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गुरुवार, 28 मई 2020

सरस्वती वंदना अलंकार युक्त

सरस्वती वंदना अलंकार युक्त 
*
वाग्देवि वागीश्वरी, वरदा वर दे विज्ञ             
- वृत्यानुप्रास  (आवृत्ति व्)
कोकिल कंठी स्वर सजे, गीत गा सके अज्ञ     
-छेकानुप्रास (आवृत्ति क, स, ग)
*
नित सूरज  दैदीप्य हो, करता तव वंदन        
- श्रुत्यनुप्रास (आवृत्ति दंतव्य न स द त)
ऊषा गाती-लुभाती, करती अभिनंदन           
- अन्त्यानुप्रास (गाती-भाती)
*
शुभदा सुखदा शांतिदा, कर मैया उपकार     
- वैणसगाई (श, क)
हंसवाहिनी हो सदा, हँसकर हंससवार           
- लाटानुप्रास (हंस)
*
बार-बार हम सर नवा, करते जय-जयकार     
- पुनरुक्तिप्रकाश (बार, जय)
जल से कर अभिषेक नत, नयन बहे जलधार 
- यमक (जल = पानी, आँसू)
*
मैया! नृप बनिया नहीं, खुश होते बिन भाव
- श्लेष (भाव = भक्ति, खुशामद, कीमत)
रमा-उमा विधि पूछतीं, हरि-शिव से न निभाव?
- वक्रोक्ति (विधि = तरीका, ब्रह्मा) 
*
कनक सुवर्ण सुसज्ज माँ, नतशिर करूँ प्रणाम
- पुनरुक्तवदाभास (कनक = सोना, सुवर्ण = अच्छे वर्णवाली)
मीनाक्षी! कमलांगिनी, शारद शारद नाम
- उपमा (मीनाक्षी! कमलांगिनी), - अनन्वय (शारद)
*
सुमन सुमन मुख-चंद्र तव, मानो 'सलिल' चकोर
- रूपक (मुख-चंद्र), उत्प्रेक्षा (मान लेना)
शारद रमा-उमा सदृश, रहें दयालु विभोर
- व्यतिरेक (उपमेय को उपमान से अधिक बताया जाए)
***








बुधवार, 27 मई 2020

नवगीत

 तीन नवगीत
*
१.
दोष गैर के
करते इंगित
पथ भूले नवगीत.
देखें, खुद की कमी
सुधारें तो
रच दें नव रीत.
*
अँगुली एक उठी गैरों पर
खुद पर उठतीं तीन.
अनदेखी कर
रहे बजाते
सुर साधे बिन बीन.
काला चश्मा चढ़ा
आज की
आँखों पर ऐसा-
धवन श्वेत
हंसा भी दिखता
करिया काग अतीत.
*
सब कुछ बुरा
न कभी रहा है,
भला न हो सकता.
नहीं बचाया
शुभ-उजियारा
तो वह खो सकता.
नव आशा का
सूर्य उगाएँ
तब निशांत होगा-
अमावसी तं
अमर हुआ, भ्रम
अब हो नहीं प्रतीत.
११.००
***
२.
सिसक रही क्यों कविता?
बोलो क्यों रोता नवगीत?
*
प्रगतिवाद ने
छीनी खुशियाँ
थोप दिया दुःख-दर्द.
ठूँस-ठूँस
कृत्रिम विडम्बना
खून कर दिया सर्द.
हँसी-ख़ुशी की
अनदेखी से
हार गयी है जीत.
*
महलों में बैठे
कुटियों का
दर्द बखान रहे.
नर को छल
नारी-शोषण का
कर यशगान रहे.
लेश न मतलब
लोक-देश से
हैं वैचारिक क्रीत.
*
नहीं लोक का
मंगल चाहें
करा रहे मत-भेद.
एक्य भुलाकर
फूट दिखाते
ताकि बढ़े मन-भेद.
नकली संत्रासों
को जय गा
करते सबको भीत.
११.४०
***
३.
मैं हूँ नवगीत
आइना दिल का,
दर्द-पीड़ा की कैद दो न मुझे.
*
मैं नहीं देह का
बाज़ार महज.
मैं नहीं दर्द की
मीनार महज.
मैं नया ख्वाब
एक बगीचा
रौंद नियमों से, खेद दो न मुझे.
*
अब भी
अरमान-हौसले बाकी.
कौतुकी हूँ
न हो टोका-टाकी.
मैं हूँ कोशिश
की केसरी क्यारी
शूल नफरत के, छेद दो न मुझे.
*
मैं हूँ गर मर्द
दोष दो न मुझे.
मैंने कविता से
मुहब्बत की है.
चाहकर भी न
न सँग रह पाए
कैसे मुमकिन है, खेद हो न मुझे?
*
जिंदगी मुझको
अपनी जीने दो.
थोड़ा हँसने दो
खिलखिलाने दो.
राग या त्याग
एक ही हैं मुझे
सुख या दुःख में भी भेद है न मुझे.
१२.३५
सरस्वती इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेकनोलोजी जबलपुर.
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
अंधड़-तूफां आया
बिजली पल में
गोल हुई
*
निष्ठा की कमजोर जड़ें
विश्वासों के तरु उखड़े
आशाओं के नीड़ गिरे
मेघों ने धमकाया
खलिहानों में
दौड़ हुई.
*
नुक्कड़ पर आपाधापी
शेफाली थर-थर काँपी
थे ध्वज भगवा, नील, हरे
दोनों को थर्राया
गिरने की भी
होड़ हुई.
*
उखड़ी जड़ खापों की भी
निकली दम पापों की भी
गलती करते बिना डरे
शैतां भी शर्माया
घर खुद का तो
छोड़ मुई!.
*
२६-५-२००१५: जबलपुर में ५० कि.मी. की गति से चक्रवातजनित आंधी-तूफ़ान, भारी तबाही के बाद रचित.

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
मुस्कानें विष बुझी
निगाहें पैनी तीर हुईं
*
कौए मन्दिर में बैठे हैं
गीध सिंहासन पा ऐंठे हैं
मन्त्र पढ़ रहे गर्दभगण मिल
करतल ध्वनि करते जेठे हैं.
पुस्तक लिख-छपते उलूक नित
चीलें पीर भईं
मुस्कानें विष बुझी
निगाहें पैनी तीर हुईं
*
चूहे खलिहानों के रक्षक
हैं सियार शेरों के भक्षक
दूध पिलाकर पाल रहे हैं
अगिन नेवले वासुकि तक्षक
आश्वासन हैं खंबे
वादों की शहतीर नईं
*
न्याय तौलते हैं परजीवी
रट्टू तोते हुए मनीषी
कामशास्त्र पढ़ रहीं साध्वियाँ
सुन प्रवचन वैताल पचीसी
धुल धूसरित संयम
भोगों की प्राचीर मुईं
27-5-2015
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
ध्वस्त हुए विश्वास किले
*
जूही-चमेली
बगिया तजकर
वन-वन भटकें
गोदी खेली
कलियाँ ही
फूलों को खटकें
भँवरे करते मौज
समय के अधर सिले
ध्वस्त हुए विश्वास किले
*
चटक-मटक पर
ठहरें नज़रें
फिर फिर अटकें
श्रम के दर की
चढ़ें न सीढ़ी
युव मन ठिठकें
शाखों से क्यों
वल्लरियों के वदन छिले
ध्वस्त हुए विश्वास किले
27-5-2015
*

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
संसद में बातें ही बातें हैं
उठ-पटक, छीन-झपट मातें हैं
अपने ही अपनों को छलते हैं-
अपने-सपने करते घातें हैं
अवमूल्यन
का गरम बाज़ार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
तिमिराये दिन, गुमसुम रातें हैं
सबब फूट का बनती जातें हैं
न्यायालय दुराचार का कैदी-
सर पर चढ़, बैठ रही लातें हैं
मनमानी
की बनी मीनार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
असमय ही शुभ अवसर आते हैं
अक्सर बिन आये ही जाते हैं
पक्षपात होना ही होना है-
बारिश में डूब गये छाते हैं
डोक्टर ही
हो रहे बीमार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
27-5-2015

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
चलो मिल सूरज उगायें
*
सघनतम तिमिर हो जब
उज्ज्वलतम कल हो तब
जब निराश अंतर्मन-
नव आशा फल हो तब
विघ्न-बाधा मिल भगायें
चलो मिल सूरज उगायें
*
पत्थर का वक्ष फोड़
भूतल को दें झिंझोड़
अमिय धार प्रवहित हो
कालकूट जाल तोड़
मरकर भी जी जाएँ
चलो मिल सूरज उगायें
*
अपनापन अपनों का
धंधा हो सपनों का
बंधन मत तोड़ 'सलिल'
अपने ही नपनों का
भूसुर-भुसुत बनायें
चलो मिल सूरज उगायें
*
27-5-2015

मुक्तक

मुक्तक:
संजीव
*
भाषण देते उपन्यास सा, है प्रयास लघुकथा हमारा
आश्वासन वह महाकाव्य है, जिसे लिखा बिन पढ़े बिसारा
मत देकर मत करो अपेक्षा, नेताजी कुछ काम करेंगे-
भूल न करते मतदाता को चेहरा दिखलायें दोबारा
*
27-5-2015

गीत

एक गीत 
*
सभ्य-श्रेष्ठ
खुद को कहता नर
करता अत्याचार।
पालें-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटे? धिक्कार।
*
बोये बीज, लगाईं कलमें
पानी सींच बढ़ाया।
पत्ते, काली, पुष्प, फल पाकर
मनुज अधिक ललचाया।
सोने के
अंडे पाने
मुर्गी को डाला मार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को नित
काटें? धिक्कार।
*
शाखा तोड़ी, तना काटकर
जड़ भी दी है खोद।
हरी-भरी भू मरुस्थली कर
बोनसाई ले गोद।
स्वार्थ साधता क्रूर दनुज सम
मानव बारम्बार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटें? धिक्कार।
*
ताप बढ़ा, बरसात घट रही
सूखे नदी-सरोवर।
गलती पर गलती, फिर गलती
करता मानव जोकर।
दण्ड दे रही कुदरत क्रोधित
सम्हलो करो सुधार।
पालें-पोसें वृक्ष
उन्हीं को हम
काटें? धिक्कार।
*
२७-५-२०१६ 

गीत

एक गीत 
*
कहते बड़ा हमारा देश
किंतु न कोई आशा शेष
*
पैर तले से भूमि छिन गयी,
हाथों में आकाश नहीं।
किसे बताऊँ?, कौन कर रहा
मेरा सत्यानाश नहीं?
मानव-हाथ छला जाकर नित
नोंच रहा खुद अपने केश।
कहते बड़ा हमारा देश
किंतु न कोई आशा शेष।
*
छाँह, फूल, पत्ते लकड़ी ले
कभी नहीं आभार किया।
जड़ें खोद मेरे जीवन का
स्वार्थ हेतु व्यापार किया।
मुझको जीने नहीं दिया,
खुद मानव भी कर सका न ऐश।
कहते बड़ा हमारा देश
किंतु न कोई आशा शेष
*
मेरे आँसू की अनदेखी
करी, काट दी बोटी-बोटी।
निर्मम-निष्ठुर दानव बनकर
मानव जला सेंकता रोटी।
कोई नहीं अदालत जिसमें
'वृक्ष' करूँ मैं अर्जी पेश।
कहते बड़ा हमारा देश
किंतु न कोई आशा शेष।
*
१६-५-२०१६

गीत

एक गीत 
*
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
*
पैर तले से भूमि छिन गयी
हाथों में आकाश नहीं।
किसे दोष दूँ?, कौन कर रहा
मेरा सत्यानाश नहीं।
मानव-हाथ छ्ल जाकर नित
नोच रहा हूँ अपने केश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
*
छाँह, फूल.पत्ते,लकड़ी ले
कभी नहीं आभार किया।
जड़ें खोद, मेरे जीवन का
स्वार्थ हेतु व्यापार किया।
मुझको जीने नहीं दिया, खुद
मानव भी कर सका न ऐश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
*
मेरे आँसू की अनदेखी
करी काटकर बोटी-बोटी।
निष्ठुर-निर्मम दानव बनकर
मुझे जलाकर सेंकी रोटी।
कोेेई नहीं अदालत जिसमें
करून वृक्ष मैं, अर्जी पेश
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष
*

गीत सलिला

गीत सलिला:
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
चंचल चितवन मृगया करती
मीठी वाणी थकन मिटाती।
रूप माधुरी मन ललचाकर -
संतों से वैराग छुड़ाती।
खोटा सिक्का
दरस-परस पा
खरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
उषा गाल पर, माथे सूरज
अधर कमल-दल, रद मणि-मुक्ता।
चिबुक चंदनी, व्याल केश-लट
शारद-रमा-उमा संयुक्ता।
ध्यान किया तो
रीता मन-घट
भरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
सदा सुहागन, तुलसी चौरा
बिना तुम्हारे आँगन सूना।
तुम जितना हो मुझे सुमिरतीं
तुम्हें सुमिरता है मन दूना।
साथ तुम्हारे गगन
हुआ मन, दूर हुईं तो
धरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एन्ड टेक्नोलॉजी
जबलपुर, २६.५.२०१६

मंगलवार, 26 मई 2020

त्रिपदियाँ

त्रिपदियाँ
*
सलीबें भी जब करें,
मन रंजना तब जानिए
विपक्षी हैं सामने
*
सलीबें थर्रा रहीं हैं
देख सत को सामने
काश हम होते नहीं
*
सलीबें बन रही हैं
आजकल इतिहास
कैसा समय है?
*
सलीबों की वंदना
कर कहें मन रंजना
वाह रे! इंसान
*
सलीबों को चूमकर
अदीबों ने कह दिया
है यही जम्हूरियत
*
सलीबें कब
देवताओं को मिलीं
सौ खून उनके माफ हैं।
*

आनंदवर्धक छंद

एक दोहा
सकल भूमि सरकार की, किसके हैं हम लोग?
कहें जांय किस भाड़ में?, तज घड़ियाली सोग
*
जनगण ने प्रतिनिधि चुने, कर पायें वे काम
जो इसमें बाधक बने, वह भोगे परिणाम
*
२६-५-२०१७ 
मुक्तिका
तेरे लिए
(१९ मात्रिक महापौराणिकजातीय आनंदवर्धक छंद)
*
जी रहा हूँ श्वास हर तेरे लिए
पी रहा हूँ प्यास हर तेरे लिए
*
हर ख़ुशी-आनंद है तेरे लिए
मीत! मेरा छंद है तेरे लिए
*
मधुर अनहद नाद है तेरे लिए
भोग, रसना, स्वाद है तेरे लिए
*
वाक् है, संवाद है तेरे लिए
प्रभु सुने फ़रियाद है तेरे लिए
*
जिंदगी का भान है तेरे लिए
बन्दगी में गान है तेरे लिए
*
सावनी जलधार है तेरे लिए
फागुनी सिंगार है तेरे लिए
*
खिला हरसिंगार है तेरे लिए
सनम ये भुजहार है तेरे लिए
*

नवगीत

*
नवगीत:
संजीव
*
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
*
जिंदगी नवगीत बनकर
सर उठाने जब लगी
भाव रंगित कथ्य की
मुद्रा लुभाने तब लगी
गुनगुनाकर छंद ने लय
कहा: 'बन जा संत रे!'
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
*
बिम्ब ने प्रतिबिम्ब को
हँसकर लगाया जब गले
अलंकारों ने कहा:
रस सँग ललित सपने पले
खिलखिलाकर लहर ने उठ
कहा: 'जग में तंत रे!'
*
बन्दगी इंसान की
भगवान ने जब-जब करी
स्वेद-सलिला में नहाकर
सृष्टि खुद तब-तब तरी
झिलमिलाकर रौशनी ने
अंधेरों को कस कहा:
भास्कर है कंत रे!
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
२५-५-२०१५

नवगीत

नवगीत
*
तन पर
पहरेदार बिठा दो
चाहे जितने,
मन पाखी को
कैद कर सके
किसका बूता?
*
तनता-झुकता
बढ़ता-रुकता
तन ही हरदम।
हारे ज्ञानी
झुका न पाये
मन का परचम।
बाखर-छानी
रोक सकी कब
पानी चूता?
मन पाखी को
कैद कर सके
किसका बूता?
*
ताना-बाना
बुने कबीरा
ढाई आखर।
ज्यों की त्यों ही
धर जाता है
अपनी चादर।
पैर पटककर
सना धूल में
नाहक जूता।
मन पाखी को
कैद कर सके
किसका बूता?
*
चढ़ी शीश पर
नहीं उतरती
क़र्ज़ गठरिया।
आस-मदारी
नचा रहा है
श्वास बँदरिया।
आसमान में
छिपा न मिलता
इब्नबतूता।
मन पाखी को
कैद कर सके
किसका बूता?
*

कृति चर्चा - मनोज शुक्ल 'मनोज


कृति चर्चा:
संवेदनाओं के स्वर : कहानीकार की कवितायेँ
चर्चाकार: आचार्य संजीव
[कृति विवरण: संवेदनाओं के स्वर, काव्य संग्रह, मनोज शुक्ल 'मनोज', आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १४४, मूल्य १५० रु., प्रज्ञा प्रकाशन २४ जग्दिश्पुरम, लखनऊ मार्ग, त्रिपुला चौराहा रायबरेली]
*
मनोज शुक्ल 'मनोज' मूलतः कहानीकार हैं. कहानी पर उनकी पकड़ कविता की तुलना में बेहतर है. इस काव्य संकलन में विविध विधाओं, विषयों तथा छन्दों की त्रिवेणी प्रवाहित की गयी है. आरम्भ में हिंदी वांग्मय के कालजयी हस्ताक्षर स्व. हरिशंकर परसाई का शुभाशीष कृति की गौरव वृद्धि करते हुए मनोज जी व्यापक संवेदनशीलता को इंगित करता है. संवेदनशीलता समाज की विसंगतियों और विषमताओं से जुड़ने का आधार देती है.
मनोज सरल व्यक्तित्व के धनी हैं. कहानीकार पिता स्व. रामनाथ शुक्ल से विरासत में मिले साहित्यिक संस्कारों को उन्होंने सतत पल्लवित किया है. विवेच्य कृति में डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी, सनातन कुमार बाजपेयी 'सनातन' ने वरिष्ठ तथा विजय तिवारी 'किसलय' ने सम कालिक कनिष्ठ रचनाधर्मियों का प्रतिनिधित्व करते हुए संकलन की विशेषताओं का वर्णन किया है. बाजपेयी जी के अनुसार भाषा की सहजता, भावों की प्रबलता, आडम्बरविहीनता मनोज जी के कवि का वैशिष्ट्य है. चतुर्वेदी जी ने साधारण की असाधारणता के प्रति कवि के स्नेह, दीर्घ जीवनानुभवों तथा विषय वैविध्य को इंगित करते हुए ठीक ही कहा है कि 'राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए स्वयं संभाव्य है' तथा ' कवि न होऊँ अति चतुर कहूं, मति अनुरूप राम-गुन गाऊँ' में राम के स्थान पर 'भाव' कर दिया जाए तो आज की (कवि की भी) आकुल-व्याकुलता सहज स्पष्ट हो जाती है. फिर जो उच्छ्वास प्रगट होता है वह स्थापित काव्य-प्रतिमानों में भले ही न ढल पाता हो पर मानव मन की विविधवर्णी अभिव्यक्ति उसमें अधिक सहज और आदम भाव से प्रगट होती है.'
निस्संदेह वीणावादिनी वन्दना से आरम्भ संकलन की ७२ कवितायें परंपरा निर्वहन के साथ-साथ बदलते समय के परिवर्तनों को रेखांकित कर सकी हैं. इस कृति के पूर्व कहानी संग्रह क्रांति समर्पण व एक पाँव की जिंदगी तथा काव्य संकलन याद तुम्हें मैं आऊँगा प्रस्तुत कर चुके मनोज जी छान्दस-अछान्दस कविताओं का बहुरंगी-बहुसुरभि संपन्न गुलदस्ता संवेदनाओं के स्वर में लाये हैं. शिल्प पर कथ्य को वरीयता देती ये काव्य रचनाएं पाठक को सामायिक सत्य की प्रतीति करने के साथ-साथ कवि के अंतर्मन से जुड़ने का अवसर भी उपलब्ध कराती हैं. जाय, होंय, रोय, ना, हुये, राखिये, भई, आंय, बिताँय जैसे देशज क्रिया रूप आधुनिक हिंदी में अशुद्धि माने जाने के बाद भी कवि के जुड़ाव को इंगित करते हैं. संत साहित्य में यह भाषा रूप सहज स्वीकार्य है चूँकि तब वर्तमान हिंदी या उसके मानक शब्द रूप थे ही नहीं. बैंक अधिकारी रहे मनोज इस तथ्य से सुपरिचित होने पर भी काव्याभिव्यक्ति के लिये अपने जमीनी जुड़ाव को वरीयता देते हैं.
मनोज जी को दोहा छंद का प्रिय है. वे दोहा में अपने मनोभाव सहजता से स्पष्ट कर पाते हैं. कुछ दोहे देखें:
ऊँचाई की चाह में, हुए घरों से दूर
मन का पंछी अब कहे, खट्टे हैं अंगूर
.
पाप-पुन्य उनके लिए, जो करते बस पाप
लेकिन सज्जन पुण्य कर, हो जाते निष्पाप
.
जंगल में हाथी नहीं, मिलते कभी सफेद
हैं सत्ता में अनगिनत, बगुले भगत सफेद
.
दोहों में चन्द्रमा के दाग की तरह मात्राधिक्य (हो गए डंडीमार, बनो ना उसके दास, चतुर गिद्ध और बाज, मायावती भी आज १२ मात्राएँ), वचन दोष (होता इनमें उलझकर, तन-मन ही बीमार) आदि खीर में कंकर की तरह खलते हैं.
अछांदस रचनाओं में मनोज जी अधिक कुशलता से अपने मनोभावों को व्यक्त कर सके हैं. कलयुगी रावण, आतंकवादी, पुरुषोत्तम, माँ की ममता त्रिकोण सास बहू बेटे का, पत्नी परमेश्वर, मेरे आँगन की तुलसी आदि रचनाएँ पठनीय हैं. गांधी संग्रहालय से एक साक्षात्कार शीर्षक रचना अनेक विचारणीय प्रश्न उठाती है. मनोज का संवेदनशील कवि इन रचनाओं में सहज हो सका है.
संझा बिरिया जब-जब होवे, तुलसी तेरे घर-आँगन में, फागुन के स्वर गूँज उठे, ओ दीप तुझे जलना होगा, प्रलय तांडव कर दिया आदि रचनाएँ इस संग्रह के पाठक को बाँधने में समर्थ हैं.
२६-५-२०१५
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समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
९४२५१८३२४४ / salil.sanjiv@gmail.com

मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी)

रसानंद दे छंद नर्मदा ३१ : मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी)
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन या सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका, शंकर तथा मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी)छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए उपेन्द्रवज्रा छन्द से
उपेन्द्र वज्रा
संजीव
*
छंद-लक्षण:
उपेन्द्र वज्रा द्विपदिक मात्रिक छंद है. इसके हर पद में क्रमश: जगण तगण जगण २ गुरु अर्थात ११ वर्ण और १७
मात्राएँ होती हैं.
उपेन्द्रवज्रा एक पद = जगण तगण जगण गुरु गुरु = १२१ / २२१ / १२१ / २२
उदाहरण:
१. सरोज तालाब गया नहाया
सरोद सायास गया बजाया
न हाथ रोका नत माथ बोला
तड़ाग झूमा नभ मुस्कुराया
२. हथेलियों ने जुड़ना न सीखा
हवेलियों ने झुकना न सीखा।
मिटा दिया है सहसा हवा ने-
फरेबियों से बचना न सीखा
३. जहाँ-जहाँ फूल खिलें वहाँ ही,
जहाँ-जहाँ शूल, चुभें वहाँ भी,
रखें जमा पैर, हटा न पाये-
भले महाकाल हमें मनायें।
***
२६-५-२०१६ 

पर्यावरण गीत

पर्यावरण गीत:
किस तरह आये बसंत
संजीव
*
मानव लूट रहा प्रकृति को
किस तरह आये बसंत?...
*
होरी कैसे छाये टपरिया?
धनिया कैसे भरे गगरिया?
गाँव लील कर हँसे नगरिया,
राजमार्ग बन गयी डगरिया
राधा को छल रहा सँवरिया
सुत भूला माँ हुई बँवरिया
अंतर्मन रो रहा निरंतर
किस तरह गाये बसंत?...
*
सूखी नदिया कहाँ नहायें?
बोल जानवर कहाँ चरायें?
पनघट सूने अश्रु बहायें,
राई-आल्हा कौन सुनायें?
नुक्कड़ पर नित गुटका खायें.
खलिहानों से आँख चुरायें.
जड़विहीन सूखा पलाश लाख
किस तरह भाये बसंत?...
*
तीन-पाँच करते दो दूनी.
टूटी बागड़ गायब थूनी.
ना कपास, तकली ना पूनी.
यांत्रिकता की दाढ़ें खूनी.
वैश्विकता ने खुशिया छीनी.
नेह नरमदा सूखी-सूनी.
शांति-व्यवस्था मिटी गाँव की
किस तरह लाये बसंत?...
*
२६-५-२०१३
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

अभियान २३ : लोक (लोकोक्ति-मुहावरा पर्व)

समाचार
* विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर *
२३ वाँ दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान : लोक पर्व (लोकोक्ति / कहावतें और मुहावरे)
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जबलपुर २६-५-२०२०।  सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर की प्रमुख साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर ने कोरोना महामारी के कारण प्रभावशील गृहबंदी को सुअवसर में बदलते हुए साहित्यिक प्रवृत्ति के सज्जनों को समूहबद्ध कर दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान की श्रृंखला आरंभ की। आज २३ वाँ दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान : लोक पर्व (लोकोक्ति / कहावतें और मुहावरे) का आयोजन वाग्देवी तथा विघ्नेश्वर वंदना के पश्चात् संगीत जगत की प्रतिभा माधुरी मिश्रा जी को मुखिया तथा शाने-अवध लखनऊ से पधारे इंजी. साहित्यकार अमरनाथ जी  को पाहुने की आसंदी पर आसीन कर आरंभ हुआ। कोकिलकंठी गायोंका मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने महाप्राण निराला रचित कालजयी सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। विषय प्रवर्तन करते हुए आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने लोकोक्ति व् मुहावरों को परिभाषित करते हुए उनके उद्गम व उनमें अंतर पर प्रकाश डाला। सलिल जी ने मुहावरों का प्रयोग कर लिखे गए दोहों और षट्पदी की प्रस्तुति कर श्रोताओं से प्रशंसा पाई। 
प्रीति मिश्रा ने बचपन में सुनी लोकोक्ति 'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' की चर्चा करते हुए उसके मूल में छिपी कहानी कही। युवा सारांश गौतम ने विविध लोकोक्तियों में निहित व्यंग्यार्थों की चर्चा की। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने विषय पर सरस चर्चा की। सिरोही राजस्थान से पधारे छगनलाल गर्ग 'विज्ञ' ने राजस्थानी कहावत-लोकोक्तियों व मुहावरे के पृष्ठभूमि में अनुभव हुए विलक्षणता  को आवश्यक बताया। पीताम्बरा माता के धाम दतिया से पधारे डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' ने रचनाकारों में सतत बढ़ती व्यंजनात्मकता को इंगित करते हुए मुहावरे को अर्थ चमत्कारकारी बताया। सिद्धेश्वरी सराफ 'शीलू' ने कबीर साहित्य में मुहावरों को इंगित किया। सपना सराफ ने 'कै हंसा मोती चुने, कै भूखे मर जाए ' का विश्लेषण किया। डॉ. मुकुल तिवारी ने लोकोक्ति व् मुहावरे के साथ  की भी चर्चा की। छाया सक्सेना ने बघेली लोकोक्तियों पर प्रकाश डाला। प्रसिद्ध समीक्षक इंजी सुरेंद्र सिंह पवार ने बुंदेलखंडी लोक मान्यताओं और लोक विश्वासों से उपजी  कहावत-मुहावरों के साथ 'बुझौअल' पर प्रकाश डाला। 
'जय जुहार' के अभिवादन के साथ पधारी धन के कटोरा रायपुर से रजनी शर्मा ने छत्तीसगढ़ी ''हाना'' (कहावतों) की चर्चा की तथा पूरा वक्तव्य छत्तीसगढ़ी में दिया। विदुषी डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने कहावतों और मुहावरों को सभ्यता का पाठ बताया। गुड़गाँव हरयाणा से सम्मिलित हुए भारतीय वायु सेना के से.नि. ग्रुपकेप्टन श्यामल सिन्हा ने मुहावरों को भाषा को जीवंत बनानेवाला कारक बताया। इंजी अरुण भटनागर ने घाग-भड्डरी की कृषि व् मौसम संबंधी कहावतों पर प्रकाश डाला। डॉ. संतोष शुक्ला ग्वालियर ने बृज कहावतों की रोचक प्रस्तुति की। विख्यात हिंदी-बुंदेली साहित्यकार लक्ष्मी शर्मा ने विविध कहवतों को प्रस्तुत कर उनकी पृष्ठभूमि की सरस चर्चा की। पानीपत से पधारी मंजरी शर्मा ने कहावतों से संबंधित कहानी सुनाई। डॉ. भावना दीक्षित ने लोकोक्ति पर्व के आयोजन की अभिनवता को उल्लेख्य बताया। जपला झारखंड की प्रतिनिधि रेखा सिंह ने लोकोक्तियों को लोक चेतना का प्रतीक बताया। भारती नरेश पाराशर ने अभियान के सारस्वत अनुष्ठान को विशेष उपयोगी बताते हुए महावरों को कथ्य को प्रभावी बनानेवाला तत्व कहा। 
मनोरमा जैन पाखी भिंड ने आम बोलचाल में प्रयुक्त कहावतों और लोकोक्तियों को गागर में सागर बताया। दमोह से आयी मनोरमा रतले ने देश काल परिस्थिति को व्याख्यायित करने में लोकोक्तियों को सक्षम बताया। चंदा देवी स्वर्णकार ने बात-बात में लोकोक्तियों और कहावतों के प्रयोग को स्वस्थ्य मनोरंजन संपन्न बताया। प्रो आलोकरंजन पलामू झारखंड ने लोकोक्तियों और मुहावरों को सोनेवाले को जगाने में सक्षम बताया। ख्यात बुंदेली साहित्यकार और आकाशवाणी उद्घोषक प्रभा विश्वकर्मा 'शील' ने  बुंदेली लोक कथा में नंद-भौजाई की रोचक चर्चा सुनते हुए लोकोक्तियों का मनोहर प्रयोग किया। 
पाहुने की आसंदी से इंजी अमरनाथ लखनऊ ने विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान के इस सारस्वत अनुष्ठान को साहित्य जगत में नए आयाम स्थापित करने वाला, सारगर्भित विचारों से साहित्यिक इतिहास रचनेवाला निरूपित किया। अध्यक्षीय आसंदी से माधुरी मिश्रा जी संस्थापक गूँज संस्था ने विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के संस्थापक-संयोजक सलिल जी व् सब सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भाषा की शक्ति और उपयोगिता वृद्धि में मुहावरों और कहावतों की भूमिका को बिहारी के दोहों की तरह बताया। इंजी अरुण भटनागर ने मुखिया माधुरी जी, पाहुना अमरनाथ जी तथा सभी सहयोगियों को प्रदत्त सहयोग हेतु आभार देते हुए भविष्य में योगदान की कामना की। समापन के पूर्व स्वतंत्रता सत्याग्रही सुकवि माणिकलाल चौरसिया के १०७ वे जयन्ती पर तथा गुरु अर्जन देव स्मृति दिवस पर श्रद्धांजलि दी गई। 
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