शब्दांजली
लगा शतक दें शुभशीष गुरु
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गुरु सक्सेना से सक्सेस के मंत्र सीख लो यार
सांड सरीखे सींग दिखाओ सीधी बहे बयार
नरसिंहपुरिया बानी होती सीधे दिल के पार
संयत को कर सकत बताओ नर हो चाहे नार
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गुरु तो गुरु हैं फंद छंद का खोलें पल में डोल
नदी नर्मदा तीर बिराजे जानें सब की पोल
'सलिल' करे अभिषेक विहँसकर है बड़भागी जान
जीव हुए 'संजीव' सभी जो करते गुरु का मान
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गुरु का जलवा जिसने देखा वही हो गया धन्य
काव्य पाठ सर्वथा अनूठा समता करे न अन्य
गुरु आवास तीर्थ है सुंदर यादें जहाँ अनेक
शारद पूजन निश-दिन होता जाग्रत रहे विवेक
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गुरु के चेले तनिक न कच्चे, गुरु जब खींचें कान
छंद मात्रिक-वार्णिक पल में बैठें जिह्वा आन
गुरु रचते हैं छंद नए नित, हैं छंदों की खान
है रस-सिक्त हृदय गुरुवर का, मानों रस की खान
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गुरु कायस्थ शिरोमणि पक्के लाला खोलें ताला
तनिक न होने देते छंदों में गड़बड़ घोटाला
घनाक्षरी है बाल सखी अरु मित्र सवैया प्यारा
दोहा दोस्त बहुत प्यारा है, मीट सोरठा न्यारा
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गुरु-यश सूरज सदा चमकता रहे गगन में रोज
गुरु सा मॉडल बना सके क्या कभी विधाता खोज?
चित्रगुप्त वंशज हैं गुरु जी कलम मान तलवार
जब-जब सूतें तब-तब होते छंद सहज साकार
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गुरु पर डाक टिकिट जारी हो चेले करें प्रयास
पद्म मिले तो हिन्दी गौरव बढ़े कीजिए आस
गुरु-कविताएँ पाठ्य पुस्तकों में भी छापे शासन
बच्चे खेल-खेल में सीखें हिन्दी का अनुशासन
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गुरु चौराहा, गुरु पथ भी हो नरसिंहपुर में मीत
करें अनावृत निज प्रतिमा भी गुरु रच दें नव रीत
शिक्षक की महिमा के हैं पर्याय गुरु जी आप
शिक्षक की छाया भी कहिए कौन सका है नाप
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गुरु जी कर संघर्ष बढ़े हैं आप बना निज राह
नामो-निशां न उनका बाकी जी करते थे डाह
अँगुली थाम 'सलिल' की भी लें यही विनय है आज
लगा शतक दें शुभशीष गुरु पूर्ण तभी हो काज
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विनयावनत
संजीव
९४२५१८३२४४
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