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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

८*निकष पर: काल है संक्रांति का 

[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आई.एस.बी.एन. ८१-७७६-१०००-७, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल',प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, सजिल्द पुस्तकालय संस्करण ३००/-, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, समन्वय प्रकाशन, ४०१  विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com]

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राकेश खंडेलवाल, कनाडा   

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जिस संक्रान्ति काल की अब तक जलती हुई प्रतीक्षायें थीं
आज समय के वृहद भाल पर वह हस्ताक्षर बन कर उभरा
नवगीतों ने नवल ताल पर किया नई लय का अन्वेषण
एक छन्द में हुआ समाहित बरस-बरस का अन्तर्वेदन
सहज शब्द में गुँथा हुआ जो भाव गूढ़, परिलक्ष हो रहा
उपन्यास जो कह न सके हैं, वह रचना में व्यक्त हो रहा

शारद की वीणा के तारों की झंकृत होती सरगम से
सजा हुआ हर वाक्य, गीत में मुक्तामणियों जैसा सँवरा

हर रस के भावों को विस्तृत करते हुये शतगुणितता में
शब्द और उत्तर दोनों ही चर्चित करते हर कविता में

एक शारदासुत के शब्दों का गर्जनस्वर और नियोजन
वाक्य-वाक्य में मंत्रोच्चारों सा परिवर्तन का आवाहन

जनमानस के मन में जितना बिखरा सा अस्पष्ट भाव था
बहते हुये सलिल-धारा में शतदल कमल बना, खिल निखरा

अलंकार के स्वर्णाभूषण, मधुर लक्षणा और व्यंजना
शब्दों की संतुलित प्रविष्टि कर, हाव-भाव से छंद गूँथना

सहज प्रवाहित काव्य सुधामय गीतों की अविरल रस धारा
जितनी बार पढो़, मन कहता एक बार फिर पढें दुबारा

इतिहासों पर रखी नींव पर नव-निर्माण नई सोचों का
नई कल्पना को यथार्थ का दिया कलेवर इसने गहरा.

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चंद्रसेन विराट, इंदौर 

                   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वह चमकदार हस्ताक्षर हैं जो साहित्य की कविता विधा में तो चर्चित हैं ही किंतु उससे कहीं अधिक वह सोशल मीडिया के फेसबुक आदि माध्यमों पर बहुचर्चित, बहुपठित और बहुप्रशंसित है। वे जाने-माने पिंगलशास्त्री भी हैं, और तो और उन्होंने उर्दू के पिंगलशास्त्र 'उरूज़' को भी साध लिया है। काव्य-शास्त्र में निपुण होने के अतिरिक्त वे पेशे से सिविल इंजिनियर रहे हैं। मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यपालन यंत्री के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। यही नहीं वे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अधिवक्ता भी रहे हैं। इसके पूर्व उनके चार ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। यह पाँचवी कृति 'काल है संक्रांति का' गीत-नवगीत संग्रह है। 'दिव्य नर्मदा' सहित अन्य अनेक पत्रिकाओं का सफल संपादन करने के अतिरिक्त उनके खाते में कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन अंकित है। गत तीन दशकों से वे हिंदी के जाने-माने प्रचलित और अल्प प्रचलित पुराने छंदों की खोज कर उन्हें एकत्रित कर रहे हैं और आधुनिक काल के अनुरूप परिनिष्ठित हिंदी में उनके आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। यही उनके सारस्वत कार्य का वैशिष्ट्य है जो उन्हें लगातार चर्चित रखता आया है। फेसबुक तथा अंतरजाल के अन्य कई वेब-स्थलों पर छंद और भाषा-शिक्षण की उनकी पाठशाला / कार्यशाला में कई-कई नव उभरती प्रतिभाओं ने अपनी जमीन तलाशी है।

                   १२७ पृष्ठीय इस गीत-नवगीत संग्रह में उन्होंने अपनी ६५ गीति रचनाएँ सम्मिलित की हैं। उल्लेखनीय है कि संग्रह में किसी की भूमिका नहीं है। और तो और स्वयं कवि की ओर से भी कुछ नहीं लिखा गया है। पाठक अनुक्रम देखकर सीधे कवि की रचनाओं से साक्षात्कार करता है। यह कृतियों के प्रकाशन की जानी-मानी रूढ़ियों को तोड़ने का स्वस्थ्य उपक्रम है और स्वागत योग्य भी है। उल्लेख्य है कि उन्होंने किसी-किसी रचना के अंत में प्रयुक्त छंद, यथा पृष्ठ २९, ५६, ६३, ६५, ६७ आदि। गीत रचना को हर बार नएपन से मण्डित करने की कोशिश कवि ने की है जिसमें 'छंद' का नयापन एवं 'कहन' का नयापन स्पष्ट दिखाई देता है। सूरज उनका प्रिय प्रतीक रहा है और कई गीत सूरज को लेकर रचे गए हैं। 'काल है संक्रांति का, तुम मत थको सूरज', 'उठो सूरज! गीत गाकर , हम करें स्वागत तुम्हारा', 'जगो सूर्य आता है लेकर अच्छे दिन', 'उगना नित, हँस सूरज!', 'आओ भी सूरज!, छँट गए हैं फूट के बादल', 'उग रहे या ढल रहे तुम, कान्त प्रतिपल रहे सूरज', सूरज बबुआ चल स्कूल', 'चंद्र-मंगल नापकर हम चाहते हैं छुएँ सूरज' आदि। कविताई की नवता के साथ रचे गए ये गीत-नवगीत कवि-कथन की नवता की कोशिश के कारण कहीं-कहीं अत्यधिक यत्नज होने से सहजता को क्षति पहुँची है। इसके बावजूद छंद की बद्धता, उसका निर्वाह एवं कथ्य में नवता के कारण इन गीत रचनाओं का स्वागत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

डॉ. श्याम गुप्त, लखनऊ -

                   ‘काल है संक्रांति का’ की सार्थकता का प्राकट्य मुखपृष्ठ एवं शीर्षक से ही हो जाता है| वास्तव में ही यह संक्रांति-काल है, सभी जन व वर्ग भ्रमित अवस्था में हैं| एक और अंग्रेज़ी का वर्चस्व, चमक-धमक वाली विदेशी संस्कृति दूर से सुहानी लगती है; दूसरी और हिंदी –हिंदुस्तान का, भारतीय स्व संस्कृति का प्रसार जो विदेश बसे को भी अपनी मिट्टी की और खींचता है| समन्वय ही उचित पंथ है।  सलिल जी की साहित्यिक समन्वयक दृष्टि का एक उदाहरण है- "गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचानें|" सलिल जी लक्षण शास्त्री हैं| साहित्य, छंद आदि के प्रत्येक भाव, भाग-विभाग का व्यापक ज्ञान व वर्णन कृति में है| विभिन्न छंदों, मूलतः सनातन छंदों– दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्ह छंद, लोकधुनों के आधार पर नवगीत रचना दुष्कर कार्य है| वस्तुतः ये विशिष्ट नवगीत हैं, प्रायः रचे जाने वाले अस्पष्ट संदेश वाले तोड़-मरोड़कर लिखे जानेवाले नवगीत नहीं हैं| सोरठा पर आधारित एक गीत देखें- ‘आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता| / करता नहीं ख़याल, नयन कौन सा फड़कता||’ कृति की भाषा सरल, सुग्राह्य, शुद्ध खड़ीबोली हिंदी व आवश्यकतानुसार भाव-संप्रेषण हेतु देशज व बुंदेली का भी प्रयोग है- यथा ‘मिलती कायं नें ऊंची वारी/ कुरसी हमकों गुइयाँ|’ उर्दू के गज़लात्मक गीत का एक उदाहरण देखें— ‘ख़त्म करना अदावत है / बदल देना रवायत है / ज़िंदगी गर नफासत है / दीन-दुनिया सलामत है|’अधिकाँश रचनाओं में उपदेशात्मक शैली के साथ वर्णानात्मक व व्यंगात्मक शैली भी यथास्थान है | कथ्य-शैली मूलतः अभिधात्मक शब्द भाव होते हुए भी अर्थ-व्यंजना युक्त है | एक व्यंजना देखिये –‘अर्पित शब्द हार उनको / जिनमें मुस्काता रक्षाबंधन’ लक्षणा का भाव देखें– ‘राधा हो या आराधा सत शिव / उषा सदृश्य कल्पना सुंदर|’

विविध अलंकारों की छटा सर्वत्र विकिरित है –‘अनहद अक्षय अजर अमर है /अमित अभय अविजित अविनाशी |’ में अनुप्रास का सौंदर्य है| ‘प्रथा की चूनर न भाती ..’ व उनके पद सरोज में अर्पित / कुमुद कमल सम आखर मनका|’ में उपमा दर्शनीय है| ‘नेता अफसर दुर्योधन, जज वकील धृतराष्ट्र..’ में रूपक की छटा है तो ‘कुमुद कमल सम आखर मनका’ में श्लेष अलंकार है| उपदेशात्मक शैली में रसों की संभावना कम ही रहती है तथापि ओबामा आते, मिलती कायं नें, लेटा हूँ में हास्य-श्रृंगार का प्रयोग है| ‘कलश नहीं आधार बनें हम..’ में प्रतीक व ‘आखें रहते भी सूर’ व ‘पौवारह’ कहावतों के उदाहरण हैं| ‘गोदी चढ़ा उंगलियाँ थामी/ दौड़ा गिरा उठाया तत्क्षण ‘.. में चित्रमय विम्ब-विधान का सौन्दर्य दृष्टिगत है| पुस्तक आवरण के मोड़-पृष्ठ पर सलिल जी के प्रति विद्वानों की राय एवं आवरण व सज्जाकारों के चित्र, आचार्य राजशेखर की काव्य-मीमांसा का उद्धरण एवं स्वरचित दोहे भी अभिनव प्रयोग हैं| वस्तुपरक व शिल्प सौंदर्य के समन्वित दृष्टि भाव से ‘काल है संक्रांति का’ एक सफल कृति है|माँ शारदा से पहले, ब्रह्म रूप में चित्रगुप्त की वंदना भी नवीनता है | कवि की हिंदी भक्ति वंदना में भी छलकती है –‘हिंदी हो भावी जग वाणी / जय जय वीणापाणी’ |

यह कृति लगभग १४ वर्षों के लंबे अंतराल में प्रस्तुत हुई है | इस काल में कितनी विधाएँ आईं–गईं, कितनी साहित्यिक गुटबाजी रही, सलिल मौन दृष्टा की भाँति गहन दृष्टि से देखने के साथ साथ उसकी जड़ों को, विभिन्न विभागों को अपने काव्य व साहित्य-शास्त्रीय कृतित्वों से पोषण दे रहे थे, जिसका प्रतिफल है यह कृति| कितना दुष्कर है बहते सलिल को पन्ने पर रोकना उकेरना | समीक्षा लिखते समय मेरा यही भाव बनता था जिसे मैंने संक्षिप्त में काव्य-रूपी समीक्षा में इस प्रकार व्यक्त किया है-

“शब्द सा है मर्म जिसमें, अर्थ सा शुचि कर्म जिसमें | / साहित्य की शुचि साधना जो, भाव का नव धर्म जिसमें |उस सलिल को चाहता है, चार शब्दों में पिरोना ||” 

राजेंद्र वर्मा, लखनऊ- 

                   ''ये गीत शिल्प और विषय, दोनों में बेजोड़ हैं। संग्रह में लोकगीत, सोहर, हरगीतिका, आल्हा, दोहा, दोहा-सोरठा मिश्रित, सार आदि नए-पुराने छंदों में सुगठित ये गीति-रचनाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति में सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की ख़बर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष-संकल्प को जगर-मगर करती चलती हैं। नवगीत की शक्ति को पहचानकर शिल्प और वास्तु में अधिकाधिक सामंजस्य बिठाकर यथार्थवादी भूमि पर रचनाकार ने आस-पास घटित हो रहे अघट को कभी सपाट, तो कभी प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से उद्घाटित किया है। विसंगतियों के विश्लेषण और वर्णित समस्या का समाधान प्रस्तुत करते अधिकांश गीत टटकी भाव-भंगिमा दर्शाते हैं। बिम्ब-प्रतीक, भाषा और टेक्नीक के स्तरों पर नवता का संचार करते हैं। इनमें ऐंद्रिक भाव भी हैं, पर रचनाकार तटस्थ भाव से चराचर जगत को सत्यम्-शिवम्- सुन्दरम् के वैचारिक पुष्पों से सजाता है। गीतकार ने गीतों की भाषा में अपेक्षित लय सुनिश्चित करने के लिए हिंदी-उर्दू के बोलचाल शब्दों को प्राथमिकता दी है; कहीं-कहीं भावानुसार तत्सम शब्दावली का चयन किया है। अधिकांश गीतों में लोक का पुट दिखलायी देता है जिससे पाठक को अपनापन महसूस होता है। आज हम गद्य की औपचारिक शब्दावली से गीतों की सर्जना करने में अधिक लगे हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि उनमें मार्मिकता और अपेक्षित संवेदना का स्तर नहीं आ पाता है। भोथरी संवेदनावाली कविता से हमें रोमावलि नहीं हो सकती, जबकि आज उसकी आवश्यकता है। ‘सलिल’ जी ने इसकी भरपाई की पुरज़ोर कोशिश की है जिसका हिंदी नवगीत संसार द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए। वर्तमान संग्रह निःसंदेह नवगीत के प्रसार में अपनी सशक्त भूमिका निभा रहा है और आने वाले समय में उसका स्थान इतिहास में अवश्य लिया जाएगा, यह मेरा विश्वास है।... लोक की शक्ति को सोद्देश्य नवगीतों में ढालने हेतु ‘सलिल’ जी साधुवाद के पात्र है।''

रामदेव लाल 'विभोर' लखनऊ-

                   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' विरचित गीत-कृति "काल है संक्रांति का" पैंसठ गीतों से सुसज्जित एक उत्तम एवं उपयोगी सर्जना है। स्वर-देव चित्रगुप्त तथा वीणापाणी वंदना से प्रारंभ कृति के गीतों का अधिकांश कथ्य नव्यता का पक्षधर है- ''नव्यता संप्रेषणों में जान भरती / गेयता संवेदनों का गान करती'' / ''सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती / मर्मबेधकता न हो तो रार ठनती'' / ''लाक्षणिकता, भाव, रस, रूपक सलोने, बिम्ब टटकापन मिले बारात सजती'' / ''नाचता नवगीत के संग लोक का मन / ताल-लय बिन बेतुकी क्यों रहे कथनी?'' ''छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किंतु बन आरोह या अवरोह पलता''-पृष्ठ १३-१४। 'काल है संक्रांति का' शीर्षक बेजोड़ गीत में सूरज को प्रतीक रूप में रख दक्षिणायन की सूर्य-दशा की दुर्दशा को एक नायाब तरीके से बिम्बित करना गीतकार की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। गीत में आज की दशा और कतिपय उद्घोष भरी पंक्तियों में अभिव्यक्ति की जीवंतता दर्शनीय है- ''दक्षिणायन की हवाएँ कँपाती हैं हाड़ / जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी काटती है झाड़''-पृष्ठ १५ / "जनविरोधी सियासत को कब्र में दो गाड़ / झोंक दो आतंक-दहशत, तुम जलाकर भाड़"-पृष्ठ १६। कृति के गीतों में राजनीति की दुर्गति, विसंगतियों की बाढ़, हताशा, नैराश्य, वेदना, संत्रास, आतंक, आक्रोश के तेवर आदि नाना भाँति के मंज़र हैं जो प्रभावी ही नहीं, प्रेरक भी हैं। नवगीतकार ने गीतों को नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व् परंपरा को दृष्टि में रखा है। कृति के कई गीतों में सूरज का प्रतीक है-  "चंद्र-मंगल नापकर हम चाहते हैं छुएँ सूरज" / "हनु हुआ घायल मगर वरदान तुमने दिए सूरज"-पृष्ठ ३७ / "कैद करने छवि तुम्हारी कैमरे हम भेजते हैं" / "प्रतीक्षा है उन पलों की गले तुमसे मिलें सूरज"- पृष्ठ ३८। गीतों में लक्षणा व व्यंजना शब्द-शक्तियों का वैभव भरा है। कतिपय यथार्थबोधक बिम्ब सरल व स्पष्ट शब्दों में बिना किसी लाग-लपेट के विद्यमान हैं किन्तु बहुत से गीत नए लहजे में नव्य दृष्टि के पोषक हैं। कई गीतों में पंक्तियाँ मुहावरों व लोकोक्तियों में अद्भुत ढंग से लपेटी गई हैं जिनकी चारुता श्लाघनीय हैं। नवगीत से इतर जो गीत हैं उनका काव्य-लालित्य किंचित भी कम नहीं है। उनमें भी कटाक्ष का बाँकपन है, आस व विश्वास का पिटारा है, श्रम की गरिमा है, अध्यात्म की छटा है और अनेक स्थलों पर घोर विसंगति, दशा-दुर्दशा, सन्देश व कटु-नग्न यथार्थ के सटीक बिम्ब हैं। कृति की भाषा अधिकांशत: खड़ी बोली हिंदी है,कहीं-कहीं आंचलिक शब्दों से गुरेज नहीं है। कतिपय स्थलों पर लोकगीतों की सुहानी गंध है। गीतों में सम्प्रेषणीयता गतिमान है। माधुर्य व प्रसाद गुण संपन्न गीतों में शांत रस आप्लावित है। कतिपय गीतों में श्रृंगार का प्रवेश नेताओं व धनाढ्यों पर ली गयी चुटकी के रूप में है। पूरे तौर पर यह नवगीत कृति मनोरम बन पड़ी है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को इस उत्तम कृति के प्रणयन के लिए हार्दिक साधुवाद।

सुरेन्द्र सिंह पवार, जबलपुर-

                   डॉ. नामवरसिंह के अनुसार ‘‘नवगीत अपने नये रूप’ और ‘नयी वस्तु’ के कारण प्रासंगिक हो सका हैं।’’ बकौल सलिल- नवगीत में 'नव्यता संप्रेषणों में जान भरती, / गेयता संवेदनों का गान करती। / कथ्य होता, तथ्य का आधार खाँटा, / सधी गति-यति अंतरों का मान करती। / अंतरों के बाद, मुखड़ा आ विहँसता, / मिलन की मधु बंसरी, है चाह संजनी। / सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती, / मर्म बेधकता न हो तो रार ठनती। / लाक्षणिता भाव, रस, रूपक सलोने, / बिम्ब टटकापन मिलें, बारात सजती। / नाचता नवगीत के संग, लोक का मन / ताल-लय बिन, बेतुकी क्यों रहे कथनी।।' सलिल जी के प्रतिनिधि नवगीतों के केंद्र में वह आदमी है, जो श्रमजीवी है, जो खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक खून-सीना बहाता हुआ मेहनत करता है, फिर भी उसकी अंतहीन जिंदगी समस्याओं से घिरी हुई हैं, उसे प्रतिदिन दाने-दाने के लिए जूझना पड़ता है। ‘मिली दिहाड़ी’ नवगीत में कवि ने अपनी कलम से एक ऐसा ही दृश्य उकेरा है - 'चाँवल-दाल किलो भर ले ले / दस रुपये की भाजी। / घासलेट का तेल लिटर भर / धनिया-मिर्ची ताजी। / तेल पाव भर फल्ली का / सिंदूर एक पुड़िया दे- / दे अमरुद पाँच का, बेटी की / न सहूँ नाराजी। / खाली जेब पसीना चूता, / अब मत रुक रे मन बेजार । / मिली दिहाड़ी, चल बाजार।।' सलिल जी के ताजे नवगीतों में प्रकृति अपने समग्र वैभव और सम्पन्न स्वरूप में मौजूद है। ...नवगीत का जो साँचा आज से ६०-६५ वर्ष पूर्व तैयार किया गया था, कुछ नवगीतकार उसी से चिपककर सीमित शब्द, लय और बिम्बात्मक सम्पदा के आधार पर केवल पुनरावृत्ति कर रहे हैं। सलिल जी जैसे नवगीतकार ही हैं, जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को भी साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के इन नवगीतों में परम्परागत मात्रिक और वर्णिक छंदों का अभिनव प्रयोग देखा गया है। विशेषकर दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा और सवैया का। इनमें लोक से जुड़ी भाषा है, धुन है, प्रतीक हैं। इनमें चूल्हा-सिगड़ी है, बाटी-भरता-चटनी है, लैया-गजक है, तिल-गुड़ वाले लडुआ हैं, सास-बहू, ननदी-भौनाई के नजदीकी रिश्ते हैं, चीटी-धप्प, लँगड़ी, कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम हैं, रमतूला , मेला, नौटंकी, कठपुतली हैं। ‘सुन्दरिये मुंदरिये, होय’, राय अब्दुला खान भट्टी उर्फ दुल्ला भट्टी की याद में गाये जाने वाला लोहड़ी गीत है, ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित - ‘मिलती काय ने ऊँचीवारी, कुर्सी हमखों गुंइया है’। सलिल जी के इन गीतों / नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है, ज्यादातर तीन से चार बंद के नवगीत हैं। इनमें फैलाव था विस्तार के स्थान पर कसावट है, संक्षिप्तता है। भाषा सहज है, सर्वग्राही है। सूत्रों जैसी भाषा आनंदित करती है। सलिल जी ने अपने सामाजिक स्तर, आंचलिक भाषा, उपयुक्त मिथक, मुहावरों और अहानो (लोकोक्तियों) के माध्यम से व्यक्तिगत विशिष्टाओं का परिचय देते हुए हमें अपने परिवेश से सहज साक्षात्कार कराया है, इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। ‘उम्मीदों की फसल उगाते’ और ‘उजियारे की पौ-बारा’ करते ये नवगीत नया इतिहास लिखने की कुब्बत रखते हैं।" ४० 

अमरनाथ, लखनऊ-

                   "नए अंदाज और नए कलेवर में लिखी इन रचनाओं में राजनीतिक, सामाजिक व चारित्रिक प्रदूषण को अत्यन्त सशक्त शैली में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। भूख, गरीबी, धन, धर्म, बन्दूक का आतंक, तथाकथित लोकतंत्र व स्वतंत्रता, सामाजिक रिश्तों का निरन्तर अवमूल्यन आदि विषयों पर कवि ने अपनी बेबाक कलम चलाई है। अच्छाई, शुभलक्षणों व जीवन्तता के वाहक सूर्य को विभिन्न रूपों में याद करते हुए, उससे फरियाद करते हुए कवि ने उस पर नौ कवितायें रच डाली। काल है संक्रान्ति का जो इस पुस्तक का शीर्षक भी है केवल सूर्य के उत्तरायण से दक्षिणायन अथवा दक्षिणायन से उत्तरायण परिक्रमापथ के संक्रमण का जिक्र नहीं अपितु सामाजिक संक्रान्ति को उजागर करती है- 'स्वभाषा  को  भूल, इंग्लिश से लड़ाती लाड़ / टाल दो दिग्भ्रान्ति को, तुम मत रुको सूरज। / प्राच्य पर पाश्चात्य का अब चढ़ गया है रंग / कौन किसको सम्हाले, पी रखी मद की भंग।/ शराफत को शरारत नित कर रही है तंग / मनुज-करनी देखकर है खुद नियति भी दंग। / तिमिर को लड़, जीतना, तुम मत चुको सूरज। / काल  है  संक्रांति  का, तुम मत थको सूरज।। (पृष्ठ-१६-१७) कवि ने एक तरफ बुन्देली के लोकप्रिय कवि ईसुरी के चौकड़िया फागों की तर्ज पर बुंदेली भाषा में ही नया प्रयोग किया है तो दूसरी ओर पंजाब के दुल्ला भाटी के लोहड़ी पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीतों की तर्ज पर कविता को नया आयाम दिया है- मिलती काय नें ऊँची वारी, कुरसी हम खों गुइयाँ। / अपनी दस पीढ़ी खें लाने, हमें जोड़ रख जानें / बना लई सोने की लंका,  ठेंगे पे राम-रमैया। (मिलती काय नें-पृष्ठ-५२) तथा 'सुंदरिये मुंदरिये, होय! सब मिल कविता करिए होय। / कौन किसी का प्यारा होय, स्वार्थ सभी का न्यारा होय। (सुंदरिये मुंदरिये होय -पृष्ठ-४९) किसी जमाने की विशेष पहचान, लुप्तप्राय  बुंदेली सोहरगीत की बानगी देखें- 'ओबामा आते देश में, करो पहुनाई। / चोला बदल कें आई किरनिया, सुसमा के संगे करें कर जुराई। / ओबामा आये देश में, करो पहुनाई। (ओबामा आते -पृष्ठ-५३)' कवि केवल नवगीत में ही माहिर नही है अपितुं छांदिक गीतों पर भी उसकी पूरी पकड़ है। उनका हरिगीतिका छंद देखे- 'पहले गुना, तब ही चुना। / जिसको तजा वह था घुना। / सपना   वही  सबने बुना / जिसके लिए सिर था धुना।' (पहले गुना -पृष्ठ-६१) यह पठनीय नवगीत-गीत संकलन नए-नए बिम्ब और प्रतीक लेकर आया है। बुन्देली और सामान्य हिन्दी में रचे गए इन गीतों में न केवल ताजगी है अपितु नयापन भी है। हिन्दी, उर्दू, बुन्देली, अंग्रेजी व देशज शब्दों का प्रयोग करते हुए इसे आमजन के लिए पठनीय बनाने का प्रयास किया गया है। हिन्दीभाषा को विश्व पटल पर लाने की आकांक्षा समेटे यह ग्रंथ हिन्दी व बुन्देली पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा, ऐसी मेरी आशा है।

डाॅ. अंसार क़म्बरी, कानपुर
                  "आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी गीत-नवगीत संग्रह ‘‘काल है संक्रांति का’’में अपनी उत्कृष्ट अनुभूति एवं उन्नत अभिव्यक्ति व्दारा काव्य का ऐसा उदात्त रूप प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों को साकार कर मानव-मनोवृृत्तियों की अनेक प्रतिमायें (बिंब) चित्रित करते हैं। आत्मनिरीक्षण और शुक्ताचरण की प्रेरणा देते हुये कविवर आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा नवगीत को नए आयाम दिए हैं। विचार बोझिल गद्य-कविता की शुष्कता से मुक्ति के लिये गीत एवं नवगीत मात्रिक छंद को सलिल जी ने प्रस्तुत संग्रह में बड़ी सफलता से प्रस्तुत किया हैं। उनकी भाषा भाव-सम्प्रेषण में कहीं अटकती नहीं है। उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों को धड़ल्ले से प्रयोग करते हुये आंचलिक भाषाओं का भी समावेश किया है जो उनके गीतों का प्राण है। उनके गीत नवीन विषयों को स्वयम् में समाहित करने के उपरान्त अपनी अनुशासनबध्दता यथा- आत्माभिव्यंजकता, भाव-प्रवणता, लयात्मकता, गेयता, मधुरता एवं सम्प्रेषणीयता आदि प्रमुख तत्वों से सम्पूरित हैं अर्थात उन्होंने हिन्दी-गीत की निरंतर प्रगतिशील बहुभावीय परम्परा एवं नवीनतम विचारों के साथ गतिमान होने के बावजूद गीति-काव्य की सर्वांगीणता को पूर्णरुपेण समन्वित किया है।" ‘सलिल’ जी आदर्शवादी संचेतना के कवि हैं लेकिन यथार्थ की अभिव्यक्ति करने में भी संकोच नहीं करते। अपने गीतों में उन्होंने भारतीय परिवेश की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि विसंगतियों को सटीक रूप में चित्रित किया है। निस्संदेह, उनका काव्य-कौशल सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। उनके गीतों में उनका समग्र व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। 

आचार्य भागवत दुबे जबलपुर

                  " ...पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गंभीरता की ओर अग्रसर होते हैं।...समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायें दीवारें' नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है। कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है।"

चंद्रकांता अग्निहोत्री, पंचकूला- 

शब्द, अर्थ, प्रतीक, बिंब, छंद, अलंकार जिनका अनुगमन करते हैं और जो सदा सत्य की सेवा में अनुरत हैं, ऐसे मनीषी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल’ जी की नवीन कृति 'काल है संक्रांति का' में कवि ने कई नए प्रयोग सफलता पूर्वक किये हैं।नवीन की चाह में शाश्वत मूल्यों को तिलांजलि न देकर आरंभ में ही 'वंदन'-’स्तवन’ में चित्रगुप्त प्रभु व शारदा माँ की स्तुति कर एक आध्यात्मिक यात्री की तरह वे अपने पूर्वजों का स्मरण भी करते हैं: कलश नहीं आधार बन सकें / भू हो हिंदी धाम। / सुमिर  लें पुरखों को हम आओ करें प्रणाम। समाज की विद्रूपताओं को देख कवि हृदय विचलित हो काव्य रचना करता है- ‘झोंक दो आतंक-दहशत / तुम जलाकर भाड़ / तुम मत झुको सूरज।’ 'सलिल' जी की सभी रचनाएँ श्रेष्ठ हैं।‘काल है संक्राति का’ का उद्घोष सभी रचनाओं में परिलक्षित होता है। उठो पाखी, संक्रांति / काल है, उठो सूरज, छुएँ सूरज, सच की अर्थी, लेटा  हूँ, मैं लडूंगा, उड़ चल हंसा, लोकतंत्र का पंछी आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। अधिकांश बिंब व प्रतीक नए व मनोहारी हैं। कवि ने अपनी भावनाओं को बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया है।इनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है घोर अन्धकार में भी आशावादी होना। प्रस्तुत संग्रह हमें साहित्य के क्षेत्र में आशावादी बनाता है। यह पुस्तक अमूल्य देन  है साहित्य को। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से सभी रचनाएं श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है।

राजेश कुमारी, देहरादून-

                   "ये  गीत-नवगीत एक बड़े कैनवस पर वैयक्तिक जीवन के आभ्यांतरिक और चयनित पक्षों को उभारते हैं, रचनाकार के आशय और अभिप्राय के बीच मुखर होकर शब्द अर्थ छवियों को विस्तार देते हैं जिनके मर्म पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ‘खासों में ख़ास’ रचना में कवि ने व्यंगात्मक शैली में पैसों के गुरूर पर जो आघात किया है देखते ही बनता है| ‘तुम बंदूक चलाओ तो’ आतंकवाद जैसे सामयिक मुद्दे पर कवि की कलम तीक्ष्ण हो उठती है जिसके पीछे एक लेखक, एक कवि की हुंकार है वो ललकारता है। मजदूर जो सुबह से शाम तक परिश्रम करता है अपना पसीना बहाकर  दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता है- "चूड़ी - बिंदी दिला न पाया / रूठ न मों से प्यारी / अगली बेर पहलऊँ लेऊँ / अब तो दे मुस्का री" - मिली दिहाड़ी चल बाज़ार। अंधविश्वास, ढकोसलों,रूढ़िवादिता जैसे विषयों के विरोध और उन्मूलन हेतु रची गयी रचनाओं से भी समृद्ध है यह संग्रह|"


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भुजंगप्रयात छंद

कार्यशाला 
यगण x ४ = यमाता x ४ = (१२२) x ४
बारह वार्णिक जगती जातीय भुजंगप्रयात छंद, 
बीस मात्रिक महादैशिक जातीय छंद 
बहर फऊलुं x ४ 
*
हमारा न होता, तुम्हारा न होता
नहीं बोझ होता, सहारा न होता
नहीं झूठ बोता, नहीं सत्य खोता-
कभी आदमी बेसहारा न होता
*
करों याद, भूलो न बातें हमारी
नहीं प्यार के दिन न रातें हमारी
कहीं भी रहो, याद आये हमेशा
मुलाकात पहली, बरातें हमारी
*
सदा ही उड़ेगी पताका हमारी
सदा भी सुनेगा जमाना हमारी
कभी भी न छोड़ा, कभी भी न छोड़ें
अदाएँ तुम्हारी, वफायें हमारी
*
कभी भी, कहीं भी सुनाओ तराना
हमीं याद में हों, नहीं भूल जाना
लिखो गीत-मुक्तक, कहो नज्म चाहे
बहाने बनाना, हमीं को सुनाना
*
प्रथाएँ भुलाते चले जा रहे हैं
अदाएँ भुनाते छले जा रहे हैं
न भूलें भुनाना,न छोड़ें सताना
नहीं आ रहे हैं, नहीं जा रहे हैं
***

आँख पर मुहावरे-कहावतें:

आँख पर मुहावरे-कहावतें:
संजीव 
*
आँख मारना = इंगित / इशारा करना, छेड़ना। 
मुझे आँख मारते देख गवाह मौन हो गया

आँखें आना = आँखों का रोग होना। 
आँखें आने पर काला चश्मा पहनें

आँखें चुराना = छिपाना। 
उसने समय पर काम नहीं किया इसलिए आँखें चुरा रहा है

आँखें झुकना = शर्म आना। 
वर को देखते ही वधु की आँखें झुक गयीं

आँखें झुकाना = शर्म आना। 
ऐसा काम मत करो कि आँखें झुकाना पड़े

आँखें टकराना = चुनौती देना।
आँखें टकरा रहे हो तो परिणाम भोगने की तैयारी भी रखो

आँखें दिखाना = गुस्से से देखना। 
दुश्मन की क्या मजाल जो हमें आँखें दिखा सके?

आँखें फेरना = अनदेखी करना।
आज के युग में बच्चे बूढ़े माँ-बाप से आँखें फेरने लगे हैं

आँखें बंद होना = मृत्यु होना। 
हृदयाघात होते ही उसकी आँखें बंद हो गयीं

आँखें मिलना = प्यार होना। 
आँखें मिल गयी हैं तो विवाह के पथ पर चल पड़ो 

आँखें मिलाना = प्यार करना। 
आँखें मिलाई हैं तो जिम्मेदारी से मत भागो

आँखों में आँखें डालना = प्यार करना
लैला मजनू की तरह आँखों में ऑंखें डालकर बैठे हैं 

आँखें मुँदना = नींद आना, मर जाना।
लोरी सुनते ही ऑंखें मुँद गयीं।
माँ की आँखें मुँदते ही भाई लड़ने लगे 

आँखें मूँदना = सो जाना, मर जाना। 
उसने थकावट के कारण आँखें मूँद लीं
 
आँखें मूँदना = मर जाना। डॉक्टर इलाज कर पते इसके पहले ही घायल ने आँखें मूँद लीं

आँखें लगना = नींद आ जाना। जैसे ही आँखें लगीं, दरवाज़े की सांकल बज गयी

आँखें लड़ना = प्रेम होना। 
आँखें लड़ गयी हैं तो सबको बता दो

आँखें लड़ाना = प्रेम करना। 
आँखें लड़ाना आसान है, निभाना कठिन

आँखें बिछाना = स्वागत करना। 
मित्र के आगमन पर उसने आँखें बिछा दीं।

आँखों का काँटा = शत्रु 
घुसपैठिए सेना की आँखों का काँटा हैं 

आँखों की किरकिरी = जो अच्छा न लगे। 
आतंकवादी मानव की आँखों की किरकिरी हैं।

आँखों में खून उतरना = अत्यधिक क्रोध आना। 
कसाब को देखते ही जनता की आँखों में खून उतर आया।

आँखों में धूल झोंकना = धोखा देना।
खड़गसिंग बाबा भारती की आँखों में धूल झोंक कर भाग गया। 

आँखों से गिरना = सम्मान समाप्त होना। 
झूठे आश्वासन देकर नेता मतदाताओं की आँखों से गिर गए हैं 

आँखों-आँखों में बात होना = इशारे से बात करना। 
आँखों-आँखों मने बात हुई और दोनों कक्षा से बाहर हो गये
आँखों ही आँखों में इशारा हो गया / बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया
आँखों-आँखों में बात होने दो / मुझको अपनी बाँहों में सोने दो

एक आँख से देखना = समानता का व्यवहार करना
समाजवाद तो नाम मात्र का है, अपने दाल और अन्य दलों के लोगों को कोई भी एक आँख से कहाँ देखता है?

फूटी आँखों न सुहाना = एकदम नापसंद करना 
माली की बेटी रानी को फूटी आँखों न सुहाती थी

अंधो मेँ काना राजा = अयोग्यों में खुद को योग्य बताना
अंधों में काना राजा बनने से योग्यता सिद्ध नहीं होती

कहावत 

अंधे के आगे रोना, अपने नैना खोना = नासमझ/असमर्थ  के सामने अपनीव्यथा कहना
नेताओं से सत्य कहना अंधे के आगे रोना, अपने नैना खोना ही है

आँख का अंधा नाम नैन सुख = नाम के अनुसार गुण न होना। 
उसका नाम तो बहादुर पर छिपकली से डर भी जाता हैं, इसी को कहते हैं आँख का अँधा नाम नैन सुख
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

हिंदी की नाट्य परंपरा

हिंदी की नाट्य परंपरा  
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                 हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र से मान्य है। भारतेंदु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने जन-जाग्रति हेतु  नाटकों की रचना कर तात्कालिक सामाजिक समस्याओं को नाटकों में अभिव्यक्त किया। अव्यावसायिक साहित्यिक रंगमंच निर्माण का श्रीगणेश आगा हसन ‘अमानत’ लखनवी के ‘इंदर सभा’ नामक गीति-रूपक से मान्य है। 'इंदर सभा’ वस्तुत: रंगमंचीय कृति नहीं थी। इसमें शामियाने के नीचे खुला मंच रहता था। तीन ओर दर्शक बैठते थे, चौथी ओर तख्त पर राजा इंदर का आसन तथा परियों के लिए कुर्सियाँ रखी जाती थीं। साजिंदों के पीछे एक पर्दा लटका दिया जाता था।  पर्दे के पीछे से पात्र प्रवेश करते थे। एक बार आकर मंच पर ही उपस्थित रहते थे,अपने संवाद बोलकर वापस नहीं जाते थे। यह नाट्यरंगन बहुत लोकप्रिय हुआ। अमानत की ‘इंदर सभा’ के अनुकरण पर कई सभाएँ (‘मदारीलाल की इंदर सभा’, ‘दर्याई इंदर सभा’, ‘हवाई इंदर सभा’) आदि बना ली गईं। पारसी नाटक मंडलियों ने भी इन सभाओं और मजलिसे परिस्तान को अपनाया। ये रचनाएँ नाटक नहीं थी और न ही इनसे हिंदी का रंगमंच निर्मित हुआ। भारतेंदु इनको 'नाटकाभास' कहते थे। उन्होंने इनकी पैरोडी के रूप में ‘बंदर सभा’ लिखी थी।
                    भारतेंदु से पूर्व हिंदी रंगमंच और नाट्य-रचना के व्यावसायिक तथा अव्यावसायिक साहित्यिक प्रयास तो हुए पर वास्तविक और स्थायी रंगमंच विकसित नहीं हो सका। सन् १८५० ई. से सन् १८६८ ई. तक हिंदी रंगमंच शैशवावस्था में ही था। पारसी व् अन्य व्यावसायिक नाटक मंडलियाँ मई स्थानों में बनाई गईं किंतु उनमें साहित्यिक समझ नहीं थी। फलत: हिंदी रंगमंच का कुछ प्रचार-प्रसार हुआ, कुछ अच्छे नाटककार हिंदी को मिले पर अवसर और परिस्थिति का लाभ नहीं उठाया जा सका था। 

                    भारतेंदु ने संस्कृत-प्राकृत की पूर्ववर्ती भारतीय नाट्य-परंपरा और बँगला की समसामयिक नाट्यधारा के साथ अंग्रेजी प्रभाव-धारा से प्रेरित हो बाँग्ला के विद्यासुंदर' (१८६७) नाटक का हिंदी अनुवाद कर अपनी यात्रा आरंभ की। नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेंदु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ किया। भारतेंदु के पूर्ववर्ती नाटककारों में भारतेंदु के पिता गोपालचंद रचित 'नहुष' (१८४१) न रीवा नरेश विश्वनाथ सिंह (१८४६-१९११) के बृजभाषा में लिखे गए नाटक 'आनंद रघुनंदन' हिंदी के प्रथम नाटक मान्य हैं।  हिंदी में साहित्यिक रंगमंच और नाट्य-सृजन परंपरा सन् १८६८ ई. में भारतेंदु के नाटक-लेखन और मंचीकरण से आरंभ हुई।। इसके पूर्व पात्रों के प्रवेश-गमन, दृश्य-योजना आदि से युक्त कोई वास्तविक नाटक नहीं रचा गया था। ‘नहुष’ तथा ‘आनंदरघुनंदन’ भी पूर्ण नाटक नहीं थे, न पर्दों और दृश्यों आदि की योजना वाला विकसित रंगमंच ही तब तक निर्मित हुआ था। नाट्यारंगन के अधिकतर प्रयास मुंबई आदि अहिंदी भाषी क्षेत्रों में ही हुए थे, भाषा हिंदी-उर्दू का मिश्रित खिचड़ी रूप में थी। 

                    ३ अप्रैल सन् १८६८ को शीतलाप्रसाद त्रिपाठी रचित 'जानकी मंगल' नाटक का अभिनय ‘बनारस थियेटर’ में आयोजित था। जिस लड़के को लक्ष्मण का अभिनय करना था वह बीमार पड़ गया।नाट्यायोजन स्थगित किया जाने लगा तो युवा भारतेंदु ने अभिजात्यता की चिंता न कर, एक-डेढ़ घंटे में ही न केवल लक्ष्मण के संवाद अपितु पूरा ‘जानकी मंगल’ नाटक ही याद कर लिया। तब उच्च कुल के लोग अभिनय करना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे। इसके बाद भारतेंदु ने अभिनय के साथ-साथ नाट्य-सृजन भी आरंभ किया। १८८५ ई. तक अपने स्वल्प और अति व्यस्त जीवन के शेष १७ वर्षों में भारतेंदु ने अनेक नाटकों का सृजन किया, अनेक नाटकों में अभिनय किया, अनेक रंगशालाएँ निर्मित कराईं और रंगमंच को स्थपित कराया। भारतेन्दु ने अनेक लेखकों और रंगकर्मियों को नाट्य-सृजन और अभिनय की प्रेरणा दी। फलत: काशी, प्रयाग, कानपुर आदि में निम्न अव्यावसायिक हिंदी साहित्यिक रंगमंच स्थापित हुए

                    भारतेंदु के ही जीवन काल में स्थापित मुख्य रंग-संस्थाएँ: १. नेशनल थियेटर काशी- ‘अंधेर नगरी’ प्रहसन इस थियेटर के लिए एक ही रात में लिखा गया था।  २. ‘आर्य नाट्यसभा’ प्रयाग- लाला श्रीनिवासदास रचित ‘रंगधीर प्रेममोहिनी’ प्रथम बार अभिनीत हुआ, ३. कानपुर में भारतेन्दु के मित्र प्रतापनारायण मिश्र ने भारतेंदु के ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘भारत-दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’ आदि नाटकों का अभिनय कराया। इनके अतिरिक्त बलिया, डुमराँव, लखनऊ आदि उत्तर प्रदेश के कई स्थानों और बिहार प्रदेश में भी हिन्दी रंगमंच और नाट्य-सृजन की दृढ़ परंपरा का निर्माण हुआ।   
                
                    पूर्व में भास, कालीदास, भवभूति, शूद्रक आदि संस्कृत नाटककारों की समृद्ध नाट्य-परम्परा विद्यमान होने पर भी ९ वीं - १० वीं सदी में प्राकृत और अपभ्रंश में भी नाट्य-सृजन वैसा उत्कृष्ट नहीं हुआ। ईसा की 9वीं-10 वीं शताब्दी के बाद संस्कृत नाटक ह्रासोन्मुख हो गया था।  जैसा पूर्ववर्ती संस्कृत-नाट्य-साहित्य था। अत: भारतेन्दु के सामने संस्कृत-प्राकृत की यह पूर्ववर्ती ह्रासगामी परम्परा रही। संस्कृत के मुरारि, राजशेखर, जयदेव आदि की क्रमश: ‘अनर्घराघव’, ‘बालरामायण’, ‘प्रसन्नराघव’ आदि रचनाएँ ही भारतेन्दु तथा उनके सहयोगी लेखकों का आदर्श बनीं। इनमें न कथ्य- या विषय-वस्तु का वह गाम्भीर्य था, जो कालिदास आदि की अमर कृतियों में था, न उन जैसी शैली-शिल्प की श्रेष्ठता थी। यही कारण है कि भारतेंदु-पूर्व हिंदी नाटक निष्प्राण रहा और भारतेंदु ने उसमें सामयिक सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक पैदा कर नवोन्मेष का प्रयास किया, पर उनके प्रयत्नों के बावजूद भारतेंदु कालीन हिंदी नाटक कथ्य और शिल्प की दृष्टि से शैशव काल में ही रहा। सन् १८८५  ई. में भारतेंदु के निधन के पश्चात् वह उत्साह भी मंद पड़ गया। १९ वीं शती के अंतिम दशक में कुछ छुटपुट प्रयास हुए। कई नाटक मंडलियों जैसे ‘श्रीरामलीला नाटक मंडली प्रयाग’, ‘हिंदी नाट्य समिति प्रयाग’, भारतेंदु जी के भतीजों- श्रीकृष्णचंद्र और श्री ब्रजचंद्र -द्वारा काशी में स्थापित ‘श्री भारतेंदु नाटक मंडली’ तथा ‘काशी नागरी नाटक मंडली' आदि में ‘महाराणा प्रताप’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘महाभारत’, ‘सुभद्राहरण’, ‘भीष्मपितामह’, ‘बिल्व मंगल’, ‘संसार स्वप्न’, ‘कलियुग’ आदि अनेक नाटकों का अभिनय हुआ।
                    धन तथा सरकारी-गैरसरकारी प्रोत्साहन के अभाव में कुछ अच्छे रंगमंचानुकूल साहित्यिक नाटकों की रचना हुई। पारसी नाटक कंपनियों के दुष्प्रभाव के सामने यह स्वल्प सत्प्रयास हिंदी-रंगमंच का विशेष विकास न कर सका। तब हिंदी रंगमंच पारसी रंगमंच से विशेष भिन्न और विकसित नहीं था, पर्दों की योजना, दृश्य-विधान और संगी सामान ही होते थे। ध्वनि-यंत्र आदि भी हिंदी रंगमंच के विकास की दिशा में विशेष योग नहीं दे पाए तथापि पारसी नाटक कंपनियों के भ्रष्ट प्रचार को कुछ धक्का लगा तथा कुछ रंगमंचीय हिंदी नाटक प्रकाश में आए। वैज्ञानिक साधन संपन्न घूमनेवाले रंगमंच का विकास १९ वीं शती में नहीं हो सका था।२० वीं शताब्दी के तीसरे दशक में सिनेमा के आगमन ने पारसी रंगमंच को समाप्त कर दिया। अव्यावसायिक रंगमंच इधर-उधर नए रूपों में जीवित रहा। अब हिंदी रंगमंच शिक्षा संस्थाओं तक सीमित होकर बड़े नाटकों की अपेक्षा एकांकियों को अधिक अपनाकर चला। डॉ॰ राम कुमार वर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, सेठ गोविंददास, जगदीशचंद्र माथुर, कमलेश्वर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मोहन राकेश, स्वदेश दीपक, नाग बोडस, हरिकृष्ण प्रेमी आदि ने उपयोगी एकांकी नाटकों/दीर्घ नाटकों की रचना की है। 
                    प्रसाद जी ने उच्चकोटि के साहित्यिक नाटक रचकर हिंदी नाटक साहित्य को समृद्ध किया। कुछ काट-छाँट के साथ प्रसाद जी के प्राय: सभी नाटकों का अभिनय हिन्दी के अव्यावसायिक रंगमंच पर हुआ। जार्ज बर्नार्ड शॉ, इब्सन आदि पाश्चात्य नाटककारों के प्रभाव से उपर्युक्त प्रसादोत्तर आधुनिक नाटककारों ने कुछ बहुत अच्छे रंगमंचीय नाटकों की सृष्टि की। इन नाटककारों के अनेक पूरे नाटक भी रंगमंचों से प्रदर्शित हुए। स्वतंत्रता के पाश्चात् हिंदी रंगमंच के स्थायी निर्माण की दिशा में अनेक सरकारी-गैर-सरकारी प्रयत्न हुए। कई गैर-सरकारी संस्थाओं को रंगमंच की स्थापना के लिए शासन से आर्थिक सहायता मिली है। पुरुषों के साथ स्त्रियाँ भी अभिनय में भाग लेने लगी हैं। स्कूलों-कॉलेजों में कुछ अच्छे नाटकों का अब अच्छा प्रदर्शन होने लगा है। अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से संबद्ध कुछ अच्छे स्थायी रंगमंच बने हैं। थिएटर सेंटर के तत्त्वावधान में दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, इलाहाबाद, हैदराबाद, बंगलौर, शांतिनिकेतन आदि स्थानों पर स्थायी रंगमंच स्थापित हैं। इन सर्वभाषायी रंगमंचों पर हिंदी भिखारिणी-सी ही प्रतीत होती है। केंद्र सरकार ने संगीत नाटक अकादमी की स्थापना की है, जिसमें अच्छे नाटककारों और कलाकारों को प्रोत्साहन दिया जाता है।व्यावसायिक रंगमंच के निर्माण के भी पिछले दिनों कुछ प्रयत्न हुए हैं। प्रसिद्ध कलाकार स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर ने कुछ वर्ष हुए पृथ्वी थियेटर की स्थापना की थी। उन्होंने कई नाटक प्रस्तुत किए हैं, जैसे ‘दीवार’, ‘गद्दार’, ‘पठान’, ‘कलाकार’, ‘आहूति’ आदि। धन की हानि उठाकर भी कुछ वर्ष इस कंपनी ने उत्साहपूर्वक अच्छा कार्य किया। इतने प्रयास पर भी बंबई, दिल्ली या किसी जगह हिंदी का स्थायी व्यावसायिक रंगमंच नहीं बन सका है। इस मार्ग में कठिनाइयाँ हैं।
साभार: विकिपीडिया 
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व्यंग्य लेख सलिला

व्यंग्य लेख
दही-हाँडी की मटकी और सर्वोच्च न्यायालय
संजीव
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दही-हाँडी की मटकी बाँधते-फोड़ते और देखकर आनंदित होते आम आदमी के रंग में भंग करने का महान कार्य कर खुद को जनहित के प्रति संवेदनशील दिखानेवाला निर्णय सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज जाने की तरह शांतिप्रिय सनातनधर्मियों के अनुष्ठान में अयाचित और अनावश्यक हस्तक्षेप करने के कदमों की कड़ी है। हाँडी की ऊँचाई उन्हें तोड़ने के प्रयासों को रोमांचक बनाती है। ऊँचाई को प्रतिबंधित करने के निर्णय का आधार, दुर्घटनाओं को बताया गया है। यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि निर्धारित ऊँचाई से दुर्घटना नहीं होगी? इस निर्णय की पृष्ठभूमि किसी प्राण-घातक दुर्घटना और जान-जीवन की रक्षा कहा जा रहा है। यदि न्यायालय इतना ही संवेदनशील है तो मुहर्रम में जलते अलावों पर चलने, उन पर कूदने और अपने आप पर घातक शास्त्रों से वार करने की परंपरा हानिहीन कैसे कही जा सकती है? क्या बकरीद पर लाखों बकरों का कत्ल अधिक जघन्य नहीं है? न्यायालय यह जानता नहीं या इसे प्रतिबंधयोग्य मानता नहीं या सनातन धर्मियों को सॉफ्ट टारगेट मानकर उनके धार्मिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप करना अपना जान सिद्ध अधिकार समझता है? सिख जुलूसों में भी शस्त्र तथा युद्ध-कला प्रदर्शनों की परंपरा है जिससे किसी की हताहत होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती।
वस्तुत: दही-हाँडी का आयोजन हो या न हो?, हो तो कहाँ हो?, ऊँचाई कितनी हो?, कितने लोग भाग लें?, किस प्रकार मटकी फोड़ें? आदि प्रश्न न्यायालय नहीं प्रशासन हेतु विचार के बिंदु हैं। भारत के न्यायालय बीसों साल से लंबित लाखों वाद प्रकरणों, न्यायाधीशों की कमी, कर्मचारियों में व्यापक भ्रष्टाचार, वकीलों की मनमानी आदि समस्याओं के बोझ तले कराह रहे हैं। दम तोड़ती न्याय व्यवस्था को लेकर सर्वोच्च न्यायाधिपति सार्वजनिक रूप से आँसू बहा चुके हैं। लंबित लाखों मुकदमों में फैसले की जल्दी नहीं है किंतु सनातन धर्मियों के धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े मामले में असाधारणशीघ्रता और जन भावनाओं के निरादर का औचित्य समझ से परे है। न्यायालय को आम आदमी की जान की इतनी ही चिंता है तो दीपा कर्माकर द्वारा प्रदर्शित जिम्नास्ट खेल में निहित सर्वाधिक जान का खतरा, अनदेखा कैसे किया जा सकता है? खतरे के कारण ही उसमें सर्वाधिक अंक हैं। क्या न्यायालय उसे भी रोक देगा? क्या पर्वतारोहण और अन्य रोमांचक खेल (एडवेंचर गेम्स) भी बंद किए जाएँ? यथार्थ में यह निर्णय उतना ही गलत है जितना गंभीर अपराधों के बाद भी फिल्म अभिनेताओं को बरी किया जाना। जनता ने न उस फैसले का सम्मान किया, न इसका करेगी।
इस संदर्भ में विचारणीय है कि-
१. विधि निर्माण का दायित्व संसद का है। न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) अत्यंत ग़ंभीऱ और अपरिहार्य स्थितियों में ही अपेक्षित है। सामान्य प्रकरणों और स्थितियों में इस तरह के निर्णय संसद के अधिकार क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है।
२. कार्यपालिका का कार्य विधि का पालन करना और कराना है। हर विधि का हर समय, हर स्थिति में शत-प्रतिशत पालन नहीं किया जा सकता। स्थानीय अधिकारियों को व्यावहारिकता और जन-भावनाओं का ध्यान भी रखना होता है। अत:, अन्य आयोजनों की तरह इस संबंध में भी निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय प्रशासन के हाथों में देना समुचित विकल्प होता।
३. न्यायालय की भूमिका सबसे अंत में विधि का पालन न होने पर दोषियों को दण्ड देने मात्र तक सीमित है, जिसमें वह विविध कारणों से असमर्थ हो रहा है। असहनीय अनिर्णीत वाद प्रकरणों का बोझ, न्यायाधीशों की अत्यधिक कमी, वकीलों का अनुत्तरदायित्व और दुराचरण, कर्मचारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण दम तोड़ती न्याय व्यवस्था खुद में सुधार लाने के स्थान पर अनावश्यक प्रकरणों में नाक घुसेड़ कर अपनी हेठी करा रही है।
मटकी फोड़ने के मामलों में स्वतंत्रता के बाद से अब तक हुई मौतों के आंकड़ों का मिलान, बाढ़ में डूब कर मरनेवालों, दंगों में मरनेवालों, समय पर चिकित्सा न मिलने से मरनेवालों, सरकारी और निजी अस्पतालों में चिकित्सकों के न होने से मरनेवालों के आँकड़ों के साथ किया जाए तो स्थिति स्पष्ट होगी यह अंतर कुछ सौ और कई लाखों का है।
यह धर्म को कानून की दृष्टि से देखने का नहीं, धर्म में कानून के अनुचित और अवांछित हस्तक्षेप का मामला है। धार्मिक यात्राएँ / अनुष्ठान ( शिवरात्रि, राम जन्म, जन्माष्टमी, दशहरा, हरछट, गुरु पूर्णिमा, मुहर्रम, क्रिसमस आदि) जन भावनाओं से जुड़े मामले हैं जिसमें दीर्घकालिक परंपराएँ और लाखों लोगों की भूमिका होती है। प्रशासन को उन्हें नियंत्रित इस प्रकार करना होता है कि भावनाएँ न भड़कें, जन-असंतोष न हो, मानवाधिकार का उल्लंघन न हो। हर जगह प्रशासनिक बल सीमित होता है। यदि न्यायालय घटनास्थल की पृष्भूमि से परिचित हुए बिना कक्ष में बैठकर सबको एक डंडे से हाँकने की कोशिश करेगा तो जनगण के पास कानून की और अधिकारियों के सामने कानून भंग की अनदेखी करने के अलावा कोई चारा शेष न रहेगा। यह स्थिति विधि और शांति पूर्ण व्यवस्था की संकल्पना और क्रियान्वयन दोनों दृष्टियों से घातक होगी।
इस निर्णय का एक पक्ष और भी है। निर्धारित ऊँचाई की मटकी फोड़ने के प्रयास में मौत न होगी क्या न्यायालय इससे संतुष्ट है? यदि मौत होगी तो कौन जवाबदेह होगा? मौत का कारण सिर्फ ऊँचाई कैसे हो सकती है। अपेक्षाकृत कम ऊँचाई की मटकी फोड़ने के प्रयास में दुर्घटना और अधिक ऊँचाई की मटकी बिना दुर्घटना फोड़ने के से स्पष्ट है कि दुर्घटना का कारण ऊँचाई नहीं फोड़नेवालों की दक्षता, कुशलता, सुरक्षा उपकरणों और संसाधनों में कमी होती है। मटकी फोड़ने संबंधी दुर्घटनाएँ न हों, कम से कम हों, कम गंभीर हों तथा दुर्घटना होने पर न्यूनतम हानि हो इसके लिए भिन्न आदेशों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता है -
१. मटकी स्थापना हेतु इच्छुक समिति निकट रहवासी नागरिकों की लिखित सहमति सहित आवेदन देकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी से अनुमति ले और उसकी लिखित सूचना थाना, अस्पताल, लोक निर्माण विभाग, बिजली विभाग व नगर निगम को देना अनिवार्य हो।
२. मटकी की ऊँचाई समीपस्थ भवनों की ऊँचाई, विद्युत् तारों की ऊँचाई, होर्डिंग्स की स्थिति, अस्पताल जैसे संवेदनशील और शांत स्थलों से दूरी आदि देखकर प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की समिति तय करे।
३. तय की गयी ऊँचाई के परिप्रेक्ष्य में अग्नि, विद्युत्, वर्षा, तूफ़ान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं तथा गिरने की संभावना का पूर्वाकलन कर अग्निशमन यन्त्र, विद्युत् कर्मचारी, श्रमिक, चिकित्साकर्मी आदि की सम्यक और समुचित व्यवस्था हो अथवा व्यवस्थाओं के अनुसार ऊँचाई निर्धारित हो।
४. इन व्यवस्थों को करने में समितियों का भी सहयोग लिया जाए। उन्हें मटकी स्थापना-व्यवस्था पर आ रहे खर्च की आंशिक पूर्ति हेतु भी नियम बनाया जा सकता है। ऐसे नियम हर धर्म, हर सम्प्रदाय, हर पर्व, हर आयोजन के लिये सामान्यत: सामान होने चाहिए ताकि किसी को भेदभाव की शिकायत न हो।
५. ऐसे आयोजनों का बीमा काबरा सामियितों का दायित्व हो ताकि मानवीय नियंत्रण के बाहर दुर्घटना होने पर हताहतों की क्षतिपूर्ति की जा सके।
प्रकरण में उक्त या अन्य तरह के निर्देश देकर न्यायालय अपनी गरिमा, नागरिकों की प्राणरक्षा तथा सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक व्यावहारिकताओं के प्रति संवेदनशील हो सकता था किन्तु वह विफल रहा। यह वास्तव में चिता और चिंतन का विषय है।
समाचार है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवहेलना कर सार्वजनिक रूप से मुम्बई में ४४ फुट ऊँची मटकी बाँधी और फोड़ी गयी। ऐसा अन्य अनेक जगहों पर हुआ होगा और हर वर्ष होगा। पुलिस को नेताओं का संरक्षण करने से फुरसत नहीं है। वह ग़ंभीऱ आपराधिक प्रकरणों की जाँच तो कर नहीं पाती फिर ऐसे प्रकरणों में कोई कार्यवाही कर सके यह संभव नहीं दिखता। इससे आम जान को प्रताड़ना और रिश्वत का शिकार होना होगा। अपवाद स्वरूप कोई मामला न्यायालय में पहुँच भी जाए तो फैसला होने तक किशोर अपराधी वृद्ध हो चुका होगा। अपराधी फिल्म अभिनेता, नेता पुत्र या महिला हुई तब तो उसका छूटना तय है। इस तरह के अनावश्यक और विवादस्पद निर्णय देकर अपनी अवमानना कराने का शौक़ीन न्यायालय आम आदमी में निर्णयों की अवहेलना करने की आदत डाल रहा है जो घातक सिद्ध होगी। बेहतर हो न्यायालय यह निर्णय वापिस ले ले।
***
लेखक संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ७९९९५५९६१८
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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

नवगीत

एक रचना
*
जुगनू हुए इकट्ठे
सूरज को कहते हैं बौना।
*
शिल्प-माफिया छाती ठोंके,
मुखपोथी कुरुक्षेत्र।
अँधरे पुजते दिव्य चक्षु बन,
गड़े शरम से नेत्र।
खाल शेर की ओढ़ दहाड़े
'चेंपो' गर्दभ-छौना।
जुगनू हुए इकट्ठे
सूरज को कहते हैं बौना।
*
भाव अभावों के ऊँचे हैं,
हुई नंगई फैशन।
पाचक चूर्ण-गोलियाँ गटकें,
कहें न पाया राशन।
'लिव इन' बरसों जिया,
मौज कर कहें 'छला बिन गौना।
*
स्यापा नकली, ताल ठोंकते
मठाधीश षडयंत्री।
शब्द-साधना मान रुदाली
रस भूसे खल तंत्री।
मुँह काला कर गर्वित,
खुद ही कहते लगा डिठौना।
***
संजीव
५-१२-२०१८

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

छंद सप्तक १

छंद सप्तक १.
*
शुभगति
कुछ तो कहो
चुप मत रहो
करवट बदल-
दुःख मत सहो
*
छवि
बन मनु महान
कर नित्य दान
तू हो न हीन-
निज यश बखान
*
गंग
मत भूल जाना
वादा निभाना
सीकर बहाना
गंगा नहाना
*
दोहा:
उषा गाल पर मल रहा, सूर्य विहँस सिंदूर।
कहे न तुझसे अधिक है, सुंदर कोई हूर।।
*
सोरठा
सलिल-धार में खूब,नृत्य करें रवि-रश्मियाँ।
जा प्राची में डूब, रवि ईर्ष्या से जल मरा।।
*
रोला
संसद में कानून, बना तोड़े खुद नेता।
पालन करे न आप, सीख औरों को देता।।
पाँच साल के बाद, माँगने मत जब आया।
आश्वासन दे दिया, न मत दे उसे छकाया।।
*
कुण्डलिया
बरसाने में श्याम ने, खूब जमाया रंग।
मैया चुप मुस्का रही, गोप-गोपियाँ तंग।।
गोप-गोपियाँ तंग, नहीं नटखट जब आता।
माखन-मिसरी नहीं, किसी को किंचित भाता।।
राधा पूछे "मजा, मिले क्या तरसाने में?"
उत्तर "तूने मजा, लिया था बरसाने में??"
*


समीक्षा: दोहा शतक मंजूषा

कृति चर्चा:
अगरबत्तियों की तरह महकता दोहा साक्षी समय का
डाॅ. प्रभा ब्यौहार
[कृति विवरण: दोहा दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला, दोहा दिव्य दिनेश, संपादक द्वय;  आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', डॉ. साधना वर्मा, प्रथम संस्करण २०१८, पृष्ठ प्रत्येक १६०, आवरण पेपरबैक-बहुरंगी, मूल्य क्रमश: २५०रु., २५०रु. व ३०० रु., प्रकाशक समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, संपादक संपर्क salil. sanjiv@gmail.com ]
जायसी का एक कथन हैः  
‘‘जो इतना जलेगा, वह कैसे नहीं महकेगा’’


                  यह उक्ति विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा "शांतिराज पुस्तक माला" के अंतर्गत सद्य
प्रकाशित दोहा संकलनत्रयी दोहा शतक मंजूषा भाग १ "दोहा-दोहा नर्मदा", भाग २ "दोहा सलिला निर्मला" तथा भाग ३ "दोहा दीप्त दिनेश" पर पूर्णत: चरितार्थ होती है। इस महत्वपूर्ण दोहा त्रयी को प्रकाशित किया है संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक गतिविधियों और हिंदी-लेखन को प्रोत्साहित कर रहे अव्यावसायिक प्रतिष्ठान समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर ने।

                  काव्य की प्रक्रिया मूलतः अत्यंत जटिल हैं सर्वप्रथम भाव बीजों का अंत:करण में स्फुटन फिर भाषा व छंद के माध्यम से ग्राहक अथवा सहृदय तक संप्रेषण और फिर कवि की मनःस्थिति के अनुरूप भोक्ता की मनःस्थिति से एकाकार होकर विभिन्न रसों को निष्पादित करना। इस समूची प्रक्रिया में कवि एक विशिष्ट संवेदनशील व्यक्ति दृष्टिगत होता है, जो काव्य की विविध शैलियों में से अपने अनुरूप किसी एक को चुनता है और उसे नये भाव, नये शब्द देता है।

                  दोहा वह काव्य विधा है जिसमें दोहा का संसार और जीवन के विविध अनुभवों से प्रभावित होकर काव्य पंक्तियाॅं कह उठता है जहाॅं तक उपर्युक्त दोहा संकलनों का प्रश्न है। संपादक संजीव वर्मा 'सलिल' ने

‘‘दोहा गाथा सनातन, शारद-कृपा पुनीत।
साॅंची साक्षी समय की, जनगण-मन की मीत।।’’

                  कहकर दोहों की परिभाषा, इतिहास, विस्तार पर गहन विवेचन प्रत्येक संकलन में किया है कि यह वह दोहा विधा है जो ‘‘जनगण-मन को मुग्ध कर, करे हृदय पर राज’’।  दोहों का विस्तृत इतिहास है अपभ्रंश से क्रमश: विविध बोलियों में होते हुए दोहा हिंदी के हृदय में आ विराजा है। चंदबरदाई, अमीर खुसरो, कबीर, तुलसीदास आदि के दोहे तो ग्रामीण अंचल के निरक्षरों के मुख से भी सुने जा सकते हैं।

                  उपर्युक्त तीन दोहा संकलनों में से प्रत्येक में १५-१५ दोहाकारों के १००-१०० दोहे हैं जो प्रत्येक दोहाकार का प्रतिनिधित्व करते है विधागत समानता के अतिरिक्त दोहों में अन्वति और बिंब योजना कई स्थानों पर दर्शनीय है। उदाहरणार्थ- 
अ. खेत से डोली चली, खलिहानों की ओर।
पिता गेह से ज्यों बिदा, पिया गेह की ओर।। -अखिलेश  खरे

ब. किरणों की है पालकी, सूरज बना कहार।
ऊषा कुलवधु सी लगे, धूप लगे गुलनार।। -जयप्रकाश श्रीवास्तव

स. झूमी फसलें खेत में, महक रही है बौर।
अमराई संसद बनी, है तोतों का शोर।। -अविनाश  ब्यौहार

द. अलस्सुबह उठ चाय में, घोला प्यार-दुलार। 
है! विधाता माँगते, प्रियतम क्यों अखबार।।  

                  इन दोहों का विष्लेषण करने पर मुख्यतः तीन विषय दृष्टिगत होते है-' प्रकृति या पर्यावरण के प्रति आकर्षण, जीवन और परिवार के प्रति रागात्मक रुझान जो सुखद संकेत देते हैं तथा राजनैतिक जीवन में ह्रास होते नैतिक मूल्य, निश्चय ही प्रकृति सौंदर्य को मनुष्य ही नष्ट कर रहा है और इसलिए "आदम के हाथों हुआ, है जंगल लहू लुहान"। और आवश्यक है-
"रक्षित कर वातावरण, बचा जीव अस्तित्व।
टालो महाविनाश को, रहे मनुज स्वामित्व।।"

                  परिवर्तित मूल्य, तकनालाॅजी के हस्तक्षेप से संबंधों का बिखराव हुआ, परिवार टूट रहें है मानों किसी ने जीवन में नागफनी बो दी है। अविनाश कह उठते हैः
"पत्थर का यह शहर है, यहाॅं बुतों का वास।"
                  राजनीति का क्षेत्र तो मूलहीनता के उस स्तर पर है कि प्रजातंत्र की अवधारणा ही नष्ट हो रही है। उपर्युक्त संकलनों के प्रत्येक दोहाकार के दोहे का अर्थ पूर्ण संप्रेषण करते है। छंद और भाषा कथ्य को स्पष्ट करते हैं। अभिधा, लक्षणा का अधिक प्रयोग है, व्यंजना का कम प्रयोग संभवतः कथन की स्पष्टता के लिए है।
                  दोहा त्रयी में लगभग दो हजार वर्षों की दोहा-यात्रा के पड़ाव, दोहा के तत्व, उच्चार नियम, रस प्रक्रिया, दोहा की विशेषताएँ, विविध रसों के दोहे, भाषा गीत, विविध भाषा-बोलिओं के दोहे, और गीत सम्राट नीरज, राजनेता-कवि अटल जी तथा महीयसी महादेवी जी को स्मरण कर संपादक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी ने वस्तुत: अपने संपादन नैपुण्य का परिचय दिया है। 
  
                  कुल मिलाकर दोहे प्रभावित करते हैं और निश्चय ही ४५ दोहाकार अगरबत्ती की काड़ियों की तरह देर तक महकते रहेंगे।
*****
संपर्क: खण्डेलवाल काॅम्पलेक्स, महानद्दा जबलपुर

रविवार, 2 दिसंबर 2018

अभियान साप्ताहिक कार्यक्रम

                          ॐ     
          - : विश्ववाणी हिंदी संस्थान : -
    अभियान - समन्वय प्रकाशन जबलपुर  
   ✆ संपर्क: ७९९९५५९६१८, ९६६९२५१३१९  
==============================
 । जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार।  
  । सलिल बचा पौधे लगा दें पुस्तक उपहार 
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मार्गदर्शन: आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी, ज्ञानरंजन,
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, पूर्णिमा बर्मन, आशा वर्मा, 
डॉ. निशा तिवारी, बिपिन बिहारी ब्योहार।  
परामर्श मंडल: अमरेंद्र नारायण, वीणा तिवारी, 
पूर्णेन्दु कुमार सिंह, गुरु सक्सेना, डॉ. प्रभा ब्योहार। 
संयोजक/संचालक: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
अध्यक्ष: बसंत शर्मा।  
उपाध्यक्ष: जयप्रकाश श्रीवास्तव, सुरेश तन्मय।  
सचिव: मिथिलेश बड़गैया। 
मुख्यालय सचिव: छाया सक्सेना।   
संगठन सचिव: शोभित वर्मा।   
प्रचार सचिव: इंद्र श्रीवास्तव, अविनाश ब्योहार। 
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☘☯☸☼⚙⚛⚝✆✇✍☏✑✪✫✿❀✽✱❋❄
   । हिंदी आटा माढ़िए, देशज मोयन डाल।  
  सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल   
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समय:  ६ बजे - १८ बजे तक। 
सोमवार: रस, छंद, अलंकार, मुक्तक काव्य, 
मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) आदि।      
प्रबंधक: मिथलेश बड़गैयाँ।       
प्रभारी: छाया सक्सेना, मीना भट्ट, छगनलाल गर्ग सिरोही।    
समीक्षक: अमरनाथ लखनऊ, प्रेमबिहारी मिश्र दिल्ली। 
-------------------------------------------------------
मंगलवार: कहानी, लघुकथा, विज्ञान कथा, बाल 
कथा, लोककथा, बोधकथा, पर्वकथा, उपन्यास आदि। 
प्रबंधक: राजकुमार महोबिआ उमरिया। 
प्रभारी: छाया त्रिवेदी, राजलक्ष्मी शिवहरे। 
समीक्षक: चंद्रकांता अग्निहोत्री पंचकूला, कांता रॉय भोपाल। 
----------------------------------------------------------- 
बुधवार:  गीत, नवगीत, बालगीत, राष्ट्रीय गीत, 
लोकगीत, प्रबंधकाव्य, खंडकाव्य, महाकाव्य आदि।  
प्रबंधक: अविनाश ब्योहार। 
प्रभारी: जयप्रकाश श्रीवास्तव, सुरेश तन्मय, अनिल 
मिश्र उमरिया । 
समीक्षक: संजीव तनहा एटा, राजा अवस्थी कटनी। 
------------------------------------------------------------                             
गुरुवार: व्यंग्य लेख, निबंध, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, 
नाटक, संस्मरण, पर्यटन वृत्त, जीवनी, पत्र साहित्य आदि।  
प्रबंधक: विवेकरंजन श्रीवास्तव।  
प्रभारी:  रमेश श्रीवास्तव 'चातक' सिवनी, रामकुमार 
चतुर्वेदी सिवनी।  
समीक्षक: राजेंद्र वर्मा लखनऊ, प्रतुल श्रीवास्तव। 
----------------------------------------------------------- 
शुक्रवार: पुस्तक-पत्रिका- अंतर्जाल समूह चर्चा,
भाषा, व्याकरण, मुहावरे, सुभाषित, तकनीकी लेख।  
प्रबंधक: प्रो. शोभित वर्मा। 
प्रभारी; सुरेंद्र सिंह पवार, रामकुमार वर्मा।          
समीक्षक: डॉ. अनामिका तिवारी, अवनीश 'अकेला' मेरठ। 
-------------------------------------------------------------------
शनिवार: कविता, क्षणिका, अन्य भाषाओँ के छंद (माहिया, 
लावणी, सॉनेट, हाइकु आदि) 
प्रबंधक: छाया सक्सेना। 
प्रभारी:  विजय बागरी, इंद्रबहादुर श्रीवास्तव, मनोज शुक्ल।   
समीक्षक: देवकीनंदन 'शांत' लखनऊ, गुरु सक्सेना गाडरवारा। 
--------------------------------------------------------------
रविवार:  संगीत (गायन, वादन), नृत्य, चित्रकला, 
ऑडियो/वीडियो, पर्यावरण, गृह सज्जा, पाक कला आदि। 
प्रबंधक: बसंत शर्मा।   
प्रभारी: शरद भटनागर मेरठ, अखिलेश खरे कटनी, संतोष 
शुक्ल ग्वालियर। 
समीक्षक:  अरुण अर्णव खरे बेंगलुरु।   
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द्विपदि (अश'आर)

आँख आँख से मिलाकर, आँख आँख में डूबती।
पानी पानी है मुई, आँख रह गई देखती।।
*
एड्स पीड़ित को मिलें एड्स, वो हारे न कभी।
मेरे मौला! मुझे सामर्थ्य, तनिक सी दे दे।।
*
बहा है पर्वतों से सागरों तक आप 'सलिल'।
समय दे रोक बहावों को, ये गवारा ही नहीं।।
*
आ काश! कि  आकाश साथ-साथ देखकर।
संजीव तनिक हो सके, 'सलिल' के साथ तू।।
*

पैरोडी- अजीबदास्तां है ये

ई मित्रता पर पैरोडी:
संजीव 'सलिल'
*
(बतर्ज़: अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...)
*
हवाई दोस्ती है ये,
निभाई जाए किस तरह?
मिलें तो किस तरह मिलें-
मिली नहीं हो जब वज़ह?
हवाई दोस्ती है ये...
*
सवाल इससे कीजिए?
जवाब उससे लीजिए.
नहीं है जिनसे वास्ता-
उन्हीं पे आप रीझिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
जमीं से आसमां मिले,
कली बिना ही गुल खिले.
न जिसका अंत है कहीं-
शुरू हुए हैं सिलसिले.
हवाई दोस्ती है ये...
*
दुआ-सलाम कीजिए,
अनाम नाम लीजिए.
न पाइए न खोइए-
'सलिल' न न ख्वाब देखिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*

चित्रगुप्त

चित्रगुप्त वंदना: १
धन-धन भाग हमारे
*
धन-धन भाग हमारे, प्रभु द्वार पधारे। 
शरणागत को ट्रेन, प्रभु द्वार पधारे....

माटी तन, चंचल अंतर्मन,
पारस हो प्रभु कर दो कंचन।
जनगण-प्राण पुकारे,
प्रभु द्वार पधारे....

प्रीत की रीत सदैव निभाई,
लाज भगत की दौड़ बचाई।
कबहुँ न मन से बिसारें,
प्रभु द्वार पधारे....

मिथ्या जग की तृष्णा-माया,
अक्षय प्रभु की अमृत छाया।
'सलिल' ईश-जय गा रे!
प्रभु द्वार पधारे....

संजीव
७९९९५५९६१८  

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

कुण्डलिया

कार्य शाला:
दोहा से कुण्डलिया 
*
बेटी जैसे धूप है, दिन भर करती बात।
शाम ढले पी घर चले, ले कर कुछ सौगात।।  -आभा सक्सेना 'दूनवी' 

लेकर कुछ सौगात, ढेर आशीष लुटाकर।
बोल अनबोले हो, जो भी हो चूक भुलाकर।। 
रखना हरदम याद, न हो किंचित भी हेटी। 
जाकर भी जा सकी, न दिल से प्यारी बेटी।। -संजीव वर्मा 'सलिल'
*** 
१.१२.२०१८