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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अप्रैल १०, ग़ज़लिका, रामकिंकर, सॉनेट, हरिगीतिका, दोहा, घनाक्षरी, व्यंग्य गीत, कुंडलिनी

 सलिल सृजन अप्रैल १०

.
ग़ज़लिका ० फ़िक्र से बेफ़िक्र रह। बात मन की जुबां कह। . सत्य वह बकरी नहीं जो न हो सकता जिबह। . जब घटे घटना रहे हमेशा पीछे वजह। . हकीकत के साथ चल मुश्किलें बिन डरे सह। . नमी के ऊपर मिले कड़ी ही हमको सतह। . पेश्तर दुनिया के कर खुदी को ऐ मन! फतह। . मत बनो पाषाण-रज 'सलिल' बनकर धार बह। ०००
छंद शाला नव प्रयोग दोहा-रोला-कुंडलिनी ० जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्योहार। सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार।। दें पुस्तक उपहार, पढ़ें तो ज्ञान-वृद्धि हो। पौधे तरु बन फलें, स्वास्थ्य की खा समृद्धि हो।। पानी रखें सँभाल, जीव जन्मे पानी में। खड़े रहें कर जोड़, नीर की अगवानी में।। ०००
गीत . कनक हिरन दंडक में भेज फिर दशानन जाने किस वन्या को उसकी परवाह हो? . होनी को होना है, होकर ही मानेगी कोशिश बाधाएँ जय करना ही ठानेगी हानि-लाभ, यश-अपयश, ग्रीष्म-शीत-सावन कौन कहे किसकी कब कितनी चाह हो? कनक हिरन दंडक में भेज फिर दशानन जाने किस वन्या को उसकी परवाह हो? . काया ही माया की छाया-छवि चाह फँसे कान्हा के हृद-पट में राधा के नैन धँसे मुरलीधर मुरली-धुन मीरा मन भावन इकतारे की गुनगुन युग का अवगाह हो कनक हिरन दंडक में भेज फिर दशानन जाने किस वन्या को उसकी परवाह हो? . लोकतंत्र वैतरणी, कोकतंत्र भवतरणी तंत्र लोक पदवरणी, मंत्र लोक मद चरणी जुमलों का जयकारा नर्मदा पतित पावन धर्म-सत्य को न कहीं तनिक भी पनाह हो कनक हिरन दंडक में भेज फिर दशानन जाने किस वन्या को उसकी परवाह हो? १०.४.२०२६ .
ग़ज़लिका
सुधियों के वातायन में आओ
साँसों पर छाया बनकर छाओ
.
सन्नाटा असहनीय होता है
अपनों में अपनी छवि दर्शाओ
.
मोह-बंध तोड़ जा चुके हो तो
यादों से भी जाकर दिखलाओ
.
खोकर भी तुम्हें नहीं खोया है
आओ यह सत्य देख भी जाओ
.
जीवन को जीवन सा जीना है
थाती मन भाती फिर सम्हलाओ
.
माली ले पौध जो जहाँ रोपे
जड़ें वहीं जमा खूब हरियाओ
.
पहचाने पथ हैं, छोटी दुनिया
कहीं तो, कभी तो आ टकराओ
.
हममें तुम, तुममें हम रह पाएँ
जैसे वह सीख सीख सिखलाओ
.
खेल रहा जो निश-दिन हम सबसे
उसको भी सँग खेलने लाओ
.
संग-साथ जो अपने साथी हैं
उनमें हम-तुम, तुम-हमको पाओ
.
रुसवा क्यों करें तुम्हें मातम कर?
यादों का स्नेह-सलिल बरसाओ
.
१०.४.२०२५
•••
स्मरण युगतुलसी
किंकर किंकर का सकूँ बन,
भज सकूँ प्रभु राम निश-दिन,
समर्पित कर सकूँ तन मन,
व्यर्थ जीवन गुरु कृपा बिन।
बसे मन में छवि तुम्हारी,
आँख मूँदूँ करूँ दर्शन,
सीख मन ने जो बिसारी,
सिखा दो कर कृपा वर्षण।
लाल हनुमत से मिला दो,
छवि सकूँ लख राम-सिय की,
भक्ति शतदल शत खिला दो,
चाह है प्रभु-पद विलय की।
मिटा दो भव भीति हे प्रभु!
बना दो शुभ रीति से प्रभु!!
१०.४.२०२४
•••
सॉनेट
अलविदा
अलविदा भी कह न पाया
आस थी तुम जय वरोगे
व्याधि को बौना करोगे
किंतु खुद को ठगा पाया।
ईश ने तुमको बुलाया
गए हो क्या खुश रहोगे?
क्या हमें बिसरा सकोगे?
जा किया हमको पराया।
छवि तुम्हारी झूलती है,
आँख होती बंद ज्यों ही
लगे बाँहों में कसोगे।
याद मन को हूलती है,
रह गई जो बात बाकी
ख्वाब में आ कब कहोगे?
१०.४.२०२४
(आज दिवंगत भाई सुशील वर्मा जी भोपाल को समर्पित)
•••
मुक्तिका
अरे! चल हट।
कहा मत नट।।
नहीं कुछ दम
परे चल झट।
फरेब न कर
न भूल, न रट।
शऊर न तज
न दूर; न सट।
न नाव; न जल
नहीं नद-तट।
न हार; न जय
नहीं चित-पट।
न भाग; ठहर
जरा रुक-डट
१०-४-२०२२
•••
मुक्तिका
*
श्रीधर वंदन
अक्षत चंदन
हों शत वर्षी
लें अभिनंदन
छंद गीत ही
हैं नंदनवन
हे रस-लयपति
लो अभिनंदन
कोरोना को
धुन दो दन दन
***
हिंदी गज़ल
छंद : हरिगीतिका
मापनी : ११२१२
बह्र : मुतफाइलुं
*
जब भी मिलो
खुश हो खिलो
हम भी चलें
तुम भी चलो
जब भोर हो
उगती चलो
जब साँझ हो
ढलती चलो
छवि नैन में
छिपती चलो
मत मौन हो
कहती चलो
१०-४-२०२०
***
दोहा सलिला
आओ यदि रघुवीर
*
गले न मिलना भरत से, आओ यदि रघुवीर
धर लेगी योगी पुलिस, मिले जेल में पीर
कोरोना कलिकाल में, प्रबल- करें वनवास
कुटिया में सिय सँग रहें, ले अधरों पर हास
शूर्पणखा की काटकर, नाक धोइए हाथ
सोशल डिस्टेंसिंग रखें, तीर मारकर नाथ
भरत न आएँ अवध में, रहिए नंदीग्राम
सेनेटाइज शत्रुघन, करें- न विधि हो वाम
कैकई क्वारंटाइनी, कितने करतीं लेख
रातों जगें सुमंत्र खुद, रहे व्यवस्था देख
कोसल्या चाहें कुसल, पूज सुमित्रा साथ
मना रहीं कुलदेव को, कर जोड़े नत माथ
देवि उर्मिला मांडवी, पढ़ा रहीं हैं पाठ
साफ-सफाई सब रखें, खास उम्र यदि साठ
श्रुतिकीरति जी देखतीं, परिचर्या हो ठीक
अवधपुरी में सुदृढ़ हो, अनुशासन की लीक
तट के वट नीचे डटे, केवट देखें राह
हर तब्लीगी पुलिस को, सौंप पा रहे वाह
मिला घूमता जो पिटा, सुनी नहीं फरियाद
सख्ती से आदेश निज, मनवा रहे निषाद
निकट न आते, दूर रह वानर तोड़ें फ्रूट
राजाज्ञा सुग्रीव की, मिलकर करो न लूट
रात-रात भर जागकर, करें सुषेण इलाज
कोरोना से विभीषण, ग्रस्त विपद में ताज
भक्त न प्रभु के निकट हों, रोकें खुद हनुमान
मास्क लगाए नाक पर, बैठे दयानिधान
कौन जानकी जान की, कहो करे परवाह?
लव-कुश विश्वामित्र ऋषि, करते फ़िक्र अथाह
वध न अवध में हो सके, कोरोना यह मान
घुसा मगर आदित्य ने, सुखा निकाली जान
१०-४-२०२०
***
छंद शाला
घनाक्षरी या कवित्त
सघन संगुफन भाव का, अक्षर अक्षर व्याप्त.
मन को छूते चतुष्पद, रच घनाक्षरी आप्त..
अष्ट अक्षरी त्रै चरण, चौथे अक्षर सात .
लघु-गुरु मात्रा से करें, अंत हमेशा भ्रात..
*
चतुष्पदी मुक्तक छंद घनाक्षरी या छप्पय के पदों में वर्ण-संख्या निश्चित होती हैं किंतु छंद के पद वर्ण-क्रम या मात्रा-गणना से मुक्त होते हैं। किसी अन्य वर्णिक छंद की तरह इसके गण (वर्णों का नियत समुच्चय) व्यवस्थित नहीं होते अर्थात पदों में गणों की आवृत्तियाँ नहीं होतीं।वर्ण-क्रम मुक्तता घनाक्षरी छंद का वैशिष्ट्य है। वाचन में प्रवाहभंग या लयभंग से बचने के लिये सम कलों वाले शब्दों के बाद सम कल के शब्द तथा विषम कलों के शब्द के बाद विषम कलों के शब्द समायोजित किये जाते हैं। वर्ण-गणना में व्यंजन या व्यंजन के साथ संयुक्त स्वर अर्थात संयुक्ताक्षर एक वर्ण माना जाता है।
हिंदी के मुक्तक छंदों में घनाक्षरी सर्वाधिक लोकप्रिय, सरस और प्रभावी छंदों में से एक है। घनाक्षरी की पंक्तियों में वर्ण-संख्या निश्चित (३१, ३२, या ३३) होती है किन्तु मात्रा गणना नहीं की जाती। अतः, घनाक्षरी की पंक्तियाँ समान वर्णिक किन्तु विविध मात्रिक पदभार की होती हैं जिन्हें पढ़ते समय कभी लघु का दीर्घवत् उच्चारण और कभी दीर्घ का लघुवत् उच्चारण करना पड़ सकता है। इससे घनाक्षरी में लालित्य और बाधा दोनों हो सकती हैं। वर्णिक छंदों में गण नियम प्रभावी नहीं होते। इसलिए घनाक्षरीकार को लय और शब्द-प्रवाह के प्रति अधिक सजग होना होता है। समान पदभार के शब्द, समान उच्चार के शब्द, आनुप्रासिक शब्द आदि के प्रयोग से घनाक्षरी का लावण्य निखरता है। वर्ण गणना करते समय लघु वर्ण, दीर्घ वर्ण तथा संयुक्ताक्षरों को एक ही गिना जाता है अर्थात अर्ध ध्वनि की गणना नहीं की जाती है।
१ वर्ण = न, व, या, हाँ आदि.
२ वर्ण = कल, प्राण, आप्त, ईर्ष्या, योग्य, मूर्त, वैश्य आदि.
३ वर्ण = सजल,प्रवक्ता, आभासी, वायव्य, प्रवक्ता आदि.
४ वर्ण = ऊर्जस्वित, अधिवक्ता, अधिशासी आदि.
५ वर्ण = पर्यावरण आदि.
६ वर्ण = वातानुकूलित आदि.
आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर, मनहर घनाक्षरी, छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर, चरण के आखिर में, 'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिये..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम, गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण- 'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
*
घनाक्षरी के ९ प्रकार होते हैं;
१. मनहर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु अथवा लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण।
२. जनहरण: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु शेष सब वर्ण लघु।
३. कलाधर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण ।
४. रूप: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
५. जलहरण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
६. डमरू: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत बंधन नहीं, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
७. कृपाण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण, प्रथम ३ चरणों में समान अंतर तुकांतता, ८-८-८-८ वर्ण।
८. विजया: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
९. देव: कुल वर्ण संख्या ३३. समान पदभार, समतुकांत, पदांत ३ लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-९ वर्ण।
उदाहरण-
०१. शस्य-श्यामला सघन, रंग-रूप से मुखर देवलोक की नदी है आज रुग्ण दाह से
लोभ मोह स्वार्थ मद पोर-पोर घाव बन रोम-रोम रीसते हैं, हूकती है आह से
यहाँ 'शस्य' (२ वर्ण, ३ मात्रा = २१ ), के बाद 'श्यामला' (३ वर्ण, ५ मात्रा, रगण = २१२ = ३ + २) है। अतः 'शस्य' के त्रिकल, के ठीक बाद श्याम का त्रिकल सटीक व्यवस्था कर वाचन में लयभंग नहीं होने देता। ऐसी मात्रा-व्यवस्था घनाक्षरी के सभी पदों में आवश्यक है। घनाक्षरी छन्द के कुल नौ भेदों में मुख्य चार १. मनहरण, २. जलहरण, ३. रूप तथा ४. देव घनाक्षरी हैं।
मनहरण घनाक्षरी- चार पदों के इस छंद के प्रत्येक पद में कुल वर्ण-संख्या ३१ तथा पदांत में गुरु अनिवार्य है। लघु-गुरु का कोई क्रम नियत नहीं है किंतु पदान्त लघु-गुरु हो तो लय सुगम हो जाती है। हर पद में चार चरण होते हैं। हर चरण में वर्ण-संख्या ८, ८, ८, ७ की यति के अनुसार होती है। पदांत में मगण (मातारा, गुरु-गुरु-गुरु, ऽऽऽ, २ २ २) वर्जित है।
अपवाद स्वरूप किसी चरण में वर्ण-व्यवस्था ८, ७, ९, ७ हो किंतु शब्द-कल का निर्वहन सहज हो अर्थात वाचन या गायन में लय-भंग न हो छन्द निर्दोष माना जाता है। सुविधा के लिये ३१ वर्ण की पद-यति १६-१५, १५, १६, १७-१४, १४-१७,१५-१६, १६-१५ या अन्य भी हो सकती है यदि लय बाधित न हो।
उदाहरण-
०२. हम कृतघ्न पुत्र हैं या दानवी प्रभाव है, स्वार्थ औ' प्रमाद में ज्यों लिप्त हैं वो क्या कहें? यति १६-१५
ममत्व की हो गोद या सुरम्यता कारुण्य की, नकारते रहे सदा मूढ़ता को क्या कहें?? यति १६-१५
यहां लय भंग नहीं है किन्तु शब्द-क्रम में यत्किंचित परिवर्तन भी लय भंग का हेतु बन जाता है।
'ममत्व की हो गोद या' को 'या गोद ममत्व की हो' अथवा 'गॉड या ममत्व की हो' किया जाय तो चरण में समान वर्ण होने के बावज़ूद लयभंगता स्पष्ट है। तथा पद-प्रवाह सहज रहें.
उदाहरण-
- सौरभ पांडेय
०१. शस्य-श्यामला सघन, रंग-रूप से मुखर देवलोक की नदी है आज रुग्ण दाह से
लोभ मोह स्वार्थ मद पोर-पोर घाव बन रोम-रोम रीसते हैं, हूकती है आह से
जो कपिल की आग के विरुद्ध सौम्य थी बही अस्त-पस्त-लस्त आज दानवी उछाह से
उत्स है जो सभ्यता व उच्च संस्कार की वो सुरनदी की धार आज रिक्त है प्रवाह से - इकड़ियाँ जेबी से
०२. नीतियाँ बनीं यहाँ कि तंत्र जो चला रहा वो श्रेष्ठ भी दिखे भले परन्तु लोक-छात्र हो
तंत्र की कमान जन-जनार्दनों के हाथ हो, त्याग दे वो राजनीति जो लगे कुपात्र हो
भूमि-जन-संविधान, विन्दु हैं ये देशमान, संप्रभू विचार में न ह्रास लेश मात्र हो
किन्तु सत्य है यही सुधार हो सतत यहाँ, ताकि राष्ट्र का समर्थ शुभ्र सौम्य गात्र हो
- संजीव 'सलिल'
०३. फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, दीप बाल अंधकार, ज़िन्दगी का हरता।
नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो, जीतता सुधीर वीर, पीर पीर सहता।।
'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ, सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता।
आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ, हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।
०४. गीत-ग़ज़ल गाइये / डूबकर सुनाइए / त्रुटि नहीं छिपाइये / सीखिये-सिखाइए
शिल्प-नियम सीखिए / कथ्य समझ रीझिए / भाव भरे शब्द चुन / लय भी बनाइए
बिम्ब नव सजाइये / प्रतीक भी लगाइये / अलंकार कुछ नये / प्रेम से सजाइए
वचन-लिंग, क्रिया रूप / दोष न हों देखकर / आप गुनगुनाइए / वाह-वाह पाइए
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०५. कौन किसका है सगा? / किसने ना दिया दगा? / फिर भी प्रेम से पगा / जग हमें दुलारता
जो चला वही गिरा / उठ हँसा पुन: बढ़ा / आदि-अंत सादि-सांत / कौन छिप पुकारता?
रात बनी प्रात नित / प्रात बने रात फिर / दोपहर कथा कहे / साँझ नभ निहारता
काल-चक्र कब रुका? / सत्य कहो कब झुका? /मेहनती नहीं चुका / धरांगन बुहारता
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०६. न चाहतें, न राहतें / न फैसले, न फासले / दर्द-हर्ष मिल सहें / साथ-साथ हाथ हों
न मित्रता, न शत्रुता / न वायदे, न कायदे / कर्म-धर्म नित करें / उठे हुए माथ हों
न दायरे, न दूरियाँ / रहें न मजबूरियाँ / फूल-शूल, धूप-छाँव / नेह नर्मदा बनें
गिर-उठें, बढ़े चलें / काल से विहँस लड़ें / दंभ-द्वेष-छल मिटें / कोशिशें कथा बुनें
०७. चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही
मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे / अग्नि इसलिए दही
मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके
जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही
सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम,
झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइये.
एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह,
एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइये..
दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह,
मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए.
राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं,
भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए..
*
बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी,
कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए.
सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका,
बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए..
कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी,
आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए.
मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें,
बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए..
*
बंधन न रास आये, बँधना न मन भाये,
स्वतंत्रता ही सुहाये, सहज स्वभाव है.
निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें,
कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है..
मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व,
निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है.
बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो,
धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है..
*
संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी,
शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो?
करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी,
शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो..
राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी,
बहिन की पत राखी, नेह का करार हो.
शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया,
नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो..
*
महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का,
तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी.
मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई,
हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी..
महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया,
हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी.
सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ,
हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी..
बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने,
एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी.
रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली,
हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी..
विप्र जब द्वार आये, राखी बांध मान पाये,
शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी.
कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े,
साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी..
*
कल :
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि, श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।
भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि, राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि, तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।
काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि, ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।
काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-
१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.
कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है.
१०-४-२०१९
***
नवगीत:
*
जाल न फैला
व्यर्थ मछेरे
मछली मिले कहाँ बिन पानी।
*
नहा-नहा नदियाँ की मैली
पुण्य, पाप को कहती शैली
कैसे औरों की हो खाली
भर लें केवल अपनी थैली
लूट करोड़ों,
बाँट सैंकड़ों
ऐश करें खुद को कह दानी।
*
पानी नहीं आँख में बाकी
लूट लुटे को हँसती खाकी
गंगा जल की देख गंदगी
पानी-पानी प्याला-साकी
चिथड़े से
तन ढँके गरीबीे
बदन दिखाती धनी जवानी।
*
धंधा धर्म रिलीजन मजहब
खुली दुकानें, साधो मतलब
साधो! आराधो, पद-माया
बेच-खरीदो प्रभु अल्ला रब
तू-तू मैं-मैं भुला,
थाम चल
भगवा झंडा, चादर धानी।
*
१०-४-२०१८
***
एक व्यंग्य गीत
*
अब ओलंपिक में हो
चप्पलबाजी भी
*
तरस गए हम स्वर्ण पदक को
एक नहीं मिल पाया
किससे-कितना रोना रोयें
कोई काम न आया
हम सा निपुण न कोई जग में
आत्म प्रशंसा करने में
काम बंद कर, संसद ठप कर
अपनी जेबें भरने में
तीनों पदक हमीं पाएंगे
यदि हो धुप्पलबाजी भी
अब ओलंपिक में हो
चप्पलबाजी भी
*
दारू के ठेके दे-देकर
मद्य-निषेध कर रहे हम
दूरदर्शनी बहस निरर्थक
मन में ज़हर भर रहे हम
रीति-नीति-सच हमें न भाता
मनमानी के हामी हैं
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
भ्रष्टाचारी नामी हैं
हों ब्रम्हांडजयी केवल हम
यदि हो जुमलेबाजी भी
अब ओलंपिक में हो
चप्पलबाजी भी
*
बीबी-बहू-बेटियाँ, बेटे
अपने मंत्री-अफसर हों
कोई हो सरकार, मरें जन
अपने उज्जवल अवसर हों
आम आदमी दबा करों से
धनिकों के ऋण माफ़ करें
करें देर-अंधेर, नहीं पर
न्यायालय इन्साफ करें
लोकतंत्र का दम निकले
ऐसी कुछ हो घपलेबाजी भी
अब ओलंपिक में हो
चप्पलबाजी भी
***
मुक्तक
प्रश्न उत्तर माँगते हैं, घूरती चुप्पी
बनें मुन्ना भाई लें-दें प्यार से झप्पी
और इस पर भी अगर मन हो न पाए शांत
गाल पर शिशु के लगा दें प्यार से पप्पी
१०.४.२०१७
***
पुस्तक चर्चा-
'महँगाई का शुक्ल पक्ष'-सामयिक विसंगतियों की शल्यक्रिया
[पुस्तक विवरण- महँगाई का शुक्ल पक्ष, व्यंग्य लेख संग्रह, सुदर्शन कुमार सोनी, ISBN ९७८-९३-८५९४२-११-२, प्रथम संस्करण २०१६, आकार- २०.५ सेमी X १४ सेमी, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, लेमिनेटेड, पृष्ठ १४४, मूल्य १२०/-,बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७, सेक्टर ९, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६, दूरभाष ०१४१ २५०३९८९, ९८२६० १८०८७, व्यंग्यकार संपर्क- डी ३७ चार इमली, भोपाल, ४६२०१६, चलभाष ९४२५६३४८५२, sudarshanksoniyahoo.co.in ]
*
विवेच्य कृति एक व्यंग्य संग्रह है। संस्कृत भाषा का शब्द ‘व्यंग्य’ शब्द ‘अज्ज’ धातु में ‘वि’ उपसर्ग और ‘ण्यत्’ प्रत्यय के लगाने से बनता है। यह व्यंजना शब्द शक्ति से संबंधित है तथा ‘व्यंग्यार्थ’ के रूप में प्रयोग किया जाता है। आम बोलचाल में व्यंग्य को ‘ताना’ या ‘चुटकी’ कहा जाता है जिसका अर्थ है “चुभती हुई बात जिसका कोई गूढ़ अर्थ हो।” आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार “व्यंग्य कथन की एक ऐसी शैली है जहाँ बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्करा रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठे।” व्यंग्य सोद्देश्य, तीखा व तेज-तर्रार कथन है जिसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है। कथन की एक शैली के रूप में जन्मा व्यंग्य क्रमश: साहित्य की ऊर्जस्वित विधा के रूप में विक्सित हो रहा है।
आज़ादी के बाद आमजन का रामराज की परिकल्पना से शासन-प्रशासन की व्यवस्था में मनोवांछित परिवर्तन न पाकर मोह-भंग हुआ। राजनैतिक-सामाजिक विद्रूपताओं ने व्यंग्य शैली को विधा का रूप धारण करने के लिए उर्वर जमीन प्रदान की है। व्यंग्य ‘जो गलत है’ उस पर तल्ख चोट कर ‘जो सही होना चाहिए’ उस सत्य ओर इशारा भी करता है। इसलिए व्यंग्य आमें साहित्य की केन्द्रीय विधा बनने की पूरी संभावना सन्निहित है। आधुनिक हिंदी साहित्य का व्यंग्य अंग्रेजी की 'सैटायर' विधा से प्रेरित है जिसमें व्यवस्था का मजान उदय जाता है। व्यंग्य में उपहास, कटाक्ष, मजाक, लुत्फ़, आलोचना तथा यत्किंचित निंदा का समावेश होता है।
इस पृष्ठ भूमि में सुदर्शन कुमार सोनी के व्यंग्य लेख संग्रह 'मँहगाई का शुक्ल पक्ष' को पढ़ना सैम सामयिक विसंगतियों से साक्षात् करने की तरह है। उनके व्यंग्य लेख न तो परसाई जी के व्यंग्य की तरह तिलमिलाते हैं, न शरद जोशी के व्यंग्य की तरह गुदगुदाते हैं, न लतीफ़ घोंघी के व्यंग्य लेखों की तरह गुदगुदाते हैं। सनातन सलिल नर्मदा तट स्थित संस्कारधानी जबलपुर में जन्में सुदर्शन जी प्रशासनिक अधिकारी हैं, अत: उनकी भाषा में गाम्भीर्य, अभिव्यक्ति में संतुलन, आक्रोश में मर्यादा तथा असहमति में संयम होना स्वाभाविक है। विवेच्य कृति के पूर्व उनके ३ कहानी संग्रह नजरिया, यथार्थ, जिजीविषा तथा एक व्यंग्य संग्रह 'घोटालेबाज़ न होने का गम' छप चुके हैं।
इस संग्रह में बैंडवालों से माफी की फरियाद, अनोखा मर्ज़, देश में इस समय दो ही काम बयान हो रहे हैं, सबके पेट पर लात, कुछ घट रहा है तो कुछ बढ़ रहा है, इट्स रेनिंग डिक्शनरीज एंड ग्रामर बुक्स, मँहगाई का शुक्ल पक्ष, चिर यौवनता की धनी, आज अफसर बहुत खुश है, आम और ख़ास, आवश्यकता नहीं उचक्कापन ही आविष्कार की जननी है, आई एम वोटिंग फॉर यू, धूमकेतु समस्या, सबसे ज्यादा असरकारी इंसान नहीं उसके रचे शब्द हैं, लाइन में लगे रहो, हाय मैंने उपवास रखा, नींद दिवस, समस्या कभी खत्म नहीं होती, सरकार के लिए कहाँ स्कोप है?, मीटिंग अधिकारी, देश का रोजनामचा, झाड़ू के दिन जैसे सबके फिरे, ये ही मेरे आदर्श हैं, फूलवालों की सैर, इन्सान नहीं परियोजनाएं अमर होती हैं, उदासी का सेलिब्रेशन, महिला सशक्तिकरण के सही पैमाने, नेता का पियक्कड़ से चुनावी मौसम में आमना-सामना, भरे पेट का चिंतन खालीपेट का चिंतन, पलटे पेटवाला आदमी, खूब जतन कर लिये नहीं हो पाया, मानसून व पत्नी की तुलना, अनोखी घुड़दौड़, रत्नगर्भा अभियान, पेड़ कटाई, बेचारे ये कुत्ते घुमानेवाले, जेनरेशन गैप इन कुत्तापालन, इंसान की पूंछ होती तो क्या होता?, इन्सान के इंजिन व ऑटोमोबाइल के हार्ट का परिसंवाद, धांसू अंतिम यात्रा की चाहत, 'अच्छे दिन आने वाले हैं' पर पीएच डी, आक्रोश ज़ोन तथा इन्सान तू सच में बहुरूपिया है शीर्षक ४३ व्यंग्य लेख सम्मिलित हैं।
प्रस्तुत संग्रह से देश के सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में व्याप्त अराजकता के साथ-साथ हिंदी के भाषिक लिखित-वाचिक रूप में व्याप्त अराजकता का भी साक्षात् हो जाता है। व्यंग्यकार सुशिक्षित, अनुभवी और समृद्ध शब्द-भण्डार के धनी हैं। साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं होता, वह भाषा के स्वरूप को संस्कारित भी करता है। नई पीढ़ी पुरानी पुस्तकों से ही भाषा को ग्रहण करती है। यह सर्वमान्य तथ्य है की किसी भाषा के श्रेष्ठ साहित्य में अन्य भाषा के शब्द आवश्यक होने पर ही लिये जाते हैं। विवेच्य कृति में हिंदी, संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का उदारतापूर्वक और बहुधा उपयुक्त प्रयोग हुआ है। अप्रतिम, उत्तरार्ध, शाश्वत, अदृश्य, गरिष्ठ, अपसंस्कृति, वयस्कता जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द, नून तलक, बावला, सयाना आदि देशज शब्द, खास, रिश्तों, खत्म, माशूक, अय्याश, खुराफाती, जंजीर जैसे उर्दू शब्द और क्रिकेट, एस एम एस, डोक्टर, इलेक्ट्रोनिक, डॉलर, सोफ्टवेयर जैसे अंग्रेजी शब्दों के समुचित प्रयोग से लेखों की भाषा जीवंत और सहज हुई है किन्तु ऐसे अंग्रेजी शब्द जिनके सरल, सहज और प्रचलित हिंदी शब्द उपलब्ध और जानकारी में हैं उनका प्रयोग न कर अंग्रेजी शब्द को ठूँसा जाना खीर में कंकर की प्रतीति कराता है। ऐसे शताधिक शब्दों में से कुछ इंटरेस्ट (रूचि), लेंग्थ (लंबाई), ड्रेस (पोशाक), क्वालिटी (गुणवत्ता), क्वांटिटी (मात्रा), प्लाट (भूखंड), साइज (परिमाप), लिस्ट (सूची), पैरेंट (अभिभावक), चैप्टर (अध्याय), करेंसी (मुद्रा), इमोशनल (भावनात्मक) आदि हैं। इससे भाषा प्रदूषित होती है।
कोढ़ में खाज यह कि मुद्रण-त्रुटि ने भी जाने-अनजाने शब्दों को विरूपित कर दिया है। महँगाई (बृहत हिंदी कोश, पृष्ठ ८७८) शब्द के दो रूप महंगाई तथा मंहगाई मुद्रित हुए हैं किन्तु दोनों ही गलत हैं। गजब यह कि 'मंह' का मतलब 'मुंह' बता दिग गया है। यह भाषा विज्ञानं के किस नियम से संभव है? यदि वह सन्दर्भ दे दिया जाता तो मुझ पाठक का ज्ञान बढ़ पाता। अनुस्वार तथा अनुनासिक के प्रयोग में भी स्वच्छन्दता बरती गयी है। 'ढ' और 'ढ़' के मुद्रण की त्रुटि ने 'मेंढक' को 'मेंढ़क' बना दिया। 'लड़ाई' के स्थान पर 'लड़ी', 'ढूँढना' के स्थान पर 'ढूंढ़ने' जैसी मुद्रण त्रुटी सम्भवत:शीघ्रता के कारण हुई हो क्योंकि प्रकाशक की अन्य पुस्तकें पथ्य त्रुटियों से मुक्त हैं। व्यंग्यकार का भाषा कौशल 'आम के आम गुठली के दाम', 'नाक-भौं सिकोड़ना' आदि मुहावरों तथा 'आवश्यकता अविष्कार की जननी है' जैसे सूक्ति वाक्यों के प्रयोग में निखरा है। 'लोकलीकरण' जैसे नये शब्द का प्रयोग लेखक की सामर्थ्य दर्शाता है। ऐसे प्रयोगों से भाषा समृद्ध होती है।
व्यंग्य लेखों के विषय सामयिक, चिन्तन सार्थक तथा भाषा शैली सहज ग्राह्य है। 'व्यंजना' शक्ति का अधिकाधिक प्रयोग भाषा के मारक प्रभाव में वृद्धि करेगा। पाठकों के बीच यह संग्रह लोकप्रिय होगा।
१०.४.२०१६
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नवगीत:
करना होगा...
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
देखे दोष,
दिखाए भी हैं.
लांछन लगे,
लगाये भी है.
गिरे-उठे
भरमाये भी हैं.
खुद से खुद
शरमाये भी हैं..
परिवर्तन-पथ
वरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
दीपक तले
पले अँधियारा.
किन्तु न तम की
हो पौ बारा.
डूब-डूबकर
उगता सूरज.
मिट-मिट फिर
होता उजियारा.
जीना है तो
मरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
नवगीत:
चलो! कुछ गायें...
*
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...
*
माना अँधियारा गहरा है.
माना पग-पग पर पहरा है.
माना पसर चुका सहरा है.
माना जल ठहरा-ठहरा है.
माना चेहरे पर चेहरा है.
माना शासन भी बहरा है.
दोषी कौन?...
न शीश झुकायें.
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...
*
सच कौआ गा रहा फाग है.
सच अमृत पी रहा नाग है.
सच हिमकर में लगी आग है.
सच कोयल-घर पला काग है.
सच चादर में लगा दाग है.
सच काँटों से भरा बाग़ है.
निष्क्रिय क्यों?
परिवर्तन लायें.
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...
***
नवगीत:
करो बुवाई...
*
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
१०-४-२०१०
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

अप्रैल ९, शे'र, कैकेयी, दोहा मुक्तिका, नवगीत, बाँस, तुम, कोरोना, एक मुक्तकी रामायण, सॉनेट, दूब, दुर्गा

 सलिल सृजन अप्रैल ९

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🌹 चरित्र वर्णन 🌹 🌷 नारीरत्न माता कैकेई🌷 ०
माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे परम सुंदरी, शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण विदुषी थीं। उन्हें राजनीति का भी सम्यक् ज्ञान और स्वसंस्कृति पर अभियान था। उन्होंने कैशोर्यावस्था में ही ऋषियों के आह्वान पर संस्कृति की रक्षा हेतु आवश्यक राजकुँवरों को तैयार करने के लिए अपने पिता कैकय नरेश के हमउम्र मित्र दशरथ से विवाह कर अतुलनीय आत्म उत्सर्ग किया।
पूर्व विवाहित पराक्रमी व विलास प्रिय दशरथ को वार्धक्य में शौर्योन्मुख कर देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के साथ वीर वेश में शस्त्र धारण कर कैकेयी ने पराक्रम दिखाया। जब महाराज दशरथ असुर शक्ति प्रहार से घायल हो गए, तो कुशल योद्धा की भाँति कैकेयी उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थीं। युद्ध क्षेत्र में रथ के पहिये के चके की कील निकल जाने पर प्रत्युतपन्न मति युक्त कैकेयी ने तत्क्षण लौह कवच धारी अँगुली फँसाकर रथ और युद्धरत दशरथ की जीवन रक्षा की। युद्ध जीतने के बाद दशरथ का ध्यान कैकेयी की लहू लुहान अँगुली पर गया तो प्रसन्न होकर उन्होंने वर दिए लेकिन निर्लोभी कैकेयी ने कुछ नहीं माँगा, तब दशरथ ने वर भविष्य के लिए सुरक्षित कर दिए। एक युद्ध में रावण ने जब उनके रूप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य देगा।

कालांतर में पुत्रहीन दशरथ को पुत्र प्राप्ति हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ कार्य गया। दशरथ का की सर्वाधिक प्रिय रानी होने पर भी कैकेयी ने यज्ञ के प्रसाद का आधा भाग बड़ी सौत कौसल्या को तथा शेष आधे भाग के दो हिस्से उन्हें और सुमित्रा को मिलने पर अपने हिस्से का आधा भाग उदारता पूर्वक छोटी सौत सुमित्रा को दे दिया। कैकेयी ने स्वयं सबसे कम भाग ग्रहण किया। स्पष्ट है कि कैकेयी सौतिया डाह से पूरी तरह मुक्त थीं। पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात प्राप्त ४ पुत्रों में कैकेयी ने कोई भेद नहीं किया। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम कैकेयी ने राम से किया। सुमित्र से भी अधिक प्रेम लक्ष्मण व शत्रुघ्न को कैकेयी ने दिया।। चारों पुत्रों के लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था कैकेयी की देख-रेख में ही हुई। कैकेयी ने अपने पुत्र भरत को कभी वरीयता नहीं दी। उनके पास वरदान होने पर भी उन्होंने कभी उनका लाभ नहीं उठाया। दशरथ की सर्वाधिक शिक्षित, वीर, सुंदर और योग्य रानी होने पर भी उन्होंने कभी अपने या अपने पुत्रों के लिए कुछ नहीं चाहा।

श्री रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो कैकेयी सर्वाधिक प्रसन्न हुईं। राम को सुयश मिले, वे जन कल्याण कर सकें इसके लिए आवश्यक था की वे असुरों का वध करें। दशरथ पुत्र मोह के कारण उन्हें अयोध्या में सुरक्षित-सीमित रखना चाहते थे। देव कार्य हेतु चिंतित ऋषियों ने कैकेयी से प्रार्थना की कि वे परिस्थति सम्हालें। स्वयं श्री राम ने माता कैकेई से कहा कि माँ मैं कुछ मांगूं तो मना तो नहीं करोगी? कैकेयी ने कहा कि राम तुम मेरे प्राण भी माँगों तो मैं सहर्ष दे दूँगी।
भगवान राम ने कहा- माँ! मैं उससे भी अधिक चाहता हूँ, उससे आपका संसार में अपयश होगा, हो सकता है आपको वैधव्य भी सहना पड़े, भरत के कटु वचन सहना पड़े और भी तिरस्कार सहना पड़े, क्या फिर भी आप मेरी माँग पूरी करेंगी।
कैकेयी मुस्कुराते हुए बोली- 'राम! मुझे तुम्हारे लिए सब स्वीकार है, तुम माँगो तो सही। भगवान राम जानते थे कि माँ को बहुत दुःख होगा। इसलिए उन्होंने पहले माँ सरस्वती से मन-ही-मन प्रार्थना की कि आप माता की जिव्हा पर विराजमान हो कर मेरा कार्य कीजिए। वे मेरे लिए वनवास और भरत के लिए राज्य माँग लें, तभी मेरे जन्म का उद्देश्य और माता का मनोरथ पूरा हो सकेगा।
माँ शारदा ने मंथरा की सहायता से कैकेई की बुद्धि फेरकर उनसे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ द्वारा उन्हें दिए वर मँगवा लिए। भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास, इस प्रकार कैकयी ने भगवान राम की लीला में सर्वाधिक और अतुलनीय सहयोग किया है। वे आदरणीय हैं। वे लोग जो उन्हें दोषी कहते हैं नादान हैं। कैकेयी का त्याग तो तपस्या से भी बढ़कर है। यही उनके आदर्श जीवन का सत्य है। इसीलिए कैकेई केबाद दूसरी कोई कैकेई हो ही नहीं सकी। आज तक कोई पिता अपनी पुत्री का नाम कैकेयी रखने का साहस नहीं कर सका। कोई पुत्री या पत्नी कैकेयी की तरह हो भी नहीं सकती। कैकेयी अपनी मिसाल आप थीं, हैं और रहेंगी।
***
ग़ज़लिका ० अनुबंध बाकी रह गए प्रतिबंध पल में ढह गए . सज मुस्कुराहट से अधर अनकहे किस्से कह गए . प्राचीर ले संयम किले आलिंगनों में बह गए . आँखें समय ने फेर लीं सुधि के सहारे सह गए . ऐ शाह! हम प्यादे भले चुप रह तुम्हें दे शह गए . हम पग बढ़ा आगे बढ़े तुम ईर्ष्या कर दह गए . मूँ चायने में मिलन की सुधियाँ अजाने तह गए . स्नेह सलिला में नहाकर विमलता ही गह गए ०००
छंद शाला दोहा+रोला=कुंडलिया ० अमृत मुख शुक नासिका, कर्णफूल द्युतिमान।
स्वर्ण हिरण सम हो त्वचा, खंजन नयन प्रधान।। -अशोक व्यग्र खंजन नयन प्रधान, समाहित सदा सकल रस। हँस-रो, मिल-मुड़ रचें, ऋचाएँ दरस-परस बस।। होते रीझ मयूर, कभी हों मुग्ध सारिका। हों मति-गुण-रति वान, अमृत मुख शुक-नासिका।। ९.४.२०२६ ०००
सत श्लोकी दुर्गा
हिंदी भावानुवाद
शिव बोले- ‘देवी! कार्यों की, तुम्हीं नियंता भक्त सुलभ।
कला एक ही कार्य सिद्धि की, है उपाय नित सतत प्रयत्न।।
देवी बोलीं- देव! समझ लें, कला सभी इष्टों का साधन।
मेरा तुम पर स्नेह बहुत है,अंबास्तुति का करूँ प्रकाशन।।
ॐ मंत्र सत श्लोकी दुर्गा, ऋषि नारायण छंद अनुष्टुप।
देवी काली रमा शारदा, दुर्गा हित यह पाठ नियोजित।।
ॐ चेतना ज्ञानी जन को, देती हैं भगवती सदा।
बरबस ही मोहा करती हैं, मातु महामाया खुद ही।१।
दुर्गे माँ! स्मरण मात्र से, हर लेतीं भक्तों का भय।
जो हो स्वस्थ्य सुमिरते तुमको, देती हो उनको शुभ फल।।
दुःख-दरिद्रता-भय हर्ता है, देवी! सिवा आपके कौन?
आतुर हो उपकार सभी का, करने सदा आपका चित्त।२।
सब मंगल की मंगलकारी, शिवा! साधतीं सबका हित।
शरण मातृ त्रय शारद गौरी, नारायणी नमन तुमको।३।
शरणागत जो दीन-आर्त जन, उनको कष्ट मुक्त करतीं।
सबकी पीड़ा हर लेती हो, नारायणी नमन तुमको।४।
सब रूपों में, ईश सभी की, शक्ति समन्वित सब तुममें।
देवी! भय न अस्त्र का किंचित्, दुर्गा देवि नमन तुमको।५।
रोग न होते यदि प्रसन्न तुम, रुष्ट अगर तो काम न होते।
जो शरणागत दीन न होता, शरणागत दे शरण अन्य को।६।
करो नष्ट सारी बाधाएँ, हे अखिलेश्वरी! तीन लोक की।
इसी तरह सब कार्य साध दो, करो शत्रुओं का विनाश भी।७।
•••
हिंदी गजल
*
नज़रों से छलकी
प्रीतम की झलकी
गालों पे लाली
मगर हल्की हल्की
खुशबू ने घेरा
चूनर जो ढलकी
मिलन की शिकायत
किसी ने न हल की
हसीं की हँसी हाय
उम्मीद कल की
पिपासा युगों की
है संतुष्टि पल की
बड़ी तीखी ये तल्खी है,
तेरी नज़रों से छलकी है....
भरोसा विरासत है
तकदीर छल की
***
सॉनेट
दूब
*
नहीं माने हार
खूब है यह खूब
कर रही तकरार
सूख ऊगी दूब
गिरे जाते रूख
जड़ न देती साथ
बढ़ी जाती भूख
झुके जाते माथ
भूलकर औकात
आदमी नीलाम
दीख जाती जात
भाग्य हो जब वाम
अश्क सींचो खूब
हो हऋ हँस दूब
९.४.२०२४
***
देवी गीत -
*
अंबे! पधारो मन-मंदिर, १५
हुलस संतानें पुकारें। १४
*
नीले गगनवा से उतरो हे मैया! २१
धरती पे आओ तनक छू लौं पैंया। २१
माँगत हौं अँचरा की छैंया। १६
न मो खों मैया बिसारें। १४
अंबे! पधारो मन-मंदिर, १५
हुलस संतानें पुकारें। १४
*
खेतन मा आओ, खलिहानन बिराजो २१
पनघट मा आओ, अमराई बिराजो २१
पूजन खौं घर में बिराजो १५
दुआरे 'माता!' गुहारें। १४
अंबे! पधारो मन-मंदिर, १५
हुलस संतानें पुकारें। १४
*
साजों में, बाजों में, छंदों में आओ २२
भजनों में, गीतों में मैया! समाओ २१
रूठों नें, दरसन दे जाओ १६
छटा संतानें निहारें। १४
अंबे! पधारो मन-मंदिर, १५
हुलस संतानें पुकारें। १४
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आज के समय में दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय हो गया है। यहाँ दंतेश्वरी मंदिर की अवस्थिति के कारण इसे एक धार्मिक पर्यटन नगर होने का गौरव प्राप्त है। बस्तर में काकतीय/चालुक्य वंश के संस्थापक अन्नमदेव से तो दंतेश्वरी देवी की अनेक कथायें जुड़ी ही हुई हैं साथ ही अंतिम शासक महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव को भी देवी का अनन्य पुजारी माना जाता था। राजाओं के प्राश्रय के कारण दंतेवाड़ा लम्बे समय तक माफी जागीर रहा है। दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वां शक्ति पीठ माना जाता है तथा मां दंतेश्वरी की महिमा को अत्यंत प्राचीन धार्मिक कथा "शिव और सती" से जोड़ कर भी देखा जाता है। यह प्रबल आस्था है कि इसी स्थल पर देवी सती का दंत-खण्ड गिरा था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ग्यारहवी शताब्दी में जब नागवंशी राजाओं ने गंगवंशी राजाओं पर अधिकार कर बारसूर को अपनी राजधानी बनाया; उन्हें पास के ही गाँव तारलापाल (वर्तमान दंतेवाड़ा) में स्थित देवी गुड़ी में अधिष्ठापित देवी की प्रसिद्धि ने आकर्षित किया। नागवंशी राजा जगदेश भूषण धारावर्ष स्वयं देवी के दर्शन करने के लिये तारलापाल उपस्थित हुए तथा बाद में इसी स्थल पर उन्होंने अपनी कुल देवी मणिकेश्वरी की प्रतिमा को स्थापित कर मंदिर बनवाया। चौदहवी शताब्दी में काकतीय राजा अन्नमदेव ने जब नाग राजाओं को पराजित किया उन्होंने भी इस मंदिर में ही अपनी कुल देवी माँ दंतेश्वरी की मूर्ति स्थापित कर दी।
सिंह द्वार से भीतर प्रविष्ठ होते ही मंदिर के समक्ष एक खुला अहाता मौजूद है। माता के मंदिर के सामने ही एक भव्य गरुड़ स्तंभ स्थापित है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे बारसूर से ला कर यहाँ स्थापित कर दिया गया है। मंदिर सादगीपूर्ण है तथा बहुतायत हिस्सा आज भी काष्ठ निर्मित ही है। मंदिर में मुख्य प्रतिमा से अलग अधिकांश मूर्तियाँ नाग राजाओं के समय की हैं। द्वार से घुसते ही जो पहला कमरा है यहाँ दाहिने ओर एक चबूतरा बना है। रियासत काल में राजधानी जगदलपुर से राजा जब भी यहाँ आते तो वहीं बैठ कर पुजारी और प्रजा से बातचीत किया करते थे। मंदिर का दूसरा कक्ष यद्यपि दीवारों की सादगी तथा किसी कलात्मक आकार के लिये नहीं पहचाना जाता किंतु यहाँ प्रवेश करते ही ठीक सामने भैरव बाबा, दोनो ओर द्वारपाल और यत्र-तत्र गणेश, शिव आदि देवों की अनेक पाषाण मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के समक्ष तीसरे कक्ष में अनेक स्तम्भ निर्मित हैं, कुछ शिलालेख रखे हुए हैं, स्थान स्थान पर अनेक भव्य प्रतिमायें हैं साथ ही एक यंत्र भी स्थापित किया गया है।
इस स्थान से आगे किसी को भी पतलून पहन कर जाने की अनुमति नहीं है चूंकि आगे ही गर्भ-गुड़ी निर्मित है, जहाँ माता दंतेश्वरी विराजित हैं। दंतेवाड़ा में स्थापित माँ दंतेश्वरी की षट्भुजी प्रतिमा काले ग्रेनाइट की निर्मित है। दंतेश्वरी माता की इस प्रतिमा की छह भुजाओं में से दाहिनी ओर के हाथों में शंख, खड्ग, त्रिशुल और बाईं ओर के हाँथों में में घंटी, पद्म और राक्षस के बाल हैं। यह प्रतिमा नक्काशीयुक्त है तथा इसके ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरुप बना हुआ है। प्रतिमा को सर्वदा श्रंगारित कर रखा जाता है तथा दंतेश्वरी माता के सिर पर एक चांदी का छत्र भी स्थापित किया गया है। गर्भगृह से बाहर की ओर द्वार पर दो द्वारपाल दाएं-बाएं खड़े हैं जो चतुर्भुजी हैं। द्वारपालों के बायें हाथ में सर्प और दायें हाथ में गदा धारित है।
मंदिर की गर्भगुड़ी से पहले, उसकी बाई ओर विशाल गणेश प्रतिमा स्थापित है जिसके निकट ही एक द्वार बना हुआ है। इस ओर से आगे बढ़ने पर सामने मणिकेश्वरी देवी का मंदिर है। यहाँ अवस्थित प्राचीन प्रतिमा अष्ठभुजी है तथा अलंकृत है। मंदिर के गर्भगृह में नव ग्रहों की प्रतिमायें स्थापित है। साथ ही दीवारों पर नरसिंह, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमायें हैं। मंदिर के पीछे की ओर चल कर माई जी की बगिया से आगे बढ़ते हुए शंखिनी-डंकिनी नदियों के संगम की ओर जाया जा सकता है।
एक मुक्तकी रामायण
राम जन्मे, वन गए, तारी अहल्या, सिय वरी।
स्वर्णमृग-बाली वधा, सुग्रीव की पीड़ा हरी ।।
तार शबरी, मार रावण, सिंधु बाँधा, पूज शिव।
सिय छुड़ा, आ अवध, जन आकांक्षा पूरी करी।।
यह विश्व की सबसे छोटी रामायण है।
'रामायण' = 'राम का अयन' = 'राम का यात्रा पथ', अयन यात्रापथवाची है।
दोहा सलिला
ऊग पके चक्की पिसे, गेहूँ कहे न पीर।
गूँथा-माढ़ा गया पर, आँटा हो न अधीर।।
कनक मुँदरिया से लिपट, कनक सराहे भाग।
कनकांगिनि कर कमल ले, पल में देती त्याग।।
लोई कागज पर रचे, बेलन गति-यति साध।
छंदवृत्त; लय अग्नि में, तप निखरे निर्बाध।।
दरस-परस कर; मत तरस, पाणिग्रहण कर धन्य।
दंत जिह्वा सँग उदर मन, पाते तृप्ति अनन्य।।
ग्रहण करें रुचि-रस सहित, हँस पाएँ रस-खान।
रस-निधि में रस-लीन हों, संजीवित श्रीमान।।
९-४-२०२२
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कोरोना गीत
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कोरोना मैया की जय जय
वर दे माता कर दो निर्भय
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मैया को स्वच्छता सुहाए
देख गंदगी सजा सुनाए
सुबह सूर्य का लो प्रकाश सब
बैठ ईश का ध्यान लगाए
रखो स्वच्छता दस दिश मिलकर
शुद्ध वायुमंडल हो अक्षय
कोरोना मैया की जय जय
वर दे माता कर दो निर्भय
*
खिड़की रोशनदान जरूरी
छोड़ो ए सी की मगरूरी
खस पर्दे फिर से लटकाओ
घड़े-सुराही को मंजूरी
कोल्ड ड्रिंक तज, पन्हा पिलाओ
हो ओजोन परत फिर अक्षय
कोरोना मैया की जय जय
वर दे माता कर दो निर्भय
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व्यर्थ न घर से बाहर घूमो
मत हग करो, न लिपटा चूमो
हो शालीन रहो मर्यादित
हो मदमस्त न पशु सम झूमो
कर प्रणाम आशीष विहँस लो
शुभाशीष दो जग हो मधुमय
कोरोना मैया की जय
वर दे माता कर दो निर्भय
*
रखो संक्रमण दूर सभी मिल
भाप नित्य लो फूलों सम खिल
हल्दी लहसुन अदरक खाओ
तज ठंडा कुनकुना पिओ जल
करो योग व्यायाम स्वतः नित
रहें फेफड़े सबल मिटे भय
कोरोना मैया की जय जय
वर दे माता कर दो निर्भय
९.४.२०२१
***
नवगीत:
करना होगा...
हमको कुछ तो
करना होगा...
*
देखे दोष,
दिखाए भी हैं.
लांछन लगे,
लगाये भी है.
गिरे-उठे
भरमाये भी हैं.
खुद से खुद
शरमाये भी हैं..
परिवर्तन-पथ
वरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
*
दीपक तले
पले अँधियारा.
किन्तु न तम की
हो पौ बारा.
डूब-डूबकर
उगता सूरज.
मिट-मिट फिर
होता उजियारा.
जीना है तो
मरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
एक दोहा
उषा संग छिप झाँकता, भास्कर रवि दिन-नाथ.
गाल लाल हैं लाज से, झुका न कोई माथ.
***
भोजपुरी दोहा:
खेत हुई रहा खेत क्यों, 'सलिल' सून खलिहान.
सुन सिसकी चौपाल के, पनघट के पहचान.
९.४.२०१७
***
कृति चर्चा :
२१ श्रेष्ठ बुंदेली लोक कथाएँ मध्यप्रदेश : लोक में नैतिकता अब भी हैं शेष
समीक्षक ; प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा, सेवानिवृत्त प्राध्यापक,
*
कृति विवरण : २१ श्रेष्ठ बुंदेली लोक कथाएँ मध्य प्रदेश, संपादक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०२२, आकार २१.५ से.मी.x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी लेमिनेटेड पेपरबैक, पृष्ठ संख्या ७०, मूल्य १५०/-, प्रकाशक डायमंड पॉकेट बुक्स नई दिल्ली।
*
लोक कथाएँ ग्राम्यांचलों में पीढ़ी दर पीढ़ी कही-सुनी जाती रहीं ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें लोक जीवन, लोक मूल्यों और लोक संस्कृति की झलक अंतर्निहित होती है। ये कहानियाँ श्रुतियों की तरह मौखिक रूप से कही जाते समय हर बार अपना रूप बदल लेती हैं। कहानी कहते समय हर वक्ता अपने लिए सहज शब्द व स्वाभाविक भाषा शैली का प्रयोग करता है। इस कारण इनका कोई एक स्थिर रूप नहीं होता। इस पुस्तक में हिंदी के वरिष्ठ साहित्य साधक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने देश के केंद्र में स्थित प्रांत मध्य प्रदेश की एक प्रमुख लोकभाषा बुंदेली में कही-सुनी जाती २१ लोक कथाएँ प्रस्तुत की हैं। पुस्तकारंभ में प्रकाशक नरेंद्र कुमार वर्मा द्वारा भारत की स्वतंत्रता के ७५ वे वर्ष में देश के सभी २८ राज्यों और ९ केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित नारी मन, बाल मन, युवा मन और लोक मन की कहानियों के संग्रह प्रकाशित करने की योजना की जानकारी दी है।
पुरोवाक के अन्तर्गत सलिल जी ने पाठकों की जानकारी के लिये लोक कथा के उद्गम, प्रकार, बुंदेली भाषा के उद्भव तथा प्रसार क्षेत्र की लोकोपयोगी जानकारी दी है। लोक कथाओं को चिरजीवी बनाने के लिए सार्थक सुझावों ने संग्रह को समृद्ध किया है। लोक कथा ''जैसी करनी वैसी भरनी'' में कर्म और कर्म फल की व्याख्या है। लोक में जो 'बोओगे वो काटोगे' जैसे लोकोक्तियाँ चिरकाल से प्रचलित रही हैं। 'भोग नहीं भाव' में राजा सौदास तथा चित्रगुप्त जी की प्रसिद्ध कथा वर्णित है जिसका मूल पदम् पुराण में है। यहाँ कर्म में अन्तर्निहित भावना का महत्व प्रतिपादित किया गया है। लोक कथा 'अतिथि देव' में गणेश जन्म की कथा वर्णित है. साथ ही एक उपकथा भी है जिसमें अतिथि सत्कार का महत्व बताया गया है। 'अतिथि देवो भव' लोक व्यवहार में प्रचलित है ही। सच्चे योगी की पहचान संबंधी उत्सुकता को शांत करने के लिए एक राज द्वारा किए गए प्रयास और मिली सीख पर केंद्रित है लोक कथा 'कौन श्रेष्ठ'। 'दूधो नहाओ, पूतो फलो' का आशीर्वाद नव वधुओं के घर के बड़े देते रहे हैं। छठ मैया का पूजन बुंदेलखंड में बहुत लोक मान्यता रखता है। यह लोक कथा छठ मैया पर ही केंद्रित है।
लोक कथा 'जंगल में मंगल' में श्रम की प्रतिष्ठा और राज्य भक्ति (देश भक्ति) के साथ-साथ वृक्षों की रक्षा का संदेश समाहित है। राजा हिमालय की राजकुमारी पार्वती द्वारा वनवासी तपस्वी शिव से विवाह करने के संकल्प और तप पर केंद्रित है लोक कथा 'सच्ची लगन'। यह लोक कथा हरतालिका लोक पर्व से जुडी हुई है। मंगला गौरी व्रत कथा में प्रत्युन्नमतित्व तथा प्रयास का महत्व अंतर्निहित है। यह संदेश 'कोशिश से दुःख दूर' शीर्षक लोक कथा से मिलता है। आम जनों को अपने अभावों का सामना कर, अपने उज्जवल भविष्य के लिए मिल-जुलकर प्रयास करने होते हैं। यह प्रेरक संदेश लिए है लोककथा 'संतोषी हरदम सुखी'। 'पजन के लड्डू' शीर्षक लघुकथा में सौतिया डाह तथा सच की जीत वर्णित है। किसी को परखे बिना उस पर शंका या विश्वास न करने की सीख लोक कथा 'सयाने की सीख' में निहित है।
भगवान अपने सच्चे भक्त की चिंता स्वयं ही करते हैं, दुनिया को दिखने के लिए की जाती पिजा से प्रसन्न नाहने होते। इस सनातन लोक मान्यता को प्रतिपादित करती है लोक कथा 'भगत के बस में हैं भगवान'। लोक मान्यता है की पुण्य सलिला नर्मदा शिव पुत्री हैं। 'सुहाग रस' नामित लोक कथा में भक्ति-भाव का महत्व बताते हुए इस लोक मान्यता के साथ लोक पर्व गणगौर का महत्व है। मध्य प्रदेश के मालवांचल के प्रतापी नरेश विक्रमादित्य से जुडी कहानी है 'मान न जाए' जबकि 'यहाँ न कोई किसी का' कहानी मालवा के ही अन्य प्रतापी नरेश राजा भोज से संबंधित है। महाभारत के अन्य पर्व में वर्णित किन्तु लोक में बहु प्रचलित सावित्री-सत्यवान प्रसंग को लेकर लिखी गयी है 'काह न अबला करि सकै'। मनुष्य को किसी की हानि नहीं करनी चाहिए और समय पर छोटे से छोटा प्राणी भी काम आ सकता है। यह कथ्य है 'कर भला होगा भला' लोक कथा का। गोंडवाना के पराक्रमी गोंड राजा संग्रामशाह द्वारा षडयंत्रकारी पाखंडी साधु को दंडित करने पर केंद्रित है लोक कथा 'जैसी करनी वैसी भरनी'। 'जो बोया सो काटो' …
९-४-२०२२
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एक गीत -
अभिन्न
*
हो अभिन्न तुम
निकट रहो
या दूर
*
धरा-गगन में नहीं निकटता
शिखर-पवन में नहीं मित्रता
मेघ-दामिनी संग न रहते-
सूर्य-चन्द्र में नहीं विलयता
अविच्छिन्न हम
किन्तु नहीं
हैं सूर
*
देना-पाना बेहिसाब है
आत्म-प्राण-मन बेनक़ाब है
तन का द्वैत, अद्वैत हो गया
काया-छाया सत्य-ख्वाब है
नयन न हों नम
मिले नूर
या धूर
*
विरह पराया, मिलन सगा है
अपना नाता नेह पगा है
अंतर साथ श्वास के सोया
अंतर होकर आस जगा है.
हो न अधिक-कम
नेह पले
भरपूर
९.४.२०१६
***
मुक्तिका
*
मेहनत अधरों की मुस्कान
मेहनत ही मेरा सम्मान
बहा पसीना, महल बना
पाया आप न एक मकान
वो जुमलेबाजी करते
जिनको कुर्सी बनी मचान
कंगन-करधन मिले नहीं
कमा बनाए सच लो जान
भारत माता की बेटी
यही सही मेरी पहचान
दल झंडे पंडे डंडे
मुझ बिन हैं बेदम-बेजान
उबटन से गणपति गढ़ दूँ
अगर पार्वती मैं लूँ ठान
सृजन 'सलिल' का है सार्थक
मेहनतकश का कर गुणगान
२०-४-२१
***
नवगीत:
बाँस
.
बाँस रोपने
बढ़ा कदम
.
अब तक किसने-कितने काटे
ढो ले गये,
नहीं कुछ बाँटें.
चोर-चोर मौसेरे भाई
करें दिखावा
मुस्का डांटें.
बँसवारी में फैला स्यापा
कौन नहीं
जिसका मन काँपा?
कब आएगी
किसकी बारी?
आहुति बने,
लगे अग्यारी.
उषा-सूर्य की
आँखें लाल.
रो-रो
क्षितिज-दिशा बेहाल.
समय न बदले
बेढब चाल.
ठोंक रहा है
स्वारथ ताल.
ताल-तलैये
सूखे हाय
भूखी-प्यासी
मरती गाय.
आँख न होती
फिर भी नम
बाँस रोपने
बढ़ा कदम
.
करे महकमा नित नीलामी
बँसवट
लावारिस-बेनामी.
अंधा पीसे कुत्ते खायें
मोहन भोग
नहीं गह पायें.
वनवासी के रहे नहीं वन
श्रम कर भी
किसान क्यों निर्धन?
किसकी कब
जमीन छिन जाए?
विधना भी यह
बता न पाए.
बाँस फूलता
बिना अकाल.
लूटें अफसर-सेठ कमाल.
राज प्रजा का
लुटते लोग.
कोंपल-कली
मानती सोग.
मौन न रह
अब तो सच बोल
उठा नगाड़ा
पीटो ढोल.
जब तक दम
मत हो बेदम
बाँस रोपने
बढ़ा कदम
९.४.२०१५
***
दोहा मुक्तिका
*
झुरमुट से छिप झाँकता, भास्कर रवि दिननाथ।
गाल लाल हैं लाज से, दमका ऊषा-माथ।।
*
कागा मुआ मुँडेर पर, बैठ न करता शोर।
मन ही मन कुछ मानता, मना रहे हैं हाथ।।
*
आँख टिकी है द्वार पर, मन उन्मन है आज।
पायल को चुप हेरती, चूड़ी कंडा पाथ।।
*
गुपचुप आ झट बाँह में, भरे बाँह को बाँह।
कहे न चाहे 'छोड़ दो', देख न ले माँ साथ।।
*
कुकड़ूँ कूँ ननदी करे, देवर देता बाँग।
बीरबहूटी छुइमुई, छोड़ न छोड़े हाथ।।
***
भोजपुरी दोहा:
*
खेत खेत रउआ भयल, 'सलिल' सून खलिहान।
सुन सिसकी चौपाल के, पनघट भी सुनसान।।
*
खनकल-ठनकल बाँह-पग, दुबुकल फउकल देह।
भूख भूख से कहत बा, कित रोटी कित नेह।।
*
बालारुण के सकारे, दीले अरघ जहान।
दुपहर में सर ढाँकि ले, संझा कहे बिहान।।
*
काट दइल बिरवा-बिरछ, बाढ़ल बंजर-धूर।
आँखन ऐनक धर लिहिल, मानुस आँधर-सूर।।
*
सुग्गा कोइल लुकाइल, अमराई बा सून।
शूकर-कूकुर जस लड़ल, है खून सँग खून
***
दोहा मुक्तिका
*
सत्य सनातन नर्मदा, बाँच सके तो बाँच.
मिथ्या सब मिट जाएगा, शेष रहेगा साँच..
*
कथनी-करनी में कभी, रखना तनिक न भेद.
जो बोया मिलता वही, ले कर्मों को जाँच..
*
साँसें अपनी मोम हैं, आसें तपती आग.
सच फौलादी कर्म ही सह पाता है आँच..
*
उसकी लाठी में नहीं, होती है आवाज़.
देख न पाते चटकता, कैसे जीवन-काँच..
*
जो त्यागे पाता 'सलिल', बनता मोह विछोह.
एक्य द्रोह को जय करे, कहते पांडव पाँच..
***
द्विपदियाँ
*
परवाने जां निसार कर देंगे.
हम चराग-ए-रौशनी तो बन जाएँ..
*
तितलियों की चाह में भटको न तुम.
फूल बन महको चली आएँगी ये..
*
जब तलक जिन्दा था रोटी न मुहैया थी.
मर गया तो तेरहीं में दावतें हुईं..
*
बाप की दो बात सह नहीं पाते
अफसरों की लात भी परसाद है..
*
पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों.
मैं ढूँढ-ढूँढ हारा, घर एक नहीं मिलता..
*
९-४-२०१०