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बुधवार, 28 जनवरी 2026

जनवरी २८, सोरठा, नर्मदाष्टक, राम, छंद, हास्य, सड़क पर, लघुकथा, बुन्देली, दोहा, मधुभार, नवगीत, लेख, समीक्षा

सलिल सृजन जनवरी २८
सोरठा सलिला

नयन नयन मिल दोस्त, दुश्मन भी होते नयन।
नयन नयन में डूब, पाते-देते सुख नयन।।
.
नयन दोस्त को देख, बाँह पसारे मिल रहे।
नयन मित्रता लेख, बेमौसम भी खिल रहे।।
.
पत्र दोस्त के नाम, नयन अभेजे भेजते।
कब सोचें परिणाम, सिर्फ स्नेह ही देखते।।
२८.१.२०२६
०००
नर्मदाष्टक ॥मणिप्रवाल मूलपाठ॥
॥नर्मदाष्टक मणिप्रवाल॥
हिंदी काव्यानुवाद - संजीव वर्मा "सलिल"॥
*
देवासुरा सुपावनी नमामि सिद्धिदायिनी,
त्रिपूरदैत्यभेदिनी विशाल तीर्थमेदिनी ।
शिवासनी शिवाकला किलोललोल चापला,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।१।।
.
सुर असुरों को पावन करतीं सिद्धिदायिनी,
त्रिपुर दैत्य को भेद विहँसतीं तीर्थमेदिनी।
शिवासनी शिवकला किलोलित चपल चंचला
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥१॥
*
विशाल पद्मलोचनी समस्त दोषमोचनी,
गजेंद्रचालगामिनी विदीप्त तेजदामिनी ।।
कृपाकरी सुखाकरी अपार पारसुंदरी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।२।।
.
नवल कमल से नयन, पाप हर हर लेतीं तुम,
गज सी चाल, दीप्ति विद्युत सी, हरती भय तम।
रूप अनूप, अनिन्द्य, सुखद, नित कृपा करें माँ
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥२॥
*
तपोनिधी तपस्विनी स्वयोगयुक्तमाचरी,
तपःकला तपोबला तपस्विनी शुभामला ।
सुरासनी सुखासनी कुताप पापमोचनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।३।।
.
सतत साधनारत तपस्विनी तपोनिधी तुम,
योगलीन तपकला शक्तियुत शुभ हर विधि तुम।
पाप ताप हर, सुख देते तट, बसें सर्वदा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥३॥
*
कलौमलापहारिणी नमामि ब्रम्हचारिणी,
सुरेंद्र शेषजीवनी अनादि सिद्धिधकरिणी ।
सुहासिनी असंगिनी जरायुमृत्युभंजिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।४।।
.
ब्रम्हचारिणी! कलियुग का मल ताप मिटातीं,
सिद्धिधारिणी! जग की सुख संपदा बढ़ातीं ।
मनहर हँसी काल का भय हर, आयु दे बढ़ा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥४॥
*
मुनींद्र वृंद सेवितं स्वरूपवन्हि सन्निभं,
न तेज दाहकारकं समस्त तापहारकं ।
अनंत पुण्य पावनी, सदैव शंभु भावनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।५।।
.
अग्निरूप हे! सेवा करते ऋषि, मुनि, सज्जन,
तेज जलाता नहीं, ताप हर लेता मज्जन ।
शिव को अतिशय प्रिय हो पुण्यदायिनी मैया,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥५॥
*
षडंगयोग खेचरी विभूति चंद्रशेखरी,
निजात्म बोध रूपिणी, फणीन्द्रहारभूषिणी ।
जटाकिरीटमंडनी समस्त पाप खंडनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।६।।
.
षडंग योग, खेचर विभूति, शशि शेखर शोभित,
आत्मबोध, नागेंद्रमाल युत मातु विभूषित ।
जटामुकुट मण्डित देतीं तुम पाप सब मिटा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥६॥
*
भवाब्धि कर्णधारके!, भजामि मातु तारिके!
सुखड्गभेदछेदके! दिगंतरालभेदके!
कनिष्टबुद्धिछेदिनी विशाल बुद्धिवर्धिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।७।।
.
कर्णधार! दो तार, भजें हम माता तुमको,
दिग्दिगंत को भेद, अमित सुख दे दो हमको ।
बुद्धि संकुचित मिटा, विशाल बुद्धि दे दो माँ!,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥७॥
*
समष्टि अण्ड खण्डनी पताल सप्त भैदिनी,
चतुर्दिशा सुवासिनी, पवित्र पुण्यदायिनी ।
धरा मरा स्वधारिणी समस्त लोकतारिणी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।८।।
.
भेदे हैं पाताल सात सब अण्ड खण्ड कर,
पुण्यदायिनी! चतुर्दिशा में ही सुगंधकर ।
सर्वलोक दो तार करो धारण वसुंधरा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥८॥
*
॥साभारःनर्मदा कल्पवल्ली, ॐकारानंद गिरि॥
***
राम सोरठावली
*
राम अनादि-अनंत, राम आत्म; परमात्म भी।
राम सृष्टि के कंत, चित्र गुप्त है राम का।।
राम अनाहद नाद, विधि-हरि-हर भी राम हैं।
राम भाव रस स्वाद, शब्दाक्षर लय-ताल हैं।।
मन होता है शांत, राम नाम गुणगान से।
माया करे न भ्रांत, राम-दास हो जा 'सलिल'।।
सबके मालिक-दास, राम आम के; खास के।
करते सतत प्रयास, राम कर्म के साथ हैं।।
कर दें भाव से पार, वाम न हों सिय-राम जू।
तुझको सुयश अपार, केवट के सँग मिलेगा।।
राम न रहते मौन, राम न सहते गलत को।
नहीं जानता कौन?, राम न कहते निज सुयश
राम न करते बैर, राम न बाधा मानते।
सबकी चाहें खैर, करते हैं सत्कर्म वे।।
वह जन परम सुजान, लक्ष्य रखे जो एक ही।
साध तीर संधान, लख न लक्ष; मन चुप रखे।।
.
लछ्मन लखन विशेष, रामानुज श्री लक्ष्मण।
शेष न रखते शेष, राम-काज सौमित्र कुछ।।
.
अँजुरी रखें अँजोर, सिया-सिंधु की उर्मि ला।
मनहर उज्ज्वल भोर, लछ्मन-मन नभ, उर्मिला।।
.
इसमें उसका वास, देह उर्मिला लखन मन।
कहिए पुष्प-सुवास, श्वास-आस सम मिल मगन।।
.
आज बने गणतंत्र हम, जनता हुई प्रसन्न।
भेद-भाव सब दूर हो, जन-जन हो संपन्न।
***
छंद सलिला १
*सात मात्रिक लौकिक जातीय छंद*
प्रकार २१
*१ शुभगति / सुगती छंद*
विधान पदांत गुरु
सप्त ऋषि हो
शांति-सुख बो
तप करो रे!
दुख हरो रे!
*
*आठ मात्रिक वासव जातीय छंद*
प्रकार ३४
*२ मधुभार / छवि छंद*
विधान पदांत जगण
अठ वसु! न हार
निज छवि निहार
हम कर सुधार
भू लें सँवार
*
*नौ मात्रिक आंक जातीय छंद*
प्रकार ५५
*३ गंग छंद*
विधान - पदांत यगण
जय गंग माता
जय जीव त्राता
सुधि लो हमारी
माँ क्यों बिसारी?
*
*४ निधि छंद*
विधान - पदांत लघु
मत जोड़ नौ निधि
श्रम साध्य हर सिधि
लघु ही नहीं लघु
गुरु ही नहीं गुरु
*
*दस मात्रिक दैशिक जातीय छंद*
प्रकार ८९
*५ दीप छंद*
विधान - पदांत नगल
जलाकर दस दीप
हरे तिमिर महीप
सूर्य सम वर तेज
रखे धूप सहेज
*
*ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद*
प्रकार १४४
*६ अहीर छंद*
विधान - पदांत जगण
एकादशी अहीर
जगण अंत धर धीर
गौ पालें यदि आप
मिटे शोक दुख शाप
*
*७ शिव / अभीर छंद*
विधान- पदांत सरन
ग्यारह दीपक जला
ज्योतित सब जग बना
रखें शुद्ध भावना
फले मनोकामना
गहें रुद्र की शरण
करें भक्ति का वरण
*
*८ भव छंद*
विधान - पदांत ग या य
ग्यारस का व्रत करें
शिवाशीष नित वरें
भव बंधन न मोहे
गय पदांती सोहे
*
*बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद*
प्रकार - २३३
*९ तोमर छंद*
विधान - पदांत गल
बारह आदित्य श्रेष्ठ
तिमिर हरें सदा ज्येष्ठ
तोमर गुरु लघु पदांत
परहित-पथ वरें कांत
*
*१० ताण्डव छंद*
विधान - पदादि ल, पदांत ल
महादेव ताण्डव कर
अभयदान देते हर
डमरू डिमडिम डमडम
बम भोले शंकर बम
*
*११ लीला छंद*
विधान - पदांत जगण
सलिल ज्योति लिंग नाथ
पद पखार जोड़ हाथ
शक्ति पीठ कीर्ति गान
लीला का कर बखान
*
*१२ नित छंद*
विधान - पदांत रनस
कथ्य लय रस संग हों
भाव ध्वनि सत्संग हों
छंदों में रहो मगन
नये बनें करो जतन
नीति नयी नित न वरो
धैर्य सदा सलिल धरो
*
*तेरह मात्रिक भागवतजातीय छंद*
प्रकार - ३७७
*१३ उल्लाला / चंद्रमणि छंद*
विधान - ग्यारहवीं मात्रा लघु, पदांत नियम नहीं
उल्लाला तेरह कला
ग्यारहवाँ लघु ही भला
मिले चंद्र मणि लें तुरत
गुमे नहीं करिए जुगत
*
*१४ चण्डिका / धरणी छंद*
विधान - पदांत रगण
चण्डिका से दुष्ट डरें
धरणी पर छिपें विचरें
गुरु लघु गुरु रखें पदांत
यत्न मग्न रहें सुशांत
२८.१.२०२०
***
हास्य रचना
*
लल्ला-लल्ली रोए मचले हमें घूमना मेला
लालू-लाली ने यह झंझट बहुत देर तक झेला
डाँटा-डपटा बस न चला तो दोनों करें विचार
होटल या बाजार गए तो चपत लगेगी भारी
खाली जेब मुसीबत होगी मँहगी चीजें सारी
खर्चा कम, मन बहले ज्यादा, ऐसा करो उपाय
चलो नर्मदा तीर नहाएँ-घूमें, है सदुपाय
शिव पूजें पाएँ प्रसाद सूर्योदय देखें सुंदर
बच्चों का मन बहलेगा जब दिख जाएँगे बंदर
स्कूटर पर चारों बैठे मानो हो वह कार
ग्वारीघाट पहुँचकर ऊषा करे सिंगार
नभ पर बैठी माथे पर सूरज का बेंदा चमके
बिंब मनोहर बना नदी में, हीरे जैसा दमके
चहल-पहल थी खूब घाट पर घूम रहे नारी-नर
नहा रहे जो वे गुंजाएँ बम भोले नर्मद हर
पंडे करा रहे थे पूजा, माँग दक्षिणा भारी
पाप-पुण्य का भय दिखलाकर
चला चढ़ोत्री आरी
जाने क्या-क्या मंत्र पढ़ें फिर मस्तक मलते चंदन
नरियल चना चिरौंजीदाने पंडित देता गिन गिन
घूम थके भूखे हो बच्चे पैर पटककर बोले
अब तो चला नहीं जाता, कैसे बोलें बम भोले
लालू लाया सेव जलेबी सबने भोग लगाया
नौकायन कर मौज मनाई नर्मदाष्टक गाया
२७-१-२०२०
***
पुस्तक चर्चा-
'सड़क पर'- आशा और कर्मठता का संदेश
अमरेंद्र नारायण
भूतपूर्व महासचिव
एशिया पैसिफिक कम्युनिटी बैंकाक
*
[कृति विवरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा सलिल, प्रथम संस्करण २०१८, आकार १३.५ से.मी. x २१.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन,
जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८ ]
*
'सड़क पर' अपने परिवेश के प्रति सजग-सतर्क प्रसिद्ध कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी रचित सहज संवेदना की अभिव्यक्ति है। सलिल जी भावुक, संवेदनशील कवि तो हैं हीं, एक अभियंता होने के नाते वे व्यावहारिक दृष्टि भी रखते हैं।
सलिल जी ने पुस्तक के आरंभ में माता-पिता को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए लिखा है:
दीपक-बाती,
श्वास-आस तुम
पैर-कदम सम,
थिर प्रयास तुम
तुमसे हारी सब बाधाएँ
श्रम-सीकर,
मन का हुलास तुम
गयी देह, हैं
यादें प्यारी।
श्रद्धा, कृतज्ञता और कर्मठता की यही भावनाएँ विभिन्न कविताओं में लक्षित होती हैं। साथ-ही-साथ इन रचनाओं में आशावादिता है और कर्मठता का आह्वान भी-
आज नया इतिहास लिखें हम
अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस-घट होगा रीता
अब न साध्य हो स्वार्थ-सुभीता
अब न कभी लांछित हो सीता
भोग-विलास न लक्ष्य रहे अब
हया-लाज-परिहास लिखें हम
आज नया इतिहास लिखें हम।
पुस्तक में सड़क पर शीर्षक से ही ९ कवितायेँ संकलित है जो जीवन के विभिन्न रंगों को चित्रित करती हैं।
सड़क प्रगति और यात्रा का माध्यम तो है, पर सड़क पर तेज गति से चलने वाली गाड़ियाँ, पैदल चलने वालों को किनारे धकेल देती हैं और अपनी सहगामिनी गाड़ियों की प्रतिस्पर्धा में यातायात अवरुद्ध भी कर देती हैं।
प्रगति -वाहिनी सड़क विषमता का पोषण करती रही है। कवि का अंतर्मन इस कुव्यवस्था के विरोध में कह उठता है:
रही सड़क पर
अब तक चुप्पी
पर अब सच कहना ही होगा।
लेकिन कवि के अंतर में आशा का दीपक प्रज्वलित है:
कशिश कोशिशों की
सड़क पर मिलेगी
कली मिह्नतों की
सड़क पर खिलेगी
पर कवि कहता है कि आखिरकार, सड़क तो सबकी है-
सड़क पर शर्म है,
सड़क बेशरम है
सड़क छिप सिसकती
सड़क पर क्षरण है!
इन कविताओं में प्रेरणा का संदेश है और आत्म-परीक्षण का आग्रह भी।
यही आत्म-परीक्षण तो हमें अध्यात्म के आलोक-पथ की ओर ले जाता है-
आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए।
खुद से खुद की भेंट हुई तो
जग-जीवन के नूर हो गए।
'सड़क पर' की कवितायेँ पाठक को आनंद तो देती ही हैं,उसे कुछ सोचने के साथ-साथ कुछ करने की भी प्रेरणा देती हैं। इस संकलन की कविताएँ पाठक की भाव -भूमि पर गहरा प्रभाव डालती हैं। सलिल जी की इस आशावादिता को नमन।
---
दोहा सलिला
प्रजातंत्र में प्रजा का, सेवक होता तंत्र।
जनसेवी नेता बनें, यही सफलता-मंत्र।।
*
लोकतंत्र में लोकमत, होता है अनमोल।
हानि न करिए देश की, कलम उठाएँ तोल।।
*
तंत्र न जन की पीर हर, खुद भोगे अधिकार।
तो जनतंत्र न सफल है, शासन करे विचार।।
*
ध्वजा तिरंगी देश की, आन, बान, सम्मान।
झुकने कभी न दे 'सलिल', विहंस लुटा दें जान।।
*
संविधान को जानकर, पालन करिए नित्य।
अधिकारों की नींव हैं, फ़र्ज़ मानिए सत्य।।
*
जाति-धर्म को भुलाकर भारतीय हैं एक।
भाईचारा पालकर, चलो बनें हम नेक।।
***
नवगीत
*
बदल गए रे
दिन घूरे के
कैक्टस
दरवाज़े पर शोभित
तुलसी चौरा
घर से बाहर
पिज्जा
गटक रहे कान्हा जू
माखन से
दूरी जग जाहिर
गौरैया
कौए न बैठते
दुर्दिन पनघट-
कंगूरे के
मत पाने
चाहे जो बोलो
मत पाकर
निज पत्ते खोलो
सरकारी
संपत्ति बेच दो
जनगण-मन में
नफरत घोलो
लड़ा-भिड़ा
खेती बिकवा दो
तार तोड़ दो
तंबूरे के
२६.१.२०१८
***
विमर्श हिंदी- समस्या और समाधान-
१. भारत में बोली जा रही सब भाषाओँ - बोलियों को संविधान की ८ वीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाए ताकि इस मुद्दे पर राजनीति समाप्त हो.
२. सब भाषाओँ को नागरी लिपि में भी लिखा जाए जैसा गाँधी जी चाहते थे।
३. हिंदी को अनुसूची से निकाल दिया जाए।
४. सब हिंदी अकादमी बन्द की जाएँ ताकि नेता - अफसर हिंदी के नाम पर मौज न कर सकें।
५. भारत की जन भाषा और प्रमुख विश्ववाणी हिंदी को सरकार किसी प्रकार का संरक्षण न दे, कोई सम्मेलन न करे, कोई विश्व विद्यालय न बनाये, किसी प्रकार की मदद न करे ताकि जनगण इसके विकास में अपनी भूमिका निभा सके।
हिंदी के सब समस्याएँ राजनेताओं और अफसरों के कारण हैं। ये दोनों वर्ग हिंदी का पीछा छोड़ दें तो हिंदी जी ही जायेगी अमर हो जाएगी।
२८-१-२०१७
***
लघुकथा
लक्ष्यवेध
*
'वत्स! धनुष पर तीर चढ़ाओ और लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करो.' गुरु ने आदेश दिया।
सभी शिष्यों ने आदेश का पालन किया।
'अब बताओ तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है देश सेवा, जन कल्याण, राष्ट्र निर्माण, गरीबी उन्मूलन या सांप्रदायिक एकता? जिस पर ध्यान केंद्रित करोगे वही लक्ष्य पा सकोगे. गुरु ने प्रश्न किया. ठीक से सोचकर बताओ।
'सत्ता गुरूजी!' सभी शिष्यों ने अविलम्ब उत्तर दिया।
२८-१-२०१७
***
पुस्तक सलिला-
चलो आज मिलकर नया कल बनायें - कुछ कर गुजरने की कवितायें
*
[कृति विवरण- चलो आज मिलकर नया कल बनायें, काव्य संग्रह, कुसुम वीर, आकार डिमाई, आवरण- बहुरंगी, सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १३४, मुल्य २००/-, प्रकाशक ज्ञान गंगा २०५ बी, चावडी बाज़ार दिल्ली ११०००६]
*
सच्चा साहित्य सर्व कल्याण के सात्विक सनातन भाव से आपूरित होता है. कविता 'स्व' को 'सर्व' से संयुक्त कर कवि को कविर्मनीषी बनाती है. कोमलता और शौर्य का, अतीत और भविष्य का, कल्पना और यथार्थ का, विचार और अनुभूति का समन्वय होने पर कविता उपजती है. कुसुम वीर जी की रचनाएँ मांगल्य परक चिंतन से उपजी हैं. वे लिखने के लिये नहीं लिखतीं अपितु कुछ करने की चाह को अभिव्यक्त करने के लिए कागज़-कलम को माध्यम बनाती हैं. प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी, तथा हिंदी प्रशक्षण संस्थान में निदेशक पदों पर अपने कार्यानुभवों को ४ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में पाठकों के साथ बाँट चुकने के पश्चात् इस कृति में कुसुम जी देश और समाज के वर्तमान से भविष्य गढ़ने के अपने सपने शब्दों के माध्यम से साकार कर सकी हैं.
साठ सारगर्भित, सुचिंतित, लक्ष्यवाही रचनाओं का यह संग्रह भाव, रस, बिम्ब, प्रतीक और शैली से पाठक को बाँधे रखता है.
हर नदी के पार होता है किनारा / हर अन्धेरी रात के आगे उजाला
मन की दुर्बलता मिटाकर तुम चलो / एक दीपक प्रज्वलित कर तुम चलो
बेहाल बच्चे, बदहवासी, कन्या नहीं अभिशाप हूँ, मैं एक बेटी, मत बाँटों इंसान को जैसी रचनाएँ वर्तमान विषमताओं और विडम्बनाओं से उपजी हैं. कवयित्री इन समस्याओं से निराश नहीं है, वह परिवर्तन का आवाहन आत्मबोध, प्रवाह, मंथन करता यह मन मेरा, जीवन ऐसे व्यर्थ नहो, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए जैसी रचनाओं के माध्यम से करती है.
दिये के नीचे भले ही अँधेरा हो, ऊपर उजाला ही होता है. यह उजास की प्यास ही घोर तिमिर से भी सवेरा उगाती है. धूप धरा से मिलाने आयी, मधुर मिलन, वात्सल्य, पावस, तेरे आने की आहट से, प्राण ही शब्दित हुए, मन के झरोखे से अदि रचनाएँ जीवन में माधुर्य, आशा और उल्लास के स्वरों की अभिव्यंजना करती हैं.
कौन कहता है जगत में / प्रीति की भाषा नहीं है
मौन के अंत: सुरों से / प्राण ही शब्दित हुए हैं
शब्द शक्ति की जय-जयकार करती ऐसी पंक्तियाँ पाठक के मन-प्राण को स्पंदित कर देती हैं.
कुसुम जी की रचनाएँ अपने कथ्य की माँग के अनुसार छंद का प्रयोग करने या न करने का विकल्प चुनती हैं. दोनों हो प्रारूपों में उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल और स्पष्ट है-
उषा को साथ ले/ अरुण-रथ पर सवार होकर
कल फिर लौटेगा सूरज / रत की पोटली में
सपनों को समेटे / पृथ्वी के प्रांगण पर
स्वर्णिम रश्मियों का उपहार बाँटने
किसी अकिञ्चन की चाह में
प्रसाद गुण संपन्न सरस-सहज बोधगम्य भाषा कुसुम जी की शक्ति है. वे मन से मन तक पहुँचने को कविता का गुण बना सकी हैं. डॉ. दिनेश श्रीवास्तव तथा इंद्रनाथ चौधुरी लिखित मंतव्यों ने संग्रह की गरिमा-वृद्धि की है. कुसुम जी का यह संग्रह उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने की प्यास जगाता है.
***
बुंदेली दोहांजलि
*
जब लौं बऊ-दद्दा जिए, भगत रए सुत दूर
अब काए खों कलपते?, काए हते तब सूर?
*
खूबई तौ खिसियात ते, दाबे कबऊं न गोड़
टँसुआ रोक न पा रए, गए डुकर जग छोड़
*
बने बिजूका मूँड़ पर, झेलें बरखा-घाम
छाँह छीन काए लई, काए बिधाता बाम
*
ए जी!, ओ जी!, पिता जी, सुन खें कान पिराय
'बेटा' सुनबे खों जिया, हुड़क-हुड़क अकुलाय
*
का भौ काय नटेर रय, दीदे मो खौं देख?
कई-सुनी बिसरा- लगा, गले मिटा खें रेख.
*
बऊ-दद्दा खिसिया रए, कौनौ धरें न कान
मौडीं-मौड़ां बाँट रये, अब बूढ़न खें ज्ञान.
२८.१.२०१६
***
मुक्तिका:
.
घर जलाते हैं दिए ही आजकल
बहकते पग बिन पिये ही आजकल
बात दिल की दिल को कैसे हो पता?
लब सिले हैं बिन सिले ही आजकल
गुनाहों की रहगुजर चाही न थी
हुए मुजरिम जुर्म बिन ही आजकल
लाजवंती है न देखो घूरकर
घूमती है बिन वसन ही आजकल
बेबसी-मासूमियत को छीनकर
जिंदगी जी बिन जिए ही आजकल
आपदाओं को लगाओ मत गले
लो न मुश्किल बिन लिये ही आजकल
सात फेरे जिंदगी भर आँसते
कहा बिन अनुभव किये ही आजकल
...
***
नवगीत:
भाग्य कुंडली
.
भाग्य कुंडली
बाँच रहे हो
कर्म-कुंडली को ठुकराकर
.
पंडित जी शनि साढ़े साती
और अढ़ैया ही मत देखो
श्रम भाग्येश कहाँ बैठा है?
कोशिश-दृष्टि कहाँ है लेखो?
संयम का गुरु
बता रहा है
.
डरो न मंगल से अकुलाकर
बुध से बुद्धि मिली है हर को
सूर्य-चन्द्र सम चमको नभ में
शुक्र चमकता कभी न डूबे
ध्रुवतारा हों हम उत्तर के
राहू-केतु को
धता बतायें
चुप बैठे हैं क्यों संकुचाकर?
...
छंद सलिला:
मधुभार छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
मधुभार अष्टमात्रिक छंद है. इसमें ३ -५ मात्राओं पर यति और चरणान्त में जगण होता है.
उदाहरण:
१. सहे मधुभार / सुमन गह सार
त्रिदल अरु पाँच / अष्ट छवि साँच
२. सुनो न हिडिम्ब / चलो अविलंब
बनो मत खंब / सदय अब अंब
---
नवगीत:
नाम बड़े हैं
.
नाम बड़े हैं
दर्शन छोटे
.
दिल्ली आया उड़न खटोला
देख पड़ोसी का दिल डोला
पडी डांट मत गड़बड़ करना
वरना दंड पड़ेगा भरना
हो शरीफ तो
हो शरीफ भी
मत हो
बेपेंदी के लोटे
.
क्या देंगे?, क्या ले जायेंगे?
अपनी नैया खे जायेंगे
फूँक-फूँककर कदम उठाना
नहीं देश का मान घटाना
नाता रखना बराबरी का
सम्हल न कोई
बहला-पोटे
.
देख रही है सारी दुनिया
अद्भुत है भारत का गुनिया
बदल रहा बिगड़ी हालत को
दूर कर रहा हर शामत को
कमल खिलाये दसों दिशा में
चल न पा रहे
सिक्के खोटे
२५.१.२०१५
....
लघु कथा:
सीख
*
भारत माता ने अपने घर में जन-कल्याण का जानदार आँगन बनाया। उसमें शिक्षा की शीतल हवा, स्वास्थ्य का निर्मल नीर, निर्भरता की उर्वर मिट्टी, उन्नति का आकाश, दृढ़ता के पर्वत, आस्था की सलिला, उदारता का समुद्र तथा आत्मीयता की अग्नि का स्पर्श पाकर जीवन के पौधे में प्रेम के पुष्प महक रहे थे।
सिर पर सफ़ेद टोपी लगाये एक बच्चा आया, रंग-बिरंगे पुष्प देखकर ललचाया, पुष्प पर सत्ता की तितली बैठी देखकर उसका मन ललचाया, तितली को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तितली उड़ गई. बच्चा तितली के पीछे दौड़ा, गिरा, रोते हुए रह गया खड़ा।
कुछ देर बाद भगवा वस्त्रधारी दूसरा बच्चा खाकी पैंटवाले मित्र के साथ आया, सरोवर में खिला कमल का पुष्प उसके मन को भाया, मन ललचाया, बिना सोचे कदम बढ़ाया, किनारे लगी काई पर पैर फिसला, गिरा, भीगा और सिर झुकाए वापिस लौट गया।
तभी चक्र घुमाता तीसरा बच्चा अनुशासन को तोड़ता, शोर मचाता घर में घुसा और हाथ में हँसिया-हथौड़ा थामे चौथा बच्चा उससे जा भिड़ा. दोनों टकराए, गिरे, कांटें चुभे और वे चोटें सहलाते सिसकने लगे।
हाथी की तरह मोटे, अक्ल के छोटे, कुछ बच्चे एक साथ धमाल मचाते आए, औरों की अनदेखी कर जहाँ मन हुआ वहीं जगह घेरकर हाथ-पैर फैलाए, धक्का-मुक्की में फूल ही नहीं पौधे भी उखाड़ लाए।
कुछ देर बाद भारत माता घर में आईं, कमरे की दुर्दशा देखकर चुप नहीं रह पाईं, दुःख के साथ बोलीं- ‘ मत दो झूठी सफाई, मत कहो कि घर की यह दुर्दशा तुमने नहीं तितली ने बनाई। काश! तुम तितली को भुला पाते, काँटों को समय रहते देख पाते, मिल-जुल कर रह पाते, ख़ुद अपने लिये लड़ने की जगह औरों के लिए कुछ कर पाते तो आदमी बन जाते।
***
मुक्तक
*
बिटिया बोले तो बचपन को याद करो।
जब चुप तो खुद से ही संवाद करो।।
जब नाचे तो झूम उठो आनंद मना-
कभी न रोए प्रभु से यह फरियाद करो।।
*
नए हाथों को सहारा दें सदा।
शुक्रिया मिलकर खुद का हो अदा।।
नई राहों पे चले जो पग नए-
मंज़िलें होंगी 'सलिल' उन पर फिदा।।
२८.१.२०१४
विशेष लेख
नवगीत और देश
*
विश्व की पुरातनतम संस्कृति, मानव सभ्यता के उत्कृष्टतम मानव मूल्यों, समृद्धतम जनमानस, श्रेष्ठतम साहित्य तथा उदात्ततम दर्शन के धनी देश भारत वर्तमान में संक्रमणकाल से गुजर रहा है।पुरातन श्रेष्ठता, विगत पराधीनता, स्वतंत्रता पश्चात संघर्ष और विकास के चरण, सामयिक भूमंडलीकरण, उदारीकरण, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, दिशाहीन मीडिया के वर्चस्व, विदेशों के प्रभाव, सत्तोन्मुख दलवादी राजनैतिक टकराव, आतंकी गतिविधियों, प्रदूषित होते पर्यावरण, विरूपित होते लोकतंत्र, प्रशासनिक विफलताओं तथा घटती आस्थाओं के इस दौर में साहित्य भी सतत परिवर्तित हुआ।छायावाद के अंतिम चरण के साथ ही साम्यवाद-समाजवाद प्रणीत नयी कविता ने पारम्परिक गीत के समक्ष जो चुनौती प्रस्तुत की उसका मुकाबला करते हुए गीत ने खुद को कलेवर और शिल्प में समुचित परिवर्तन कर नवगीत के रूप में ढालकर जनता जनार्दन की आवाज़ बनकर खुद को सार्थक किया ।
किसी देश को उसकी सभ्यता, संस्कृति, लोकमूल्यों, धन-धान्य, जनसामान्य, शिक्षा स्तर, आर्थिक ढाँचे, सैन्यशक्ति, धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक संरचना से जाना जाता है। अपने उद्भव से ही नवगीत ने सामयिक समस्याओं से दो-चार होते हुए, आम आदमी के दर्द, संघर्ष, हौसले और संकल्पों को वाणी दी। कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर नवगीत ने वैशिष्ट्य पर सामान्यता को वरीयता देते हुए खुद को साग्रह जमीन से जोड़े रखा प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, ममता, करुणा, सामाजिक टकराव, चेतना, दलित-नारी विमर्श, सांप्रदायिक सद्भाव, राजनैतिक सामंजस्य, पीढ़ी के अंतर, राजनैतिक विसंगति, प्रशासनिक अन्याय आदि सब कुछ को समेटते हुइ नवगीत ने नयी पीढ़ी के लिये आशा, आस्था, विश्वास और सपने सुरक्षित रखने में सफलता पायी है।
पुरातन विरासत:
किसी देश की नींव उसके अतीत में होती है। नवगीत ने भारत के वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक काल से लेकर अधिक समय तक के कालक्रम, घटना चक्र और मिथकों को अपनी ताकत बनाये रखा है। वर्तमान परिस्थितियों और विसंगतियों का विश्लेषण और समाधान करता नवगीत पुरातन चरित्रों और मिथकों का उपयोग करते नहीं हिचकता। (जागकर करेंगे हम क्या? / सोना भी हो गया हराम / रावण को सौंपकर सिया / जपता मारीच राम-राम - मधुकर अष्ठाना, वक़्त आदमखोर), अंधों के आदेश / रात-दिन ढोता राजमहल / मिला हस्तिनापुर को / जाने किस करनी का फल (जय चक्रवर्ती, थोड़ा लिखा समझना ज्यादा) में देश की पुरातन विरासत पर गर्वित नवगीत सहज दृष्टव्य है।
संवैधानिक अधिकार:
भारत का संविधान देश के नागरिकों को अधिकार देता है किन्तु यथार्थ इसके विपरीत है- मौलिक अधिकारों से वंचित है / भारत यह स्वतंत्र नागरिक / वैचारिक क्रांति अगर आये तो / ढल सकती दोपहरी कारुणिक (आनंद तिवारी, धरती तपती है), क्यों व्यवस्था / अनसुना करते हुए यों / एकलव्यों को / नहीं अपना रही है? (जगदीश पंकज, सुनो मुझे भी), तंत्र घुमाता लाठियाँ / जन खाता है मार / उजियारे की हो रही अन्धकार से हार / सरहद पर बम फट रहे / सैनिक हैं निरुपाय / रण जीतें तो सियासत / हारें, भूल बताँय / बाँट रहे हैं रेवाड़ी / अंधे तनिक न गम / क्या सचमुच स्वाधीन हम? (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सड़क पर) आदि में नवगीत देश के आम नागरिक के प्रति चिंतित है।
गणतंत्र:
देश के संविधान, ध्वज हर नागरिक के लिये बहुमूल्य हैं। गणतंत्र की महिमा गायन कर हर नागरिक का सर गर्व से उठ जाता है - गणतंत्र हर तूफ़ान से गुजर हुआ है / पर प्यार से फहरा हुआ है ताल दो मिलकर / की कलियुग में / नया भारत बनाना है (पूर्णिमा बर्मन, चोंच में आकाश)। नवगीत केवक विसंकटी और विडम्बना का चित्रण नहीं है, वह देश के प्रति गर्वानुभूति भी करता है - पेट से बटुए तलक का / सफर तय करते मुसाफिर / बात तू माने न माने / देश पर अभिमान करने / के अभी लाखों बहाने (रामशंकर वर्मा, चार दिन फागुन के), मुक्ति-गान गूँजे, जब / मातृ-चरण पूजें जब / मुक्त धरा-अम्बर से / चिर कृतज्ञ अंतर से / बरबस हिल्लोल उठें / भावाकुल बोल उठें / स्वतंत्रता- संगरो नमन / हुंकृत मन्वन्तरों नमन (जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', तमसा के दिन करो नमन) आदि में देश के गणतंत्र और शहीदों को नमन कर रहा है नवगीत।
वर्ग संघर्ष-शोषण:
कोई देश जब परिवर्तन और विकास की राह पर चलता है तो वर्ग संघर्ष होना स्वाभाविक है. नवगीत ने इस टकराव को मुखर होकर बयान किया है- हम हैं खर-पतवार / सड़कर खाद बनते हैं / हम जले / ईंटे पकाने / महल तनते हैं (आचार्य भगवत दुबे, हिरन सुगंधों के), धूप का रथ / दूर आगे बढ़ गया / सिर्फ पहियों की / लकीरें रह गयीं (प्रो. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र'), सड़क-दर-सड़क / भटक रहे तुम / लोग चकित हैं / सधे हुए जो अस्त्र-शास्त्र / वे अभिमंत्रित हैं (कुमार रवीन्द्र), व्यर्थ निष्फल / तीर और कमान / राजा रामजी / क्या करे लक्षमण बड़ा हैरान / राजा राम जी (स्व. डॉ. विष्णु विराट) आदि में नवगीत देश में स्थापित होते दो वर्गों का स्पष्ट संकेत करता है।
विकासशील देश में बदलते जीवन मूल्य शोषण के विविध आयामों को जन्म देता है. स्त्री शोषण के लिए सहज-सुलभ है. नवगीत इस शोषण के विरुद्ध बार-बार खड़ा होता है- विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी / जेठ-ससुर की मैली नजरें / अब टूटीं, तब टूटीं (राजा अवस्थी, जिस जगह यह नाव है), कहीं खड़ी चौराहे कोई / कृष्ण नहीं आया / बनी अहल्या लेकिन कोई राम नहीं पाया / कहीं मांडवी थी लाचार घुटने टेक पड़ी (गीता पंडित, अब और नहीं बस), होरी दिन भर बोझ ढोता / एक तगाड़ी से / पत्नी भूखी, बच्चे भूखे / जब सो जाते हैं / पत्थर की दुनिया में आँसू तक खो जाते हैं (जगदीश श्रीवास्तव) कहते हुए नवगीत देश में बढ़ रहे शोषण के प्रति सचेत करता है।
परिवर्तन-विस्थापन:
देश के नवनिर्माण की कीमत विस्थापित को चुकानी पड़ती है. विकास के साथ सुरसाकार होते शहर गाँवों को निगलते जाते हैं- खेतों को मुखिया ने लूटा / काका लुटे कचहरी में / चौका सूना भूखी गैया / प्यासी खड़ी दुपहरी में (राधेश्याम /बंधु', एक गुमसुम धूप), सन्नाटों में गाँव / छिपी-छिपी सी छाँव / तपते सारे खेत / भट्टी बनी है रेत / नदियां हैं बेहाल / लू-लपटों के जाल (अशोक गीते, धुप है मुंडेर की), अंतहीन जलने की पीड़ा / मैं बिन तेल दिया की बाती / मन भीतर जलप्रपात है / धुआँधार की मोहक वादी / सलिल कणों में दिन उगते ही / माचिस की तीली टपका दी (रामकिशोर दाहिया, अल्लाखोह मची), प्रतिद्वंदी हो रहे शहर के / आसपास के गाँव / गाये गीत गये ठूंठों के / जीत गये कंटक / ज़हर नदी अपना उद्भव / कह रही अमरकंटक / मुझे नर्मदा कहो कह रहा / एक सूखा तालाब (गिरिमोहन गुरु, मुझे नर्मदा कहो), बने बाँध / नदियों पर / उजड़े हैं गाँव / विस्थापित हुए / और मिट्टी से कटे / बच रहे तन / पर अभागे मन बँटे / पथरीली राहों पर / फिसले हैं पाँव (जयप्रकाश श्रीवास्तव, परिंदे संवेदना के) आदि भाव मुद्राओं में देश विकास के की कीमत चुकाते वर्ग को व्यथा-कथा शब्दित कर उनके साथ खड़ा है नवगीत।
पर्यावरण प्रदूषण:
देश के विकास साथ-साथ की समस्या सिर उठाने लगाती है। नवगीत ने पर्यावरण असंतुलन को अपना कथ्य बनाने से गुरेज नहीं किया- इस पृथ्वी ने पहन लिए क्यों / विष डूबे परिधान? / धुआँ मंत्र सा उगल रही है / चिमनी पीकर आग / भटक गया है चौराहे पर / प्राणवायु का राग / रहे खाँसते ऋतुएँ, मौसम / दमा करे हलकान (निर्मल शुक्ल, एक और अरण्य काल), पेड़ कब से तक रहा / पंछी घरों को लौट आएं / और फिर / अपनी उड़ानों की खबर / हमको सुनाएँ / अनकहे से शब्द में / फिर कर रही आगाह / क्या सारी दिशाएँ (रोहित रूसिया, नदी की धार सी संवेदनाएँ) कहते हुए नवगीत देश ही नहीं विश्व के लिए खतरा बन रहे पर्यावरण प्रदूषण को काम करने के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है।
भ्रष्टाचार:
देश में पदों और अधिकारों का का दुरुपयोग करनेवाले काम नहीं हैं। नवगीत उनकी पोल खोलने में पीछे नहीं रहता- लोकतंत्र में / गाली देना / है अपना अधिकार / अपना काम पड़े तो देना / टेबिल के नीचे से लेना (ओमप्रकाश तिवारी, खिड़कियाँ खोलो) स्वर्णाक्षर सम्मान पत्र / नकली गुलदस्ते हैं / चतुराई के मोल ख़रीदे / कितने सस्ते हैं (महेश अनघ), आत्माएँ गिरवी रख / सुविधाएँ ले आये / लोथड़ा कलेजे का, वनबिलाव चीलों में / गंगा की गोदी में या की ताल-झीलों में / क्वाँरी माँ जैसे, अपना बच्चा दे आये (नईम), अंधी नगरी चौपट राजा / शासन सिक्के का / हर बाज़ी पर कब्जा दिखता / जालिम इक्के का (शीलेन्द्र सिंह चौहान) आदि में नवगीत देश में शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार को उद्घाटित कर समाप्ति हेतु प्रेरणा देता है।
उन्नति और विकास:
नवगीत विसंगति और विडम्बनाओं तक सीमित नहीं रहता, वह आशा-विश्वास और विकास की गाथा भी कहता है- देखते ही देखते बिटिया / सयानी हो गयी / उच्च शिक्षा प्राप्त कर वह नौकरी करने चली / कल तलक थी साथ में / अब कर्म पथ वरने चली (ब्रजेश श्रीवास्तव, बाँसों के झुरमुट से), मुश्किलों को मीत मानो / जीत तय होगी / हौसलों के पंख हों तो।/ चिर विजय होगी (कल्पना रामानी, हौसलों के पंख) कहते हुए नवगीत देश की युवा पीढ़ी को आश्वस्त करता है की विसंगतियों और विडम्बनाओं की काली रात के बाद उन्नति और विकास का स्वर्णिम विहान निकट है।
प्यार :
किसी देश का निर्माण सहयोग, सद्भाव और प्यार से हो होता है. टकराव से सिर्फ बिखराव होता है. नवगीत ने प्यार की महत्ता को भी स्वर दिया है- प्यार है / तो ज़िंदगी महका / हुआ एक फूल है / अन्यथा हर क्षण / ह्रदय में / तीव्र चुभता शूल है / ज़िंदगी में / प्यार से दुष्कर / कहीं कुछ भी नहीं (महेंद्र भटनागर, दृष्टि और सृष्टि), रातरानी से मधुर / उन्वान हम / फिर से लिखेंगे / बस चलो उस और सँग तुम / प्रीत बंधन है जहाँ (सीमा अग्रवाल, खुशबू सीली गलियों की) में नवगीत जीवन में प्यार और श्रृंगार की महक बिखेरता है।
आव्हान :
सपनों से नाता जोड़ो पर / जाग्रति से नाता मत तोड़ो तथा यह जीवन / कितना सुन्दर है / जी कर देखो... शिव समान / संसार हेतु / विष पीकर देखो (राजेंद्र वर्मा, कागज़ की नाव), सबके हाथ / बराबर रोटी बाँटो मेरे भाई (जयकृष्ण तुषार), गूंज रहा मेरे अंतर में / ऋषियों का यह गान / अपनी धरती, अपना अम्बर / अपना देश महान (मधु प्रसाद, साँस-साँस वृन्दावन) आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत के अंतर में देश के नव निर्माण की आकुलता की अभव्यक्ति करते हुई आश्वस्त करती हैं की देश का भविष्य उज्जवल है और युवाओं को विषमता का अंत कर समता-ममता के बीज बोने होंगे।
*** 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

जनवरी २७, हरियाणवी हाइकु, सोरठा, उल्लाला, चित्रगुप्त, सरस्वती, दोस्त, ग्वारीघाट जबलपुर, सप्त मात्रिक छंद, गीत

सलिल सृजन जनवरी २७
पूर्णिका
.
मन! कहो क्या करूँ रीत का
लेश जिसमें नहीं प्रीत का
.
जिंदगी जिंदगी ही नहीं
ज्ञान जिसको नहीं नीत का
.
हार से हारता जब नहीं
पंथ तब ही मिले जीत का
.
धड़कनों को धड़कना सिखा
आप आशिक हुआ गीत का
.
दुरदुराता रहा जग, न जग
मोल जाना नहीं क्रीत का
.
भ्रम वहम है अहं का 'सलिल'
मान रखना सदा मीत का
०००
चंद अश'आर
.
दस्तक दरे-दिल पर न देता दोस्त हो 
दिन न मुझको जिंदगी में देखना है।
.
दोस्त दरिया दिल दयानतदार दे
जिंदगी ने जिंदगी कर दी अता।
.
दिल! दुखाना मत कभी दिल दोस्त का
मुआफी मौला नहीं देगा तुझे।
.
तीरगी में दोस्त ही बनकर दिया
साथ मेरे उम्र भर चलता रहा।
.
बाँह थामी दोस्त की बर्बाद ने
दोस्ती ने कर दिया आबाद झट।
.
दोस्त को साया कभी मत बोलना
वह नहीं यह अँधेरे में साथ दे।
.
दोस्त के लगकर गले ऐसा लगा
चाँद-सूरज जमीं पर मिलते गले।
.
कयामत कुदरत ने ढाई दोस्त पर
दोस्त बोला- 'छोड़ उसको, मुझपे ढा।
.
दोस्ती ने तर्क सारे फर्क कर
दो दिलों को एक कर ही दम लिया।
२७.१.२०२६
०००
हरियाणवी हाइकु
*
लिक्खण बैठ्या
हरियाणवी कविता
कग्गज कोरा।१।
*
अकड़ कोन्या
बैरी बुढ़ापा आग्या
छाती तान के।२।
*
भला हकीम
आक करेला नीम
कड़वा घणा।३।
*
रै बेइमान!
छुआछूत कर्‌या
सब हैं एक।४।
*
सबतै ऊँच्चा
जीवन मैं अपने
दर्जा गुरु का।५।
*
हँसी गौरैया
किलकारी मारकै
मनी बैसाखी।६।
*
चैन की बंसी
दुनिया को चुभती
चाट्टी चिन्ता नै।७।
*
सुपणा पूरा
जीत ल्याई मैडल
गाम की लाड़ो।८।
*
देश नै नेता
खसोटन लाग्या हे
रब बचाए।९।
*
जीत कै जंग
सबनै चुनरिया
करती दंग।१०।
*
घर म्हं घर
खतरा चिड़िया नै
तोड़ पिंजरा।११।
*
भुक्खा किसान
मरणा हे लड़कै
नहीं झुककै।१२।
***
हिंदी हाइकु
*
याद ही याद
पोर-पोर समाई
स्वाद ही स्वाद।१।
*
सरिता बहे
अनकहनी कहे
कोई न सुने।२।
*
रीता है कोष
कम नहीं है जोश
यही संतोष।३।
*
जग नादान
नाहक भटकता
बने जिज्ञासु।४।
*
नहीं गैर से
खतराही खतरा
अपनों ही से।५।
*
नहीं हराना
मुझे किसी को कभी
यही जीत है।६।
*
करती जंग
बुराईयों से बिंदी
दुनिया दंग।७।
*
धूप का रूप
अनुपम अनूप
मिस इण्डिया।८।
***
सोरठा सलिला
*
लख वसुधा सिंगार, महुआ मुग्ध महक रहा।
किंशुक हो अंगार, दग्ध हृदय कर झट दहा।।
वेणी लाया साथ, मस्त मोगरा पान भी।
थाम चमेली हाथ, झूम कर रहा ठिठोली।।
रंग कुसुंबी डाल, राधा जू ने भिगाया।
मलकर लाल गुलाल, बनवारी ने खिझाया।।
रीझ नैन पर नैन, मिले झुके उठ मिल लड़े।
चारों हो बेचैन, दोनों में दोनों धँसे।।
दिल ने दिल का हाल, बिना कहे ही कह दिया।
दिलवर हुआ निहाल, कहा दिलरुबा ने पिया।।
२७-१-२०२३
चित्रगुप्त जी का न्याय
एक घोर पापी चोर,जुआरी, शराबी, व्यसनी मनुष्य ने जीवन में एक भी पुण्य न कर र पाप ही पाप किए।
एक दिन उसने महारानी की सवारी बाजार से निकलते देखी और महारानी के सिर पर सजी हुई मोगरे के फूलों की वेणी (माला) देखते ही उसे चुराकर अपनी प्रेयसी को उपहार स्वरूप देने का विचार किया। सैनिकों को छकाते हुए बहुत चतुराई से उसने महारानी के सिर से वह वेणी निकाली और लेकर सरपट अपनी प्रेयसी के पास भागा।
उसे वेणी चुराकर भागता देख महारानी के रक्षक सैनिक उसे पकड़ने के लिए दौड़े। चोर व्यसनी था, उसका शरीर भागते-भागते शीघ्र ही थक-चुक गया और वह एक पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ा। संयोग से वह एक चबूतरे पर स्थापित शिवलिंग के निकट गिरा। चाहकर भी वह उठ नहीं पा रहा था, भागता कैसे? उसे पकड़ने के लिए पल-पल समीप आ रहे राजा के सैनिक उसे यमदूतों की तरह लग रहे थे। चोर के मुँह से निकला- "अब तो मरना है ही! ले तू ही पहन ले इसे!" उसने वेणी शिवलिंग को पहना दी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
मरते ही उसे चित्रगुप्त जी के दरबार में लाया गया। यमराज बोले- "प्रभु! इस जीव ने जीवन में एक भी पुण्य नहीं किया। इसका पूरा जीवन पापमय आचरण करते हुए व्यतीत हुआ है, इसे सौ कल्प तक नरक-वास करने का दंड दीजिए।
चित्रगुप्त जी ने उसके कर्मों का सूक्ष्म विचारण कर कहा- 'इसने मृत्यु से ठीक पहले अंत समय में शंकर भगवान को निस्वार्थ भाव से वेणी अर्पित की और उन्हीं को स्मरण कर प्राण तजे इसलिए यह एक मुहूर्त के लिए इंद्रपद का अधिकारी है। "
यह सुनते ही यमराज ने चोर से पूछा कि वह नरक भोगकर एक मुहूर्त स्वर्ग का शासन करेगा या पहले स्वर्ग का राजा बनकर नरक में यातना झेलेगा?
चोर ने सोचा कि पहले स्वर्ग के आनंद ले लेना चाहिए बाद में तो नरक की अग्नि में जलना ही है। इंद्रदेव को यह सुचना मिली तो उन्होंने उस चोर को अपशब्द कहते हुए उसे इन्द्रासन के अयोग्य बताया पर देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त के न्यायादेश का पालन करनी ही पड़ा। उस चोर को इंद्र के स्थान पर एक मुहूर्त के लिए स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा दिया गया।
इंद्रदेव दवरा किए गए अपमान से क्षुब्ध चोर ने इंद्रासन पर बैठते ही सोचा कि स्वर्ग का खजाना खाली कर इंद्र से अपमान का बदला लेना है।उसने विनम्रतापूर्वक देवगुरु बृहस्पति से पूछा- "गुरुदेव! मैंने मरने से पहले जिसको माला पहनाई थी… क्या नाम था उसका… शिव! मैं स्वर्ग की समस्त संपदा शिव को दान देना है। आप साक्षी के रूप में ऋषि-महर्षियों को बुलवाइए।"
इंद्रासन पर आसीन देवराज के आदेश का पालन अनिवार्य था। चोर एक मुहूर्त के लिए ही सही पर था तो इंद्र ही। सप्तऋषि, नारद जी तथा अन्य ऋषिगण आ गए तो इस चोर ने जो अभी इंद्र था उसने दान आरंभ किया। गुरु बृहस्पति ने उसके हाथ में जल दिया और उसने स्वर्ग की सब संपदा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत हाथी, वज्र आदि शिव को दान दे दी।
एक मुहूर्त पूरा होते ही यमदूत उसे नरक ले जाने आ गए। तभी शिव जी के पार्षदों ने यमदूतों को उसे नरक ले जाने से रोक दिया कि निष्काम भाव से स्वर्ग-संपदा शिव जी को दान देने के कारण उसके करोड़ों पाप वैसे ही भस्म हो गए है जैसे अग्नि में काष्ठ।
शिवदूतों और यमदूतों में संघर्ष की स्थिति बनने के पहले ही स्वयं श्रीमन्नारायण भगवान प्रगट हुए और बोले: "बेटा तुमने शिव जी को दान दिया पर मुझ शिवभक्त को भूल गए? अब अगले जन्म में मैं स्वयं तुमसे दान लेने आऊँगा।
अगले जान में चोर महाराज बलि हुआ और उससे उसकी स्वर्ग सदृश्य संपदा तीन पग में विष्णु जी ने दान में ले ली। कर्मेश्वर चित्रगुप्त जी के न्याय विधान को यम ही नहीं विष्णु जी और शिव जी ने भी मान्यता दी।
***
शारदे माँ!
तार दे माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ।।
*
करो छाया, हरो माया,
साधना कर सके काया।।
वंदना कर, प्रार्थना कर,
अर्चना कर सिर नवाया।।
भाव सुमन बटोर लाया
हँस इन्हें स्वीकार ले माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ
शारदे माँ!
तार दे माँ!
*
मति पुनीता, हो विनीता,
साम गाए, बाँच गीता।।
कथ्य रस लय भाव अर्पित
अर्चना कर सिर नवाया।।
शब्द-सुमन बटोर लाया
हँस इन्हें स्वीकार ले माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ
शारदे माँ!
तार दे माँ!
*
रच ऋचाएँ साम गाऊँ,
तुझे मन में बसा पाऊँ।
बहुत भूला, बहुत भटका
अब तुम्हीं में मैं समाऊँ।।
सत्य-शिव-सुंदर रचा माँ
भव तरूँ, पतवार दे माँ!
शारदे माँ!
तार दे माँ!
२७-१-२०२१
***
ग्वारीघाट जबलपुर की एक शाम
*
लल्ला-लल्ली रोए मचले हमें घूमना मेला
लालू-लाली ने यह झंझट बहुत देर तक झेला
डाँटा-डपटा बस न चला तो दोनों करें विचार
होटल या बाजार गए तो चपत लगेगी भारी
खाली जेब मुसीबत होगी मँहगी चीजें सारी
खर्चा कम, मन बहले ज्यादा, ऐसा करो उपाय
चलो नर्मदा तीर नहाएँ-घूमें, है सदुपाय
शिव पूजें पाएँ प्रसाद सूर्योदय देखें सुंदर
बच्चों का मन बहलेगा जब दिख जाएँगे बंदर
स्कूटर पर चारों बैठे मानो हो वह कार
ग्वारीघाट पहुँचकर ऊषा करे सिंगार
नभ पर बैठी माथे पर सूरज का बेंदा चमके
बिंब मनोहर बना नदी में, हीरे जैसा दमके
चहल-पहल थी खूब घाट पर घूम रहे नारी-नर
नहा रहे जो वे गुंजाएँ बम भोले नर्मद हर
पंडे करा रहे थे पूजा, माँग दक्षिणा भारी
पाप-पुण्य का भय दिखलाकर चला चढ़ोत्री आरी
जाने क्या-क्या मंत्र पढ़ें फिर मस्तक मलते चंदन
नरियल चना चिरौंजीदाने पंडित देता गिन गिन
घूम थके भूखे हो बच्चे पैर पटककर बोले
अब तो चला नहीं जाता, कैसे बोलें बम भोले
लालू लाया सेव जलेबी सबने भोग लगाया
नौकायन कर मौज मनाई नर्मदाष्टक गाया
२७-१-२०२०
***
कार्यशाला
*
ऐसे सच्चे मित्र हैं, जीवन निधि अनमोल
घावों पर मरहम सरिस, होके उनके बोल - अनिल अनवर
होते उनके बोल, अमिय सम नवजीवन दें
मृदुला विमला नेह नर्मदा बन मधुवन दें
मिले गुलाबों से हमें जैसे परिमल इत्र
वैसे सही विमर्श दें, ऐसे सच्चे मित्र - संजीव
***
मुक्तिका:
रात
( तैथिक जातीय पुनीत छंद ४-४-४-३, चरणान्त sssl)
.
चुपके-चुपके आयी रात
सुबह-शाम को भायी रात
झरना नदिया लहरें धार
घाट किनारे काई रात
शरतचंद्र की पूनो है
'मावस की परछाईं रात
आसमान की कंठ लंगोट
चाहे कह लो टाई रात
पर्वत जंगल धरती तंग
कोहरा-पाला लाई रात
वर चंदा तारे बारात
हँस करती कुडमाई रात
दिन है हल्ला-गुल्ला-शोर
गुमसुम चुप तनहाई रात
२७-१-२०२०
छंद सलिला
दोहा
जैसे ही अनुभूति हो, कर अभिव्यक्ति तुरंत
दोहा-दर्पण में लखें, आत्म-चित्र कवि-संत
*
कुछ प्रवास, कुछ व्यस्तता, कुछ आलस की मार
चाह न हो पाता 'सलिल', सहभागी हर बार
*
सोरठा
बन जाते हैं काम, कोशिश करने से 'सलिल'
भला करेंगे राम, अनथक करो प्रयास नित
*
रोला
सब स्वार्थों के मीत, किसका कौन सगा यहाँ?
धोखा देते नित्य, मिलता है अवसर जहाँ
राजनीति विष बेल, बोकर-काटे ज़हर ही
कब देखे निज टेंट, कुर्सी ढाती कहर ही
*
काव्य छंद
सबसे प्यारा पूत, भाई जाए भाड़ में
छुरा दिया है भोंक, मजबूरी की आड़ में
नाम मुलायम किंतु सेंध लगाकर बाड़ में
खेत चराते आप, अपना बेसुध लाड़ में
*
द्विपदी
पत्थर से हर शहर में, मिलते मकां हजारों
मैं ढूँढ-ढूँढ हारा, घर एक नहीं मिलता
***
लौकिक जातीय सप्त मात्रिक छंद
१. पदांत यगण
तज बहाना
मन लगाना
सफल होना
लक्ष्य पाना
जो मिला है
हँस लुटाना
मुस्कुराना
खिलखिलाना
२. पदांत मगण
न भागेंगे
न दौड़ेंगे
करेंगे जो
न छोड़ेंगे
*
३. पदांत तगण
आओ मीत
गाओ गीत
नाता जोड़
पाओ प्रीत
*
४. पदांत रगण
पाया यहाँ
खोया यहाँ
बोया सदा
काटा यहाँ
*
कर आरती
खुश भारती
सन्तान को
हँस तारती
*
५. पदांत जगण
भारत देश
हँसे हमेश
लेकर जन्म
तरे सुरेश
*
६. पदांत भगण
चपल चंचल
हिरन-बादल
दौड़ते सुन
ढोल-मादल
*
७. पदांत नगण
मीठे वचन
बोलो सजन
मूँदो न तुम
खोलो नयन
*
८. पदांत सगण
सुगती छंद
सच-सच कहो
मत चुप रहो
जो सच दिखे
निर्भय कहो
२७-१-२०१७
***
नवगीत
तुम कहीं भी हो
.
तुम कहीं भी हो
तुम्हारे नाम का सजदा करूँगा
.
मिले मंदिर में लगाते भोग मुझको जब कभी तुम
पा प्रसादी यूँ लगा बतियाओगे मुझसे अभी तुम
पर पुजारी ने दिया तुमको सुला पट बंद करके
सोचते तुम रह गये
अब भक्त की विपदा हरूँगा
.
गया गुरुद्वारा मिला आदेश सर को ढांक ले रे!
सर झुका कर मूँद आँखें आत्म अपना आँक ले रे!
सबद ग्रंथी ने सुनाया पूर्णता को खंड करके
मिला हलुआ सोचता मैं
रह गया अमृत चखूँगा
.
सुन अजानें मस्जिदों के माइकों में जा तलाशा
छवि कहीं पाई न तेरी भरी दिल में तब हताशा
सुना फतवा 'कुफ्र है, यूँ खोजना काफिर न आ तू'
जा रहा हूँ सोचते यह
राह अपनी क्यों तजूँगा?
.
बजा घंटा बुलाया गिरजा ने पहुंचा मैं लपक कर
माँग माफ़ी लूँ कहाँ गलती करी? सोचा अटककर
शमा बुझती देख तम को साथ ले आया निकलकर
चाँदनी को साथ ले,
बन चाँद, जग रौशन करूँगा
.
कोई उपवासी, प्रवासी कोई जप-तप कर रहा था
मारता था कोई खुद को बिना मारे मर रहा था
उठा गिरते को सम्हाला, पोंछ आँसू बढ़ चला जब
तब लगा है सार जग में
गीत गाकर मैं तरूँगा
***
उल्लाला सलिला:
*
(छंद विधान १३-१३, १३-१३, चरणान्त में यति, सम चरण सम तुकांत, पदांत एक गुरु या दो लघु)
*
अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता।
भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता।।
*
मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना।
जगत देखता है नहीं अभियंता की भावना।।
*
सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत।
अभियंता योगी सदृश, कर्म करें निज अनवरत।।
*
भोगवाद हो गया है, सब जनगण को साध्य जब।
यंत्री कैसे हरिश्चंद्र, हो जी सकता कहें अब??
*
भृत्यों पर छापा पड़े, मिलें करोड़ों रुपये तो।
कुछ हजार वेतन मिले, अभियंता को क्यों कहें?
*
नेता अफसर प्रेस भी, सदा भयादोहन करें।
गुंडे ठेकेदार तो, अभियंता क्यों ना डरें??
*
समझौता जो ना करे, उसे तंग कर मारते।
यह कड़वी सच्चाई है, सरे आम दुत्कारते।।
*
हर अभियंता विवश हो, समझौते कर रहा है।
बुरे काम का दाम दे, बिन मारे मर रहा है।।
*
मिले निलम्बन-ट्रान्सफर, सख्ती से ले काम तो।
कोई न यंत्री का सगा, दोषारोपण सब करें।।
२७-१-२०१५
***
कृति चर्चा:
मरुभूमि के लोकजीवन की जीवंत गाथा "खम्मा"
*
[कृति विवरण: खम्मा, उपन्यास, अशोक जमनानी, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, पृष्ठ १३७, मूल्य ३०० रु., श्री रंग प्रकाशन होशंगाबाद]
*
राजस्थान की मरुभूमि से सन्नाटे को चीरकर दिगंत तक लोकजीवन की अनुभूतियों को अपने हृदवेधी स्वरों से पहुँचाते माँगणियारों के संघर्ष, लुप्त होती विरासत को बचाये रखने की जिजीविषा, छले जाने के बाद भी न छलने का जीवट जैसे जीवनमूल्यों पर केंद्रित "खम्मा" युवा तथा चर्चित उपन्यासकार अशोक जमनानी की पाँचवी कृति है. को अहम्, बूढ़ी डायरी, व्यासगादी तथा छपाक से हिंदी साहत्य जगत में परिचित ही नहीं प्रतिष्ठित भी हो चुके अशोक जमनानी खम्मा में माँगणियार बींझा के आत्म सम्मान, कलाप्रेम, अनगढ़ प्रतिभा, भटकाव, कलाकारों के पारस्परिक लगाव-सहयोग, तथाकथित सभ्य पर्यटकों द्वारा शोषण, पारिवारिक ताने-बाने और जमीन के प्रति समर्पण की सनातनता को शब्दांकित कर सके हैं.
"जो कलाकार की बनी लुगाई, उसने पूरी उम्र अकेले बिताई" जैसे संवाद के माध्यम से कथा-प्रवाह को संकेतित करता उपन्यासकार ढोला-मारू की धरती में अन्तर्व्याप्त कमायचे और खड़ताल के मंद्र सप्तकी स्वरों के साथ 'घणी खम्मा हुकुम' की परंपरा के आगे सर झुकाने से इंकार कर सर उठाकर जीने की ललक पालनेवाले कथानायक बींझा की तड़प का साक्षी बनता-बनाता है.
अकथ कहानी प्रेम की, किणसूं कही न जाय
गूंगा को सुपना भया, सुमर-सुमर पछताय
मोहब्बत की अकथ कहानी को शब्दों में पिरोते अशोक, राहुल सांकृत्यायन और विजय दान देथा के पाठकों गाम्भीर्य और गहनता की दुनिया से गति और विस्तार के आयाम में ले जाते हैं. उपन्यास के कथासूत्र में काव्य पंक्तियाँ गेंदे के हार में गुलाब पुष्पों की तरह गूँथी गयी हैं.
बेकलू (विकल रेत) की तरह अपने वज़ूद की वज़ह तलाशता बींझा अपने मित्र सूरज और अपनी संघर्षरत सुरंगी का सहारा पाकर अपने मधुर गायन से पर्यटकों को रिझाकर आजीविका कमाने की राह पर चल पड़ता है. पर्यटकों के साथ धन के सामानांतर उन्मुक्त अमर्यादित जीवनमूल्यों के तूफ़ान (क्रिस्टीना के मोहपाश में) बींझा का फँसना, क्रिस्टीना का अपने पति-बच्चों के पास लौटना, भींजा की पत्नी सोरठ द्वारा कुछ न कहेजाने पर भी बींझा की भटकन को जान जाना और उसे अनदेखा करते हुए भी क्षमा न कर कहना " आपने इन दिनों मुझे मारा नहीं पर घाव देते रहे… अब मेरी रूह सूख गयी है… आप कुछ भी कहो लेकिन मैं आपको माफ़ नहीं कर पा रही हूँ… क्यों माफ़ करूँ आपको?' यह स्वर नगरीय स्त्री विमर्श की मरीचिका से दूर ग्रामीण भारत के उस नारी का है जो अपने परिवार की धुरी है. इस सचेत नारी को पति द्वारा पीटेजाने पर भी उसके प्यार की अनुभूति होती है, उसे शिकायत तब होती है जब पति उसकी अनदेखी कर अन्य स्त्री के बाहुपाश में जाता है. तब भी वह अपने कर्तव्य की अनदेखी नहीं करती और गृहस्वामिनी बनी रहकर अंततः पति को अपने निकट आने के लिये विवश कर पाती है.
उपन्यास के घटनाक्रम में परिवेशानुसार राजस्थानी शब्दों, मुहावरों, उद्धरणों और काव्यांशों का बखूबी प्रयोग कथावस्तु को रोचकता ही नहीं पूर्णता भी प्रदान करता है किन्तु बींझा-सोरठ संवादों की शैली, लहजा और शब्द देशज न होकर शहरी होना खटकता है. सम्भवतः ऐसा पाठकों की सुविधा हेतु किया गया हो किन्तु इससे प्रसंगों की जीवंतता और स्वाभाविकता प्रभावित हुई है.
कथांत में सुखांती चलचित्र की तरह हुकुम का अपनी साली से विवाह, उनके बेटे सुरह का प्रेमिका प्राची की मृत्यु को भुलाकर प्रतीची से जुड़ना और बींझा को विदेश यात्रा का सुयोग पा जाना 'शो मस्त गो ऑन' या 'जीवन चलने का नाम' की उक्ति अनुसार तो ठीक है किन्तु पारम्परिक भारतीय जीवन मूल्यों के विपरीत है. विवाहयोग्य पुत्र के विवाह के पूर्व हुकुम द्वारा साली से विवाह अस्वाभाविक प्रतीत होता है.
सारतः, कथावस्तु, शिल्प, भाषा, शैली, कहन और चरित्र-चित्रण के निकष पर अशोक जमनानी की यह कृति पाठक को बाँधती है. राजस्थानी परिवेश और संस्कृति से अनभिज्ञ पाठक के लिये यह कृति औत्सुक्य का द्वार खोलती है तो जानकार के लिये स्मृतियों का दरीचा.... यह उपन्यास पाठक में अशोक के अगले उपन्यास की प्रतीक्षा करने का भाव भी जगाता है.
********
कुण्डलिया
मंगलमय हो हर दिवस, प्रभु जी दे आशीष.
'सलिल'-धार निर्मल रखें, हों प्रसन्न जगदीश..
हों प्रसन्न जगदीश, न पानी बहे आँख से.
अधरों की मुस्कान न घटती अगर बाँट दें..
दंगल कर दें बंद, धरा से कटे न जंगल
मंगल क्यों जाएँ, भू का हम कर दें मंगल..
२७-१-२०१३
***

सोमवार, 26 जनवरी 2026

जनवरी २६, मुक्तिका, सोरठे, गणतंत्र, नवगीत, लघुकथा, प्रजातन्त्र, जनतंत्र, लोकतंत्र

सलिल रचना जनवरी २६
मुक्तिका
*
जनगण सेवी तंत्र बने राधे माधव
लोक जागृति मंत्र बने राधे माधव
पेज पर्व गणतंत्र दिवस यह अमर रहे
देश जन यंत्र बने राधे माधव
होन वैल्यू न पर मनभेद कभी हममें
कोटि-कोटि जन बने एक राधे माधव
पक्ष-विपक्ष और सहिष्णु विवेकी हों
दाऊ-कन्हैया सदृश सदा राधे माधव
होन नर-नारी फुलाए हुए शंकर-उमा भंडार
संतति सीता-राम रहे राधे माधव
हो संजीवित जग जीवन की जय बोलें
हो न महाभारत भारत राधे माधव
आर्यावर्त बने भारत सुख-शान्तिप्रदा
रिद्धि-सिद्धि-विघ्नेश दास राधे माधव
देव कलम के! शब्द-शक्ति की जय जय हो
शरद सुत हों सदा सुखी राधे माधव
जगवाणी हिंदी की दस दिश जय गूंजे
स्नेह सलिल अभिषेक करे राधे माधव
गणतंत्र दिवस 2020
***
सोरठे गणतंत्र के
जनता हुई पार्टी, आज बने गणतंत्र हम।
जन-जन हो सारथी, भेद-भाव सब दूर हो।
*
सेवक होता है तंत्र, प्रजातन्त्र में प्रजा का।
यही सफलता-मंत्र, जनसेवी नेता।
*
होता है अनमोल, लोकतंत्र में लोकमत।
कलम उठाये तोल, नुकसान न करिये देश की।।
*
खुद भोगे अधिकार, तंत्र न जन की पीर हर।
शासन करे विचार, तो जनतंत्र सफल नहीं है।।
*
आन, बान, सम्मान, ध्वजा तिरंगी देश की।
विहंस लता दे जान, झकने कभी न दे 'सलिल'।
*
पालन ​​करिए नित्य, संविधान को जानना।
फ़र्ज़ मानिये सत्य, प्राधिकार की संस्थाएँ हैं।।
*
भारतीय एक हैं, जाति-धर्म को भुलाकर।
चलो हम नेक, भाईचारा पालकर
2016-11-2011
***
नवगीत
*
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
संविधान कर प्रोविजन
जो देता है, बताता है
सर्वशक्ति रचनाकार
केवल बेब्स-दीन
नाग-साँप-बिच्छू चुनावी लड़की
बाँट-फूट डालो
विजयी हूँ, मिल जन-धन लूटें
जन-गण हो निर्धन
लोकतंत्र का पोस्टर करता है
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
उपयोगकर्ता खोजें, जीतें चुनाव, कह
जुमला जाता भूल
कहते हैं गरीबी पर गरीब को
मत, निर्मूल
खुद की मूरत लगा ताला,
वस्त्रते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख, पा पुरस्कार
वापस करो हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
गौरक्षा का नाम, गौरक्षा का नाम
बहुत दुख रहे हैं
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब गया
दुश्मनों के झंडे लहराते
सेना को दोष दें
बिन मेहनत पा सजीव न रोटी
तब आएगा होश
जंग जागे, गलती जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
22-8-2011
***
गीत:
ये कैसा जनतंत्र...
*
यह कैसा जनतंत्र की सहमति होनी चाहिए, हुआ गुनाह?
आह फिल वे जो न और क्यू सह सकते हैं व...
*
सत्ता और फैक्ट्री दल में नेता बंट गए
एक जय तो कहे दूसरा, मैं हार गया
नूरा कुश्ती खेल-कर जंग-मन को ठगते-
स्वार्थ और सत्य हित पल में हाथ मिलाये मिलते हैं
मेरी भी जय, तेरी भी जय, करो देश की रक्षा...
*
हुजूर के सिद्धार्थ में बैठे गगन में उड़ते
जड़ो को नहीं पता, चेतन जड़ावत के बल जमीन से जुड़ते हैं
खुद को सही, गलत औरों को कहा- पाला शौक़ीन
आक्रामक ज्यों दौड़े सारमे मिल-भौंक
दूर पंक से निर्मल चन्द्रमा रखें सही सलाह...
*
दुर्योधन पर विदुर कर नियंत्रण कैसे पाया जाएगा?
शकुनि बिन सुविधाये जी सलाह कैसे??
धर्मराज की अनदेखी लाख, पार्थ-भीम भी मौन
कृष्ण नहीं तो पीर सखा की नई इच्छा कौन?
तल मिले विनाश, सज्जन ही सदा करो...
*
वे भक्त का वैज्ञानिक कुदृष्टि उमा पर रेखा दर्शनन
दबे अँगूठे के नीचे तब स्तोत्र रचे मनभावन
सच जानें महेश लेकिन वे नहीं अन्य लीला
रामते राम, रहे फिर भी सिया-आँचल
सात को वनवास क्यों? असत वाग्मी क्यों गहे पनाह?...
*
कुसुम न काँटों से उछले, तब देव-शीष पर चढ़ता
सलिल न पत्थर से लड़ता तब उदय पूजता
धाँक हँसे घन श्याम, बोरा राकेश न ध्यान देता है
घट-बढ़कर भी बाँट चन्द्रिका, जग को दे शोभा
जो गहरा वे शांत, मिले कब किसके मन की थाह...
*
22-4-22-44
***
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
201-2015
***
लघु कथा
शब्द और अर्थ
*
शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त कर लिया...कमर सीधा कर लूँ, झुका हुआ लेता था कि काम के महीने में कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के ग्रुप में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गये थे। चश्मा लगाए पढ़ें, वे शब्द थे 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र'।
शब्द कोशकार चौका - 'अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने सोचा कि यथास्थान रखा गया था, हथियार ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ कह गए हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। पेज तंत्र में तंत्र के लिए पेज की कोई चीज़ नहीं है। गन विकसन गन तंत्र की अवधारणा ही संभव नहीं है। जन गण मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश के सारे साधन को तंत्र के सुख के लिए तैयार कर रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक बाजार होता हुआ कहा।
0-7-
***
विवाद सलिला:
शिव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तूमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हँसी)
*
एकादश रुद्रों के आधार पर बारह मात्राओं के छंदों को 'रुद्र' परिवार का छंद कहा गया है। शिव खण्ड भी रूद्र परिवार का खण्ड है जिसमें 11 मात्राएँ हैं। तृतीय, छठवीं तथा नवमी मात्रा का लघु होना आवश्यक है। शिव छंद की मात्रा 3-3-3-3-2 होती है।
छोटे-छोटे चरण और दो चरणों के समान तुक शिव चंद को गति और लालित्य से समृद्ध करता है। सुमिनी की सलिल धर की तरंगों के सतत प्रवाह और नरंतर प्रभाव की सी विशेषता युक्त शिव छंद की विशेषता है।
शिव छंद में अनिवार्य रूप से तीसरी, छठवीं और नवमी लघु मात्रा के पहले या बाद में 2-2 मात्राएँ होती हैं। ये एक गुरु या दो लघु हो सकते हैं। नवमी मात्रा के साथ चारणों में दो लघु जुड़ते हैं नगण, एक गुरु जुड़ते हैं आठवीं मात्रा पर सगण और गुरु होते हैं पर रागन होता है।
सामान्यतया दो चरणों में दो चरणों का होना आवश्यक नहीं है। मूलतः छंद के चार चरणों में लघु, गुरु, लघु-गुरु या गुरु-लघु के आधार पर 4 उपभेद हो सकते हैं।
उदाहरण:
1. चरणांत लघु:
हम कहीं भी रहें सनम, हो कभी न आँख नम
दूरियाँ न कर दूरियां, दूर-होंगे हम
2. चरणान्त गुरु:
आप साथ हो सदा, मोहती रहे अदा
एक मैं नहीं रहूँ, भाग्य भी रहा फ़िदा
3. चरणान्त लघु-गुरु:
शिव-शिव सदाय रहें, जगंन्त रहे अभय
पूत भक्ति भावना, पूर्ण शक्ति कामना
4. चरणान्त गुरु लघु:
हाथ-हाथ में लिए, बाएं मुश्ती लब सिये
उन्नत सर-मथ राख, चाह-रह निज परख
------
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
२६.१.२०१३ ***