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सोमवार, 22 जुलाई 2019

मनहरण घनाक्षरी छन्द

मनहरण घनाक्षरी छन्द
विधान: ८-८-८-७ वर्ण 
.
चीनियों को ठोंककर, पाकियों को पीटकर, 
फ़हरा तिरंगा आज, हम मुसकायेगे.
जन गण मन, वंदे मातरम गायेंगे.
सिक्किम भूटान नेपाल की न बात करो,
तिब्बत को भी फिर से, आजाद हम करायेंगे.
भारत से भाग किसी वक्त जो अलग हुए,
एक साथ जोड़ आर्यावर्त हम बनायेंगे.
*

मुकतक महिला क्रिकेट

मुकतक महिला क्रिकेट
*
दीप्ति तम हरकर उजाला बाँट दे 
अब न शर्मा शतक से तम छांट दे
दस दिशाओं से सुनो तुम तालियाँ 
फाइनल लो जीत धोबीपाट दे
*
एकता है तो मिलेगी विजय भी
गेंद की गति दिशा होगी मलय सी
खाए चक्कर ब्रिटिश बल्लेबाज सब 
तिरंगा फ़हरा सके, हो जयी भी
*
स्मृति का बल्ला चला, गेंद हुई रॉकेट.
पलक झपकते नभ छुए, गेंदबाज अपसेट.
*
दीप्ति कौंधती दामिनी, गिरे उड़ा दे होश.
चमके दमके निरंतर, कभी न रीते कोश.
*
पूनम उतरी तो हुई,  अजब अनोखी बात.
घिरे विपक्षी तिमिर में,  कहें अमावस तात.
*
शर संधाना तो हुई, टीम विरोधी ढेर. 
मंधाना के वार से,  नहीं किसी की खैर
२२.७.२०१७ 
***

नवगीत कारे बदरा



नवगीत
कारे बदरा 
*
आ रे कारे बदरा
*
टेर रही धरती तुझे 
आकर प्यास बुझा 
रीते कूप-नदी भरने की 
आकर राह सुझा 
ओ रे कारे बदरा 
*
देर न कर अब तो बरस 
बजा-बजा तबला 
बिजली कहे न तू गरज 
नारी है सबला 
भा रे कारे बदरा 
*
लहर-लहर लहरा सके 
मछली के सँग झूम 
बीरबहूटी दूब में 
नाचे भू को चूम 
गा रे कारे बदरा 
*
लाँघ न सीमा बेरहम 
धरा न जाए डूब 
दुआ कर रहे जो वही 
मनुज न जाए ऊब 
जारे कारे बदरा 
*
हरा-भरा हर पेड़ हो 
नगमे सुना हवा 
'सलिल' बूंद नर्तन करे 
गम की बने दवा
जारे कारे बदरा
*****
२२-७-२०१६

दोहा-यमक

दोहा-यमक 
*
गले मिले दोहा यमक, गणपति दें आशीष। 
हो समृद्ध गणतंत्र यह, गणपति बने मनीष।। 
*
वीणावादिनि शत नमन, साध सकूं कुछ राग ।
वीणावादिनि है विनत, मन में ले अनुराग। ।
*
अक्षर क्षर हो दे रहा, क्षर अक्षर ज्ञान।
शब्द ब्रह्म को नमन कर, भव तरते मतिमान।।
*
चित्र गुप्त है चित्र में, देख सके तो देख।
चित्रगुप्त प्रति प्रणत हो, अमिट कर्म का लेख।।
*
दोहा ने दोहा सदा, भाषा गौ को मीत।
गीत प्रीत के गुँजाता, दोहा रीत पुनीत।।
*
भेंट रहे दोहा-यमक, ले हाथों में हार।
हार न कोई मानता, प्यार हुआ मनुहार।।
*
नीर क्षीर दोहा यमक, अर्पित पिंगल नाग।
बीन छंद, लय सरस धुन, झूम उठे सुन नाग।।
*
गले मिले दोहा-यमक, झपट झपट-लिपट चिर मीत।
गले भेद के हिम शिखर, दमके ऐक्य पुनीत।।
*
ग्यारह-तेरह यति रखें, गुरु-लघु हो पद अंत।
जगण निषिद्ध पदादि में, गुरु-लघु सम यति संत।।
*
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक पीछे भाग।
ना मन में अनुराग रख, ना तन में बैराग।।
*
ना हक की तू माँग कर, कर पहले कर कर्तव्य।
नाहक भूला आज को, सोच रहा भवितव्य।।
*

नवगीत : का बिगार दओ

नवगीत :
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें 
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ

पीजा मान्साहार

पीजा मान्साहार है...
मोजरेला चीज़ Mozzarella व अन्य प्रकार के पनीर जिनसे पिज़्ज़ा या पीज़ा या अन्य विदेशी व्यंजन बनते हैं, शाकाहारी नहीं हैं।
पश्चिमी फैशन के मारे हुए हमारे भारतीय भाई बड़े शौक से पीज़ा खाते हैं क्योंकि पीज़ा पर शाकाहार की हरी मुहर लगी होती है।
लेकिन बेचारे नादान यह नहीं जानते कि ‘वेज़ पीज़ा’ नाम की कोई वस्तु इस संसार में है ही नहीं क्योंकि पीजा के ऊपर चिपचिपाहट के लिए जो पनीर (चीज़) बिछाई जाती है, उस पनीर (चीज़) में गाय के नवजात बछड़े के पेट का रस (रेनेट Rennet) मिला हुआ होता है।
Mozzarella di bufala is traditionally produced solely from the milk of the domestic Buffalo.
A whey starter is added from the previous batch that contains thermophilic bacteria, and the milk is left to ripen so the bacteria can multiply.
Then, rennet is added to coagulate the milk.
After coagulation, the curd is cut into large, 1″–2″ pieces, and left to sit so the curds firm up in a process known as healing.
रेनेट Rennet डाले बिना पिजा-चीज़ चिपचिपी नहीं बन सकती अर्थात् सभी पीज़ा मांसाहारी नॉन-वेज़ (गाय के मांस के रस से युक्त) होते हैं।
यदि पीजा घर में बनाया जाए तो शाकाहारी भी हो सकता है क्योंकि हम उस मांसाहारी पनीर (चीज़) की जगह पर घरेलू पनीर का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन शायद उसमें वो बात ना बने !
Rennet is a complex of enzymes produced in any mammalian stomach, and is often used in the production of cheese.
Rennet contains many enzymes, including a proteolytic enzyme (protease) that coagulates the milk, causing it to separate into solids (curds) and liquid (whey).
They are also very important in the stomach of young mammals as they digest their mothers’ milk.
The active enzyme in rennet is called chymosin or rennin (EC 3.4.23.4) but there are also other important enzymes in it, e.g., pepsin and lipase.
हार्ड-चीज़ के अलावा अन्य पनीर (चीज़) भी ज्यादातर गौमांस युक्त है।
भारत में शायद अभी संभव नहीं है लेकिन विदेशी बाज़ार में इटली की ‘मासकरपोने क्रीम-चीज़’ मिल जाती है जो केवल दुग्ध उत्पाद से बनी है पर यह मासकरपोने आम पनीर (चीज़) से 4-5 गुना मंहगी होती है।
कई सालों से ऐसी पनीर (चीज़) की तलाश की गई पर इसके अलावा दूसरी कोई पनीर (चीज़) नहीं मिली।
हर पनीर (चीज़) में जाने-अंजाने या वज़ह-बेवज़ह गौमांस है।
कुछ ऐसी पनीर (चीज़) कंपनी भी हैं जो गाय की आँतो के साथ-साथ गाय की हड्डी भी पनीर (चीज़) में डालती हैं।
गाय की हड्डी डालने से पनीर (चीज़) देखने में इकसार लगती है (पीज़े में डलने से पहले)।
उपभक्ता को मूर्ख बनाने के लिये पैकिंग के ऊपर गाय की हड्डी को लिखा जाता है।
वैसे यह रसायन ‘कैलसियम क्लोराईड’ या ‘E509′ प्राकृतिक रूप से भी प्राप्त किया जा सकता है या कारखाने में बनाया जा सकता है.
हार्ड-पनीर (चीज़) जैसी ही एक पनीर (चीज़) होती जिसे परमिजान कहते हैं, कुछ लोगों को भ्रम है कि परमिजान शाकाहारी है, लेकिन ऐसा नहीं है।
हाँ शायद एक-आध कंपनी हैं जो कि गाय की आँतों की बजाए बकरे की आँत परमिजान-चीज़ में डालती हैं लेकिन इसके अलावा और क्या-क्या है उस पनीर (चीज़) में, इस बारे में अभी कोई सन्तोषजनक जानकारी नहीं है।
बी.बी.सी. के रसोई वाली साइट पर परमिज़ान को शाकाहारी भाजन में शामिल किया गया है लेकिन दूसरी जगह उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि परमिजान चीज़ हमेशा शाकाहारी नहीं होता।
पनीर
हम जो पनीर बाज़ार से ख़रीद कर खाते हैं वो भी भरोसेमन्द नहीं है। क्योंकि दूध फाड़ कर पनीर बनाने का जो सबसे सफल रसायन है, जिसका इस्तेमाल अधिकांश पेशेवर लोग करते हैं। वो वास्तव में रसायन नहीं बल्कि गाय के नवजात शिशु का पाचन तन्त्र है।
अगर हम पनीर बनाने के लिए दूध में नीम्बू का रस, टाटरी या सिट्रिक एसिड डालते हैं तो दूध इतनी आसानी से नहीं फटता जितना कि उस अंजान रसायन से, फिर घरेलू पनीर में खटास भी होती है, बाज़ार के पनीर की तुलना में जल्दी खट्टा या ख़राब हो जाता है।
इस रसायन की यही पहचान है कि पनीर जल्दी ख़राब या खट्टा नही होता और हमारी सबसे बड़ी यह समस्या यह है कि किसी भी लेबोटरी टेस्ट से यह नहीं जाना जा सकता कि पनीर को बनाने के लिए गाय के शिशु की आँतों का इस्तेमाल किया गया है क्योंकि गाय के शिशु की आँतें दूध के फटने पर पनीर से अलग हो कर पानी में चली जाती हैं।
इसका बहुत कम (नहीं के बराबर) अंश ही पनीर में बचता है।
यह पानी जो दूध फटने पर निकलता है इसे विदेशों में मट्ठा या छाज (whey) कह कर बेचते हैं।
शाकाहारी जन कृपा करके यह विदेशी मट्ठा कभी न ख़रीदें। इसलिए बाज़ारू पनीर (सभी प्रकार के पनीर) से भी सावधान रहें। दूध, क्रीम, मक्खन, दही तथा दही की तरह ही दूध से बने (खट्टे) उत्पादों के अतिरिक्त विदेशों में बिक रहे लगभग सभी अन्य दुग्ध-उत्पाद मांसाहारी हैं। ज्यादातर मरगारीन भी मांसाहारी ही है।

नवगीतः सुग्गा बोलो

नवगीतः
सुग्गा बोलो
सन्जीव
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्‍ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*

कार्यशाला : घनाक्षरी

कार्यशाला : घनाक्षरी
माँ कोख में न मारिए, गोद में ले दुलारिए, प्यार से पुचकारिए, बेटी उपहार है। सजाती घर आँगन, बहाती रस पावन, लगती मनभावन, घर की शृंगार है। तपस्वी साधिका वह, श्याम की राधिका वह ब्रज की वाटिका वह, बरसाती प्यार है दो कुल की शान बेटी, देश की गुमान बेटी, माँ की अभिमान बेटी अमि रसधार है।
*
विमर्श: सरस्वती कुमारी रचित उक्त मनहरण
घनाक्षरी में ८-८-८-७ का वर्ण संतुलन होते हुए
भी लय का अभाव है। उनकर आग्रह पर कुछ
बदलाव के साथ इसे पढ़िए और परिवर्तनों का
कारण व प्रभाव समझिये।
कोख में न मारिए माँ, गोद में दुलारिए भी,
प्यार से पुकार कहें, बेटी उपहार है। शोभा घर-अँगना की, बहे स्नेह सलिला सी, लगे मनभावन, ये घर का शृंगार है। तापसी है साधिका है, गोकुल की राधिका है, शिवानी भवानी भी है, बरसाती प्यार है। दो कुलों की शान बेटी, देश का गुमान बेटी, माँ की अभिमान बेटी, अमि रसधार है।

नवगीत मेरे पुरखों

एक नवगीत
तुम्हें प्रणाम
*
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
सूक्ष्म काय थे,
चित्र गुप्त विधि ,
अणु-परमाणु-विषाणु विष्णु हो धारे तुमने।
कोष-वृद्धि कर
'श्री' पाई है।
जल-थल--नभ पर
कीर्ति-पताका
फहराई है।
पंचतत्व तुम
नाम अनाम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
भू-नभ
दिग्दिगंत यश गाते।
भूत-अभूत तुम्हीं ने नाते, बना निभाए।
द्वैत दिखा,
अद्वैत-पथ वरा।
कहा प्रकृति ने
मनुज है खरा।
लड़, मर-मिटे
सुरासुर लेकिन
मिलकर जिए
रहे तुम आम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
धरा-पुत्र हे!
प्रकृति-मित्र हे!
गही विरासत हाय! न हमने, चूक यही।
रौंद प्रकृति को
'ख़ास' हो रहे।
नाश बीज का
आप बो रहे।
खाली हाथों
जाना फिर भी
जोड़ मर रहे
विधि है वाम।
***

रविवार, 21 जुलाई 2019

महिला क्रिकेट

महिला क्रिकेट
*
जा विदेश में बोलिए,
हिन्दी तब हो गर्व. 
क्या बोला सुन समझ लें,
भारतीय हम सर्व.
*
चौको से यारी करो,
छक्को से हो प्यार. 
शतक साथ डेटिग करो, 
मीताली सौ बार.
*
खेलो हर स्ट्रोक तुम, 
पीटो हँस हर गेंद.
गेंदबाज भयभीत हो, 
लगा न पाए सेंध.
*
दस हजार का लक्ष्य ले, 
खेलो धरकर धीर.
खेल नायिका पा सको, 
नया नाम रन वीर.
*
कर किताब से मित्रता,
रह तनाव से दूर. 
शान्त चित्त खेलो क्रिकेट,
मिले वाह भरपूर.
*
राज मिताली राज का, 
तूफानी रफ़्तार.
राज कर रही विकेट पर,
दौड़ दौड़ हर बार.
*
अंग्रेजी का मोह तज,
कर हिन्दी में बात.
राज दिलों पर राज का, 
यह मीताली राज.
*
चौको छक्को की करी, 
लगातार बरसात.
हक्का बक्का रह गए,
कंगारू खा मात.
*
हरमन पर हर मन फिदा,
खूब दिखाया खेल.
कंगारू पीले पड़े, 
पल में निकला तेल.
*
सरहद सारी सुरक्षित,
दुश्मन फौज फ़रार.
पता पड़ गया आ रही,
हरमन करने वार.
*
हरमन ने की दनादन,
चोट, चोट पर चोट.
दीवाली की बम लडी,
ज्यों करती विस्फ़ोट.
*
गेंदबाज चकरा गए, 
भूले सारे दाँव.
पंख उगे हैं गेंद के, 
या ऊगे हैं पाँव.
या ऊगे हैं पाँव 
विकेटकीपर को भूली.
आँख मिचौली खेल,
भीड़ के हाथों झूली.
हरमन से कर प्रीत,
शोट खेल में छा गए.
भूले सारे दाँव,
गेंदबाज चकरा गए.

***
२०१७ 

दोहा - सोरठा गीत पानी की प्राचीर



दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित 
हर, कर दे बे-पीर।। 
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को। 
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
* 
सकें मछलियाँ नाच, 
पोखर - ताल भरे रहें। 
प्रणय पत्रिका बाँच, 
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर। 
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
* 
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब। 
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
***
२०-७-२०१६ 
-----------------

मुक्तिका



मुक्तिका 
*
कल दिया था, आज लेता मैं सहारा 
चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा 
सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी 
जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा 
देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है 
चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा 
पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले 
थाम छड़ियाँ खड़ा पैरों पर दुबारा 
साथ दे जो मुसीबत में वही अपना
दूर बैठा गैर, चुप देखे नज़ारा
मैं नहीं निर्जीव, हूँ संजीव जिसने 
अवसरों को खोजकर फिर-फिर गुहारा 
शक्ति हो तब संग जब कोशिश करें खुद 
सफलता हो धन्य जब मुझको निहारा 
*

द्विपदी / दोहे

द्विपदी / दोहे
*
गौर गुरु! मीत की बातों पे करो 
दिल किसी का दुखाना ठीक नहीं
*
श्री वास्तव में हो वहीं, जहां रहे श्रम साथ
जीवन में ऊन्चा रखे श्रम ही हरदम माथ
*
खरे खरा व्यव्हार कर, लेते हैं मन जीत
जो इन्सान न हो खरे, उनसे करें न प्रीत.
*
गौर करें मन में नहीं, 'सलिल' तनिक हो मैल
कोल्हू खीन्चे द्वेष का, इन्सां बनकर बैल
*
काया की माया नहीं जिसको पाती मोह, 
वही सही कायस्थ है, करे गलत से द्रोह.

सोरठा - दोहा गीत

सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही। 
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
***
२०-७-२०१६
---------------
दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित
हर, कर दे बे-पीर।।
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को।
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
सकें मछलियाँ नाच,
पोखर - ताल भरे रहें।
प्रणय पत्रिका बाँच,
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब।
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
***
२०-७-२०१६
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शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

हास्य सलिला: याद

हास्य सलिला:
याद
संजीव 'सलिल'
*
कालू से लालू कहें, 'दोस्त! हुआ हैरान.
घरवाली धमका रही, रोज खा रही जान.
पीना-खाना छोड़ दो, वरना दूँगी छोड़.
जाऊंगी मैं मायके, रिश्ता तुमसे तोड़'
कालू बोला: 'यार! हो, किस्मतवाले खूब.
पिया करोगे याद में, भाभी जी की डूब..
बहुत भली हैं जा रहीं, कर तुमको आजाद.
मेरी भी जाए कभी प्रभु से है फरियाद..'
____________________

आर्द्रा छंद

छंद सलिला
आर्द्रा छंद
संजीव
*

द्विपदीय, चतुश्चरणी, मात्रिक आर्द्रा छंद के दोनों पदों पदों में समान २२-२२ वर्ण तथा ३५-३५ मात्राएँ होती हैं. प्रथम पद के २ चरण उपेन्द्र वज्रा-इंद्र वज्रा (जगण तगण तगण २ गुरु-तगण तगण जगण २ गुरु = १७ + १८ = ३५ मात्राएँ) तथा द्वितीय पद के २ चरण इंद्र वज्रा-उपेन्द्र वज्रा (तगण तगण जगण २ गुरु-जगण तगण तगण २ गुरु = १८ + १७ = ३५ मात्राएँ) छंदों के सम्मिलन से बनते हैं.
उपेन्द्र वज्रा फिर इंद्र वज्रा, प्रथम पंक्ति में रखें सजाकर
द्वितीय पद में सह इंद्र वज्रा, उपेन्द्र वज्रा कहे हँसाकर
उदाहरण:
१. कहें सदा ही सच ज़िंदगी में, पूजा यही है प्रभु जी! हमारी
रहें हमेशा रत बंदगी में, हे भारती माँ! हम भी तुम्हारी
२. बसंत फूलों कलियों बगीचों, में झूम नाचा महका सवेरा
सुवास फ़ैली वधु ज्यों नवेली, बोले अबोले- बस में चितेरा
३. स्वराज पाया अब भारतीयों, सुराज पाने बलिदान दोगे?
पालो निभाओ नित नेह-नाते, पड़ोसियों से निज भूमि लोगे?
कहो करोगे मिल देश-सेवा, सियासतों से मिल पार होगे?
नेता न चाहें फिर भी दलों में, सुधार लाने फटकार दोगे?
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

त्रिभंगी सलिला: हम हैं अभियंता

त्रिभंगी सलिला:
हम हैं अभियंता
संजीव
*
(छंद विधान: १० ८ ८ ६ = ३२ x ४)
*
हम हैं अभियंता नीति नियंता, अपना देश सँवारेंगे
हर संकट हर हर मंज़िल वर, सबका भाग्य निखारेंगे
पथ की बाधाएँ दूर हटाएँ, खुद को सब पर वारेंगे
भारत माँ पावन जन मन भावन, श्रम-सीकर चरण पखारेंगे
*
अभियंता मिलकर आगे चलकर, पथ दिखलायें जग देखे
कंकर को शंकर कर दें हँसकर मंज़िल पाएं कर लेखे
शशि-मंगल छूलें, धरा न भूलें, दर्द दीन का हरना है
आँसू न बहायें , जन-गण गाये, पंथ वही तो वरना है
*
श्रम-स्वेद बहाकर, लगन लगाकर, स्वप्न सभी साकार करें
गणना कर परखें, पुनि-पुनि निरखें, त्रुटि न तनिक भी कहीं वरें
उपकरण जुटाएं, यंत्र बनायें, नव तकनीक चुनें न रुकें
आधुनिक प्रविधियाँ, मनहर छवियाँ, उन्नत देश करें
*
नव कथा लिखेंगे, पग न थकेंगे, हाथ करेंगे काम काम सदा
किस्मत बदलेंगे, नभ छू लेंगे, पर न कहेंगे 'यही बदा'
प्रभु भू पर आयें, हाथ बटायें, अभियंता संग-साथ रहें
श्रम की जयगाथा, उन्नत माथा, सत नारायण कथा कहें
================================
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma
'salil'

हरिगीतिका सलिला

हरिगीतिका सलिला
संजीव
*
(छंद विधान: १ १ २ १ २ x ४, पदांत लघु गुरु, चौकल पर जगण निषिद्ध, तुक दो-दो चरणों पर, यति १६-१२ या १४-१४ या ७-७-७-७ पर)
*
कण जोड़ती, तृण तोड़ती, पथ मोड़ती, अभियांत्रिकी
बढ़ती चले, चढ़ती चले, गढ़ती चले, अभियांत्रिकी
उगती रहे, पलती रहे, खिलती रहे, अभियांत्रिकी
रचती रहे, बसती रहे, सजती रहे, अभियांत्रिकी
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नव रीत भी, नव गीत भी, संगीत भी, तकनीक है
कुछ हार है, कुछ प्यार है, कुछ जीत भी, तकनीक है
गणना नयी, रचना नयी, अव्यतीत भी, तकनीक है
श्रम मंत्र है, नव यंत्र है, सुपुनीत भी तकनीक है
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यह देश भारत वर्ष है, इस पर हमें अभिमान है
कर दें सभी मिल देश का, निर्माण यह अभियान है
गुणयुक्त हों अभियांत्रिकी, श्रम-कोशिशों का गान है
परियोजना त्रुटिमुक्त हो, दुनिया कहे प्रतिमान है
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गीत: ज्ञान सुरा पी

गीत:
ज्ञान सुरा पी.…
संजीव
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ज्ञान सुरा पी बहकें ज्ञानी,
श्रेष्ठ कहें खुद को अभिमानी।
निज मत थोप रहे औरों पर-
सत्य सुनें तो मरती नानी…
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हाँ में हाँ चमचे करते हैं,
ना पर मिल टूटे पड़ते हैं.
समाधान स्वीकार नहीं है-
सद्भावों को चुभ-गड़ते हैं.
खुद का खुद जयकारा बोलें
कलह करेंगे मन में ठानी…
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हिंदी की खाते हैं रोटी,
चबा रहे उर्दू की बोटी.
अंग्रेजी के चाकर मन से-
तनखा पाते मोटी-मोटी.
शर्म स्वदेशी पर आती है
परदेशी इनके मन भानी…
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मोह गौर का, असित न भाये,
लख अमरीश अकल बौराये.
दिखे चन्द्रमा का कलंक ही-
नहीं चाँदनी तनिक सुहाये.
सहज बुद्धि को कोस रहे हैं
पी-पीकर बोतल भर पानी…
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(असितांग = शिव का एक रूप, असित = अश्वेत, काला (शिव, राम, कृष्ण, गाँधी, राजेन्द्र प्रसाद सभी अश्वेत), असिताम्बुज = नील कमल
अमर = जिसकी मृत्यु न हो. अमर + ईश = अमरीश = देवताओं के ईश = महादेव. वाग + ईश = वागीश।)

कुछ दोहे अनुप्रास के

दोहा सलिला:
कुछ दोहे अनुप्रास के
संजीव
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अजर अमर अक्षर अमित, अजित असित अवनीश
अपराजित अनुपम अतुल, अभिनन्दन अमरीश
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अंबर अवनि अनिल अनल, अम्बु अनाहद नाद
अम्बरीश अद्भुत अगम, अविनाशी आबाद
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अथक अनवरत अपरिमित, अचल अटल अनुराग
अहिवातिन अंतर्मुखी, अन्तर्मन में आग
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आलिंगन कर अवनि का, अरुण रश्मियाँ आप्त
आत्मिकता अध्याय रच, हैं अंतर में व्याप्त
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अजब अनूठे अनसुने, अनसोचे अनजान
अनचीन्हें अनदिखे से,अद्भुत रस अनुमान
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अरे अरे अ र र र अड़े, अड़म बड़म बम बूम
अपनापन अपवाद क्यों अहम्-वहम की धूम?
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अकसर अवसर आ मिले, बिन आहट-आवाज़
अनबोले-अनजान पर, अलबेला अंदाज़
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