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गुरुवार, 25 जून 2020

समीक्षा के भेदक तत्व

समीक्षा के भेदक तत्व
डॉ०आलोक रंजन कुमार

शास्त्रीय समीक्षा तथा स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व--

शास्त्रीय समीक्षाशास्त्र के रूप में समीक्षा की परंपरा अति प्राचीन है। "शास्त्र" शब्द को परिभाषित करते हुए "शासनात शास्त्रम्" तथा "शंसनात शास्त्रम्" दोनों बातें कही गई हैं। वस्तुतः शास्त्र शासन भी करता है और अनुशंसा (संस्तुति) भी। भारतवर्ष में आचार्य भरत के समय विक्रम संवत दूसरी सदी तथा पाश्चात्य जगत में प्लेटो के काल से ही क्रमशः काव्य और कला के रूप में साहित्य के लिए निकष की स्थापना होती रही है। परवर्ती रचनाकार उनका अनुसरण करते रहे हैं। आज भी कुछ तथावत् तथा कुछ परिवर्तित रूपों में आलोचनाशास्त्र साहित्य रूपों का नियमन तथा उसका परीक्षण करता है। हां , इतनी बात अवश्य है कि आचार्य भरत के शब्दों में- लोक जीवन का अनुकरण है "लोकानुकरणम् नाट्यम्" तथा प्लेटो के शब्दों में - "वह प्रकृति का अनुकरण है"- (इमिटेशन ऑफ नेचर)। लोक मान्यताओं की परिवर्तनशीलता तथा पाश्चात्य मान्यताओं के प्रभाव स्वरूप भारतीय मान्यताएं भी बदलती रही हैं। तदनुसार साहित्य की समीक्षा भी भिन्न-भिन्न ढंग से होती रही हैं।
संस्कृत वांग्मय में प्रतिभा के दो रूप माने गए हैं --
(१).कारयित्रि प्रतिभा तथा, (२).भावयित्री प्रतिभा ।

(१). कारयित्री प्रतिभा के बल पर रचनाकार सृजन करता है।
(२).भावयित्री प्रतिभा के बल पर पाठक तथा आलोचक उसका मूल्यांकन करते हैं । आलोचक इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि कोई रचनाकार मानव हृदय की अनुभूतियों को किस सौंदर्य और सीमा के साथ उद्घाटित करने में सफल हुआ है।
आलोचना के दो रूप माने जाते हैं --
(1). सैद्धांतिक आलोचना,
(2). व्यावहारिक आलोचना।

(1). सैद्धांतिक आलोचना के अंतर्गत साहित्य रचना के सिद्धांतों का निरूपण होता है। इसके अंतर्गत रचनाओं के प्रतिमान गठित किए जाते हैं।
(2). व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत उन सिद्धांतों के आधार पर किसी कृतिकार अथवा उसकी कृति विशेष का परीक्षण किया जाता है।
संस्कृत में सैद्धांतिक समीक्षा की तो सुदीर्घ परंपरा मिलती है । परंतु व्यावहारिक आलोचना /समीक्षा का कोई रूप वहां नहीं मिलता। व्यवहारिक समीक्षा का विकास हिंदी में शुक्ल युग से प्रारंभ हुआ। हिंदी में इसकी दीर्घ परंपरा है ।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत शास्त्रीय - समन्वयात्मक, स्वच्छंदतावादी, उपयोगितावादी, मनोविश्लेषणात्मक तथा समाजशास्त्रीय इत्यादि कई प्रकार की समीक्षा पद्धतियों का विकास हुआ है।
हिंदी आलोचना के जनक के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रायः सभी विद्वान् स्वीकारते हैं। इन्होंने सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की समीक्षा की है।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत ये शास्त्रीय समीक्षक माने जाते हैं । उनकी "रस- मीमांसा" तथा "चिंतामणि" में "कविता क्या है?" शीर्षक निबंध शास्त्रीय समीक्षा के उदाहरण हैं । आगे भी शास्त्रीय समीक्षा से संबंधित जो भी ग्रंथ लिखे गए हैं, उसके शलाका पुरुष के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को ही स्वीकार किया गया है। वैसे तो हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पूर्व भी रीतिकालीन कवि - आचार्यों ने लक्षण ग्रंथ की रचना की है, जिसे शास्त्रीय समीक्षा के रूप में स्वीकार किया जाता है। किंतु वह परंपरा डॉ० राम विनोद सिंह के शब्दों में - "अनगढ़-सी" है। वस्तुतः हिंदी में शास्त्रीय समीक्षा के पुरोधा आचार्य शुक्ल जी ही हैं , जिनका आगमन द्विवेदी युग के अंत में हुआ है। हिंदी आलोचना के इतिहास में शुक्ल जी को स्वमेव एक युग मानना समीचीन होगा।
आचार्य शुक्ल के पूर्व रीतिकालीन आचार्यों ने संस्कृत की शास्त्रीय समीक्षा के छ: संप्रदायों में से केवल चार अर्थात रस, छंद, अलंकार और ध्वनि संप्रदायों का अनुसरण करने का प्रयास किया। द्विवेदी युग में इसका विस्तार हुआ किंतु यहां भी शास्त्रीय समीक्षा संस्कृत के प्रभाव से मुक्त एवं आत्मनिर्भर नहीं है। शुक्ल जी ने साहित्य के नवबोध के साथ ही बदलती हुई भारतीय सामाजिकता से प्रभाव ग्रहण किया तथा साहित्य को लोकमंगल से जोड़कर उसके स्वरूप को लोचदार और कारण सापेक्ष बनाया ।
आचार्य शुक्ल जी की शास्त्रीय समीक्षा अपने काल के साहित्य आदर्शों तथा पारंपरिक साहित्य सिद्धांतों के समीकरण से निर्मित है। शुक्ल जी यह महसूस करते हैं कि शास्त्रीय समीक्षा अपने देश की समस्त सांस्कृतिक परंपरा से जुड़कर ही अधिक सार्थक एवं संगत बन गई है। परंतु कुछ विद्वानों का आरोप है कि आचार्य शुक्ल तथा ,उनकी समीक्षा नैतिक वादी है जो पारंपरिक भाव ।बोध का अंध समर्थन और नवबोध का प्रतिकार करती है। नैतिकता वादी दृष्टि प्रायः जीवन के व्यवहार पक्ष की अवहेलना करती है तथा यथार्थ से दूर वह आदर्शों में जीती है। साथ ही स्वरूप उपदेशात्मक हो जाता है। कुल मिलाकर हिंदी की शास्त्रीय समीक्षा साहित्य के पारंपरिक प्रतिमानों, प्राचीन एवं अर्वाचीन भावबोधों तथा पाश्चात्य एवं प्राचीन तथा नवीन मान्यताओं के समीकरण से निर्मित है। जीवन आदर्शों का पोषक तथा उससे जुड़ कर चलने वाली समीक्षा पद्धति है।
आचार्य शुक्ल जी की समीक्षा पद्धति रसवादी है। इन्होंने रस को ही काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया है। रीति काल में प्राय: अलंकारवादी समीक्षा की होड़ सी रही है। किंतु आचार्य शुक्ल के काल में तथा शुक्लोत्तर हिंदी समीक्षा का स्वरूप प्राय: रसवादी तथा लोक मांगलिक रहा है।
शास्त्रीय समीक्षकों की परंपरा में आचार्य शुक्ल के पश्चात् गुलाब राय( काव्य के रूप: सिद्धांत और अध्ययन), चंद्रबली पांडे, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, लक्ष्मीनारायण सुधांशु (काव्य में अभिव्यंजनावाद ,जीवन के तत्व एवं काव्य के सिद्धांत), रामकृष्ण सिलीमुख, आचार्य विश्वनाथ प्रताप मिश्र( वांग्मय विमर्श), पंडित रमाशंकर शुक्ल रसाल, हरिऔध , माधव प्रसाद मिश्र, डॉ श्यामसुंदर दास, डॉ नगेंद्र आदि की सुदीर्घ परंपरा आती है।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा-
आचार्य शुक्ल की शास्त्रीय समीक्षा के परंपरावादी एवं आदर्श परक दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया रूप में विकसित स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति प्रकाश में आई । शुक्ल जी का रसवादी दृष्टिकोण इतिवृत्तात्मक साहित्य के अभिव्यंजना कौशल तथा मूल्यांकन की नैतिकतावादी दृष्टि स्वच्छंदतावादी समीक्षकों को मान्य नहीं । प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् (1914 से 1919) भारतीय जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया तथा उसमें प्रभावित नए ढंग के काव्य का सूत्रपात हुआ तथा काव्य कला संबंधी नई धारणाएं सामने आईं। पारंपरिक मान्यताओं से हटकर साहित्यकारों ने आत्मानुभूति को साहित्य में अभिव्यक्ति प्रदान की। 1920 के आसपास दार्शनिक आभा से अभिमंडित, नूतन कोमल कल्पनाओं से सुसज्जित, आत्मपरक साहित्य के प्रणयन होने लगे, जो आगे चलकर छायावादी साहित्य के नाम से अभिहित हुआ।इनके मूल्यांकन में आचार्य शुक्ल द्वारा स्थापित शास्त्रीय समीक्षा पद्धति असमर्थ रही। इन समीक्षकों ने न तो वैसे साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखलाई और ना तो उन्हें इसकी सही परख ही हो सकी । फलत: छायावादी साहित्य को अनेक तरह के आरोपों का शिकार होना पड़ा। फलत: वैसे साहित्यकारों को अपने विरोधियों का उत्तर देने के लिए आलोचना के क्षेत्र में उतरना पड़ा और उन्होंने साहित्य के नए प्रतिमान गठित किए।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा काव्य और शिल्प दोनों ही क्षेत्रों में नवीन मार्ग का अनुसरण करती है। यहां समष्टिगत अनुभूतियों और मान्यताओं की जगह व्यक्तिगत अनुभूतियों को साहित्य में स्थान दिया गया। स्वतंत्रता की भावना तथा विद्रोह की प्रवृत्ति स्वच्छंदतावाद की मुख्य विशेषता है । साहित्यकार अपनी रचना में व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए पूर्णत: स्वतंत्र है। वस्तुतः एक सफल कलाकार की व्यष्टिपरक अनुभूति साहित्य जगत में आकर स्वमेव व्यष्टिगत हो जाती है और समग्र लोक जीवन को प्रभावित करती है ।
पंत, प्रसाद, निराला तथा महादेवी ने स्वयं अपनी रचनाओं में छायावादी साहित्य पर लगाए गए आरोपों के उत्तर देते हुए लंबी-लंबी भूमिकाएं लिखी तथा स्वतंत्र रचनाओं के रूप में युगीन काव्य की प्रेरणा , अनुभूति , अभिव्यक्ति एवं काव्य सौष्ठव पर विचार किया। यहीं से हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावादी समीक्षा का विकास हुआ।
हिंदी में स्वच्छंदतावादी समीक्षा के उद्भावक के रूप में सुमित्रानंदन पंत को माना जाता है । इन्होंने सर्वप्रथम 1926 ईस्वी में "पल्लव* की भूमिका में स्वच्छंदतावादी काव्य-शिल्प पर विचार किया। पंत जी के अनुसार-" कविता की भाषा चित्रात्मक होनी चाहिए । काव्य में शब्द और अर्थ का अभिन्न संबंध होता है तथा भावों की अभिव्यक्ति और भाषा सौष्ठव मुक्त छंद में अधिक सुघड़ता से व्यक्त किया जा सकता है।" पंत जी ने साहित्य और जीवन में अन्योन्याश्रय संबंध माना है ।
स्वच्छंदतावादी समीक्षकों की परंपरा में छायावाद चतुष्टय के कवियों के अतिरिक्त आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का नाम अग्रगण्य है। इन्होंने शुक्ल जी की आलोचना को सीमित बतलाया तथा छायावाद के सौंदर्य बोध एवं भाषा शिल्प पर भी नूतन दृष्टि डाली। आचार्य वाजपेई के पश्चात् शांतिप्रिय द्विवेदी , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ० नागेंद्र प्रवृत्ति आलोचकों के नाम इसी परंपरा में आते हैं।

शास्त्रीय एवं स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व-
१). सैद्धांतिक समीक्षा के अंग होते हुए भी जहां शास्त्रीय समीक्षा परंपरावादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा परंपरा मुक्त है । वह परंपराओं और रूढ़ियों के प्रति विद्रोहात्मक है।
२). शास्त्रीय समीक्षा जहां परंपराओं और आदर्शों के प्रति मोह ग्रस्त है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा पारंपरिक मान्यताओं से हटकर नवीन उद्भावनाओं का आग्रह है। फलत: कविवर प्रसाद कहते हैं-
"पुरातनता का यह निर्भीक
सहन करती न प्रकृति पल एक,
नित्य नूतनता का आनंद
किए हैं परिवर्तनों में टेक।"
३). शास्त्रीय समीक्षा जहां आदर्शवादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा यथार्थवादी।
४). शास्त्रीय समीक्षा साहित्य में समष्टिपरक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का आग्रही है, वहां स्वच्छंदतावादी मान्यताएं व्यक्तिगत अनुभूतियों विचारों तथा कल्पनाओं की अभिव्यक्ति की पूरी छूट देती है।
५). स्वच्छंदता वादी समीक्षक कला को साहित्य का बाह्य रूप मानते हैं तथा जीवन को उसका अंतः स्वरूप । अतः साहित्य में कृतिकार की निजी संवेदना ही अभिव्यक्ति पाएगी। डॉ०शांति प्रिय द्विवेदी के शब्दों में -"कला साहित्य का बाह्य रूप है, जीवन उसका अंत रूप। कला अभिव्यक्ति है जीवन अभिव्यक्त।"
६). शास्त्रीय समीक्षा के उद्भावक आचार्य शुक्ल ने जहां अपनी समीक्षा का केंद्रबिंदु तुलसी और उनके रामचरितमानस को माना है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षकों का केंद्रबिंदु छायावादी साहित्य है।
७).स्वच्छंदतावादी समीक्षा साहित्य में व्यक्ति का उदात्त कल्पना, कलात्मक उत्कर्ष, प्रकृति चित्रण आदि की पूरी छूट देते हैं तथा कवि को शास्त्र एवं परंपरा के हर बंधन से उन्मुक्त । जबकि शास्त्रीय समीक्षक आदर्श के मोह का त्याग नहीं करते, वे सामाजिक अनुभूतियों, लोक मर्यादाओं तथा परंपराओं के प्रति आग्रही हैं।
समग्रत: हम कह सकते हैं कि स्वच्छंदतावादी समीक्षा सैद्धांतिक समीक्षा के क्षेत्र में एक आंदोलन है जो प्राचीन रूढ़ियों का विरोध कर हर क्षण नवीन उद भावनाओं तथा उन्मुक्त भावनाओं का स्वागत करती है।

त्रिप्रमाणिका सवैया

अभिनव प्रयोग-
नवान्वेषित त्रिप्रमाणिका सवैया
*
गणसूत्र - ज र ल ग, ज र ल ग, ज र ल ग।
*
चलो ध्वजा उठा चलें, प्रयाण गीत गा चलें, सभी सुलक्ष्य पा सकें।
कहीं नहीं कमी रहे, विकास की हवा बहे, गरीब सौख्य पा सकें।
नया उगे विहान भी, नया तने वितान भी, न भेद-भाव भा सकें।
उठो! उठो!! न हारना, जहां हमें सुधारना, सुछंद नित्य गा सकें।
*

२५-६-२०१९
संजीव वर्मा 'सलिल'
७९९९५५९६१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला
*
लाक्षणिकता हो प्रबल, सहज व्यंजना साध्य।
गति-यति-लय पच तत्वमय दोहा ही आराध्य।
*
दोहा-सुषमा सहजता, भाषिक सलिल प्रवाह।
पाठक करता वाह हो, श्रोता भरता आह।।
*
भाव बिंब रस भाव दें, दोहा के माधुर्य।
मिथक-प्रतीक सटीक हों, किन हो क्लिष्ट-प्राचुर्य।।
*
२५-६-२०१९

विमर्श: पुरुष सामंती हैं और स्त्री?

विमर्श:
कृष्णा अग्निहोत्री: ९०% पुरुष सामंती धारणा के हैं. आपकी क्या राय है?
*
और स्त्रियाँ? शत प्रतिशत... विवाह होते ही स्वयं को हरः स्वामिनी मानकर पति के पूरे परिवार को बदलने या बेदखल करने की कोशिश, सफल न होने पर शोषण का आरोप, सम्बन्ध न निभा पाने पर खुद को न सुधार कर शेष सब को दंडित करने की कोशिश. जन्म से मरण तक खुद को पुरुष से मदद पाने का अधिकारी मानेंगी और उसी पर निराधार आरोप भी लगाएँगी. पिता की ममता, भाई का साथ, मित्र का अपनापन, पति का संरक्षण, ससुराल की धन-संपत्ति, बच्चों का लाड़, दामाद का आदर सब स्त्री का प्राप्य है किन्तु यह देनेवाला सामन्ती, शोषक, दुर्जन और न जाने क्या-क्या है. पुरुष प्रधान समाज में एक अकेली स्त्री आकर पति गृह की स्वामिनी हो जाती है जबकि पुरुष अपनी ससुराल में केवल अतिथि ही हो पाता है. यदि स्त्री प्रधान समाज हो तो स्त्री पुरु को जन्म ही न लेने दे या जन्मते ही दफना दे. इसी लिए प्रकृति ने पुरुष का अस्तित्व बचाए रखने के लिए प्राणी जगत में पुरुष को सबल बनाया.
२५-६-२०१७ 

रचना-प्रति रचना राकेश खण्डेलवाल-संजीव सलिल

रचना-प्रति रचना
राकेश खण्डेलवाल-संजीव सलिल
दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
***
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित -
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
जैसे हो तुम मन के अंदर
वैसे ही बाहर दिखते हो
बहुत बधाई तुमको भैया!
*
अब न रहा कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान् कहाँ है?
कनककशिपु तो पग-पग पर हैं, पर प्रहलाद न कहीं यहाँ है
शील सती का भंग करें हरि, तो कैसे भगवान हम कहें?
नहीं जलंधर-हरि में अंतर, जन-निंदा में क्यों न वे दहें?
वर देते हैं शिव असुरों को
अभय दान फिर करें सुरों को
आप भवानी-भंग संग रम
प्रेरित करते नारि-नरों को
महाकाल दें दण्ड भयंकर
दया न करते किंचित दैया!
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जन-हित राजकुमार भेजकर, सत्तासीन न करते हैं अब
कौन अहल्या को उद्धारे?, बना निर्भया हँसते हैं सब
नाक आसुरी काट न पाते, लिया कमीशन शीश झुकाते
कमजोरों को मार रहे हैं, उठा गले से अब न लगाते
हर दफ्तर में, हर कुर्सी पर
सोता कुम्भकर्ण जब जागे
थाना हो या हो न्यायालय
सदा भुखमरा रिश्वत माँगे
भोग करें, ले आड़ योग की
पेड़ काटकर छीनें छैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जब तक था वह गगनबिहारी, जग ने हँस आरती उतारी
छलिये को नटनागर कहकर, ठगी गयी निष्ठा बेचारी
मटकी फोड़ी, माखन खाया, रास रचाई, नाच नचाया
चला गया रणछोड़ मोड़ मुख, युगों बाद सन्देश पठाया
कहता प्रेम-पंथ को तज कर
ज्ञान-मार्ग पर चलना बेहतर
कौन कहे पोंगा पंडित से
नहीं महल, हमने चाहा घर
रहें द्वारका में महारानी
हमें चाहिए बाबा-मैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
असत पुज रहा देवालय में, अब न सत्य में है नारायण
नेह नर्मदा मलिन हो रही, राग-द्वेष का कर पारायण
लीलावती-कलावतियों को 'लिव इन' रहना अब मन भाया
कोई बाँह में, कोई चाह में, खुद को ठगती खुद ही माया
कोकशास्त्र केजी में पढ़ती,
नव पीढ़ी के मूल्य नये हैं
खोटे सिक्कों का कब्ज़ा है
खरे हारकर दूर हुए हैं
वैतरणी करने चुनाव की
पार, हुई है साधन गैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
दाँत शेर के कौन गिनेगा?, देश शत्रु से कौन लड़ेगा?
बोधि वृक्ष ले राजकुँवरि को, भेज त्याग-तप मौन वरेगा?
जौहर करना सर न झुकाना, तृण-तिनकों की रोटी खाना
जीत शौर्य से राज्य आप ही, गुरु चरणों में विहँस चढ़ाना
जान जाए पर नीति न छोड़ें
धर्म-मार्ग से कदम न मोड़ें
महिषासुरमर्दिनी देश-हित
अरि-सत्ता कर नष्ट, न छोड़ें
सात जन्म के सम्बन्धों में
रोज न बदलें सजनी-सैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
युद्ध-अपराधी कहा उसे जिसने, सर्वाधिक त्याग किया है
जननायक ने ही जनता की, पीठ में छुरा भोंक दिया है
सत्ता हित सिद्धांत बेचते, जन-हित की करते नीलामी
जिसमें जितनी अधिक खोट है, वह नेता है उतना दामी
साथ रहे सम्पूर्ण क्रांति में
जो वे स्वार्थ साध टकराते
भूले, बंदर रोटी खाता
बिल्ले लड़ते ही रह जाते
डुबा रहे मल्लाह धार में
ले जाकर अपनी ही नैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
कहा गरीबी दूर करेंगे, लेकिन अपनी भरी तिजोरी
धन विदेश में जमा कर दिया, सब नेता हो गए टपोरी
पति पत्नी बच्चों को कुर्सी, बैठा देश लूटते सब मिल
वादों को जुमला कह देते, पद-मद में रहते हैं गाफिल
बिन साहित्य कहें भाषा को
नेता-अफसर उद्धारेंगे
मात-पिता का जीना दूभर
कर जैसे बेटे तारेंगे
पर्व त्याग वैलेंटाइन पर
लुक-छिप चिपकें हाई-हैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*****
२५-६-२०१६

मुक्तक: दीप्ति

मुक्तक: दीप्ति
संजीव
*
दीप्ति दुनिया की बढ़े नित, देव! यह वरदान देना,
जब कभी तूफां पठाओ, सिखा देना नाव खेना।
नहीं मोहन भोग की है चाह- लेकिन तृप्ति देना-
उदर अपना भर सकूँ, मेहमान भी पायें चबेना।।
*
दीप्ति निश-दिन हो अधिक से अधिक व्यापक,
लगें बौने हैं सभी दुनिया के मापक।
काव्यधारा रहे बहती, सत्य कहती -
दूर दुर्वासा सरीखे रहें शापक।।
*
दीप्ति चेहरे पर रहे नित नव सृजन की,
छंद में छवि देख पायें सब स्वजन की।
ह्रदय का हो हार हिंदी विश्व वाणी-
पत्रिका प्रेषित चरण में प्रभु! नमन की।।
*
दीप्ति आगत भोर का सन्देश देती,
दीप्ति दिनकर को बढ़ो आदेश देती।
दीप्ति संध्या से कहे दिन को नमन कर-
दीप्ति रजनी को सुला बांहों में लेती।।
*
दीप्ति सपनों से सतत दुनिया सजाती,
दीप्ति पाने ज़िंदगी दीपक जलाती।
दीप्ति पाले मोह किंचित कब किसी से-
दीप्ति भटके पगों को राहें दिखाती।।
*
दीप्ति की पाई विरासत धन्य भारत,
दीप्ति कर बदलाव दे, कर-कर बगावत।
दीप्ति बाँटें स्नेह सबको अथक निश-दिन-
दीप्ति से हो तम पराजित कर अदावत।।
*
दीप्ति की गाथा प्रयासों की कहानी,
दीप्ति से मैत्री नहीं होती जुबानी।।
दीप्ति कब मुहताज होती है समय की =-
दीप्ति का स्पर्श पा खिलती जवानी।।
*

२५-६-२०१३ 

मुक्तिका

मुक्तिका:
लिखी तकदीर रब ने...
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
लिखी तकदीर रब ने फिर भी हम तदबीर करते हैं.
फलक उसने बनाया है, मगर हम रंग भरते हैं..
न हमको मौत का डर है, न जीने की तनिक चिंता-
न लाते हैं, न ले जाते मगर धन जोड़ मरते हैं..
कमाते हैं करोड़ों पाप कर, खैरात देते दस.
लगाकर भोग तुझको खुद ही खाते और तरते हैं..
कहें नेता- 'करें क्यों पुत्र अपने काम सेना में?
फसल घोटालों-घपलों की उगाते और चरते हैं..
न साधन थे तो फिरते थे बिना कपड़ों के आदम पर-
बहुत साधन मिले तो भी कहो क्यों न्यूड फिरते हैं..
न जीवन को जिया आँखें मिलाकर, सिर झुकाए क्यों?
समय जब आख़िरी आया तो खुद से खुद ही डरते हैं..
'सलिल' ने ज़िंदगी जी है, सदा जिंदादिली से ही.
मिले चट्टान तो थमते नहीं, सूराख करते हैं..
२५-६-२०२० 

बुधवार, 24 जून 2020

मुक्तिका

: मुक्तिका: :संजीव 'सलिल'
ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो कट जाएगी.
कोशिशें आस को चाहेंगी तो पट जाएगी..
जो भी करना है उसे कल पे न टालो वरना
आयेगा कल न कभी, साँस ही घट जाएगी..
वायदे करना ही फितरत रही सियासत की.
फिर से जो पूछोगे, हर बात से नट जाएगी..
रख के कुछ फासला मिलना, तो खलिश कम होगी.
किसी अपने की छुरी पीठ से सट जाएगी..
दूरियाँ हद से न ज्यादा हों 'सलिल' ध्यान रहे.
खुशी मर जाएगी गर खुद में सिमट जाएगी..
२४-६-२०१० 

हाइकु

कुछ हाइकु
संजीव 'सलिल'
*
रात की बात
किसी को मिली जीत
किसी को मात..
*
फूल सा प्यारा
धरती पर तारा
राजदुलारा..
*
करेँ वंदन
लगाकर चन्दन
हँसे नंदन..
*
आता है याद
दूर जाते ही देश
यादें अशेष..
*
कुसुम-गंध
फैलती सब ओर.
देती आनंद..
*
देना या पाना
प्रभु की मर्जी
पा मुस्कुराना..
*
आंधी-तूफ़ान
देता है झकझोर
चले न जोर..
*
उखाड़े वृक्ष
पल में ही अनेक
आँधी है दक्ष..
*
बूँदें बरसें
सौधी गंध ले सँग
मन हरषे..
*
करे ऊधम
आँधी-तूफ़ान, लिए
हाथ में हाथ..
*
बादल छाये
सूरज खिसियाये
भू मुस्कुराये.
*
नापते नभ
आवारा की तरह
नाच बादल..
*
२४-६-२०१०

स्मृति गीत / शोक गीत

स्मृति गीत / शोक गीत
संजीव 'सलिल'
याद आ रही पिता तुम्हारी
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याद आ रहीपिता तुम्हारी...

तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ?
जीवन का सब विष पी पाऊँ.
अमृत बाँट सकूँस्वजनों को-
विपदा को हँस सह मुस्काऊँ.
विधि ने काहेबात बिगारी?
याद आ रही पिता तुम्हारी...
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रही शीश पर जब तव छाया.
तनिक न विपदा से घबराया.
आँधी-तूफांजब-जब आये-
हँसकर मैंने गले लगाया.
बिना तुम्हारे हुआ भिखारी.
याद आ रही पिता तुम्हारी...
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मन न चाहता खुशी मनाऊँ.
कैसे जग को गीत सुनाऊँ?
सपने में आकर मिल जाओ-
कुछ तो ढाढस-संबल पाऊँ.
भीगी अँखियाँ खारी खारी
याद आ रही पिता तुम्हारी...
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२४-६-२०१०