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रविवार, 28 मार्च 2021

मुक्तिका

मुक्तिका
*
कहाँ गुमी गुड़धानी दे दो
किस्सोंवाली नानी दे दो
बासंती मस्ती थोड़ी सी
थोड़ी भंग भवानी दे दो
साथ नहीं जाएगा कुछ भी
कोई प्रेम निशानी दे दो
मोती मानुस चून आँख को
बिन माँगे ही पानी दे दो
मीरा की मुस्कान बन सके
बंसी-ध्वनि सी बानी दे दो
*
संजीव
२७-३-२०२०

मुक्तक

मुक्तक
शशि त्यागी है सदा से, करे चाँदनी दान
हरी हलाहल की तपिश, शिव चढ़ पाया मान
सुंदरता पर्याय बन, कवियों से पा प्रेम
सलिल धार में छवि लखे, माँगे जग की क्षेम
२७-३-२०२०

लेख: संतान बनो

लेख:
संतान बनो
*
इसरो के वैज्ञानिकों ने देश के बाहरी शत्रुओं की मिसाइलों, प्रक्षेपास्त्रों व अंतरिक्षीय अड्डों को नष्ट करने की क्षमता का सफल क्रियान्वयन कर हम सबको 'शक्ति की भक्ति' का पाठ पढ़ाया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश बाहरी शत्रुओं से बहादुर सेना और सुयोग्य वैग्यानिकों की दम पर निपट सकता है। मेरा कवि यह मानते हुए भी 'जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि' तथा 'सम्हल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से' की घुटी में मिली सीख भूल नहीं पाता।
लोकतंत्र के भीतरी दुश्मन कौन और कहाँ हैं, कब-कैसे हमला करेंगे, उनसे बचाव कौन-कैसे करेगा जैसे प्रश्नों के उत्तर चाहिए?
सचमुच चाहिए या नेताओं के दिखावटी देशप्रेम की तरह चुनावी वातावरण में उत्तर चाहने का दिखावा कर रहे हो?
सचमुच चाहिए
तुम कहते हो तो मान लेता हूँ कि लोकतंत्र के भीतरी शत्रुओं को जानना और उनसे लोकतंत्र को बचाना चाहते हो। इसके लिए थोड़ा कष्ट करना होगा।
घबड़ाओ मत, न तो अपनी या औलाद की जान संकट में डालना है, न धन-संपत्ति में से कुछ खर्च करना है।
फिर?
फिर... करना यह है कि आइने के सामने खड़ा होना है।
खड़े हो गए? अब ध्यान से देखो। कुछ दिखा?
नहीं?
ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम आइने के सामने हो और कुछ न दिखे। झिझको मत, जो दिख रहा है बताओ।
तुम खुद... ठीक है, आइना तो अपनी ओर से कुछ जोड़ता-घटाता नहीं है, सामने तुम खड़े हो तो तुम ही दिखोगे।
तुम्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिला?
नहीं?, यह तो हो ही नहीं सकता, आईना तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर ही दिखा रहा है।
चौंक क्यों रहे हो? हमारे लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा और उस खतरे से बचाव का एकमात्र उपाय दोनों तुम ही हो।
कैसे?
बताता हूँ। तुम कौन हो?
आदमी
वह तो जानता हूँ पर इसके अलावा...
बेटा, भाई, मित्र, पति, दामाद, जीजा, कर्मचारी, व्यापारी, इस या उस धर्म-पंथ-गुरु या राजनैतिक दल या नेता के अनुयायी...
हाँ यह सब भी हो लेकिन इसके अलावा?
याद नहीं आ रहा तो मैं ही याद दिला देता हूँ। याद दिलाना बहुत जरूरी है क्योंकि वहीं समस्या और समाधान है।
जो सबसे पहले याद आना चाहिए और अंत तक याद नहीं आया वह यह कि तुम, मैं, हम सब और हममें से हर एक 'संतान' है। 'संतान होना' और 'पुत्र होना' शब्द कोश में एक होते हुए भी, एक नहीं है।
'पुत्र' होना तुम्हें पिता-माता पर आश्रित बनाता है, वंश परंपरा के खूँटे से बाँधता है, परिवार पोषण के ताँगे में जोतता है, कभी शोषक, कभी शोषित और अंत में भार बनाकर निस्सार कर देता है, फिर भी तुम पिंजरे में बंद तोते की तरह मन हो न हो चुग्गा चुगते रहते हो और अर्थ समझो न समझो राम नाम बोलते रहते हो।
संतान बनकर तुम अंधकार से प्रकाश पाने में रत भारत माता (देश नहीं, पिता भी नहीं, पाश्चात्य चिंतन देश को पिता कहता है, पौर्वात्य चिंतन माता, दुनिया में केवल एक देश है जिसको माता कहा जाता है, वह है भारत) का संतान होना तुम्हें विशिष्ट बनाता है।
कैसे?
क्या तुम जानते हो कि देश को विदेशी ताकतों से मुक्त कराने वाले असंख्य आम जन, सर्वस्व त्यागने वाले साधु-सन्यासी और जान हथेली पर लेकर विदेशी शासकों से जूझनेवाले पंथ, दल, भाषा, भूषा, व्यवसाय, धन-संपत्ति, शिक्षा, वाद, विचार आदि का त्याग कर भारत माता की संतान मात्र होकर स्वतंत्रता का बलिवेदी पर हँसते-हँसते शीश समर्पित करते रहे थे?
भारत माँ की संतान ही बहरों को सुनाने के लिए असेंबली में बम फोड़ रही थी, आजाद हिंद फौज बनाकर रणभूमि में जूझ रही थी।
लोकतंत्र को भीतरी खतरा उन्हीं से है जो संतान नहीं है और खतरा तभी मिलेगा जब हम सब संतान बन जाएँगे। घबरा मत, अब संतान बनने के लिए सिर नहीं कटाना है, जान की बाजी नहीं लगाना है। वह दायित्व तो सेना, वैग्यानिक और अभियंता निभा ही रहे हैं।
अब लोकतंत्र को बचाने के लिए मैं, तुम, हम सब संतान बनकर पंथ, संप्रदाय, दल, विचार, भाषा, भूषा, शिक्षा, क्षेत्र, इष्ट, गुरु, संस्था, आहार, संपत्ति, व्यवसाय आदि विभाजक तत्वों को भूलकर केवल और केवल संतान को नाते लोकहित को देश-हित मानकर साधें-आराधें।
लोकतंत्र की शक्ति लोकमत है जो लोक के चुने हुए नुमाइंदों द्वारा व्यक्त किया जाता है।
यह चुना गया जनप्रतिनिधि संतान है अथवा किसी वाद, विचार, दल, मठ, नेता, पंथ, व्यवसायी का प्रतिनिधि? वह जनसेवा करेगा या सत्ता पाकर जनता को लूटेरा? उसका चरित्र निर्मल है या पंकिल? हर संतान, संतान को ही चुने। संतान उम्मीदवार न हो तो निराश मत हो, 'नोटा' अर्थात इनमें से कोई नहीं तो मत दो। तुम ऐसा कर सके तो राजनैतिक सट्टेबाजों, दलों, चंदा देकर सरकार बनवाने और देश लूटनेवालों का बाजी गड़बडा़कर पलट जाएगी।
यदि नोटा का प्रतिशत ५००० प्रतिशत या अधिक हुआ तो दुबारा चुनाव हो और इस चुनाव में खड़े उम्मीदवारों को आजीवन अयोग्य घोषित किया जाए।
पिछले प्रादेशिक चुनाव में सब चुनावी पंडितों को मुँह की खानी पड़ी क्योंकि 'नोटा' का अस्त्र आजमाया गया। आयाराम-गयाराम का खेल खेल रहे किसी दलबदलू को कहीं मत न दे, वह किसी भी दल या नेता को नाम पर मत माँगे, उसे हरा दो। अपराधियों, सेठों, अफसरों, पूँजीपतियों को ठुकराओ। उन्हें चुने जो आम मतदाता की औसत आय के बराबर भत्ता लेकर आम मतदाता को बीच उन्हीं की तरह रहने और काम करने को तैयार हो।
लोकतंत्र को बेमानी कर रहा दलतंत्र ही लोकतंत्र का भीतरी दुश्मन है। नेटा के ब्रम्हास्त्र से- दलतंत्र पर प्रहार करो। दलाधारित चुनाव संवैधानिक बाध्यता नहीं है। संतान बनकर मतदाता दलीय उम्मीदवारों के नकारना लगे और खुद जनसेवी उम्मीदवार खड़े करे जो देश की प्रति व्यक्ति औसत आय से अधिक भत्ता न लेने और सब सुविधाएँ छोड़ने का लिखित वायदा करे, उसे ही अवसर दिया जाए।
संतान को परिणाम की चिंता किए बिना नोटा का ब्रम्हास्त्र चलाना है। सत्तर साल का कुहासा दो-तीन चुनावों में छूटने लगेगा।
आओ! संतान बनो।
२८-३-२०१९
*

मुक्तिका

मुक्तिका
संजीव
*
मुझमें कितने 'मैं' बैठे हैं?, किससे आँख मिलाऊँ मैं?
क्या जाने क्यों कब किस-किससे बरबस आँख चुराऊँ मैं??
*
खुद ही खुद में लीन हुआ 'मैं', तो 'पर' को देखे कैसे?
बेपर की भरता उड़ान पर, पर को तौल न पाऊँ मैं.
*
बंद करूँ जब आँख, सामना तुमसे होता है तब ही
कहीं न होकर सदा यहीं हो, किस-किस को समझाऊँ मैं?
*
मैं नादां बाकी सब दाना, दाना रहे जुटाते हँस
पाकर-खोया, खोकर-पाया, खो खुद को पा जाऊँ मैं
*
बोल न अपने ही सुनता मन, व्यर्थ सुनाता औरों को
भूल कुबोल-अबोल सकूँ जब तब तुमको सुन पाऊँ मैं
*
देह गेह है जिसका उसको, मन मंदिर में देख सकूँ
ज्यों कि त्यों धर पाऊँ चादर, तब तो आँख उठाऊँ मैं.
*
आँख दिखाता रहा जमाना, बेगाना है बेगाना
अपना कौन पराया किसको, कह खुद को समझाऊँ मैं?
२८-३-२०१४ 
***

महारास और न्यायालय

त्वरित प्रतिक्रिया
महारास और न्यायालय
*
महारास में भाव था, लीला थी जग हेतु.
रसलीला क्रीडा हुई, देह तुष्टि का हेतु..
न्यायालय अंधा हुआ, बँधे हुए हैं नैन.
क्या जाने राधा-किशन, क्यों खोते थे चैन?.
हलकी-भारी तौल को, माने जब आधार.
नाम न्याय का ले करे, न्यायालय व्यापार..
भारहीन सच को 'सलिल', कोई न सकता नाप.
नाता राधा-किशन का, सके आत्म में व्याप..
*
मन से राधाकिशन तब, 'सलिल' रहे थे संग.
तन से रहते संग अब, लिव इन में कर जंग..
लिव इन में कर जंग, बदलते साथी पल-पल.
कौन बताए कौन, कर रहा है किससे छल?.
नाते पलते मिलें, आजकल केवल धन से.
सलिल न हों संजीव, तभी तो रिश्ते मन से.
२८-३-२०१०
***
संजीव, ७९९९५५९६१८

शनिवार, 27 मार्च 2021

गजल का शिल्प - राजेन्द्र वर्मा

 गजल का शिल्प

- राजेन्द्र वर्मा


छन्दोबद्ध कविता दो प्रकार के छन्दों से बनती है- मात्रिक, अथवा वार्णिक। ग़ज़ल भी इन्हीं छंदों से बनती है. मात्रिक छन्द के उदाहरण हैं- दोहा, चौपाई, अरिल्ल, पादाकुलक, कुण्डल, दिग्पाल सरसी, ताटंक आदि। ये दो प्रकार के होते हैं- सम और विषम।

सम छन्द वे होते हैं जिनकी प्रत्येक पंक्ति में समान मात्राएँ होती हैं, जैसे- ‘चौपाई, अरिल्ल, पादाकुलक, दिग्पाल।’ इस सबमें १६ मात्राएँ होती हैं और अंत में दीर्घ मात्रा आती है, पर अन्त में दीर्घ मात्राओं के आने का पृथक विधान है, जैसे- ‘चौपाई’ के अन्त में दो दीर्घ आते हैं, तो ‘अरिल्ल’ में तीन दीर्घ। 


विषम छन्द के चरणों में मात्राओं की संख्या भिन्न होती है, जैसे- दोहा, सरसी, कुण्डल, ताटंक। इनके प्रथम और तृतीय चरण में जो मात्राएँ होती हैं, वे द्वितीय और चतुर्थ चरण से भिन्न होती हैं. छंदों के मात्रा सम्बन्धी कुछ नियम होते हैं, जैसे- दोहे में चार चरण होते हैं- प्रथम व तृतीय में १३ तथा द्वितीय व चतुर्थ में ११ मात्राएँ होती हैं। प्रथम व तृतीय चरण का अन्त रगण २१२ से तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण का अन्त तगण २२१ या जगण १२१ से होता है। साथ-ही द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में तुकान्त होता है। इसी प्रकार, सरसी छन्द में १६-११ मात्राएँ होती हैं। पहले चरण के अन्त में दो दीर्घ तथा दूसरे चरण के अन्त में दीर्घ-लघु आते हैं। विषम मात्रिक छन्दों में, ‘कुण्डल’ तथा ‘ताटंक’ छन्दों में ग़ज़ल सफलतापूर्वक कही जा सकती है। कुण्डल में २२ मात्राएँ होती हैं और १२ पर दीर्घ के साथ यति होती है। ताटंक में ३० मात्राएँ होती हैं जिसमें १६ पर दीर्घ के साथ यति होती है। दोनों ही छन्दों के अन्त में दीर्घ आता है। यति का अर्थ है- ठहराव। बच्चन की ‘मधुशाला’ ताटंक छन्द ही में है जिसे कुछ लोग त्रुटिवश 'रुबाई’ कहते हैं। रुबाई २० मात्रिक छंद है जो विभिन्न वार्णिक क्रम में प्रस्तुत की जाती है।

ग़ज़ल प्रायः वार्णिक छन्द में होती है। वार्णिक छन्द की विषेशता यह है कि पहली पंक्ति जिस वर्ण क्रम पर आधारित होगी, दूसरी पंक्ति भी उसी क्रम में होगी, जबकि मात्रिक छन्द में यह क्रम आवश्यक नहीं है। उसकी प्रत्येक पंक्ति में मात्राएँ समान होती हैं, उनका क्रम कुछ भी हो सकता है। आवश्यक यह है कि इस क्रम-विधान में लय बनी रहे। ऐसे प्रयोगों में छन्द की झंकार कथ्य पर हावी रहती है। फिर भी, चौपाई, अरिल्ल, पादाकुलक आदि अनेक १६ मात्राओं के अनेक सम छन्द हैं जिनमें ग़ज़लें सफलतापूर्वक कही जा सकती हैं।

किसी ग़ज़ल में पाँच से लेकर ग्यारह शे’र होते हैं। अधिकतम की संख्या निश्चित नहीं है। मेरे एक मित्र- मधुकर शैदाई ने ५२५ शे’र वाली ग़ज़ल कह कर ‘लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड’ ही बना डाला। लेकिन यह प्रयोग है, सामान्य नियम नहीं। ग़ज़ल का पहला शे’र जिसमें काफ़िया या अथवा काफ़िया-रदीफ़ दोनों होते हैं, ‘मतला’ कहलाता है। मतले का अर्थ है- प्रारम्भ। मतले की पहली पंक्ति ‘मिसरा’ या ‘ऊला’ कहलाती है और उसकी दूसरी पंक्ति- ‘सानी’। जिस ग़ज़ल में दो मतले होते हैं, उन्हें ‘हुस्ने-मतला’ कहा जाता है। कभी-कभी तीन अशआर का मतला होता है। जिस शे’र में शायर अपना संक्षिप्त नाम या तख़ल्लुस (उपनाम) प्रयुक्त करता है, उसे ‘मक्ता’ कहते हैं। यह समापन शे’र होता है। शे’र का बहुवचन ‘अशआर’ कहलाता है। ग़ज़ल में शे’र अलग-अलग भाव-भूमि के होते हैं, जैसे- गुलदस्ते में विविध रंग के फूल। गीत और ग़ज़ल में बुनियादी अन्तर यही है कि गीत किसी भाव विशेष पर केन्द्रित होता है, जबकि ग़ज़ल का हर शेर स्वतंत्र होता है। यही कारण है कि ग़ज़ल में गीत की तरह शीर्षक नहीं होता। हाँ, जब किसी विषय के विभिन्न पहलुओं पर ग़ज़ल के शे’र कहे जाते हैं, तो वह ‘मुसलसल ग़ज़ल’ कहलाती है। मुसलसल माने- पूरी-की-पूरी।

‘वर्ण’ को उर्दू में ‘रुक्न’ कहते हैं जिसका बहुचवचन ‘अरकान’ कहलाता है। हिन्दी छन्द विधान में चूंकि तीन ही वर्णों का युग्म होता है, इसलिए ग़ज़ल के छन्दों को समझने के लिए उर्दू के छन्दविधान का सहारा लेना पड़ता है। हिन्दी का छन्दसूत्र है- यमाताराजभानसलगा। इससे तीन वर्णों की संयुति से एक 'गण' की निर्मिति होती है। पूरे छन्दसूत्र से ८ गण तैयार होते हैं, जैसे- यगण। इसका पूरा नाम है- यमाता। इसमें एक लघु तथा दो दीर्घ वर्ण होते हैं- १२२. इसी प्रकार अन्य गण हैं: मगण- मातारा २२२, तगण- ताराज २२१, रगण- राजभा २१२, जगण- जभान १२१, भगण- भानस २११, नगण- नसल १११, सगण- सलगा ११२.

उर्दू में दो से लेकर पाँच वर्णों तक की एक इकाई बन जाती है, जिसे ‘अरकान’ कहा जाता है, जैसे- दो लघु (११) को ‘फ़उ’ तथा दो दीर्घ (२२) को ‘फेलुन्’ कहा जाता है। लघु-दीर्घ (१२) ‘फ़ऊ’ और दीर्घ-लघु (२१) को ‘फ़ात’ कहते हैं. तीन वार्णिक युग्म में १११ को फ़उल’, १२१ को ‘फ़ऊल’, १२२ को ‘फ़ऊलुन्’ या ‘मफ़ैलुन्’, २११ अथवा ११२ को ‘फेलुन’ या ‘फ़इलुन’, २२१ को ‘फ़इलात्’, २१२ को ‘फाइलुन’ तथा २२२ को ‘फ़इलातुन’ कहते हैं। चार वर्णों में- ११११ को फ़इलुन’, १११२ को फ़ऊलुन’, ११२२ को ‘फ़इलातुन’१२२२ को ‘फ़ऊलातुन’ या मुफ़इलातुन’,२१२२ को ‘फ़ाइलातुन’,२२१२ ‘मुतफाइलुन’ तथा २२२२ को ‘मुतफ़इलातुन’ कहा जाता है. २२१२ (मुतफ़ाइलुन) की चार आवृतियों से हिन्दी का ‘हरगीतिका’ छन्द बन जाता है। इस छंद की विशेषता यह भी है कि इसके नाम की चार आवृत्तियों से ‘हरगीतिका’ छन्द स्वतः निर्मित हो जाता है- ‘हरगीतिका, हरगीतिका, हरगीतिका, हरगीतिका।‘ महाकवि तुलसी का प्रसिद्ध ‘राम-स्तवन’ इसी छन्द में है- “श्रीरामचन्द्रकृपालु भज मन हरण भवभयदारुणम्।”, यद्यपि 'हरण' पर अनुशाशन भंग है- ‘१२’ के स्थान पर ‘२१’ प्रयुक्त हुआ है। पंचवर्णीय अरकान हैं- २२१२२ मुतफ़ाइलातुन्, २१२२२ मुतफ़ऊलातुन, १२१२१ मफाइलात. २२२२२ को दो टुकड़ों में विभक्त कर ‘फेलुन-फ़इलातुन’ अथवा इसका उल्टा, ‘फ़इलातुन, फ़ेलुन’ कहा जा सकता है।

वार्णिक छन्द भी दो प्रकार से निर्मित होते हैं- एक, जिसकी संरचना वर्ण-युग्म की बारम्बारता से होती है और दूसरे, कुछ वर्ण-युग्म के मिश्रण से। दोनों ही प्रकार के छन्दों में लय स्वतः आ जाती है। पहले प्रकार का छन्द किसी गण विशेष को दुहराने से बनता है, जैसे- यगण (१२२) अथवा रगण (२१२) को चार बार दुहरा कर। इसमें लय अपने-आप उत्पन्न हो जायेगी, यथा- यमाता-यमाता-यमाता-यमाता, अथवा, राजभा-राजभा-राजभा-राजभा। हिन्दी के इन गणों को उर्दू में क्रमशः ‘फ़ऊलुन्, फ़ऊलुन् फ़ऊलुन् फ़ऊलुन्’ और ‘फ़ाइलुन्, फ़ाइलुन्, फ़ाइलुन्, फ़ाइलुन्’ कहते हैं. इनसे क्रमशः ‘भुजंगप्रयात’ और ‘स्रग्विणी’ छंद बन जाता है. इन छंदों से बनी मेरी ही गजलों के मक्ते देखिए-

१२२ १२२ १२२ १२२
अगर आपको सच की आदत नहीं है,
तो हमको भी कोई शिकायत नहीं है। (चार ‘यगण’ या ‘फ़ऊलुन’= भुजंगप्रयात छंद)
* * *
२१२ २१२ २१२ २१२
हम निकटतम हुए, धन्यवाद् आपका,
आपके हम हुए, धन्यवाद् आपका। (चार ‘रगण’ या ‘फ़ाइलुन्’= स्रग्विणी छंद)

इन आवृत्तियों को आवश्यकतानुसार घटाया-बढ़ाया भी जा सकता है। उदाहरणार्थ-
२१२ २१२ २१२
हमको जो भी उजाले मिले
तम के घर पलने वाले मिले। (तीन ‘रगण’ या ‘फ़ाइलुन')

कभी-कभी, वर्ण-युग्मों की बारम्बारता से नहीं, अलग-अलग युग्मों की संयुति से छन्द निर्मित होता है, जैसे- ‘उमराव जान’ फि़ल्म की यह ग़ज़ल- “दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए।” इसके अरकान हैं- ‘फ़ेलुन मफ़ाइलात् मफ़ैलुन् मफ़ाइलुन्’- यह उर्दू का ‘मुज़ारे-अख़रब’ कहलाता है। मत्ला और एक शेर देखें-

२२१ २१२१ १२२१ २१२
दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए,
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए। - शहरयार
यहाँ, ‘जान’ के तुकान्त या काफ़िये ‘मान’, ‘पहचान’ और ‘ठान’ हैं। ’लीजिए’ इसका रदीफ़ है। यों ग़ज़ल में रदीफ़ का होना आवश्यक नहीं, तथापि यदि प्रयुक्त हो तो, हर सानी वाली पंक्ति में इसका आना आवश्यक है। सानी वाली पंक्ति अर्थात्- शेर की दूसरी पंक्ति। मतले के शेर को छोड़कर अन्य अशआर के मिसरों में रदीफ़ अथवा उसके स्वर का आना दोषपूर्ण माना जाता है। इसी प्रकार सानी में काफ़िया का न आना अथवा ग़लत काफि़ये का आना भी दोषपूर्ण है। उपर्युक्त ग़ज़ल के दूसरे शेर के पहले मिसरे में प्रयुक्त ‘बार-बार’ में एक मात्रा बढ़ी हुई है। बहर के अनुसार ‘बारबा’ आना चाहिए, पर मिसरे में एक मात्रा अधिक लगाने की छूट है।

मिश्रित वर्ण-युग्मों या अरकान से निर्मित कुछ छन्दों के उदाहरण देखें-

१. फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन- २१२२ २१२२ २१२२ २१२ (बहरे-‘रमल’ अथवा ‘गीतिका’ छंद)
हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है। -रामप्रसाद ’बिस्मिल’

हिन्दी के गणों के अनुसार इस छन्द के गण होंगे- रगण, तगण, मगण, यगण और रगण। उर्दू में इस छन्द या बहर को ‘रमल’ और हिन्दी में ‘गीतिका’ कहते हैं। यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि उपर्युक्त ३ ‘फ़ाइलातुन’ में से २ को रखकर भी ग़ज़ल हो सकती है, जैसे-

१ -अ फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन- २१२२ २१२२ २१२ (पीयूषवर्ष)
अंक में आकाश भरने के लिए
उड़ चले हैं हम बिखरने के लिए.
अथवा,
युग-युगान्तर चल रहा है क्रम यही
शिव के हिस्से में लिखा विष-पान ही

२ . फऊलुन फाइलुन फेलुन, फऊलुन फाइलुन फेलुन- १२२ २१२ २२१ २२२ १२२ २
अथवा
फ़ऊलातुन, फ़ऊलातुन, फ़ऊलातुन, फ़ऊलातुन- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ (‘विधाता’ छंद)
मुनासिब दूरियाँ रखिए, भले कैसा ही रिश्ता हो
बहुत नज़दीकियों में भी घुटन महसूस होती है। - बशीर बद्र
* * *
अमीरी मेरे घर आकर मुझे आँखें दिखाती है
ग़रीबी मुस्कुराकर मेरे बर्तन माँज जाती है। - राजेंद्र वर्मा

३. फाइलातुन मफाइलुन फेलुन/फइलुन- २१२२ १२१२ २२ /११२ (बहरे-‘ख़फ़ीफ़’ अथवा ‘उत्थक्क’ छंद)
ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं
और क्या जुर्म है, पता ही नहीं। - नूर लखनवी
(यहाँ ‘फेलुन’ को ‘फइलुन’ की भाँति प्रयुक्त किया गया है।)

४. मफाइलुन, फ़इलातुन, मफाइलुन, फेलुन- १२१२ ११२२ १२१२ २२
कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। -दुष्यन्त कुमार

५. मनोरम छंद- फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन
जीत ही उन्माद की है
छद्म के अनुनाद की है.

६- सुमेरु छंद- फ़ऊलुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन
हमीं उम्मीद रक्खे आँधियों से
कि वे बरतेंगी दूरी बस्तियों से

७- राधा छंद- फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन, फेलुन
दोस्तो! अब आइए, कुछ यूँ किया जाये
बाँट कर अमरित, हलाहल कुछ पिया जाये

८- छंद का नाम- अज्ञात- फ़ऊलुन, फ़ऊलुन, फ़ऊलुन, फ़ऊ
बजे नाद अनहद, सुनाई न दे
वो कण-कण में लेकिन, दिखाई न दे

९- कुंडल छंद- फेलुन, फेलुन, फेलुन, फ़इलातुन फेलुन= २२ मात्राएँ
चाहे-अनचाहे ऐसे क्षण आते हैं,
सब कुछ होते हुए हमीं चुक जाते हैं

१०- रतिवल्लभ छंद- फ़ऊलातुन, फ़ऊलातुन, फ़ऊलुन
स्वयं के हित सभी उपलब्धियाँ हैं
हमारे हेतु केवल सूक्तियाँ हैं.

११- अप्सरीविलसिता छंद- फेलुन, फेलुन, फ़ाइलुन
राजकुँवर मतिमन्द हैं
मंत्रीगण सानन्द हैं।

१२- छंद का नाम- अज्ञात-फेलुन, मुफाइलुन, फेलुन
बंजर में बोइए क्योंकर?
दाना भी खोइए क्योंकर?

१३- दोहा छंद २४ मात्राएँ १३/११ के चरण; पहले चरण के अन्त में दीर्घ-लघु-दीर्घ (२१२) तथा
दूसरे चरणान्त में दीर्घ-लघु (२१)
चलने को चल पड़े, लोग अनेकानेक
पर मेरे गन्तव्य तक, साथ न देता एक।

१४- छंद का नाम- अज्ञात- फ़ऊल फ़ेलुन, फ़ऊल फ़ेलुन
गरज़ पड़ी, तो बने हैं बिल्ली
वगरना बैठे गरज रहे हैं।

१५- तोटक छंद- फेलुन, फेलुन, फेलुन, फेलुन (१६ मात्राएँ)
पहले सच को सच कहते हो
फिर गुमसुम-गुमसुम रहते हो!

१६- ताटंक छंद, १६/१४ मात्राएँ, अन्त में तीन दीर्घ, यथा-
फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़इलातुन
मेरे सपनों में अक्सर ही आ जाता है ताजमहल,
मेरे कटे हुए हाथों को दिखलाता है ताजमहल।

१७- दिग्पाल छंद- २४ मात्राएँ, अंत में दो दीर्घ, यथा-
फ़इलातुन फेलुन: फ़इलातुन फेलुन, फेलुन
सोच रहा है गुमसुम बैठा रामभरोसे,
कब तक आखि़र देश चलेगा रामभरोसे?

१८- छंद का नाम- अज्ञात- फ़ऊलातुन, फ़ऊलातुन
तुम्हारी बात कुछ ऐसी
अमा भी पूर्णिमा जैसी

१९- महानुभाव छंद- ६+६=१२ मात्राएँ, यथा- मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन
तनिक विनीत हो गया
मैं सबका मीत हो गया.

२०- छंद का नाम- अज्ञात- फ़ाइलुन, फ़ऊल, फ़ाइलुन
चन्दनी चरित्र हो गया
मैं सभी का मित्र हो गया।

२१- अरिल्ल छंद- १६ मात्राएँ, अंत में मगण (२२२)
जब तक हृदयों में दूरी है
मेरी हर ग़ज़ल अधूरी है.

२२- पादाकुलक छंद- १६ मात्राएँ (सभी दीर्घ)
चाहे जितनी हो कठिनाई
हम छोड़ न पाते सच्चाई

२३- छंद का नाम- अज्ञात- फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन
तू अकेला है तो क्या?
है अकेला ही ख़ुदा!
(क्रमांक ५ से लेकर २३ तक के उदहारण इन पंक्तियों के लेखक के हैं.)

इस प्रकार, कई अरकान से मिलकर एक छन्द बन जाता है- वे चाहे एक जैसे हो, या कई प्रकार के। वार्णिक छन्द में सवैया की भाँति दीर्घ को लघु पढ़ा जाता है- ‘मानुस हो तो वही रसखान बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।’ इसमें आठ भगण हैं, अर्थात् एक दीर्घ और दो लघु की आठ बार आवृत्ति है- २११ २११ २११ २११ २११ २११ २११ २११ . लेकिन सवैया की तरह ग़ज़ल में ८ गणों की आवश्यकता नहीं है। ग़ज़लकार चाहे तो तीन-चार आवृत्तियों से काम चला सकता है।

लेकिन यह तो ग़ज़ल का ढाँचा है। असली बात तो उसमें शेरियत लाने की है। शेरियत भाषा की लक्षणा-व्यंजना शक्ति से आती है। अभिधा में सादगी होती है जिसमें कोई बड़ी बात कहना कठिन होता है। शेर वही जुबान पर चढ़ता है जिसमें भाषा की सादगी होती है। लेकिन सादगी में एक बाँकपन होता है, जो ह्रदय को छू जाता है.

ग़ज़ल का शिल्प जान लेना एक बात है और उसे व्यवहार में उतारना दूसरी। तथापि, किसी मीटर या बहर (छन्द) में ग़ज़ल कहने के लिए हिन्दी-उर्दू शब्दों के मिश्रण से वांछित लय आती है। केवल हिन्दी या केवल उर्दू की ज़ुबान वाले शब्दों से ग़ज़ल कहना दुष्कर है। उर्दू की ताक़त यह है कि उसमें एक शब्द के बोलचाल के कई पर्यायवाची मिल जाते हैं. इसके अलावा, एक ही शब्द कई प्रकार से बोला-लिखा जाता है जो अलग-अलग वर्ण-युग्म के होते हैं, जैसे- ‘ख़ामोशी’ (२२२) को चुप्पी (२२), ख़ामशी या ख़ामुशी (२१२) अथवा ख़मोशी (१२२) के वज़न पर बाँधा जा सकता है, जबकि हिन्दी में इसके लिए एक ही शब्द है- ‘शान्ति’ (२१) जिसमें कुछ भी घट-बढ़ नहीं सकता। इसके अलावा, उसमें वह व्यंजना भी नहीं जो ‘ख़ामोशी’ में है। ख़ामोशी आरोपित भी हो सकती है, जबकि शान्ति 'कर्मवाची’ है। इसी प्रकार- ‘ख़याल’ (१२१) ‘ख़्याल’ (२१) के रूप में भी प्रयुक्त होता है, जबकि हिन्दी के ‘विचार’ (१२१) में कोई परिवर्तन संभव नहीं है। उर्दू के ‘ज़िन्दगी’ (२१२) के बदले हिन्दी में अकेला ‘जीवन’ (२२) है, जबकि 'ज़िन्दगी’ के पर्यायवाची हैं- ज़ीस्त (२१), हयात (१२१), ज़िन्दगानी (२१२२). इसी प्रकार, ग़रीबी (१२२) को ग़ुरबत (२२) भी कहते हैं, जबकि हिन्दी में ‘निर्धनता’ (२२२) का कोई विकल्प नहीं है। ‘दीनता’ या ‘दैन्य’ हैं अवश्य, पर वे निर्धनता के सटीक पर्यायवाची नहीं हैं।... उर्दू में ‘राहबर’ (२१२) को रहबर (२२), ‘राहनुमा’ (२११२) को रहनुमा (२१२), ‘शहर’ (१२) को शह्र (२१) और 'जान’ (२१) को जां (२) भी कहते-लिखते हैं, जबकि हिन्दी में यह सुविधा नहीं है। इस कारण उर्दू के कारण ग़ज़ल की भाषा में अतिरिक्त लोच, लय या रवानी आ जाती है। फि़ल्मी ग़ज़लें इसकी मिसाल हैं।

होली गीत

पूज्य मातुश्री रचित होली गीत  

होली की हार्दिक शुभकामनायें

होली खेलें सिया की सखियाँ - स्व. शांति देवी वर्मा 


होली खेलें सिया की सखियाँ,
जनकपुर में छायो उल्लास....

रजत कलश में रंग घुले हैं, मलें अबीर सहास.
होली खेलें सिया की सखियाँ...

रंगें चीर रघुनाथ लला का, करें हास-परिहास.
होली खेलें सिया की सखियाँ...

एक कहे: 'पकडो, मुंह रंग दो, निकरे जी की हुलास.'
होली खेलें सिया की सखियाँ...

दूजी कहे: 'कोऊ रंग चढ़े ना, श्याम रंग है खास.'
होली खेलें सिया की सखियाँ...

सिया कहें: ' रंग अटल प्रीत का, कोऊ न अइयो पास.'
होली खेलें सिया की सखियाँ...

सियाजी, श्यामल हैं प्रभु, कमल-भ्रमर आभास.
होली खेलें सिया की सखियाँ...

'शान्ति' निरख छवि, बलि-बलि जाए, अमिट दरस की प्यास.
होली खेलें सिया की सखियाँ...

होली की हार्दिक शुभकामनायें

होली खेलें चारों भाई - स्व. शांति देवी वर्मा 

होली खेलें चारों भाई, अवधपुरी के महलों में...

अंगना में कई हौज बनवाये, भांति-भांति के रंग घुलाये.
पिचकारी भर धूम मचाएं, अवधपुरी के महलों में...

राम-लखन पिचकारी चलायें, भारत-शत्रुघ्न अबीर लगायें.
लखें दशरथ होएं निहाल, अवधपुरी के महलों में...

सिया-श्रुतकीर्ति रंग में नहाई, उर्मिला-मांडवी चीन्ही न जाई.
हुए लाल-गुलाबी बाल, अवधपुरी के महलों में...

कौशल्या कैकेई सुमित्रा, तीनों माता लेंय बलेंयाँ.
पुरजन गायें मंगल फाग, अवधपुरी के महलों में...

मंत्री सुमंत्र भेंटते होली, नृप दशरथ से करें ठिठोली.
बूढे भी लगते जवान, अवधपुरी के महलों में...

दास लाये गुझिया-ठंडाई, हिल-मिल सबने मौज मनाई.
ढोल बजे फागें भी गाईं,अवधपुरी के महलों में...

दस दिश में सुख-आनंद छाया, हर मन फागुन में बौराया.
'शान्ति' संग त्यौहार मनाया, अवधपुरी के महलों में...

होली की हार्दिक शुभकामनायें

काव्य की पिचकारी - आचार्य संजीव सलिल

रंगोत्सव पर काव्य की पिचकारी गह हाथ.
शब्द-रंग से कीजिये, तर अपना सिर-माथ

फागें, होरी गाइए, भावों से भरपूर.
रस की वर्षा में रहें, मौज-मजे में चूर.

भंग भवानी इष्ट हों, गुझिया को लें साथ
बांह-चाह में जो मिले उसे मानिए नाथ.

लक्षण जो-जैसे वही, कर देंगे कल्याण.
दूरी सभी मिटाइये, हों इक तन-मन-प्राण.

होली की हार्दिक शुभकामनायें

अबकी बार होली में - आचार्य संजीव सलिल

करो आतंकियों पर वार अबकी बार होली में.
न उनको मिल सके घर-द्वार अबकी बार होली में.

बना तोपोंकी पिचकारी चलाओ यार अब जी भर.
निशाना चूक न पाए, रहो गुलज़ार होली में.

बहुत की शांति की बातें, लगाओ अब उन्हें लातें.
न कर पायें घातें कोई अबकी बार होली में.

पिलाओ भांग उनको फिर नचाओ भांगडा जी भर.
कहो बम चला कर बम, दोस्त अबकी बार होली में.

छिपे जो पाक में नापाक हरकत कर रहे जी भर.
करो बस सूपड़ा ही साफ़ अब की बार होली में.

न मानें देव लातों के कभी बातों से सच मानो.
चलो नहले पे दहला यार अबकी बार होली में.

जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली.
चलो खेलें 'सलिल' मिल साथ अबकी बार होली में.

होली की हार्दिक शुभकामनायें


होली की हार्दिक शुभकामनायें

मुक्तिका होली मने

मुक्तिका 
होली मने 
*
भावना बच पाए तो होली मने
भाव ना बढ़ पाएँ तो होली मने
*
काम ना मिल सके तो त्यौहार क्या
कामना हो पूर्ण तो होली मने
*
साधना की सिद्धि ही होली सखे!
साध ना पाए तो क्या होली मने?
*
वासना से दूर हो होली सदा
वास ना हो दूर तो होली मने
*
झाड़ ना काटो-जलाओ अब कभी
झाड़ना विद्वेष तो होली मने
*
लालना बृज का मिले तो मन खिले
लाल ना भटके तभी होली मने
*
साज ना छोड़े बजाना मन कभी
साजना हो साथ तो होली मने
***
२७-३-२०११

हिंदी शब्द

: हिंदी शब्द सलिला - १ :
आइये! जानें अपनी हिंदी को।
हिंदी का शब्द भंडार कैसे समृद्ध हुआ?
आभार अरबी भाषा का जिसने हमें अनेक शब्द दिए हैं, इन्हें हम निरंतर बोलते हैं बिना जाने कि ये अरबी भाषा ने दिए हैं।
भाषिक शुद्धता के अंध समर्थक क्या इन शब्दों को नहीं बोलते?
सचाई न जानने के कारण हम इन्हें उर्दू का मान लेते हैं। ये इतने प्रचलित हैं कि इनके अर्थ बिना बताये आप जानते हैं।
कुछ अरबी शब्द निम्नलिखित हैं -
अखबार
अदालत
अल्लाह
अलस्सुबह
आदमकद
आदमी
औकात
औरत
औलाद
इम्तहान
ऐनक
कद्दावर
काफी
किताब
कैद
खत
खातिर
ग़ज़ल
गलीचा
जलेबी
तकिया
तबला
तलाक
तारीख
दिनार
दीवान
बिसात
मकतब
मस्तूल
महक
मानसून
मुहावरा
मौसम
लिहाज
वकील
वक़्त
शहीद
शादी
सुबह
हकीम
*

कीलक स्तोत्र

श्री दुर्गा शप्तसती कीलक स्तोत्र
*
ॐ मंत्र कीलक शिव ऋषि ने, छंद अनुष्टुप में रच गाया।
प्रमुदित देव महाशारद ने, श्री जगदंबा हेतु रचाया।।
सप्तशती के पाठ-जाप सँग, हो विनियोग मिले फल उत्तम।
ॐ चण्डिका देवी नमन शत, मारकण्डे' ऋषि ने गुंजाया।।
*
देह विशुद्ध ज्ञान है जिनकी, तीनों वेद नेत्र हैं जिनके।
उन शिव जी का शत-शत वंदन, मुकुट शीश पर अर्ध चन्द्र है।१।
*
मन्त्र-सिद्धि में बाधा कीलक, अभिकीलन कर करें निवारण।
कुशल-क्षेम हित सप्तशती को, जान करें नित जप-पारायण।२।
*
अन्य मंत्र-जाप से भी होता, उच्चाटन-कल्याण किंतु जो
देवी पूजन सप्तशती से, करते देवी उन्हें सिद्ध हो।३।
*
अन्य मंत्र स्तोत्रौषधि की, उन्हें नहीं कुछ आवश्यकता है।
बिना अन्य जप, मंत्र-यंत्र के, सब अभिचारक कर्म सिद्ध हों।४।
*
अन्य मंत्र भी फलदायी पर, भक्त-मनों में रहे न शंका।
सप्तशती ही नियत समय में, उत्तम फल दे बजता डंका।५।
*
महादेव ने सप्तशती को गुप्त किया, थे पुण्य अनश्वर।
अन्य मंत्र-जप-पुण्य मिटे पर, सप्तशती के फल थे अक्षर।६।
*
अन्य स्तोत्र का जपकर्ता भी, करे पाठ यदि सप्तशती का।
हो उसका कल्याण सर्वदा, किंचितमात्र न इसमें शंका।७।
*
कृष्ण-पक्ष की चौथ-अष्टमी, पूज भगवती कर सब अर्पण।
करें प्रार्थना ले प्रसाद अन्यथा विफल जप बिना समर्पण।८।
*
निष्कीलन, स्तोत्र पाठ कर उच्च स्वरों में सिद्धि मिले हर।
देव-गण, गंधर्व हो सके भक्त, न उसको हो किंचित डर।९।
*
हो न सके अपमृत्यु कभी भी, जग में विचरण करे अभय हो।
अंत समय में देह त्यागकर, मुक्ति वरण करता ही है वो।१०।
*
कीलन-निष्कीलन जाने बिन, स्तोत्र-पाठ से हो अनिष्ट भी।
ग्यानी जन कीलन-निष्कीलन, जान पाठ करते विधिवत ही।११।
*
नारीगण सौभाग्य पा रहीं, जो वह देवी का प्रसाद है।
नित्य स्तोत्र का पाठ करे जो पाती रहे प्रसाद सर्वदा।१२।
*
पाठ मंद स्वर में करते जो, पाते फल-परिणाम स्वल्प ही।
पूर्ण सिद्धि-फल मिलता तब ही, सस्वर पाठ करें जब खुद ही।१३।
*
दें प्रसाद-सौभाग्य सम्पदा, सुख-सरोगी, मोक्ष जगदंबा।
अरि नाशें जो उनकी स्तुति, क्यों न करें नित पूजें अंबा।१४।
३१-३--२०१७
***

विमर्श : गणगौर : क्या और क्यों?

विमर्श :
गणगौर : क्या और क्यों?
*
'गण' का अर्थ शिव के भक्त या शिव के सेवक हैं।
गणनायक, गणपति या गणेश शिवभक्तों में प्रधान हैं।
गणेश-कार्तिकेय प्रसंग में वे शिव-पार्वती की परिक्रमा कर सृष्टि परिक्रमा की शर्त जीतते हैं।
'कर्पूर गौरं करुणावतारं' के अनुसार 'गौर' शिव हैं। गण गौर में 'गण' मिलकर 'गौर' की पूजा करते हैं जो अर्धनारीश्वर हैं अर्थात् 'गौर' में ही 'गौरी' अंतर्व्याप्त हैं। तदनुसार परंपरा से गणगौर पर्व में शिव-शिवा पूज्य हैं।
'गण' स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं किंतु चैत्र में फसल पकने के कारण पति को उसका संरक्षण करना होता है। इसलिए स्त्रियाँ (अपने मन में पति की छवि लिए) 'गौर' (जिनमें गौरी अंतर्निहित हैं) को पूजती हैं। नर-नारी साम्य का इससे अधिक सुंदर उदाहरण विश्व में कहीं नहीं है।
विवाह पश्चात् प्रथम गणगौर पर्व 'तीज' पर ही पूजने की अनिवार्यता का कारण यह है कि पति के मन में बसी पत्नि और पति के मन में बसा पति एक हों। मन का मेल, तन का मेल बने और तब तीसरे (संतान) का प्रवेश हो किंतु उससे भी दोनों में दूरी नहीं, सामीप्य बढ़े।
ईसर-गौर की प्रतिमा के लिए होलिका दहन की भस्म और तालाब की मिट्टी लेना भी अकारण नहीं है। योगी शिव को भस्म अतिप्रिय है। महाकाल का श्रंगार भस्म से होता है। त्रिनेत्र खुलने से कामदेव भस्म हो गया था। होलिका के रूप में विष्णु विरोधी शक्ति जलकर भस्म हो गयी थी। शिव शिवा प्रतिमा हेतु भस्म लेने का कारण विरागी का रागी होना अर्थात् पति का पत्नि के प्रति समर्पित होना, प्रेम में काम के वशीभूत न होकर आत्मिक होना तथा वे विपरीत मतावलंबी या विचारों के हों तो विरोध को भस्मीभूत करने का भाव अंतर्निहित है।
गौरीश्वर प्रतिमा के लिए दूसरा घटक तालाब की मिट्टी होने के पीछे भी कारण है। गौरी, शिवा, उमा ही पार्वती (पर्वत पुत्री) हैं। तालाब पर्वत का पुत्र याने पार्वती का भाई है। आशय यह कि ससुराल में पर्व पूजन के समय पत्नि के मायके पक्ष का सम मान हो, तभी पत्नि को सच्ची आनंदानुभूति होगी और वह पति के प्रति समर्पिता होकर संतान की वाहक होगी।
दर्शन, आध्यात्म, समाज, परिवार और व्यक्ति को एक करने अर्थात अनेकता में एकता स्थापित करने का लोकपर्व है गणगौर।
गणगौर पर १६ दिनों तक गीत गाए जाते हैं। १६ अर्थात् १+६=७। सात फेरों तथा सात-सात वचनों से आरंभ विवाह संबंध १६ श्रंगार सज्जित होकर मंगल गीत गाते हुए पूर्णता वरे।
पर्वांत पर प्रतिमा व पूजन सामग्री जल स्रोत (नदी, तालाब, कुआं) में ही क्यों विसर्जित करें, जलायें या गड़ायें क्यों नहीं?
इसका कारण भी पूर्वानुसार ही है। जलस्रोत पर्वत से नि:सृत, पर्वतात्मज अर्थात् पार्वती बंधु हैं। ससुराल में मंगल कार्य में मायके पक्ष की सहभागिता के साथ कार्य समापन पश्चात् मायके पक्ष को भेंट-उपहार पहुँचाई जाए। इससे दोनों कुलों के मध्य स्नेह सेतु सुदृढ़ होगा तथा पत्नि के मन में ससुरालियों के प्रति प्रेमभाव बढ़ेगा।
कुँवारी कन्या और नवविवाहिता एेसे ही संबंध पाने-निभाने की कामना और प्रयास करे, इसलिए इस पर्व पर उन्हें विशेष महत्व मिलता है।
एक समय भोजन क्योँ?
ऋतु परिवर्तन और पर्व पर पकवान्न सेवन से थकी पाचन शक्ति को राहत मिले। नवदंपति प्रणय-क्रीड़ारत होने अथवा नन्हें शिशु के कारण रात्रि में प्रगाढ़ निद्रा न ले सकें तो भी एक समय का भोजन सहज ही पच सकेगा। दूसरे समय भोजन बनाने में लगनेवाला समय पर्व सामग्री की तैयारी हेतु मिल सकेगा। थके होने पर इस समय विश्राम कर ऊर्जा पा सकेंगे।
इस व्रत के मूल में शिव पूजन द्वारा शिवा को प्रसन्न कर गणनायक सदृश मेधावी संतान धारण करने का वर पाना है। पुरुष संतान धारण कर नहीं सकता। इसलिए केवल स्त्रियों को प्रसाद दिया जाता है। सिंदूर स्त्री का श्रंगार साधन है। विसर्जन पूर्व गणगौर को पानी पिलाना, तृप्त करने का परिचायक है।
***
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
२७-३-२०२०
९४२५१८३२४४

गीत

गीत :
मैं अकेली लड़ रही थी
- संजीव 'सलिल'
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
सामने सागर मिला तो, थम गये थे पग तुम्हारे.
सिया को खोकर कहो सच, हुए थे कितने बिचारे?
जो मिला सब खो दिया, जब रजक का आरोप माना-
डूब सरयू में गये, क्यों रुक न पाये पग किनारे?
छूट मर्यादा गयी कब
क्यों नहीं अनुमान पाये???.....
*
समय को तुमने सदा, निज प्रशंसा ही सुनाई है.
जान यह पाये नहीं कि, हुई जग में हँसाई है..
सामने तव द्रुपदसुत थे, किन्तु पीछे थे धनञ्जय.
विधिनियंता थे-न थे पर, राह तुमने दिखायी है..
जानते थे सच न क्यों
सच का कभी कर गान पाये???.....
*
हथेली पर जान लेकर, क्रांति जो नित रहे करते.
विदेशी आक्रान्ता को मारकर जो रहे मरते..
नींव उनकी थी, इमारत तुमने अपनी है बनायी-
हाय! होकर बागबां खेती रहे खुद आप चरते..
श्रम-समर्पण का न प्रण क्यों
देश के हित ठान पाये.....
*
'आम' के प्रतिनिधि बने पर, 'खास' की खातिर जिए हो.
चीन्ह् कर बाँटी हमेशा, रेवड़ी- पद-मद पिए हो..
सत्य कर नीलाम सत्ता वरी, धन आराध्य माना.
झूठ हर पल बोलते हो, सच की खातिर लब सिये हो..
बन मियाँ मिट्ठू प्रशंसा के
स्वयं ही गान गाये......
*
मैं तुम्हारी अस्मिता हूँ, आस्था-निष्ठा अजय हूँ.
आत्मा हूँ अमर-अक्षय, सृजन संधारण प्रलय हूँ.
पवन धरती अग्नि नभ हूँ, 'सलिल' हूँ संचेतना मैं-
द्वैत मैं, अद्वैत मैं, परमात्म में होती विलय हूँ..
कर सके साक्षात् मुझसे
तीर कब संधान पाए?.....
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
७९९९५५९६१८
salil.sanjiv@gmail.com
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#हिंदी_ब्लॉगर

सामयिक दोहे


⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐
सामयिक दोहे
लोकतंत्र की हो गई, आज हार्ट-गति तेज?
राजनीति को हार्ट ने, दिया सँदेसा भेज?
वादा कर जुमला बता, करते मन की बात
मनमानी को रोक दे, नोटा झटपट तात
मत करिए मत-दान पर, करिए जग मतदान
राज-नीति जन-हित करे, समय पूर्व अनुमान
लोकतंत्र में लोकमत, ठुकराएँ मत भूल
दल-हित साध न झोंकिए, निज आँखों में धूल
सत्ता साध्य न हो सखे, हो जन-हित आराध्य
खो न तंत्र विश्वास दे, जनहित से हो बाध्य
नोटा का उपयोग कर, दें उन सबको रोक
स्वार्थ साधते जो रहे, उनको ठीकरा लोक
👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌
२७-३-२०१९

नवगीत

नवगीत 
सच्ची बात
*
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
मेरा अनुभव है यही
पैमाने हैं दो।
मुझको रिश्वत खूब दो
बाकी मगर न लो
मैं तेरा रखता न पर
तू मेरा रखे खयाल
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
मेरे घर हो लक्ष्मी,
तेरे घर काली
मुझसे ले मत, दे मुझे
तू दहेज-थाली
तेरा नत, मेरा रहे
हरदम ऊँचा भाल
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
तेरा पुत्र शहीद हो
मेरा अफसर-सेठ
तेरी वाणी नम्र हो
मैं दूँ गाली ठेठ
तू मत दे, मैं झटक लूँ
पहना जुमला-माल
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
२७-३-२०१९
संवस, ७९९९५५९६१८

नवगीत

नवगीत
*
ताप धरा का
बढ़ा चैत में
या तुम रूठीं?
लू-लपटों में बन अमराई राहत देतीं।
कभी दर्प की उच्च इमारत तपतीं-दहतीं।
बाहों में आ, चाहों ने हारना न सीखा-
पगडंडी बन, राजमार्ग से जुड़-मिल जीतीं।
ठंडाई, लस्सी, अमरस
ठंडा खस-पर्दा-
बहा पसीना
हुई घमौरी
निंदिया टूटी।
*
सावन भावन
रक्षाबंधन
साड़ी-चूड़ी।
पावस की मनहर फुहार मुस्काई-झूमी।
लीक तोड़कर कदम-दर-कदम मंजिल चूमी।
ध्वजा तिरंगी फहर हँस पड़ी आँचल बनकर-
नागपंचमी, कृष्ण-अष्टमी सोहर-कजरी।
पूनम-एकादशी उपासी
कथा कही-सुन-
नव पीढ़ी में
संस्कार की
कोंपल फूटी।
*
अन्नपूर्णा!
शक्ति-भक्ति-रति
नेह-नर्मदा।
किया मकां को घर, घरनी कण-कण में पैठीं।
नवदुर्गा, दशहरा पुजीं लेकिन कब ऐंठीं?
धान्या, रूपा, रमा, प्रकृति कल्याणकारिणी-
सूत्रधारिणी सदा रहीं छोटी या जेठी।
शीत-प्रीत, संगीत ऊष्णता
श्वासों की तुम-
सुजला-सुफला
हर्षदायिनी
तुम्हीं वर्मदा।
*
जननी, भगिनी
बहिन, भार्या
सुता नवेली।
चाची, मामी, फूफी, मौसी, सखी-सहेली।
भौजी, सासू, साली, सरहज छवि अलबेली-
गति-यति, रस-जस,लास-रास नातों की सरगम-
स्वप्न अकेला नहीं, नहीं है आस अकेली।
रुदन, रोष, उल्लास, हास,
परिहास,लाड़ नव-
संग तुम्हारे
हुई जिंदगी ही
अठखेली।
*****

मधुमालती छंद

छंद सलिला:
मधुमालती छंद
संजीव
*
लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ७-७, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण) होता है.
लक्षण छंद:
मधुमालती आनंद दे
ऋषि साध सुर नव छंद दे
चरणांत गुरु लघु गुरु रहे
हर छंद नवउत्कर्ष दे।
उदाहरण:
१. माँ भारती वरदान दो
सत्-शिव-सरस हर गान दो
मन में नहीं अभिमान हो
घर-अग्र 'सलिल' मधु गान हो।
२. सोते बहुत अब तो जगो
खुद को नहीं खुद ही ठगो
कानून को तोड़ो नहीं-
अधिकार भी छोडो नहीं
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)

मनोरम छंद

छंद सलिला:मनोरम छंद
संजीव
*
लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोहर
आदि गुरुवत पकड़ लो मग
अंत भय से बच हमेशा
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)

मुक्तिका

मुक्तिका
*
नेताओं का शगल है, करना बहसें रोज.
बिन कारण परिणाम के, क्यों नाहक है खोज..
नारी माता भगिनी है, नारी संगिनी दिव्य.
सुता सखी भाभी बहू, नारी सचमुच भव्य..
शारद उमा रमा त्रयी, ज्ञान शक्ति श्री-खान.
नर से दो मात्रा अधिक, नारी महिमावान..
तैंतीस की बकवास का, केवल एक जवाब.
शत-प्रतिशत के योग्य वह, किन्तु न करे हिसाब..
देगा किसको कौन क्यों?, लेगा किससे कौन?
संसद में वे भौंकते, जिन्हें उचित है मौन..
*
२७-३-२०१० 
संजीव, ७९९९५५९६१८

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

रैप सांग, कोरोना कर्फ्यू

कर्फ्यू वंदना
(रैप सौंग)
*
घर में घर कर
बाहर मत जा
बीबी जो दे
खुश होकर खा
ठेला-नुक्कड़
बिसरा भुख्खड़
बेमतलब की
बोल न बातें
हाँ में हाँ कर
पा सौगातें
ताँक-झाँक तज
भुला पड़ोसन
बीबी के संग
कर योगासन
चौबिस घंटे
तुझ पर भारी
काम न आए
प्यारे यारी
बन जा पप्पू
आग्याकारी
तभी बेअसर
हो बीमारी
बिसरा झप्पी
माँग न पप्पी
चूड़ी कंगन
करें न खनखन
कहे लिपिस्टिक
माँजो बर्तन
झाड़ू मारो
जरा ठीक से
पौंछा करना
बिना पीक के
कपड़े धोना
पर मत रोना
बाई न आई
तुम हो भाई
तुरुप के इक्के
बनकर छक्के
फल चाहे बिन
करो काम गिन
बीबी चालीसा
हँस पढ़ना
अपनी किस्मत
खुद ही गढ़ना
जब तक कहें न
किस मत करना
मिस को मिस कर
मन मत मरना
जान बचाना
जान बुलाना
मिल लड़ जाएँ
नैन झुकाना
कर फ्यू लेकिन
कई वार हैं
कर्फ्यू में
झुक रहो, सार है
बीबी बाबा बेबी की जय
बोल रहो घुस घर में निर्भय।।
***
संजीव
२२-३-२०२०
९४२५१८३२४४
आज सारा देश मेरा लॉक में है 
देख कोरोना बिचारा शॉक में है। 

दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

नवदुर्गा पर्व पर विशेष:
श्री दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र
हिंदी काव्यानुवाद
*
शिव बोलेः ‘हे पद्ममुखी! मैं कहता नाम एक सौ आठ।
दुर्गा देवी हों प्रसन्न नित सुनकर जिनका सुमधुर पाठ।१।
ओम सती साघ्वी भवप्रीता भवमोचनी भवानी धन्य।
आर्या दुर्गा विजया आद्या शूलवती तीनाक्ष अनन्य।२।
पिनाकिनी चित्रा चंद्रघंटा, महातपा शुभरूपा आप्त।
अहं बुद्धि मन चित्त चेतना, चिता चिन्मया दर्शन प्राप्त।३।
सब मंत्रों में सत्ता जिनकी, सत्यानंद स्वरूपा दिव्य।
भाएँ भाव-भावना अनगिन, भव्य-अभव्य सदागति नव्य।४।
शंभुप्रिया सुरमाता चिंता, रत्नप्रिया हों सदा प्रसन्न।
विद्यामयी दक्षतनया हे!, दक्षयज्ञ ध्वंसा आसन्न।५।
देवि अपर्णा अनेकवर्णा पाटल वदना-वसना मोह।
अंबर पट परिधानधारिणी, मंजरि रंजनी विहॅंसें सोह।६।
अतिपराक्रमी निर्मम सुंदर, सुर-सुंदरियॉं भी हों मात।
मुनि मतंग पूजित मातंगी, वनदुर्गा दें दर्शन प्रात।७।
ब्राम्ही माहेशी कौमारी, ऐंद्री विष्णुमयी जगवंद्य।
चामुंडा वाराही लक्ष्मी, पुरुष आकृति धरें अनिंद्य।८।
उत्कर्षिणी निर्मला ज्ञानी, नित्या क्रिया बुद्धिदा श्रेष्ठ ।
बहुरूपा बहुप्रेमा मैया, सब वाहन वाहना सुज्येष्ठ।९।
शुंभ-निशुंभ हननकर्त्री हे!, महिषासुरमर्दिनी प्रणम्य।
मधु-कैटभ राक्षसद्वय मारे, चंड-मुंड वध किया सुरम्य।१०।
सब असुरों का नाश किया हॅंस, सभी दानवों का कर घात।
सब शास्त्रों की ज्ञाता सत्या, सब अस्त्रों को धारें मात।११।
अगणित शस्त्र लिये हाथों में, अस्त्र अनेक लिये साकार।
सुकुमारी कन्या किशोरवय, युवती यति जीवन-आधार।१२।
प्रौढ़ा नहीं किंतु हो प्रौढ़ा, वृद्धा मॉं कर शांति प्रदान।
महोदरी उन्मुक्त केशमय, घोररूपिणी बली महान।१३।
अग्नि-ज्वाल सम रौद्रमुखी छवि, कालरात्रि तापसी प्रणाम।
नारायणी भद्रकाली हे!, हरि-माया जलोदरी नाम।१४।
तुम्हीं कराली शिवदूती हो, परमेश्वरी अनंता द्रव्य।
हे सावित्री! कात्यायनी हे!!, प्रत्यक्षा विधिवादिनी श्रव्य।१५।
दुर्गानाम शताष्टक का जों, प्रति दिन करें सश्रद्धा पाठ।
देवि! न उनको कुछ असाध्य हो , सब लोकों में उनके ठाठ।१६।
मिले अन्न धन वामा सुत भी, हाथी-घोड़े बँधते द्वार।
सहज साध्य पुरुषार्थ चार हो, मिले मुक्ति होता उद्धार।१७।
करें कुमारी पूजन पहले, फिर सुरेश्वरी का कर ध्यान।
पराभक्ति सह पूजन कर फिर, अष्टोत्तर शत नाम ।१८।
पाठ करें नित सदय देव सब, होते पल-पल सदा सहाय।
राजा भी हों सेवक उसके, राज्य लक्ष्मी प् वह हर्षाय।१९।
गोरोचन, आलक्तक, कुंकुम, मधु, घी, पय, सिंदूर, कपूर।
मिला यंत्र लिख जो सुविज्ञ जन, पूजे हों शिव रूप जरूर।२०।
भौम अमावस अर्ध रात्रि में, चंद्र शतभिषा हो नक्षत्र।
स्तोत्र पढ़ें लिख मिले संपदा, परम न होती जो अन्यत्र।२१।
।।इति श्री विश्वसार तंत्रे दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र समाप्त।।
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संजीव
९४२५१८३२४४