कुल पेज दृश्य

सोमवार, 2 नवंबर 2015

kruti charcha :

कृति चर्चा:
अल्पना अंगार पर - नवगीत निखार पर 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: अल्पना अंगार पर, नवगीत संग्रह, रामकिशोर दाहिया, २००८, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १९२, १००/-,  उद्भावना प्रकाशन, ए २१ झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया,  जी. टी.  रोड,शाहदरा दिल्ली ११००९५, कृतिकार संपर्क: अयोध्या  बस्ती,साइंस कॉलेज, खिरहने कटनी ४८३५०१, ९४२४६ ७६२९७, ९४२४६ २४६९३] 
*                    
नदी के कलकल प्रवाह, पवन की सरसराहट और कोयल की कूक की लय जिस मध्र्य को घोलती है वह गीतिरचना का पाथेय है। इस लय को गति-यति, बिंब-प्रतीक-रूपक से अलंकृत कर गीत हर सहृदय में मन को छूने में समर्थ बन जाता है। गति और लय को देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप नवता देकर गीत के आकाशी कथ्य को जमीनी स्पर्श देकर सर्वग्राह्य बना देता है नवगीत। अपने-अपने समय में जिसने भी पारम्परिक रूप से स्थापित काव्य के शिल्प और कथ्य को यथावत न स्वीकार कर परिवर्तन के शंखनाद किया और सृजन-शरों से स्थापित को स्थानच्युत कर परिवर्तित का भिषेक किया वह अपने समय में नवता का वाहक बना। इस समय के नवताकारक सृजनधर्मियों में अपनी विशिष्ट भावमुद्रा और शब्द-समृद्धता के लिये चर्चित नवगीतकार रामकिशोर दाहिया की यह प्रथम कृति अपने शीर्षक 'अल्पना अंगार पर' में अन्तर्निहित व्यंजना से ही अंतर्वस्तु का आभास देती है। अंगार जैसे हालात का सामना करते हुए समय के सफे पर हौसलों की अल्पना  के नवगीत लिखना सब के बस का काम नहीं है।  

नवगीत को उसके उद्भव काल के मानकों और भाषिक रूप तक सिमित रखने असहमत रामकिशोर जी ने अपने प्रथम संग्रह में ही अपनी जमीन तैयार कर ली हैं। बुंदेली-बघेली अंचल के निवासी होने के नाते उनकी भाषा में स्थानीय लोकभाषाओं का पूत तो अपेक्षित है किन्तु उनके नवगीत इससे बहुत आगे जाकर इन लोकभाषाओं के जमीनी शब्दों को पूरी स्वाभाविकता और अधिकार के साथ अंगीकार करते हैं। वे यह भी जानते हैं कि शब्दों के अर्थों से कॉंवेंटी पीढ़ी ही नहीं रचनाकार, शब्द कोष भी अपरिचित हैं इसलिए पाद टिप्पणियों में शब्दों के अर्थ समाविष्ट कर अपनी सजगता का परिचय देते हैं।

आजीविका से शिक्षक, मन से साहित्यकार और प्रतिबद्धता से आम आदमी की पीड़ा के सहभागी हैं राम किशोर, इसलिए इन नवगीतों में सामाजिक वैषम्य, राजनैतिक विद्रूपताएँ, आर्थिक विषमता, धार्मिक पाखंड और व्यक्तिगत दोमुँहेपन पर प्रबल-तीक्ष्ण शब्द-प्रहार होना स्वाभाविक है। उनकी संवेदनशील दृष्टि राजमार्गोन्मुखी न होकर पगडंडी के कंकरों, काँटों, गड्ढों और उन पर बेधड़क चलने वाले पाँवों के छालों, चोटों, दर्द और आह को केंद्र में रखकर रचनाओं का ताना-बाना बुनती है। वे माटी की सौंधी गंध तक सीमित नहीं रहते, माटी में मिले सपनों की तलाश भी कर पाते हैं। विवेच्य संग्रह वस्तुत: २ नवगीत संग्रहों को समाहित किये है जिन्हें २ खण्डों के रूप में 'महानदी उतरी' (ग्राम्यांचल के सजीव शब्द चित्र तदनुरूप बघेली भाषा)  और  'पाले पेट कुल्हाड़ी' (सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों से जुड़े नवगीत) शीर्षकों के अंतर्गत रखा गया है। २५-३० रचनाओं की स्वतंत्र पुस्तकें निकालकर संख्या बढ़ाने के काल में ४५ + ५३ कुल ९८ नवगीतों के  समृद्ध संग्रह को पढ़ना स्मरणीय अनुभव है।

कवि ज़माने की बंदिशों को ठेंगे पर मारते हुए अपने मन की बात सुनना अधिक महत्वपूर्ण मानता है-

कुछ अपने दिल की भी सुन
संशय के गीत नहीं बुन
अंतड़ियों को खंगालकर
भीतर के ज़हर को निकाल
लौंग चूस / जोड़े से चाब
सटका दे / पेट के बबाल
तंत्री पर साध नई धुन

लौंग को जोड़े से चाबना और तंत्री पर धुन साधना जैसे अनगिन प्रयोग इस कृति में पृष्ठ-पृष्ठ पर हैं। शिक्षक रामकिशोर को पर्यावरण की फ़िक्र न हो यह कैसे संभव है?

धुआँ उगलते वाहन सारे / साँसों का संगीत लुटा है
धूल-धुएँ से / हवा नहाकर /  बैठी खुले मुँडेरे
नहीं उठाती माँ भी सोता / बच्चा अलस्सवेरे

छद्म प्रगति के व्यामोह में फँसे जनगण को प्रतीत हो रहे से सर्वथा विपरीत स्थिति से रू-ब-रू कराते हुए कवि अपना बेलाग आकलन प्रस्तुत करता है:

आँख बचाकर / छप्पर सिर की /नव निर्माण उतारे
उठती भूखी / सुबह सामने / आकर हाथ पसारे
दिये गये / संदर्भ प्रगति के / उजड़े रैन बसेरे

समाज में व्याप्त दोमुँहापन कवि की चिंता का विषय है:

लोग बहुत हैं / धुले दूध के / खुद हैं चाँद-सितारे
कालिख रखते / अंतर्मन में / नैतिक मूल्य बिसारे

नैतिक मूल्यों की चिंता सर्वाधिक शिक्षक को ही होती है। शिक्षकीय दृष्टि सुधर को लक्षित करती है किन्तु कवि उपदेश नहीं देना चाहता, अत:,  इन रचनाओं में शब्द प्रचलित अर्थ के साथ विशिष्ट अर्थ व्यंजित करते हैं:

स्वेद गिरकर / देह से / रोटी उगाता
ज़िंदगी के / जेठ पर / आजकल दरबान सी
देने लगी है / भूख पहरा पेट पर 

स्वतंत्रता के बाद क्या-कितना बदला? सूदखोर साहूकार आज भी किसानों के म्हणत की कमाई खा रहा है। मूल से ज्यादा सूद चुकाने के बाद भी क़र्ज़ न चुकाने की त्रासदी भोगते गाँव की व्यथा-कथा गाँव में पदस्थ और निवास करते संवेदनशील शिक्षक से कैसे छिप सकती है? व्यवस्था को न सुधार पाने और शोषण को मूक होकर  देखते रहने से उपजा असंतोष इन रचनाओं के शब्द-शब्द में व्याप्त है:

खाते-बही, गवाह-जमानत / लेते छाप अँगूठे
उधार बाढ़ियाँ / रहे चुकाते / कन्हियाँ धांधर टूटे
.
भूखे-लांघर रहकर जितना / देते सही-सही
जमा नहीं / पूँजी में पाई / बढ़ती ब्याज रही
बने बखार चुकाने पर भी / खूँटे से ना छूटे
.
लड़के को हरवाही लिख दी / गोबरहारिन बिटिया
उपरवार / महरारु करती / फिर भी डूबी लुटिया
मिले विरासत में हम बंधुआ / अपनी साँसें कूते

सामान्य लीक से हटकर रचे गए  नवगीतों में अम्मा शीर्षक गीत उल्लेखनीय है:

मुर्गा बांग / न देने पाता / उठ जाती अँधियारे अम्मा
छेड़ रही / चकिया पर भैरव / राग बड़े भिन्सारे अम्मा

से आरम्भ अम्मा की दिनचर्या में दोपहर कब आ जाती, है पता ही नहीं चलता-

चौक बर्तन / करके रीती / परछी पर आ धूप खड़ी है
घर से नदिया / चली नहाने / चूल्हे ऊपर दाल चढ़ी है
आँगन के / तुलसी चौरे पर / आँचल रोज पसारे अम्मा 
पानी सिर पर / हाथ कलेवा / लिए पहुँचती खेत हरौरे
उचके हल को / लत्ती देने / ढेले आँख देखते दौरे

यह क्रम देर रात तक चलता है:

घिरने पाता / नहीं अँधेरा / बत्ती दिया जलाकर रखती
भूसा-चारा / पानी - रोटी / देर-अबेर रात तक करती
मावस-पूनो / ढिंगियाने को / द्वार-भीत-घर झारे अम्मा

ऐसा जीवन शब्द चित्र मनो पाठक अम्मा को सामने देख रहा हो। संवेदना की दृष्टि से श्री आलोक श्रीवास्तव की सुप्रसिद्ध 'अम्मा' शीर्षक ग़ज़ल के समकक्ष और जमीनी जुड़ाव में उससे बढ़कर यह नवगीत इस संग्रह की प्रतिनिधि रचना है।

रामकिशोरजी सिर्फ शिक्षक नहीं अपितु सजग और जागरूक शिक्षक हैं। शिक्षक के प्राण शब्दों में बसते हैं चूँकि शब्द ही उसे संसार और शिष्यों से जोड़ते हैं। विवेच्य कृति कृतिकार के समृद्ध शब्द भण्डार का परिचय पंक्ति-पंक्ति में देती है। एक ओर बघेली के शब्दों दहरा, लमतने, थूं, निगडौरे, भिनसारे, हरौरे, ढिंगियाने, भीत, पगडौरे, लौंद, गादर, अलमाने, च्यांड़ा, चौहड़े, लुसुक, नेडना, उरेरे, चरागन, काकुन, डिंगुरे, तुरतुरी, खुम्हरी आदि को हिंदी के संस्कृतनिष्ठ शब्दों लौह्गामिनी, कीटविनाशी, दावानल, बड़वानल, वसुधा, व्योम, अनुगूंज, ऊर्जा, स्रोत, शिल्प, चन्द्रकला, अविराम, वृन्त, कुंतल, ऊर्ध्ववती, कपोल, समुच्चय, पारलौकिक, श्रृंगारित आदि को गले मिलते देखना आनंदित करता है तो  दूसरी ओर उर्दू के लफ़्ज़ों वज़ूद, सिरफिरी, सोहबत, दौलत, तब्दील, कंदील, नूर, शोहरत, सरहदों, बाजार, हुकुम, कब्ज़े, फरजी, पेशी, जरीब, दहशत, सरीखा, बुलंदी, हुनर, जुर्म, ज़हर, बेज़ार, अपाहिज, कफ़न, हैसियत, तिजारत, आदि को अंग्रेजी वर्ड्स पेपर, टी. व्ही., फ़ोकस, मिशन, सीन, क्रिकेटर, मोटर, स्कूल, ड्रेस, डिम, पावर, केस, केक, स्वेटर, डिजाइन, स्क्रीन, प्लेट, सर्किट, ग्राफ, शोकेस आदि के साथ हाथ मिलाते देखना सामान्य से इतर सुखद अनुभव कराता है।  

इस संग्रह में शब्द-युग्मों का प्रयोग यथावसर हुआ है। साही-साम्भर, कोड़ों-कुटकी, 'मावस-पूनो, तमाखू-चूना, कांदो-कीच, चारा-पानी, कांटे-कील, देहरी-द्वार, गुड-पानी, देर-अबेर, चौक-बर्तन, दाने-बीज, पौधे-पेड़, ढोर-डंगार, पेड़-पत्ते, कुलुर-बुलुर, गली-चौक, आडी-तिरछी, काम-काज, हट्टे-कट्टे, सज्जा-सिंगार, कुंकुम-रोली, लचर-पचर, खोज-खबर, बत्ती-दिया आदि गीतों की भाषा को सरस बनाते हैं।

राम किशोर जी ने किताबी भाषा के व्यामोह को तजते हुए पारंपरिक मुहावरों दांत निपोरेन, सर्ग नसेनी, टेंट निहारना आदि के साथ धारा हुई लंगोटी, डबरे लगती रोटी, झरबेरी की बोटी, मन-आँगन, कानों में अनुप्रास, मदिराया मधुमास, विषधर वसन, बूँद के मोती, गुनगुनी चितवन, शब्दों के संबोधन, आस्था के दिये, गंध-सुंदरी, मन, मर्यादा पोथी, इच्छाओं के तारे, नदिया के दो ओंठ, नयनों के पटझर जैसी निजी अनुभूतिपूर्ण शब्दावली से भाषा को जीवंत किया है।     

बुंदेलखंड-बघेलखण्ड के घर-गाँव अपने परिवेश के साथ इस गहराई और व्यापकता के साथ उपस्थित हैं कि कोई चित्रकार शब्दचित्रों से रेखाचित्र की ओर बढ़ सके। कुछ शब्दों का संकेत ही पर्याप्त है यह इंगित करने के लिए कि ग्राम्य जीवन का हर पक्ष इन गीतों में है। निवास स्थल- द्वार, भीत, घर, टटिया, कछरा आदि, श्रृंगार- सेंदुर, कुंड़वा, कंघी, चुरिया महावर आदि, वाद्य- टिमकी, मांडल, ढोलक, मंजीर, नृत्य-गान- राई , करमा, फाग, कबीर, कजरी, राग आदि, वृक्ष-पौधे महुआ, आम, अर्जुन, सेमल, साल, पलाश, अलगोजे, हरसिंगार, बेल, तुलसी आदि, नक्षत्र- आर्द्रा, पूर्व, मघा आदि, माह- असाढ़, कातिक, भादों, कुंवार, जेठ, सावन, पूस, अगहन आदि, साग-सब्जी- सेमल, परवल, बरबटी, टमाटर, गाजर, गोभी, मूली, फल- आंवले, अमरुद, आम, बेल आदि, अनाज- उर्द, अरहर, चना, मसूर, मूंग, उड़द, कोदो, कुटकी, तिल, धान, बाजरा, ज्वार आदि, पक्षी- कबूतर, चिरैयाम सुआ, हरियर, बया, तितली, भौंरे आदि, अन्य प्राणी- छिपकली, अजगर, शेर, मच्छर सूअर, वनभैंसा, बैल, चीतल, आदि, वाहन- जीप, ट्रक, ठेले, रिक्शे, मोटर आदि , औजार- गेंती, कुदाल आदि उस अंचल के प्रतिनिधि है जहाँ की पृष्ठभूमि में इन नवगीतों की रचना हुई है. अत: िंवगीतों में उस अंचल की संस्कृति और जीवन -शब्द में अभव्यक्त होना स्वाभाविक है।      

उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर है 'गिरते हैं शाह सवार ही मैदाने जंग में / वह तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले' कवि राम किशोर जी गुड़सवारी करने, गिरने और बढ़ने का माद्दा रखते हैं यह काबिले-तारीफ है। नवगीतों की बंधी-बंधाई लीक से हटकर उन्होंने पहली ही कृति में अपनी पगडंडी आप बनाने का हसला दिखाया है।  दाग की तरह कुछ त्रुटियाँ होन स्वाभविक है- 'टी. व्ही. के / स्क्रीन सरीखे / सारे दृश्य दिखाया' में वचन दोष, 'सर्किट प्लेट / ह्रदय ने घटना / चेहरे पर फिल्माया' तथा 'बढ़ती ब्याज रही' में लिंग दोष है। लब्बो-लुबाब यह कि 'अल्पना अंगार पर' समसामयिक सन्दर्भों में नवगीत की ऐसी कृति है जिसके बिना इस दशक के नवगीतों का सही आकलन नहीं किया जा सकेगा। रामकिशोर जी का शिक्षक मन इस संग्रह में पूरी ईमानदारी से उपस्थित है- 'दिल की बात / लिखी चहरे पर/ चेहरा पढ़ना सीख'।

****
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ०७६१ २४१११३१, ९४२५१ ८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com 
==========

















laghukatha

लघुकथा 
अर्थ २ 
*
व्यापम घोटाला समाचार पत्रों, दूरदर्शन, नुक्कड़ से लेकर पनघट हर जगह बना रहा चर्चा का केंद्र, बड़े-बड़ों के लिपटने के समाचारों के बीच पकड़े गए कुछ छुटभैये। 

फिर आरम्भ हुआ गवाहों के मरने का क्रम लगभग वैसे ही जैसे श्री आसाराम बापू और अन्य इस तरह के प्रकरणों में हुआ। 

सत्ताधारियों के सिंहासन डोलने और परिवर्तन के खबरों के बीच विश्व हिंदी सम्मेलन का भव्य आयोजन, चीन्ह-चीन्ह कर लेने-देने का उपक्रम, घोटाले के समाचारों की कमी, रसूखदार गुनहगारों का जमानत पर रिहा होना, समान अपराध के गिरफ्तार अन्य को जमानत न मिलना, सत्तासीनों के कदम अंगद के पैर की तरह जम जाना, समाचार माध्यमों से व्यापम ही नहीं छात्रवृत्ति और अन्य घोटालों की खबरों का विलोपित हो जाना,  पुस्तक हाथ में लिए मैं कोशिश कर रहा हूँ किन्तु समझ नहीं पा रहा हूँ समानता, मौलिक अधिकारों और लोककल्याणकारी गणतांत्रिक गणराज्य का अर्थ। 
***       

भ्रांतिमान अलंकार

अलंकार सलिला: २८ 
भ्रांतिमान अलंकार
*














*
समझें जब उपमेय को, भ्रम से हम उपमान 
भ्रांतिमान होता वहीँ, लें झट से पहचान. 
जब दिखती है एक में, दूजे की छवि मीत. 
भ्रांतिमान कहते उसे, कविजन गाते गीत.. 

गुण विशेष से एक जब, लगता अन्य समान. 
भ्रांतिमान तब जानिए, अलंकार गुणवान.. 

भ्रांतिमान में भूल से, लगे असत ही सत्य. 
गुण विशेष पाकर कहें, ज्यों अनित्य को नित्य..
 

जैसे रस्सी देखकर, सर्प समझते आप. 
भ्रांतिमान तब काव्य में, भ्रम लख जाता व्याप.. 


जब रूपरंगगंधआकारकर्म आदि की समानता के कारण भूल से प्रस्तुत में अप्रस्तुत का आभास होता हैतब ''भ्रांतिमान अलंकार'' होता है

जब दो वस्तुओं में किसी गुण विशेष की समानता के कारण भ्रमवश एक वस्तु को अन्य वस्तु समझ लिया जाये तो उसे ''भ्रांतिमान अलंकार'' कहते हैं.  

उदाहरण: 

१. कपि करि ह्रदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब. 
    जनु असोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ..   
-तुलसीदास 

यहाँ अशोक वृक्ष पर छिपे हनुमान जी द्वारा सीताजी का विश्वास अर्जित करने के लिए श्री राम की अँगूठीफेंके जाने पर दीप्ति के कारण सीता जी को अंगार का भ्रम होता हैअतःभ्रांतिमान अलंकार है

२. जानि स्याम घन स्याम को, नाच उठे वन-मोर.

यहाँ श्री कृष्ण को देखकरउनके सांवलेपन के कारण वन के मोरों को काले बादल होने का भ्रम  होता है औरवे वर्षा होना जानकार नाचने लगते हैं. अतः, भ्रांतिमान है. 
३. चंद के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को. 

कुमुदिनी को देखकर चंद्रमा का भ्रम होना, भ्रांतिमान अलंकार का लक्षण है. 

४. चाहत चकोर सूर ओर, दृग छोर करि. 
    चकवा की छाती तजि, धीर धसकति है..
 

५. हँसनि में मोती से झरत जनि हंस दौरें बार मेघ मानी बोलै केकी वंश भूल्यौ है. 
    कूजत कपोत पोत जानि कंठ रघुनाथ फूल कई हरापै मैन झूला जानि भूल्यौ है. 
    ऐसी बाल लाल चलौ तुम्हें कुञ्ज लौं देखाऊँ जाको ऐसो आनन प्रकास वास तूल्यौ है. 
    चितवे चकोर जाने चन्द्र है अमल घेरे भौंर भीर मानै या कमल चारु फूल्यौ है. 

६. नाक का मोती अधर की कांति से. 
    बीज दाडिम का समझ कर भ्रांति से. 
    देखकर सहसा हुआ शुक मौन है. 
    सोचता है अन्य शुक यह कौन है. 
-
 मैथिलीशरण गुप्त 

७. काली बल खाती चोटी को देख भरम होता नागिन का. -सलिल 

८. अरसे बाद 
    देख रोटी चाँद का 
    आभास होता.     
-सलिल 

९. जन-गण से है दूर प्रशासन 
    जनमत की होती अनदेखी 
    छद्म चुनावों से होता है 
    भ्रम सबको आजादी का.
 -सलिल 

१०. पेशी समझ माणिक्य को, वह विहग, देखो ले चला 

११. मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं 

१२. चंद अकास को वास विहाई कै 
     आजु यहाँ कहाँ आइ उग्यौ है?


भ्रांतिमान अलंकार सामयिक विसंगतियों को उद्घाटित करनेआम आदमी की पीडा को शब्द देने और युगीन विडंबनाओं पर प्रहार करने का सशक्त हथियार है किन्तु इसका प्रयोग वही कर सकता है जिसे भाषा पर अधिकार हो तथा जिसका शब्द भंडार समृद्ध हो

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है. 
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है. 
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर. 
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है. 

**********

rasanand de chhand narmada : 4 doha

रसानंद दे छंद नर्मदा : ४  

दोहा रचें सुजान 

- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’


आइये! कुछ दोहों का रसास्वादन कर उनके तत्वों को समझें और नियमों के अनुसार जाँचें:

मन से मन के मिलन हित, दोहा रचें सुजान 
सार सत्य कितना कहाँ, पल में सकें बखान 

१. उक्त दोहे में 'मन से मन के मिलन हित' प्रथम (विषम) चरण, 'दोहा रचें सुजान', दूसरा (सम) चरण, 'सार सत्य कितना कहाँ' तीसरा    (विषम) चरण और 'पल में सकें बखान' चौथा (सम) चरण है पहले तथा दूसरे चरण को मिलाकर प्रथम पद (पंक्ति) तथा तीसरे व        चौथे चरण को मिलाकर द्वितीय पद बनता है। हर दोहे में दो पद होने के कारण इसे द्विपदी, दोपदी और दोहा नाम मिला। 

२. हर पंक्ति या पद में २-२ चरण या अर्धाली हैं जिन्हें अल्प विराम (,) तथा पूर्ण विरामों () से दर्शाया जाता है विषम चरण पूर्ण  होने      को अल्प विराम द्वारा इंगित किया जाता है जबकि सम चरण की पूर्णता प्रथम पदांत में एक तथा द्वितीय पदांत में २ पूर्ण विराम          लगाके इंगित करने की परंपरा है ताकि एक पद उद्धृत होने पर उसका पद क्रम जाना जा सके

३. प्रथम पंक्ति में प्रथम (विषम)) चरण 'मन से मन के मिलन हित' तथा द्वितीय (सम) चरण 'दोहा रचें सुजान है द्वितीय पंक्ति में पहले     विषम चरण 'सार सत्य कितना कहाँ' तथा अंत में सम चरण 'पल में सकें बखान' है  

४. विषम चरणों में १३-१३ मात्राएँ हैं-

    मन से मन के मिलन हित,
    ११   २   ११   २   १११     ११  = १३  

    सार सत्य कितना कहाँ,
    २१     २१    ११२    १२   =  १३ 

५. सम चरणों में ११-११ मात्राएँ हैं-

    दोहा रचें सुजान
    २२   १२   १२१   = ११ 
    पल में सकें बखान
    ११   २   १२   १२१   = ११ 

६. पद के दोनों चरणों को मिलकर २४-२४ मात्राएँ हैं। दोहा की रचना मात्रा गणना के आधार पर की जाती है इसलिए यह मात्रिक छंद है।    दोहा के दो विषम चरणों में समान १३-१३ मात्राएँ तथा दो सम चरणों में भिन्न समान ११-११ मात्राएँ है अर्थात आधे-आधे भागों            (चरणों) में भी समान मात्राएँ हैं इसलिए यह अर्ध सम मात्रिक छंद है। 

    मन से मन के मिलन हित, दोहा रचें सुजान
    ११   २   ११   २   १११     ११ ,  २२   १२   १२१    = १३ + ११  = २४   
    सार सत्य कितना कहाँ, पल में सकें बखान
    २१     २१    ११२    १२  , ११   २   १२   १२१      = १३ + ११  = २४

७. पद के अंतिम शब्दों पर ध्यान दें: 'सुजान' और बखान' ये दोनों शब्द 'जगण' अर्थात जभान १ २ १ = ४ मात्राओं के हैं दोहे के पदांत       में गुरु-लघु अनिवार्य है, इस नियम का यहाँ पालन हुआ है 

८. दोहा का पदारम्भ एक शब्द में 'जगण' जभान १ २ १ से नहीं होना चाहिए। यहाँ प्रथम शब्द क्रमश: मन तथा सार हैं जो इस नियम के     अनुकूल हैं

     १३ - ११ मात्राओं पर यति होने की पुष्टि पढ़ने तथा लिखने में अल्प विराम व पूर्ण विराम से होती है 

     निम्न दोहों को पढ़ें, उक्त नियमों के आधार पर परखें और देखें कि कोई त्रुटि तो नहीं है। 

९. इन दोहों में लघु-गुरु मात्राओं को गणना करें। सभी दोहों में कुल मात्राओं की संख्या सामान होने पर भी पदों या चरणों में लघु - गुरु      मात्राओं की संख्या तथा स्थान समान नहीं हैं। इस भिन्नता के कारण उन्हें पढ़ने की 'लय' में भिन्नता आती है। इस भिन्नता के        आधार पर दोहों को २३ विविध प्रकारों में विभक्त किया गया है। 

दोहा मात्रिक छंद है, तेईस विविध प्रकार

तेरह-ग्यारह दोपदी, चरण समाहित चार

१०. दोहे के विषम (पहले, तीसरे) चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण = जभान = लघु गुरु लघु वर्जित है किन्तु शुभ शब्दों यथा            गणेश, महेश, रमेश, विराट आदि अथवा  दो शब्दों में विभाजित कर जगण का प्रयोग किया जा सकता है।  

विषम चरण के आदि में, 'जगण' विवर्जित मीत

दो शब्दों में मान्य है, यह दोहा की रीत

     विषम (प्रथम, तृतीय) चरण के अंत में 'सनर' अर्थात सगण = सलगा = लघु लघु गुरु, नगण = नसल = लघु लघु लघु अथवा रगण = राजभा = गुरु लघु गुरु होना चाहिए सम (दूसरे, चौथे) चरण के अंत में 'जतन' अर्थात जगण = जभान = लघु गुरु लघु,  तगण = ताराज = गुरु गुरु लघु या  नगण = नसल = लघु लघु लघु में से कोई एक रखा जा सकता। 

विषम चरण के अंत में, 'सनर' सुशोभित खूब

सम चरणान्त 'जतन' रहे, पाठक रस ले डूब

११. एक और बात पर ध्यान दें- लघु-गुरु मात्राओं का क्रम बदलने अर्थात शब्दों को आगे-पीछे करने पर कभी-कभी दोहा लय में पढ़ा जा सकता है अर्थात उसका मात्रा विभाजन (मात्रा बाँट) ठीक होता है, कभी-कभी दोहा लय में नहीं पढ़ा जा सकता अर्थात उसका मात्रा विभाजन (मात्रा बाँट) ठीक नहीं होता। 


कवि कविता से छल करे, क्षम्य नहीं अपराध
ख़ुद को ख़ुद ही मारता, जैसे कोई व्याध

इस दोहे के प्रथम चरण में शब्दों को आगे-पीछे कर 'छल कवि कविता से करे,  कवि छल कविता से करे, कविता से छल कवि करे. छल से कवि कविता करे' आदि लिखने पर लय तथा सार्थकता बनी रहती है किंतु कवि, कविता और छल में से किस पर जोर दिया जा रहा है यह तत्व बदलता हैदोहाकार जिस शब्द पर जोर देना चाहे उसे चुन सकता है, इससे कथ्य के अर्थ और प्रभाव में परिवर्तन होगा। 

इसी चरण को 'करे कवि कविता से छल, कविता से करे कवि छल, छल करे कविता से कवि' आदि करने पर लय सहज प्रवाहमयी नहीं रह जाती अर्थात लय-भंग हो जाती है। ऐसे परिवर्तन नहीं किये जा सकते या उस तरह से दोहा में लय-भंग को दोष कहा जाता है। आरंभ में यह कठिन तथा दुष्कर प्रतीत हो सकता है किन्तु क्रमश: दोहाकार इसे समझने लगता है। 

इसी तरह 'ख़ुद को ख़ुद ही मारता' के स्थान पर 'खुद ही खुद को मारता' तो किया जा सकता है किन्तु 'मारता खुद खुद को ही', खुद ही मारता खुद को' जैसे बदलाव नहीं किये जा सकते

दोहा 'सत्' की साधना, करें शब्द-सुत नित्य.

दोहा 'शिव' आराधना, 'सुंदर' सतत अनित्य.

तप न करे जो सह तपन, कैसे पाये सिद्धि?
तप न सके यदि सूर्ये तो, कैसे होगी वृद्धि?

इन दोहों में यत्किंचित परिवर्तन भी लय भंग की स्थिति बना देता है

दोहा में कल-क्रम (मात्रा बाँट) : 

अ. विषम चरण: 

क. विषम मात्रिक आरम्भ- दोहे के प्रथम या तृतीय अर्थात विषम चरण का आरम्भ यदि विषम मात्रिक शब्द (जिस शब्द का मात्रा योग विषम संख्या में हों) से हो तो चरण में कल-क्रम ३ ३ २ ३ २  रखने पर लय सहज तथा प्रवाहमय होती है। चरणान्त में रगण या नगण स्वतः स्थान ग्रहण कर लेगा। सहज सरल हो कथन यदि, उसे नहीं दें मत कभी आदि में यह कल-क्रम देखा जा सकता है।  

ख. सम मात्रिक आरम्भ- दोहे के प्रथम या तृतीय अर्थात विषम चरण का आरम्भ यदि सम मात्रिक शब्द (जिस शब्द का मात्रा योग सम संख्या में २ या ४ हों) से हो तो चरण में कल-क्रम ४ ४ ३ २  रखने पर लय सहज तथा प्रवाहमय होती है। चरणान्त में रगण या नगण स्वतः स्थान ग्रहण कर लेगा। दोहा रोला रचें हँस, आश्वासन दे झूठ जो वह आदि में यह कल-क्रम दृष्टव्य है  

आ. सम चरण: 

ग. विषम मात्रिक आरम्भ- दोहे के द्वितीय या चतुर्थ अर्थात सम चरण का आरम्भ यदि विषम मात्रिक शब्द (जिस शब्द का मात्रा योग विषम संख्या में हों) से हो तो चरण में कल-क्रम ३ ३ २ ३  रखने पर लय निर्दोष होती है। यहाँ त्रिमात्रिक शब्द गुरु लघु  है, वह लघु गुरु नहीं हो सकता। चरणान्त में जगण, तगण या नगण रखना श्रेयस्कर है समय न जाए व्यर्थ, वह भटकाता राह आदि में ऐसी मात्रा बाँट देखिए


घ. सम मात्रिक आरंभ- दोहे के द्वितीय या चतुर्थ अर्थात सम चरण का आरम्भ यदि सम मात्रिक शब्द (जिस शब्द का मात्रा योग सम संख्या में हों) से हो तो चरण में कल-क्रम ४ ४ ३  रखने पर लय मधुर होती है। यहाँ त्रिमात्रिक शब्द गुरु लघु  है, वह लघु गुरु नहीं हो सकता। चरणान्त में तगण या जगण रखना श्रेयस्कर है।  पाठक समझें अर्थ, जिसकी करी न चाह आदि में मात्राओं का क्रम इसी प्रकार है

सहज सरल हो कथन यदि, पाठक समझें अर्थ 
दोहा रोला रचें हँस, समय न जाए व्यर्थ 

उसे नहीं दें मत कभी, जिसकी करी न चाह 
आश्वासन दे झूठ जो, वह भटकाता राह 

दोहा रचना में शिल्पगत उक्त विधानों के साथ कथ्यगत विशिष्टताएँ संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, सार्थकता, मर्मबेधकता तथा सरसता के पंच तत्व होना भी आवश्यक है। 

=====================                                             - क्रमश: ५ 

रविवार, 1 नवंबर 2015

navgeet

एक रचना:
चाकरी
*
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
यही है पहचान
सच्चे मर्द की
.
कंकरों पर चोट कर निष्ठुर समय
तोड़ शंकर बोल माँगे जब अभय
यदि उन्हें मैं मौन रह सहला रहा
कह रहे तुम व्यर्थ मन बहला रहा
गर्मियों को क्या पता
कैसी तपिश
हुआ करती असह
मौसम सर्द की?
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
.
हथौड़ों के कौन छाले देखता
रास्ते की पीर कोई लेखता?
सफलता की बोलकर जय शब्द भी
क्या नहीं खुद को रहा है बेचता?
मलिन होता
है कलश वह
जो नहीं किया करता
फ़िक्र उड़ती गर्द की
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
.
सेज सुमनों की नहीं है ज़िंदगी
शूल की जिसने नहीं की बंदगी
वह करेगा स्वच्छ दुनिया क्या कभी
निकट जा जिसने न देखी गंदगी
गीत रचते वक़्त
सुन भी लो कभी
नींव में दब गयी
पत्ती ज़र्द की
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
***
Sanjiv verma 'Salil', 94251 83244
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahitya salila / sanjiv verma 'salil'

laghukatha

लघुकथा:
अर्थ
*
हमने बच्चे को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिहार के छोटे से कसबे से बेंगलोर जैसे शहर में आया। इतने साल पढ़ाई की। इतनी अच्छी कंपनी में इतने अच्छे वेतन पर है, देश-विदेश घूमता है। गाँव में खेती भी हैं और यहाँ भी पिलोट ले लिया है। कितनी ज्यादा मँहगाई है, १ करोड़ से कम में क्या बनेगा मकान? बेटी भी है ब्याहने के लिये, बाकी आप खुद समझदार हैं।
आपकी बेटी पढ़ी-लिखी है,सुन्दर है, काम करती है सो तो ठीक है, माँ-बाप पैदा करते हैं तो पढ़ाते-लिखाते भी हैं। इसमें खास क्या है? रूप-रंग तो भगवान का दिया है, इसमें आपने क्या किया? ईनाम - फीनाम का क्या? इनसे ज़िंदगी थोड़े तेर लगती है। इसलिए हमने बबुआ को कुछ नई करने दिया। आप तो समझदार हैं, समझ जायेंगे।
हम तो बाप-दादों का सम्मान करते हैं, जो उन्होंने किया वह सब हम भी करेंगे ही। हमें दहेज़-वहेज नहीं चाहिए पर अपनी बेटी को आप दो कपड़ों में तो नहीं भेज सकते? आप दोनों कमाते हैं, कोई कमी नहीं है आपको, माँ-बाप जो कुछ जोड़ते हैं बच्चियों के ही तो काम आता है। इसका चचेरा भाई बाबू है ब्याह में बहुरिया कर और मकान लाई है। बाकी तो आप समझदार हैं।
जी, लड़का क्या बोलेगा? उसका क्या ये लड़की दिखाई तो इसे पसंद कर लिया, कल दूसरी दिखाएंगे तो उसे पसंद कर लेगा। आई. आई. टी. से एम. टेक. किया है,इंटर्नेशनल कंपनी में टॉप पोस्ट पे है तो क्या हुआ? बाप तो हमई हैं न। ये क्या कहते हैं दहेज़ के तो हम सख्त खिलाफ हैं। आप जो हबी करेंगे बेटी के लिए ही तो करेंगे अब बेटी नन्द की शादी में मिला सामान देगई तो हम कैसे रोकेंगे? नन्द तो उसकी बहिन जैसी ही होगी न? घर में एक का सामान दूसरे के काम आ ही जाता है। बाकि तो आप खुद समझदार हैं।
मैं तो बहुत कोशिश करने पर भी नहीं समझ सका, आप समझें हों तो बताइये समझदार होने का अर्थ।
***