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बुधवार, 13 मार्च 2024

मानस-प्रवचन १, रामकिंकर उपाध्याय

स्मरण : युगतुलसी
मानस-प्रवचन १ 
पद्मभूषण रामकिंकर उपाध्याय जी 
*
''सुनि मुनीसु कह बचन संप्रीतौ। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम विरस सेवक सुखदाता॥

जाइ देखि आवहु नगर, सुख निधान दोउ भाई।
करहु सुफल सबके नयन, सुन्दर बदन दिखाई।। १/२१७।७

भगवान्‌ श्री रामभद्र की महती अनुकम्पा ओर श्री बसन्त कुमार जी बिड़ला, सौजन्यमयी श्री सरलाजी बिड़ला के स्नेह और आग्रह से प्रति वर्ष की परम्परा इस बार भी आज प्रारम्भ होने जा रही है। मुझे विश्वास है कि प्रति वर्ष की भाँति आप एकान्त और शान्त चित्त से मानस के इस ज्ञान-यज्ञ में भाग लेंगे। पिछले वर्ष बालकाण्ड के अहल्योद्धार-प्रसंग का समापन किया गया था और विशेष रूप से रामनवमी के संदर्भ मे भगवान्‌ राम के प्राकट्य का क्या तत्व है, इसकी चर्चा कौ गई थी। प्रवचन के आरम्भ में उद्धृत पंक्तियों के अनुसार अह्यो द्वार के पश्चात्‌ भगवान्‌ श्री राम जनकपुरी में महर्षि के पास बैठे हैँ। श्री लक्ष्मणजी के हृदय में नगर-दर्शन की उत्कण्ठा है पर वे संकोच ओर भय के कारण कह नहीं पाते। उन्होंने प्रभु की ओर देखा और प्रभु उनके अंतर्मन बात समझ लेते हैं, और वे महर्षि विश्वामित्र की ओर देखते हैं। महर्षि विश्वामित्र ने प्रभु से पूछा, क्या आप कुछ कहना चाहते हैं? भगवान्‌ श्री राम ने कहा कि गुरुदेव, लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, पर आपके भय ओर संकोच के कारण वे कह नहीं पा रहे हैँ। यदि आप, आज्ञा दें तो मैं उन्हें नगर दिखा लाऊँ? भगवान्‌ राम के उक्त वाक्य को सुनते ही महर्षि विश्वामित्र सर्वथा भावविभोर हो जाते हैं और वे श्री राम को एक उपाधि देते हैँ ओर वह उपाधि बड़े महत्व की है। महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि राघवेन्द्र! तुमने मुझ से जो कुछ पूछा है वह तो सर्वथा तुम्हारे उपयुक्त ही दै; क्योंकि वस्तुतः तुम तो धर्मसेतु के संरक्षक हो। यहाँ महर्षि विश्वामित्र दारा श्रीराम को धर्मसेतु के संरक्षक की उपाधि दी गई और ठीक इससे मिलती-जुलती उपाधि गुरु वशिष्ठ द्वारा चित्रकूट की भूमि में भगवान्‌ श्री राम को दी गई थी। इस पंक्ति में जहाँ भगवान्‌ श्री राम को धर्म सेतु के संरक्षक के रूप में स्मरण किया गया है वहाँ गुरु वशिष्ठ चित्रकूट में कहते हैं कि वस्तुतः तुम स्वयं मूर्तिमान धर्मसेतु हो,

'धर्म सेतु करुनायतन कस न कहु अस राम।'
लोग दुखित दिन इ दरस देखि लहहुँ विश्राम ॥\ २।२४८

वस्तुतः तुम तो धर्म के मूर्तिमान सेतु हो और इसका यत्किंचित्‌ विस्तार अरण्यकाण्ड में हुआ। सेतु पुल को कहते हैं। बहुधा हम जब पुल की कल्पना करते हैं तो नदी के ऊपर पुल है, ऐसी कल्पना करते हैं। श्री राम को ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र ने सेतु के रूप में स्मरण किया ओर उसका स्पष्टीकरण करते हैं सुतीक्ष्णजी। वे कहते हैं कि आप केवल नदी के सेतु नहीं, अपितु अति नागर भव सागर सेतु है। अतः, भगवान्‌ श्री राम न केवल सेतु हैं अपितु सुतीक्ष्णजी के शब्दों में वे वस्तुतः संसार-सागर के सेतु हैं। सेतु का यह प्रतीक गोस्वामीजी को. बहुत प्रिय है। यदि नदी को पार करना हो तो भी सेतु का बड़ा महत्व है। नदी को पार करने के लिए एक समर्थ व्यक्ति उसे तैरकर भी पार कर सकता है, कुछ लोग कर भी लेते हैं, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति तैरकर उस पार नहीं जा सकता। यदि तैराकी का पौरुष प्रदर्शन हो तो उसके निमित्त व्यक्ति तैरकर पार जाता हे किन्तु साधारणतः नदी पार होने के लिए कोई तैराकी का आश्रय नहीं लेगा; क्योंकि स्वाभाविक है कि यदि व्यक्ति तैरकर नदी पार करने की चेष्टा करेगा तो उसके वस्त्र भीग जाएँगे और वह्‌ कोई सामान लेकर नहीं जा सकेगा किन्तु जहाँ तक समुद्र को पार करने का प्रश्न है वहाँ तो तैराकी का कोई महत्व ही नहीं है- 'ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। परि पार चार्हाह जड़ करनी ।॥। ७।११४।४

गोस्वामीजी ने कहा कि वह तो कोई महान मूर्ख ही होगा जो समुद्र को तरकर पार करना चाहे । ऐसी स्थिति में नदी अथवा समुद्र को पार करने के लिए व्यक्ति नौका या जहाज का आश्रय लेता है, लेकिन उसकी भी सीमा है। एक तो नौका की सामर्थ्य कितनी है, कितने यात्रियों को वह नौका ढो सकती है, उसका चालक कितना कुशल है और इतना होने पर भी सीमित संख्या में ही कोई कुशल नाविक लोगों को नदी के पार उतार सकता है। नदी अथवा समुद्र को पार करने का तीसरा माध्यम जो सर्व श्रेष्ठ माध्यम है, वह है सेतु। सेतु का अभिप्राय यह है कि जब नदी पर पुल का निर्माण कर दिया जाता है तो फिर निर्बाध गति से प्रत्येक व्यक्ति उसके माध्यम से इस पार से उस पार पहुँच सकता है और दोनों पार के व्यक्ति एक-दुसरे के पास सरलता से आ-जा सकते हैं। गोस्वामी जी इसको इस अर्थ में लेते हैं कि नौकाके द्वारा बहुत होगा तो कुछ व्यक्ति पार होंगे लेकिन जब सेतु का निर्माण हो जाता है तो एक विशेषता और आ जाती है:

'अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराह ।
चढ़ि पिपीलिकऊ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहि ॥१।१३

आप तो नाविक या मल्लाह को उतराई देकर नाव से पार उतर सकते हैं, पर नन्ही-सी चींटी यदि पार होना चाहे तो कैसे पार हो? उसे तो मल्लाह ले जाकर नाव पर नहीं बैठानेवाला है। अतः, सेतु की सबसे बड़ी विशेषता यह्‌ है कि उसके माध्यम से न केवल मनुष्य, पशु ओर पक्षी ही नहीं जो अत्यन्त क्षुद्र जन्तु है, बिलकुल नन्हीं सी चींटी भी पार हो जाती है। यह चींटी लघुता की प्रतीक है और इसका अभिप्राय यह्‌ है कि पार होने का माध्यम इतना महत् हो कि उसका लाभ केवल कुछ व्यवितयों को प्राप्त न हो अपितु नन्हें से नन्हा प्राणी भी उसके द्वारा दूरी को पार कर सके। इस दृष्टि से गोस्वामीजी सेतु को सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मानते हैं। भगवान् श्री राम को जब यह उपाधि दी गई कि श्री राम सेतु हैं तो मैं यही कहूँगा कि भगवान राम के व्यक्तित्व की इससे बढ़कर कोई सार्थक व्याख्या नहीं हो सकती। लंका और भारत के बीच विशाल समुद्र लहरा रहा है और उस समुद्र को पार करने की समस्या है। यदि श्री राम के ईश्वरत्व पर विचार कर मानस-प्रवचन करें तो पार होने की कोई समस्या नहीं है लेकिन जहाँ एक ओर रामचरितमानस में बार-बार आग्रहपूर्वक कहा गया है कि श्री राम ईश्वर है, वहाँ उतने ही आग्रह से यह भी कहा गया है कि श्री राम ईश्वर होते हुए भी नर-लीला करते हैं, मानव-लीला करते हैँ -'चरित करत नर अनुहरत'। और उसका उद्देश्य भी यही है 'संसृति सागर सेतु'। संसार सागर पर सेतु का निर्माण करने के लिए भगवान्‌ मानवीय चरित्र का आचरण प्रकट करते हैं । भगवान्‌ श्री राम द्वारा समुद्र पार करते समय समस्या क्या है? एक तो यह कि भगवान्‌ श्री राम अकेले नहीं हैं। अगणित बन्दर इस समुद्र को पार करने के लिए उनके साधन हैं और श्री राम को सारे बन्दरों को भी पार ले जाना है। ऐसी स्थिति में भगवान्‌ श्री राम् अपने व्यक्तित्व का एक बड़ा विलक्षण पक्ष सामने रखते हैं। सेतु को केवल इसी अर्थ में मत लीजिए कि उन्होंने लंका और भारत के बीच बहुत बड़े सेतु का निर्माण किया अपितु भगवान् राम के व्यवितत्व पर इस दृष्टि से विचार करके देखिये कि जैसे नदी के दो किनारे हैं ओर दोनों किनारों की दूरी के कारण इस पार और उस पार के व्यक्ति एक-दूसरे से सरलता से नहीं मिल पाते, और कही-कहीं तो यह दूरी समद्र के समान इतनी विशाल प्रतीत होती है कि लगता है इस दूरी को तो किसी तरह से पाटा ही नहीं जा सकता। दूरी की यह समस्या समाज में सर्वदा रही है। यह व्यक्ति के जीवन में भी रहती है ओर समाज के जीवन में भी रहती है । समाज की तुलना यदि नदी से करें तो समाज के दोनों वर्ग एक-दूसरे से दूर और एक-दूसरे से मिल नहीं पाते। फिर भले उसे आप 'जन' ओर 'बुध' कह लें। रामचरितमानस की विशेषता बताते हुए गोस्वामी जी इसके लिए शब्द चुनते हैं- 'बुध विश्राम सकल जन रजनी।'

अगर समाज नदी की तरह है तो उसका एक किनारा 'जन' ओौर दूसरा किनारा 'बुध' है। एक ओर विद्वान्‌ है तो दूसरी ओर साधारणः समझवाला व्यक्ति है; एक ओर धनवान है तो दूसरी ओर निर्धन है; एक ओर बलवान है तो दूसरी ओर निर्बल व्यक्ति है। इतना ही नहीं, विचार के क्षेत्र में भी व्यक्ति-व्यक्ति के बीच दूरी पाई जाती है। एक महापुरुष की विचार-धारा है तो दूसरे महापुरुष की विचारधारा कुछ और है । भावनाओं में भी परस्पर दूरी दिखाई देती है। कभी-कभी तो एक ही परिवार में रहनेवाले व्यक्ति परस्पर भावना की दृष्टि से एक-दूसरे से दूर दिखाई देते हैं और व्यवहार में तो पग-पग पर दूरी का दर्शन होता है। ऐसी परिस्थिति में समाज में या जीवन में, बल्कि समाज और जीवन में ही नहीं हम तो यों कहेंगे कि अपने ही भीतर इतनी बड़ी दूरी है कि उस दूरी को हम पूरा नहीं कर पाते। हमारे ही मन और बुद्धि में इतनी दूरी पाई जाती है कि अगर बाहर की दूरी को छोड़कर अपने ही भीतर की दूरी पर विचार करें तो ऐसा लगने लगता है कि अरे! हम बाहर की दूरी क्या पारकरेंगे जबकि अपने भीतरवाली दूरी को ही पार नहीं कर पा रहे हैं। स्वयं अपने में ही, अपनी बुद्धि में हम जिसे सत्य समझते हैं, उसे हमारा मन स्वीकार नहीं करता । मन और बुद्धिके बीच हमारा अहंकार ऐसा लहरा रहा है कि उसे पारकर पाना सम्भव नहीं।

ऐसी परिस्थिति में आन्तर जीवन और बाह्य जीवन में दूरी को कैसे दूर किया जाए, यह्‌ बड़ी समस्या है। इस दृष्टि से भगवान्‌ राम के अवतार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान्‌ राम किसी एक किनारे के व्यक्ति नहीं है, भगवान्‌ राम किसी एक विचारधारा के समर्थक नहीं और न वे किसी एक वर्ग के समर्थक हैं अपितु जैसे सेतु का कार्यं नदी के दोनों किनारों को एक-दूसरे से मिला देना है उसी प्रकार भगवान्‌ राम के व्यक्तित्व का अनोखापन यही है कि चाहे भावना का क्षेत्र हो, चाहे विचार का क्षेत्र हो, चाहे व्यवहार का क्षेत्र हो, जहाँ भी दूरी है वहाँ भगवान् राम का व्यक्तित्व सबके बीच सेतु बनकर मिलाने का काम कर रहा है। सेतु-निर्माण तो बाद में हुआ। पहले रामचरितमानस मे संकेत आता है कि भगवान्‌ श्री राम मंत्रिमण्डल के सामनेप्रश्न रखते हैँ कि इस विशाल समुद्र को कैसे पार किया जाए। इस पर विभीषण जो कि समय पहले ही आए थे और जिन्हें थोड़ी देर पहले मंत्रिमण्डल मे सम्मिलित किया गया था, उत्साह् में भरे हुए कहते हैं कि महाराज, मैं तो यह समझता हूँ कि समुद्र आपका कुलगुरु है ओर यदि आप उसे प्रसन्न करें तो उसके द्वारा ही किसी-न-किसी एसे उपाय का पता चलेगा जिससे सरलता से सेना पार हो जाएगी, इसलिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग यही है :

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि 
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ ५।५० ६ 

लेकिन फिर वही दूरीवाली बात आ गई। समुद्र की दूरी तो बाद में आती है पहले तो व्यक्तिओं की दूरी है। भगवान्‌ राम ने तो विभीषण का यह वाक्य सुनते ही तुरन्त उनका समाधान करते हुए कहा : 

सखा कहौ तुम्ह नीक उपाई। करिअ देव जौ होई  सहाई। ५/५०/१ 

मित्र! तुमने तो बहुत सुन्दर उपाय बताया और उसके साथ एक वाक्य प्रभु ने और जोड़ दिया कि “अगर देव सहायक होगा तो सफलता मिलेगी", जिससे ऐसा लगा कि विभीषण के समान भगवान राम शान्ति-नीति के समर्थक हैं, देववाद के समर्थक हैं या नियति की प्रबलता को स्वीकार करते हैं पर उसी समय बोल पड़े लक्ष्मण। फिर लक्ष्मण ओर विभीषण के व्यक्तित्व की दूरी को क्या आप साधारण दूरी समझते हैं? भगवान् राम के सामने दो भाई हैं- एक अपना भाई ओर एक शत्रु का भाई। संयोग से लक्ष्मण भगवान राम के छोटे भाई हैं तो विभीषण उनके शत्रु रावण का छोटा भाई है किन्तु दोनों भाइ्यो में हर दृष्टि से बड़ा अन्तर है। दोनों की पद्धति ही बिल्कुल अलग है। लक्ष्मण यदि भ्रातृ प्रेम के अनुपम प्रतीक है तो विभीषण को भ्रातृ-प्रेम की दृष्टि से कभी आदर्श नहीं माना गया बल्कि गोस्वामीजी तो दोहावली रामायण में कहते हैं कि लंका से लौटने के पश्चात्‌ भगवान राम ने जब भरत का विभीषण से परिचय कराया ओर भरत प्रेम से विभीषणसे मिलने के लिए चले तो उस समय विभीषण जी ने मन में बहुत संकोच अनुभव किया। गोस्वामीजी कहते हैं : 

राम सराहे, भरत उठि मिले राम सम जानि। 
तदपि विभीषण कीसपति तुलसी गरत गलानि ॥ दोहावली, २०८

यद्यपि भगवान्‌ राम ने उनका प्रशंसापूर्ण परिचय दिया था और भरत जी ने भी उसका सम्मान किया पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उनके अन्तमन मे कहीं-न-कहीं अपने भाइयों का विरोध करने के कारण ग्लानि को भावना काम कर रही है। लक्ष्मणजी भगवान् राम का किसी भी परिस्थिति में परित्याग नहीं करते जबकि विभीषण के जीवन में उस प्रकार की विचारधारा नहीं थी। इतना ही नहीं विचार अथवा भावना की दृष्टि से भी दोनों में सर्वथा दूरी है। अगर विभीषण दैववाद के समर्थक हैं तो लक्ष्मणजी के जीवन में दैव कहीं निकट फटकने भी नहीं पाता। वे तो शुद्ध पुरुषार्थवादी हैं, पुरुषार्थं के समर्थक हैं, अतः उन्होंने भगवान राम की बात का विरोध करते हुए तुरंत कहा : 

मंत्र न यह लछमन मन भावा, राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥ 
नाथ देव कर कवन भरोसा ५।५०।२ 

जो अनिर्चित है उस पर क्या व्यक्ति को विश्वास करना चाहिए? दैव का अभिप्राय उसके भरोसे बैठ अनिश्चितता को स्वीकार कर लेना है : ''नाथ दैव कर कवन भरोसा।'' जो पुरुषार्थविहीन व्यक्ति हैं वे देव का आश्रय लेते हैं पर आपके हाथ में यह धनुष-बाण किसलिए है? पुरुषार्थं का प्रतीक आपने यह शस्त्र उठा लिया है। ऐसी स्थिति में आप दैववाद का समर्थन कर रहे हैं : 

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिञ सिधु करिअ मन रोसा ॥ ५।५०/२ 

यहाँ दो व्यक्ति आमने-सामने हैं पर पास होते हुए भी वे कितने दूरहैं, विचार की दृष्टि से, भावना की दृष्टि से किन्तु भगवान् राम किसके पक्ष में हैं? भगवान्‌ राम किस किनारे पर हैं?  भगवान राम किनारे पर नहीं है, वे तो दोनों किनारों को जोड़नेवाले है, सेत्‌ सेतु हैं। अतः, भगवान राम की जो सेतु-वृत्ति थी वह तुरत प्रकट हो गई। हो सकता था भगवान्‌ राम लक्ष्मणजी की बात स्वीकार कर लेते ओर कह देते कि तुम बिल्कुल ठीक कहते हो, हम धनुष-बाण के द्वारा समुद्र को पार करेंगे अथवा यह कह देते कि नहीं, देव ही सब कुछ है और  विभीषण ने बिलकुल ठीक कहा है; अतः, मैं उनकी बात को स्वीकार करूँगा परन्तु भगवान राम ने दोनों को जोड़ दिया। जोड़ने का तात्पर्य यह है कि जहाँ भी दूरी है, उस दूरी के बीच कहीं कोई एकता है या नहीं, इस पर विचार कीजिए। 

हमारी दृष्टि दूरी पर तो जाती है पर हममें वह कला नहीं है कि हम यह ढूँढ सकें कि दूरी के बीच एकता का कोई तत्त्व है या नहीं? जैसे मान लीजिए कि 'बुध' है ओर 'जन' है, इसलिए यह हो सकता है कि बुध ओौर जन में समझ की दृष्टि से अन्तर हो, क्षमता का अन्तर हो पर क्या कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है कि बुध ओर जन दोनों समान हों? अगर आप ऐसे क्षेत्र की खोज करेंगे तो आपको कुछ कम क्षेत्र नहीं मिलेगा। भूख के क्षेत्र में, प्यास के क्षेत्र में, मानसिक उपलब्धि के क्षेत्र में बुध ओर जन दोनों की वृत्ति समान है। ऐसा नहीं है कि बुध सुख न पाना चाहता हो और जन सुख पाना चाहता हो। अतः, इसका अभिप्राय यह है कि दोनों का जो केन्द्र है उसे जोड़ने की कला जो जानता हो वही सच्चे अर्थो मे अपने व्यक्तित्व के द्वारा सेतुत्व का निर्माण कर सकता है। भगवान्‌ श्री राम लक्ष्मण जी और विभीषण के कथन को इस दृष्टि से नहीं देखते कि दोनों के मत अलग-अलग हैं बत्कि वे इस दृष्टि से विचार करते है कि दोनों के अन्तःकरण में मेरे प्रति समान रूप से प्रगाढ़ प्रेम है। विभीषण जो सम्मति दे रहे है उसके पीछे भगवान्‌ श्री राम के प्रति अपार प्रेम और सद्‌भाव है, उनको ऐसा लगता है कि समुद्र को पार करने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग यही है और जो लक्ष्मण कह रहे हैं उसके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या?| उनके हदय में जितनी प्रीति, जितनी व्याकुलता है वह अद्वितीय है। यद्यपि दोनों अलग-अलग बात कह रहे हैं किंतु दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों के सामने सेतु को पार करने की समस्या है पर मतभेद इस बात पर है कि उसे पार कैसे किया जाए। इसलिए भगवान् श्री राम दोनों को जोड़ देते हैं। जब उन्होंने विभीषण का समर्थन और लक्ष्मण जी ने उनका विरोध किया तो उस समय विभीषण जी का मुँह कुछ उतर गया। एक तो वे नए-नए आए थे, यह्‌ पहली सम्मति थी, मंत्रिमण्डल में अभी-अभी सम्मिलित किए गए थे और लक्ष्मण जी जैसे तेजस्वी व्यक्ति ने जितने कठोर शब्दों में उनकी आलोचना की उससे विभीषणजी का मन थोड़ा छोटा हो जाए यह्‌ स्वाभाविक ही है। इससे उनके मन मे यही आया होगा कि वे अपने छोटे भाई को छोड़कर मेरी सम्मति को क्यों महत्त्व देंगे? लेकिन विभीषण का हृदय उस समय कितना विकसित हो गया, कितना आनन्दित हौ गया जब उन्होंने देखा कि भगवान राम ने उनके मत को स्वीकार कर लिया। शायद विभीषण इस बात को सोचकर चकित हो गए कि मैं सर्वथा नया व्यक्ति, शत्रु का छोटा भाई और ऐसी परिस्थिति में भी अपने छोटे भाई की तुलना में शत्रु के भाई के मत को इतना महत्त्व देना, इतना आदर देना श्री राम के अतिरिक्त शायद अन्य किसी के लिए सम्भव नहीं, पर लक्ष्मण को भी सन्तुष्ट करना भगवान्‌ राम जानते हैँ। अगर उन्होंने  विभीषणजी का समर्थन वाणी से किया था तो लक्ष्मण जी का समर्थन अपनी हँसी से किया। कोई बात पसन्द आ जाती है तो व्यक्ति को हँसी आ ही जाती है, यह आनन्द की अभिव्यक्ति है । लक्ष्मणजी की बात सुनकर मत तो स्वीकार कर रहे हैं विभीषण का पर उसके साथ ही जुड़ा हुआ है एक वाक्य और उस वाक्य के पहले: 'सुनत बिहसि,  पहले तो लक्ष्मण जी की बात सुनकर देर तक हँसते ही रहे, आनन्द लेते रहे और उसके पञ्चात तुरत बोले : 

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा ऐसहि करब धरहु मन धीरा ॥ ५/५०।५ 

भाई, यही करेंगे, थोड़ा धैर्य धारण करो । इसका अभिप्राय है कि भगवान्‌ श्री राम दोनों के मत का समन्वय करना जानते हैं। इसके लिए वे कष्ट उठाते हैं। उन्हें यह ज्ञात है कि विभीषण के बताए हुए मार्ग से विलम्ब होगा। भगवान्‌ श्री राम को लगता है कि तीन दिन का विलम्ब भले ही हो जाए पर दो व्यक्तियों की दूरी तो मिट जाएगी। इन दोनों में एक-दूसरे के प्रति मैत्री ओर स्नेह का उदय हो और सचमुच विभीषण के प्रति लक्ष्मण के मन में अपरिमित अपनत्व उदित हो गया। प्रारम्भ में इतना गहरा मतभेद ओर बाद में? यदि आप गीतावली रामायण पढ़ें तो उसमें वर्णन आता है कि लक्ष्मण जी को जो शक्ति लगी वह्‌ मेघनाद ने उन्हें लक्ष्य करके नहीं चलाई थी। वस्तुतः विभीषण को देखकर उसे क्रोध आ गया था और उसने सोचा कि यही व्यक्ति हमारे सारे कष्ट का कारण है, सारे रहस्य बतानेवाला है, इसलिए पहले इसे नष्ट किया जाए और बाद में इन दोनों राजकुमारों को देखूँगा। जब मेघनाद की फेंकी हुई शक्ति विभीषण की ओर चली तो उस समय कोई सामने नहीं आया । लेकिन धन्य हैं श्री लक्ष्मण। सचमुच श्री राम ने विभीषण को जितना महत्त्व दिया उससे उनके अन्तःकरण में ईर्ष्या उत्पन्न नहीं हुई। यदि किसी व्यक्ति के मत को अधिक महत्त्व दिया जाए तो कभी-कभी निकट के व्यक्तियों से भी दूरी आ जाती ह । संसार में अधिकांश व्यक्ति निकटवालों को भी दूर बनाने की कला में निपुण होते हैं। वे अपने व्यवहार से परिवार से, समाज में ओर निकटवालों में द्वेष की सृष्टि कर दूरी उत्पन्न कर देते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान राम के आसपास जितने व्यक्ति हैं उन सबके व्यक्तित्व में इतनी बड़ी दूरी है कि शायद वे कभी मिल ही न पाएँ, उनमे कभी समता न हो पाए पर भगवान राम की विशेषता है ऐसी प्रेरणा दे देना जिससे आज लक्ष्मण के मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि मेरे जीवित रहते विभीषण की मृत्यु नहीं हो सकती, मैं विभीषण को नहीं मरने दूँगा उन्होंने तुरत विभीषण को पीछे ढकेल दिया और उस शक्ति को अपनी छाती पर ले लिया। भगवान् श्री राम ने जब यह्‌ समाचार सुना तो लक्ष्मण के मूर्छित शरीर को हृदय से लगाकर प्रभु, ने आँसू भरकर यही कहा कि लक्ष्मण तुमने मेरा व्रत सार्थक कर दिया : 

मोरेपन की लाज यहाँ लगि निज प्रिय प्राण दये हैं। 
लागत सांग बिभीषण ही पर सीपर आप भये हैं \ विनयपत्रिका, ६।५ 

श्री लक्ष्मण ओर विभीषण के व्यवितित्व की दूरी मिटा देना ही सेतु का कार्य है। पत्थर का पुल बनाना उतना कठिन नहीं जितना कि व्यक्तियों के बीच की दूरी को पाट देना है। भगवान्‌ राम ने ऐसा ही समन्वय किया। वे समुद्र के किनारे अनशन करने के लिए बैठ गये.और अनशन भी किया तो कैसे किया- तीन दिन तक ञ्जनशन किया: बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति ॥ ५५७ और फिर- 'बोले राम सकोप तब।' शांति आवश्यक है कि क्रोध? आपको दोनों के समर्थक मिल जाएँगे । कुछ लोग इतने उग्रवादी होते हैं कि हर समय क्रोध का ही समर्थन करते हैं ओर कुछ लोग इतने शान्तिवादी होते है कि सर्वदा निष्क्रियता की ही बात किया करते है। इन दोनों में से भगवान राम किसके समर्थक हैं? वे तो सेतुहैं और सेतु का काम किसी एक के पक्ष मे रहना नहीं है। भगवान्‌ श्री राम तीन दिन तक प्रतीक्षा करते हैं और इसका अभिप्राय है कि जीवन में अगर दोनों वृत्तियाँ हैं तो शान्ति ओर क्रोध दोनों का सदुपयोग करना चाहिए और  उसका सदुपयोग यह् है कि हम शान्ति के द्वारा दूसरे के अन्तःकरण में प्रेरणा उत्पन्न करने की चेष्टा करें। अगर शान्ति के द्वारा कार्य सम्पन्न नहीं होता तो फिर रोष की भी आवश्यकता होती है। अतः, भगवान्‌ श्री राम ने तुरत कहा-  'बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब... ॥ १५/५७ 

ये शब्द भगवान्‌ राम के चरित्र के परिचायक हैं। दूसरा व्यक्ति श्री राम पर हँस सकता है कि अन्त में आपको भी तो क्रोध ही करना पड़ा पर भगवान् राम तोड़ने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए क्रोध कर रहे हैं। भगवान् राम का वाक्य बताता है कि उनका दर्शन बड़ा अनूठा है। व्यक्ति शान्ति चाहेगा समझौते के लिए ओर क्रोध करेगा तोड़ने के लिए किंतु भगवान्‌ राम कहते हैं कि मैं समुद्र पर क्रोध करूँगाक्योंकि : 'बोले राम सकोप तब भय बिनु होई न प्रीति ॥ ५/।५७' करनी तो प्रीति ही है पर कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो प्रीति से प्रीति नहीं करते, भय से प्रीति करते हैं। तो चलो भई, लक्ष्य तो हमारा भी प्रीति ही है, चाहे कोई भय से प्रीति करे, सद्भाव से प्रीति करे या चाहे प्रलोभन से प्रीति करे प्रीति का लक्षण है एक-दूसरे को जोड़ना। भगवान् राम उस समय लक्ष्मणजी की ओर देखते हैं और कहते हैं : 'लछमन बान सरासन आनू ।' ५/५७।१ लक्ष्मण जरा धनुष-बाण तो ले आओ।  लक्ष्मणजी बड़े प्रसन्न हुए और उनको बड़ा सन्तोष मिला कि चलो, भगवान्‌ राम ने अधिक समय नहीं केवल तीन ही दिन व्यतीत किए ओर चौथे दिन् माने । चौथे दिन के चुनाव का तात्पर्य यही है कि यदि सात दिनों का बँटवारा किया जाए तो तीन दिन एक ओर और तीन दिन दूसरी ओर होंगे। बीच का चौथा दिन ही ऐसा है जो दोनों के ठीक मध्य में रहता है। यह चौथे दिनवाली बात  बड़ी सार्थक है। भगवान्‌ श्री राम चौथे दिन ही क्रोध करते हैं और क्रोध करने के पश्चात कौन जीता-  विभीषण या लक्ष्मण? अगर भगवान्‌ श्री राम अनशन ही करते रह जाएँ तो समझ लीजिए कि विभीषण के मत पर स्थिर हो गए और यदि समुद्र को सुखा दें तो लक्ष्मण के मत की जीत हो गई किन्तु दोनों में से एक को थोड़े ही जिताना है, दोनों को जिताना है। और आगे लगा कि ये तो दोनों के समर्थक थे किन्तु बात तीसरी ही भगवान राम के मन में थी और दिखाई यह दे रहा था कि वे दोनों का समर्थन कर रहे हैं। इसका पता तब चला जब धनुष पर बाण चढ़ा दिया तो उसे सुखा देना चाहिए। लक्ष्मणजी का तो यही मत था, पर भगवान राम ने वैसा नहीं किया। धनुष पर बाण चढ़ा लिया, पर रुके हुए हैं। बस, ज्यों ही प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाया : 'संधानेउ प्रभु बिसिख कराला । उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ॥ मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने ॥ ५।५७/६''¦ भगवान्‌ श्री राम कै सामने प्रश्न है कि समुद्र को तो सुखाया जा सकता है किन्तु समुद्र के जलचर भी तो विनष्ट हो जाएँगे। विनष्ट कर देने की इस प्रक्रिया से केवल मेरे उद्देश्य की पूर्ति होगी, लेकिन कितने प्राणियों का व्यर्थ हनन होगा ! ये बेचारे किंस अपराध के दोषी हैं कि इन्हें विनष्ट किया जाए। समुद्र भयभीत होकर भगवान्‌ राम के सामने आ जाता है। 

उस समय भगवान राम और समुद्र के बीच जो वार्तालाप होता है वह बड़ा सार्थक वार्तालाप है। समुद्र ने भगवान राम से कहा कि महाराज, आपके हाथ में धनुष-बाण देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ओर विशेष रूप से जब कि आपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया है। क्या महाराज सचमुच आपने मुझे सुखाने के लिए बाण चढ़ाया है? समुद्र रहस्य को समझ गया था । समुद्र ने कहा कि महाराज! अगर आपने मुझे सुखाने के लिए ऐसा किया है, और लोग ऐसा समझते हों तो भी मैं नहीं मानता; क्योंकि मुझे सुखाने के लिए क्या आपको भी धनुष-बाण चलाना पड़ेगा? ईश्वर सृष्टि का निर्माण संकल्प से करता है, संकल्प से ही उसकी सृष्टि का विनाश हो जाता है। अतः, आपने चाहा और मेरा निर्माण हो गया और आप चाहेंगे तो मैं सूख जाऊँगा। महाराज! यदि आप सचमुच मुझे सुखाना चाहते होते तो केवल सोचते, धनुष पर बाण न चढ़ाते। इसी से पता चल गया कि आप नाटक ही कर रहे हैं और इससे अधिक कुछ नहीं कर रहे हैं। ठीक है, आपने अच्छा ही किया। आपने अच्छे अभिनय का परिचय दिया। लेकिन प्रभु! अगर आप मुझे सुखाना चाहें तो संकल्प से सुखा दीजिए। मानवीय लीला में आप मुझे सुखाना चाहें तो बाण से सुखा दीजिए, लेकिन एक उपाच और है। गोस्वामी जी कहते हैं कि समुद्र ने इतने मर्म की बात कही कि भगवान्‌ राम बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि समुद्र ने ऐसी बात कही जो श्री राम के व्यक्तित्व क दर्शन थी, व्यक्तित्व के अनुकूल थी। समुद्र ने कहा कि महाराज! आपके गौरव की महिमा और प्रतिष्ठा तब होगी जब आप संकल्प से मुझे सुखाकर सारी सेना को पार उतार दें, और दूसरा उपाय यह है कि आप मेरे ऊपर सेतु का निर्माण करें। समुद्र ने मानो उस महामन्त्र को पकड़ लिया जो भगवान राम का व्यक्तित्व है, उनके व्यक्तित्व का दर्शन है।आप मेरे ऊपर सेतु का निर्माण करें और सेतु के निर्माण में बंदरों  का ओर मेरा सहयोग लें।

अब एक ओर तो समुद्र स्वयं चंचल है, उसकी लहरें बड़ी तीव्र हैं और यदि उसमें कोई वस्तु डाली जाये तो लहर उसे दूर फेंक देगी ओर दूसरी ओर बन्दर भी अत्यन्त चंचल हैं, अत्यन्त क्षुद्र और अत्यन्त छोटे हैं पर समुद्र कहता है कि या तो आप मेरी और बन्दरों की सहायता से सेतु का निर्माण कीजिए और उसके माध्यम से सेना पार हो जाएँ या फिर दूसरा उपाय यह्‌ है कि आप मुझे सुखाकर चले जाइए । यदि आप मुझे सुखाकर चले जाएँगे तो इससे मेरा बड़प्पन नष्ट हो जाएगा। भगवान राम ने कौन सा मार्ग चुना? उन्होंने अपने बड़प्पन का मार्ग नहीं चुना। उनका जो प्रिय मार्ग था वही समुद्र ने बता दिया। भगवान्‌ श्री राम ने तुरत कहा कि आपने तो बड़ी सुन्दर बात कही, अब आप बताएँ कि सेना कैसे पार हो? उसके पश्चात भगवान श्री राम द्वारा समुद्र पर सेतु का निर्माण हुआ। एक तो समुद्र पर असम्भव को सम्भव करने की चेष्टा और असम्भव को भी साध्य बनाया उन बन्दरों के द्वारा जो कि हर दृष्टि से हीन माने जाते हैं।

कई बार लोग प्रश्न किया करते हैं कि भगवान्‌ राम लंका के विरुद्ध युद्ध करना चाहते थे तो उन्होंने अयोध्या से सेना क्यों नहीं बुला ली? भगवान श्री राम कोई उत्तर-दक्षिण का युद्ध थोड़े ही लड़ रहे थे। वस्तुतः, भगवान्‌ श्री राम तो यह बताना चाहते थे कि रावण शरीर की दृष्टि से जिनके सन्निकट है उनके और अपने बीच दूरी पैदा कर देता है। अपनों के बीच दूरी पैदा करना, दूसरों के बीच दूरी पैदा करना ही रावण की सबसे बड़ी सफलता है। अपने छोटे भाई विभीषण को अपने से दूर कर दिया ओर भगवान राम की प्रिया सीताजी को भी उनसे दूर करने की चेष्टा की। ऐसी स्थिति में भगवान्‌ राम तो यह बताना चाहते थे कि लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए किसी विशिष्ट व्यक्ति की आवश्यकता नहीं। इसका अभिप्राय है कि अगर विशिष्ट व्यक्ति के जीवन मे विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा कोई बड़ा काम ले लिया जाए तो यह्‌ सफलता नहीं। भगवान राम यह्‌ दिखाना चाहते थे कि जो क्षुद्र माने जाते हैं, चंचल माने जाते हैं वे, भी महान कार्य कर सकते हैं और सचमुच भगवान श्री राम ने समुद्र पर सेतु का निर्माण कराया बन्दरों के द्वारा किन्तु उसके बाद एक बड़ा विनोद-भरा प्रसंग आ गया। जब सेतु का निर्माण हो गया तो जाम्बवान जी ने कहा कि महाराज! सेतु तो बन गया पर समुद्र विशाल है, सेतु छोटा है, समय तो लगेगा सेना को पार होने में, पर लोग उतावले हो रहे हैं पार जाने के लिए। अतः, भगवान्‌ श्री राम ने एक सेतु का स्वयं ही निर्माण किया और वे उसका निर्माण करते हैं अपने सौंदर्य के द्वारा। रामचरित मानस में बताया गया है कि भगवान राम का नाम भी सेतु है, भगवान राम का रूप भी सेतु है, भगवान्‌ राम का चरित्र ओर भगवान की कथा भी सेतु है, भगवान्‌ राम का धाम भी सेतु है। अलग-अलग प्रसंगों में भगवान राम की उन विशेषताओं की सेतु के रूप में कल्पना की गई है और इसी प्रसंग में जाम्बवान जी ने भगवान्‌ श्री राम के लिए वाक्य जोड़ा : 'नाथ नाम तव सेतु नर चह भव सागर तरहि ॥ ६।०३ आपका नाम भी तो भव-सेतु है। इसके पश्चात्‌ राम के सौंदर्य का सेतु सामने आया। क्षत्रिय राम का सौन्दर्य कैसा है?जोड़ने वाला, मिलाने वाला है। भगवान्‌ राम जब पत्थर के पुल पर जाकर खड़े हुए तो समूद्र के जितने जलचर थे वे सबके सब ऊपर आ गए, अगर प्रभु श्री लक्ष्मणजी की बात मान लेते और समुद्र को सुखा देते तो जलचर नष्ट हो जाते लेकिन भगवान राम बताना चाहते थे कि लंका के युद्ध में ये जलचर भी सहायक बन सकते हैं जो बिलकुल अनुपयोगी लगते थे पर वे जल जन्तु भी इस युद्ध अभियान में सहायक बन सकते हैं, इसलिए भगवान्‌ श्री राम एक नये दृश्य का दर्शन कराते हैं : देखन कहूं प्रभु करुना कदा। प्रगट भये सब जलचर बदा ६।३।३ < >< तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी) मगन भए हरि रूप निहारी॥ ६/३।८ भगवान्‌ राम ने कहा कि मित्रो! अब तो पुल ही पुल है, चाहे जिधर से पार हो जाइए कोई समस्या नहीं है। कहीं जल दिखाई नहीं दे रहा है। बन्दर थोड़ा भयभीत हुए, क्योंकि उन्होंने अपने पुरुषार्थ से जो पुल बनाया था वह बड़ा सुदृढ़ लग रहा था, किन्तु जलचरोंका पुल भी पुल हो सकता है, इस पर सन्देह होने लगा। उनके मन में आशंका थी कि अभी तो ये जल-जन्तु ऊपर आ गये हैं पर पैर रखते ही अगर ये नीचे डूब जाएँ तो हम क्या करेंगे? भगवान राम ने कहा कि अच्छा, आप लोग परीक्षा करके देखिए, तो गोस्वामी जी ने लिखा : प्रभुहि बिलोकहि टरहि न टारे। ६।३/७ यही तो व्यक्तित्व का आकर्षण है। मनुष्यों का तो कहना ही क्या, पशु-पक्षी भी भगवान राम की ओर आकृष्ट होकर आ गए। यह वर्णन बीच में आया है, और फिर जलचरों के आकर्षण का उल्लेख किया गया है। जब भगवान राम को देखते हुए इन जलचरों के ऊपर पत्थर अथवा वृक्ष डाला जाता तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था : प्रभुहि बिलोकहि टरहिं न टारे। मन हरिषत सब भए सुखारे॥ ६।३/७ हृदय में इतना आनन्द आ रहा है उसका अभिप्राय क्या है? अभी तक जल में डूबे रहने वाले इस समय श्री राम के सौन्दर्यं के अमृत में दूबकर धन्य हो रहे हैं। भगवान राम ने कहा : अब सेना पार हो जाए। सेतु ब॑ध भई भौर अति कपि नभ पंथ उड़ाहि। अपर जलचर मँह ऊपर चढ़ि चढ़ि जाहि।। ६/४ जब प्रत्येक व्यक्ति मनमाने मार्ग से पार कर रहा था उस समय जांबवान जी से नहीं रहा गया, उन्होंने भगवान राम से कहा कि जब इतनी सरलता से आप इतना बढ़िया पुल बना सकते थे तो आपने बन्दरों से पुल क्यों बनवाया, इतना परिश्रम क्यों कराया? भगवान्‌ राम ने तुरन्त उत्तर दिया कि यह्‌ जो सेतु मैंने बनाया है, उसे आप लोगों ने देखा कि कहाँ बनाया है? आप लोगों ने ऊपर ही देखा, पुल देखा, किन्तु यह नहीं देखा कि वह क्यों-कैसे बना? मेरे मुख को आप लोगों ने देखा लेकिन मेरे चरण को नहीं देखा। अगर आप लोगों ने पत्थर का पुल न बनाया होता तो कहाँ खड़े होकर मैं नया पुल बनाता? इसका अभिप्राय है कि ईश्वर कहता है कि पहले अपने पुरुषार्थ का पुल बनाओ, उसके पश्चात्‌ कृपा का पुल हम बना देंगे। इतना आधार तो तुम दो भाई! जो क्षमता तुम्हें मिली हुई है उसका सदुपयोग तो तुम करो, फिर तुम्हारे संकल्प की आधार-भूमि पर खड़े होकर मैं निर्माण करूँगा और तिस पर प्रभु की विशेषता क्या है? अगर प्रभु अपने चमत्कार से सारे कार्य कर दें तो मनुष्य में निष्क्रियता आ जाएगी और सारे कार्य पुरुषार्थ से ही सम्पन्न हो जाने दें तो मनुष्य में अहंकार आ जाएगा । दोनों ओर बड़ा संकट है। अगर व्यक्ति हर समय सफल-ही-सफल होता रहे तो अहंकारी बने बिना नहीं रहेगा और व्यक्ति कुछ न करे और बिना कुछ किए ही सफल होता रहे तो निष्क्रियता आ जाएगी। अतः, भगवान राम दोनों का सन्तुलन करते हैं। पहले पुरुषार्थ कराते हैं और उसके पश्चात अपनी कृपा का दर्शन कराते हैं और कृपा के दर्शन के साथ-साथ प्रत्येक बन्दर के मन में यह्‌ भावना उत्पन्न कर देना चाहते हैं कि वह महान कार्य करने वाला है।

जब भगवान्‌ राम ने पुल पार किथा तो जाम्बवान जी का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट किया और कहा, जाम्बवान जी आपने देखा कि बन्दर तो मेरे बनाए पुल से पार हुए पर मैं तो आप लोगों के बनाए पुल से पार हुआ, इसलिए हमारा आपका नाता बराबरी का ही है। आप हमारे लिए सेतु बनायें, हम आपके लिए सेतु बनाएँ और इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के सन्तरण के माध्यम बन सके। भगवान श्री राम ने सेतु का निर्माण करा कर सेना को पार कर दिया और इसीलिए गोस्वामी जी ने सुन्दरकाण्ड के अन्त में जो फल का दोहा लिखा उसमें वे कहते हैं : सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहि ते तरहि भव सिंधु बिना जल जान। ५/६० सुन्दरकाण्ड की यह कथा जो सुने वह पार हो जाए। किसी ने कहा कि महाराज! यह तो रामायण भर में आपने बार-बार कहा कि पार हो जाए, पार हो जाए, यहाँ कोई नई विशेषता है वया? हाँ, एक विशेषता है : सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुर्नाहि ते तरहि भव सिंधु बिना जल जान॥। ५/६० जहाज के द्वारा समुद्र पार करते तो आपने देखा होगा पर क्या बिना जहाज के भी किसी को पार उतरते देखा है? इसका सांकेतिक तत्त्व है- जहाज । गोस्वामीजी ने नाव और मल्लाह का प्रतीक बनाया है। नाव है विद्या और विद्वान्‌ है मल्लाह : केवट बुध विद्या बड़ नावा। २।२७५।४ विद्या बड़ी नौका है भौर बुध जन मल्लाह है। मगर संकेत यह है कि जब तक समुद्र को जहाज या नौका के द्वारा पार करना है तब तक बुध ओर विद्यावाला व्यक्ति ही हमें पार उतार सकता है, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन गोस्वामीजी विश्वास दिलाते हैं कि आप समुद्र को पार कर लेंगे पर अब आपको जहाज की आवश्यकता नहीं। मानो गोस्वामीजी संकेत करना चाहते हैं कि जब श्री राम स्वयं सेतु का निर्माण कर रहे हैं तो क्या आवश्यकता है कि हम जहाज ढूँढें, क्या आवश्यकता है कि हम नौका को या मल्लाह को ढूँढें। श्रीराम के व्यक्तित्व के सेतु के माध्यम से- चाहे वह नाम का सेतु हो, चाहे रूप का सेतु हो, चाहे चरित्र का सेतु हो- हम इस दूरी को पार कर सकते हैं। अगर गोस्वामीजी की आध्यात्मिक भाषा में कहें तो मनुष्य के अन्तःकरण में : अभिमान सागर भयंकर घोर विपुल अवगाह दुस्तर अपारम्‌। विनयपत्रिका, ५८।। देहाभिमान का समुद्र लहरा रहा है। गोस्वामीजी कहते हैं कि श्री राम का जो चरित्र है, व्यक्तित्व है उससे बढ़कर इस कार्य को करने में कोई सफल नहीं। गुरु विश्वामित्र और वरिष्ठ जनों द्वारा इन दोनों उपाधियों के दिए जाने के पीछे तात्पर्य है कि शिष्य को योग्यता का प्रमाणपत्र तो गुरु ही दे सकता है और ये दोनों बड़े कड़े परीक्षक हैं। गुरु वशिष्ठ जितने कड़े परीक्षक हैं उससे सौ गुना अधिक कड़े परीक्षक हैं विश्वामित्र जी। पर दोनों के मुँह से श्री राम के लिए एक ही उपाधि निकली। दोनों ने कहा कि श्रीराम तुम तो सेतु हो। वस्तुतः, जब दोनों ने भगवान राम को सेतु कहा तो यह गुरु के रूप में भगवान श्री राम के व्यक्तित्व की व्याख्या थी।

हम चाहें तो यों भी कह सकते हैं कि इन दोनों महापुरुषों के मन में एक ही बात क्यों आई? उसका रहस्य यह था कि ये दोनों महात्मा भी नदी के दो किनारों की तरह एक-दूसरे से इतनी दूर थे कि अगर भगवान राम सेतु के रूप में न आते तो ये दोनों मिल ही न पाते। विश्वामित्र और वशिष्ठ के संघर्ष के बारे में आपने पुराणों में पढ़ा होगा, सुना होगा। इतना बड़ा झगड़ा- दो महापुरुष, दोनों महान तपस्वी, दोनों योग्य पर इसका अभिप्राय क्या है? दोनों के बीच बड़ी भारी दूरी थी और वह दूरी इतनी बदी थी कि एक ओर तो रावण द्वारा समाज में अत्याचार हो रहा था और दूसरी ओर इतने बड़े-बड़े महापुरुष थे, जिनमें तपस्या की इतनी बड़ी शक्ति थी पर जो आपस में संघर्षशील थे। चुनाव भी भगवान श्री राम ने कैसा किया- गुरु बनाया तो एक को नहीं, दो को बनाया जो आपस में विरोधी थे। विश्वामित्र और वशिष्ठ में इतना विरोध है, पर भगवान राम से पूछा जाए कि आपके गुरु कौन हैं तो वे एक ओर गुरु वरिष्ठ के चरणों में देखते हैं और दूसरी ओर विश्वामित्र के। जब भगवान राम सीताजी से विवाह करके लौटे तो उसका सबसे बड़ा आनन्द यह था कि उक्त दोनों महात्मा भी साथ-साथ अयोध्या लौटे। इन दोनों महात्माओं का अयोध्या में मिलन इस सेतु के माध्यम से हुआ और सबसे अधिक आनन्द कब आया? विश्वामित्र जी चाहते थे कि एक बार वशिष्ठजी जीवन में मुझे ब्रह्मर्षि कह दें और वशिष्ठजी इस विषय में इतने दृढ़ और कठोर बने हुए थे कि सारा संसार कह दे किन्तु मैं नहीं कहूँगा। इतना विरोध कि अपनी तपस्या की शक्ति दिखाने के लिए विश्वामित्र ने क्रोध में आकर वशिष्ठ के पुत्र को जला दिया। जरा कल्पना कीजिए कितनी बड़ी दूरी दोनों में उत्पन्न हो गई होगी। कितनी ही दुर्घटनाएँ हुईं इस बीच जिनकी अनगिनत गाथाएँ पुराणों में हैं लेकिन आज क्याहै? विवाह के दूसरे दिन जब अयोध्या लौटकर आए तो सभा में गुर वशिष्ठ कथा सुनानेवाले आसन पर बैठे। लोगों ने सोचा कि आज गुरुदेव शायद विवाह की कथा सुनाएँगे कि कैसे जनकपुर में श्री राम-सीता का विवाह सम्पन्न हुआ किन्तु गोस्वामीजी ने कहा कि वशिष्ठजी ने आज विवाह की कथा नहीं सुनाई बल्कि : सुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बशिष्ठ बिपुल बिधि बरनी॥ १।२३५८/६ विश्वामित्रजी का चरित्र सुनाने लगे। बोले : विवाह में सारा श्रेय तो महर्षि विश्वामित्र जैसे सन्त को है। इन्हीं के द्वारा विवाह सम्पन्न हुआ और वे कितने महान तपस्वी हैं कि इतना महान कार्य किया। जो तीन अक्षर का एक शब्द नहीं कह पाता था वह कथा के आसन पर बैठकर लगा भूरि-भूरि प्रशंसा करने। सारी अयोध्या में आनन्द छा गया। लोग प्रसन्न हुए कि दो महापुरुषों में जो दूरी थी आज वह मिट गई किन्तु सबसे अधिक आनन्द आया : सुनि आनन्दु भयउ सत॒ काहू । राम लखन उर अधिक उछाहू॥ १/३५०८/८ भगवान राम ने लक्ष्मण की ओर और लक्ष्मण ने भगवान की ओर देखा। दोनों का संकेत यह था कि जैसे हम दोनों की जोड़ी है इसी तरह दोनों गुरुओं की भी जोड़ी बन गई। चलो, अब झगड़े की कोई बात नहीं रही। हमारे-तुम्हारे स्वभाव में भी तो भिन्नता है। अगर बहिरंग दुष्ट से होता तो हममें-तुममें बड़ी दूरी होती पर हम दोनों में जैसे दूरी नहीं, स्नेह है जो हम दोनों को जोड़ हुए है उसी प्रकार आज हमारे दोनों गुरु भी स्नेह-बन्धन में आबद्ध हो गए। सचमुच श्री राम॒ का सेतुत्व अनोखा है। भगवान राम तो जहाँ गए उन्होंने इस प्रकार से सेतु बनाकर सारे समाज को एक- दूसरे के निकट ला दिया। इसकी चर्चा हम अगले प्रवचन में करेंगे।

॥ श्री रामः शरणं मम ॥

मार्च १३, सॉनेट, शिव छंद, कठपुतली, भज गोविन्दम्, प्रेम, होली, दोहा गीत, चुनाव, लघुकथा, तुम, नवगीत, युगतुलसी

सलिल सृजन १३ मार्च
*
स्मरण युगतुलसी 
शिव (समानिका) छंद

लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, ३ री, ६ वी, ९ वी मात्रा लघु, मात्रा बाँट ३-३-३-२, चरणान्त लघु लघु गुरु (सगण), गुरु गुरु गुरु (मगण) या लघु लघु लघु (नगण), तीव्र प्रवाह।
लक्षण छंद:
शिव-शिवा रहें सदय। 
रुद्र जग करें अभय। 
भक्ति भाव से नमन 
माँ दया मिले समन। 
(संकेत: रुद्र = ११ मात्रा, समन = सगण, मगण, नगण/अच्छे मन से)
अवधनाथ भीति हर
कर कृपा करें निडर
चरित राम का सुमिर। 
गुरु कहें बखान कर। 
पढ़ सुनें गुनें सतत। 
हम सभी रहें विनत।। 
साध्य है नहीं जगत। 
इष्ट है नहीं विगत
भज सदा रमारमण। 
कर वृथा न एक क्षण।। 
चरण धूलि माथ धर। 
सकल पाप त्याग तर।। 
राम नाम है सुखद।
श्याम नाम है वरद।। 
एक राम-श्याम द्वय। 
जो भजे रहे अभय।।  

सॉनेट
प्रेम की डगर
*
निश्छल प्रेम की डगर,
दुष्कर है सहज-सरल,
कभी अमिय; कभी गरल,
पथिक! प्रेम अजर-अमर।
श्वेत-श्याम जगर-मगर,
बैद कान्ह प्रेम खरल,
गले अहं बने तरल,
शूल चुभे तज न समर।
खुद को खो; खुद को पा,
खुदी-खुदा दो न रहें,
सब में तू; तुझ में सब।
प्रिय के गुण हर दिन गा,
स्नेह सलिल बहा बहें,
रब में तू; तूहज में रब।
***
सॉनेट
प्रेम
जग मन चाह सभी की क्षेम।
मेरा-तेरा द्वैत भुला दे।
एक सभी, कर सब से प्रेम।।
सबको अपना मीत बना ले।।
देख अदेखा आँख बंद कर।
तू है कौन, कहाँ से आया?
सुन अनसुना, सुवाच छंद कर।
जाना कहाँ, कहाँ भरमाया?
सुमिरन कर ले गुप्त चित्र का।
भाव सुमन कर उसको अर्पित।
सत्य सनातन ईश मित्र का।।
आत्म दीप कर जला समर्पित।।
कर ले पल पल प्रेम भुला जग।
दौड़ आए वह झट बिन मग।।
१३-३-२०२३
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सॉनेट
कठपुतली
कठपुतली हैं हम सब प्यारे!
नटवर तू नित हमें नचाता।
तू नटराज न नृत्य दिखाता।।
नाच नचा जग को मुस्का रे!!
छलिया! छिपा हुआ अंतर में।
थके खोज वह नजर न आता।
निर्बल का संबल बन जाता।।
महल मिला माटी-कंकर में।।
कठपुतली क्या पाए-खोए?
सपने अनगिन नयन सँजोए।
नाहक लड़-मर, नयन भिगोए।।
दर्शक झूम बजाए ताली।
रुचे न खेला, झट दे गाली।
कठपुतली खाली की खाली।।
१३-३-२०२२
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होरी के जे हुरहुरे
*
होरी के जे हुरहुरे, लिये स्नेह-सौगात
कौनऊ पढ़ मुसक्या रहे, कौनऊ दिल सहलात
कौनऊ दिल सहलात, किन्हऊ खों चढ़ि गओ पारा,
जिन खों पारा चढ़े, होय उनखों मूं कारा
*
मुठिया भरे गुलाल से, लै पिचकारी रंग
कृष्णकांत जी को मलें, चंद्रा जी कर जंग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
हरी हुई तबियत चढ़ी, भंग भवानी शीश
गृहणी ने जी भर रँगा, लगें सुरेश कपीश
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
हिलसा खा ठंडाई पी, करें घोष जयघोष
होरी गातीं इला जी, लुटा रंग का कोष
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गयी कहानी गोंदिया, कही कहानी डूब
राजलक्ष्मी ले उड़े, राम कहानी खूब
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
जयप्रकाश जी झूमकर, रचा रहे हैं स्वाँग
गृह स्वामिन खिल खिल हँसे, भजियों में दे भाँग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
जबलपुर भोपाल बिच, रहे कबड्डी खेल
तू तू तू तू कर रहे, तन्मय हुए सुरेश
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
मुग्ध मंजरी देखकर, भूले काम बसंत
मधु हाथों मधु पानकर, पवन बन रहे संत
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
कोक भरी पिचकारियों, से मारें हँस धार
छाया पियें मनीष जी, भीग भई भुन्सार
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
झूमें सँग अविनाश के, रचना गाकर फाग
पहन विनीता घूमतीं, फूल-धतूरा पाग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
शोभित की महिमा अजब, मो सें बरनि न जाय
भांग भवानी हाथ ले, नेहा से बतियांय
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
बिरह-ब्यथा मिथलेस की, बिनसे सही न जाय
तजी नौकरी घर घुसे, हीरा धुनी रमांय
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
पीले-पीले हो रहे, जयप्रकाश पी आज।
श्याम घटा में चाँदनी, जैसे जाए डूब।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गूझों का आनंद लें, लुक-छिप धरकर स्वांग।
पुरुषोत्तम; मीना न दें , अडा रही हैं टाँग।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
लाल गाल अखिलेश के हुए, नींद में मस्त।
सेव-पपडिया खा हुईं, मुदित विनीता पस्त।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
***
एक द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*
यह द्विपदी अश्वावातारी जातीय बीर छंद में है.
***
क्षणिका
*
आमंत्रण है तुम्हें पधारो कोरोना
थके न मिटती रिश्वरखोरी
सुना कर रहे तुम बरजोरी
झटपट आओ,
इसे मिटाओ
सही न जाए कुछ कोरो ना
१३.३.२०२०
***
क्षणिका
मौन
*
बिन बोले ही बोलता
सुन सकते
हर बात।
दिन हो
चाहे रात
फर्क इसे पड़ता नहीं।
बोलो
हो तुम कौन
कभी नहीं यह पूछता?
वन-पर्वत या
हो शहर
बतियाता है मौन।
***
दोहा गीत
चुनाव
*
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे,
कहते आम चुनाव।
नूराकुश्ती सियासत,
ऐक्य संग अलगाव।।
*
पाने रोटी-दाल,
आम आदमी जूझता।
जनता का दुःख-दर्द,
नेता कभी न बूझता।
सुविधाएँ दे त्याग,
मार्ग न उसको सूझता।
मिटती कभी न दूरियाँ
दूर न हो भटकाव।
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे
कहते आम चुनाव।।
*
वादे रखें न याद,
दावे झूठे कर रहे।
जन-हितकारी मूल्य
बिन मारे ही मर रहे।
इसकी टोपी छीन,
उसके सिर पर धर रहे।
केर-बेर का संग ही
दिखला रहा प्रभाव।
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे
कहते आम चुनाव।।
बुधवार, १३-३-२०१९
***
लघुकथा
राहत की सांस
*
लेख वार्ता (चैट) पर बार-बार रचनाओं की प्रशंसा के बाद कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं? घर में कौन-कौन हैं? कविता कैसे करते हैं? जैसे प्रश्न किये गये। उसने सहज शालीनतापूर्वक उत्तर दे दिए। जब उसे स्वस्थ्य और सुन्दर कहते हुए पूछा गया कि वह एकांत में समय कैसे बिताता है?, उसके शौक क्या है ? तो वह चौंका और कुछ रुखाई के साथ उत्तर दिया कि उससे केवल साहित्य संबंध में चर्चा की जाए, अन्य विषयों में कोई रूचि नहीं है। वह स्तब्ध रह गया यह देखकर कि विपन्नता, समाज के अत्याचारों से पीड़ित, पुरुषों को कोसने, स्वावलंबन और स्त्री अधिकारों की दुहाई देनेवाली ने अपने निर्वस्त्र चित्र भेजते हुए पूछा कि वह प्रति रात्रि कितनी राशि दे सकता है?
क्रोध, क्षोभ और अपमान का अनुभव करते हुए उसने फटकार लगायी कि विवाहित और बच्चों की माँ होते हुए उसका यह आचरण कैसे उचित है? यदि अर्थाभाव है तो उसे विधि सम्मत व्यवसाय कर अतिरिक्त धनार्जन करना चाहिए। इस तरह समाज को प्रदूषित करने का उसके बच्चों पर क्या असर होगा?
उत्तर मिला कि संपन्न वर्ग यह सब करता है तो फैशन कहा जाता है, गरीब को सब उपदेश देते हैं, सहायता नहीं करते। देह व्यवसाय को मान्यता देनेवाले देशों के उदाहरण के साथ उस को बुर्जुआ, घिसी-पिटी दकियानूसी घटिया सोचवाला, समाज की प्रगति में बाधक कहते हुए समय के साथ बदलने की सीख दी गयी। स्त्री का अपनी देह पर पूरा अधिकार है। इससे रोकनेवाली पुरुषप्रधान मानसिकता समाप्त कर स्त्री सशक्तिकरण समय की माँग है।
उसने हार मानते हुए फेसबुक प्रबंधन को रिपोर्ट कर वह लेखा बंद कराकर राहत की सांस ली।
१३-३-२०१६
***
नवगीत -
याद
*
याद आ रही
याद पुरानी
*
फेरे साथ साथ ले हमने
जीवन पथ पर कदम धरे हैं
धूप-छाँव, सुख-दुःख पा हमको
नेह नर्मदा नहा तरे हैं
मैं-तुम हम हैं
श्वास-आस सम
लेखनी-लिपि ने
लिखी कहानी
याद आ रही
याद पुरानी
*
ज्ञान-कर्म इन्द्रिय दस घोड़े
जीवन पथ पर दौड़े जुत रथ
मिल लगाम थामे हाथों में
मन्मथ भजते अंतर्मन मथ
अपनेपन की
पुरवाई सँग
पछुआ आयी
हुलस सुहानी
*
कोयल कूकी, बुरा अमुआ
चहकी चिड़िया, महका महुआ
चूल्हा-चौके, बर्तन-भाँडे
देवर-ननदी, दद्दा-बऊआ
बीत गयी
पल में ज़िंदगानी
कहते-सुनते
राम कहानी
***
नवगीत
तू
*
पल-दिन,
माह-बरस बीते पर
तू न
पुरानी लगी कभी
पहली बार
लगी चिर-परिचित
अब लगती
है निपट नई
*
खुद को नहीं समझ पाया पर
लगता तुझे जानता हूँ
अपने मन की कम सुनता पर
तेरी अधिक मानता हूँ
मन को मन से
प्रीति पली जो
कम न
सुहानी हुई कभी
*
कनखी-चितवन
मुस्कानों ने
कब-कब
क्या संदेश दिए?
प्राण प्रवासी
पुलके-हरषे
स्नेह-सुरभि
विनिवेश लिये
सार्थक अर्थशास्त्र
जीवन का
सच, न
कहानी हुई कभी
४-३-२०१६
***
नवगीत:
आरक्षण
*
जिनको खुद पर
नहीं भरोसा
आरक्षण की भीख माँगते।
*
धन-दौलत, जमीन पाकर भी
बने हुए हैं अधम भिखारी।
शासन सब कुछ छीने इनसे
तब समझेंगे ये लाचारी।
लात लगाकर इनको इनसे
करा सके पीड़ित बेगारी।
हो आरक्षण उनका
जो बेबस
मुट्ठी भर धूल फाँकते।
*
जिसने आग लगाई जी भर
बैैंक और दुकानें लूटीं।
धन-सम्पति का नाश किया
सब आस भाई-चारे की टूटी।
नारी का अपमान किया
अब रोएँ, इनकी किस्मत फूटी।
कोई न देना बेटी,
हो निरवंशी
भटकें थूक-चाटते।
*
आस्तीन के साँप, देशद्रोही,
मक्कार, अमानव हैं ये।
जो अबला की इज्जत लूटें
बँधिया कर दो, दानव हैं ये।
इन्हें न कोई राखी बाँधे
नहीं बहन के लायक हैं ये।
न्यायालय दे दण्ड
न क्यों फाँसी पर
जुल्म-गुनाह टाँगते?
२९-२-२०१६
***
छंद सलिला:
शिव (समानिका) छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, ३ री, ६ वी, ९ वी मात्र लघु, मात्रा बाँट ३-३-३-२, चरणान्त लघु लघु गुरु (सगण), गुरु गुरु गुरु (मगण) या लघु लघु लघु (नगण), तीव्र प्रवाह।
लक्षण छंद:
शिव-शिवा रहें सदय, रूद्र जग करें अभय
भक्ति भाव से नमन, माँ दया मिले समन
(संकेत: रूद्र = ११ मात्रा, समन = सगण, मगण, नगण)
उदाहरण:
१. हम जहाँ रहें सनम, हो वहाँ न आँख नम
कुछ न याद हो 'सलिल', जब समीप आप-हम
२. आज ना अतीत के, हार के न जीत के
आइये रचें विहँस, मीत! गीत प्रीत के
नीत में अनीत में, रीत में कुरीत में
भेद-भाव कर सकें, गीत में अगीत में
३. आप साथ हों सदा, मोहती रहे अदा
एक मैं नहीं रहूँ, आप भी रहें फ़िदा
४. फिर चुनाव आ रहे, फिर उलूक गा रहे
मतदाता आज फिर, हाय ठगे जा रहे
केर-बेर साथ हैं, मैल भरे हाथ हैं
झूठ करें वायदे, तोड़ें खुद कायदे
सत्ता की चाह है, आपस में डाह है
रीति-नीति भूलते, सपनों में झूलते
टीप: श्यामनारायण पाण्डेय ने अभिनव प्रयोग कर शिव छंद को केवल ९ वीं मात्रा लघु रखकर रचा है. इससे छंद की लय में कोई अंतर नहीं आया. तदनुसार प्रस्तुत है उदाहरण ४.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१३-३-२०१४
***
चिंतन सलिला:
धर्म
*
आत्मीय!
वन्दे मातरम.
महाभारतकार के अनुसार 'धर्मं स: धारयेत' अर्थात वह जो धारण किया जाए वह धर्म है.
प्रश्न हुआ: 'क्या धारण किया जाए?'
उत्तर: 'वह जो धारण करने योग्य है.'
प्रश्न: 'धारण करने योग्य है क्या है?
उत्तर: वह जो श्रेष्ठ है?
प्रश्न: श्रेष्ठ क्या है?
उत्तर वह जो सबके लिए हितकर है.
डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार धर्म लंबे समय की राजनीति और राजनीति तत्कालीन समय का धर्म है.
उक्तानुसार धर्म सदैव प्रासंगिक और सर्वोपयोगी होता है अर्थात जो सबके लिए नहीं, कुछ या किसी के लिए हितकर हो वह धर्म नहीं है.
साहित्य वह जो सबके हित सहित हो अर्थात व्यापक अर्थ में साहित्य ही धर्म और धर्म ही साहित्य है.
साहित्य का सृजन अक्षर से होता है. अक्षर का उत्स ध्वनि है. ध्वनि का मूल नाद है... नाद अनंत है... अनंत ही ईश्वर है.
इस अर्थ में अक्षर-उपासना ही धर्मोपासना है. इसीलिये अक्षर-आराधक को त्रिकालदर्शी, पूज्य और अनुकरणीय कहा गया, उससे समाज का पथ-प्रदर्शन चाह गया, उसका शाप अनुल्लन्घ्य हुआ. अकिंचन गौतम के शाप से देवराज इंद्र भी न बच सका.
धर्म समय-सापेक्ष है. समय परिवर्तन शील है. अतः, धर्म भी सतत गतिशील और परिवर्तन शील है, वह जड़ नहीं हो सकता.
पञ्च तत्व की देह पञ्चवटी में पीपल (ब्रम्हा, नीम (शक्ति, रोगाणुनाशक, प्राणवायुदाता), आंवला (हरि, ऊर्जावर्धक ), बेल (शिव, क्षीणतानाशक ) तथा तथा आम (रसवर्धक अमृत) की छाया में काया को विश्राम देने के साथ माया को समझने में भी समर्थ हो सकती थी.
मन के अन्दर जाने का स्थान ही मन्दिर है. मन मन्दिर बनाना बहुत सरल है किन्तु सरल होना अत्यंत कठिन है. सरलता की खोज में मन्दिर में मन की तलाश ने मन को ही जड़ बना दिया.
शिव वही है जो सत्य और सुन्दर है. असत्य या असुंदर शिव नहीं हो सकता. शिव के प्रति समर्पण ही 'सत' है.
शिव पर शंका का परिणाम सती होकर ही भोगना पड़ता है. शिव अर्थात सत्य पर संदेह हो तो मन की शांति छिन जाती है और तन तापदग्धता भोगता ही है.
शिव पर विश्वास ही सतीत्व है. शंकर शंकारि (शंका के शत्रु अर्थात विश्वास) है. विश्वास की संगिनी श्रद्धा ही हो सकती है. तभी तो तुलसी लिखते हैं: 'भवानी-शंकरौ वन्दे श्रृद्धा-विश्वास रूपिणौ' किसी भी काल में श्रृद्धा और विश्वास अप्रासंगिक कैसे हो सकते हैं?
जिसकी सत्ता किसी भी काल में समाप्त न हो वही तो महाकाल हो सकता है. काल से भी क्षिप्र होने पर ही वह काल का स्वामी हो सकता है. उसका वास क्षिप्रा तीर पर न हो तो कहाँ हो?
शिव सृजन से नाश और नाश से सृजन के महापथ निर्माता हैं. श्रृद्धा और विश्वास ही सम्मिलन की आधार भूमि बनकर द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती हैं. श्रृद्धा की जिलहरी का विस्तार और विश्वास के लिंग की दृढ़ता से ही नव सृजन की नर्मदा (नर्मम ददाति इति नर्मदा जो आत्मिक आनंद दे वह नर्मदा है) प्रवाहित होती है.
संयम के विनाश से सृजन का आनंद देनेवाला अविनाशी न हो तो और कौन होगा? यह सृजन ही कालांतर में सृजक को भस्म कर देगा (तेरा अपना खून ही आखिर तुझमें आग लगाएगा).
निष्काम शिव काम क्रीडा में भी काम के वशीभूत नहीं होते, काम को ह्रदय पर अधिकार करने का अवसर दिए बिना क्षार कर देते हैं किन्तु रति (लीनता अर्थात पार्थक्य का अंत) की प्रार्थना पर काम को पुनर्जीवन का अवसर देते हैं. निर्माण में नाश और नाश से निर्माण ही शिवत्व है.
इसलिए शिव अमृत ग्रहण न करने और विषपायी होने पर भी अपराजित, अडिग, निडर और अमर हैं. दूसरी ओर अमृत चुराकर भागनेवाले शेषशायी अमर होते हुए भी अपराजित नहीं रणछोड़ हैं.
सतीनाथ सती को गँवाकर किसी की सहायता नहीं कहते स्वयं ही प्रलय के वाहक बन जाते हैं जबकि सीतानाथ छले जाकर याचक हो जाते हैं. सती के तप का परिणाम अखंड अहिवात है जबकि सीता के तप का परिणाम पाकर भी खो देना है.
सतीनाथ मर्यादा में न बंधने के बाद भी मर्यादा को विस्मृत नहीं करते जबकि सीतानाथ मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी सीता की मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाते.
शिव रात्रि की प्रासंगिकता अमृत और गरल के समन्वय की कला सीखकर जीने में है.
शेष अशेष...
१३-३-२०१३
***
भज गोविन्दम्
(मूल संस्कृत, हिन्दी काव्यानुवाद, अर्थ व अंग्रेजी अनुवाद सहित)
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे ॥१॥
गोविंद भजो, गोविंद भजो, गोविंद भजो रे मूरख मन।
अंतिम पल रक्षा कर न सके, केवल यह व्याकरण रटन॥१॥
हे मोह से ग्रसित बुद्धि वाले मित्र! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है ॥१॥
O deluded minded friend, chant Govinda, worship Govinda, love Govinda as memorizing the rules of grammar cannot save one at the time of death. ॥1॥
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्, वित्तं तेन विनोदय चित्तं ॥२॥
धन-अर्जन की तृष्णा तज, सद्बुद्धि रखो वासना तजो।
सत्कर्म उपार्जित धन-प्रयोग दे, सदा चित्त को आनंदन॥२॥
हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत्यता के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो ॥२॥
O deluded minded ! Give up your lust to amass wealth. Give up such desires from your mind and take up the path of righteousness. Keep your mind happy with the money which comes as the result of your hard work. ॥2॥
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्।
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥३॥
नाभि-वक्ष सौंदर्य देखकर, मत मतवाला हो नारी का।
अस्थि, मांस, मज्जा, मेदा है, अशुचि मोह का कर भंजन॥३॥
स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि ये मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं ॥३॥
Do not get attracted on seeing the parts of woman's anatomy under the influence of delusion, as these are made up of skin, flesh and similar substances. Deliberate on this again and again in your mind॥3॥
नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम् ॥४॥
कमल-पाँखुरी पर क्रीड़ारत, सलिल-बिंदुवत चंचल मति-यश।
रोग, अहं, अभिमानग्रस्त है, सकल विश्व यह समझ अकिंचन॥४॥
जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प (क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है ॥४॥
Life is as ephemeral as water drops on a lotus leaf . Be aware that the whole world is troubled by disease, ego and grief. ॥4॥
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥५॥
धन-अर्जन-संचय की जब तक, शक्ति तभी तक आश्रित चिपके।
कोई न चाहे बातें करना, निर्बल-जर्जर जब होगा तन॥५॥
जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है ॥५॥
As long as a man is fit and capable to earn money, everyone in the family show affection towards him. But after wards, when the body becomes weak no one enquires about him even during the talks. ॥5॥
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥६॥
इस नश्वर शरीर में जब तक, प्राण तभी तक लोग पूछते।
प्राण शरीर छोड़ता, डरती अर्धांगिनी तक लख विकृत तन॥६॥
जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से प्राण वायु के निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है ॥६॥
Till one is alive, family members enquire kindly about his welfare. But when the vital air (Prana) departs from the body, even the wife fears from the corpse.॥6॥
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥७॥
बालक-मन आसक्त खेल में, तरुण-युवा मन हो रमणी में।
चिंतासक्त वृद्ध-मन होता, हो न ब्रम्ह में लीन कभी मन.॥७॥
बचपन में खेल में रूचि होती है , युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है ॥७॥<p> </p>
In childhood we are attached to sports, in youth, we are attached to woman . Old age goes in worrying over every thing . But there is no one who wants to be engrossed in Govind, the parabrahman at any stage. ॥7॥
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं वा कुत आयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥८॥
कौन तुम्हारा पत्नि-पुत्र है?, यह दुनिया सचमुच विचित्र है।
तुम किसके हो?, आये कहाँ से?, अब तो कर लो यह सच-चिंतन.॥8॥
कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, बन्धु ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो ॥८॥
Who is your wife ? Who is your son? Indeed, strange is this world. O dear, think again and again who are you and from where have you come. ॥8॥
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं, निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥
सत्संगति से अनासक्ति हो, अनासक्ति से माया छूटे।
मुक्ति तत्व का अनुभव हो तब, जन्म-मरण का छूटे बंधन॥९॥
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥९॥
Association with saints brings non-attachment, non-attachment leads to right knowledge, right knowledge leads us to permanent awareness,to which liberation follows. ॥9॥
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥१०॥
काम कहाँ जब यौवन बीते?, कहाँ जलाशय जब जल रीते?।
धन बिन कहाँ स्वजन औ' परिजन?, तत्व-ज्ञान सच, भ्रम जग-जीवन॥१०॥
आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता ॥१०॥
As lust without youth, lake without water, the relatives without wealth are meaningless, similarly this world ceases to exist, when the Truth is revealed? ॥10॥
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं।
मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा ॥११॥
धन-अनुचर-यौवन पर मत कर, गर्व काल पल में हर लेता।
मिथ्या माया तज दे पल में, जान ब्रम्ह को कर अनुगायन॥११॥
धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो ॥११॥
Do not boast of wealth, friends (power), and youth, these can be taken away in a flash by Time . Knowing this whole world to be under the illusion of Maya, you try to attain the Absolute. ॥11॥
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि, न मुन्च्त्याशावायुः ॥१२॥
आते-जाते दिवस-रात, संध्या-प्रभात, ऋतु शिशिर-वसंती।
मिथ्या माया तज दे पल में, जान ब्रम्ह को कर अनुगायन॥१२॥
दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते है काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है पर इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है ॥१२॥
Day and night, dusk and dawn, winter and spring come and go. In this sport of Time entire life goes away, but the storm of desire never departs or diminishes. ॥12॥
द्वादशमंजरिकाभिरशेषः, कथितो वैयाकरणस्यैषः।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः ॥१२अ॥
बारह पद के पुष्पहार से, उपदेशा व्याकरणाचार्य को।
आदि शंकराचार्य देव ने, पढ़-सुन-गुन ले कुछ तू भी मन॥१२अ॥
बारह गीतों का ये पुष्पहार उपदेश के रूप में, सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया ॥१२अ॥
This bouquet of twelve verses was imparted to a grammarian by the all-knowing, god-like Sri Shankara. ॥12A॥
कांते कांता धन गत चिंता, वातुल किं तव नास्ति नियंता।
त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका ॥१३॥
चिंता क्यों भार्या की, धन की?, क्या न तुम्हारा ईश नियामक?
भवसागर से पार उतर जा, कर सुसंग नौका-नौकायन ॥१३॥
तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है| तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है ॥१३॥
Oh deluded man ! Why do you worry about your wealth and wife? Is there no one to take care of them? Only the company of saints can act as a boat in three worlds to take you out from this ocean of rebirths. ॥13॥
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥१४॥
जटा बढ़ाकर, शीश मुंडाकर, बाल नुचा, गेरुआ पहनकर ।
सत्य देख क्यों देख न पाते?, विविध वेश धर पाते भोजन ॥१४॥
बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल , काषाय (भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो ॥१४॥
Matted and untidy hair, shaven heads, orange or variously colored cloths are all a way to earn livelihood . O deluded man why don't you understand it even after seeing.॥14॥
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥१५॥
बदन गल गया, बाल पक गये, मुँह के दाँत गिर गये सारे।
ले लाठी करता पग-चालन, आशा फिर भी नहीं तजे मन॥१५॥
क्षीण अंगों, पके हुए बालों, दांतों से रहित मुख और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बंधा रहता है ॥१५॥
Even an old man of weak limbs, hairless head, toothless mouth, who walks with a stick, cannot leave his desires. ॥15॥
अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥१६॥
सूर्य ढले तब अग्नि जला, सह ठंडी घुटने-ठुड्डी पर रख ठुड्डी।
भिक्षा माँगे, तरु नीचे रह, आशा-फंदा ताजे न दामन॥१६॥
सूर्यास्त के बाद, रात्रि में आग जला कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है ॥१६॥
One who warms his body by fire after sunset, curls his body to his knees to avoid cold; eats the begged food and sleeps beneath the tree, he is also bound by desires, even in these difficult situations. ॥16॥
कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥१७॥
गंगासागर गमन करे या, दान करे करके व्रत-पालन।
ज्ञान बिना भव-पार न जाता, सौ-सौ जन्म कहें सब सज्जन॥१७॥
किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञानरहित रहकर गंगासागर जाने, व्रत रखने और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है ॥१७॥
According to all religions, without knowledge one cannot get liberated in hundred births though he might visit Gangasagar or observe fasts or do charity. ॥17॥
सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः
सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः ॥१८॥
छाल हिरन की पहन, शयनकर देवालय में तरु के नीचे।
ताजे लालसा-भोग विलासी, सुख न कौन सा पता तब मन?॥१८॥
देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी ॥१८॥
Reside in a temple or below a tree, sleep on mother earth as your bed, stay alone, leave all the belongings and comforts, such renunciation can give all the pleasures to anybody. ॥18॥
योगरतो वाभोगरतोवा, सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥१९॥
भोग करे या योगलीं हो?, रहे भीड़ में या एकाकी?।
सुखी-प्रसन्न वही वास्तव में, लीन ब्रम्ह में हो जिसका मन॥१९॥
कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है वो ही आनंद करता है, आनंद ही करता है ॥१९॥
One may like meditative practice or worldly pleasures , may be attached or detached. But only the one fixing his mind on God lovingly enjoys bliss, enjoys bliss, enjoys bliss. ॥19॥
भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥२०॥
किंचित भी भवद्गीता पढ़, एक बूँद भी गंगाजल पी।
पूजे पल भर भी मुरारि को, यदि- हो दूर सदा यम-बंधन॥२०॥
जिन्होंने भगवदगीता का थोडा सा भी अध्ययन किया है, भक्ति रूपी गंगा जल का कण भर भी पिया है, भगवान कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार से पूजा की है, यम के द्वारा उनकी चर्चा नहीं की जाती है ॥२०॥
Those who study Gita, even a little, drink just a drop of water from the holy Ganga, worship Lord Krishna with love even once, Yama, the God of death has no control over them. ॥20॥
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥२१॥
जन्म-मरण, माँ-गर्भ-शयन, हो बार-बार संसार यही है।
करो कृपा हे देव मुरारि!, उद्धारो कर भव-भय-भंजन॥२१॥
बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है, हे कृष्ण कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें ॥२१॥
Born again, die again, stay again in the mother's womb, it is indeed difficult to cross this world. O Murari ! please help me through your mercy. ॥21॥
रथ्या चर्पट विरचित कन्थः, पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः।
योगी योगनियोजित चित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव ॥२२॥
जो गुण-दोष-परे पथ का हो, पथिक मात्र गुदड़ी धारणकर।
बच्चे सा उन्मत्त सुयोगी, दैव-चेतना-लीन रहे मन॥२२॥
रथ के नीचे आने से फटे हुए कपड़े पहननेवाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर चलने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी, बालक के समान आनंद में रहते हैं ॥२२॥
One who wears cloths ragged due to chariots, move on the path free from virtue and sin,keeps his mind controlled through constant practice, enjoys like a carefree exuberant child. ॥22॥
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम् ॥२३॥
कौन तुम? हूँ कौन मैं?, आया कहाँ से?, कौन माँ-पितु?।
स्वप्नसम निस्सार जग-तज, तत्व-जिज्ञासा करो मन॥२३॥
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझकर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो ॥२३
Who are you ? Who am I ? From where I have come ? Who is my mother, who is my father ? Ponder over these and after understanding,this world to be meaningless like a dream,relinquish it. ॥23॥
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥२४॥
तुममें, मुझमें, सकल जगत में, व्याप्त विष्णु ही व्यापक सच है।
क्रुद्ध अकारण हो न, एक सा हर हालत में रखना निज मन॥२४॥
तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ ॥२४॥
Lord Vishnu resides in me, in you and in everything else, so your anger is meaningless . If you wish to attain the eternal status of Vishnu, practice equanimity all the time, in all the things. ॥24॥
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥२५॥
शत्रु-मित्र या संबंधी-सुत, से लड़ना-मिलना न सार्थक।
सब में खुद को देख तजो, अज्ञानजनित वैभिन्न्य भाव मन॥२५॥
शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से द्वेष और प्रेम मत करो, सबमें अपने आपको ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो ॥२५॥
Try not to win the love of your friends, brothers, relatives and son(s) or to fight with your enemies. See yourself in everyone and give up ignorance of duality everywhere.॥25॥
कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्।
आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥२६॥
काम, क्रोध, मद, लोभ त्यागकर, मैं 'वह' हूँ अनुभव कर साधक।
जिन्हें न आत्मज्ञान, वे मूरख, पीड़ित हों बन यम-बंदीजन ॥२६॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ, जो आत्म- ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं वे बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं ॥२६॥
Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real nature . Those devoid of the knowledge of self come in this world, a hidden hell, endlessly. ॥26॥
गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥२७॥
गीता-विष्णुसहस्त्रनाम का गान, ध्यानकर श्री हरि का मन।
सदा रहो सत्संग-लीन मन, दीनों को के दान सदा धन॥२७॥
भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो, सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो ॥२७॥
Sing thousand glories of Lord Vishnu, constantly remembering his form in your heart. Enjoy the company of noble people and do charity for the poor and the needy. ॥27॥
सुखतः क्रियते रामाभोगः, पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुंचति पापाचरणं ॥२८॥
क्षणिक भोगकर कायिक सुख, रोगी हो जाते सभी बाद में।
मृत्यु अंत में पाते लेकिन, नहीं त्यागते पाप-आचरण॥२८॥
सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते हैं ॥२८॥
People use this body for pleasure which gets diseased in the end. Though in this world everything ends in death, man does not give up the sinful conduct. ॥28॥
अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥२९॥
हर विपत्ति का मूल संपदा, सुख न तनिक भी धन से मिलता।
सुत भी बैरी बने धनिक का, सच स्वीकारी तज दो धन, मन॥२९॥
धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए | धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं ऐसा सबको पता ही है ॥२९॥
Keep on thinking that money is cause of all troubles, it cannot give even a bit of happiness. A rich man fears even his own son . This is the law of riches everywhere. ॥29॥
प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्।
जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम् ॥३०॥
क्रिया-नियंत्रण, इन्द्रिय संयम, सत्यासत्य-विवेचन नित कर ।
नित्य-अनित्य विचारण, जप-तप, का अभ्यास सजग रह कर मन॥३०॥
प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो ॥३०॥
Do pranayam, the regulation of life forces, take proper food, constantly distinguish the permanent from the fleeting, Chant the holy names of God with love and meditate,with attention, with utmost attention. ॥30॥
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ॥३१॥
गुरु-पदपद्म-भक्त! इन्द्रिय-मन, नियमन कर भव से छूटो रे।
निज उरवासी देव के करो, दर्शन, तरो मुक्त हो रे मन॥३१॥
गुरु के चरणकमलों का ही आश्रय माननेवाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो ॥३१॥
Be dependent only on the lotus feet of your Guru and get salvation from this world. Through disciplined senses and mind, you can see the indwelling Lord of your heart !॥31॥
मूढः कश्चन वैयाकरणो, डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः।
श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै, बोधित आसिच्छोधितकरणः ॥३२॥
मुग्ध व्याकरण के नियमों पर, संगत में व्याकरणाचार्य की।
शिष्य कई शंकराचार्य के, ईश-बोध हित हुए सुप्रेरित ॥३२॥
इस प्रकार व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित किए गए ॥३२॥
Thus through a deluded grammarian lost in memorizing rules of the grammar, the all knowing Sri Shankara motivated his disciples for enlightenment. ॥32॥
भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे ॥३३॥
गोविन्द भजो, गोविन्द भजो, गोविन्द भजो रे मूरख मन।
भव से पार उतरने का है, ईश नाम जप ही साधन॥३३॥
गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥३३॥
O deluded minded friend, chant Govinda, worship Govinda, love Govinda as there is no other way to cross the life's ocean except lovingly remembering the holy names of God. ॥33॥
१३-३-२०११
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दोहा
'सलिल' बड़ों ने सच कहा, न दो किसी को दोष.
बढ़ो सतत निज राह पर, मन में रख संतोष
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जब भी पाओ समय तो, करलो तनिक विनोद.
'सलिल' भूलकर फ़िक्र सब, कर आमोद-प्रमोद
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'शुभ प्रभात'
खिड़की पर बैठी हुई, मीत गुनगुनी धूप.
'शुभ प्रभात' कह रही है, तुमको हवा अरूप.
चूँ-चूँ कर चिड़िया कहे: 'जगो, हो गयी भोर.
'आलस छोड़ो' कह रही है मैया झकझोर.
खड़ी द्वार पर सफलता, उठो, मिलाओ हाथ.
'सलिल' परिश्रम जो करे, किस्मत उसके साथ.
१३-३-२०१०
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