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सोमवार, 19 जून 2017

shuddhdhvani chhand

२४ जून १५६४ महारानी दुर्गावती शहादत दिवस पर विशेष रचना

















छंद सलिला: ​​​शुद्ध ध्वनि छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १८-८-८-६, पदांत गुरु

लक्षण छंद:
लाक्षणिक छंद है / शुद्धध्वनि पद / अंत करे गुरु / यश भी दे
यति रहे अठारह / आठ आठ छह, / विरुद गाइए / साहस ले
चौकल में जगण न / है वर्जित- करि/ए प्रयोग जब / मन चाहे
कह-सुन वक्ता-श्रो/ता हर्षित, सम / शब्द-गंग-रस / अवगाहे
.
उदाहरण:
१. बज उठे नगाड़े / गज चिंघाड़े / अंबर फाड़े / भोर हुआ
खुर पटकें घोड़े / बरबस दौड़े / संयम छोड़े / शोर हुआ
गरजे सेनानी / बल अभिमानी / मातु भवानी / जय रेवा
ले धनुष-बाण सज / बड़ा देव भज / सैनिक बोले / जय देवा
कर तिलक भाल पर / चूड़ी खनकीं / अँखियाँ छलकीं / वचन लिया
'सिर अरि का लेना / अपना देना / लजे न माँ का / दूध पिया'
''सौं मातु नरमदा / काली मैया / यवन मुंड की / माल चढ़ा
लोहू सें भर दौं / खप्पर तोरा / पिये जोगनी / शौर्य बढ़ा''

सज सैन्य चल पडी / शोधकर घड़ी / भेरी-घंटे / शंख बजे
दिल कँपे मुगल के / धड़-धड़ धड़के / टँगिया सम्मुख / प्राण तजे
गोटा जमाल था / घुला ताल में / पानी पी अति/सार हुआ
पेड़ों पर टँगे / धनुर्धारी मा/रें जीवन दु/श्वार हुआ

वीरनारायण अ/धार सिंह ने / मुगलों को दी / धूल चटा
रानी के घातक / वारों से था / मुग़ल सैन्य का / मान घटा
रूमी, कैथा भो/ज, बखीला, पं/डित मान मुबा/रक खां लें
डाकित, अर्जुनबै/स, शम्स, जगदे/व, महारख सँग / अरि-जानें
पर्वत से पत्थर / लुढ़काये कित/ने हो घायल / कुचल मरे-
था नत मस्तक लख / रण विक्रम, जय / स्वप्न टूटते / हुए लगे
बम बम भोले, जय / शिव शंकर, हर / हर नरमदा ल/गा नारा
ले जान हथेली / पर गोंडों ने / मुगलों को बढ़/-चढ़ मारा
आसफ खां हक्का / बक्का, छक्का / छूटा याद हु/ई मक्का
सैनिक चिल्लाते / हाय हाय अब / मरना है बिल/कुल पक्का
हो गयी साँझ निज / हार जान रण / छोड़ शिविर में / जान बचा
छिप गया: तोपखा/ना बुलवा, हो / सुबह चले फिर / दाँव नया
रानी बोलीं "हम/ला कर सारी / रात शत्रु को / पीटेंगे
सरदार न माने / रात करें आ/राम, सुबह रण / जीतेंगे
बस यहीं हो गयी / चूक बदनसिंह / ने शराब थी / पिलवाई
गद्दार भेदिया / देश द्रोह कर / रहा न किन्तु श/रम आई
सेनानी अलसा / जगे देर से / दुश्मन तोपों / ने घेरा
रानी ने बाजी / उलट देख सो/चा वन-पर्वत / हो डेरा
बारहा गाँव से / आगे बढ़कर / पार करें न/र्रइ नाला
नागा पर्वत पर / मुग़ल न लड़ पा/येंगे गोंड़ ब/नें ज्वाला

सब भेद बताकर / आसफ खां को / बदनसिंह था / हर्षाया
दुर्भाग्य घटाएँ / काली बनकर / आसमान पर / था छाया
डोभी समीप तट / बंध तोड़ मुग/लों ने पानी / दिया बहा
विधि का विधान पा/नी बरसा, कर / सकें पार सं/भव न रहा

हाथी-घोड़ों ने / निज सैनिक कुच/ले, घबरा रण / छोड़ दिया
मुगलों ने तोपों / से गोले बर/सा गोंडों को / घेर लिया
सैनिक घबराये / पर रानी सर/दारों सँग लड़/कर पीछे
कोशिश में थीं पल/टें बाजी, गिरि / पर चढ़ सकें, स/मर जीतें

रानी के शौर्य-पराक्रम ने दुश्मन का दिल दहलाया था
जा निकट बदन ने / रानी पर छिप / घातक तीर च/लाया था
तत्क्षण रानी ने / खींच तीर फें/का, जाना मु/श्किल बचना
नारायण रूमी / भोज बच्छ को / चौरा भेज, चु/ना मरना

बोलीं अधार से / 'वार करो, लो / प्राण, न दुश्मन / छू पाये'
चाहें अधार लें / उन्हें बचा, तब / तक थे शत्रु नि/कट आये
रानी ने भोंक कृ/पाण कहा: 'चौरा जाओ' फिर प्राण तजा
लड़ दूल्हा-बग्घ श/हीद हुए, सर/मन रानी को / देख गिरा

भौंचक आसफखाँ / शीश झुका, जय / पाकर भी थी / हार मिली
जनमाता दुर्गा/वती अमर, घर/-घर में पुजतीं / ज्यों देवी
पढ़ शौर्य कथा अब / भी जनगण, रा/नी को पूजा / करता है
जनहितकारी शा/सन खातिर नित / याद उन्हें ही / करता है

बारहा गाँव में / रानी सरमन /बग्घ दूल्ह के / कूर बना
ले कंकर एक र/खे हर जन, चुप / वीर जनों को / शीश नवा
हैं गाँव-गाँव में / रानी की प्रति/माएँ, हैं ता/लाब बने
शालाओं को भी , नाम मिला, उन/का- देखें ब/च्चे सपने

नव भारत की नि/र्माण प्रेरणा / बनी आज भी / हैं रानी
रानी दुर्गावति / हुईं अमर, जन / गण पूजे कह / कल्याणी
नर्मदासुता, चं/देल-गोंड की / कीर्ति अमर, दे/वी मैया
जय-जय गाएंगे / सदियों तक कवि/, पाकर कीर्ति क/था-छैंया
*********
टिप्पणी: कूर = समाधि,
दूरदर्शन पर दिखाई जा रही अकबर की छद्म महानता की पोल रानी की संघर्ष कथा खोलती है.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

बुधवार, 14 जून 2017

muktak

चंद मुक्तक
*
कलम तलवार से ज्यादा, कहा सच वार करती है.
जुबां नारी की लेकिन सबसे ज्यादा धार धरती है.
महाभारत कराया द्रौपदी के व्यंग बाणों ने-
नयन के तीर छेदें तो न दिल की हार खलती है..
*
कलम नीलाम होती रोज ही अखबार में देखो.
खबर बेची-खरीदी जा रही बाज़ार में लेखो.
न  माखनलाल जी ही हैं, नहीं विद्यार्थी जी हैं-
रखे अख़बार सब गिरवी  स्वयं सरकार ने देखो.
*
बहाते हैं वो आँसू छद्म, छलते जो रहे अब तक.
हजारों मर गए पर शर्म इनको आयी ना अब तक.
करो जूतों से पूजा देश के नेताओं की मिलकर-
करें गद्दारियाँ जो 'सलिल' पायें एक भी ना मत..
*
वसन हैं श्वेत-भगवा किन्तु मन काले लिये नेता.
सभी को सत्य मालुम, पर अधर अब तक सिये नेता.
सभी दोषी हैं इनको दंड दो, मत माफ़ तुम करना-
'सलिल' पी स्वार्थ की मदिरा सतत, अब तक जिए नेता..
*
जो सत्ता पा गए हैं बस चला तो देश बेचेंगे.
ये अपनी माँ के फाड़ें वस्त्र, तन का चीर खीचेंगे.
यही तो हैं असुर जो देश से गद्दारियाँ करते-
कहो कब हम जागेंगे और इनको दूर फेंकेंगे?
*
तराजू न्याय की थामे हुए हो जब कोई अंधा.
तो काले कोट क्यों करने से चूकें सत्य का धंधा.
खरीदी और बेची जा रही है न्याय की मूरत-
'सलिल' कोई न सूरत है न हो वातावरण गन्दा.
*
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

doha muktika

सामयिक दोहा मुक्तिका:
संदेहित किरदार.....
संजीव 'सलिल
*
लोकतंत्र को शोकतंत्र में, बदल रही सरकार.
असरदार सरदार सशंकित, संदेहित किरदार..

योगतंत्र के जननायक को, छलें कुटिल-मक्कार.
नेता-अफसर-सेठ बढ़ाते, प्रति पल भ्रष्टाचार..

आम आदमी बेबस-चिंतित, मूक-बधिर लाचार.
आसमान छूती मंहगाई, मेहनत जाती हार..

बहा पसीना नहीं पल रहा, अब कोई परिवार.
शासक है बेफिक्र, न दुःख का कोई पारावार..

राजनीति स्वार्थों की दलदल, मिटा रही सहकार.
देश बना बाज़ार- बिकाऊ, थाना-थानेदार..

अंधी न्याय-व्यवस्था, सच का कर न सके दीदार.
काले कोट दलाल- न सुनते, पीड़ित का चीत्कार..

जनमत द्रुपदसुता पर, करे दु:शासन निठुर प्रहार.
कृष्ण न कोई, कौन सकेगा, गीता-ध्वनि उच्चार?

सबका देश, देश के हैं सब, तोड़ भेद-दीवार.
श्रृद्धा-सुमन शहीदों को दें, बाँटें-पायें प्यार..

सिया जनास्था का कर पाता, वनवासी उद्धार.
सत्ताधारी भेजे वन को, हर युग में हर बार..

लिये खडाऊँ बापू की जो, वही बने बटमार.
'सलिल' असहमत जो वे भी हैं, पद के दावेदार..

'सलिल' एक है राह, जगे जन, सहे न अत्याचार.
अफसरशाही को निर्बल कर, छीने निज अधिकार..

*************

doha

दोहा सलिला

आम खास का खास है......

संजीव 'सलिल'

*

आम खास का खास है, खास आम का आम.

'सलिल' दाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

छककर खाएं अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

लंगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिनाबदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

'सलिल' आम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ', तोते जैसा चाम..

हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़े देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

'सलिल' आम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

*******
१४-६-२०११ 

muktak

मुक्तक
पलकें भिगाते तुम अगर बरसात हो जाती 
रोते अगर तो ज़िंदगी की मात हो जाती 
ख्वाबों में अगर देखते मंज़िल को नहीं तुम 
सच कहता हूँ मैं हौसलों की मात हो जाती 
*

baal geet

बाल गीत
सूरज
*
पर्वत-पीछे झाँके ऊषा
हाथ पकड़कर आया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
धूप संग इठलाया सूरज।
*
योग कर रहा संग पवन के
करे प्रार्थना भँवरे के सँग।
पैर पटकता मचल-मचलकर
धरती मैडम हुईं बहुत तँग।
तितली देखी आँखमिचौली
खेल-जीत इतराया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
नाक बहाता आया सूरज।
*
भाता है 'जन गण मन' गाना
चाहे दोहा-गीत सुनाना।
झूला झूले किरणों के सँग
सुने न, कोयल मारे ताना।
मेघा देख, मोर सँग नाचे
वर्षा-भीग नहाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
झूला पा मुस्काया सूरज।
*
खाँसा-छींका, आई रुलाई
मैया दिशा झींक-खिसियाई।
बापू गगन डॉक्टर लाया
डरा सूर्य जब सुई लगाई।
कड़वी गोली खा, संध्या का
सपना देख न पाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
कॉमिक पढ़ हर्षाया सूरज।
***

geet

अतिथि रचना
'कौन संकेत देता रहा'
कुसुम वीर
*
भोर में साथ उषा के जागा रवि, साँझ आभा सिन्दूरी लिए थी खड़ी 
कौन संकेत देता रहा रश्मि को, रास धरती से मिलकर रचाती रही
पलता अंकुर धरा की मृदुल कोख में, पल्लवित हो सृजन जग का करता रहा
गोधूलि के कण को समेटे शशि,चाँदनी संग नभ में विचरता रहा
सागर से लेकर उड़ा वाष्पकण, बन कर बादल बरसता-गरजता रहा
मेघ की ओट से झाँकती दामिनी, धरती मन प्रांगण को भिगोता रहा
उत्तालित लहर भाव के वेग में तट के आगोश से थी लिपटती रही
तरंगों की ताल पे नाचे सदा, सागर के संग-संग थिरकती रही
स्मित चाँदनी की बिखरती रही, आसमां' को उजाले में भरती रही
कौन संकेत देता रहा रात भर, सूनी गलियों की टोह वो लेती रही
पुष्प गुञ्जों में यौवन सरसता रहा, रंग वासन्त उनमें छिटकता रहा
कौन पाँखुर को करता सुवासित यहाँ, भ्रमर आ कर मकरन्द पीता रहा
झड़ने लगे शुष्क थे पात जो, नई कोंपल ने ताका ठूँठी डाल को
​शाख एक-दूजे से पूछने तब लगी, क्या जीवन का अंतिम प्रहर है यही
साँसों के चक्र में ज़िंदगी फिर रही, मौत के साये में उम्र भी घट रही
कब किसने सुना वक़्त की थाप को, रेत मुट्ठी से हर दम फिसलती रही
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सोमवार, 12 जून 2017

hasya kavita

एक रचना 
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता 
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता? 
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया उमा सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
नहीं किसी से एक सम्हलती, चार-चार को विहँस सम्हाले
ठेंगे का पुरुषार्थ गज़ब है, चारों हो हँस साथ दबा ले
'ही' हो या 'शी' रूप न बदले ठेंगा कभी न ठेंगी होता
है समाजवादी पक्का यह, कभी ना अपना धीरज खोता
बाप-चचा रह गए देखते, पूत-भतीजे के ठेंगे को
पंजे ने पंचर की सैकिल, सैकिल ने पटका पंजे को
 अन्शंबाज मुख्यमंत्री ने कृषकों को ठेंगा दिखलाया
आश्वासन से करी आरती, नव वादों का भोग लगाया
 ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
***

शुक्रवार, 9 जून 2017

भोपाल प्रवास.

भोपाल प्रवास :
मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिक अनुष्ठान 'गीत प्रसंग' में सहभागी होने आज रात्रि जबलपुर से भोपाल प्रस्थान, वापिसी रविवार शाम जन शताब्दी एक्सप्रेस से. मैं हॉटल रेसीडेंसी, महाराणा प्रताप नगर में ठहरूँगा. संपर्क ९४२५१८३२४४. कार्यक्रम स्थल: मायाराम सुरजन स्मृति भवन, पी. एंड टी. चौराहा, शास्त्री नगर भोपाल, संध्या ४ बजे से.

गुरुवार, 8 जून 2017

hindi haiku

लेख 
हिंदी ने बनाया बोनसाई हाइकु को वटवृक्ष 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हाइकु: असमाप्त काव्य का नैरन्तर्य:
पारम्परिक जापानी हाइकु (Haiku 俳句 high-koo) ३ पदावलियों में विभक्त, ५-७-५ अर्थात १७ ध्वनिखण्डों (लघुतम उच्चरित ध्वनि, अंग्रेजी में सिलेबलका समुच्चय है। हाइकु ऐसी लघु कवितायेँ हैं जो एक अनुभूति या छवि को व्यक्त करने के लिए संवेदी भाषा प्रयोग करती है हाइकु बहुधा प्रकृति के तत्व, सौंदर्य के पल या मार्मिक अनुभव से उद्भूत होते हैं हाइकु को असमाप्त काव्य कहा गया है। हाइकु में पाठक / श्रोता के मनोभावों के अनुसार पूर्ण किये जाने की अपेक्षा निहित होती है। 

कैनेथ यशुदा के अनुसार 'हाइकु' छंद की संज्ञा का विकास क्रम 'रेंगा' की तीन पंक्तियों से 'हाइकाइ', 'होक्कू' होकर 'हाइकु' है। हाइकु का उद्भव 'रेंगा नहीं हाइकाइ' (haikai no renga) सहयोगी काव्य समूह' जिसमें शताधिक छंद होते हैं से हुआ है'रेंगा' समूह का प्रारंभिक छंद 'होक्कु' मौसम तथा 'अंतिम शब्द' का संकेत करता है हाइकु अपने काव्य-शिल्प से परंपरा का नैरन्तर्य  बनाये रखता है। समकालिक हाइकुकार कम से कम शब्दों में लघु काव्य रचनाएँ करते हैं। यशुदा हाइकु को 'एक श्वासी काव्य' कहते हैं। हाइकु को तांका या वाका की प्रथम ३ पंक्तियाँ भी कहा गया है। जापानी समीक्षक कोजी कावामोटो के अनुसार मध्यकालीन दरबारी काव्य में स्थानीय देशज शब्दों की उपेक्षा तथा चीनी भाषा के शब्दों को लेने के विरोध में 'हाइकाइ' (उपहास काव्य) का जन्म हुआ जिसे बाशो जैसे कवियों ने गहनता, विस्तार तथा ऊँचाई से समृद्ध किया तथा हास्य काव्य को 'सेनर्यु' संज्ञा मिली।    

हाइकु: एक मुकम्मल कविता
डॉ. भगवत शरण अग्रवाल के अनुसार "कोई भी छंद हो वास्तव में तो वह संवेदनाओं का वाहक माध्यम भर ही होता है.... पाँच सात पाँच अक्षरों का फ्रेम ही हाइकु नहीं है। शुद्ध हाइकु एक मुकम्मिल कविता होता है।  सूत्र वाक्य के समान।... शुद्ध हाइकु रचना शास्त्रीय संगीत के सामान प्रत्येक कवि के वश की बात नहीं।"

बाँसुरी थी मैं / साँस-साँस बजती / दूसरी क्यों ली? -डॉ. सरोजिनी अग्रवाल 

हाइकु का वैशिष्ट्य
१. ध्वन्यात्मक संरचना: समय के साथ विकसित हाइकु काव्य के अधिकांश हाइकुकार अब ५-७-५ संरचना का अनुसरण नहीं करते। जापानी या अंग्रेजी के आधुनिक हाइकु न्यूनतम एक से लेकर सत्रह से अधिक ध्वनियों तक के होते हैं। अंग्रेजी सिलेबल लम्बाई में बहुत परिवर्तनशील होते है जबकि जापानी सिलेबल एकरूपेण लघु होते हैं।  इसलिए 'हाइकु' चंद ध्वनियों का उपयोग कर एक छवि निखारने' की पारम्परिक धारणा से हटकर रचे जा रहे हैं। १७ सिलेबल का अंग्रेजी हाइकु १७ सिलेबल के जापानी हाइकु की तुलना में बहुत लंबा होता है। ५-७-५ सिलेबल का बंधन बच्चों को विद्यालयों में पढाये जाने के बावजूद अंग्रेजी हाइकू लेखन में प्रभावशील नहीं है। हाइकु लेखन में सिलेबल निर्धारण के लिये जापानी अवधारणा "हाइकु एक श्वास में अभिव्यक्त कर सके" उपयुक्त है। अंग्रेजी में सामान्यतः इसका आशय १० से १४ सिलेबल लंबी पद्य रचना से है। अमेरिकन उपन्यासकार जैक कैरोक का एक हाइकू देखें:
Snow in my shoe  / Abandoned  / Sparrow's nest
मेरे जूते में बर्फ / परित्यक्त/ गौरैया-नीड़। 

२. वैचारिक सन्निकटता: हाइकु में दो विचार सन्निकट होते हैं। जापानी शब्द 'किरु' अर्थात 'काटना' का आशय है कि हाइकु में दो सन्निकट विचार हों जो व्याकरण की दृष्टि से स्वतंत्र तथा कल्पना प्रवणता की दृष्टि से भिन्न हों। सामान्यतः जापानी हाइकु 'किरेजी' (विभाजक शब्द) द्वारा विभक्त दो सन्निकट विचारों को समाहित कर एक सीधी पंक्ति में रचे जाते हैं। किरेजी (एक ध्वनि, पदावली, वाक्यांश) अंत में आती है। अंग्रेजी में किरेजी की अभिव्यक्ति - से की जाती है. बाशो के निम्न हाइकु में दो भिन्न विचारों की संलिप्तता देखें:
how cool the feeling of a wall against the feet — siesta
कितनी शीतल दीवार की अनुभूति पैर के विरुद्ध। 
आम तौर पर अंग्रेजी हाइकु ३ पंक्तियों में रचे जाते हैं। दो सन्निकट विचार (जिनके लिये २ पंक्तियाँ ही आवश्यक हैं) पंक्ति-भंग, विराम चिन्ह अथवा रिक्त स्थान द्वारा विभक्त किये जाते हैं। अमेरिकन कवि ली गर्गा का एक हाइकु देखें-
fresh scent- / the lebrador's muzzle  / deepar into snow            
ताज़ा सुगंध / लेब्राडोर की थूथन / गहरे बर्फ में। 

सारतः दोनों स्थितियों में, विचार- हाइकू का दो भागों में विषयांतर कर अन्तर्निहित तुलना द्वारा रचना के आशय को ऊँचाई देता है।  इस द्विभागी संरचना की प्रभावी निर्मिति से दो भागों के अंतर्संबंध तथा उनके मध्य की दूरी का परिहार हाइकु लेखन का कठिनतम भाग है। 

३. विषय चयन और मार्मिकता: पारम्परिक हाइकु मनुष्य के परिवेश, पर्यावरण और प्रकृति पर केंद्रित होता है। हाइकु को ध्यान की एक विधि के रूप में देखें जो स्वानुभूतिमूलक व्यक्तिनिष्ठ विश्लेषण या निर्णय आरोपित किये बिना वास्तविक वस्तुपरक छवि को सम्प्रेषित करती है। जब आप कुछ ऐसा देखें या अनुभव करे जो आपको अन्यों को बताने के लिए प्रेरित करे तो उसे 'ध्यान से देखें', यह अनुभूति हाइकु हेतु उपयुक्त हो सकती है। जापानी कवि क्षणभंगुर प्राकृतिक छवियाँ यथा मेंढक का तालाब में कूदना, पत्ती पर जल वृष्टि होना, हवा से फूल का झुकना आदि को ग्रहण व सम्प्रेषित करने के लिये हाइकु का उपयोग करते हैं। कई कवि 'गिंकगो वाक' (नयी प्रेरणा की तलाश में टहलना) करते हैं। आधुनिक हाइकु प्रकृति से परे हटकर शहरी वातावरण, भावनाओं, अनुभूतियों, संबंधों, उद्वेगों, आक्रोश, विरोध, आकांक्षा, हास्य आदि को हाइकु की विषयवस्तु बना रहे हैं। 

४. मौसमी संदर्भ: जापान हाइकु में 'किगो' (मौसमी बदलाव, ऋतु परिवर्तन आदि) अनिवार्य तत्व है। मौसमी संदर्भ स्पष्ट या प्रत्यक्ष (सावन, फागुन आदि) अथवा सांकेतिक या परोक्ष (ऋतु विशेष में खिलनेवाले फूल, मिलनेवाले फल, आनेवाले पर्व आदि) हो सकते हैं। फुकुडा चियो नी रचित हाइकु देखें:
morning glory! / the well bucket-entangled, /I ask for water                         
भोर की महिमा/ कुआँ - बाल्टी अनुबंधित / मैंने पानी माँगा। 

५. विषयांतर: हाइकु में दो सन्निकट विचारों की अनिवार्यता को देखते हुए चयनित विषय के परिदृश्य को इस प्रकार बदला जाता है कि रचना में २ भाग हो सकें। रिचर्ड राइट लकड़ी के लट्ठे पर रेंगती दीमक पर केंद्रित होते समय उस छवि को पूरे जंगल या दीमकों के निवास के साथ जोड़ा है। सन्निकटता तथा संलिप्तता हाइकु को सपाट वर्णन के स्थान पर गहराई तथा लाक्षणिकता प्रदान करती हैं:
A broken signboard banging  /In the April wind. / Whitecaps on the bay.     
टूटा साइनबोर्ड तड़क रहा है / अप्रैल की हवाओं में/  खाड़ी में झागदार लहरें। 

६. संवेदी भाषा-सूक्ष्म विवरण: हाइकु गहन निरीक्षणजनित सूक्ष्म विवरणों से निर्मित और संपन्न होता है।  हाइकुकार किसी घटना को साक्षीभाव (तटस्थता) से देखता है और अपनी आत्मानुभूति शब्दों में ढालकर अन्यों तक पहुँचाता है।  हाइकु का विषय चयन करने के पश्चात उन विवरणों का विचार करें जिन्हें आप हाइकु में देना चाहते हैं।  मस्तिष्क को विषयवस्तु पर केंद्रित कर विशिष्टताओं से जुड़े प्रश्नों का अन्वेषण करें। जैसे: अपने विषय के सम्बन्ध क्या देखा? कौन से रंग, संरचना, अंतर्विरोध, गति, दिशा, प्रवाह, मात्रा, परिमाण, गंध आदि तथा अपनी अनुभूति को आप कैसे सही-सही अभिव्यक्त कर सकते हैं?
ईंट-रेट का / मंदिर मनहर / ईश लापता।        

७. वर्णनात्मक नहीं दृश्यात्मक: हाइकु-लेखन वस्तुनिष्ठ अनुभव के पलों का अभिव्यक्तिकरण है न की उन घटनाओं का आत्मपरक या व्यक्तिपरक विश्लेषण या व्याख्या। हाइकू लेखन के माध्यम से पाठक/श्रोता को घटित का वास्तविक साक्षात कराना अभिप्रेत है न कि यह बताना कि घटना से आपके मन में क्या भावनाएँ उत्पन्न हुईं। घटना की छवि से पाठक / श्रोता को उसकी अपनी भावनाएँ अनुभव करने दें।  अतिसूक्ष्म, न्यूनोक्ति (घटित को कम कर कहना) छवि का प्रयोग करें। यथा: ग्रीष्म पर केंद्रित होने के स्थान पर सूर्य के झुकाव या वायु के भारीपन पर प्रकाश डालें। घिसे-पिटे शब्दों या पंक्तियों जैसे अँधेरी तूफानी रात आदि का उपयोग न कर पाठक / श्रोता को उसकी अपनी पर्यवेक्षण उपयोग करने दें। वर्ण्य छवि के माध्यम से मौलिक, अन्वेषणात्मक भाषा / शंब्दों की तलाश कर अपना आशय सम्प्रेषित करें। इसका आशय यह नहीं है कि शब्दकोष लेकर अप्रचलित शब्द खोजकर प्रयोग करें अपितु अपने जो देखा और जो आप दिखाना चाहते हैं उसे अपनी वास्तविक भाषा में स्वाभाविकता से व्यक्त करें।
वृष देव को / नमन मनुज का / सदा छाँव दो।    
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लहर पर / मचलती चाँदनी / मछली जैसी। -सिद्धेश्वर 


८. किरेजी: हाइकु शिल्प का एक महत्त्वपूर्ण अंग है "किरेजि"। "किरेजि" का स्पष्ट अर्थ देना कठिन है, शाब्दिक अर्थ है "काटने वाला अक्षर"। इसे हिंदी में ''वाचक शब्द'' कहा जा सकता है। "किरेजि" जापानी कविता में शब्द-संयम की आवश्यकता से उत्पन्न रूढ़ि-शब्द है जो अपने आप में किसी विशिष्ट अर्थ का द्योतक न होते हुए भी पाद-पूर्ति में सहायक होकर कविता के सम्पूर्णार्थ में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है। सोगि (१४२०-१५०२) के समय में १८ किरेजि निश्चित हो चुके थे। समय के साथ इनकी संख्या बढ़ती रही। महत्त्वपूर्ण किरेजि है- या, केरि, का ना, और जो। "या" कर्ता का अथवा अहा, अरे, अच्छा आदि का बोध कराता है। 
यथा- आरा उमि या / सादो नि योकोतोओ / आमा नो गावा [ "या" किरेजि] 
अशांत सागर / सादो तक फैली है / नभ गंगा 
-[ जापानी हाइकु और आधुनिक हिन्दी कविता, डा० सत्यभूषण वर्मा, पृष्ठ ५५-५६ ]


९. पठन, प्रेरणा और अभ्यास: अन्य भाषाओँ- बोलिओं के हाइकुकारों के हाइकू पढ़िए। अन्यों के हाइकू पढ़ने से आपके अंदर छिपी प्रतिभा स्फुरित तथा गतिशील होती है। महान हाइकुकारों ने हाइकु रचना की प्रेरणा हेतु चतुर्दिक पदयात्रा, परिवेश से समन्वय तथा प्रकृति से बातचीत को आवश्यक कहा है।आज करे सो अब: कागज़-कलम अपने साथ हमेशा रखें ताकि पंक्तियाँ जैसे ही उतरें, लिख सकें। आप कभी पूर्वानुमान नहीं कर सकते कि कब जलधारा में पाषाण का कोई दृश्य, सुरंग पथ पर फुदकता चूहा या सुदूर पहाड़ी पर बादलों की टोपी आपको हाइकु लिखने के लिये प्रेरित कर देगी।किसी भी अन्य कला की तरह ही हाइकू लेखन कला भी आते-आते ही आती है सर्वकालिक महानतम हाइकुकार बाशो के अनुसार हर हाइकु को हजारों बार जीभ पर दोहराएं, हर हाइकू को कागज लिखें, लिखें और फिर-फिर लिखें जब तक कि उसका निहितार्थ स्पष्ट न हो जाए स्मरण रहे कि आपको ५-७-५ सिलेबल के बंधन में कैद नहीं होना है वास्तविक साहित्यिक हाइकु में 'किगो' द्विभागी सन्निकट संरचना और प्राथमिक तौर पर संवादी छवि होती है

हाइकु का हिंदी संस्कार:
१. तीन पंक्ति, ५-७-५ बंधन रूढ़:  निस्संदेह जापानी हाइकु को हिंदी हाइकुकारों ने हिंदी का भाषिक संस्कार और भारतीय परिवेश के अनुकूल कलेवर से संयुक्त कर लोकप्रिय बनाया है किन्तु यह भी उतना ही सच है कि जापानी और अन्य भाषाओँ में हाइकु रचनाओं में ५-७-५ के ध्वनिखंड बंधन तथा तीन पंक्ति बंधन को लचीले रूप में अपनाया गया जबकि हिंदी में इसे अनुल्लंघनीय मान लिया गया है। इसका कारण हिंदी की वार्णिक तथा मात्रिक छंद परंपरा है जहाँ अल्प घटा-बढ़ी से भिन्न छंद उपस्थित हो जाता है 

२. तुकसाम्यता: हाइकु में सामान्यतः तुकसाम्यता, छंदबद्धता या काफ़िया नहीं होता। हिंदी हाइकुकारों में तुकांतता के प्रति आग्रह हठधर्मी तक है। तुकांतता रचना को गेय और सरस तो बनाती है किंतु बहुधा कथ्य के चाक्षुस बिम्बों को कमजोर भी करती है। हिंदी हाइकु में पहली दो, अंतिम दो तथा पहली तीसरी पंक्ति में सामान तुक रख कर शैल्पिक वैविध्य उत्पान किये जाने से पठनीयता तथा सरसता में वृद्धि होती है किन्तु यह स्वाभाविकता को नष्ट कट ठूंसा गया नहीं प्रतीत होना चाहिए 

३. औचित्य: हिंदी जगत में हाइकु का विरोध और समर्थन दोनों हुआ है। विरोधियों ने भारत में गायत्री, ककुप आदि त्रिपदिक छंद होने के तर्क देकर छंद आयात को अनावश्यक कहा। हाइकु का भारतीयकरण कर त्रिपदी, त्रिशूल आदि नाम देकर छंद रचना का प्रयास लोकप्रिय नहीं हुआ डॉ.ओमप्रकाश भाटिया 'अराज' ने दोहा के बिषम चरण की तीन आवृत्तियों से निर्मित 'जनक छंद' की अवधारणा देकर तथा अन्यों ने सम चरण की तीन आवृत्ति, सम-विषम सम चरण, विषम-सम-विषम चरण से छंद बनाकर हाइकु का विकल्प सुझाया किंतु वह सर्व स्वीकार्य नहीं है निस्संदेह आज हाइकु को हिंदी में व्यवहार जगत छंद स्वीकारा जा चुका है किन्तु पिंगल ग्रंथों में इसे हिंदी छंद के रूप में स्थान मिलना शेष है मैंने अपने प्रकाशनाधीन ग्रन्थ 'हिंदी छंद कोष' में पंजाबी के माहिया, मराठी के लावणी, जापानी के हाइकु, वाका, तांका, स्नैर्यु, चोका, सेदोका आदि, अंग्रेजी के सोनेट, कपलेट आदि को हिंदी छंदों के रूप में जोड़ा है   

४. अलंकार: जापानी हाइकु में उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि अलंकारों के प्रयोग और प्रकृति के मानवीकरण को वर्ज्य मानते हुए हाइकु को सहज अभिव्यक्ति के कविता कहा गया है। हिंदी में महाकवि केशव का मत सर्वमान्य है- 'भूषण बिना न सोहहीं कविता, वनिता, वित्त' जापानी हाइकु में श्लाघ्य 'सहजता' भी हिंदी में 'स्वभावोक्ति अलंकार' बन जाती है। भारत और हिंदी के संस्कार हाइकु में अलंकारों की उपस्थिति अनिवार्य बना देते हैं  

५. सामासिकता तथा संयोजक चिन्ह: लघुकाव्य में 'ऊहा' और 'सामासिकता' का समान महत्व है संस्कृत, गुजराती आदि में विभक्ति-प्रयोग से अक्षर बचाए जाते हैं जबकि हिंदी में कारक का प्रयोग अक्षरों की संख्या वृद्धि करता है। संयोजक चिन्ह के प्रयोग से अक्षर संख्या कम की जा सकती है मेरे कुछ प्रयोग दृष्टव्य हैं 

मैथिली हाइकु: स्नेह करब / हमर मंत्र अछि / गले लगबै
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६. नव प्रयोग: हिंदी में हाइकु को एक छंद के रूप में स्वीकारते हुए कुछ स्वाभाविक और व्यवहारिक तथा कुछ अतिरेकी प्रयोग किये गए हैं। इससे हिंदी हाइकु को अन्य भाषाओँ के हाइकु की तुलना में वृहत्तर भूमिका निर्वहन का अवसर उपलब्ध हुआ है। डॉ. राम नारायण पटेल 'राम ' ने प्रथम हाइकु खंड काव्य वियोगिनी सन १९९८ में प्रकाशित किया। डॉ. राज गोस्वामी ने १९९९ में श्रीमद्भागवत का काव्यानुवाद हाइकु में  किया। श्री नलिनी कांत ने १०११ हाइकु 'हाइकु शब्द छवि' शीर्षक से २००४ में प्रकाशित किये। ललिता रावल ने मालवी हाइकु संग्रह 'थाली में चंदरमा' २००४ तथा 'बिलपत्तर' २०१० प्रकाशित किये हैं। हिंदी में अनेक हाइकु संग्रह और संकलन प्रकशित हुए जिनका उल्लेख स्थानाभाव के कारण नहीं किया जा रहा 

७. रस वर्षण: हाइकु में विविध रसों की नदी प्रवाहित करने में हिंदी पीछे नहीं है। मन्वंतर ने हास्य हाइकु रचकर १९९४-९५ में नया प्रयोग किया-
हास्य हाइकु:  अजब गेट / कोई न जाए पार / रे! कोलगेट।
                  एक ही सेंट / नहीं सकते सूंघ / है परसेंट।
                  कौन सी बला / मानी जाती है कला? / बजा तबला।

७. नव छंद रचना: हिंदी ने हाइकु को नया आकाश और नए आयाम देकर उसे वटवृक्ष की सी भूमिका निर्वाह करने का अवसर दिया है। हिंदी में हाइकु दोहा, हाइकु ग़ज़ल, हाइकु कुंडली, हाइकु गीत, हाइकु नवगीत जैसे प्रयोगों ने उसे नवजीवन दिया है। मेरी जानकारी में किसी भी अन्य भाषा में हाइकु के ऐसे बहुआयामी प्रयोग नहीं किये गए। प्रस्तुत हैं एक हाइकु गीत, एक हाइकु ग़ज़ल

हाइकु गीत:
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रेवा लहरें
झुनझुना बजातीं
लोरी सुनातीं
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मन लुभातीं
अठखेलियाँ कर
पीड़ा भुलातीं
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राई सुनातीं  
मछलियों के संग
रासें रचातीं
.
रेवा लहरें
हँस खिलखिलातीं
ठेंगा दिखातीं 

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कुनमुनातीं
सुबह से गले मिल
जागें मुस्कातीं
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चहचहातीं
चिरैयाँ तो खुद भी
गुनगुनातीं
.
रेवा लहरें
झट फिसल जातीं 
हाथ न आतीं
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हाइकु  ग़ज़ल-
नव दुर्गा का, हर नव दिन हो, मंगलकारी
नेह नर्मदा, जन-मन रंजक, संकटहारी

मैं-तू रहें न, दो मिल-जुलकर एक हो सकें
सुविचारों के, सुमन सुवासित, जीवन-क्यारी

गले लगाये, दिल को दिल खिल, गीत सुनाये
हों शरारतें, नटखटपन मन,-रञ्जनकारी 

भारतवासी, सकल विश्व पर, प्यार लुटाते
संत-विरागी, सत-शिव-सुंदर, छटा निहारी 

भाग्य-विधाता, लगन-परिश्रम, साथ हमारे
स्वेद बहाया, लगन लगाकर, दशा सुधारी

पंचतत्व का, तन मन-मंदिर,  कर्म धर्म है
सत्य साधना, 'सलिल' करे बन, मौन पुजारी
(वार्णिक हाइकु छन्द ५-७-५)

हिंदी ने जापानी छंद को न केवल अपनाया उसका भारतीयकरण और हिंदीकरण कर उसे अपने रंग में रंगकर बोनसाई से वट वृक्ष बना दिया। किसी भी अन्य भाषा न हाइकु को वह उड़ान नहीं दी जो हिंदी ने दी
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संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१ ८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com