मंगलवार, 1 नवंबर 2016

geet

एक रचना 
हस्ती 
*
हस्ती ख़त्म न होगी तेरी 
*
थर्मोडायनामिक्स बताता 
ऊर्जा बना न सकता कोई 
बनी हुई जो ऊर्जा उसको 
कभी सकेगा मिटा न कोई 
ऊर्जा है चैतन्य, बदलती 
रूप निरंतर पराप्रकृति में 
ऊर्जा को कैदी कर जड़ता 
भर सकता है कभी न कोई 
शब्द मनुज गढ़ता अपने हित 
ऊर्जा करे न जल्दी-देरी 
​​
हस्ती ख़त्म न होगी तेरी 
*
तू-मैं, यह-वह, हम सब आये 
ऊर्जा लेकर परमशक्ति से 
निभा भूमिका रंगमंच पर 
वरते करतल-ध्वनि विभक्ति से 
जा नैपथ्य बदलते भूषा 
दर्शक तब भी करें स्मरण 
या सराहते अन्य पात्र को 
अनुभव करते हम विरक्ति से 
श्वास गली में आस लगाती 
रोज सवेरे आकर फेरी 
हस्ती ख़त्म न होगी तेरी 
*
साँझ अस्त होता जो सूरज
भोर उषा-संग फिर उगता है 
रख अनुराग-विराग पूर्ण हो 
बुझता नहीं सतत जलता है 
पूर्ण अंश हम, मिलें पूर्ण में 
किंचित कहीं न कुछ बढ़ता है 
अलग पूर्ण से हुए अगर तो 
नहीं पूर्ण से कुछ घटता है 
आना-जाना महज बहाना 
नियति हुई कब किसकी चेरी 
हस्ती ख़त्म न होगी तेरी 
*

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