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रविवार, 8 नवंबर 2015

संदेह अलंकार

अलंकार सलिला: २९  

संदेह अलंकार
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*
किसी एक में जब दिखें, संभव वस्तु अनेक। 

अलंकार संदेह तब, पहिचानें सविवेक।। 

निश्चय करना कठिन हो, लख गुण-धर्म समान 
अलंकार संदेह की, यह या वह पहचान     

गुरुदत्त जी, वहीदा जी, रहमान जी तथा जॉनी वाकर जी के जीवंत अभिनय, निर्देषम, कथा और मधुर गीतों के लिये 

स्मरणीय हिंदी सिनेमा की कालजयी कृति 'चौदहवीं का चाँद' को हम याद कर रहे हैं शीर्षक गीत के लिये... 

चौदहवीं का चाँद हो / या आफताब हो?

जो भी हो तुम / खुदा की कसम / लाजवाब हो

नायिका के अनिंद्य रूप पर मुग्ध नायक यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे चाँद माने या सूर्य? एक अन्य पुराना फिल्मी गीत है-

ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत / कौन हो तुम बतलाओ?

देर से इतनी दूर खड़ी हो / और करीब आ जाओ

यह तो आप सबने समझ ही लिया है कि नायक नायिका को देखकर सपना है या सच है? का निश्चय नहीं कर पा रहा है 

और यह तय करने के लिये उसे निकट बुला रहा है। एक और फिल्मी गीत को लें-

मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाए 

बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए?

आप सोच रहे होंगे अलंकार चर्चा के इच्छुक काव्य रसिकों से यह कैसा सलूक कि अलंकार छोड़कर सिनेमाई गीत वो भी 

पुराने दोहराये जाएँ? धैर्य रखिये, यह अकारण नहीं है

घबराइये मत, हम आपसे न तो गीत सुनाने को कह रहे हैं, न गीतकार, गायक या संगीतकार का नाम ही पूछ रहे हैं 

बताइए सिर्फ यह कि इन गीतों में कौन सी समानता है?

क्या?..  पर्दे पर नायक ने गाया है... यह तो पूछने जैसी बात ही नहीं है असल में ...समानता यह है कि तीनों गीतों में 

नायक दुविधा का शिकार है- चाँद या सूरज?, सपना या सच?, मारे या छोड़े ?

यह दुविधा, अनिर्णय, संशय, शक या संदेह की मनःस्थिति जिस अलंकार की जननी है, उसका नाम है संदेह अलंकार

रूप, रंग आदि की समानता होने के कारण उपमेय में उपमान का संशय होने पर संदेह अलंकार होता है

जहाँ रूप, रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चचय न हो सके कि यह वही वस्तु है या 

नहीं? वहाँ संदेह अलंकार होता है

यह अलंकार तब होता है जब एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का संदेह तो हो पर निश्चय न हो इसके वाचक शब्द कि, 

किधौं, धौं, अथवा, या आदि हैं

यह-वह का संशय बने, अलंकार संदेह

निश्चय बिन हिलता लगे, विश्वासों का गेह

इस-उस के निश्चय बिना हो मन हो डाँवाडोल

अलंकार संदेह को, ऊहापोह से तोल

उदाहरण:

१. कौन बताये / वीर कहूँ या धीर / पितामह को?

२. नग, जुगनू या तारे? / बूझ न पाये हारे 

३. नर्मदा हो, वर्मदा हो / शर्मदा हो धर्मदा 
    जानता माँ मात्र इतना / तुम सनातन मर्मदा  

४.  सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है

    सारी ही कि नारी है कि नारी ही कि सारी है

    यहाँ द्रौपदी के चीरहरण की घटना के समय का चित्रण है कि द्रौपदी के चारों और चीर के ढेर देखकर दर्शकों को संदेह 

हुआ कि साड़ी के बीच नारी है या नारी के बीच साड़ी है?

५. को तुम तीन देव मँह कोऊ, नर नारायण की तुम दोऊ

    यहाँ संदेह है कि सामने कौन उपस्थित है ? नर, नारायण या त्रिदेव (ब्रम्हा-विष्णु-महेश)

६ . परत चंद्र प्रतिबिम्ब कहुँ जलनिधि चमकायो

    कै तरंग कर मुकुर लिए शोभित छवि छायो

    कै रास रमन में हरि मुकुट आभा जल बिखरात है

    कै जल-उर हरि मूरति बसत ना प्रतिबिम्ब लखात है

    पानी में पड़ रही चंद्रमा की छवि को देखकर कवि संशय में है कि यह पानी में चन्द्र की छवि है या लहर हाथ में दर्पण लिये 

है? यह रास लीला में निमग्न श्री कृष्ण के मुकुट की परछाईं है या सलिल के ह्रदय में बसी प्रभु की प्रतिमा है?

७. तारे आसमान के हैं आये मेहमान बनि,

                    केशों में निशा ने मुक्तावलि सजायी है

    बिखर गयी है चूर-चूर है के चंद कैधों,

                   कैधों घर-घर दीपमालिका सुहाई है

    इस प्रकृति चित्रण में संशय है कि आसमान में तारे अतिथि बनकर आये हैं, अथवा रजनी ने मुक्तावलि सजायी है, 

चंद्रमा चूर होकर बिखर गया है या घर -घर में दिवाली मनाई जा रही है.

८. कज्जल के तट पर दीपशिखा सोती है कि,

                    श्याम घन मंडल में दामिनी की धारा है?

    यामिनी के अंचल में कलाधर की कोर है कि,

                    राहू के कबंध पै कराल केतु तारा है?

    'शंकर' कसौटी पर कंचन की लीक है कि,

                    तेज ने तिमिर के हिए में तीर मारा है?

    काली पाटियों के बीच मोहिनी की मांग है कि,

                    ढाल पर खांडा कामदेव का दुधारा है.?

    इस छंद में संदेह अलंकार की ४ बार आवृत्ति है. संदेह है कि- काजल के किनारे दिये की बाती है या काले बादलों के बीच बिजली?, रात के आँचल में चंद्रमा की कोर है या राहू के कंधे पर केतु?, कसौटी के पत्थर पर परखे जा रहे सोने की रेखा है या अँधेरे के दिल में उजाले का तीर?, काले बालों के बीच सुन्दरी की माँग है या ढाल पर कामदेव का दुधारा रखा है?

९. नित सुनहली साँझ के पद से लिपट आता अँधेरा,

    पुलक पंखी विरह पर उड़ आ रहा है मिलन मेरा

    कौन जाने बसा है उस पार

    तम या रागमय दिन? - महादेवी वर्मा

१०. जननायक हो जनशोषक

    पोषक अत्याचारों के?

    धनपति हो या धन-गुलाम तुम

    दोषी लाचारों के? -सलिल

११. भूखे नर को भूलकर, हर को देते भोग

    पाप हुआ या पुण्य यह?, करुँ हर्ष या सोग?.. -सलिल

१२. राधा मुख आली! किधौं, कैधौं उग्यो मयंक?

१३. कहहिं सप्रेम एक-इक पाहीं। राम-लखन सखि! होब कि नाहीं।।   

१४. संसद या मंडी कहूँ? 
      हल्ला-गुल्ला हो रहा
      आम आदमी रो रहा   

१५. जीत हुई या हार 
      भाँज रहे तलवार
      जन हित होता उपेक्षित।                 

संदेह अलंकार का प्रयोग सामाजिक विसंगतियों और त्रासदियों के चित्रण में भी किया जा सकता है

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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

muktika

मुक्तिका:
*


*
ज़िंदगी जीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
होंठ हँस सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
क्या कहे? कैसे कहें? किससे कहें? बहरा समय
अश्रु चुप पीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
तुहिन, ओले, आग, बरखा, ठंड, गर्मी या तुषार
झेलते रीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
मिल तो अंगूर मीठे, ना मिले खट्टे हुए 
फेंकते तीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
सत्य से साक्षात् कर ये ज़िंदगी दूभर हुई
राम तज सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
नहीं अबला, ना बला, सबला लगाते पार हम
पल नहीं बीते रहे हम पुस्तकों के बीच में?
.
कर रही कुदरत नहीं क्या आदमी से भी मजाक
'सलिल' हो बहते रहे हम पुस्तकों के बीच में
*** 

navgeet

एक रचना:
जमींदार
*
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
.
इन्हें किया था नामजद
किसी शाह ने रीझ.
बख्शी थी जागीर कह  
'कर मनमानी खूब.
पाल-पोस चेले बढ़ा
कह औरों को दूब.
बदल समय के साथ मत
खुद पर खुद ही खीझ.
लँगड़ा करता है सफर
खुद की बाजू थाम.
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
.
बँधवाया, अब बाँधना  
तू गंडा-ताबीज़.
शब्द न समझें लोग जो  
लिखना खोज अजूब.
गलत और का सही भी 
कहना मद में डूब.
निज पीड़ा संवेदना
दर्द अन्य का चीज.
दाम-नाम के लिये कर 
शब्दों का व्यायाम.
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
***

बुधवार, 4 नवंबर 2015

chandra kalayen

शरद पूर्णिमा: १६ चन्द्र कलाएं एवं महारास
तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं। यथा... अलगे पन्ने पर जानिए 16 कलाओं के नाम... इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में अलगे अलग मिलते हैं।
*1.अन्नमया, 2.प्राणमया, 3.मनोमया, 4.विज्ञानमया, 5.आनंदमया, 6.अतिशयिनी, 7.विपरिनाभिमी, 8.संक्रमिनी, 9.प्रभवि, 10.कुंथिनी, 11.विकासिनी, 12.मर्यदिनी, 13.सन्हालादिनी, 14.आह्लादिनी, 15.परिपूर्ण और 16.स्वरुपवस्थित।
*अन्यत्र 1.श्री, 3.भू, 4.कीर्ति, 5.इला, 5.लीला, 7.कांति, 8.विद्या, 9.विमला, 10.उत्कर्शिनी, 11.ज्ञान, 12.क्रिया, 13.योग, 14.प्रहवि, 15.सत्य, 16.इसना और 17.अनुग्रह।
*कहीं पर 1.प्राण, 2.श्रधा, 3.आकाश, 4.वायु, 5.तेज, 6.जल, 7.पृथ्वी, 8.इन्द्रिय, 9.मन, 10.अन्न, 11.वीर्य, 12.तप, 13.मन्त्र, 14.कर्म, 15.लोक और 16.नाम।
16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।
19 अवस्थाएं : भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01..हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।
आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।- (8-24)
भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।

samiksha

कृति चर्चा:

'धरती तपती है' तभी गीत नर्मदा बहती है

चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: धरती तपती है, नवगीत संग्रह, आनंद तिवारी, वर्ष २००८, पृष्ठ १५२, १५०/-, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, जैकेट सहित, उद्भावना प्रकाशन दिल्ली, कृतिकार संपर्क समीप साईं मंदिर, छोटी खिरहनी, कटनी, ४८३५०१, चलभाष ९४२५४ ६४७७९]
*
धरती और मनुष्य का नाता अभिन्न और विशिष्ट है। धरती है तो आधार है, आधार है तो ठोकर है, ठोकर है तो दर्द है, दर्द है तो गीत है। धरती तपती-फटती है उसकी पीड़ा धरती पुत्र को विगलित कर, नव सृजन की चुनौती से जूझने का हौसला देती है। पीड़ा और आनंद के परों पर अनुभूति की कोयल कल्पना की उड़ान भरते हुए अभिव्यक्ति के वृक्ष पर बैठकर नवगीत की कुहु-कुहु से अश्रुओं को बीज बनाकर भविष्य के सपनों की फसल आनंददायी बोती है। युवा कवि आनंद तिवारी का प्रथम नवगीत संग्रह 'धरती तपती है' का वचन ऐसी ही उड़ान का साक्षी होना है। निस्संदेह प्रथम पग लक्ष्य को नहीं छूता किन्तु वह लक्ष्य-प्राप्ति की दिशा और गति का संकेत तो करता ही है। 

एक सौ पाँच गीति रचनाओं की यह मञ्जूषा बाल भास्कर की निखरती-बिखरती किरण-छटा की तरह आनंदित करती है। भोर के भास्कर से दोपहर के सूर्य  की सी प्रखरता या साँझ के अस्ताचलगामी रवि की तरह परिपक्वता की नहीं, ताजगी की अपेक्षा होती है। यह ताजगी आनंद के गीत-नवगीत की पंक्ति-पंक्ति में समाहित है, जिसका पान कर पाठक-मन आनंदित हो उठता है। बुन्देल-बघेलखण्ड की माटी की तरह खाँटी ईमानदारी से आनंद अपनी बात कहते हैं। वे कृत्रिम भाव मुद्राएँ नहीं बनाते, शब्दों को चुनकर नहीं सजाते, लय को अलंकृत नहीं करते। उनके गीतों में अन्तर्निहित सौंदर्य ब्यूटी पार्लर से सज्जित-अलंकृत रूपसी सा नहीं किसी ग्राम्य बाला की अनगढ़-सरल रूप-छटा सा है। इन गीतों में बाह्य उपादानों का आश्रयकम से कम लेकर गीतकार आतंरिक तत्वों को उद्घाटित करने के प्रति सचेष्ट है।

आनंद अपने चतुर्दिक जो पाते हैं (गाँव-घर, गाँव-क़स्बा, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, रहन-सहन, खान-पान, प्रेम-पीड़ा, कार्य-व्यापार, सभ्यता-संस्कार, हाट-बाजार, मंडई-मेला आदि) वह सब उनके गीतों में बिम्बित होता है।
संयोगवश उस अंचल में कुछ दिन कार्य करने का सुअवसर मुझे भी मिला है, इसलिए उस माटी की सौंधी महक, ग्राम्य-श्रमिक के अर्थाभाव, निर्मम शोषण, प्राकृतिक सुषमा, ग्राम्य शब्दों के खुरदरेपन में निहित मिठास, अपनत्व और पिछड़कर आगे आने की जिजीविषा का साक्षी हूँ। 

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। आनंद पारंपरिक परिवेश में नव्यता तलाश  समय कुछ मानकों का अनुसरण करे, कुछ को छोड़े, कुछ को तोड़-झिंझोड़-मरोड़े और कुछ लो गढ़े इसमें न तो कुछ अस्वाभाविक हैं, न आपत्ति जनक, विशिष्ट यह  सब करते हुए आनंद अनुभूति की अभिव्यक्ति अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ते। वे विधागत बंधनों पर अभिव्यक्तिगत निजता को वरीयता देते हुए परिवर्तन और परंपरा के दो पाटों के बीच पिसते आम जन के सुख-दुःख, हर्ष-पीड़ा, उतार-चढ़ाव, सुन्दर-असुंदर के प्रति प्रतिबद्धता न छोड़ते हुए इन अनुभूतियों को शब्द देते हैं। लोक गीत कहे, नवगीत कहे, कविता कहे या कुछ न कह खुद को उसमें खोजता-पाता रहे, यही उन्हें अभीष्ट है -

समस्याओं अनायास उत्पन्न हों तो उन्हें सुलझाया जा सकता है किन्तु समस्याओं को आमंत्रित किया जाए तो उनका हल कभी नहीं मिलता-
ददुआ का बबुआ बालू पर / कब्जा किये हुए 
बुनियादी अधिकारों पर / अवरोधक लगे हुए  
आयातित की गईं / समस्याएं हैं शीश लदीं 
जिन पर बाग़ की रखवाली का दायित्व है वे ही कलियों को रौंदने लगें तो किस तरह रोक जाए-

मौसम ने अपनी 
मनमानी कर डाली
निकल न पाई आमों में 
अब तक बाली 
.  
आनंद की विशेषता कथ्य के कैनवास पर परिवेश को शब्द-कूची से अंकित सकना है- 

ठंडी रातें / बर्फ हो रहीं 
सिकुड़ा हुआ शहर 
लौह-पूत / रिक्शेवाला वह 
कुलगुंटी से ढाँके तन को  
 पैर उपनहे / फ़टी बिवाई 
बैरागी सा / साधे मन को 
सुविधाओं की / गठरी बाँधे 
रिक्शे पर अफसर है  
बुचकी-बुचकी लगे कमरिया 
तुचके-तुचके गाल 
निहुरे-निहुरे ऐसे चलती 
जैसे चले श्रृगाल 
उम्र बीत गयी भाग-दौड़ में 
मिले न चैन कमीना 
चहकूं-चूँ तेल बिना गाड़ी सी ज़िंदगी 
पहिए की पूही जो टूटी 
बेटों की बजी अलग ढपली 
पूरे घर की किस्मत फूटी 
बरगद की बर्रोंहों जैसे 
लटके हुए अधर में 
खो-खो खेल रहे हैं चूहे 
भूखे-धँसे उदर में 
धरती तपती है की ठेठ देशज शब्दों से युक्त मुहावरेदार भाषा वनजा षोडशी के चिकुर-जाल के तरह मन मोहने के समर्थ है। गैर बुंदेली-बघेली अंचल के पाठकों के सामने एक समस्या अवश्य होगी, ग्राम्यांचली शब्दों के अर्थ खोजने की। हिंदी के शब्दकोशों में तो ये शब्द मिलने से रहे, इसलिए ऐसे शब्दों के अर्ह पद टिप्पणी में देना एक उपाय हो सकता है।

आनंद अपने कथ्य को इस तरह पेश करते हैं की उसे सूक्ति की तरह कहा जा सके- गर्व से गुर्रा रही है / यह निगोड़ी गंदगी, आयतन मजदूर का / सँकरा गया, सबके अंतर्मन संवेदन / को चंदन करिये, अफ्रीका के मानचित्र सी / खटिया पड़ी उतान, बंजर में बो-बोकर बीज चूक गए, कौन मंत्र / फूकूँ फिर / फेंकू मैं राई आदि।

सामान्य और शहरी पाठक के शब्द भण्डार में यह संकलन निश्चय ही वृद्धि करेगा- टिपिर-टिपिर, तितिर-बिटिर, फुलगुंती, उपनहे, टाटी, धनकुट, पैनारी, ललछौंही, फँलांगी, भब्भड़, पसही, बर्रोंहों, फटोही, उतान, चेंक, पगड़ी, सुआ-चरेरू, नोहरी, ऊना, गोरुआ, सँझबाती जैसे शब्द और 'बीछी रखे डंक पर डेरा' जैसी लोकोक्ति हिंदी की रोटी खा रहे और कॉंवेंटों में बच्चे पढ़ा रहे हिंदी प्राध्यापकों ने सुने ही न होंगे।

'कहते हैं कि ग़ालिब का है तर्ज़े बयां और' की तर्ज पर आनंद की कहन अपनी मौलिक है। वे किसी का नुकरण नहीं करते। समय-शकुनि, क्रूर-कँगूरे, दर्द के वितान, कोदों के पैरे, पुआल का बिछौना, पुआल का वितान, कुहरील प्रभात, अगिन चितेरा, मन के भोजपत्र, गली के कोड़े, भूंजी-भांग, बंजारा मन, चिकन-चांदन, आशा का कचनार, बुद्धि का मछेरा, भावों की फसल, संदेह का सँपेरा, सुधियों के मृग-शावक जैसी अभिव्यक्तियाँ कथ्य की कड़वाहट में चाशनी घोल देती हैं।

इस संकलन में घाघ, भड्डरी, दधीचि, कणाद, वात्स्यायन का होना चकित कर गया। प्रकृति और परिवेश से जुड़े आनंद के इस नवगीत-मंच पर नदियाँ (सोनभद्र, महानदी, खैर), पर्वत (विंध्याचल, हिमालय), नृत्य-गान (राई, कजरी, करमा, ढोल, मंजीरे, मादल), वनस्पति (चन्दन, गेंदा, सोनजुही, जासौंन, कांस, टेसू, महुआ, सेमल, आम), पक्षी (पनडुब्बी, कौआ, सोनचिरैया, पपीहा, कोयल, चकवा-चकवी, चकोर, अबाबील, हंस, खंजन, गौरैया, सुग्गा, चटक, चकोरी, कागा, मैन, बाज मुर्गा और तितली) भी अपनी भूमिका निभाते हैं।

बिम्ब, प्रतीकों, रूपकों की मायानगरी रचने के मूल में जो भाव है उसे आनंद यूं बयां करते हैं:

सबके जीवन में / रस घोलें / ऐसा गीत लिखें 
जीवन की / सच्चाई बोले / ऐसा गीत लिखें 

नर्मदांचल का तरुण नवगीतकार ऐसे गीत लिख सका है यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है।
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-समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ०७६१ २४१११३१ / ९४२५१ ८३२४४ 
salil.sanjiv@gmail.com 
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पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सांध्‍यकालीन पाठयक्रमों में प्रवेश 31 अक्टूबर 2015 तक

पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सांध्‍यकालीन पाठयक्रमों में
प्रवेश 31 अक्टूबर 2015 तक
 माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय द्वारा संचालित सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश 31 अक्टूबर 2015 त्तक दिए जाएंगे। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक सत्र 2015-16 के लिए वैब संचार, वीडियो प्रोडक्‍शन, पर्यावरण संचार, भारतीय संचार परम्पराएँ, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार, फिल्म पत्रकारिता, डिजिटल फोटोग्राफी, संचार कौशल एवं आयोजन प्रबंधन आदि विषयों में सांध्यकालीन पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रक्रिया जारी है। पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ नौकरीपेशा व्यक्तियों, सेवानिवृत्त लोगों, सैन्य अधिकारियों तथा गृहिणियों के लिए भी उपलब्ध होंगे।
      विश्वविद्यालय द्वारा नौ सम्भावनाओं से भरे क्षेत्रों में सांध्यकालीन पी.जी.डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। विश्वविद्यालय का सांध्यकालीन वैब संचार पाठ्यक्रम अखबारों के ऑनलाईन संस्करण, वैब पोर्टल, वैब रेडियो एवं वैब टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के लिए कुशलकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वीडियो कार्यक्रम के निर्माण सम्बन्धी तकनीकी एवं सृजनात्मक पक्ष के साथ स्टुडियो एवं आउटडोर शूटिंग, नॉनलीनियर सम्पादन, डिजिटल उपकरणों के संचालन आदि के सम्बन्ध में कुशल संचारकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से वीडियो प्रोडक्शन का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। पर्यावरण आज समाज में ज्वलंत विषय है। पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करने एवं इस क्षेत्र के लिए विशेष लेखन-कौशल विकसित करने के उद्देश्य से पर्यावरण संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। योग, स्वास्थ्य और आध्यात्म के क्षेत्र में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने तथा इस क्षेत्र के लिए कुशल कार्यकर्ता को तैयार करने के उद्देश्य से योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में मौजूद संचार के विभिन्न स्वरूपों की शिक्षा एवं वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उनके सार्थक उपयोग की दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय संचार परम्पराओं में सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। सिनेमा के विविध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग, फिल्म समीक्षा एवं फिल्म लेखन की दृष्टि से फिल्म पत्रकारिता का पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। फोटोग्राफी के विविध आयामों से परिचित कराने तथा कौशलपूर्ण डिजिटल फोटोग्राफी सिखाने के उद्देश्‍य से डिजिटल फोटोग्राफी का पाठ्यक्रम उपलब्‍ध हैं। इस शैक्षणिक सत्र से विश्वविद्यालय दो नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ कर रहा है।  समारोह नियोजन एवं प्रबंधन के क्षेत्र में संभावनाओं को केंद्र में रखकर आयोजन प्रबंधन तथा संचार प्रबंधन एवं कौशल विकास हेतु संचार कौशल के पाठ्यक्रम आरम्भ किये जा रहे हैं। प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिये 15 स्थान निर्धारित किये गये हैं।
      पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा में प्राप्त अंकों की मेरिट के आधार पर दिया जायेगा। पाठ्यक्रमों की अवधि एक वर्ष है। प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क 10,000 रुपये रखा गया है जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित चार किश्तों में देय होगा। प्रवेश हेतु आवेदन ऑनलाइन स्वीकार किये जा रहे हैं। इस हेतु www.mponline.gov.in पर लॉगइन कर citizen services लिंक पर क्लिक करना होगा प्रवेश हेतु आवेदन शुल्क 150/- रुपये (अ.ज./अ.ज.जा. के लिए 100/- रुपये) ऑनलाइन ही देय होगा। अभ्यर्थी एक से अधिक पाठ्यक्रमों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। प्रत्‍येक अतिरिक्‍त आवेदन का शुल्‍क 50 रुपये निर्धारित है। विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.mcu.ac.in से विवरणिका एवं अन्य जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अधिक जानकारी के लिए टेलीफोन नम्बर 0755-2553523 पर भी सम्पर्क किया जा सकता है।


(डा. पवित्र श्रीवास्तव)

निदेशक, प्रवेश

‘‘मीडिया की भूमिका: भाषा सीखना या सिखाना’’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी

‘‘मीडिया की भूमिका: भाषा सीखना या सिखाना’’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग द्वारा पंचम तल स्थित सभागार में दिनांक 04 नवम्बर 2015 को प्रातः 10.30 से सायं 05.30 तक ‘‘मीडिया की भूमिका: भाषा सीखना या सिखाना’’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। संगोष्ठी चार सत्रों में आयोजित होगी। इस संगोष्ठी के प्रथम उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ मीडिया प्रोफेशनल श्री राहुल देव मुख्य वक्ता होगे एवं अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला करेंगे। द्वितीय सत्र ‘‘अंग्रेजी मीडिया की भाषा’’ विषय पर होगा साथ ही इस सत्र में विद्यार्थियों द्वारा समाचार पत्रोंउनकी भाषा और उनमें अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग के संबंध में अभ्यास कार्य व उसका प्रस्तुतिकरण किया जाएगा ।

तृतीय सत्र ‘‘हिन्दी मीडिया की भाषा’’ विषय के मुख्य वक्ता श्री आनंद पाण्डेयसमूह संपादक नईदुनियाइन्दौर एवं श्री आषीष जोशीडायरेक्टर प्रोडक्शन, मा.च.रा.प.एवं सं. विवि. होगे एवं अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद पुरोहित करेगें।
चतुर्थ सत्र ‘‘समाज पोषित मीडिया की भाषा’’ विषय के मुख्य वक्ता श्री उमेश त्रिवेदीप्रधान संपादक,सुबह सवेरे एवं श्री गिरीष उपाध्यायसंपादक सुबह सवेरे होगें एवं अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला करेगें।

laghu katha

लघु कथा:
साँसों का कैदी
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जब पहली बार डायलिसिस हुआ था तो समाचार मिलते ही देश में तहलका मच गया था। अनेक महत्वपूर्ण व्यक्ति और अनगिनत जनता अहर्निश चिकित्सालय परिसर में एकत्र रहते, डॉक्टर और अधिकारी खबरचियों और जिज्ञासुओं को उत्तर देते-देते हलाकान हो गए थे। 

गज़ब तो तब हुआ जब प्रधान मंत्री ने संसद में उनके देहावसान की खबर दे दी, जबकि वे मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे। वस्तुस्थिति जानते ही अस्पताल में उमड़ती भीड़ और जनाक्रोश सम्हालना कठिन हो गया। प्रशासन को अपनी भूल विदित हुई तो उसके हाथ-पाँव ठन्डे हो गए। गनीमत हुई कि उनके एक अनुयायी जो स्वयं भी प्रभावी नेता थे, वहां उपस्थित थे, उन्होंने तत्काल स्थिति को सम्हाला, प्रधान मंत्री से बात की, संसद में गलत सूचना हेतु प्रधानमंत्री ने क्षमायाचना की। 

धीरे-धीरे संकट टला.… आंशिक स्वास्थ्य लाभ होते ही वे फिर सक्रिय हो गए, सम्पूर्ण क्रांति और जनकल्याण के कार्यों में। बार-बार डायलिसिस की पीड़ा सहता तन शिथिल होता गया पर उनकी अदम्य जिजीविषा उन्हें सक्रिय किये रही। तन बाधक बनता पर मन कहता मैं नहीं हो सकता साँसों का कैदी। 

***

geet

दीपमालिके !
  


 
दीपमालिके!
दीप बाल के
बैठे हैं हम
आ भी जाओ

अब तक जो बीता सो बीता
कलश भरा कम, ज्यादा रीता
जिसने बोया निज श्रम निश-दिन
उसने पाया खट्टा-तीता

मिलकर श्रम की करें आरती
साथ हमारे तुम भी गाओ

राष्ट्र लक्ष्मी का वंदन कर
अर्पित निज सीकर चन्दन कर
इस धरती पर स्वर्ग उतारें
हर मरुथल को नंदन वन कर

विधि-हरि-हर हे! नमन तुम्हें शत
सुख-संतोष तनिक दे जाओ

अंदर-बाहर असुरवृत्ति जो
मचा रही आतंक मिटा दो
शक्ति-शारदे तम हरने को
रवि-शशि जैसा हमें बना दो

चित्र गुप्त जो रहा अभी तक
झलक दिव्य हो सदय दिखाओ

- संजीव वर्मा सलिल
१ नवंबर २०१५
  
आभार; अनुभूति दिवाली विशेषांक 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

navgeet

एक रचना:
*
गोड-बखर
धरती पहले
फिर खेती कर
.
बीज न बोता
और चाहता फसल मिले
नीर न नयनों में
कैसे मन-कमल खिले
अंगारों से जला
हथेली-तलवा भी
क्या होती है
तपिश तभी तो पता चले
छाया-बैठा व्यर्थ
धूप को कोस रहा
घूरे सूरज को
चकराकर आँख मले
लौटना था तो
तूने माँगा क्यों था?
जनगण-मन से दूर
आप को आप छले
ईंट जोड़ना
है तो खुद
को रेती कर
गोड-बखर
धरती पहले
फिर खेती कर
.
गधे-गधे से
मिल ढेंचू-ढेंचू बोले
शेर दहाड़ा
'फेंकू' कह दागें गोले
कूड़ा-करकट मिल
सज्जित हो माँग भरें
फिर तलाक माँगें
कहते हम हैं भोले
सौ चूहे खा
बिल्ली करवाचौथ करे
दस्यु-चोर ईमान
बाँट बिन निज तौले
घास-फूस की
छानी तले छिपाए सिर
फूँक मारकर
जला रहे नाहक शोले
ऊसर से
फल पाने
खुद को गेंती कर
गोड-बखर
धरती पहले
फिर खेती कर
.  

सोमवार, 2 नवंबर 2015

laghukatha

लघुकथा:
अर्थ ३
*
मध्य प्रदेश बांगला साहित्य अकादमी रजत जयंती समारोह मुख्य अतिथि वक्ता के नाते भाषा के उद्भव, उपादेयता, स्वर-व्यंजन, लिपि के विकास,विविध भाषाओँ बोलिओं के मध्य सामंजस्य, जीवन में भाषा की भूमिका, भाषा से आजीविका, अनुवाद, लिप्यंतरण तथा स्थानीय, देशज व् राष्ट्रीय भाषा में मध्य अंतर्संबंध जैसे जटिल और नीरस विषय को सहज बनाते हुए हिंदी में अपनी बात पूरी की. महिलाएं, बच्चे तथा पुरुष रूचि लेकर सुनते रहे, उनके चेहरों से पता चलता था कि वे बात समझ रहे हैं, सुनना चाहते हैं.

मेरे बाद भागलपुर से पधारे ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बांगला प्रोफ़ेसर ने बांगला में बोलना प्रारम्भ किया। विस्मय हुआ की बांगलाभाषी जनों ने हिंदी में कही बात मन से सुनी किन्तु बांगला वक्तव्य आरम्भ होते ही उनकी रूचि लगभग समाप्त हो गयी, आपस में बात-चीत होने लगी. वोिदवान वक्त ने आंकड़े देकर बताया कि गीतांजलि के कितने अनुवाद किस-किस भाषा में हुए. शरत, बंकिम, विवेकानंद आदि कासाहित्य किन-किन भाषाओँ में अनूदित हुआ किन्तु यह नहीं बता सके कि कितनी भाषाओँ का साहित्य बांगला में अनूदित हुआ.

कोई कितना भी धनी हो उसके कोष से धन जाता रहे किन्तु आये नहीं तो तिजोरी खाली हो ही जाएगी। प्रयास कर रहा हूँ कि बांगला भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जाने लगे तो हम मूल रचनाओं को उसी तरह पढ़ सकें जैसे उर्दू की रचनाएँ पढ़ लेते हैं. लिपि के प्रति अंध मोह के कारण वे नहीं समझ पा रहे हैं मेरी बात का अर्थ

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