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मंगलवार, 7 मई 2013

muktika: sanjiv 'salil'

मुक्तिका

संजीव
*
हमको केवल खुद से प्यार
बनते जग के पहरेदार
कुर्सी पा मनमानी की
औरों को उपदेश हजार
देख छिपकली  डर जाते
लेकिन शेखी रहे बघार
नगद न नौ है हाथों में
तेरह चाहें मिले उधार
मन का मैल न धोते हैं
तन को अपने रहे निहार
अपनी रखते परदे में
सब की बीबी रहे निहार
दिया नहीं दिल जला रहे
'सलिल' ने देना भाग्य पजार

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