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गुरुवार, 4 मार्च 2021

कविता क्या है? आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

कविता क्या है?
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है, मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत् से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करुणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है।
कविता क्या है? 
जब कवि 'भावनाओं के प्रसव' से गुजरते हैं, तो कविताएं प्रस्फुटित होती हैंं।
कार्य में प्रवृत्ति
कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। केवल विवेचना के बल से हम किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते हैं। केवल इस बात को जानकर ही हम किसी काम के करने या न करने के लिए प्रायः तैयार नहीं होते कि वह काम अच्छा है या बुरा, लाभदायक है या हानिकारक। जब उसकी या उसके परिणाम की कोई ऐसी बात हमारे सामने उपस्थित हो जाती है, जो हमें आह्लाद, क्रोध और करुणा आदि से विचलित कर देती है, तभी हम उस काम को करने या न करने के लिए प्रस्तुत होते हैं। केवल बुद्धि हमें काम करने के लिए उत्तेजित नहीं करती। काम करने के लिए मन ही हमको उत्साहित करता है। अतः कार्य-प्रवृत्ति के लिए मन में वेग का आना आवश्यक है। यदि किसी से कहा जाये कि अमुक देश तुम्हारा इतना रुपया प्रतिवर्ष उठा ले जाता है, इसी से तुम्हारे यहाँ अकाल और दारिद्र्य बना रहता है, तो सम्भव है कि उस पर कुछ प्रभाव न पड़े। पर यदि दारिद्र्य और अकाल का भीषण दृश्य दिखाया जाए, पेट की ज्वाला से जले हुए प्राणियों के अस्थिपंजर सामने पेश किए जाए और भूख से तड़पते हुए बालक के पास बैठी हुई माता का आर्त्तस्वर सुनाया जाए तो वह मनुष्य क्रोध और करुणा से विह्वल हो उठेगा और इन बातों को दूर करने का यदि उपाय नहीं तो संकल्प अवश्य करेगा। पहले प्रकार की बात कहना राजनीतिज्ञ का काम है और पिछले प्रकार का दृश्य दिखाना, कवि का कर्तव्य है। मानव-हृदय पर दोनों में से किसका अधिकार अधिक हो सकता है, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं।
मनोरंजन और स्वभाव-संशोधन
कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं। किसी लोभी और कंजूस दुकानदार को देखिए, जिसने लोभ के वशीभूत होकर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि मनोविकारों को दबा दिया है और संसार के सब सुखों से मुँह मोड़ लिया है अथवा किसी महाक्रूर राजकर्मचारी के पास जाइए, जिसका हृदय पत्थर के समान जड़ और कठोर हो गया है, जिसे दूसरे के दुःख और क्लेश का अनुभव स्वप्न में भी नहीं होता। ऐसा करने से आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि क्या इनकी भी कोई दवा है। ऐसे हृदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक धर्म पर लाने की सामर्थ्य काव्य ही में है। कविता ही उस दुकानदार की प्रवृत्ति भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि के सौन्दर्य की ओर ले जाएगी, कविता ही उसका ध्यान औरों की आवश्यकता की ओर आकर्षित करेगी और उनकी पूर्ति करने की इच्छा उत्पन्न करेगी, कविता ही उसे उचित अवसर पर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि सिखावेगी। इसी प्रकार उस राजकर्मचारी के सामने कविता ही उसके कार्यों का प्रतिबिम्ब खींचकर रक्खेगी और उनकी जघन्यता और भयंकरता का आभास दिखलावेगी तथा दैवी किंवा अन्य मनुष्यों द्वारा पहुँचाई हुई पीड़ा और क्लेश के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश को दिखलाकर उसे दया दिखाने की शिक्षा देगी। प्रायः लोग कहा करते हैं कि कविता का अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन है, पर मेरी समझ में मनोरंजन उसका अन्तिम उद्देश्य नहीं है। कविता पढ़ते समय मनोरंजन अवश्य होता है, पर इसके सिवा कुछ और भी होता है। मनोरंजन करना कविता का प्रधान गुण है। इससे मनुष्य का चित्त एकाग्र हो जाता है, इधर-उधर जाने नहीं पाता। यही कारण है कि नीति और धर्म-सम्बन्धी उपदेश चित्त पर वैसा असर नहीं करते जैसा कि किसी काव्य या उपन्यास से निकली हुई शिक्षा असर करती है। केवल यही कहकर कि ‘परोपकार करो’ ‘सदैव सच बोलो’ ‘चोरी करना महापाप है’ हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि कोई अपकारी मनुष्य परोपकारी हो जाएगा, झूठा सच्चा हो जाएगा और चोर चोरी करना छोड़ देगा, क्योंकि पहले तो मनुष्य का चित्त ऐसी शिक्षा ग्रहण करने के लिए उद्यत ही नहीं होता, दूसरे मानव-जीवन पर उसका कोई प्रभाव अंकित हुआ न देखकर वह उनकी कुछ परवा नहीं करता, पर कविता अपनी मनोरंजक शक्ति के द्वारा पढ़ने या सुनने वाले का चित्त उचटने नहीं देती। उसके हृदय आदि अत्यन्त कोमल स्थानों को स्पर्श करती है और सृष्टि में उक्त कर्मों के स्थान और सम्बन्ध की सूचना देकर मानव जीवन पर उनके प्रभाव और परिणाम को विस्तृत रूप से अंकित करके दिखलाती है। इन्द्रासन खाली कराने का वचन देकर, हूर और गिलमा का लालच दिखाकर, यमराज का स्मरण दिलाकर और दोजख़ की जलती हुई आग की धमकी देकर हम बहुधा किसी मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्य-परायण नहीं बना सकते। बात यह है कि इस तरह का लालच या धमकी ऐसी है जिससे मनुष्य परिचित नहीं और जो इतनी दूर की है कि उसकी परवा करना मानव-प्रकृति के विरुद्ध है। सदा-चार में एक अलौकिक सौन्दर्य और माधुर्य होता है। अतः लोगों को सदाचार की ओर आकर्षित करने का प्रकृत उपाय यही है कि उनको उसका सौन्दर्य और माधुर्य दिखाकर लुभाया जाए, जिससे वे बिना आगा पीछा सोचे मोहित होकर उसकी ओर ढल पड़ें। मन को हमारे आचार्यों ने ग्यारहवीं इन्द्रिय माना है। उसका रञ्जन करना और उसे सुख पहुँचाना ही यदि कविता का धर्म माना जाए तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुई। परन्तु क्या हम कह सकते हैं कि वाल्मीकि का आदि-काव्य, तुलसीदास का रामचरितमानस, या सूरदास का सूरसागर विलास की सामग्री है? यदि इन ग्रन्थों से मनोरंजन होगा, तो चरित्र-संशोधन भी अवश्य ही होगा। खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने शृंगार रस की उन्माद कारिणी उक्तियों से साहित्य को इतना भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है। पीछे से तो ग्रीष्मोपचार आदि के नुस्खे भी कवि लोग तैयार करने लगे। ऐसी शृंगारिक कविता को कोई विलास की सामग्री कह बैठे तो उसका क्या दोष? सारांश यह कि कविता का काम मनोरंजन ही नहीं कुछ और भी है। चरित्र-चित्रण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है, उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं। आदि-काव्य रामायण में जब हम भगवान् रामचन्द्र के प्रतिज्ञा-पालन, सत्यव्रताचरण और पितृभक्ति आदि की छटा देखते हैं, भारत के सर्वोच्च स्वार्थत्याग और सर्वांगपूर्ण सात्विक चरित्र का अलौकिक तेज देखते हैं, तब हमारा हृदय श्रद्धा, भक्ति और आश्चर्य से स्तम्भित हो जाता है। इसके विरुद्ध जब हम रावण को दुष्टता और उद्दंडता का चित्र देखते हैं तब समझते हैं कि दुष्टता क्या चीज है और उसका प्रभाव और परिणाम सृष्टि में क्या है। अब देखिए कविता द्वारा कितना उपकार होता है। उसका काम भक्ति, श्रद्धा, दया, करुणा, क्रोध और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिमार्जित करना तथा सृष्टि की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त सम्बन्ध स्थिर करना है।
उच्च आदर्श
कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत करती है और उसे उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है, जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है।
कविता की आवश्यकता
कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी। इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता जाती रहने का डर रहता है। अतएव मानुषी प्रकृति को जागृत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है। कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पावे। जानवरों को इसकी जरूरत नहीं। हमने किसी उपन्यास में पढ़ा है कि एक चिड़चिड़ा बनिया अपनी सुशीला और परम रुपवती पुत्रवधू को अकारण निकालने पर उद्यत हुआ। जब उसके पुत्र ने अपनी स्त्री की ओर से कुछ कहा तब वह चिढ़कर बोला, ‘चल चल! भोली सूरत पर मरा जाता है’ आह! यह कैसा अमानुषिक बर्ताव है! सांसारिक बन्धनों में फंसकर मनुष्य का हृदय कभी-कभी इतना कठोर और कुंठित हो जाता है कि उसकी चेतनता - उसका मानुषभाव - कम हो जाता है। न उसे किसी का रूप माधुर्य देखकर उस पर उपकार करने की इच्छा होती है, न उसे किसी दीन दुखिया की पीड़ा देखकर करुणा आती है, न उसे अपमानसूचक बात सुनकर क्रोध आता है। ऐसे लोगों से यदि किसी लोमहर्षण अत्याचार की बात कही जाए, तो मनुष्य के स्वाभाविक धर्मानुसार, वे क्रोध या घृणा प्रकट करने के स्थान पर रुखाई के साथ यही कहेंगे - “जाने दो, हमसे क्या मतलब, चलो अपना काम देखो.” याद रखिए, यह महा भयानक मानसिक रोग है। इससे मनुष्य जीते जी मृतवत् हो जाता है। कविता इसी मरज़ की दवा है।
सृष्टि-सौन्दर्य
कविता सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त करती है। जो कविता रमणी के रूप माधुर्य से हमें आह्लादित करती है, वही उसके अन्तःकरण की सुन्दरता और कोमलता आदि की मनोहारिणी छाया दिखा कर मुग्ध भी करती है। जिस बंकिम की लेखनी ने गढ़ के ऊपर बैठी हुई राजकुमारी तिलोत्तमा के अंग प्रत्यंग की शोभा को अंकित किया है, उसी ने आयशा के अन्तःकरण की अपूर्व सात्विकी ज्योति दिखा कर पाठकों को चमत्कृत किया है। भौतिक सौन्दर्य के अवलोकन से हमारी आत्मा को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार मानसिक सौन्दर्य से भी। जिस प्रकार वन, पर्वत, नदी, झरना आदि से हम प्रफुल्लित होते हैं, उसी प्रकार मानवी अन्तःकरण में प्रेम, दया, करुणा, भक्ति आदि मनोवेगों के अनुभव से हम आनंदित होते हैं और यदि इन दोनों पार्थिव और अपार्थिव सौन्दर्यों का कहीं संयोग देख पड़े तो फिर क्या कहना है। यदि किसी अत्यन्त सुन्दर पुरुष या अत्यन्त रूपवती स्त्री के रूप मात्र का वर्णन करके हम छोड़ दें तो चित्र अपूर्ण होगा, किन्तु यदि हम साथ ही उसके हृदय की दृढ़ता और सत्यप्रियता अथवा कोमलता और स्नेह-शीलता आदि की भी झलक दिखावें तो उस वर्णन में सजीवता आ जाएगी। महाकवियों ने प्रायः इन दोनों सौन्दर्यों का मेल कराया है जो किसी किसी को अस्वाभाविक प्रतीत होता है। किन्तु संसार में प्रायः देखा जाता है कि रूपवान् जन सुशील और कोमल होते हैं और रूपहीन जन क्रूर और दुःशील। इसके सिवा मनुष्य के आंतरिक भावों का प्रतिबिम्ब भी चेहरे पर पड़कर उसे रुचिर या अरुचिर बना देता है। पार्थिव सौन्दर्य का अनुभव करके हम मानसिक अर्थात् अपार्थिव सौन्दर्य की ओर आकर्षित होते हैं। अतएव पार्थिव सौन्दर्य को दिखलाना कवि का प्रधान कर्म है। ==कविता का दुरुपयोग== जो लोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं, वे सरस्वती का गला घोंटते हैं। ऐसी तुच्छ वृत्ति वालों को कविता न करना चाहिए। कविता का उच्चाशय, उदार और निःस्वार्थ हृदय की उपज है। सत्कवि मनुष्य मात्र के हृदय में सौन्दर्य का प्रवाह बहाने वाला है। उसकी दृष्टि में राजा और रंक सब समान हैं। वह उन्हें मनुष्य के सिवा और कुछ नहीं समझता। जिस प्रकार महल में रहने वाले बादशाह के वास्तविक सद् गुणों की वह प्रशंसा करता है, उसी प्रकार झोंपड़े में रहने वाले किसान के सद्गुणों की भी। श्रीमानों के शुभागमन की कविता लिखना और बात बात पर उन्हें बधाई देना सत्कवि का काम नहीं। हाँ, जिसने निःस्वार्थ होकर और कष्ट सहकर देश और समाज की सेवा की है, दूसरों का हित साधन किया है, धर्म का पालन किया है, ऐसे परोपकारी महात्मा का गुण गान करना उसका कर्तव्य है।
कविता की भाषा
मनुष्य स्वभाव ही से प्राचीन पुरुषों और वस्तुओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखता है। पुराने शब्द हम लोगों को मालूम ही रहते हैं। इसी से कविता में कुछ न कुछ पुराने शब्द आ ही जाते हैं। उनका थोड़ा बहुत बना रहना अच्छा भी है। वे आधुनिक और पुरातन कविता के बीच सम्बन्ध सूत्र का काम देते हैं। हिन्दी में ‘राजते हैं’ ‘गहते हैं’ ‘लहते हैं’ ‘सरसाते हैं’ आदि प्रयोगों का खड़ी बोली तक की कविता में बना रहना कोई अचम्भे की बात नहीं। अँग्रेज़ी कविता में भी ऐसे शब्दों का अभाव नहीं, जिनका व्यवहार बहुत पुराने जमाने से कविता में होता आया है। ‘Main’ ‘Swain’ आदि शब्द ऐसे ही हैं। अंग्रेज़ी कविता समझने के लिए इनसे परिचित होना पड़ता है, पर ऐसे शब्द बहुत थोड़े आने चाहिए, वे भी ऐसे जो भद्दे और गंवारू न हों। खड़ी बोली में संयुक्त क्रियाएँ बहुत लंबी होती हैं, जैसे - "लाभ करते हैं,” “प्रकाश करते हैं” आदि। कविता में इनके स्थान पर “लहते हैं” “प्रकाशते हैं” कर देने से कोई हानि नहीं, पर यह बात इस तरह के सभी शब्दों के लिए ठीक नहीं हो सकती। कविता में कही गई बात हृत्पटल पर अधिक स्थायी होती है। अतः कविता में प्रत्यक्ष और स्वभावसिद्ध व्यापार-सूचक शब्दों की संख्या अधिक रहती है। समय बीता जाता है, कहने की अपेक्षा, समय भागा जाता है, कहना अधिक काव्य सम्मत है। किसी काम से हाथ खींचना, किसी का रुपया खा जाना, कोई बात पी जाना, दिन ढलना, मन मारना, मन छूना, शोभा बरसना आदि ऐसे ही कवि-समय-सिद्ध वाक्य हैं, जो बोल-चाल में आ गए हैं। नीचे कुछ पद्य उदाहरण-स्वरूप दिए जाते हैं -
(क) धन्य भूमि वन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाँव तुम धारा।। -तुलसीदास
(ख) मनहुँ उमगि अंग अंग छवि छलकै।। -तुलसीदास, गीतावलि
(ग) चूनरि चारु चुई सी परै चटकीली रही अंगिया ललचावे
(घ) वीथिन में ब्र में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरो बसंत है। -पद्माकर
(ङ) रंग रंग रागन पै, संग ही परागन पै, वृन्दावन बागन पै बसंत बरसो परै।
बहुत से ऐसे शब्द हैं, जिनसे एक ही का नहीं किन्तु कई क्रियाओं का एक ही साथ बोध होता है। ऐसे शब्दों को हम जटिल शब्द कह सकते हैं। ऐसे शब्द वैज्ञानिक विषयों में अधिक आते हैं। उनमें से कुछ शब्द तो एक विलक्षण ही अर्थ देते हैं और पारिभाषिक कहलाते हैं। विज्ञानवेत्ता को किसी बात की सत्यता या असत्यता के निर्णय की जल्दी रहती है। इससे वह कई बातों को एक मानकर अपना काम चलाता है, प्रत्येक काम को पृथक पृथक दृष्टि से नहीं देखता। यही कारण है जो वह ऐसे शब्द अधिक व्यवहार करता है, जिनसे कई क्रियाओं से घटित एक ही भाव का अर्थ निकलता है। परन्तु कविता प्राकृतिक व्यापारों को कल्पना द्वारा प्रत्यक्ष कराती है- मानव-हृदय पर अंकित करती है। अतएव पूर्वोक्त प्रकार के शब्द अधिक लाने से कविता के प्रसाद गुण की हानि होती है और व्यक्त किए गए भाव हृदय पर अच्छी तरह अंकित नहीं होते। बात यह है कि मानवी कल्पना इतनी प्रशस्त नहीं कि एक दो बार में कई व्यापार उसके द्वारा हृदय पर स्पष्ट रीति से खचित हो सकें। यदि कोई ऐसा शब्द प्रयोग में लाया गया जो कई संयुक्त व्यापारों का बोधक है तो सम्भव है, कल्पना शक्ति किसी एक व्यापार को भी न ग्रहण कर सके अथवा तदन्तर्गत कोई ऐसा व्यापार प्रगट करे, जो मानवी प्रकृति का उद्दीपक न हो। तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो कई संयुक्त व्यापारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं। किसी ने ‘प्रेम फ़ौजदारी’ नाम की शृंगार-रस-विशिष्ट एक छोटी-सी कविता अदालती कार्रवाइयों पर घटा कर लिखी है और उसे ‘एक तरफा डिगरी’ आदि क़ानूनी शब्दों से भर दिया है। यह उचित नहीं। कविता का उद्देश्य इसके विपरीत व्यवहार से सिद्ध होता है। जब कोई कवि किसी दार्शनिक सिद्धान्त को अधिक प्रभावोत्पादक बना कर उसे लोगों के चित्त पर अंकित करना चाहता है, तब वह जटिल और पारिभाषिक शब्दों को निकाल कर उसे अधिक प्रत्यक्ष और मर्म स्पर्शी रुप देता है। भर्तृहरि और गोस्वामी तुलसीदास आदि इस बात में बहुत निपुण थे। भर्तृहरि का एक श्लोक लीजिए- तृषा शुष्य्तास्ये पिबति सलिलं स्वादु सुरभि
क्षुधार्त्तः संछालीन्कवलयति शाकादिवलितान्।
प्रदीप्ते रागाग्रौ सुदृढ़तरमाश्ल्ष्यिति वधूं
प्रतीकारो व्याधैः सुखमिति विपर्यस्यति जनः।।
भावार्थ - प्यासे होने पर स्वादिष्ट और सुगन्धित जल-पान, भूखे होने पर शाकादि के साथ चावलों का भोज और हृदय में अनुरागाग्नि के प्रज्वलित होने पर प्रियात्मा का आलिंगन करने वाले मनुष्य विलक्षण मूर्ख हैं, क्योंकि प्यास आदि व्याधियों की शान्ति के लिए जल-पान आदि प्रतीकारों ही को वे सुख समझते हैं। वे नहीं जानते कि उनका यह उपचार बिलकुल ही उलटा है। देखिए, यहाँ पर कवि ने कैसी विलक्षण उक्ति के द्वारा मनुष्य की सुखःदुख विषयक बुद्धि की भ्रामिकता दिखलाई है। अंग्रेज़ों में भी पोप कवि इस विषय में बहुत सिद्धहस्त था। नीचे उसका एक साधारण सिद्धान्त लिखा जाता है- “भविष्यत् में क्या होने वाला है, इस बात की अनभिज्ञता इसलिए दी गई है, जिसमें सब लोग, आने वाले अनिष्ट की शंका से, उस अनिष्ट घटना के पूर्ववर्ती दिनों के सुख को भी न खो बैठें.” इसी बात को पोप कवि इस तरह कहता है-
The lamb thyariot dooms to bleed to day
Had he thy reason would he skip and play?
Pleased to the last he crops the flow’ry food
And licks the hand just raised to shed his blood.
The blindness to the future kindly given। Essay on man.
भावार्थ - उस भेड़ के बच्चे को, जिसका तू आज रक्त बहाना चाहता है, यदि तेरा ही सा ज्ञान होता तो क्या वह उछलता कूदता फिरता? अन्त तक वह आनन्दपूर्वक चारा खाता है और उस हाथ को चाटता है जो उसका रक्त बहाने के लिए उठाया गया है। … भविष्यत् का अज्ञान हमें (ईश्वर ने) बड़ी कृपा करके दिया है। ‘अनिष्ट’ शब्द बहुत व्यापक और संदिग्ध है, अतः कवि मृत्यु ही को सबसे अधिक अनिष्ट वस्तु समझता है। मृत्यु की आशंका से प्राणिमात्र का विचलित होना स्वाभाविक है। कवि दिखलाता है कि परम अज्ञानी पशु भी मृत्यु सिर पर नाचते रहते भी सुखी रहता है। यहाँ तक कि वह प्रहारकर्ता के हाथ को चाटता जाता है। यह एक अद्भुत और मर्मस्पर्शी दृश्य है। पूर्वोक्त सिद्धान्त को यहाँ काव्य का रूप प्राप्त हुआ है। एक और साधारण-सा उदाहरण लीजिए। “तुमने उससे विवाह किया” यह एक बहुत ही साधारण वाक्य है। पर “तुमने उसका हाथ पकड़ा” यह एक विशेष अर्थ-गर्भित और काव्योचित वाक्य है। ‘विवाह’ शब्द के अन्तर्गत बहुत से विधान हैं, जिन सब पर कोई एक दफ़े दृष्टि नहीं डाल सकता। अतः उससे कोई बात स्पष्ट रूप से कल्पना में नहीं आती। इस कारण उन विधानों में से सबसे प्रधान और स्वाभाविक बात जो हाथ पकड़ना है उसे चुन कर कवि अपने अर्थ को मनुष्य के हृत्पटल पर रेखांकित करता है।
श्रुति सुखदता 
कविता की बोली और साधारण बोली में बड़ा अन्तर है। “शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे” और “नीरसतरुरिह विलसति पुरतः” वाली बात हमारी पण्डित मण्डली में बहुत दिन से चली आती है। भाव-सौन्दर्य और नाद-सौन्दर्य दोनों के संयोग से कविता की सृष्टि होती है। श्रुति-कटु मानकर कुछ अक्षरों का परित्याग, वृत्त-विधान और अन्त्यानुप्रास का बन्धन, इस नाद-सौन्दर्य के निबाहने के लिए है। बिना इसके कविता करना अथवा केवल इसी को सर्वस्व मानकर कविता करने की कोशिश करना निष्फल है। नाद-सौन्दर्य के साथ भाव-सौन्दर्य भी होना चाहिए। हिन्दी के कुछ पुराने कवि इसी नाद-सौन्दर्य के इतना पीछे पड़ गए थे कि उनकी अधिकांश कविता विकृत और प्रायः भावशून्य हो गई है। यह देखकर आजकल के कुछ समालोचक इतना चिढ़ गए हैं, कि ऐसी कविता को एकदम निकाल बाहर करना चाहते हैं। किसी को अन्त्यानुप्रास का बन्धन खलता है, कोई गणात्मक द्वन्द्वों को देखकर नाक भौं चढ़ाता है, कोई फ़ारसी के मुखम्मस और रुबाई की ओर झुकता है। हमारी छन्दोरचना तक की कोई कोई अवहेलना करते हैं- वह छन्दो रचना जिसके माधुर्य को भूमण्डल के किसी देश का छन्द शास्त्र नहीं पा सकता और जो हमारी श्रुति-सुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है। जो लोग अन्त्यानुप्रास की बिलकुल आवश्यकता नहीं समझते उनसे मुझे यही पूछना है कि अन्त्यानुप्रास ही पर इतना कोप क्यों? छन्द (Metre) और तुक (Rhyme) दोनों ही नाद-सौन्दर्य के उद्देश्य से रखे गए हैं, फिर क्यों एक को निकाला जाए दूसरे को नहीं? यदि कहा जाए कि सिर्फ छन्द से उस उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है तो यह जानने की इच्छा बनी रहती है कि क्या कविता के लिए नाद-सौन्दर्य की कोई सीमा नियत है। यदि किसी कविता में भाव-सौन्दर्य के साथ नाद-सौन्दर्य भी वर्तमान हो, तो वह अधिक ओजस्विनी और चिरस्थायिनी होगी। नाद-सौन्दर्य कविता के स्थायित्व का वर्धक है, उसके बल से कविता ग्रंथाश्रय-विहीन होने पर भी किसी न किसी अंश में लोगों की जिह्वा पर बनी रहती है। अतएव इस नाद-सौन्दर्य को केवल बन्धन ही न समझना चाहिए। यह कविता की आत्मा नहीं, तो शरीर अवश्य है। नाद-सौन्दर्य संबंधी नियमों को गणित-क्रिया समान काम में लाने से हमारी कविता में कहीं-कहीं बड़ी विलक्षणता आ गई है। श्रुति-कटु वर्णों का निर्देश इसलिए नहीं किया गया कि जितने अक्षर श्रवण-कटु हैं, वे एकदम त्याज्य समझे जाएँ और उनकी जगह पर श्रवण-सुखद वर्ण ढूंढ-ढूंढ कर रखे जाएँ। इस नियम-निर्देश का मतलब सिर्फ इतना ही है कि यदि मधुराक्षर वाले शब्द मिल सकें और बिना तोड़ मरोड़ के प्रसंगानुसार खप सकें तो उनके स्थान पर श्रुति-कर्कश अक्षर वाले शब्द न लाए जाएँ। संस्कृत से सम्बन्ध रखने वाली भाषाओं में इस नाद-सौन्दर्य का निर्वाह अधिकता से हो सकता है। अतः अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं की देखा-देखी जिनमें इसके लिए कम जगह है, अपनी कविता को भी हमें इस विशेषता से वंचित कर देना बुद्धिमानी का काम नहीं। पर, याद रहे, सिर्फ श्रुति-मधुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्यान्य गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है। एक और विशेषता हमारी कविता में है। वह यह है कि कहीं कहीं व्यक्तियों के नामों के स्थान पर उनके रूप या कार्यबोधक शब्दों का व्यवहार किया जाता है। पद्य के नपे हुए चरणों के लिए शब्दों की संख्या का बढ़ाना ही इसका प्रयोजन जान पड़ता है, पर विचार करने से इसका इससे भी गुरुतर उद्देश्य प्रगट होता है। सच पूछिए तो यह बात कृत्रिमता बचाने के लिए की जाती है। मनुष्यों के नाम यथार्थ में कृत्रिम संकेत हैं, जिनसे कविता की परिपोषकता नहीं होती। अतएव कवि मनुष्यों के नामों के स्थान पर कभी कभी उनके ऐसे रूप, गुण या व्यापार की ओर इशारा करता है जो स्वाभाविक होने के कारण सुनने वाले के ध्यान में अधिक आ सकते हैं और प्रसंग विशेष के अनुकूल होने से वर्णन की यथार्थता को बढ़ाते हैं। गिरिधर, मुरारि, त्रिपुरारि, दीनबन्धु, चक्रपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं। ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। जैसे, यदि कोई मनुष्य किसी दुर्घर्ष अत्याचारी के हाथ से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए - ‘हे गोपिकारमण!’ ‘हे वृन्दावनबिहारी!’ आदि कहकर कृष्ण को पुकारने की अपेक्षा ‘हे मुरारि!’ ‘हे कंसनिकंदन’ आदि सम्बोधनों से पुकारना अधिक उपयुक्त है, क्योंकि श्रीकृष्ण के द्वारा मुर और कंस आदि दुष्टों को मारा जाना देख कर उसे उनसे अपनी रक्षा की आशा हुई है न कि उनकी वृन्दावन में गोपियों के साथ विहार करना देख कर। इसी तरह किसी आपत्ति से उद्धार पाने के लिए कृष्ण को ‘मुरलीधर’ कह कर पुकारने की अपेक्षा ‘गिरिधर’ कहना अधिक तर्क-संगत है।
अलंकार 
कविता में भाषा को खूब जोरदार बनाना पड़ता है- उसकी सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है। कल्पना को चटकीली करने और रस-परिपाक के लिए कभी कभी किसी वस्तु का गुण या आकार बहुत बढ़ाकर दिखाना पड़ता है और कभी घटाकर। कल्पना-तरंग को ऊँचा करने के लिए कभी कभी वस्तु के रूप और गुण को उसके समान रूप और धर्म वाली और वस्तुओं के सामने लाकर रखना पड़ता है। इस तरह की भिन्न भिन्न प्रकार की वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार है। इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है। इनसे वस्तु वर्णन में बहुत सहायता मिलती है। कहीं कहीं तो इनके बिना कविता का काम ही नहीं चल सकता, किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि अलंकार ही कविता है। ये अलंकार बोलचाल में भी रोज आते रहते हैं। जैसे, लोग कहते हैं ‘जिसने शालग्राम को भून डाला उसे भंटा भूनते क्या लगता है?’ इसमें काव्यार्थापत्ति अलंकार है। ‘क्या हमसे बैर करके तुम यहाँ टिक सकते हो?’ इसमें वक्रोक्ति है। कई वर्ष हुए ‘अलंकारप्रकाश’ नामक पुस्तक के कर्ता का एक लेख ‘सरस्वती’ में निकला था। उसका नाम था- ‘कवि और काव्य’। उसमें उन्होंने अलंकारों की प्रधानता स्थापित करते हुए और उन्हें काव्य का सर्वस्व मानते हुए लिखा था कि ‘आजकल के बहुत से विद्वानों का मत विदेशी भाषा के प्रभाव से काव्य विषय में कुछ परिवर्तित देख पड़ता है। वे महाशय सर्वलोकमान्य साहित्य-ग्रन्थों में विवेचन किए हुए व्यंग्य-अलंकार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट न समझ केवल सृष्टि-वैचित्र्य वर्णन में काव्यत्व समझते हैं। यदि ऐसा हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या?’ रस और भाव ही कविता के प्राण हैं। पुराने विद्वान् रसात्मक कविता ही को कविता कहते थे। अलंकारों को वे आवश्यकतानुसार वर्णित विषय को विशेषतया हृदयंगम करने के लिए ही लाते थे। यह नहीं समझा जाता था कि अलंकार के बिना कविता हो ही नहीं सकती। स्वयं काव्य-प्रकाश के कर्ता मम्मटाचार्य ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है और उदाहरण भी दिया है- “तददौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि.” किन्तु पीछे से इन अलंकारों ही में काव्यत्व मान लेने से कविता अभ्यासगम्य और सुगम प्रतीत होने लगी। इसी से लोग उनकी ओर अधिक पड़े। धीरे-धीरे इन अलंकारों के लिए आग्रह होने लगा। यहाँ तक कि चन्द्रालोककार ने कह डाला कि-
अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।।
अर्थात् - जो अलंकार-रहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अग्नि को उष्णता रहित क्यों नहीं मानता? परन्तु यथार्थ बात कब तक छिपाई जा सकती है। इतने दिनों पीछे समय ने अब पलटा खाया। विचारशील लोगों पर यह बात प्रगट हो गई कि रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है। इस विषय में पूर्वोक्त ग्रंथकार महोदय को एक बात कहनी थी, पर उन्होंने नहीं कही। वे कह सकते थे कि सृष्टि-वैचित्र्य-वर्णन भी तो स्वभावोक्ति अलंकार है। इसका उत्तर यह है कि स्वभावोक्ति को अलंकार मानना उचित नहीं। वह अलंकारों की श्रेणी में आ ही नहीं सकती। वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है। जिस वस्तु को हम चाहें उस प्रणाली के अन्तर्गत करके उसका वर्णन कर सकते हैं। किसी वस्तु-विशेष से उसका सम्बन्ध नहीं। यह बात अलंकारों की परीक्षा से स्पष्ट हो जाएगी। स्वभावोक्ति में वर्ण्य वस्तु का निर्देश है, पर वस्तु-निर्वाचन अलंकार का काम नहीं। इससे स्वभावोक्ति को अलंकार मानना ठीक नहीं। उसे अलंकारों में गिनने वालों ने बहुत सिर खपाया है, पर उसका निर्दोष लक्षण नहीं कर सके। काव्य-प्रकाश के कारिकाकार ने उसका लक्षण लिखा है-
स्वभावोक्तिवस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारुपवर्णनम्


अर्थात्- जिसमें बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है। बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है। बालकादिक कहने से किसी वस्तुविशेष का बोध तो होता नहीं। इससे यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के व्यापार और रूप का वर्णन स्वभावोक्ति है। इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष के कारण अलंकारता नहीं आती। अलंकारसर्वस्व के कर्ता राजानक रूय्यक ने इसका यह लक्षण लिखा है-
सूक्ष्मवस्तु स्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः।
अर्थात्- वस्तु के सूक्ष्म स्वभाव का ठीक-ठीक वर्णन करना स्वभावोक्ति है। आचार्य दण्डी ने अवस्था की योजना करके यह लक्षण लिखा है-
नानावस्थं पदार्थनां रुपं साक्षाद्विवृण्वती।
स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालंकृतिर्यथा।।
बात यह है कि स्वभावोक्ति अलंकार के अंतर्गत आ ही नहीं सकती, क्योंकि वह वर्णन की शैली नहीं, किन्तु वर्ण्य वस्तु या विषय है। जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकार-स्थापना सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकती। महाराज भोज ने भी अलंकार को ‘अलमर्थमलंकर्त्तुः’ अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है। इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता की सुन्दरता सिद्ध है। अतः उसे अलंकारों में ढूंढना भूल है। अलंकारों से युक्त बहुत से ऐसे काव्योदाहरण दिए जा सकते हैं जिनको अलंकार के प्रेमीलोग भी भद्दा और नीरस कहने में संकोच न करेंगे। इसी तरह बहुत से ऐसे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं जिनमें एक भी अलंकार नहीं, परंतु उनके सौन्दर्य और मनोरंजकत्व को सब स्वीकार करेंगे। जिन वाक्यों से मनुष्य के चित्त में रस संचार न हो - उसकी मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन न हो - वे कदापि काव्य नहीं। अलंकारशास्त्र की कुछ बातें ऐसी हैं, जो केवल शब्द चातुरी मात्र हैं। उसी शब्दकौशल के कारण वे चित्त को चमत्कृत करती हैं। उनसे रस-संचार नहीं होता। वे कान को चाहे चमत्कृत करें, पर मानव-हृदय से उनका विशेष सम्बन्ध नहीं। उनका चमत्कार शिल्पकारों की कारीगरी के समान सिर्फ शिल्प-प्रदर्शनी में रखने योग्य होता है। अलंकार है क्या वस्तु? विद्वानों ने काव्यों के सुन्दर-सुन्दर स्थलों को पहले चुना। फिर उनकी वर्णन शैली से सौन्दर्य का कारण ढूंढा। तब वर्णन-वैचित्र्य के अनुसार भिन्न-भिन्न लक्षण बनाए। जैसे ‘विकल्प’ अलंकार को पहले पहल राजानक रुय्यक ने ही निकाला है। अब कौन कह सकता है कि काव्यों के जितने सुन्दर-सुन्दर स्थल थे सब ढूंढ डाले गए, अथवा जो सुन्दर समझे गए - जिन्हें लक्ष्य करने लक्षण बने- उनकी सुन्दरता का कारण कही हुई वर्णन प्रणाली ही थी। अलंकारों के लक्षण बनने तक काव्यों का बनना नहीं रुका रहा। आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि ने - “मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः” का उच्चारण किसी अलंकार को ध्यान में रखकर नहीं किया। अलंकार लक्षणों के बनने से बहुत पहले कविता होती थी और अच्छी होती थी। अथवा यों कहना चाहिए की जब से इन अलंकारों को हठात् लाने का उद्योग होने लगा तबसे कविता कुछ बिगड़ चली। (जय हिन्द वन्देमातरम)
*

अक्षरवाणी छंद सलिला

 अक्षरवाणी छंद सलिला 

[04/03, 18:32] +91 81214 87232: https://youtu.be/xeEnKZvcyHo

[04/03, 18:33] +91 81214 87232: https://streamyard.com/iz735rs3wx
[04/03, 18:33] +91 81214 87232: https://youtu.be/xeEnKZvcyHo

मुक्तक:

मुक्तक:
फूल फूला तो तभी जब सलिल ने दी है नमी
न तो माटी ने, न हवाओं ने ही रखी है कमी
सारे गुलशन ने महककर सुबह अगवानी की
सदा मुस्कान मिले, पास नहीं आए गमी.
४-३-२०१८

होली की कुण्डलियाँ

होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
संजीव 'सलिल'
*
होली हो ली हो रही होगी फिर-फिर यार
मोदी राहुल ममता माया जयललिता तैयार
जयललिता तैयार न जीवनसाथी-बच्चे
इसीलिये तो दाँव न चलते कोई कच्चे
कहे 'सलिल' कवि बच्चेवालों की जो टोली
बचकर रहे न गीतका दें ये भंग की गोली
*
होली अनहोली न हो, खायें अधिक न ताव.
छेड़-छाड़ सीमित करें, अधिक न पालें चाव..
अधिक न पालें चाव, भाव बेभाव बढ़े हैं.
बचें करेले सभी, नीम पर साथ चढ़े हैं..
कहे 'सलिल' कविराय, न भोली है अब भोली.
बचकर रहिये आप, मनायें जम भी होली..
*
होली जो खेले नहीं, वह कहलाये बुद्ध.
माया को भाये सदा, सत्ता खातिर युद्ध..
सत्ता खातिर युद्ध, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोलकर करता बातें.
लेकिन भीतर ही भीतर करता हैं घातें..
नकली कुश्ती देख भ्रमित है जनता भोली.
एक साथ मिल खर्चे बढ़वा खेलें होली..
*
४-३-२०१५

समीक्षा नवगीत राधेश्याम बंधु

कृति चर्चा:
एक गुमसुम धूप : समय की साक्षी देते नवगीत
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[कृति विवरण: एक गुमसुम धूप, राधेश्याम बंधु, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक बहुरंगी जेकेटयुक्त, पृष्ठ ९६, मूल्य १५०/-, प्रकाशक कोणार्क प्रकाशन बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, नवगीतकार संपर्क ९८६८४४४६६६, rsbandhu2@gmail.com]
नवगीत को ‘स्व’ से ‘सर्व’ तक पहुँचाकर समाज कल्याण का औजार बनाने के पक्षधर हस्ताक्षरों में से एक राधेश्याम बंधु की यह कृति सिर्फ पढ़ने नहीं, पढ़कर सोचने और सोचकर करनेवालों के लिये बहुत काम की है. बाबा की / अनपढ़ बखरी में / शब्दों का सूरज ला देंगे, जो अभी / तक मौन थे / वे शब्द बोलेंगे, जीवन केवल / गीत नहीं है / गीता की है प्रत्याशा, चाहे / थके पर्वतारोही / धूप शिखर पर चढ़ती रहती जैसे नवाशा से भरपूर नवगीतों से मुदों में भी प्राण फूँकने का सतत प्रयास करते बंधु जी के लिये लेखन शगल नहीं धर्म है. वे कहते हैं: ‘जो काम कबीर अपनी धारदार और मार्मिक छान्दस कविताओं से कर सके, वह जनजागरण का काम गद्य कवि कभी नहीं कर सकते..... जागे और रोवे की त्रासदी सिर्फ कबीर की नहीं है बल्कि हर युग में हर संवेदनशील ईमानदार कवि की रही है... गीत सदैव जनजीवन और जनमानस को यदि आल्हादित करने का सशक्त माध्यम रहा है तो तो वह जन जागरण के लिए आम आदमी को आंदोलित करनेवाला भी रहा है.’
‘कोलाहल हो / या सन्नाटा / कविता सदा सृजन करती है’ कहनेवाला गीतकार शब्द की शक्ति के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है: ‘जो अभी / तक मौन थे / वे शब्द बोलेंगे’. नवगीत के बदलते कलेवर पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करनेवालों को उनका उत्तर है: ‘शब्दों का / कद नाप रहे जो/ वक्ता ही बौने होते हैं’.
शहर का नकली परिवेश उन्हें नहीं सुहाता: ‘शहरी शाहों / से ऊबे तो / गीतों के गाँव चले आये’ किन्तु विडम्बना यह कि गाँव भी अब गाँव से न रहे ‘ गाँवों की / चौपालों में भी / होरीवाला गाँव कहाँ?’ वातावरण बदल गया है: ‘पल-पल / सपनों को महकाती / फूलों की सेज कसौली है’, कवि चेतावनी देता है: ‘हरियाली मत / हरो गंध की / कविता रुक जाएगी.’, कवि को भरोसा है कल पर: ‘अभी परिंदों / में धड़कन है / पेड़ हरे हैं जिंदा धरती / मत उदास / हो छाले लखकर / ओ माझी! नदिया कब थकती?.’ डॉ. गंगाप्रसाद विमल ठीक ही आकलन करते हैं :’राधेश्याम बंधु ऐसे जागरूक कवि हैं जो अपने साहित्यिक सृजन द्वारा बराबर उस अँधेरे से लड़ते रहे हैं जो कवित्वहीन कूड़े को बढ़ाने में निरत रहा है.’
नवगीतों में छ्न्दमुक्ति के नाम पर छंदहीनता का जयघोष कर कहन को तराशने का श्रम करने से बचने की प्रवृत्तिवाले कलमकारों के लिये बंधु जी के छांदस अनुशासन से चुस्त-दुरुस्त नवगीत एक चुनौती की तरह हैं. बंधु जी के सृजन-कौशल का उदहारण है नवगीत ‘वेश बदल आतंक आ रहा’. सभी स्थाई तथा पहला व तीसरा अंतरा संस्कारी तथा आदित्य छंदों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं जबकि दूसरा अंतरा संस्कारी छंद में है.
‘जो रहबर
खुद ही सवाल हैं,
वे क्या उत्तर देंगे?
पल-पल चुभन बढ़ानेवाले
कैसे पीर हरेंगे?
गलियों में पसरा सन्नाटा
दहशत है स्वच्छंद,
सरेशाम ही हो जाते हैं
दरवाजे अब बंद.
वेश बदल
आतंक आ रहा
कैसे गाँव जियेंगे?
बस्ती में कुहराम मचा है
चमरौटी की लुटी चाँदनी
मुखिया के बेटे ने लूटी
अम्मा की मुँहलगी रौशनी
जब प्रधान
ही बने लुटेरे
वे क्या न्याय करेंगे?
जब डिग्री ने लाखों देकर
नहीं नौकरी पायी
छोटू कैसे कर्ज़ भरेगा
सोच रही है माई?
जब थाने
ही खुद दलाल हैं
वे क्या रपट लिखेंगे?
.
यह कैसी सिरफिरी हवाएँ शीर्षक नवगीत के स्थाई व अंतरे संस्कारी तथा मानव छंदों की पंक्तियों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं. ‘उनकी खातिर कौन लड़े?’ नवगीत में संस्कारी तथा दैशिक छन्दों का क्रमिक प्रयोग कर रचे गये स्थायी और अंतरे हैं:
उनकी खातिर
कौन लड़े जो
खुद से डरे-डरे?
बचपन को
बँधुआ कर डाला
कर्जा कौन भरे?
जिनका दिन गुजरे भट्टी में
झुग्गी में रातें,
कचरा से पलनेवालों की
कौन सुने बातें?
बिन ब्याही
माँ, बहन बन गयी
किस पर दोष धरे?
परमानन्द श्रीवास्तव के अनुसार: ‘राधेश्याम बंधु प्रगीतात्मक संवेदना के प्रगतिशील कवि हैं, जो संघर्ष का आख्यान भी लिखते हैं और राग का वृत्तान्त भी बनाते हैं. एक अर्थ में राधेश्याम बंधु ऐसे मानववादी कवि हैं कि उन्होंने अभी तक छंद का अनुशासन नहीं छोड़ा है.’
इस संग्रह के नवगीत सामयिकता, सनातनता, सार्थकता, सम्प्रेषणीयता, संक्षिप्तता, सहजता तथा सटीकता के सप्त सोपानों पर खरे हैं. बंधु जी दैनंदिन उपयोग में आने वाले आम शब्दों का प्रयोग करते हैं. वे अपना वैशिष्ट्य या विद्वता प्रदर्शन के लिये क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ अथवा न्यूनज्ञात उर्दू या ग्राम्य शब्दों को खोजकर नहीं ठूँसते... उनका हर नवगीत पढ़ते ही मन को छूता है, आम पाठक को भी न तो शब्दकोष देखना होता है, न किसी से अर्थ पूछना होता है. ‘एक गुमसुम धूप’ का कवि युगीन विसंगतियों, और विद्रूपताओं जनित विडंबनाओं से शब्द-शस्त्र साधकर निरंतर संघर्षरत है. उसकी अभिव्यक्ति जमीन से जुड़े सामान्य जन के मन की बात कहती है, इसलिए ये नवगीत समय की साक्षी देते हैं.
***

समीक्षा नवगीत जगदीश पंकज



कृति चर्चा :
‘सुनो मुझे भी’ नवगीत की सामयिक टेर
चर्चाकार: संजीव
[कृति विववरण: सुनो मुझे भी, नवगीत संग्रह, जगदीश पंकज, आकार डिमाई, पृष्ठ ११२, मूल्य १२०/-, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, वर्ष २०१५, निहितार्थ प्रकाशन, एम् आई जी भूतल १, ए १२९ शालीमार गार्डन एक्सटेंशन II, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद, ०९८१०८३७८१४, ०९८१०८३८८३२ गीतकार संपर्क:सोम सदन ५/४१ राजेन्द्र नगर, सेक्टर २ साहिबाबाद jpjend@hyahoo.co.in]
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बहता पानी निर्मला... सतत प्रवाहित सलिल-धार के तल में पंक होने पर भी उसकी विमलता नहीं घटती अपितु निरंतर अधिकाधिक होती हुई पंकज के प्रगटन का माध्यम बनती है. जगदीश वही जो जग के सुख-दुःख से परिचित ही नहीं उसके प्रति चिंतित भी हो. भाई जगदीश पंकज अपने अंत:करण में सतत प्रवाहित नेह नर्मदा के आलोड़न-विलोड़न में बाधक बाधाओं के पंक को साफल्य के पंकज में परिवर्तित कर उनकी नवगीत सुरभि जन गण को ‘तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा’ के मनोभाव से सौंप सके हैं.
नवगीत के शिखर हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ के अनुसार: ‘ जगदीश पंकज के पास भी ऐसी बहुत कुछ कथ्य सम्पदा है जिसे वे अपने पाठकों तक संप्रेषित करना चाहते हैं. ऐसा आग्रह वह व्यक्ति ही कर सकता है जिसके पास कहने के लिए कुछ विशेष हो, जो अभी तक किसी ने कहा नहीं हो- ‘अस्ति कश्चित वाग्विशेष:’ की भांति. यहाँ मुझे महाभारत की एक और उक्ति सहज ही याद आ रही है 'ऊर्ध्वबाहु: विरौम्यहम् न कश्चित्छ्रिणोतिमाम् ' मैं बाँह उठा-उठाकर चीख रहा हूँ किन्तु मुझे कोई सुन नहीं रहा.’ मुझे प्रतीत होता है कि इन नवगीतों में सर्वत्र रचनात्मक सद्भाव की परिव्याप्ति इसलिए है कि कवि अपनी बात समय और समाज को सामर्थ्य के साथ सुना ही नहीं मनवा भी सका है. शून्य से आरंभ कर निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचाने का संतोष जगदीश जी के व्यक्तित्व तथा कृतित्व दोनों में बिम्बित है. इंद्र जी ने ठीक ही कहा है: ‘प्रस्तुत संग्रह एक ऐसे गीतकार की रचना है जो आत्मसम्मोहन की भावना से ग्रस्त न होकर बृहत्तर सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध संघर्षरत है, जो मानवीय आचरण की समरसता के प्रति आस्थावान है, जो हर किस्म की गैरबराबरी के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करता है और जो अपने शब्दों में प्रगति की आग्नेयता छिपाए हुए है, क्रांतिधर्म होकर भी जो लोकमंगल का आकांक्षी है.’
जगदीश जी वर्तमान को समझने, बूझने और अबूझे से जूझने में विश्वास करते हैं और नवगीत उनके मनोभावों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है:
गीत है वह
जो सदा आँखें उठाकर
हो जहाँ पर भी,
समय से जूझता है
अर्ध सत्यों के
निकलकर दायरों से
जिंदगी की जो
व्यथा को छू रहा है
पद्य की जिस
खुरदुरी झुलसी त्वचा से
त्रासदी का रस
निचुड़कर चू रहा है
गीत है वह
जो कड़ी अनुभूतियों की
आँच से टेढ़ी
पहेली बूझता है.
त्रैलोक जातीय छंद में रचित इस नवगीत में कथ्य की प्रवहमानता, कवि का मंतव्य, भाषा और बिम्ब सहजग्राह्य है. इसी छंद का प्रयोग निम्न नवगीत में देखिए:
चीखकर ऊँचे स्वरों में
कह रहा हूँ
क्या मेरी आवाज़
तुम तक आ रही है?
जीतकर भी
हार जाते हम सदा ही
यह तुम्हारे खेल का
कैसा नियम है
चिर-बहिष्कृत हम रहें
प्रतियोगिता से
रोकता हमको
तुम्हारा हर कदम है
क्यों व्यवस्था
अनसुना करते हुए यों
एकलव्यों को
नहीं अपना रही है
साधनसंपन्नों द्वारा साधनहीनों की राह में बाधा बनने की सामाजिक विसंगतियाँ महाभारत काल से अब तक ज्यों की त्यों हैं. कवि को यथार्थ को यथावत कहने में कोई संकोच या डर नहीं है:
जैसा सहा, वैसा कहा
कुछ भी कभी
अतिशय नहीं
मुझको किसी का
भय नहीं
आकाश के परिदृश्य में
निर्जल उगी है बादली
मेरी अधूरी कामना भी
अर्धसत्यों ने छली
सच्चा कहा, अच्छा कहा
इसमें मुझे
संशय नहीं
मुझको किसी का
भय नहीं
स्थाई में त्रैलोक और अन्तर में यौगिक छंद का सरस समायोजन करता यह संदेशवाही नवगीत सामायिक परिस्थितियों और परिदृश्य में कम शब्दों में अधिक बात कहता है.
जगदीश जी की भाषिक पकड़ की बानगी जगह-जगह मिलती है. मुखपृष्ठ पर अंकित गौरैया और यह नवगीत एक-दूसरे के लिये बने प्रतीत होते हैं. कवि की शब्द-सामर्थ्य की जय बोलता यह नवगीत अपनी मिसाल आप है:
डाल पर बैठी चिरैया
कूकती है
चंद दानों पर
नज़र है पेट की
पर गुलेलों में बहस
आखेट की
देखकर आसन्न खतरे
हूकती है
जब शिकारी कर रहे हों
दंत-नख पैने
वह समर सन्नद्ध अपने
तानकर डैने
बाज की बेशर्मियों पर
थूकती है
यहाँ कवि ने स्थाई में त्रैलोक, प्रथम अंतरे में महापौराणिक तथा दुसरे अंतरे में रौद्राक छंदों का सरस-सहज सम्मिलन किया है. नवगीतों में ऐसे छांदस प्रयोग कथ्य की कहन को स्वाभाविकता और सम्प्रेषणीयता से संपन्न करते हैं.
समाज में मरती संवेदना और बढ़ती प्रदर्शनप्रियता कवि को विचलित करती है, दो शब्दांकन देखें:
चीख चौंकाती नहीं, मुँह फेर चलते
देखकर अब बेबसों को लोग
.
घाव पर मरहम लगाना भूलकर अब
घिर रहे क्यों ढाढ़सों में लोग
नूतन प्रतिमान खोजते हुए / जीवन अनुमान में निकल गया, छोड़कर विशेषण सब / ढूँढिए विशेष को / रोने या हँसने में / खोजें क्यों श्लेष को?, आग में कुछ चिन्दियाँ जलकर / रच रहीं हैं शब्द हरकारे, मत भुनाओ / तप्त आँसू, आँख में ठहरे, कैसा मौसम है / मुट्ठी भर आँच नहीं मिलती / मिले, विकल्प मिले तो / सीली दियासलाई से, आहटें, / संदिग्ध होती जा रहीं / यह धुआँ है, / या तिमिर का आक्रमण, ओढ़ता मैं शील औ’ शालीनता / लग रहा हूँ आज / जैसे बदचलन जैसी अभिव्यक्तियाँ पाठक / श्रोता के मन को छूती ही नहीं बेधती भी हैं.
इन नवगीतों में आत्मालोकन, आत्मालोचन और आत्मोन्नयन के धागे-सुई-सुमनों से माला बनायी गयी है. कवि न तो अतीत के प्रति अंध श्रृद्धा रखता है न अंध विरोध, न वर्त्तमान को त्याज्य मनाता है न वरेण्य, न भविष्य के प्रति निराश है न अति आशान्वित, उसका संतुलित दृष्टिकोण अतीत की नीव पर निरर्थक के मलबे में सार्थक परिवर्तन कर वर्तमान की दीवारें बनाने का है ताकि भविष्य के ज्योतिकलश तिमिर का हरण कर सकें. वह कहता है:
बचा है जो
चलो, उसको सहेजें
मिटा है जो उसे फिर से बनाएँ
गए हैं जो
उन्हें फिर ध्यान में ले
तलाशें फिर नयी संभावनाएँ.
***
४-३-२०१५

मार्च २०२१ कब क्या ?

मार्च २०२१ 
कब क्या ?
२ - सरोजनी नायडू दिवस, ब्योहार राजेंद्र सिंह निधन १९८८। 
३ - फ़िराक़ गोरखपुरी निधन। 
४ - सुरक्षा दिवस, रेणु जयंती। 
७ - गोविन्द वल्लभ पंत दिवस, अज्ञेय जयंती। 
८ - अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस।
१०. सावित्रीबाई फुले पुण्यतिथि।   
११ - वैद्यनाथ जयंती, लोधेश्वर दिवस। 
१२- क्रांतिकारी भगवानदास माहौर निधन। 
१४ - स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जयंती। 
१५ - विश्व उपभोक्ता संरक्षण दिवस, विश्व विकलांग दिवस, रामकृष्ण परमहंस जयंती, कवि इंद्रमणि उपाध्याय निधन। 
२० - रानी अवंती बाई बलिदान दिवस। 
२१ - विश्व वानिकी दिवस, विश्व आनंद दिवस,  विश्व गौरैया दिवस, ओशो संबोधि दिवस, दादूदयाल जयंती, बिस्मिल्लाखाँ जन्म, शिवानी निधन। 
२२ - विश्व जल दिवस, राष्ट्रीय शक संवत १९४३ आरंभ। । 
२३ - भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव शहादत दिवस, शहीद हेम कालाणी जन्म, राममनोहर लोहिया जयंती। 
२४ - विश्व क्षय रोग दिवस, नवल पंथ योगेश्वर दयाल जयंती। 
२५ - गणेश शंकर विद्यार्थी बलिदान दिवस। 
२६ -  महीयसी महादेवी  जयंती। 
२७ - सम्राट अशोक जयंती।  
२८ होलिका दहन, चैतन्य महाप्रभु जयंती, मैक्सिम गोर्की जन्म। 
२९ - धुरेड़ी। 
३० - चित्रगुप्त दूज पूजन, तुकाराम जयंती। 
*
 


द्विपदी

इश्क है तो जुबां से कुछ न कहें
बोले बिन भी निगाह बोलेगी।

साक्षात्कार प्रश्नों के घेरे में आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा विभा तिवारी

साक्षात्कार 
प्रश्नों के घेरे में आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
द्वारा विभा तिवारी
*
प्र.१_ छंदमुक्त काव्य तथा मुक्त छंद काव्य में मुख्य रूप से आप क्या अंतर देखते हैं ?

उ. १ - पहले यह समझें कि छंद क्या है? छंद शब्द का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सुक्त के १० वें मंत्र में मिलता हैं। 'तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥१०॥ '
यहाँ छंद की उत्पत्ति "विराट यज्ञ पुरुष " से बताई गई है। पिंगल ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा ने छंद-ज्ञान बृहस्पति को, बृहस्पति ने च्वयन को, च्यवन ने माडव्य को, मांडव्य ने सैतव को, सैतव ने यास्क को और यास्क ने पिंगल जी को यह ज्ञान दिया। पिंगल कृत "छंद सूत्र" (७०० ई. पू.) छंद शास्त्र" का प्रथम ग्रंथ मान्य है। छंद' वेदांग' है जिसके उपवेद-वेदांग गार्ग्यप्रोक्त उपनिदान सूत्र,छन्द मंजरी, छन्दसूत्र, छन्दोविचित छन्द सूत्र, छन्दोऽनुक्रमणी, छलापुध वृत्ति, जयदेव छन्द, जानाश्रमां छन्दोविचित, वृत्तरत्नाकर,वेंकटमाधव छन्दोऽनुक्रमणी, श्रुतवेक आदि हैं।
संस्कृत वाङ्मय में छन्दःशास्त्र के लिए (१) छन्दोविचिति, (२) छन्दोमान, (३) छन्दोभाषा, (४) छन्दोविजिनी (५) छन्दोविजिति, (छन्दोविजित), (६) छन्दोनाम, (७) छन्दोव्याख्यान, (८) छन्दसांविच्य, (९.) छन्दसांलक्षण, (१०) छन्दःशास्त्र, (११) छन्दोऽनुशासन, (१२) छन्दोविवृति, (१३) वृत्त, (१४) पिङ्गल अदि नामों का व्यवहार किया गया है।
'छन्दस्' शब्द वेद का पर्यायवाची है। ध्वनि विज्ञान तथा गणित पर आधारित होने के कारण छंद को 'पुष्ट' अर्थात विज्ञान सम्मत शास्त्र कहा गया है। छन्दशास्त्र की रचना का उद्देश्य भविष्य में इसके नियमों के आधार पर छन्दरचना के सनातन परंपरा का विकास है। छंद शास्त्री 'प्रस्तार' आदि के द्वारा आचार्य नए छंद विकसित करते रहे। कविगण कथ्यानुरूप छंद चयन कर विधान में यत्किंचित परिवर्तन की छूट लेते हुए अपनी बात इस प्रकार कहते रहे कि छंद का मूल विधान नष्ट न हो। परिवर्तित विधान में निरंतर कई कवियों द्वारा रचना किये जाने पर नए छंद उत्पन्न हुए और अब भी हो रहे हैं। माँ शारदा ने मुझे ५०० से अधिक नए छंदों के प्रागट्य का माध्यम बनाकर कृतार्थ किया है।
'चद्' धातु से बने छंद शब्द का अर्थ है 'आह्लादित करना', 'आनंदित करना'। यह आह्लाद ध्वन्यात्मक उच्चार (सामान्यत: वर्ण के माध्यम से लिखा तथा मात्रा के माध्यम से उच्चारकाल को गिना जाता है) की आवृत्ति तथा संख्या के विन्यास से उत्पन्न होता है। 'वर्णों या मात्राओं की आह्लादकारी नियमित संख्या के विन्यास को छंद कहते हैं'। सामान्यतः वर्णों और मात्राओं की गेय-व्यवस्था को छन्द कहा जाता है। इसी अर्थ में पद्य शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। पद्य अधिक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाषा में शब्द और शब्दों में वर्ण तथा स्वर रहते हैं। इन्हीं को एक निश्चित विधान से सुव्यवस्थित करने पर 'छन्द' का नाम दिया जाता है। जिस रचना में मात्राओं और वर्णों की विशेष व्यवस्था तथा संगीतात्मक लय और गति की योजना रहती है, उसे ‘छन्द’ कहते हैं।
छंद 'वाक्' से निर्मित हैं। वास्तव में छंद वाचिक होते है। लोक (जान सामान्य) लघु-गुरु उच्चारों का समायोजन कर अनुभूत की अभिव्यक्ति कर 'लौकिक छंदों' को जन्म देता है।वाचिक छंद निश्चित नियम पर नहीं, विशेष ताल और लय पर ही आधारित रहते हैं। इनकी रचना सामान्य  अपठित जन भी कर लेते हैं। लोक द्वारा प्रयुक्त लौकिक छंदों का ध्यायन कर उनमें अन्तर्निहित लघु-गुरु उच्चार क्रम को नियमबद्ध कर वैदिक संस्कृत में रचे गए छंदों को 'वैदिक छंद' कहा गया है जिनका जन्मदाता वाल्मीकि को माना गया है। छंद को वेदों का चरण (पैर) कहा गया है। अपौरुषेय कहे गए वैदिक छंदों में ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और स्वरित, इन चार प्रकार के स्वरों का विचार किया जाता है, यथा "अनुष्टुप" इत्यादि। लौकिक  छंद वे वाचिक छंद हैं जिनकी रचना निश्चित नियमों के आधार पर होती है और जिनका प्रयोग सुपठित कवि काव्यादि रचना में करते हैं। इन लौकिक छंदों के रचना-विधि-संबंधी नियम सुव्यवस्थित रूप से जिस शास्त्र में रखे गए हैं उसे छंदशास्त्र कहते हैं। आचार्य पिंगल ने ‘छन्दसूत्र’ में छंदों का सुव्यवस्थित वर्णन किया है, अत: इसे छन्दशास्त्र का आदि ग्रन्थ माना जाता है। छन्दशास्त्र को ‘पिंगलशास्त्र’ भी कहा जाता है।
लौकिक और वैदिक छंदों पर लोक भाषाओँ ,प्राकृत पैशाची, छंदों की रचना चिरकाल से की जाती रही है। इस विरासत को आत्मसात करते हुए हिंदी में छंद शास्त्र का विकास होना स्वाभाविक है। हिन्दी छन्दशास्त्र की दृष्टि से प्रथम कृति ‘छन्दमाला’ है। हिंदी में लघु-गुरु उच्चार के लिप्यांकित रूप वर्ण (अक्षर) गणना पर आधारित छंद 'वर्णिक' तथा वर्ण के उच्चारकाल पर आधारित छंद 'मात्रिक' कहे जाते हैं। लघु उच्चार की एक तथा गुरु उच्चार की २ मात्रा गिनी जाती है। ध्वनि की मूल इकाई ‘वर्ण’ हैं। वर्णों का व्यवस्थित समूह ‘वर्णमाला’ है। उच्चारकाल के आधार पर वर्ण के दो प्रकार ‘लघु’ और ‘गुरु’ हैं।
अब आपके प्रश्न पर आते हैं। गद्य या पद्य दोनों ही उच्चारों से निर्मित वर्णों के संयुक्त होने से बने सार्थक शब्दों से रचे जाते हैं। पद्य लय प्रधान है। गद्य में व्याकरणिक नियम मुख्य हैं। छांदस काव्य वह है जो किसी निश्चित विधान के आधार पर रचा गया हो। हर छन्दस विधान कभी न कभी पहली बार रचा गया होगा। इसलिए छांदस काव्य के दो उपप्रकार ज्ञात विधान के अनुसार तथा अज्ञात विधान के अनुसार अर्थात नए छंद का निर्माण कर रचा काव्य हैं। अछांदस काव्य किसी छंद विशेष के विधानानुसार  काव्य है अर्थात उसकी विविध पंक्तियाँ विविध ज्ञात-अज्ञात छंदों पर आधारित होती हैं। इनमें से कुछ अछन्द अगेय भी हो सकते हैं। 
प्र.२_ आपके अनुसार छंद के तत्त्व क्या हैं ?
उ. २    छन्द के निम्न संघटक तत्त्व हैं-
पाद / पंक्ति - छन्द कुछ पंक्तियों का समूह होता है और प्रत्येक पंक्ति में समान वर्ण या मात्राएँ होती हैं। इन्हीं पंक्तियों को ‘चरण’ या ‘पाद’ कहते हैं।
चरण - कुछ छड़ों की पंक्तियाँ निश्चित यति स्थान द्वारा उन्हें एकाधिक भागों में विभक्त की जाती हैं। इन भागों को 'चरण' कहा जाता है।
दोहा दोपादिक (दो पंक्तियों का) छंद है। दोहा के प्रत्येक 'पाद' में दो चरण होते हैं। पहले तथा तीसरे चरण को 'विषम' तथा दूसरे और चौथे चरण को 'सम' कहा जाता है।
कल बाँट/क्रम - वर्ण या मात्रा की लघु-गुरु व्यवस्था को ‘बाँट/क्रम’ कहते हैं।
यति - छन्दों को पढ़ते समय बीच-बीच में कुछ रुकना पड़ता है। इन विराम स्थलों को ‘यति’ कहते हैं।छन्द के प्रत्येक चरण के अन्त में ‘यति’ होती है।
गति / लय - ‘गति’ का अर्थ ‘लय’ है। छन्दों को पढ़ते समय मात्राओं के लघु अथवा दीर्घ होने के कारण जो विशेष स्वर लहरी उत्पन्न होती है, उसे ही ‘गति’ या ‘लय’ कहते हैं।
तुकांत और पदांत - छन्द के प्रत्येक पाद के अन्त में स्वर-व्यंजन की समानता को ‘तुक’ कहते हैं। जिस छन्द में तुक नहीं मिलता है, उसे ‘अतुकान्त’ और जिसमें तुक मिलता है, उसे ‘तुकान्त’ छन्द कहते हैं। पाद के अंत में प्रयुक्त सामान भार के शब्द समूह को पदांत तथा उसके बिलकुल पहले प्रयुक्त उच्चार को तुकांत कहा जाता है।
गण - तीन उच्चारों के समूह को ‘गण’ कहते हैं। गणों  की संख्या आठ है-यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण। इन गणों के नाम रूप का सूत्र ‘यमातराजभानसलगा’ है।   
विषय -  छंद में जिसका वर्णन हो वह छंद का विषय है। 
कथ्य - विषय के संबंध  जो कहा जाए वह छंद का कथ्य है। 
रस - रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनन्द'। काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहा जाता है। श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। छंद सुनकर मन में जिस प्रकार की भावना हो वह रस है। रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनन्द'। काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहा जाता है। श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य का रस है। पदार्थ की दृष्टि से रस का प्रयोग षडरस के रूप में, आयुर्वेद में धातु के अर्थ में, भक्ति में ब्रह्मानंद के लिए तथा साहित्य के क्षेत्र में काव्य स्वाद या काव्य आनंद के लिए रस का प्रयोग होता है। रस मूलतः आलोकिक स्थिति है, यह केवल काव्य की आत्मा ही नहीं बल्कि यह काव्य का जीवन भी है इसकी अनुभूति से सहृदय पाठक का हृदय आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। नाट्यशास्त्रकार भरत मुनि के अनुसार 'विभावानुभाव संचार संयोगाद्रस निष्पत्ति' अर्थात विभाव अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
अलंकार - अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – अलं + कार। यहाँ पर अलं का अर्थ है 'आभूषण'। काव्य को भाषा को सुन्दर बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है।  
बिंब - बिंब संवेदात्मक शब्द-चित्र है जो अपने संदर्भ में मानवीय संवेदनाओ से संबंध रखता है। वह कविता की भावना या उसके आशय को पाठक तक पहुँचाता है। बिंब चित्रमयता या चित्रात्मक स्थितियों द्वारा पाठक को वर्ण्य का चाक्षुष अनुभव करा पाता है। बिंब के मुख्य प्रकार चाक्षुष बिंब, नाद बिंब, गन्ध बिम्ब, स्वाद बिंब, स्पर्श बिंब, मानसिक बिंब आदि हैं।
प्रतीक - प्रतीक का शाब्दिक अर्थ अवयव या चिह्न है । कविता में प्रतीक हमारी भाव सत्ता को प्रकट अथवा गोपन करने का माध्यम है। प्रत्येक भाव व्यंजना की विशिष्ट प्रणाली है। इससे सूक्ष्म अर्थ व्यंजित होता है । डॉक्टर भगीरथ मिश्र कहते हैं कि ” सादृश्य के अभेदत्व का घनीभूत रूप ही प्रतीक है”। उनके मंतव्य में प्रतीक की सृष्टि अप्रस्तुत बिंब द्वारा ही संभव है। प्रतीक के मौलिक गुण धर्म सांकेतिकता, संक्षिप्तता, रहस्यात्मकता,बौद्धिकता, भावप्रकाशयत्ता एवं प्रत्यक्षतः प्रतिज्ञा प्रगटीकरण से बचाव आदि हैं। प्रतीक सामान्य लक्षण को अपने अंदर समाहित कर पाठक को विषय को समझने अनुभव करने और अर्थ में संबोधन का व्यापक विकल्प प्रस्तुत करता है।
मिथक - 'मिथक' परंपरागत या अनुश्रुत कथा है जो किसी अतिमानवीय प्राणी या घटना से संबंध रखती है। विशेषतः इसका संबंध देवताओं, विश्व की उत्पत्ति तथा विश्ववासियों से है, यह एक ऐसा विश्वास है जो बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लिया जाता है। सामान्यतः मिथक  एक मिथ्या कथा है जिसकी सच्चाई की परीक्षा नहीं की जाती है।
प्र.३_ आज की पीढ़ी प्रकाशित पुस्तकों के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकों के प्रति अधिक आकर्षित है इसके चलते आप कविता के भविष्य को किस प्रकार देखते हैं ?
उ. ३  पुस्तक चिरकाल से मनुष्य का अभिन्न अंग थी, है और रहेगी। प्रगैतिगासिक मानव द्वारा निर्मित शैल चित्र लेखन विधा के मूल हैं। तब से अब तक माध्यम बदलते रहे शिलापट, ताड़पत्र, भोजपत्र, वस्त्र, धातु, कागज और अब अंतर्जाल का आभासी पटल। इन सबकी उपादेयता और प्रासंगिकता है। ये एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। युवा पीढ़ी सभी माध्यमों का यथावश्यक प्रयोग कर रही है।        
प्र ४ _ क्या आपको लगता है कि आज का साहित्य राजनीति से प्रेरित है ? यदि है तो इसमें कविता की क्या भूमिका है ?
उ. ४ साहित्य मानवीय गतिविधियों, चिंतन और परिवेश  उत्पन्न अनुभूतियों को अभिव्यक्त करता है। राजनीति आज नहीं, आदि काल से साहित्य  का विषय रही है। देवासुर संग्राम संबंधी साहित्य विविध संस्कृतियों के टकराव और सामंजस्य का लेखा-जोखा ही तो है। सत्ता पर आधिपत्य के लिए राजनीति हमेशा की गयी। कविता वेद पूर्व, वेद काल और पश्चात् भी राजनितिक घटनाओं को वर्णित करती है। विश्व की  प्रथम काव्य कृति महर्षि बाल्मीकि रचित रामायण भी राजनीति को समेटे हुए है। कविता राजनीति को प्रभावित करती भी है और राजनीति से प्रभावित होती भी है। यह केवल हिंदी या भारत नहीं, अपितु विश्व की हर भाषा और देश के संदर्भ में सत्य है।  
प्र. ५ _आपके अनुसार छायावादोत्तर काल में हिन्दी कविता के स्तर में क्या परिवर्तन हुआ है ?
उ. ५ छायावादोत्तरी हिन्दी कविता के स्तर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। तब भी श्रेष्ठ, सामान्य और कमजोर रचनाएँ की गईं और अब भी की जा रही हैं। आपका आशय संभवत: कविता के कलेवर, कथ्य या वर्ण्य विषय से है। छायावादोत्तरी कविता अमूर्तता से मूर्तता की ओर काव्य यात्रा है। इसे भावनात्मकता से मांसलता की यात्रा या आदर्श से यथार्थ की यात्रा भी कह सकते हैं। वास्तव में अमूर्त में मूर्त तथा मूर्त में अमूर्त सदैव होता है। एक के बिना दूसरा हो ही नहीं सकता। कविता के संदर्भ में कलेवर में आनुपातिक उपस्थिति के आधार पर 'इस' या 'उस' में वर्गीकृत किया जाता है। रचनाकार और पाठक रचना को समग्रता में ग्रहण करता है, वर्गीकरण और विश्लेषण समीक्षकों और प्राध्यापकों का बौद्धिक व्यायाम मात्र है।
प्र.६_ आजकल अतुकांत कविता के नाम पर कुछ भी लिख कर उसे कविता मान लेने का आग्रह किया जाता है, आप इस बात से कितना सहमत और संतुष्ट हैं ?
उ. ६ 'अतुकांत कविता के नाम पर कुछ भी लिख कर उसे कविता मान लेने का आग्रह' कौन कब और किससे करता है? मेरे लगभग ५ दशक के रचनाकाल में आज तक किसी ने मुझसे ऐसा आग्रह नहीं किया, न मैंने किसी से किया। कवि आत्म अनुभूत अथवा स्व विचारित सत्य की अभिव्यक्ति कविता में करता है। कथ्य के प्रस्तुतीकरण के दो महत्वपूर्ण उपादान भाषा शैली और शिल्प हैं। रचनाकार सिद्धहस्त हो तो अभिव्यक्ति प्रभावकारी होती है अन्यथा न्यून प्रभावकारी या अप्रभावकारी होती है। संतान कैसी भी हो माँ को उससे मोह तो होता ही है और इसके लिए कोई माँ को दोष नहीं देता। आरंभिक दिनों में  हर रचनाकार को अपनी रचना से मोह होना स्वभाविक है। रचनायात्रा में परिपक्वता के साथ यह मोह घटकर नीर-क्षीर विवेक बुद्धि का विकास हो तो कमजोर रचनाएँ रचनाकार ही प्रस्तुत नहीं करता। जिन रचनाकारों में यह बोध नहीं होता, वे और उनकी रचनाएँ समझदार पाठकों और विद्वानों के मध्य समादृत नहीं होतीं। 
प्र.७_ हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में आप क्या अन्तर मानते हैं?
उ. ७ हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में वही अंतर् है जो दो भाषाओं की काव्य रचनाओं में होता है। वस्तुत: ग़ज़ल अरबी-फ़ारसी की काव्य विधा है जो भारत से ही गयी है। ग़ज़ल के शिल्प के लोकगीत भारत की लोक भाषाओँ में गए जाते रहे हैं। समान पदांत-तुकांत के संस्कृत श्लोक भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। उर्दू स्वतंत्र भाषा है भी नहीं। उर्दू शब्द-कोष के समस्त शब्द अन्य भाषाओँ से लिए गए हैं। इतिहास साक्षी है कि मुग़ल आक्रमणों में विजयी मुग़ल सैनिकों (विद्वान या साहित्यकार नहीं) की छावनियों (लश्करों) में पराजित भारतीय सैनिकों को गुलामों की तरह की तरह सेवा करनी पड़ी। इस बीच अरबी-फ़ारसी और सीमांत भारतीय भाषाओँ के सम्मिश्रण से लश्करी का जन्म हुआ जो कालांतर में रेख़्ता कही गई। मुग़ल सत्ता के स्थायित्व के साथ उर्दू (तुर्की शब्द, अर्थ छावनी का बाज़ार)  जो सैन्य शिविरों और बाज़ारों में प्रयुक्त होती बाजारू भाषा थी, वह शासन-प्रशासन की भाषा हो गई। 
अब उर्दू को यदि हिंदी से अलग स्वतंत्र भाषा मानें तो तो जो अंतर अंग्रेजी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में है, जो अंतर तमिल ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में है वही हिंदी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में होगा अर्थात हिंदी ग़ज़ल हिंदी भाषा के छंद शास्त्र से संस्कारित होकर लिखी जाए, उसका अरबी-फ़ारसी के छंद शास्त्र के साथ कोई अंतरसंबंध न हो। समान तुकांत-पदांत की सब रचनाएँ हिंदी ग़ज़ल हों। इससे उर्दू साहित्यकार को ऐतराज क्यों हो? 
उर्दू को बुंदेली, मालवी, राजस्थानी, बृज, अवधि, भोजपुरी की तरह हिंदी की सहयोगी आंचलिक भाषा मानें तो उसे हिंदी व्याकरण को अपनाना होगा, उर्दू भाषी इसके लिए भी तैयार नहीं हैं। उर्दू के साहित्यकारों को रोटी हिंदी के पाठकों-श्रोताओं से ही मिलती है। तथापि हिंदीभाषियों की कमजोर मानसिकता और उर्दू भाषियों के पूर्वाग्रह के कारण हिंदी ग़ज़ल को विवाद का सामना करना पड़ रहा है। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदी में विविध खेमे सामान शिल्प की रचनाओं को मुक्तिका (चतुष्पदी मुकतक का विस्तार), गीतिका (इस नाम के मात्रिक व् वर्णिक छंद हिंदी में हैं), तेवरी (व्यवस्था विरोध की ग़ज़ल), सजल, अनुगीत आदि अनेक नामों से लिख रहे हैं। 
ग़ज़ल को ग़ज़ल मानकर हिंदी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल माननेवालों को देखना होगा की उर्दू ग़ज़ल अरबी व्याकरण-छंदशास्त्र पर आधारित है जबकि हिंदी ग़ज़ल हिंदी व्याकरण और छंदशास्त्र पर, वे एक नहीं हो सकतीं। हिंदी के रचनाकार को अन्य भाषा का व्याकरण क्यों जानना चाहिए? उर्दू में हिंदी की पञ्चम वर्ण की ध्वनि है ही नहीं, इसी तरह उर्दू की नुक्ते वाली और अन्य ध्वनियाँ हिंदी में नहीं हैं। 
एक तथ्य यह भी है कि उर्दू छंद शास्त्र में प्रयुक्त सभी लयखण्ड (बह्र) संस्कृत के छंदों से ली गयी हैं जो हिंदी आधार हैं। उदाहरण के लिए 'हरिगीतिका' छंद का लयखण्ड ११२१२ ही उर्दू बह्र 'मुतफाइलुं' में प्रयुक्त हुआ है। इसलिए स्पष्ट है कि हिंदी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल एक समान नहीं हैं और हिंदी ग़ज़ल का अरबी-फ़ारसी या उर्दू का व्याकरणिक या छन्दशास्त्रीय अनुशासन से कोई सरोकार नहीं है। 
प्र. ८ _उर्दू के शायर हिन्दी ग़ज़लकारों को खारिज कर देते हैं। इस बारे में आपकुछ कहना चाहेंगे..?
उ.८ उक्त उत्तर के प्रकाश में उर्दू शायर को किसी भी अन्य भाषा (हिंदी सहित) की ग़ज़ल के संबंध में निर्णय करने का कोई अधिकार नहीं है।तथापि वे तो हिंदी ग़ज़ल को खारिज करने की मूर्खता करें तो हिंदी गज़लकार भी उर्दू ग़ज़ल को खारिज कर इसका उत्तर दें। ऐसी स्थिति में हिंदी गज़लकार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर उर्दू ग़ज़लकार के लिए श्रोताओं और आजीविका के लाले पड़ जाएँगे।
प्र.९_ गीत/ नवगीत को आप पाठकों को किस तरह समझाऐंगे?
उ.९  हिंदी गीति काव्य के वृक्ष की गीत शाखा पर ऊगा नव पल्लव नवगीत है। शैल्पिक दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों की रचना मुखड़ा अंतरा मुखड़ा अंतरा मुखड़ा के शिल्प में की जाती है। दोनों के कथ्य या विषय किसी प्रतिबंध के कैदी नहीं हैं। नवगीत का वैशिष्ट्य टटकापन (देशज शब्दों का प्रयोग) है तो वह लोकगीतों में भी है। नवगीत को पृथक विधा माननेवाले 'कहन' के अंतर को भिन्नता का आधार मानते हैं किन्तु कहाँ गीतकार की भाषा शैली का वैशिष्ट्य है जो हर नवगीतकार का भिन्न होता है। नवगीत में पारंपरिक बिंब , प्रतीकादि के प्रतिबंध संबंधी धारणा भ्रामक है। हर गीतकार गीत के कथ्य और विषय के अनुरूप बिंब, प्रतीक आदि का चयन करता है। ऐसा कोई नवगीत नहीं हो सकता जो गीत न हो किन्तु गणित गीत ऐसे हैं जिन्हें नवगीत मानने में तथाकथित कुछ नवगीतकारों को कठिनाई होती है। इससे स्पष्ट है की गीत महासागर है जिसकी एक खाड़ी (तटीय हिस्सा) नवगीत है।
प्र.१० _हिन्दी ग़ज़ल को गीतिका/सजल जैसे नाम देकर लिखा जा रहा है।आप इसे किस रूप में लेते हैं।?
उ.१० उर्दू के साहित्यकारों द्वारा हिंदी ग़ज़ल को बिना अधिकार व् कारण के खारिज करने के कारण उपजी निराशा व कुंठा के कारण इससे बचने के लिए हिंदी ग़ज़लकारों ने विविध नामों से हिंदी ग़ज़ल लिखना आरंभ कर दिया। मुक्तिका, गीतिका, सजल, तेवरी, अनुगीत और अन्य कई नाम प्रयोग में लाए जा रहे हैं। वास्तव में ये सब हिंदी ग़ज़ल ही हैं। 
प्र.११_आप स्वयं एक वरिष्ठ कवि हैं, क्या आपको लगता है कि निज जीवन में ईमानदार आज का कवि कविता के प्रति भी ईमानदार है ?
उ.११  ईमानदार व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में ईमानदार होता है। यहाँ ईमानदार, वहाँ बेईमान कैसे होगा? यथार्थत: शाट-प्रतिशत ईमानदार तो वर्तमान काल में कहीं-कोई नहीं है। हम कवि होने से पहले मानव हैं। वर्तमान देश-काल-समाज में जीना है तो 'जैसा देस वैसा भेस' कहावत का अनुकरण करना होगा। कवि भी समाज ही अंग है, वह समाज से भिन्न नहीं हो सकता। ईमानदारी का कम या ज्यादा होना कवि के  व्यक्तित्व का हिस्सा है जो समाज और परिस्थितियों से प्रभावित होता है। 
प्र.१२_छायावाद के कवियों में से तथा आज के कवियों में से अपनी पसंद के एक-एक कवि के बारे में बताएं, यह भी कि वे आपको क्यों पसंद हैं ?
उ.१२ किसी भी एक कवि की सब रचनाएँ पसंद होना अथवा किसी अन्य कवि की एक भी रचना पसंद न होना, संभव नहीं होता। तथापि छायावादी कवियों में महीयसी महादेवी वर्मा जी तथा समसामयिक कवियों में नीरज मुझे सर्वाधिक पसंद हैं।                                                          महादेवी जी की रचनाओं में भावों की ऐन्द्रजालिक सघनता, भाषिक प्राञ्जलता, सटीक शब्द प्रयोग, करुण रस की बाँकी छटा मन मोहती है। उनकी रचनाएँ अपनी साथ पाठक को बहा ले जाती हैं। उनकी रचनाओं का सम्मोहन क्रमिक विस्तार पाता है, जैसे-जैसे समय बीतता है उनकी पंक्तियाँ पाठक के मानस पट पर उभरती जाती हैं। महादेवी की मंचीय प्रस्तुति बहुत प्रभावी नहीं होती थी, तथापि उनका काव्य विस्मृत नहीं होता, यही उनका वैशिष्ट्य है। महादेवी जी के दीप-गीत उज्ज्वल भविष्य के प्रति उनकी अगाध आस्था से प्रेरित हैं। मुझे 'मधुर-मधुर मेरे दीपक जल' और 'मैं नीर भरी दुःख की बदली' सर्वाधिक पसंद हैं।                                                                                                                    महादेवी जी के पूरक रूप में नीरज जी की रचनाएँ लोक में व्याप्त व्यावहारिक हिंदवी या हिंदुस्तानी को वरीयता देती हैं। नीरज जी की मंचीय प्रस्तुति अपनी मिसाल आप है। नीरज जी के विषय और भाषा समसामयिक पीड़ा को केंद्र में रखकर आम आदमी के मनोभावों को शब्दित करते हैं। नीरज जी की 'कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे' और 'इसीलिये तो नगर नगर बदनाम हो गए मेरे आँसू, मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था' मैं शालेय जीवन से गुनगुनाता रहा हूँ।
प्र.१३ _छंदबद्ध कविता कि किस विधा से आप प्रभावित हैं और क्यों ?
उ.१३ मुझे छांदस और अछांदस दोनों तरह की काव्य विधा पसंद है। मेरे दो अछांदस काव्य संग्रह और ३ छांदस काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। दोनों तरह की काव्य रचनाओं का अपना-अपना महत्व है। मुझे गीत-नवगीत सर्वाधिक पसंद हैं। गीत मन की श्रेष्ठ मनोदशाओं को शब्दांकित करता है तो नवगीत समसामयिक यथार्थ को। मूलत: नवगीत भी गीत ही है।
प्र.१४_ नवोदित कवियों के लिए आप क्या सन्देश देना चाहेंगे ?
उ.१४ नवोदित कवि नाम का कोई पृथक वर्ग नहीं होता। कवि केवल कवि होता है। कोई एक रचना कर अमर हो जाता है कोई सहस्त्रों रचनाएँ करने के बाद भी छाप नहीं छोड़ पाता। सामान्यत: हर कवि रचनारंभ करते समय नवोदित और क्रमशः वरिष्ठ कहा जाता है किन्तु ज्येष्ठता ही श्रेष्ठता नहीं होती। जो रचनाकार लेखन कर्म आरम्भ करना चाहते हैं उन्हें यह परामर्श देना चाहता हूँ कि जो भी लिखें अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए लिखें, लोगों की सराहना, संस्थाओं से अभिनन्दन या धनार्जन को लक्ष्य बनाकर न लिखें। लेखन दो तरह से होता है प्रथम मन में उठे विचारों के अनुसार दूसरा किसी पूर्व निर्धारित विषय पर। प्रथम तरह का लेखन ह्रदय प्रधान और दूसरा मस्तिष्क प्रधान होता है। जिस विधा में लिखना चाहते हैं उस विधा की श्रेष्ठ रचनाएँ पढ़ लें, मानक और विधान जान लें, तब लिखें। अपने विचारों को क्रम बद्ध, सटीक शब्द-चयन करते हुए प्रस्तुत करें। भाषिक शुद्धता का ध्यान रखें। काव्य दोषों की जानकारी कर उनसे मुक्त रहने का प्रयास करें। अपनी शैली आप विकसित करें, किसी की नकल न करें। कथ्य, कहन और कथन तीनों में मौलिकता आवश्यक है।
प्र.१५_ आप अभी क्या लिख रहे हैं और भविष्य में क्या लिखना चाहते हैं? 
उ.१५ मैं ३ दशकों से छंद कोष पर काम कर रहा हूँ। ५०० से अधिक नए छंद बन चुके हैं। इसे पूर्ण करना है। 'नीर-क्षीर दोहा यमक' शीर्षक से यमकमय दोहों की सतसई को अंतिम रूप देना है। ३ लघुकथा संकलन प्रकाशन की राह देख रहे हैं। शिशु गीत संग्रह, बाल गीत संग्रह, श्रुंगात गीत संग्रह, नवगीत संग्रह, हाइकु संग्रह, कुण्डलिया संग्रह, हिंदी ग़ज़ल संग्रह, क्षणिका संग्रह, व्यंग्य लेख संग्रह, तकनीकी लेख संग्रह, समीक्षा संग्रह, पुरोवाक संग्रह की सामग्री अंतरजाल पर बिखरी है उसे एकत्र कर पुस्तकाकार देना है। किसी सहृदय प्रकाशक की तलाश है। 

बुधवार, 3 मार्च 2021

लेख: सतत स्थाई विकास

लेख:
सतत स्थाई विकास : मानव सभ्यता की प्राथमिक आवश्यकता
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
स्थायी-निरंतर विकास : हमारी विरासत
मानव सभ्यता का विकास सतत स्थाई विकास की कहानी है। निस्संदेह इस अंतराल में बहुत सा अस्थायी विकास भी हुआ है किन्तु अंतत: वह सब भी स्थाई विकास की पृष्ठ भूमि या नींव ही सिद्ध हुआ। विकास एक दिन में नहीं होता, एक व्यक्ति द्वारा भी नहीं हो सकता, किसी एक के लिए भी नहीं किया जाता। 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:, सर्वे भद्राणु पश्यन्ति, माँ कश्चिद दुःखभाग्भवेद" अर्थात ''सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ्य हों, शुभ देखें सब, दुःख न कहीं हो"का वैदिक आदर्श तभी प्राप्त हो सकता है जब विकास, निरंतर विकास, सबकी आवश्यकता पूर्ति हित विकास, स्थाई विकास होता रहे। ऐसा सतत और स्थाई विकास जो मानव की भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और उनके समक्ष उपस्थित होने वाले संकटों और अभावों का पूर्वानुमान कर किया जाए, ही हमारा लक्ष्य हो सकता है। सनातन वैदिक चिंतन धारा द्वारा प्रदत्त वसुधैव कुटुम्बकम" तथा 'विश्वैक नीडं' के मन्त्र ही वर्तमान में 'ग्लोबलाइज विलेज' की अवधारणा का आधार हैं।
'सस्टेनेबल डेवलपमेंट अर्थ स्थायी या टिकाऊ विकास से हमारा अभिप्राय विकास ऐसे कार्यों की निरन्तरता से है जो मानव ही नहीं, सकल जीव जंतुओं की भावी पीढ़ियों का आकलन कर, उनकी प्राप्ति सुनिश्चित करते हुए, वर्तमान समय की आवश्यकताएँ पूरी करे। दुर्गा सप्तशतीकार कहता है 'या देवी सर्व भूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:'। पौर्वात्य चिन्तन प्रकृति को 'माँ' और सभी प्राणियों को उसकी संतान मानता है। इसका आशय यही है कि जैसे शिशु माँ का स्तन पान इस तरह करता है की माँ को कोई नहीं होती, अपितु उसका जीवन पूर्णता पता है, वैसे ही मनुष्य प्रकृति संसाधनों का उपयोग इस कि प्रकृति अधिक समृद्ध हो। भारतीय परंपरा में प्रकृति के अनुकूल विकास की मानता है, प्रकृति के प्रतिकूल विकास की नहीं।'सस्टेनेबल डवलेपमेन्ट कैन ओनली बी इन एकॉर्डेंस विथ नेचर एन्ड नॉट, अगेंस्ट और एक्सप्लोयटिंग द नेचर।'
प्रकृति माता - मनुष्य पुत्र
स्वयं को प्रकृति पुत्र मानने की अवधारणा ही पृथ्वी, नदी, गौ और भाषा को माता मानने की परंपरा बनकर भारत के जान-जन के मन में बसी है। गाँवों में गरीब से गरीब परिवार भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी बनाकर उन्हें खिलाते हैं। देहरी से भिक्षुक को खाली हाथ नहीं लौटाते। आंवला, नीम, पीपल, बेल, तुलसी, कमल, दूब, महुआ, धान, जौ, लाई, आदि पूज्यनीय हैं। नर्मदा ,गंगा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियाँ पूज्य हैं। नर्मदा कुम्भ, गंगा दशहरा, यमुना जयंती आदि पर्व मनाये जाते हैं। पोला लोक पर्व पोला पर पशुधन का पूजन किया जाता है। आँवला नवमी, तुलसी जयंती आदि लोक पर्व मनाये जाते हैं। नीम व जासौन को देवी, बेल व धतूरा को शिव, कदंब व करील को कृष्ण, कमल व धान को लक्ष्मी, हरसिंगार को विष्णु से जोड़कर पूज्यनीय कहा गया है। यही नहीं पशुओं और पक्षियों को भी देवी-देवताओं से संयुक्त किया गया ताकि उनका शोषण न कर, उनका ध्यान रखा जाए। बैल, सर्प व नीलकंठ को शिव, शेर व बाघ को देवी, राजहंस व मोर को सरस्वती, हाथी को लक्ष्मी, मोर को कृष्ण आदि देवताओं के साथ संबद्ध बताया गया ताकि उनका संरक्षण किया जाता रहे। यही नहीं हनुमान जी को वायु, लक्ष्मी जी को जल, पार्वती जी को पर्वत, सीता जी भूमि की संतान कहा गया ताकि जन सामान्य इन प्राकृतिक तत्वों तत्वों की शुद्धता और सीमित सदुपयोग के प्रति सचेष्ट हो।
विश्व रूपांतरण : युग की महती आवश्यकता
हम पृथ्वी को माता मानते है और सतत विकास सदैव हमारे दर्शन और विचारधारा का मूल सिद्धांत रहा है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक मोर्चों पर कार्य करते हुए हमें महात्मा गांधी की याद आती है, जिन्होंने हमें चेतावनी दी थी कि धरती प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को तो पूरा कर सकती है, पर प्रत्येक व्यक्ति के लालच को नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प कोभारत सहित १९३ देशों ने सितंबर, २०१५ में संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक में स्वीकार और इसे एक जनवरी, २०१६ से लागू किया। इसे सतत विकास लक्ष्यों के घोषणापत्र के नाम से भी जाना जाता है। सतत विकास का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण हेतु विकास में सामाजिक परिवेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाविष्ट करना है। २००० से २०१५ तक के लिए निर्धारित नए लक्ष्यों का उद्देश्य विकास के अधूरे कार्य को पूरा करना और ऐसे विश्व की संकल्पना को मूर्त रूप देना है, जिसमें चुनौतियाँ कम और आशाएँ अधिक हों। भारत विश्व कल्याणपरक विकास के मूलभूत सिद्धांतों को अपनी विभिन्न विकास नीतियों में आराम से ही सम्मिलित करता रहा है। वर्तमान विश्वव्यापी अर्थ संकट के संक्रमण काल में भी विकास की अच्छी दर बनाए रखने में भारत सफल है। गाँधी जी ने 'आखिरी आदमी के भले', विनोबा जी ने सर्वोदय और दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय के माध्यम से निर्धनों को को गरीबी रेखा से ऊपर लाने और निर्बल को सबल बनाने की संकल्पना का विकास किया। वर्ष २०३० तक निर्धनता को समाप्त करने का लक्ष्य हमारा नैतिक दायित्व ही नहीं, शांतिपूर्ण, न्यायप्रिय और चिरस्थायी भारत और विश्व को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य प्राथमिकता भी है।
सतत विकास कार्यक्रम : लक्ष्य
वित्तीय लक्ष्य:
विकसित देश सरकारी विकास सहायत का अपना लक्ष्य प्राप्त कर, अपनी सकल राष्ट्रीय आय का ०.७%० विकासशील देशों को तथा ०.१५% से ०.२०% सबसे कम विकसित राष्ट्रों को दें। विकासशील देश एकाधिक स्रोत से साधन जुटाएँ तथा समन्वित नीतियों द्वारा दीर्घिकालिक ऋण संवहनीयता प्राप्त कर अत्यधिक ऋणग्रस्त निर्धन देशों पर ऋण बोझ कम कर निवेश संवर्धन को करें।
तकनीकी लक्ष्य:
विकसित, विकासशील व् अविकसित देशों के मध्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनालोजी व नवाचार सुलभ कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। वैश्विक तकनॉलॉजी तंत्र का विकास करना। परस्पर सहमति पर रियायती और वरीयता देते हुए हितकारी शर्तों पर पर्यावरण अनुकूल तकनोलॉजी का विकास, हस्तांतरण, प्रसार व् समन्वय करना। तकनोलॉजी बैंक बनाकर सामर्थ्यवान तकनोलॉजी का प्रयोग बढ़ाना।
क्षमता निर्माण तथा व्यापार :
विकाशील देशों में लक्ष्य क्षमता निर्माण कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। राष्ट्रीय योजनाओं को समर्थन दिलाना। विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सार्वभौम, नियमाधारित, भेदभावहीन, खुली और समान बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को प्रोत्साहित करना। विकासशील देशों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि कर, सबसे कम देशों की भागीदारी दोगुनी करना। सबसे कम विकसित देशों को शुल्क और कोटा मुक्त बाजार प्रवेश सुविधा देना, पारदर्शी व् सरल व्यापार नियम बनाकर बाजार में प्रवेश सरल बनाना।
नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य:
सतत विकास हेतु वैश्विक वृहद आर्थिक स्थिरता वृद्धि हेतु नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य बनाना। गरीबी मिटाने हेतु पारस्परिक नीतिगय क्षमता और नेतृत्व का सम्मान करना। सभी देशों के साथ सतत विकास लक्ष्य पाने में सहायक बहुहितकारी भागीदारियाँ कर विशेषज्ञता, तकनोलॉजी, तहा संसाधन जुटाना। प्रभावी सार्वजनिक व् निजी संसाधन जुटाना। सबसे कम विकसित, द्वीपीय व विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण समर्थन बढ़ाना। २०३० तक सकल घेरलू उत्पाद के पूरक प्रगति के पैमाने विकसित करना।
स्थायी विकास लक्ष्य : केंद्र के प्रयास
सतत् विकास लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए खरबों डॉलर के निजी संसाधनों की काया पलट ताकत जुटाने, पुनःनिर्देशित करने और बंधन मुक्‍त करने हेतु तत्‍काल कार्रवाई करने, विकासशील देशों में संवहनीय ऊर्जा, बुनियादी सुविधाओं, परिवहन - सूचना - संचार प्रौद्योगिकी आदि महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सहित दीर्घकालिक निवेश जुटाने के साथ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के लिए एक स्‍पष्‍ट दिशा निर्धारित करनी है। इस हेतु सहायक समीक्षा व निगरानी तंत्रों के विनियमन और प्रोत्‍साहक संरचनाओं हेतु नए साधन जुटाकर निवेश आकर्षित कर सतत विकास को पुष्‍ट करना प्राथमिक आवश्यकता है। सर्वोच्‍च ऑडिट संस्‍थाओं, राष्‍ट्रीय निगरानी तंत्र और विधायिका द्वारा निगरानी के कामकाज को अविलंब पुष्‍ट किया जाना है। हमारे मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री ग्रामीण और शहरी आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, डिजिटल इंडिया, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, स्किल इंडिया और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शामिल हैं। इसके अलावा अधिक बजट आवंटनों से बुनियादी सुविधाओं के विकास और गरीबी समाप्त करने से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने तथा इसके समन्वय की जिम्मेदारी नीति आयोग को, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा प्रस्तावित संकेतकों की वैश्विक सूची से उपयोगी संकेतकों की पहचान कर राष्ट्रीय संकेतक तैयार करने का कार्य सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को सौंपा है।न्यूयार्क में जुलाई, २०१७ में आयोजित होने वाले उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच (एचएलपीएफ) पर अपनी पहली स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षा (वीएनआर) प्रस्तुत कर भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के सफल कार्यान्वयन को सर्वोच्च महत्व दिया है।
राज्यों की भूमिका :
भारत के संविधान केंद्रों और राज्यों के मध्य राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति संतुलन के अनुरूप राज्यों में विभिन्न राज्य स्तरीय विकास योजनायें कार्यान्वित की जा रही हैं। इन योजनाओं का सतत विकास लक्ष्यों के साथ तालमेल है। केंद्र और राज्य सरकारों को सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन में आनेवाली विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला मिलकर करना है। भारतीय संसद विभिन्न हितधारकों के साथ सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए सक्रिय है। अध्यक्षीय शोध कदम (एसआरआई) सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सांसदों और विशेषज्ञों के मध्य विमर्श हेतु है। नीति आयोग सतत विकास लक्ष्यों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श शृंखलाएं आयोजित कर विशेषज्ञों, विद्वानों, संस्थाओं, सिविल सोसाइटियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और केंद्रीय मंत्रालयों राज्य सरकारों व हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण व संपूर्ण विकास हेतु जन आकांक्षा पूर्ण करने हेतु राष्ट्रीय, राज्यीय, स्थानीय प्रशासन तथा जन सामान्य द्वारा सतत समन्वयकर कार्य किये जा रहे हैं।
जन सामान्य की भूमिका :
भारत के संदर्भ में दृष्टव्य है कि सतत स्थाई कार्यक्रमों की प्रगति में जान सामान्य की भूमिका नगण्य है। इसका कारण उनका समन्वयहीन धार्मिक-राजनैतिक संगठनों से जुड़ाव, प्रशासन तंत्र में जनमत और जनहित के प्रति उपेक्षा, व्यापारी वर्ग में येन-केन-प्रकारेण अधिकतम लाभार्जन की प्रवृत्ति तथा संपन्न वर्ग में विपन्न वर्ग के शोषण की प्रवृत्ति का होना है। किसी लोकतंत्र में सब कुछ तंत्र के हाथों में केंद्रित हो तो लोक निराशा होना स्वाभाविक है। सतत विकास नीतियाँ गाँधी के 'आखिरी आदमी' अर्थात सबसे कमजोर को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप आजीविका साधन उपलब्ध करा सकें तभी उनकी सार्थकता है। सरकारी अनुदान आश्रित जनगण कमजोर और तंत्र द्वारा शोषित होता है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व को दलीय हितों पर राष्ट्रीय हितों को वरीयता देकर राष्ट्रोन्नयनपरक सतत विकास कार्यों में परस्पर सहायक होना होगा तभी संविधान की मंशा के अनुरूप लोकहितकारी नीतियों का क्रियान्वय कर मानव ही नहीं, समस्त प्राणियों और प्रकृति की सुरक्षा और विकास का पथ प्रशस्त सकेगा।
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संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४,
ईमेल : salil.sanjiv@gmail.com

नवगीत

।     
   
नवगीत:
संजीव
.
समय न्यायाधीश की
लगती अदालत.
गीत!
हाज़िर हो.
.
लगा है इलज़ाम
तुम पर
गिरगिटों सा
बदलते हो रंग.
श्रुति-ऋचा
या अनुष्टुप बन
छेड़ डी थी
सरसता की जंग.
रूप धरकर
मन्त्र का
या श्लोक का
शून्य करते भंग.
काल की
बनकर कलम तुम
स्वार्थ को
करते रहे हो तंग.
भुलाई ना
क्यों सखावत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
छेड़ते थे
जंग हँस
आक्रामकों
से तुम.
जान जाए
या बचे
करते न सुख
या गम.
जूझते थे
बूझते थे
मनुजता को
पूजते थे.
ढाल बनकर
देश की
दस दिशा में
घूमते थे.
मिटायी क्यों
हर अदावत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
पराजित होकर
न हारे,
दैव को
ले आये द्वारे.
भक्ति सलिला
में नहाये
कर दिये
सब तम उजारे.
बने संबल
भीत जन का-
‘त्राहि’ दनु हर
हर पुकारे.
दलित से
लगकर गले तुम
सत्य का
बनते रहे भुजदंड .
अनय की
क्यों की मलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
एक पल में
जिरह-बखतर
दूसरे पल
पहन चीवर.
योग के सँग
भोग अनुपम
रूप को
वरकर दिया वर.
नव रसों में
निमज्जित हो
हर असुन्दर
किया सुंदर.
हास की
बनकर फसल
कर्तव्य का ही
भुला बैठे संग?
नाश की वर
ली अलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
श्रमित काया
खोज छाया,
लगी कहने-
‘जगत माया’.
मूर्ति में भी
अमूरत को
छिपा- देखा,
पूज पाया.
सँग सुन्दर के
वरा शिव
शिवा को
मस्तक नवाया.
आज का आधार
कल कर,
स्वप्न कल का
नव सजाया.
तंत्र जन का
क्यों नियामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
स्वप्न टूटा,
धैर्य छूटा.
सेवकों ने
देश लूटा.
दीनता का
प्रदर्शन ही -
प्रगतिवादी
बेल-बूटा.
छंद से हो तंग
कर रस-भंग
कविता गढ़ी
श्रोता मिला सोता.
हुआ मरकर
पुनर्जीवित
बोल कैसे
गीत-तोता?
छंद अब भी
क्यों सलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
हो गये इल्जाम
पूरे? तो बतायें
शेष हों कुछ और
तो वे भी सुनायें.
मिले अनुमति अगर
तो मैं अधर खोलूँ.
बात पहले आप तोलूँ
बाद उसके असत्य बोलूँ
मैं न मैं था,
हूँ न होऊँ.
अश्रु पोछूं,
आस बोऊँ.
बात जन की
है न मन की
फ़िक्र की
जग या वतन की.
साथ थी हर-
दम सखावत
प्रीत!
हाज़िर हो.
.
नाम मुझको
मिले कितने,
काम मैंने
किये कितने.
याद हैं मुझको
न उतने-
कह रहा है
समय जितने.
छंद लय रस
बिम्ब साधन
साध्य मेरा
सत सुपावन
चित रखा है
शांत निश-दिन
दिया है आनंद
पल-छिन
इष्ट है परमार्थ
आ कह
नीत!
हाज़िर हो.
.
स्वयंभू जो
गढ़ें मानक,
हो न सकते
वे नियामक.
नर्मदा सा
बह रहा हूँ.
कुछ न खुद का
गह रहा हूँ.
लोक से ले
लोक को ही,
लोक को दे-
लोक का ही.
रहा खाली हाथ
रखा ऊँचा माथ,
सब रहें सानंद
वरें परमानन्द.
विवादों को भूल
रच नव
रीत!
हाज़िर हो.
.
३-३-२०१५
कृति चर्चा :
‘नदियाँ क्यों चुप हैं?’ विसंगतियों पर आस्था का जयघोष
चर्चाकार: संजीव
[कृति विववरण: नदियाँ क्यों चुप हैं?, navgeetनवगीत संग्रह, राधेश्याम बंधु , आकार डिमाई, पृष्ठ ११२, मूल्य १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेटयुक्त, वर्ष २०११, कोणार्क प्रकाशन, बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, संपर्क: ९८६८४४४६६६, rsbandhrsbandhu2@gmail.com]
.
दादी सी दुबली, गरीब हैं नदियाँ बहुत उदास
सबकी प्यास बुझातीं, उनकी कौन बुझाये प्यास?
.
जब सारा जल
जहर हो रहा नदियाँ क्यों चुप हैं?
.
उक्त २ उद्धरण श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार राधेश्याम बंधु के चिन्तनपरक नवगीतों में अन्तर्निहित संतुलित, समन्वित, विचारधारा के संकेतक हैं कि उनकी सोच एकांगी नहीं है, वे विसंगति और विडम्बना के दोनों पक्षों का विचार कर नीर-क्षीर प्रवृत्ति परक navgeetनवगीत रचते हैं, उनका आग्रह ‘कला’ को साध्य मानने के प्रति कम तथा ‘कथ्य’ को साध्य मानने के प्रति अधिक है. वे navgeeनवगीत में छंद की अंतर्व्याप्ति के पक्षधर हैं. उनके अपने शब्दों में: ‘मनुष्य ने जब भी अपनी अन्तरंग अनुभूतियों की अनुगूंज अपने मन में सुननी चाही, तो उसे सदैव गीतात्मक प्रतीति की अनुगूंज ही सुनाई पड़ी. वहाँ विचार या विमर्श का कोई अस्तित्व नहीं होता. हम चाहे जितने आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के रंग में रंग जाएँ, हम अपने सांस्कृतिक परिवेश और लोकचेतना के सौन्दर्यबोध से कभी अलग नहीं हो सकते. इतिहास साक्षी है कि जब भी हर्ष, विषद या संघर्ष की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता हुई तो लयात्मक छान्दस कविता ही उसके लिये माध्यम बनी. आदि कवि बाल्मीकि से लेकर निराला तक के कविता के इतिहास पर यदि हम दृष्टि डालें तो हम पायेंगे कि इतने लम्बे कालखंड में छन्दस काव्य का ही सातत्य विद्यमान है. वह चाहे ऋचा हो या झूले का गीत हो.’
इस संग्रह के गीत कथ्य की दृष्टि से navgeनवगीत (२७) तथा जनगीत (१५) में वर्गीकृत हैं किन्तु उनमें पर्यावरण के प्रति चिंता सर्वत्र दृष्टव्य है. प्रदूषण प्राकृतिक पर्यावरण में हो अथवा सामाजिक पर्यावरण में वह बंधु जी को क्लेश पहुँचाता है. इस संग्रह का वैशिष्ट्य एक पात्र को विविध रूपकों में ढाल कर उसके माध्यम से विसंगतियों और विडम्बनाओं का इंगित करना है. चाँदनी, नदी, आदि के माध्यम से कवि वह सब कहता है जो सामान्य जन अनुभव करते हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पाते:
यहाँ ‘नदी’ जलधार मात्र नहीं है, वह चेतना की संवाहक प्रतीक है, वह जीवन्तता की पर्याय है:
संसद की
राशन की नदियाँ
किस तहखाने में खो जाती?
.
प्यासी नदी
रेत पर तड़पे
अब तो बादल आ
.
कैसे दिन
आये रिश्तों की
नदिया सूख गयी.
.
पाषाणों
में भी हमने
नदिया की तरज जिया.
मानव जीवन में खुशहाली के लिये हरियाली और छाँव आवश्यक है:
फिर-फिर
जेठ तपेगा आँगन
हरियल पेड़ लगाये रखना
विश्वासों के
हरसिंगार की
शीतल छाँव बचाये रखना
बादल भी विसंगतियों का वाहक है:
राजा बन बादल जुलूस में
हठी पर आते
हाथ हिलाकर प्यासी जनता
को हैं बहलाते
.
फिर-फिर
तस्कर बादल आते
फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती
.
जब बादल बदल गए तो चांदनी कैसे अपनी मर्यादा में रहे:
कभी उतर आँगन में
निशिगंधा चूमती
कभी खड़ी खिड़की पर
ननदी सी झाँकती
निराश न हों, कहते हैं आशा पर आकाश थमा है. कालिमा कितनी भी प्रबल क्यों न हो जाए चाँदनी अपनी धवलता से निर्मलता का प्रसार करेगी ही:
उतरेगी
दूधिया चाँदनी
खिड़की जरा खुली रहने दो
.
कठिनाई यह है कि बेचारी चाँदनी के लिये इंसान ने कहीं स्थान ही नहीं छोड़ा है:
पत्थर के
शहरों में अब तो
मिलती नहीं चाँदनी है
बातूनी
चंचल बंगलों में
दिखती नहीं चाँदनी है
.
इस जीवन शैली में किसी को किसी के लिये समय नहीं है और चाँदनी नाउम्मीद हुई जाती है:
लेटी है बेचैन चाँदनी
पर आँखों में नींद कहाँ?
आँखें जब रतजगा करें तो
सपनों की उम्मीद कहाँ?रिश्तों की
उलझी अलकें भी
कोई नहीं सँवार रहा
.
नाउम्मीदी तो किसी समस्या का हल हो नहीं सकती. कोशिश किये बिना कोई समाधान नहीं मिलता. इसलिए चाँदनी लगातार प्रयासरत रहती है:
रिश्तों की
उलझन को
सुलझाती चाँदनी
एकाकी
जीना क्या
समझाती चाँदनी
.
बंधु जी विसंगतियों का संकेतन स्पष्टता से करते हैं:
चाँदनी को
धूप मैं, कैसे कहूँ
वह भले ही तपन का अहसास दे?
.
नारी है
चाँदनी प्यार की
हर घर की मुस्कान
फिर भी
खोयी शकुंतला की
अब भी क्यों पहचान?
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कम भले हो
तन का आयतन
प्यार का घनत्व कम न हो
.
अपनेपन की कोमल अनुभूति को समेटे कवि प्यार दो या न दो / प्यार से टेर लो, मौन / तुम्हारा इतना मादक / जब बोलोगे तब क्या होगा, धुप बनी / या छाँव बनो / हम तुम्हें खोज लेंगे, शब्दों / के पंख उड़ चले / चलो चलें सपनों के गाँव, चलो बचा लें / महुआवाले / रिश्तों का अहसास आदि में रूमानियत उड़ेलते हुए navgeetनवगीत ओ क्लिष्ट शब्दों और जटिल अनुभूतियों से भरनेवाले कला के पक्षधरों को अपनी सरलता-सहजता से निरुत्तरित करते हैं.
जनगीतों में बन्धु जी मनुष्य की अस्मिता के संरक्षण हेतु कलम चलाते हैं:
आदमी कुछ भी नहीं
फिर भी वतन की आन है
हर अँधेरी झोपड़ी का
वह स्वयं दिनमान है
जब पसीने की कलम से
वक्त खुद गीता लिखे
एक ग्वाला भी कभी
बनता स्वयं भगवान् है.
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भारत में श्रम की प्रतिष्ठा तथा मूल्यांकन न होना पूँजी के असमान वितरण का कारण है. बंधु जी को श्रम ही अँधेरा मिटाकर उजाला करने में समर्थ प्रतीत होता है:
उगा
सूर्य श्रम का
अँधेरा मिटेगा
गयी धुंध दुःख की
उजाला हँसेगा
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वे इंसान की प्रतिष्ठा भगवान से भी अधिक मानते हैं:
रहने दो इंसान
ही मुझे, मुझको मत देवता बनाओ.
नवगीतों में छंद को अनावश्यक माननेवाले संकीर्ण दृष्टि संपन्न अथवा छंद का पूर्णरूपेण पालन न कर सकनेवाले मूर्धन्यों को छोड़ दें तो navgeet के प्रेमी इन नवगीतों का स्वागत मात्र नहीं करेंगे अपितु इनसे प्रेरणा भी ग्रहण करेंगे. अवतारी, महाभागवत आदि छंदों का प्रयोग करने में बंधु जी सिद्धहस्त हैं. वे शब्द चयन में प्रांजलता को वरीयता देते हैं, हिंदीतर शब्दों का प्रयोग न्यूनतम करते हैं. विवेच्य संकलन के नवगीत लोकमानस में अपना स्थान बनाने में समर्थ हैं, यही कवि का साध्य है.
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