
सहना सदा
वह जो सही
तहना सदा
वह जो सही
*
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका)
१४.२.२०१६
एक रचना-
*
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो स्याह सुफेद सरीखो
तुमरो धौला कारो दीखो
पंडज्जी ने नोंचो-खाओ
हेर सनिस्चर भी सरमाओ
घना बाज रओ थोथा दाना
ठोस पका
हिल-मिल खा जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो पाप पुन्न सें बेहतर
तुमरो पुन्न पाप सें बदतर
होते दिख रओ जा जादातर
ऊपर जा रो जो बो कमतर
रोन न दे मारे भी जबरा
खूं कहें आँसू
चुप पी जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
८.२.२०१६
***
नवगीत-
महाकुम्भ
*
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
आशाओं की
वल्लरियों पर
सुमन खिले हैं।
बिन श्रम, सीकर
बिंदु, वदन पर
आप सजे हैं।
पलक उठाने में
भारी श्रम
किया न जाए-
रूपगर्विता
सम्मुख अवनत
प्रणय-दंभ है।
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
रति से रति कर
बौराई हैं
केश लताएँ।
अलक-पलक पर
अंकित मादक
मिलन घटाएँ।
आती-जाती
श्वास और प्रश्वास
कहें चुप-
अनहोनी होनी
होते लख
जग अचंभ है।
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
एच ए ७ अमरकंटक एक्सप्रेस
३. ४२, ६-२-२०१६
***
नवगीत:
.
जन चाहता
बदले मिज़ाज
राजनीति का
.
भागे न
शावकों सा
लड़े आम आदमी
इन्साफ मिले
हो ना अब
गुलाम आदमी
तन माँगता
शुभ रहे काज
न्याय नीति का
.
नेता न
नायकों सा
रहे आक आदमी
तकलीफ
अपनी कह सके
तमाम आदमी
मन चाहता
फिसले न ताज
लोकनीति का
(रौद्राक छंद)
****
द्विपदी / शे'र
लब तरसते रहे आयीं न, चाय भिजवा दी
आह दिल ने करी, लब दिलजले का जला.
***
हाइकु
.
दर्द की धूप
जो सहे बिना झुलसे
वही है भूप
.
चाँदनी रात
चाँद को सुनाते हैं
तारे नग्मात
.
शोर करता
बहुत जो दरिया
काम न आता
.
गरजते हैं
जो बादल वे नहीं
बरसते हैं
.
बैर भुलाओ
वैलेंटाइन मना
हाथ मिलाओ
.
मौन तपस्वी
मलिनता मिटाये
नदी का पानी
.
नहीं बिगड़ा
नदी का कुछ कभी
घाट के कोसे
.
गाँव-गली के
दिल हैं पत्थर से
पर हैं मेरे
.
गले लगाते
हँस-मुस्काते पेड़
धूप को भाते
१४-२-२०१५
***
मुक्तक
वैलेंटाइन पर्व:
*
भेंट पुष्प टॉफी वादा आलिंगन भालू फिर प्रस्ताव
लला-लली को हुआ पालना घर से 'प्रेम करें' शुभ चाव
कोई बाँह में, कोई चाह में और राह में कोई और
वे लें टाई न, ये लें फ्राईम, सुबह-शाम बदलें का दौर
***
त्रिभंगी सलिला:
ऋतुराज मनोहर...
*
ऋतुराज मनोहर, प्रीत धरोहर, प्रकृति हँसी, बहु पुष्प खिले.
पंछी मिल झूमे, नभ को चूमे, कलरव कर भुज भेंट मिले..
लहरों से लहरें, मिलकर सिहरें, बिसरा शिकवे भुला गिले.
पंकज लख भँवरे, सजकर सँवरे, संयम के दृढ़ किले हिले..
*
ऋतुराज मनोहर, स्नेह सरोवर, कुसुम कली मकरंदमयी.
बौराये बौरा, निरखें गौरा, सर्प-सर्पिणी, प्रीत नयी..
सुरसरि सम पावन, जन मन भावन, बासंती नव कथा जयी.
दस दिशा तरंगित, भू-नभ कंपित, प्रणय प्रतीति न 'सलिल' गयी..
*
ऋतुराज मनोहर, सुनकर सोहर, झूम-झूम हँस नाच रहा.
बौराया अमुआ, आया महुआ, राई-कबीरा बाँच रहा..
पनघट-अमराई, नैन मिलाई के मंचन के मंच बने.
कजरी-बम्बुलिया आरोही-अवरोही स्वर हृद-सेतु तने..
१४-२-२०१३
***