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गुरुवार, 12 नवंबर 2015

apanhuti alankar

अलंकार सलिला: ३०  
अपन्हुति अलंकार

*













*
प्रस्तुत का वारण जहाँ, वहीं अपन्हुति मीत
कर निषेध उपमेय का, हो उपमान सप्रीत 
'अपन्हुति' का अर्थ है वारण या निषेध करना, छिपाना, प्रगट न होने देना आदि. इसलिए इस अलंकार में प्रायः निषेध देखा जाता है प्रकृत, प्रस्तुत या उपमेय का प्रतिषेध कर अन्य अप्रस्तुत या उपमान का आरोप या स्थापना किया जाए तो 'अपन्हुति अलंकार' होता है। जहाँ उपमेय का निषेध कर उसमें उपमान का आरोप किया जाये वहाँ 'अपन्हुति अलंकार' होता है
प्रस्तुत या उपमेय का, लें निषेध यदि देख
अलंकार तब अपन्हुति, पल में करिए लेख
प्रस्तुत का वारण जहाँ, वहीं अपन्हुति मीत
आरोपित हो अप्रस्तुत, 'सलिल' मानिये रीत
१. हेम सुधा यह किन्तु है सुधा रूप सत्संग
    यहाँ सुधा पर सुधा का आरोप करना के लिए उसमें अमृत के गुण का निषेध किया गया है अतः, अपन्हुति अलंकार है
२.सत्य कहहूँ हौं दीनदयाला, बन्धु न होय मोर यह काला
    यहाँ प्रस्तुत उपमेय 'बन्धु' का निषेध कर अप्रस्तुत उपमान 'काल' की स्थापना किये जाने से अपन्हुति अलंकार है
३. फूलों पत्तों सकल पर हैं वारि बूँदें लखातीं
    रोते हैं या निपट सब यों आँसुओं को दिखाके
    प्रकृत उपमेय 'वारि बूँदे' का निषेधकर 'आँसुओं' की स्थापना किये जाने के कारण यहाँ ही अपन्हुति है
४.अंग-अंग जारति अरि, तीछन ज्वाला-जाल
    सिन्धु उठी बडवाग्नि यह, नहीं इंदु भव-भाल
    अत्यंत तीक्ष्ण ज्वालाओं के जाल में अंग-प्रत्यंग जलने का कारण सिन्धु की बडवाग्नि नहीं,  शिव के शीश पर चन्द्र का स्थापित होना है. प्रस्तुत उपमेय 'बडवाग्नि' का प्रतिषेध कर अन्य  उपमान 'शिव'-शीश' की स्थापना के कारण अपन्हुति है.
५.छग जल युक्त भजन मंडल को, अलकें श्यामन थीं घेरे
    ओस भरे पंकज ऊपर थे, मधुकर माला के डेरे
    यहाँ भक्ति-भाव में लीन भक्तजनों के सजल नयनों को घेरे काली अलकों के स्थापित उपमेय  का निषेध कर प्रातःकाल तुहिन कणों से सज्जित कमल पुष्पों को घेरे भँवरों के अप्रस्तुत उपमान को स्थापित किया गया है. अतः अपन्हुति अलंकार है.
.हैं नहीं कुल-श्रेष्ठ, अंधे ही यहाँ हैं
    भक्तवत्सल साँवरे, बोलो कहाँ हैं?   -सलिल
    यहाँ द्रौपदी द्वारा प्रस्तुत उपमेय कुल-श्रेष्ठ का निषेध कर अप्रस्तुत उपमान अंधे की स्थापना की गयी है. अतः, अपन्हुति है.
७.संसद से जन-प्रतिनिधि गायब
    बैठे कुछ मक्कार हैं -सलिल
    यहाँ उपमेय 'जनप्रतिनिधि' का निषेध कर उपमान 'मक्कार' की स्थापना किये जाने से अपन्हुति है.
८. अरी सखी! यह मुख नहीं, यह है अमल मयंक 
९. किरण नहीं, पावक के कण ये जगतीतल पर गिरते हैं 
१०. सुधा सुधा प्यारे! नहीं, सुधा अहै सतसंग 
११. यह न चाँदनी, चाँदनी शिला 'मरमरी श्वेत 
१२. चंद चंद आली! नहीं, राधा मुख है चंद 
१३. अरध रात वह आवै मौन 
     सुंदरता बरनै कहि कौन?  
     देखत ही मन होय अनंद
     क्यों सखि! पियमुख? ना सखि चंद
अपन्हुति अलंकार के प्रकार: 
'यहाँ' नहीं 'वह' अपन्हुति', अलंकार लें जान
छः प्रकार रोचक 'सलिल', रसानंद की खान
प्रस्तुत या उपमेय का निषेध कर अप्रस्तुत की स्थापना करने पर अपन्हुति अलंकार जन्मता है. इसके छः भेद हैं.
१. शुद्धापन्हुति:
जहाँ पर प्रकृत उपमेय को छिपाकर या उसका प्रतिषेध कर अन्य अप्रस्तुत का निषेधात्मक शब्दों में आरोप किया जाता है.
१. ऊधो यह सूधो सो संदेसो कहि दीजो भलो,
    हरि सों हमारे ह्यां न फूले वन कुञ्ज हैं
    किंसुक गुलाब कचनार औ' अनारन की
     डारन पै डोलत अन्गारन के पुंज हैं
२. ये न मग हैं तव चरण की रेखियाँ हैं
    बलि दिशा की ओर देखा-देखियाँ हैं
    विश्व पर पद से लिखे कृति-लेख हैं ये
    धरा-तीर्थों की दिशा की मेख हैं ये
३. ये न न्यायाधीश हैं, 
    धृतराष्ट्र हैं ये
    न्याय ये देते नहीं हैं, 
    तोलते हैं
४. नहीं जनसेवक
    महज सत्ता-पिपासु,
    आज नेता बन
    लूटते देश को हैं
५. अब कहाँ कविता?
    महज तुकबन्दियाँ हैं, 
    भावना बिन रचित  
    शाब्दिक-मंडियाँ हैं  
२. हेत्वापन्हुति:
जहाँ प्रस्तुत का प्रतिषेध कर अप्रस्तुत का आरोप करते समय हेतु या कारण स्पष्ट किया जाए वहाँ हेत्वापन्हुति अलंकार होता है.
१. रात माँझ रवि होत नहिं, ससि नहिं तीव्र सुलाग
    उठी लखन अवलोकिये, वारिधि सों बड़बाग
२. ये नहिं फूल गुलाब के, दाहत हियो अपार
    बिनु घनश्याम अराम में, लगी दुसह दवार
३. अंक नहीं है पयोधि के पंक को औ' वसि बंक कलंक न जागै
    छाहौं नहीं छिति की परसै अरु धूमौ नहीं बड़वागि को पागै
    मैं मन वीचि कियो निह्चै रघुनाथ सुनो सुनतै भ्रम भागै
    ईठिन या के डिठौना दिया जेहि काहू वियोगी की डीठि न लागै
४. पहले आँखों में थे, मानस में कूद-मग्न प्रिय अब थे
    छींटे वहीं उड़े थे, बड़े-बड़े ये अश्रु कब थे.
५. गुरु नहीं, शिक्षक महज सेवक 
     साध्य विद्या नहीं निज देयक।  
३. पर्यस्तापन्हुति: 
जहाँ उपमेय या वास्तविक धर्मी में धर्म का निषेध कर अन्य में उसका आरोप जाता है वहाँ पर्यस्तापन्हुति अलंकार होता है
१. आपने कर्म करि हौं हि निबहौंगो तौ तो हौं ही करतार करतार तुम काहे के?
२. मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है
    भेंट जहाँ मस्ती की मिलती वह मेरी मधुशाला है
३ . जहाँ दुःख-दर्द
    जनता के सुने जाएँ
    न वह संसद
    जहाँ स्वार्थों का
    सौदा हो रहा
    है देश की संसद
४. चमक न बाकी चन्द्र में 
    चमके चेहरा खूब
५. डिग्रियाँ पाई, 
     न लेकिन ज्ञान पाया। 
     लगी जब ठोकर
     तभी कुछ जान पाया  
४. भ्रान्त्य अपन्हुति:
जहाँ किसी कारणवश भ्रम हो जाने पर सच्ची बात कहकर भ्रम का निवारण किया जाता है और उसमें कोई चमत्कार रहता है, वहाँ भ्रान्त्यापन्हुति अलंकार होता है
१. खायो कै अमल कै हिये में छायो निरवेद जड़ता को मंत्र पढि नायो शीश काहू अरि
    कै लग्यो है प्रेत कै लग्यो है कहूँ नेह हेत सूखि रह्यो बदन नयन रहे आँसू भरि
    बावरी की ऐसी दशा रावरी दिखाई देति रघुनाथ इ भयो जब मन में रो गयो डरि
    सखिन के टरै गरो भरे हाथ बाँसुरी देहरे कही-सुनी आजु बाँसुरी बजाई हरि
२. आली लाली लखि डरपि, जनु टेरहु नंदलाल
    फूले सघन पलास ये, नहिं दावानल ज्वाल    
३. डहकु न है उजियरिया, निसि नहिं घाम
    जगत जरत अस लाग, मोहिं बिनु राम
४. सर्प जान सब डर भगे, डरें न व्यर्थ सुजान
    रस्सी है यह सर्प सी, किन्तु नहीं है जान
५. बिन बदरा बरसात? 
    न, सिर धो आयी गोरी
    टप-टप बूँदें टपकाती 
    फिरती है भोरी
५. छेकापन्हुति:
जहाँ गुप्त बात प्रगट होने की आशंका से चतुराईपूर्वक मिथ्या समाधान से निषेध कर उसे छिपाया जाता है वहाँ छेकापन्हुति अलंकार होता है
१. अंग रंग साँवरो सुगंधन सो ल्प्तानो पीट पट पोषित पराग रूचि वरकी
    करे मधुपान मंद मंजुल करत गान रघुनाथ मिल्यो आन गली कुञ्ज घर की
    देखत बिकानी छबि मो पै न बखानी जाति कहति ही सखी सों त्यों बोली और उरकी
    भली भईं तोही मिले कमलनयन परत नहीं सखी मैं तो कही बात मधुकर की
२. अर्धनिशा वह आयो भौन
    सुन्दरता वरनै कहि कौन?
    निरखत ही मन भयो अनंद
    क्यों सखी साजन?
    नहिं सखि चंद
३. श्यामल तन पीरो वसन मिलो सघन बन भोर
    देखो नंदकिशोर अलि? ना सखि अलि चितचोर
४. चाहें सत्ता?, 
    नहीं-नहीं, 
    जनसेवा है लक्ष्य
५. करें चिकित्सा डॉक्टर 
     बिना रोग पहचान
     धोखा करें मरीज से?
     नहीं, करें अनुमान।     
६. कैतवापन्हुति:
जहाँ प्रस्तुत का प्रत्यक्ष निषेध न कर चतुराई से किसी व्याज (बहाने) से उसका निषेध किया जाता है वहाँ कैतवापन्हुति अलंकार होता है कैटव में बहाने से, मिस, व्याज, कारण आदि शब्दों द्वारा उपमेय का निषेध कर उपमान का होना कहा जाता है 
१. लालिमा श्री तरवारि के तेज में सारदा लौं सुखमा की निसेनी
    नूपुर नील मनीन जड़े जमुना जगै जौहर में सुखदेनी
    यौं लछिराम छटा नखनौल तरंगिनी गंग प्रभा फल पैनी
    मैथिली के चरणाम्बुज व्याज लसै मिथिला मग मंजु त्रिवेनी। 
२. मुख के मिस देखो उग्यो यह निकलंक मयंक 
३. नूतन  पवन के मिस प्रकृति ने सांस ली जी खोल के 
    यह नूतन पवन नहीं है,प्रकृति की सांस है 
४. निपट नीरव ही मिस ओस के 
    रजनि थी अश्रु गिरा रही 
    ओस नहीं, आँसू हैं 
५. जनसेवा के वास्ते 
    जनप्रतिनिधि वे बन गये,
    हैं न प्रतिनिधि नेता हैं
=========================  निरंतर
 आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', 

बुधवार, 11 नवंबर 2015

geet

एक रचना
: पाँच पर्व :











*
पाँच तत्व की देह है,
ज्ञाननेद्रिय हैं पाँच।
कर्मेन्द्रिय भी पाँच हैं,
पाँच पर्व हैं साँच।।
*











माटी की यह देह है,
माटी का संसार।
माटी बनती दीप चुप,
देती जग उजियार।।
कच्ची माटी को पका
पक्का करती आँच।
अगन-लगन का मेल ही
पाँच मार्ग का साँच।।
*











हाथ न सूझे हाथ को
अँधियारी हो रात।
तप-पौरुष ही दे सके
हर विपदा को मात।।
नारी धीरज मीत की
आपद में हो जाँच।
धर्म कर्म का मर्म है
पाँच तत्व में जाँच।।
*









बिन रमेश भी रमा का
तनिक न घटता मान।
ऋद्धि-सिद्धि बिन गजानन
हैं शुभत्व की खान।।
रहें न संग लेकिन पूजें
कर्म-कुंडली बाँच।
अचल-अटल विश्वास ही
पाँच देव हैं साँच।।
*









धन्वन्तरि दें स्वास्थ्य-धनहरि दें रक्षा-रूप।
श्री-समृद्धि, गणपति-मति
देकर करें अनूप।।
गोवर्धन पय अमिय दे
अन्नकूट कर खाँच।
बहिनों का आशीष ले
पाँच शक्ति शुभ साँच।।
*










पवन, भूत, शर, अँगुलि मिल
हर मुश्किल लें जीत।
पाँच प्राण मिल जतन कर
करें ईश से प्रीत।।
परमेश्वर बस पंच में
करें न्याय ज्यों काँच।
बाल न बाँका हो सके
पाँच अमृत है साँच










*****

mahalakshayamashtak stotra

II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II मूल पाठ-तद्रिन, हिंदी काव्यानुवाद-संजीव 'सलिल' II ॐ II











II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते I शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II१II सुरपूजित श्रीपीठ विराजित, नमन महामाया शत-शत. शंख चक्र कर-गदा सुशोभित, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. नमस्ते गरुड़ारूढ़े कोलासुर भयंकरी I सर्व पापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II२II कोलाsसुरमर्दिनी भवानी, गरुड़ासीना नम्र नमन. सरे पाप-ताप की हर्ता, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी I सर्व दु:ख हरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II३II सर्वज्ञा वरदायिनी मैया, अरि-दुष्टों को भयकारी. सब दुःखहरनेवाली, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. सिद्धि-बुद्धिप्रदे देवी भुक्ति-मुक्ति प्रदायनी I मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II४II भुक्ति-मुक्तिदात्री माँ कमला, सिद्धि-बुद्धिदात्री मैया. सदा मन्त्र में मूर्तित हो माँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. आद्यांतर हिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी I योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II५II हे महेश्वरी! आदिशक्ति हे!, अंतर्मन में बसो सदा. योग्जनित संभूत योग से, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. स्थूल-सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोsदरे I महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II६II महाशक्ति हे! महोदरा हे!, महारुद्रा सूक्ष्म-स्थूल. महापापहारी श्री देवी, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी I परमेशीजगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II७II कमलासन पर सदा सुशोभित, परमब्रम्ह का रूप शुभे. जगज्जननि परमेशी माता, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते I जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II८II दिव्य विविध आभूषणभूषित, श्वेतवसनधारे मैया. जग में स्थित हे जगमाता!, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. महा लक्ष्यमष्टकस्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: I सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यंप्राप्नोति सर्वदा II९II जो नर पढ़ते भक्ति-भाव से, महालक्ष्मी का स्तोत्र. पाते सुख धन राज्य सिद्धियाँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. एककालं पठेन्नित्यं महापाप विनाशनं I द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन-धान्यसमन्वित: II१०II एक समय जो पाठ करें नित, उनके मिटते पाप सकल. पढ़ें दो समय मिले धान्य-धन, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनं I महालक्ष्मीर्भवैन्नित्यं प्रसन्नावरदाशुभा II११II तीन समय नित अष्टक पढ़िये, महाशत्रुओं का हो नाश. हो प्रसन्न वर देती मैया, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. II तद्रिन्कृत: श्री महालक्ष्यमष्टकस्तोत्रं संपूर्णं II तद्रिंरचित, सलिल-अनुवादित, महालक्ष्मी अष्टक पूर्ण. नित पढ़ श्री समृद्धि यश सुख लें, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. ******************************************* आरती क्यों और कैसे? संजीव 'सलिल' * ईश्वर के आव्हान तथा पूजन के पश्चात् भगवान की आरती, नैवेद्य (भोग) समर्पण तथा अंत में विसर्जन किया जाता है। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। आरती करने ही नहीं, इसमें सम्मिलित होंने से भी पुण्य मिलता है। देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। आरती का गायन स्पष्ट, शुद्ध तथा उच्च स्वर से किया जाता है। इस मध्य शंख, मृदंग, ढोल, नगाड़े , घड़ियाल, मंजीरे, मटका आदि मंगल वाद्य बजाकर जयकारा लगाया जाना चाहिए। आरती हेतु शुभ पात्र में विषम संख्या (1, 3, 5 या 7) में रुई या कपास से बनी बत्तियां रखकर गाय के दूध से निर्मित शुद्ध घी भरें। दीप-बाती जलाएं। एक थाली या तश्तरी में अक्षत (चांवल) के दाने रखकर उस पर आरती रखें। आरती का जल, चन्दन, रोली, हल्दी तथा पुष्प से पूजन करें। आरती को तीन या पाँच बार घड़ी के काँटों की दिशा में गोलाकार तथा अर्ध गोलाकार घुमाएँ। आरती गायन पूर्ण होने तक यह क्रम जरी रहे। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। आरती पूर्ण होने पर थाली में अक्षत पर कपूर रखकर जलाएं तथा कपूर से आरती करते हुए मन्त्र पढ़ें: कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारं। सदावसन्तं हृदयारवंदे, भवं भवानी सहितं नमामि।। पांच बत्तियों से आरती को पंच प्रदीप या पंचारती कहते हैं। यह शरीर के पंच-प्राणों या पञ्च तत्वों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव पंच-प्राणों (पूर्ण चेतना) से ईश्वर को पुकारने का हो। दीप-ज्योति जीवात्मा की प्रतीक है। आरती करते समय ज्योति का बुझना अशुभ, अमंगलसूचक होता है। आरती पूर्ण होने पर घड़ी के काँटों की दिशा में अपने स्थान पट तीन परिक्रमा करते हुए मन्त्र पढ़ें: यानि कानि च पापानि, जन्मान्तर कृतानि च। तानि-तानि प्रदक्ष्यंती, प्रदक्षिणां पदे-पदे।। अब आरती पर से तीन बार जल घुमाकर पृथ्वी पर छोड़ें। आरती प्रभु की प्रतिमा के समीप लेजाकर दाहिने हाथ से प्रभु को आरती दें। अंत में स्वयं आरती लें तथा सभी उपस्थितों को आरती दें। आरती देने-लेने के लिए दीप-ज्योति के निकट कुछ क्षण हथेली रखकर सिर तथा चेहरे पर फिराएं तथा दंडवत प्रणाम करें। सामान्यतः आरती लेते समय थाली में कुछ धन रखा जाता है जिसे पुरोहित या पुजारी ग्रहण करता है। भाव यह हो कि दीप की ऊर्जा हमारी अंतरात्मा को जागृत करे तथा ज्योति के प्रकाश से हमारा चेहरा दमकता रहे। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं। कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं। यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है। जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं। दीपमालिका कल हर दीपक अमल-विमल यश-कीर्ति धवल दे...... शक्ति-शारदा-लक्ष्मी मैया, 'सलिल' सौख्य-संतोष नवल दें...

सोमवार, 9 नवंबर 2015

laghukatha

लघुकथाः
जीवन मूल्य
*
फेसबुक पर मित्रता अनुरोध पाकर उसका प्रोफाइल देखा, पति एक छोटा व्यवसायी, एक बच्चा, एक बच्ची। रचनाओं की प्रशंसा कर उसने मेरे बारे में पूछा तो मैंने सहज भाव से उत्तर दे दिया। कुछ दिन औपचारिक चैट-चर्चा के बाद उसने पति की कम आय और आर्थिक कठिनाई की चर्चा की।

दो शिशुओं की शिक्षा आदि पर संभावित व्यय को देखते हुए मैंने उसे पति के व्यवसाय में सहयोग करने अथवा खुद कुछ काम करने का परामर्श दिया। वह कैसे भी सरकारी नौकरी चाहती थी। मैंने स्पष्ट कहा कि सामान्य द्वितीय श्रेणी से स्नातक के लिये सरकारी नौकरी संभव नहीं है। घर से दूर कुछ हजार रुपये की निजी नौकरी में बच्चों की देखरेख नहीं हो सकेगी, बेहतर है मीठा-नमकीन, बड़ी-पापड़ आदि बनाकर दोपहर में बैंक, कॉलेज, सरकारी दफ्तरों में कार्यरत महिलाओं को बेचे। कम पूँजी में अच्छा लाभ हो सकता है, चूँकि नौकरीपेशा महिलायें इस कार्य के लिये समय नहीं निकाल पातीं, बाजार भाव से १०% कम कीमत में अच्छा सामान जरूर खरीदेंगी, फिर भी पूँजी से दोगुना लाभ होगा।

उसने उत्तर दिया कि इस सबमें बहुत समय बर्बाद होगा। उसे बहुत जल्दी और अधिक धन चाहिए ताकि चैन की ज़िंदगी जी सके। मैंने सोच लिया उसे उसके हाल पर छोड़ दूँ। अचानक उसका सन्देश आया आपसे कुछ पूछूँ बुरा तो नहीं मानेंगे? पूछो कहते ही सन्देश मिला मैं आपके शहर में जहाँ आप कहें आ जाऊँ तो मुझे आपके साथ रात बिताने का कितना रूपया देंगे?

काटो तो खून नहीं की स्थिति में मेरा मस्तिष्क चकरा गया, तुरंत उससे पूछा कि किसी की विवाहिता और दो-दो बच्चों की माँ होते हुए भी वह अपने पिता के समान के व्यक्ति से ऐसा कैसे कह सकती है? बच्चों और गृहस्थी पर कैसा दुष्प्रभाव होगा क्या सोचा है? पति की कमाई में कुछ संयम से इज्जत की ज़िंदगी गुजरना बहुत अच्छा है। अब मुझसे संपर्क न करे। मैंने अपनी मित्र मंडली से उसे निकाल दिया। यदा-कदा अब भी फेसबुक पर उसकी क्षमायाचना और शुभकामनायें रचनाओं की प्रतिक्रिया में प्राप्त होती है पर मैं उत्तर न देने की अशिष्टता के अलावा कुछ नहीं कर पाता, किन्तु चिंतित अवश्य करते है बदलते जीवन मूल्य।

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laghukatha

 लघुकथा:
धनतेरस
*
वह कचरे के ढेर में रोज की तरह कुछ बीन रहा था, बुलाया तो चला आया। त्यौहार के दिन भी इस गंदगी में? घर कहाँ है? वहां साफ़-सफाई क्यों नहीं करते?त्यौहार नहीं मनाओगे? मैंने पूछा।
'क्यों नहीं मनाऊँगा?, प्लास्टिक बटोरकर सेठ को दूँगा जो पैसे मिलेंगे उससे लाई और दिया लूँगा।' उसने कहा।
'मैं लाई और दिया दूँ तो मेरा काम करोगे?' कुछ पल सोचकर उसने हामी भर दी और मेरे कहे अनुसार सड़क पर नलके से नहाकर घर आ गया। मैंने बच्चे के एक जोड़ी कपड़े उसे पहनने को दिए, दो रोटी खाने को दी और सामान लेने बाजार चल दी। रास्ते में उसने बताया नाले किनारे झोपड़ी में रहता है, माँ बुखार के कारण काम नहीं कर पा रही, पिता नहीं है।
ख़रीदे सामान की थैली उठाये हुए वह मेरे साथ घर लौटा, कुछ रूपए, दिए, लाई, मिठाई और साबुन की एक बट्टी दी तो वह प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखते हुए पूछा: 'ये मेरे लिए?' मैंने हाँ कहा तो उसके चहरे पर ख़ुशी की हल्की सी रेखा दिखी। 'मैं जाऊं?' शीघ्रता से पूछ उसने कि कहीं मैं सामान वापिस न ले लूँ। 'जाकर अपनी झोपडी, कपडे और माँ के कपड़े साफ़ करना, माँ से पूछकर दिए जलाना और कल से यहाँ काम करने आना, बाक़ी बात मैं तुम्हारी माँ से कर लूँगी।
'क्या कर रही हो, ये गंदे बच्चे चोर होते हैं, भगादो' पड़ोसन ने मुझे चेताया। गंदे तो ये हमारे फेंके कचरे को बीनने से होते हैं। ये कचरा न उठायें तो हमारे चारों तरफ कचरा ही कचरा हो जाए। हमारे बच्चों की तरह उसका भी मन करता होगा त्यौहार मनाने का।
'हाँ, तुम ठीक कह रही हो। हम तो मनायेंगे ही, इस बरस उसकी भी मन सकेगी धनतेरस'
कहते हुए ये घर में आ रहे थे और बच्चे के चहरे पर चमक रहा था थोड़ा सा चन्द्रमा।
**********

dhanteras


धनतेरसपर विशेष गीत...

प्रभु धन दे...

संजीव 'सलिल'
*
प्रभु धन दे निर्धन मत करना.
माटी को कंचन मत करना.....
*
निर्बल के बल रहो राम जी,
निर्धन के धन रहो राम जी.
मात्र न तन, मन रहो राम जी-
धूल न, चंदन रहो राम जी..

भूमि-सुता तज राजसूय में-
प्रतिमा रख वंदन मत करना.....
*
मृदुल कीर्ति प्रतिभा सुनाम जी.
देना सम सुख-दुःख अनाम जी.
हो अकाम-निष्काम काम जी- 
आरक्षण बिन भू सुधाम जी..

वन, गिरि, ताल, नदी, पशु-पक्षी-
सिसक रहे क्रंदन मत करना.....
*
बिन रमेश क्यों रमा राम जी,
चोरों के आ रहीं काम जी?
श्री गणेश को लिये वाम जी.
पाती हैं जग के प्रणाम जी..

माटी मस्तक तिलक बने पर-
आँखों का अंजन मत करना.....
*
साध्य न केवल रहे चाम जी,
अधिक न मोहे टीम-टाम जी.
जब देना हो दो विराम जी-
लेकिन लेना तनिक थाम जी..

कुछ रच पाए कलम सार्थक-
निरुद्देश्य मंचन मत करना..
*
अब न सुनामी हो सुनाम जी,
शांति-राज दे, लो प्रणाम जी.
'सलिल' सभी के सदा काम जी-
आये, चल दे कर सलाम जी..

निठुर-काल के व्याल-जाल का
मोह-पाश व्यंजन मत करना.....
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रविवार, 8 नवंबर 2015

samiksha

कृति चर्चा:
अल्लाखोह मची - नवगीतीय भाव-भंगिमा मँजी 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
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[कृति विवरण: अल्लाखोह मची, नवगीत संग्रह, रामकिशोर दाहिया, वर्ष २०१४, ३००/-, पृष्ठ १४३, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, सजिल्द, जैकेट सहित, उद्भावना प्रकाशन, एच ५५ सेक्टर २३, राजनगर, गाज़ियाबाद, चलभाष: ९८११५८२९०२, नवगीतकार संपर्क: गौर मार्ग, दुर्गा चौक, जुहला कटनी ४८३५०१, चलभाष: ०९७५२५३९८९६]
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'अल्लाखोह मची' अर्थात 'हाहाकार मचा' ऐसी नवगीत कृति है जिसका शीर्षक ही उसके रचनाकार की  दृष्टि और सृष्टि, परिवेश और परिस्थिति, आभ्यंतरिक अन्तर्वस्तु  और बाह्य आचरणजनित प्रभावों का संकेत करता है। नवगीत की रचना वैयक्तिक दर्द और पीड़ाजनित न होकर सामूहिक और पारिस्थितिक वैषम्य एवं विडम्बनाकारित अनुभूतियों के सम्प्रेषण हेतु की जाती है। नवगीत का प्रादुर्भाव होता है या वह रचा जाता है, आदिकवि वाल्मीकि रचित प्रथम काव्य पंक्तियों की तरह नवगीत किसी घटना की स्वत: स्फूर्त  प्राकृतिक क्रिया है अथवा किसी घटना या किन्हीं घटनाओं के कारण उत्पन्न प्रतिक्रियाओं के संचित होते जाने और निराकृत न होने पर रचनाकार के सुचिंतन का सारांश इस पर मत वैभिन्न्य हो सकता है किन्तु यह लगभग निर्विवाद है कि नवगीत आम जन की अनुभूतियों का शब्दांकन है, न कि व्यक्तिगत चिन्तन का प्रस्तुतीकरण। विवेच्य कृति की हर रचना गीतकार के साक्षीभाव का प्रमाण है। 

श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार श्री अवधबिहारी श्रीवास्तव के अनुसार 'ईमानदार कवि ने जो करीब से देखा, महसूस किया, भीतर-भीतर जिन घटनाओं की संवेदना उसके भीतर उतर गयी है, उस सच का बयान है, ये गीत फैशन और बहाव में लिखे गीत नहीं हैं. ये गीत एयरकण्डीशनरों में बैठकर कल्पना से गाँव, गरीबी, परिश्रम और पसीने का अनुगायन नहीं है। इन्हें एक गरीब किसान के बेटे ने कड़ी धूप में खड़े होकर भूख और प्यास की पीड़ा सहते हुए धरती की छाती पर लिखा है, इसीलिये इनके गीतों में पसीने से भीगी माटी की गंध आ रही है।' खुद रामकिशोर जी मानते हैं कि उनका लेखन 'घुटन, टूटन, संत्रास, उपेक्षा के शिकार, संघर्षरत आम आदमी की समस्याओं को ज्यों का त्यों रेखांकित करने का प्रयास है।' प्रयास हमेशा सायास होता है, अनायास नहीं। 'ज्यों का त्यों सायास' प्रस्तुतिकरण इन नवगीतों का प्रथम वैशिष्ट्य है।

इन नवगीतों का दूसरा वैशिष्ट्य 'स्वर में आक्रामकता' है, वैषम्य और विडम्बनाओं के प्रहार निरंतर सहनेवाला मन  कितना भी भीरु हो, उनमें सुधारने और सुधार न सके तो तोड़ने की प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है। एक बच्चे के पास कोई खिलौना हो और दूसरे के पास न हो तो वह  खिलौना पाने की ज़िद करता है और न मिलने पर तोड़ देता है, भले ही बाद में दंडित हो। यह आक्रामकता इन गीतों में है। 

                                      शीश नहीं / कंधे पर लेकिन / रुण्ड हवा में / लाठी भाँजे।
सोना-तपा / खरा हो निकला / चमका जितना / छीले-माँजे।     

इस आक्रामकता को दिशाहीन होने से जो प्रवृत्ति बचाती है वह है 'गाम्भीर्य'। संयोगवश रामकिशोर जी शिक्षक हैं, वे रचनाकार का गंभीर होना उसका नैतिक दायित्व मानते हैं तो शिक्षक का संयमित होना कैसे भूल सकते हैं? आक्रामकता, गंभीरता और संयम की त्रिवेणी इन नवगीतों को उनके गाँव में प्रवहित झिरगिरी नदी के प्रवाह की तरह उफनने, गरजने, शांत होने, तृषा हरने की प्रवृत्ति से युक्त करते हैं। 

ईंधन आग / जलाने के हम / फिर से / झोंके गए भाड़ में । 
जान सौंपकर / किये काम को / ताकत-हिम्मत / रही हाड़ में । 

इन नवगीतों  का सर्वाधिक उल्लेखनीय तत्व इनकी लोकधर्मिता है। यह लोकधर्मिता रामकिशोर जी को उनके लोकगायक पिता से विरासत में मिली है। बुंदेलखंड-बघेलखण्ड का सीमावर्ती अंचल बुढ़ार, उमरिया, मानपुर, बरही आदि कुछ समय के लिए मेरा और लम्बे समय तक रामकिशोर जी का कार्यक्षेत्र रहा है। वे नयी पीढ़ी को शिक्षित करने में जुटे थे और मैं नदियों पर सेतु परियोजनाओं के प्रस्ताव तैयार करने और निर्माण कराने में जुटा था। तब हमारी भेंट भले ही नहीं हो सकी किन्तु अंचल के आदमी के अभाव, दर्द, बेचैनी, उकताहट के साक्षी होने का अवसर अवश्य ही दोनों को मिला। वहाँ रहकर देखने, भोगने और सीखने के काल ने वह पैनी दृष्टि दी जो आवरणों को भेदकर सत्य की प्रतीति कर सके। 

फूटी पाँव / बिवाई धरती / एक बूँद भी / लगे इमरती 
भारी महा गिरानी / आसों बादल टाँगे पानी। 
आधा डोल / कहे अब आके। / कुएँ लगे पेंदी से जाके। 
गया और / जलस्तर नीचे। / सावन सूखा पड़ा उलीचे। 

'सावन सूखा' की विडंबना लगातार झेलती पीड़ा का संवेदनशील चक्षुसाक्षी, नीरो की तरह वेणुवादन कर प्रेम और शांति  के राग नहीं गा सकता। कादम्बरीकार बाणभट्ट और मेघदूत सर्जक कालिदास के काल से विंध्याटवी के इस अंचल में लगातार वन कटने, पहाड़ खुदने और नदियों का जलग्रहण क्षेत्र घटने के बाद भी अकल्पनीय प्राकृतिक सौंदर्य है। सौंदर्य कितना भी नैसर्गिक और दिव्य हो उससे क्षुधा और तृषा शांत नहीं होती। जाने-अनजाने कोलाहल को जीता-पीता हुआ वह मोहकवादियों में भी तपिश अनुभव करता है।

अंतहीन / जलने की पीड़ा / मैं बिन तेल दिया की बाती।
मन के भीतर / जलप्रपात है / धुआँधार की मोहकवादी।
सलिल कणों में / दिन उगते ही / माचिस की तीली टपका दी।  
सूख रही / नर्मदा पेट से / ऊपर जलती धू-धू छाती।
निर्जन वन का / सूनापन भी / भरे कोलाहल भीतर जैसे।
मैं विस्मित हूँ / खोह विजन में / चिल-कूट करते तीतर कैसे? 

बरसों से जड़वत-निष्ठुर राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था और अधिकाधिक संवेदहीन-प्रभावहीन होती सांस्कृतिक-साहित्यिक विरासत सिर्फ और सिर्फ असंतोष को जन्म देती है जो घनीभूत होकर क्षोभ और आक्रोश की अभिव्यक्ति कर नवगीत बन जाती है। विडंबना यह कि विदेशी शासकों के विरुद्ध विद्रोह करने पर देशप्रेम और जनसमर्थन तो प्राप्त होता पर तथाकथित स्वदेशी सम्प्रभुओं ने वह राह भी नहीं छोड़ी है। अब शासन-प्रशासन के विरुद्ध जाने की परिणति नक्सलवादऔर आतंकवाद में होती है। इस संग्रह के प्रथम खंड 'धधकी आग तबाही' के अंतर्गत समाहित नवगीत अनसुनी-अनदेखी शिकायतों के जीवंत दस्तावेज हैं-

डंपर-ट्रॉली / ढोते ट्रक हैं / नंबर दो की रेत। 
महानदी के / तट कैसे / दाबे कुचले खेत।  
लिखी शिकायत / केश उखाड़े / सबको गया टटोला। 
पीली-लाल / बत्तियों पर / संयुक्त मोर्चा खोला। 
छान-बीन / तफ्तीशें जारी / डंडे भूत-परेत। 

असंतुष्ट पर से भूत-प्रेत उतारते व्यवस्था के डंडे कल से कल तक का अकाट्य सत्य है।  आम आदमी को इस सत्य से जूझते देख उसकी जिजीविषा पर विस्मिय होता है। रामकिशोर जी का अंदाज़े-बयां 'कम लिखे से जादा समझना' की परिपाटी का पालन करता है-

दवा सरीखे / भोजन मिलता / रस में टँगा मरीज रहा हूँ।
दैनिक / वेतनभोगी की मैं / फटती हुई कमीज रहा हूँ।
गर्दन से / कब सिर उतार दे / पैनी खड्ग / व्यवस्था इतनी।.... 
.... झोपड़पट्टी के / आँगन में / राखी-कजली / तीज रहा हूँ।

आम आदमी की यह ताकत जो उसे राखी, कजली, तीज अर्थात पारिवारिक-सामाजिक संबंधों के अनुबंधों से मिलती है, वही सर्वस्व ध्वंस के अवांछित रास्तों पर जाने से रोकती है किन्तु अंतत: इससे मुक्ताकाश में पर तौलने के इच्छुक पर कतरे जाकर बकौल रहीम 'रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय' कहते हैं तो आम आदमी की जुबान से सिर्फ यह कह पाते हैं- 

मेरी पीड़ा मेरा धन है। / नहीं बाँटता मेरा मन है। 
सूम बने रहना / ही बेहतर / खुशहाली में घर-आँगन है।    

संग्रह का दूसरा खंड 'पागल हुआ रमोली' के हुआ सवेरा जैसे गीत कवि के अंतर्मन में बैठे आशावादी शिक्षक की वाणी हैं- 'उठ जा बेटे! हुआ सवेरा । /  हुई भोर है गया अँधेरा। / जागा सूरज खोले आँखें / फ़ैल रही किरणों की पाँखें'। नवाशा का यह स्वर भोर की ताजगी की ही तरह शीघ्र ही गायब हो जाता है और शेष रह जाती है 'मूँड़ फूट जाएगा लगता / हींसों के बँटवारे में' की आशंका, 'लाल-पीली / बत्तियों का / हो गया / कानून बंधुआ' का कड़वा सच, 'ले गयी है / बाढ़ हमसे / छीनकर घर-द्वार पूरा' का दर्द,  'वजनदार हो फ़ाइल सरके / बाबू बैठा हुआ अकड़ के / पटवारी का काला-पीला' से उपजा शोषण, 'झमर-झिमिर भी / बरसे पानी / हालत सार-सरीखी घर की' की बेचारगी, 'चांवल, दाल / गेहूं सोना है। / रोजी-रोटी का रोना है' की विवशता, 'खौल रहा / अंदर से लेकिन / बना हुआ गंभीर लेड़ैया / नहीं बोलता / हुआ हुआ का' की हताशा और 'झोपड़पट्टी टूट रही है / सिर की छाया छूट रही है .... चलता / छाती पर / बुलडोजर / बेजा कब्जा खाली होता' की आश्रय हीनता।

'मेरी अपनी जीवन शैली / अलग सोच की अलग / कहन है' कहनेवाले रामकिशोर जी का शब्द भण्डार स्पृहणीय है। वे कुनैते, दुनका, चरेरू, बम्हनौही, कनफोर, क़मरी, सरौधा, अइसन, हींसा, हरैया, आसन, पिटपासों, दुनपट, फरके, छींदी, तरोगा, चिंगुटे, हँकरा, गुंगुआना, डहडक, टूका, पुरौती, ठोंढ़ा, तुम्मी, अकिल, पतुरिया, कुदारी, चुरिया, मिड़वइया आदि देशज बुंदेली-बघेली शब्द, इंटरनेट, लान, ड्रीम, डम्पर, ट्रॉली, ट्रक, नंबर, लीज, लिस्ट, सील, साइन, एटम बम, कोर्ट, मार्किट, रेडीमेड, ऑप्शन, मशीन, पेपरवेट, रेट, कंप्यूटर, ड्यूटी जैसे अंग्रेजी शब्द तथा फरेब, रोज, किस्मत, रकम, हकीम, ऐब, रौशनी, रिश्ते, ज़हर, अहसान, हर्फ़, हौसला, बोटी, आफत, कानून, बख्शें, गुरेज, खानगी, फरमाइश, बेताबी, खुराफात, सोहबत, ख़ामोशी, फ़क़त, दहशत, औकात आदि उर्दू शब्द खड़ी हिंदी के साथ समान सहजता और सार्थकता के साथ उपयोग कर पाते हैं। पूर्व नवगीत संग्रह की तरह ठेठ देशज शब्दों के अर्थ पाद टिप्पणी में दिए जान शहरी तथा अन्य अंचलों के पाठकों के लिए आवश्यक है क्योंकि ऐसे शब्दों के अर्थ सामान्य शब्दकोशों में भी नहीं मिलते हैं। 

'अपने दम पर / मैं अभाव के / छक्के छुड़ा दिआ', 'मैं फरेबी धुंध की / वह छोर खोजा हूँ'  जैसी एक-दो त्रुटिपूर्ण अभिव्यक्ति के अपवाद को छोड़कर पूर्ण संग्रह भाषिक दृष्टि से निर्दोष है। पारम्परिक गीत की छंदरूढ़ता और प्रगतिवादी काव्य की छंदहीनता के बीच सहज साध्य छंदयोजना के अपनाते हुए रामकिशोर जी इन नवगीतों की लयबद्धता को सरस और रूचि पूर्ण रख सके हैं। 'ज़िंदा सरोधा' शीर्षक नवगीत के मुखड़े में २३ मात्रिक छंद रौद्राक जातीय उपमान छंद का, मुखड़े में २६ मात्रिक महाभागवत जातीय छंद का, 'भरे कोलाहल भीतर', 'रस में टँगा मरीज' शीर्षक नवगीतों के मुखड़े-अंतरों में ३२ मात्रिक लाक्षणिक छंद,  'रुण्ड हवा में' शीर्षक नवगीत के मुखड़े में ४२ मात्रिक कोदंड जातीय तथा अँतरे में ३२ मात्रिक लाक्षणिक जातीय छंद का, 'घूँघट वाला अँचरा' में ३० मात्रिक महातैथिक जातीय छंद का मुखड़ा, २८ मात्रिक यौगिक जातीय छंद का अन्तरा, 'हींसों के बँटवारे' में ३० मात्रिक महातैथिक जातीय छंद का मुखड़ा तथा १६ मात्रिक संस्कारी जातीय ७ पंक्तियों का अंतरा प्रयोग किया गया है। अपवादस्वरूप कुछ नवगीतों में अंतरों में भी अलग-अलग छंद प्रयुक्त हुए है जो नवगीतकार की प्रयोगधर्मिता को इंगित करता है।

समीक्ष्य संग्रह के नवगीत रामकिशोर के व्यक्तित्व और चिंतन के प्रतीति कराते हैं। लेखनमें किसी अन्य से प्रभावित हुए बिना अपनी लीक आप बनाते हुए, पारम्परिकता, नवता और स्वीकार्यता की त्रिवेणी प्रवाहित करते हुए रामकिशोर जी के अगले संकलन की प्रतीक्षा हेतु उत्सुकता जगाता है यह संग्रह।

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-समन्वयम २०४ विजय, अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, सुभद्रा वार्ड, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ salil.sanjiv@gmail.com, o७६१ २४१११३१ / ९४२५१८३२४४ 
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laghukatha

लघुकथा:
थोड़ा सा चन्द्रमा
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अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रवेश, पति को हृद्रोग दोनों सूचनाएँ साथ-साथ पाकर उनका जी धक से रह गया... अपना बक्सा खोला उसमें रखे पैसे गिने, बैंक की पास बुक देखी, दवाई-इलाज का काम तो खींच-तान कर चला लेंगी पर अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रवेश कैसे?, प्रवेश न कराये तो बच्चे का भविष्य अंधकारमय, पति के लिये तनाव भी घातक, क्या करें?…

''आइये, आइये' दरवाज़े पर उन्हें ठिठका देख मैंने पूछा 'कहिये, डॉक्टर क्या कह रहे हैं?' और सोफे पर बैठने का संकेत किया।

खुद को संयत करते हुए उन्होंने उक्त परिस्थति की चर्चाकर मागदर्शन चाहा। एक क्षण को मैं हतप्रभ हुआ,क्या कहूँ? परिस्थिति वाकई जटिल थी। कुछ सोचकर कहा: 'फ़िक्र न करें,हम सब मिलकर स्थिति को सुलझा लेंगे। बच्चे को कितनी फीस कब भरनी है बता दें, मैं बैंक से लाकर भिजवा दूँगा, आप इलाज पर ध्यान दें।'

'आपसे यही उम्मीद थी, पर ५ साल पढ़ाई का खर्च कैसे? अभी २ माह ये नौकरी पर भी नहीं जा सकेंगे, तनखा भी बाद में ही मिलेगी' -वे बोलीं, चाहती तो नहीं थी पर मजबूरी में आपसे …

इस बीच मैं अपना मन स्थिर कर चुका था कहा: 'आपने तुरंत बताकर बिलकुल ठीक किया। एक ही रास्ता है लेकिन आपको बहुत मेहनत'

'मैं कुछ भी कर लूँगी' मेरे वाक्य पूरा करने के पहले ही बोल पड़ीं वे और फिर अपनी हड़बड़ी पर झेंप भी गयीं।

'मुझे कार्यालय के मित्रों को पार्टी देना है, ये कॉलेज में ही इतना थक जाती हैं कि चाह कर भी बना नहीं पाएंगी औए बाजार का बना मैं खिलाना नहीं चाहता, सामान भेज दूँ तो बना देंगी मेरे लिये?' मैंने उन्हें मिठाई-नमकीन की सूची दे दी। उन्हें अटपटा तो लगा किन्तु चुप रहीं। श्रीमती जी के घर लौटने पर मैंने पूरी बात और अपनी योजना बताई और उनसे पूछकर किरानेवाले को फोन कर सामान भिजवा दिया। 

अगले ही दिन उन्होंने कहे अनुसार सामान बनाकर भेज दिया था। हमने अपने कार्यालयों में साथियों को वह मीठा-नमकीन खिलाकर त्यौहार पर इन्हीं से खरीदने का आग्रह किया। बाजार भाव से १०% कम दर बताई तो उनका सब सामान बिक गया था। किरानेवाले का बिल चुकाकर अच्छी रकम बच गयी। श्रीमती जी ने बची राशि व नये आदेश उन्हें देते हुए बताया कि किरानेवाला सामान भी भेज रहा है, आप सुविधा से बना देना तो हम दोनों ग्राहकों तक पहुँचा देंगे। वे अवाक सी सुनती रहीं मानों विश्वास न कर पा रही हों, चेहरे पर एक रंग आ रहा था तो एक जा रहा था, अंत में ख़ुशी ने स्थाई डेरा जमा लिया तो हमने चैन की सांस ली

'अरे! ऐसे क्या देख रही हैं? आपने तो तीर मार दिया, बेटा जाने कब कमायेगा पर आपने तो कमाना शुरू भी कर दिया। अब बेटे की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी लेकिन पहले रुपये गिन लीजिये, आपकी सहेली ने कम तो नहीं कर दिए और पहली कमाई पर खीर तो खिलानी ही पड़ेगी।' 

मेरी आवाज सुनकर उन्होंने आश्चर्य और कृतज्ञता के भाव से मुझे देखा और श्रीमती जी से बोलीं: 'डाइबिटीजवालों को तो खीर मिलेगी नहीं' 

'अच्छा! मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊं?' श्रीमती जी बोलीं, तब मुझे ध्यान आया कि उनके श्रीमान और मेरी श्रीमती जी मधुमेहग्रस्त हैं। वे तो चली गयीं पर खिड़की से झाँक रहा था थोड़ा सा चन्द्रमा

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