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रविवार, 14 जनवरी 2024

सलिल सृजन १४ जनवरी, लोहड़ी, दोहा, नवगीत, लघुकथा, शोक गीत, संक्रांति, सॉनेट

सलिल सृजन १४ जनवरी
संस्कृति
लोहड़ी का गीत : सुंदर मुंदरीए होए
*
लोहड़ी उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब का एक प्रसिद्ध त्योहार है। लोहड़ी पर्व पर लोगों के घर जा कर लोहड़ी जलाने के लिए लकड़ियाँ माँगी जाती हैं और दुल्ला भट्टी के गीत गाए जाते हैं। लोहड़ी के की शाम को लोग सामूहिक रूप से आग जलाकर उसकी पूजा करते हैं। महिलाएँ आग के चारों और चक्कर काट-काटकर लोकगीत गाती हैं। कहते हैं कि अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी एक लुटेरा था लेकिन वह हिंदू लड़कियों को गुलाम के तौर पर बेचे जाने का विरोधी था। उन्हें बचा कर वह उनकी हिंदू लड़कों से शादी करा देता था। उसे लोग पसंद करते थे। लोहड़ी गीतों में उसके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।’ कहा जाता है कि एक मुस्लिम फ़क़ीर ने एक हिन्दू अनाथ लड़की को पाला था। फिर जब लड़की जवान हुई तो उस फ़कीर ने उस लड़की की शादी के लिए घूम-घूम कर पैसे इकट्ठे किए और फिर धूमधाम से उसका विवाह किया। इस त्यौहार से जुड़ी और भी कई किवदंतियां हैं। कहा जाता है कि सम्राट अकबर के ज़माने में लाहौर से उत्तर की ओर पंजाब के इलाक़ों में दुल्ला भट्टी नामक एक दस्यु या डाकू हुआ था, जो धनी ज़मींदारों को लूटकर ग़रीबों की मदद करता था। इस गीत का नातालोक नायक दुल्ला भट्टी से ज़रूर है। यह गीत आज भी लोहड़ी के मौक़े पर ख़ूब गया जाता है।
*
लोहड़ी का गीत
सुंदर मुंदरीए होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुड़ी दे लेखे लाई होए
घर घर पवे बधाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
अल्ला भट्टी भेजे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
ज़िमींदारां लुट्टी होए
दुल्ले घोड़ दुड़ाए होए
ज़िमींदारां सदाए होए
विच्च पंचायत बिठाए होए
जिन जिन पोले लाई होए
सी इक पोला रह गया
सिपाही फड़ के ले गया
आखो मुंडेयो टाणा टाणा
मकई दा दाणा दाणा
फकीर दी झोली पाणा पाणा
असां थाणे नहीं जाणा जाणा
सिपाही बड्डी खाणा खाणा
अग्गे आप्पे रब्ब स्याणा स्याणा
यारो अग्ग सेक के जाणा जाणा
लोहड़ी दियां सबनां नूं बधाइयां
***
दोहा सलिला
सूर्य रश्मि लोरी सुना, कहे जगो हे राम!
राजकुमार उठो करो, धन्य धरा भू धाम।।
कोहरा घूँघट ओट से, कर चितवन का वार।
रश्मि निमंत्रण दे करो, सबसे सब दिन प्यार।।
वाक् ब्रह्म है नाद हरि, ताल- थाप शिव जान।
स्वर सरगम शारद-रमा, उमा तान मतिमान।।
योग प्रयोग करें सतत, मिट जाए हर रोग।
हों वियोग अति भोग से, संयम सदा सुयोग।।
मिला मुकद्दर मुफ्त में, मान महज मेहमान।
अवसर-कशिश की कशिश, घरवाली वत जान।।
श्याम पूर्ण हो शुभ्र से, शुभ्र श्याम से पूर्ण।
शुभ न अशुभ बिन शुभ रहे, अशुभ बिना शुभ चूर्ण।।
कर अक्षर आराधना, होगा नहीं अभाव।
भाव शब्द में रस भरे, सब से कर निभाव।।
१४.१.२०२४
शोक गीत
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
प्रकृति प्रेमी चेताते थे, हुआ प्रशासन था बहरा।
शासन ने भी बात न मानी, स्वार्थ-राज अंधा ठहरा।।
जंगल काट लिए धरती माँ का है चीर हरा तुमने।
कच्चे नए पहाड़ों की छाती छलनी की दानव ने।।
दुःशासन-शासन को तरस न आता किस्मत वाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
आँसू बहा रही हैं नदियाँ, चीख रहे पर्वत-टीले।
आर्तनाद करती है जनता, नयन सभी के हैं गीले।।
नेता-अफसर-सेठ काटते माल तिजोरी भरते हैं।
सरकारी धन चारा समझें, बेरहमी से चरते हैं।।
सपने टूट गए, सिर पीटें राहत के पैगाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
चेताया केदारनाथ ने, लेकिन तनिक नहीं चेते।
बना-बना सीमेंट कंठ गिरि-पर्वत के तुमने रेते।।
पॉवर प्लांट बना न्योता है खुद विनाश को तुमने ही।
बर्फ ग्लेशियर पिघल रहे, यह बतलाया इसरो ने भी।।
धँसती धरा' मशीन दानवी है अभिशाप अवाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
विस्फोटों से कँपी दिशाएँ, आसमान भी दहल गया।
भाषण-आश्वासन सुन भोला जनगण- जनमत बहल गया।।
बाँध-सुरंगों को रोको, भू संरक्षण तत्काल करो।
दूब-पौध से आच्छादित कर धरती को नवजीवन दो।।
पूर्ण नाश के पहले सम्हले, शासन जीवन-शाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
सकल हिमालय की घाटी पर खतरा कम मत आँको तुम।
दोष न औरों को दो, अपने अंतर्मन में झाँको तुम।।
जनगण मन ने किया भरोसा, सिसक रहा है ठगा गया।
गया पुराना भी हाथों से, आया हाथ विनाश नया।।
हाय राम! तुम चीख न सुनते, मुग्ध हुए श्री राम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
१४-१-२०२३
•••
सॉनेट
संक्रांति
*
भुवन भास्कर शत अभिनंदन।
दक्षिणायणी था अब तक पथ।
उत्तरायणी होगा अब रथ।।
अर्पित अक्षत रोली चंदन।।
करूँ पुष्प बंधूक समर्पित।
दो संक्रांति काल को मति-गति।
शारद-रमा-उमा की हो युति।।
विधि-हरि-हर मन-मंदिर अर्चित।।
चित्र गुप्त उज्जवल हो अपना।
शुभ सबका, अब रहे न सपना।
सत-शिव-सुंदर हो प्रभु! नपना।।
पोंगल बैसाखी हँस गाए।
बीहू सबको गले लगाए।
मिल खिचड़ी गुड़ लड्डू खाए।।
१४-१-२०२२
***
सॉनेट
रस
*
रस जीवन का सार है।
रस बिन नीरस जिंदगी।
रसमय प्रभु की बंदगी।।
सरस ईश साकार है।।
नीरसता भाती नहीं।
बरस बरस रस बरसता।
रस पाने मन तरसता।।
पारसता आती नहीं।।
परस मिले प्रिय का सदा।
चरस दूर हो सर्वदा।
दरस ईश का हो बदा।
हो रसलीन करूँ सृजन।।
रसानंद पा कर जतन।।
हो रसनिधि रसखान मन।।
१४-१-२०२२
***
गीत
सरकार
*
बेगानी है सरकार
*
करते न जो कहते तुम
कैसे भरोसा हो?
कहते न जो करते तुम।
जनता को दिया बिसार
अब दीख रहा तुमको
मनमानी में ही सार।
बेगानी है सरकार
*
किस्मत के भरोसे ही
आवाज दे रहे हैं
सुनते ही नहीं बहरे।
सुलझे कैसे तकरार
दूर न करते पीर
अनसुनी रही इसरार।
बेगानी है सरकार
***
दोहागीत
संकट में हैं प्राण
*
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
अफसरशाही मत्त गज
चाहे सके उखाड़
तना लोकमत तोड़ता
जब-तब मौका ताड़
दलबंदी विषकूप है
विषधर नेता लोग
डँसकर आँसू बहाते
घड़ियाली है सोग
ईश्वर देख; न देखता
कैसे होगा त्राण?
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
धनपति चूहे कुतरते
स्वार्थ साधने डाल
शोषण करते श्रमिक का
रहा पेट जो पाल
न्यायतंत्र मधु-मक्षिका
तौला करता न्याय
सुविधा मधु का भोगकर
सूर करे अन्याय
मुर्दों का सा आचरण
चाहें हों संप्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
आवश्यकता-डाल पर
आम आदमी झूल
चीख रहा है 'बचाओ
श्वास-श्वास है शूल
पत्रकार पत्ते झरें
करें शहद की आस
आम आदमी मर रहा
ले अधरों पर प्यास
वादों को जुमला कहे
सत्ता डँस; ले प्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
१४-१-२०२१
नवगीत
दूर कर दे भ्रांति
*
दूर कर दे भ्रांति
आ संक्राति!
हम आव्हान करते।
तले दीपक के
अँधेरा हो भले
हम किरण वरते।
*
रात में तम
हो नहीं तो
किस तरह आये सवेरा?
आस पंछी ने
उषा का
थाम कर कर नित्य टेरा।
प्रयासों की
हुलासों से
कर रहां कुड़माई मौसम-
नाचता दिनकर
दुपहरी संग
थककर छिपा कोहरा।
संक्रमण से जूझ
लायें शांति
जन अनुमान करते।
*
घाट-तट पर
नाव हो या नहीं
लेकिन धार तो हो।
शीश पर हो छाँव
कंधों पर
टिका कुछ भार तो हो।
इशारों से
पुकारों से
टेर सँकुचे ऋतु विकल हो-
उमंगों की
पतंगें उड़
कर सकें आनंद दोहरा।
लोहड़ी, पोंगल, बिहू
जन-क्रांति का
जय-गान करते।
*
ओट से ही वोट
मारें चोट
बाहर खोट कर दें।
देश का खाता
न रीते
तिजोरी में नोट भर दें।
पसीने के
नगीने से
हिंद-हिंदी जगजयी हो-
विधाता भी
जन्म ले
खुशियाँ लगाती रहें फेरा।
आम जन के
काम आकर
सेठ-नेता काश तरते।
१२-१-२०१७
***
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
...
लघुकथा-
पतंग
*
- बब्बा! पतंग कट गयी....
= कट गयी तो कट जाने दे, रोता क्यों है? मैंने दूसरी लाकर रखी है, वह लेकर उड़ा ले।
- नहीं, नयी पतंग उड़ाऊँगा तो बबलू फिर काट देगा।
= काट देगा तो तू फिर नयी पतंग ले जाना और उड़ाना
- लेकिन ऐसा कब तक करूँगा?
= जब तक तू बबलू की पतंग न काट दे। जीतने के लिये हौसला, कोशिश और जुगत तीनों जरूरी हैं। चरखी और मंझा साथ रखना, पतंग का संतुलन साधना, जिस पतंग को काटना हो उस पर और अपनी पतंग दोनों पर लगातार निगाह रखना, मौका खोजना और झपट्टा मारकर तुरंत दूर हो जाना, जब तक सामनेवाला सम्हाले तेरा काम पूरा हो जाना चाहिए। कुछ समझा?
- हाँ, बब्बा! अभी आता हूँ काटकर बबलू की पतंग।
***
लघुकथा -
रफ्तार
*
प्रतियोगिता परीक्षा में प्रथम आते ही उसके सपनों को रफ्तार मिल गयी। समाचार पत्रों में सचित्र समाचार छपा, गाँव भी पहुँचा। ठाकुर ने देखा तो कलेजे पर साँप लोट गया। कर्जदार की बेटी हाकिम होकर गाँव में आ गयी तो नाक न कट जायेगी? जैसे भी हो रोकना होगा।
जश्न मनाने के बहाने हरिया को जमकर पिलाई और बिटिया के फेरे अपने निकम्मे शराबी बेटे से करने का वचन ले लिया। उसने नकारा तो पंचायत बुला ली गयी जिसमें ठाकुर के चमचे ही पञ्च थे जिन्होंने धार्मिक पाखंड की बेडी उसके पैर में बाँधने वरना जात बाहर करने का हुक्म दे दिया।
उसके अपनों और सपनों पर बिजली गिर पड़ी। उसने हार न मानी और रातों-रात दद्दा को भेज महापंचायत करा दी जिसने पंचायत का फैसला उलट दिया। ठाकुर के खिलाफ दबे मामले उठने लगे तो वह मन मसोस कर बैठ रहा।
उसने धार्मिक पाखंड, सामाजिक दबंगई और आर्थिक शोषण के त्रिकोण से जूझते हुए भी फिर दे दी अपने सपनों को रफ्तार।
***


लघुकथा:
अनजानी राह
*
कोशिश रंग ला पाती इसके पहले ही तूफ़ान ने कदमों को रोक दिया, धूल ने आँखों के लिये खुली रहना नामुमकिन कर दिया, पत्थरों ने पैरों से टकराकर उन्हें लहुलुहान कर दिया, वाह करनेवाला जमाना आह भरकर मौन हो रहा।
इसके पहले कि कोशिश हार मानती, कहीं से आवाज़ आयी 'चली आओ'। कौन हो सकता है इस बवंडर के बीच आवाज़ देनेवाला? कान अधिकाधिक सुनने के लिये सक्रिय हुए, पैर सम्हाले, हाथों ने सहारा तलाशा, सर उठा और चुनौती को स्वीकार कर सम्हल-सम्हल कर बढ़ चला उस ओर जहाँ बाँह पसारे पथ हेर रही थी अनजानी राह।
***




लघुकथा-
चेतना शून्य
*
उच्च पदस्थ बेटी की उपलब्धि पर आयोजित अभिनन्दन भोज में आमंत्रित माँ पहुँची। बेटी ने शैशव में दिवंगत हो चुके पिता के निधनोपरांत माँ द्वारा लालन-पालन किये जाने पर आभार व्यक्त करते हुए अपनी श्रेष्ठ शिक्षा, आत्म विश्वास और उच्च पद पाने का श्रेय माँ को दिया तो पत्रकारों के प्रश्न और छायाकारों के कैमरे माँ पर केंद्रित हो गये।
सामान्य घरेलू जीवन की अभ्यस्त माँ असहज अनुभव कर शीघ्र ही हट गयी। घर आते ही माँ ने बेटी से उसकी सफलता के इतने बड़े आयोजन में उसके जीवन साथी और संतान की अनुपस्थिति के बारे पूछा। बेटी ने झिझकते हुए अपने लिव इन रिलेशन, वैचारिक टकराव और जीवनसाथी तथा संतान से अलगाव की जानकारी दी। माँ को लगा वह हुई जा रही है चेतना शून्य ।
***


लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
***
लघुकथा-
यह स्वप्न कैसा?
*
आप एक कार से उतर कर दूसरी में क्यों बैठ रहे है? जहाँ जाना है इसी से चले जाइये न.
नहीं भाई! अभी तक सरकारी दौरा कर रहा था इसलिए सरकारी वाहन का उपयोग किया, अब निजी काम से जाना है इसलिए सरकारी वाहन और चालक छोड़कर अपने निजी वाहन में बैठा हूँ और इसे खुद चलाकर जा रहा हूँ अगर मैं जन प्रतिनिधि होते हुए सरकारी सुविधा का दुरूपयोग करूँगा तो दूसरों को कैसे रोकूँगा?
सोच रहा हूँ जो कभी साकार न हो सके वह स्वप्न कैसा?
***
लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोटी हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पडोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागने वाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
***
लघुकथा -
संक्रांति
*
- छुटका अपनी एक सहकर्मी को आपसे मिलवाना चाहता है, शायद दोनों....
= ठीक है, शाम को बुला लो, मिलूँगा-बात करूँगा, जम गया तो उसके माता-पिता से बात की जाएगी।बड़की को कहकर तमिल ब्राम्हण, छुटकी से बातकर सरदार जी और बड़के को बताकर असमिया को भी बुला ही लो।
- आपको कैसे?... किसी ने कुछ.....?
= नहीं भई, किसी ने कुछ नहीं कहा, उनके कहने के पहले ही मैं समझ न लूँ तो उन्हें कहना ही पड़ेगा। ऐसी नौबत क्यों आने दूँ? हम दोनों इस घर-बगिया में सूरज-धूप की तरह हैं। बगिया में किस पेड़ पर कौन सी बेल चढ़ेगी, इसमें सूरज और धूप दखल नहीं देते, सहायता मात्र करते हैं।
- किस पेड़ पर कौन सी बेल चढ़ाना है यह तो माली ही तय करता है फिर हम कैसे यह न सोचें?
= ठीक कह रही हो, किस पेड़ों पर किन लताओं को चढ़ाना है, यह सोचना माली का काम है। इसीलिये तो वह माली ऊपर बैठे-बैठे उन्हें मिलाता रहता है। हमें क्या अधिकार कि उसके काम में दखल दें?
- इस तरह तो सब अपनी मर्जी के मालिक हो जायेंगे, घर ही बिखर जायेगा।
= ऐसे कैसे बिखर जायेगा? हम संक्रांति के साथ-साथ पोंगल, लोहड़ी और बीहू भी मना लिया करेंगे, तब तो सब एक साथ रह सकेंगे। सब अँगुलियाँ मिलकर मुट्ठी बनेंगीं तभी तो मनेगी संक्रांति।
१४.१.२०१६
***
नवगीत:
.
काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
.
दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
*
उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
६-१-२०१५
***
नवगीत:
आओ भी सूरज
*
आओ भी सूरज!
छट गये हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिल उड़ाओ
गाओ भी सूरज!
*
करधन दिप-दिप दमक रही है
पायल छन-छन छनक रही है
नच रहे हैं झूमकर मादल
बुराई हर अलावों में जलाओ
आओ भी सूरज!
*
खिचड़ी तिल-गुड़वाले लडुआ
पिज्जा तजकर खाओ बबुआ
छोड़ बोतल उठा लो छागल
पड़ोसी को खुशी में साथ पाओ
आओ भी सूरज!
*
रविवार, ४ जनवरी २०१५
***
नवगीत:
संक्रांति काल है
.
संक्रांति काल है
जगो, उठो
.
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आँखें रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर
संभ्रांति टाल दो
जगो, उठो
.
खरपतवार न शेष रहे
कचरा कहीं न लेश रहे
तज सिद्धांत, बना सरकार
कुर्सी पा लो, ऐश रहे
झुका भाल हो
जगो, उठो
.
दोनों हाथ लिये लड्डू
रेवड़ी छिपा रहे नेता
मुँह में लैया-गज़क भरे
जन-गण को ठेंगा देता
डूबा ताल दो
जगो, उठो
.
सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे बंसी-मादल
छिपा माल दो
जगो, उठो
.
नवता भरकर गीतों में
जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि तू भी
जाए आज अतीतों में
खींच खाल दो
जगो, उठो
२-१-२०१५
***

राम-माता कैकेयी, कैकेई

श्री राम विग्रह स्थापना और कैकेई 

२२ जनवरी २०२४ राम भक्तों के लिए अभूतपूर्व आनद और सौभाग्य का दिन है जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का नयनाभिराम विग्रह दिव्य-भव्य रामलय में स्तापित किया जाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा जन नायक श्री नरेंद्र मोदी जी के कर कमलों से संपन्न होने जा रही है। विडंबना है की इस अवसर पर राजकुमार राम को मर्यादा पुरुष्टतां राम बनाने में महती भूमिका निभानेवाली राममाता कैकेयी, उनके पितृपक्ष के इशदेव श्री चित्रगुप्त भगवान, उनके मायके पक्ष के वंशज कायस्थों को पूरी तरह विस्मृत किया जा रहा है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ तथा भारतीय जनता पार्टी क उद्भव और विकास में महती भूमिका निभाकर सतत योगदान देनेवाले कायस्थ अकारण ही उपेक्षित हैं। श्री राम के वंशजों को खोज-खोज कार आमंत्रित किया गया है किंतु राम-माताओं विशेषकर कैकेयी मैया के वंशज भुला दिए गए हैं। राजमाता कैकेयी को उनका योगदान भुलाकर भ्रमवश कलंकिनी तक कह दिया गया। तब ही से कायस्थ भी भुला दिए गए। आयी, मैया कैकेयी की वास्तविकता जानें।     

देव संस्कृति के समक्ष शिव भक्त रक्षेन्द्र रावण के पराक्रम ने संकट उपस्थिति किया तो उनसे युद्ध करने हेतु देवों तथा आर्यों में कोई नायक योद्धा नहीं था। कुछ नरूप जनक जी की तरह वीतरागी हो गए थे, कुछ देवराज इन्द्र की तरह विलासी थे, अवध नरेश दशरथ वार्धक्य की कगार पर थे। 

त्रिकालदर्शी ऋषियों ने विचार किया कि किसी वीरांगना और किसी वीर राज पुरुष के गर्भ से दर्शन उत्पन्न पुत्र को वीरोंचित शिक्षा देकर रावण वध कराया जाए। ऋषियों की दृष्टि कैकेय देश की राजकुमारी वीरांगना, विदुषी और रूपसी कैकेयी पर गई, जो वीरमाता बनने हेतु सर्वथा उपयुक्त थीं किंतु उनकी उम्र का कोई राजकुमार नहीं था। अवधपति पराक्रमी दशरथ विवाहित और वार्धक्य की कगार पर थे, वे कैकेय  (पाक अधिकृत कश्मीर) नरेश के मित्र थे। कैकेयी-दशरथ के विवाह के प्रस्ताव से कैकेय नरेश सहमत न थे किंतु देव संस्कृति की रक्षा के लिए राजकुमारी कैकेयी आत्मोत्सर्ग हेतु सहमत हो गयीं। इस अवसर पर महाराज कैके को सहमत कराने के लिए दशरथ जी ने वचन दिया की कैकेयी की संतान ही अवध की गद्दी पर बैठेगी। 

विवाह पश्चात कैकेयी जी ने अपनी पूर्ण योग्यता से दशरथ का साथ दिया। अपनी दो सौतों के साथ सौहार्द्र स्थापित करने के साथ साथ वे महाराज दशरथ को भोग से विमुखकर युद्ध हेतु ले गयीं। दशरथ के साथ युद्ध किया, दशरथ के घायल होने पर उनकी रक्षा और चिकित्सा की, रथ का पहिया निकलने पर धुरी की जगह अपनी अंगुली लगाकर दशरथ को विजय दिलायी। दशरथ जी द्वारा दो वरदान दिए जाने पर भी उन्होंने कुछ नहीं माँगा।  

पुत्रेष्टि यज्ञ के बाद भी कैकेयी ने प्राप्त पायस में से आधा भाग सुमित्रा जी को दिया। चारों पुत्रों का जन्म होने पर उन्होंने चारों को समान स्नेह दिया, चारों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की, उन्हें शस्त्र संचालन सिखाकर निर्भीक बनाया। राम को कौशल्या मैया से अधिक स्नेह कैकेयी मैया से मिला। राम के बाद होने पर दशरथ में उनके प्रति मोह जाग गया। विश्वामित्र जी के द्वारा यज्ञ रक्षा हेतु श्री राम की याचना करने पर दशरथ जी ने मना कर दिया किंतु मैया कैकेयी ने आग्रह कर दशरथ जी को सहमत करा कर श्री राम को विश्वामित्र जी के साथ भिजवाया। फलत:, पूर्व योजनानुसार ताड़का-वाढ और श्री राम विवाह संपन्न हुआ। राम विवाह के पश्चात कैकेयी मैया ने अपना महल कनक भवन ही नव विवाहित राम-सीता के निवास हेतु दे दिया था। 

आयु बढ़ने के साथ-साथ दशरथ जी का राम-मोह भी बढ़ा। श्री राम अवध नरेश बनते तो वे तब तक रावण वध नहीं कर पाते जब तक कि रावण अयोध्या पर आक्रमण न करता। रावण अयोध्या राज्य को छोड़कर अत्याचार करता रहता। रावण को शिव जी से प्राप्त वरदानों के कारण वह श्री राम के अलावा अन्य किसी के द्वारा मारा नहीं जा सकता था। ऐसी परिस्थिति में ऋषियों के अनुरोध और दस्वपन में देवताओं द्वारा प्रार्थना किए जाने पर  कैकेयी मैया एक बार फिर आत्मोत्सर्ग कर, कलंक का विष पीकर राम जी के वन गमन का पथ प्रशस्त करने के लिए दो वरदानों का उपयोग कर राम का वनवास और भारत का राज्याभिषेक माँगती हैं। यदि उनके लक्ष्य भरत जी का राज्याभिषेक मात्र होता तो वह श्री राम से कह सकती थीं। राम-भरत का प्रगाढ़ प्रेम सभी जानते हैं। क्या श्री राम जी को भरत जी को गद्दी देने में तनिक भी आपत्ति होती?

विधि की विडंबना कि पुत्र-मोह की अधिकता के कारण दशरथ जी का देहावसन हो गया। लोक ने उन्हें लांछित किया। वे श्री राम के हाथों देव कार्य करने के लिए मौन रहीं, यहाँ तक कि पुत्र भरत को भी सत्य न बताकर भर्त्सना की पात्र बनीं। चित्रकूट में श्री राम ने मैया कौशल्या से पहले मैया कैकेयी के चरण-स्पर्श कर तथा भरत जी को कैकेयी मैया का अपमान न करने की सलाह देकर इंगित किया कि वे दोषी नहीं थीं। भरत जी ने नंदी ग्राम में तापस जीवन बिताया तो कैकेयी मैया ने भी तपस्विनी की तरह जीवन जिया। अयोध्या लौटने पर श्री राम ने फिर कौशल्या मैया से पहले कैकेयी मैया के चरण छुए पर लोकापवाद मिटा नहीं।

श्री राम मंदिर स्थापना के कालजयी अनुष्ठान में माता कैकेयी के साथ न्याय किया जाए। उनके चित्र व विग्रह यथास्थान हों, उनके पितृ पक्ष के आवंशज कायस्थों को भी आमन्त्रित किया जाए। मैया कौशल्या के पितृ पक्ष से वर्तमान छतीसगढ़ के प्रतिनिधि तथा मैया सुमित्रा के पितृ पक्ष से भी प्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएँ, तबही यह अनुष्ठान परिपूर्ण होगा।  

त्यागमूर्ति कैकेई 
*
कैकेई कश्मीर के पूर्व में स्थित कैकय देश की कायस्थ राजकुमारी थी। अध्यात्म रामायण कहती है कि एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं तो उनके स्वप्न में विप्र, धेनु, सुर, संत सब एक साथ हाथ जोड़कर दर्शन देते हैं और उनसे कहते हैं कि 'हे माता कैकेयी!, हम सब आपकी शरण में हैं। महाराजा दशरथ की बुद्धि जड़ हो गयी है, तभी वो राम को राजा का पद दे रहे हैं। अगर प्रभु अयोध्या की राजगद्दी पर बैठ गए तब उनके अवतार लेने का मूल कारण ही नष्ट हो जायेगा। माता, सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ आपमें ही ये साहस है कि आप राम से जुड़े अपयश का विष पी सकती हैं। कृपया, प्रभु को जंगल भेज कर राक्षसों का वध, जटायु तथा शबरी का कल्याण आदि  कार्य संपन्न कराइए।  युगों-युगों से कई लोग उद्धार होने की प्रतीक्षा में हैं। त्रिलोकस्वामी का उद्देश्य भूलोक का राजा बनना नहीं है। वनवास न हुआ तो राम इस लोक के 'प्रभु' ना हो पाएंगे माता।' 

माता कैकेयी के आँखों से आँसू बहने लगे। माता बोलीं - 'आने वाले युगों में लोग कहेंगे कि मैंने भरत के लिए राम को छोड़ दिया लेकिन असल में मैं राम के लिए आज भरत का त्याग कर रही हूँ। मुझे मालूम है इस निर्णय के बाद भरत और भारत मुझे कभी स्वीकार नहीं करेगा।'

रामचरित मानस में भी कई जगहों पर इसका संकेत मिलता है जब गुरु वशिष्ठ दुःखी भरत से कहते हैं -

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि-लाभु जीवनु-मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।। 

हे भरत ! सुनो भविष्य बड़ा बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के ही हाथ में है, बीच में केवल माध्यम आते हैं।

प्रभु श्रीराम इस रहस्य को जानते थे इसीलिए चित्रकूट में तीनों माताओं के आने पर प्रभु सबसे पहले माता कैकेयी के पास पहुँच कर उन्हें प्रणाम करते हैं और भरत जी को भी कैकेयी मैया का अनादर और अवज्ञा करने से रोकते हैं। प्रभु श्री राम को पैदा करने वाली भले ही कौशल्या जी थीं लेकिन उन्हें ही नहीं चारों भाइयों को राजकुमारों के विलास से दूर रखकर कड़ी शिक्षा दिलवाकर कर्मयोगी और जनसेवी बनानेवाली मैया कैकेयी ही थीं। लंका से लौटने और राज्याभिषेक होने के बाद भी श्री राम ने कैकेयी मैया को सर्वाधिक सम्मान दिया। उनको 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाने वाली माता कैकेयी ही थीं।
***
प्रेषक 
संजीव वर्मा 'सलिल', संयोजक विश्व कायस्थ समाज जबलपुर 
संपर्क- ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 
राम-माता कैकेयी
*
कैकेयी थी कौन, जान न पाए आज तक।

समय रह गया मौन, अपराधिन कह कर उसे।।

राजकुँवरि थी श्रेष्ठ, रूपवती वीरांगना।

घट न सके कुछ नेष्ठ, किया त्याग अनुपम; न कह।।

धर्म संस्कृति हेतु, जीवन का बलिदान कर।

बना सकी वह सेतु, वृद्ध व्यक्ति का कर वरण।।

गई युद्ध में साथ, पति की रक्षा कर सकी।

बनीं तीसरा हाथ, अँगुलि चक्र में लगाकर।।

पाए दो वरदान, किन्तु नहीं माँगा उन्हें।

थी रघुकुल की आन, कैकेयी रक्षा कवच।।

लक्ष्य मात्र था एक, रक्ष संस्कृति नष्ट हो।

कार्य किया हर नेक, सौत डाह से मुक्त रह।।

दिया हवन का भाग, छोटी रानी को विहँस।

अधिकारों का त्याग, कैकेयी करती रही।।

निज सुत से भी अधिक, सौत-पुत्र को प्यार दे।

किया सभी को चकित, प्राणाधिक अधिकार दे।।

दी-दिलवाई नित्य, शिक्षा-दीक्षा सुतों को।

किए उचित हर कृत्य, तज विशेष अधिकार हर।।
(छंद सोरठा)
***

शोधलेख:
मानव जाति की गौरव नारी रत्न महारानी कैकेयी
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संयोजक विश्व कायस्थ समाज, पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अभाकाम / राकाम
*
कहते हैं 'मनुज बली नहीं होत है समय होत बलवान' समय की बलिहारी कि मानव सभ्यता की सर्वकालिक महानतम नारियों में से एक कैकेयी मैया की गौरव गाथा से उन्हीं का कायस्थ कुल अपरिचित हैं। माँ की उपेक्षा करनेवाली जाति कभी फूलती-फलती नहीं। कायस्थों ने आदि माता द्वय नंदिनी-इरावती और कैकेयी की उपेक्षा निरंतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी की है। यह एक बड़ा कारण है कि किसी समय भारत के अधिकांश भाग पर राज्य करने वाले कायस्थ आज संसद और विधान सभाओं में एक-एक स्थान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस संक्षिप्त आलेख में महामाता कैकेयी की कथा से परिचित करने का प्रयास है। आचार्य डॉ. मुंशीराम शर्मा 'सोम' ने कैकेयी को रामायण का आदि-अंत और सार माना है।

कैकेयी और कायस्थ

कैकेयी के कायस्थ होने का प्रमाण ऋग्वेद में मिलता है-

स्वायुधरचवस सुरणार्थं चतु: समुद्र वरुणारथीणाम।
चकृत्वशस्यभूरिवाणस्यम्यं चित्रवृशणरविंदा: ।। [ऋग्वेद १०-४७-४८२]

एक अन्य प्रमाण शब्दकल्पद्रुम काण्ड ६ से प्रस्तुत है-

वाहयौश्चक्षत्रियं जाता: कायस्थ जगतीतले।
चित्रगुप्त: स्थिति: स्वर्गे चित्रोहि भूमण्डले।।
चैत्रस्थ: सुतस्तस्म यशस्वी कुल दीपक:।
ऋषि वंशे समुद्गते गौतमो नाम सतम:।।
तस्य शिष्यों महाप्रशश्चित्रकूटा चलाधिया:।।

मातृकुल

चंद्र के पुत्र 'विधु' व् पुत्रवधु इला की संततियों से चंद्र वंश आगे बढ़ा। इला-बुध से पुरुरवा तथा पुरुरवा-उर्वशी से आयु उत्पन्न हुआ जिनके पुत्र नहुष तथा पेटर ययाति हुए। ययाति की दो पत्नियां देवयानी तथा शर्मिष्ठा हुईं। शर्मिष्ठा के पुत्र अनु की इक्कीसवीं पीढ़ी में महामानस का जन्म हुआ। आगे इसी वंश में महादानी राजा शिवि के चार पुत्र विषदर्भ, कैकेय, मदर तथा सौवीर हुए। कैकेय का राज्य पश्चिमोत्तर भारत में सिंधु नद की पश्चिमी सहायक नदी कुर्मी के किनारे निचले भीग में बन्नू की दून में था। इस राज्य का नाम वैदिक काल में 'कूर्म' रहा है। इसका ऊपरी भाग आज भी 'कुर्रम' तथा निचला भाग 'बन्नू' कहलाता है। इसी की सीध में पूर्व में कैकय जनपद था। यह आधिनिक झेलम, गुजरात तथा शाहपुर जिलों का केंद्रीय भाग [अब पाकिस्तान में] है। वाल्मीकि रामायण में सर्ग ३८ श्लोक १६ में शरदण्डा नदी पार करने का वर्णन है। यही नदी प्राचीन काल में शराबती कुरुक्षेत्र की 'चित्तांग नदी' कहलाती रही है। अयोध्या तथा कैकेय राज्यों के मध्य व्यापारिक संबंध थे।

कैकय नरेश कैकेय की सुरूपवती कन्या को 'सुरूपा' नाम उचित ही दिया गया। विवाह पश्चात वधुओं की उनके मायके के नाम से पुकारने की प्रथा आज भी है जैसे मैनपुरीवाली चची, बनारसवाली भाभी आदि। तत्कालीन प्रथानुसार कोसल राजकुमारी को विवाह पश्चात् अयोध्या में 'कौसल्या' तथा कैकय राजकुमारी को 'कैकेयी' संबोधन मिले, यही प्रसिद्ध होते गए और उनके मूल नाम विस्मृत हो गए। कैकेय पुत्री कैकेयी का विवाह सूर्यवंशी पराक्रमी अयोध्यापति दशरथ से हुआ। दशरथ की तीन प्रमुख क्रमश: रानियाँ कौशल्या (कोशलनरेश की पुत्री), कैकेयी तथा सुमित्रा हुईं। 'पद्म पुराण' के अनुसार भरत की माता का नाम सुरूपा है। 'पउम चरिउ' के अनुसार कैकेयी का ही नाम सुमित्रा भी है। संभवत: विवाह पश्चात् कैकेयी के सद्गुणों को देखते हुए उन्हें सुरूपा तथा सुमित्रा कहा गया। वे परम लावण्यमयी, परम विदुषी, मिलनसार, मिठभाषिणी, वीरांगना, दूरदर्शी तथा आत्मोत्सर्ग हेतु उद्यत रहनेवाली युग निर्मात्री नारी रत्न रहीं है।

कैकेयी का आत्मोत्सर्ग और दशरथ से विवाह

आज के संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह वैदिक काल में विविध देशों, प्रदेशों और संस्कृतियों में टकराव, युद्ध और रक्तपात टालकर सामन्यजस्य और सद्भाव बनाये रखने के लिए एक कुल (संघ) कार्यरत था। दशरथ तथा कैकेय दोनों ही इसके सदस्य थे। भगवान् परशुराम की शिष्य कैकेयी अचूक बाण विद्या, रथ सञ्चालन, युद्धनीति निर्माण आदि की धनी थी। वह विवाहपूर्व भी शिकार पर जाती थी तथा भयानक हिंस्र पशुओं से जूझती थी। उसके साहस व पराक्रम की कथाएं दूर-दूर तक कही-सुनी जाती थीं। देवासुर संग्राम में असुरों पर जय पाकर दशरथ भी प्रसिद्ध हो चुके थे। कैकेयी विवाह के समय किश्री थीं जबकि दशरथ अधेड़ और पूर्व विवाहित। दशरथ में एक दोष विलासी होना था जबकि कैकेयी तपस्विनी की तरह संयमी थीं। रक्ष संस्कृति के विस्तार को रोककर देव संस्कृति की सुरक्षा और विकास के लिए भविष्य में एक पराक्रमी राजकुमार की आवश्यकता को देखते हुए त्रिकाल दर्शी ऋषियों ने एक योजना तैयार की। दशरथ के वृद्ध होने के पूर्व उस राजकुमार को उनकी विरासत मिले और वह पिता का स्थान लेकर राक्षसों का दमन करे। दशरथ विवाहित किंतु निस्संतान थे। उनकी पत्नी कौसल्या सामान्य सरल हृदया स्त्री थीं। वे किसी पुत्र को रणनीति विशारद नहीं बना सकती थीं। पर्याप्त मनमंथन पश्चात् ऋषियों ने कैकेयी व्दशरथ के विवाह से उत्पन्न संतान में यह संभावना देखकर योजना बनाई। कैकेय अपनी सुलक्षणा पुत्री को अधेड़ अवस्था से दशरथ के साथ ब्याने को तैयार नहीं थे किन्तु कैकेयी को यह ज्ञात होने पर उसने अपने देश और संस्कृति के संरक्षण हेतु इस प्रस्ताव को स्वीकृति देकर आत्मोत्सर्ग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। दशरथ ने कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कैकेयी के पुत्र को अवधनरेश बनाने का वचन दिया।

कैकेयी के वरदान

विवाह पश्चात् उसने दशरथ को फिर युद्ध की और उन्मुख करने के लिए खुद उनके साथ युद्धक्षेत्र में जाना आरंभ किया वह दशरथ के रथ का अति निपुणता से रथ सञ्चालन करती और अवसर पर शस्त्र प्रहार कर उनके प्राण भी बचाती। एक देवासुर संग्राम में दशरथ के रथ के चक्र की धुरी निकल गयी। कैकेयी ने आव देखा न ताव, तत्क्षण लौह कवच से ढँकी अपनी अँगुली लगाकर चके को निकलने से रोक लिया और दूसरे हाथ से रथ चलाती रही। इससे उसकी प्रत्युत्पन्नमति, धीरज, साहस और बलिदान भाव का परिचय मिलता है। दशरथ लड़ते रहे कैकेयी मुंह में वल्गा थाम एक हाथ की अंगुली धुरी में फँसाये, दूसरे हाथ से अस्त्र देती रही। युद्ध जीतने पर दशरथ का ध्यान उनकी और गया। वे भावविवहल हो गए। कैकेयी ने न केवल उनके प्राण बचाये थे अपितु विजय भी दिलाई थी। उन्होंने कैकेयी को मनचाहे वरदान दिए पैट कैकेयी ने कुछ न चाहा, बहुत आग्रह किये जाने पर कैकेयी ने दशरथ का मान रखते हुए वरदान भविष्य के लिए रख लिए।

कैकेयी और दशरथ पुत्र

कैकेयी की कीर्ति पताका सर्वत्र फहरा रही थी। परोक्षत: अयोध्या का राज्य सञ्चालन भी उसी के हाथों में था। इस पर भी वह सौतिया डाह से मुक्त अन्य दोनों रानियों को बड़ी-छोटी बहिन मानकर पूर्ण समर्पण भाव से दायित्व निर्वहन करती रही। दशरथ में विलासजनित दुर्बलता को देखते हुए श्रृंगी ऋषि को उपचार हेतु नियुक्त किया गया। उनके उपचारों से दशरथ पूण: स्वस्थ हुए। श्रृंगी ऋषि ने तीनों रानियों को भी दिव्य औषधियों का सेवन कराया। कैकेयी में ईर्ष्या भाव होता तो वह वरदानों का प्रयोग कर अपने सिवाय किसी रानी को संतान न प्राप्त होने देती किंतु वह इस सबसे बहुत ऊपर थीं। संतान होने पर भी उसने केवल अपने पुत्र को शिक्षित नहीं किया अपितु तीनों रानियों के चारों पुत्रों को समान मानते हुए शास्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी और दिलवाई। यही नहीं उसने ऋषि विश्वामित्र द्वारा राक्षसों के आतंक से मुक्ति के लिए राजकुमार माँगे जाने पर दशरथ के मन कर देने पर भी उन्हें सहमत कराया, अपने पुत्र के स्थान पर यह अनुभव और यश पाने का अवसर कौसल्या पुत्र राम को दिया। इस सबसे स्पष्ट है की कैकेयी का मन निर्मल और वृत्ति तापसी थी। वह दशरथ को आत्मकेंद्रित होकर पुत्रों को संघर्ष से दूर रखने के पक्ष में न थी क्योंकि उसने विवाह देव संस्कृति की रक्षा और रक्ष संस्कृति के नाश हेतु ही किया था। यदि दशरथ अपने मन की कर पाते तो यह उद्देश्य पूर्ण न होता। ऋषि मंडल दशरथ से निराश हो रहा था।

कैकेयी का आत्म-बलिदान

सद्गुणों से संपन्न दशरथ पुत्र कैशौर्य से तरुणाई की और बढ़ रहे थे। वीतरागी राजा जनक की पुत्रियों से उनके विवाह कराकर ऋषिमण्डल दो पुत्रों को राक्षसों से युद्ध हेतु भेजकर शेष दो पुत्रों को अयोध्या की सुरक्षा व्यवस्था में लगाए रखना चाहते थे। दशरथ अब आत्म केंद्रित हो अपने कुल के साथ शांति का जीवन जीना चाहते थे। ऐस होने पर रक्ष-सेना देवलोक को ध्वंस करने लगती। ऋषियों ने फिर कैकेयी की सहायता चाही। दशरथ ने महामंत्री सुमंत्र (कायस्थ) से विमर्श कर ज्येष्ठ पुत्र राम के राज्याभिषेक की तैयारी की। उन्होंने समय वह चुना जब भरत और शत्रुघ्न कैकय देश (ननिहाल) गए थे। कैकेयी को सूचना तक नहीं दी गयी। ऋषि मंडल ने मंथरा के माध्यम से कैकेयी को पूरी योजना सूचित की। यह कैकेयी की अग्निपरीक्षा की घड़ी थी, पति का साथ देकर स्वार्थ साधे या पति को रोककर देव संस्कृति की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग करे। बलिपंथी कैकेयी ने वही किया जो विवाह पूर्व किया था, निजी हित पर देश और संस्कृति के हित को वरीयता देना। उसने दशरथ को मनाना चाहा, न मानने पर वरदानों का उपयोग किया। दशरथ विवाह पूर्व दिए गए वचन (वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय संधि की तरह) को भंग कर रहे थे। वे कैकेयी को अँधेरे में रखकर ऋषिमण्डल की योजना को विफल करने का कारण बन रहे थे। इससे समूची देव संस्कृति के नाश होने का खतरा आसन्न था चूंकि लंकापति रावण देव लोक को घेरकर (जैसे चीन भारत को घेर रहा है) नाश करने की योजना पर दिन-ब-दिन काम कर रहा था। कैकेयी ने संस्कृति और देश पर आये खतरे को टालने के लिए खुद की प्रतिष्ठा और मान को निछावर करते हुए वर माँग लिए।

मूल्यांकन

राम को ऋषिमण्डल की योजना की कुछ जानकारी विश्वामित्र से मिल गयी थी। वे कैकेयी के त्याग से अवगत थे। इसलिए कैकेयी द्वारा वदान लिए जाने पर भी वे न केवल कैकेयी के प्रति विनयशील और आज्ञा पालक बने रहे अपितु पितृभक्त होते हुए भी दशरथ के विरोध की अनदेखी कर वन चले गए। दुर्भाग्य से दशरथ का आकस्मिक निधन हो गया। शेष दोनों रानियों या तीनों राजकुमारों से ऋषि मंडल की योजना गुप्त रखी गयी थी। फलत:, वे कैकेयी के त्याग को न जान सके। अज्ञानता के कारण ही भारत ने कैकेयी को आरोपित और लांछित किया। दशरथ निधन के बाद भी चित्रकूट में मिलने पर राम ने सगी माँ कौसल्या से भी पहले कैकेयी से भेंट की। दोनों रानियों ने सौत होते हुए भी कैकेयी से कभी गिला-शिकवा नहीं किया। यहाँ तक कि कर्मव्रती कैकेयी दे दशरथ के निधन के बाद राजमहल छोड़कर नंदी ग्राम में उसी भरत के साथ निवास कर राज्य सञ्चालन में मदद की जो उन्हें दोषी समझ रहा था जबकि शेष दोनों रानियां और सीता की तीनों बहिनें राजमहल में थीं। राम की वन यात्रा, सीता हरण और लंका युद्ध के समाचार कैकेयी को मिलते रहे थे। वह फिर शास्त्र धारण कर या अयोध्या की सेना भेजकर युद्ध का निर्णय करा सकती थी किन्तु तब राम को यश नहीं मिलता। उन्होंने धैर्य के साथ ऋषि मंडल की योजना को क्रियान्वित होने यश पाने दिया। रावण-वध के पश्चात् अयोध्या लौटने पर राम फिर कौसल्या से पहले कैकेयी से मिले और कृतज्ञता ज्ञापित की चूँकि वे कैकेयी की बलिदानी भूमिका से अवगत थे।

कैकेयी के गुप्त बलिदान से अनभिगायता तथा राम पर दैवत्व आरोपित किये जाने पर उनके प्रति अंध भक्ति भाव के करम राम के पश्चात्वर्ती कैकेयी के चरित्र की उदात्तता को नहीं समझा तथापि कुछ मनीषियों ने सत्य जानने के प्रयास किये और कैकेयी की म्हणता को पहचाना है। पद्म श्री युग तुलसी रामकिंकर जी महाराज ने कैकेयी पर २६५ पृष्ठीय ग्रंथ की रचना की है। महाकवि इंदु सक्सेना ने कैकेई शीर्षक महाकाव्य की रचना की है। वेदप्रताप सिंह 'प्रकाश' ने कैकेयी पर केंद्रित प्रबंध काव्य 'अनुताप' में उनका मूल्यांकन किया है। कैकेयी के मातृकुल के कायस्थ राजाओं ने कई पीढ़ियों तक कश्मीर और आस पास के क्षेत्रों पर राज्य किया। काल के दुष्प्रभाव से ब्राम्हणों ने अन्य वर्गों के साथ मिलकर कायस्थों को सत्ता-च्युत किया। कायस्थ भागकर उत्तर भारत और वहां से मध्य प्रदेश, बिहार, ब्नगल महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में पहुंचे। यह भी कहा जाता है कि 'इतिहास अपने आप को दोहराता है।' अनुमानत:: जिन कश्मीरी पंडितों को यवन आतंकवादियों ने खदेड़ बाहर किया है, वही कश्मीरी पंडित पुरातन काल में कश्मीर से कायस्थों की राज सत्ता छिनने के कारण बने थे।

हमारा कर्तव्य

इतिहास की बातें इतिहास तक सीमित रहने देकर आज कायस्थ समाज का अकर्तव्य अपने मूल स्वरुप को जानने और अपनी मातृ शक्तियों को प्रतिष्ठित कर पूजन एक है ताकि मातृ-आशीष से वे पुन: समृद्ध और सुखी हो सकें। कैकेयी मैया के चरित्र पर चितन-मनन कर अपनी बच्चियों का नामकरण किया जाना चाहिए। कैकेयी मैया के नाम पर पुरस्कार, अलंकरण और छात्रवृत्तियाँ स्थापित की जाना चाहिए।
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शनिवार, 13 जनवरी 2024

सोरठा, कृष्ण, सॉनेट, महेश योगी, लालबहादुर, हाइकु, नवगीत, सूरज, कल्पना रामानी, देवरहा बाबा

सलिल सृजन १३ जनवरी
सॉनेट
सूरज छिपकर तरु पीछे से झाँक रहा है,
उषा भीत है सोचे साथ रहे या छोड़े?
लव जिहाद का नारा सुन पग पीछे मोड़े,
निकलूँ या छिप जाऊँ, गुपचुप आँक रहा है।
अरुणोदय का दृश्य मनोरम टाँक रहा है,
बाजों ने गौरैया के सब सपने तोड़े,
जवां कबूतर घायल खा श्रद्धा के कोड़े,
हृदय ऐक्य का हाय! टूट दो फाँक रहा है।
बाल राम को जिसने दूल्हा राजा देखा,
सिया सहित दरबार सजाकर हर पल पूजा,
हैं अवाक् वह अवध, देख धनुधारी आया।
कौन करे हमलों-दंगों का लेखा-जोखा?
१३.१.२०२४
••• 
सोरठा सलिला
कृष्ण
*
अनुपम कौशल कृष्ण, काम करें निष्काम रह।
हुए नहीं वे तृष्ण, थे समान सुख-दुःख उन्हें।।
खींचो रेखा एक, अकरणीय-करणीय में।
जाग्रत रखो विवेक, कृष्ण न कह करते रहे।।
कृष्ण कर्म पर्याय, निष्फल कुछ करते नहीं।
सक्रियता पर्याय, निष्क्रियता वरते नहीं।।
गहो कर्म सन्यास, यही कृष्ण-संदेश है।
हो न मलिन विन्यास, जग-जीवन का तनिक भी।.
कृष्ण -राधिका एक, कृष्ण न मिलते कृष्ण भज।
भजों राधिका नेंक, आ जाएँगे कृष्ण खुद।।
तहाँ कृष्ण जहँ प्रेम, हो न तनिक भी वासना।
तभी रहेगी क्षेम, जब न वास हो मोह का।।
१३-१-२०२३
***
सॉनेट
महर्षि महेश योगी
*
गुरु-पद-रज, आशीष था।
मार्ग आप अपना गढ़ा।
ध्यान मार्ग पर पग बढ़ा।।
योग हुआ पाथेय था।।
महिमा थी ओंकार की।
ब्रह्मानंद सुयश भजा।
फहराई जग में ध्वजा।।
बना विश्व सरकार दी।।
सपने थे अनगिन बुने।
वेद-ज्ञान हर जन गुने।
जतन निरंतर अनसुने।
पश्चिम नत हो सिर धुने।।
योगमार्ग अपना चुने।।
त्याग भोग के झुनझुने।।
१३-१-२०२२
***
सॉनेट
लालबहादुर
*
छोटा कद, ऊँचा किरदार।
लालबहादुर नेता सच्चे।
सादे सरल जिस तरह बच्चे।।
भारत माँ पे हुए निसार।।
नन्हें ने दृढ़ कदम बढ़ाया।
विश्वशक्ति को धता बताया।
भूखा रहना मन को भाया।।
सीमा पर दुश्मन थर्राया।।
बापू के सच्चे अनुयायी।
दिशा देश को सही दिखायी।
जनगण से श्रद्धा नित पायी।
विजय पताका थी फहरार्ई।।
दुश्मन ने भी करी बड़ाई।।
सब दुनिया ने जय-जय गाई।।
१३-१-२०२२
***
हाइकु
*
झूठ को सच
करती सियासत
सच को झूठ
*
सुबहो-शाम
आराम है हराम
राम का नाम
*
प्राची लगाती
माथे पर बिंदिया
साँझ सुहाती
*
शंख निनाद
मग्न स्वर तरंग
मिटा विषाद
*
गया बरस
तनिक न दे सका
सुख हरष
*
अस न बस
मनाना ही होगा
नया बरस
*
बिच्छू का डंक
सहे संत स्वभाव
रहे नि:शंक
१३.१.२०१६
***
नवगीत:
.
खों-खों करते
बादल बब्बा
तापें सूरज सिगड़ी
.
आसमान का आँगन चौड़ा
चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे
बदरी दादी 'रोको' पुकारें
पछुआ अम्मा
बड़बड़ करती
डाँट लगातीं तगड़ी
.
धरती बहिना राह हेरती
दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम
रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत न
आये घर में
खोल न खिड़की अगड़ी
.
सूर बनाता सबको कोहरा
ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक ही
फसल लाएगी राहत को ही
हँसकर खेलें
चुन्ना-मुन्ना
मिल चीटी-धप, लँगड़ी
....
कृति चर्चा:
हौसलों के पंख : नवगीत की उड़ान
चर्चाकार: आचार्य संजीव
.
[कृति विवरण: हौसलों के पंख, नवगीत संग्रह, कल्पना रामानी, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ ११२, नवगीत ६५, १२०/-, अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद]
.
ओम निश्चल: 'गीत-नवगीत के क्षेत्र में इधर अवरोध सा आया है. कुछ वरिष्‍ठ कवि फिर भी अपनी टेक पर लिख रहे हैं... एक वक्‍त उनके गीत... एक नया रोमानी उन्माद पैदा करते थे पर धीरेधीरे ऐसे जीवंत गीत लिखने वाली पीढी खत्‍म हो गयी. कुछ कवि अन्य विधाओं में चले गए .... नये संग्रह भी विशेष चर्चा न पा सके. तो क्‍या गीतों की आभा मंद पड़ गयी है या अब वैसे सिद्ध गीतकार नहीं रहे?'
'गीत में कथ्य वर्णन के लिए प्रचुर मात्रा में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करना कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता है तो नवगीत में गेयता को महत्व मिलता है।'
उक्त दो बयानों के परिप्रेक्ष्य में नवगीतकार कल्पना रामानी के प्रथम नवगीत संग्रह 'हौसलों के पंख' को पढ़ना और और उस पर लिखना दिलचस्प है।
कल्पना जी उस सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसके लिए साहित्य रचा जाता है और जो साहित्य से जुड़कर उसे सफल बनाता है। जहाँ तक ओम जी का प्रश्न है वे जिस 'रोमानी उन्माद' का उल्लेख करते हैं वह उम्र के एक पड़ाव पर एक मानसिकता विशेष की पहचान होता है। आज के सामाजिक परिवेश और विशेषकर जीवनोद्देश्य लेकर चलनेवाले युवाओं नई ने इसे हाशिये पर रखना आरंभ कर दिया है। अब किसी का आँचल छू जाने से सिहरन नहीं होती, आँख मिल जाने से प्यार नहीं होता। तन और मन को अलग-अलग समझने के इस दौर में नवगीत निराला काल के छायावादी स्पर्शयुक्त और छंदमुक्त रोमांस तक सीमित नहीं रह सकता।
कल्पना जी के जमीन से जुड़े ये नवगीत किसी वायवी संसार में विचरण नहीं कराते अपितु जीवन जैसा ही देखते हुए बेहतर बनाने की बात करते हैं। कल्पना की कल्पना भी सम्भावना के समीप है कपोल कल्पना नहीं। जीवन के उत्तरार्ध में रोग, जीवन साथी का विछोह अर्थात नियतिजनित एकाकीपन से जूझ और मृत्यु के संस्पर्श से विजयी होकर आने के पश्चात उनकी जिजीविषाजयी कलम जीवन के प्रति अनुराग-विराग को एक साथ साधती है। ऐसा गीतकार पूर्व निर्धारित मानकों की कैद को अंतिम सत्य कैसे मान सकता है? कल्पना जी नवगीत और गीत से सुपरिचित होने पर भी वैसा ही रचती हैं जैसा उन्हें उपयुक्त लगता है लेकिन वे इसके पहले मानकों से न केवल परिचय प्राप्त करती हैं, उनको सीखती भी हैं।
प्रतिष्ठित नवगीतकार यश मालवीय ठीक ही कहते हैं कि 'रचनाधर्मिता के बीज कभी भी किसी भी उम्र में रचनाकार-मन में सुगबुगा सकते हैं और सघन छायादार दरख्त बन सकते हैं।'
डॉ. अमिताभ त्रिपाठी इन गीतों में संवेदना का उदात्त स्तर, साफ़-सुथरा छंद-विधान, सुगठित शब्द-योजना, सहजता, लय तथा प्रवाह की उपस्थिति को रेखांकित करते हैं। कल्पना जी ने भाषिक सहजता-सरलता को शुद्धता के साथ साधने में सफलता पाई है। उनके इन गीतों में संस्कृतनिष्ठ शब्द (संकल्प, विलय, व्योम, सुदर्श, विभोर, चन्द्रिका, अरुणिमा, कुसुमित, प्राण-विधु, जल निकास, नीलांबर, तरुवर, तृण पल्लव्, हिमखंड, मोक्षदायिनी, धरणी, सद्ज्ञान, परिवर्धित, वितान, निर्झरिणी आदि), उर्दू लफ़्ज़ों ( मुश्किलों, हौसलों, लहू. तल्ख, शबनम, लबों, फ़िदा, नादां, कुदरत, फ़िज़ा, रफ़्तार, गुमशुदा, कुदरत, हक़, जुबां, इंक़लाब, फ़र्ज़, क़र्ज़, जिहादियों, मज़ार, मन्नत, दस्तखत, क़ैद, सुर्ख़ियों आदि) के साथ गलबहियाँ डाले हुए देशज शब्दों ( बिजूखा, छटां, जुगाड़, फूल बगिया, तलक आदि) से गले मिलते हैं।
इन नवगीतों में शब्द युग्मों (नज़र-नज़ारे, पुष्प-पल्लव, विहग वृन्दों, मुग्ध-मौसम, जीव-जगत, अर्पण-तर्पण, विजन वन, फल-फूल, नीड़चूजे, जड़-चेतन, तन-मन, सतरंगी संसार, पापड़-बड़ी-अचार आदि) ने माधुर्य घोला है। नवगीतों में अन्त्यानुप्रास का होना स्वाभाविक है किन्तु कल्पना जी ने छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का भी प्रयोग प्रचुरता से किया है। इन स्थलों पर नवगीतों में रसधार पुष्ट हुई है। देखें: तृषायुक्त तरुवर तृण, सारू सरिता सागर, साँझ सुरमई, सतरंगी संसार, वरद वन्दिता, कचनार काँप कर, चंचल चपल चारुवदना, सचेतना सुभावना सुकमना, मृदु महक माधुरी, सात सुरों का साजवृन्द, मृगनयनी मृदु बयनभाषिणी, कोमल कंचन काया, कवच कठोर कदाचित, कोयलिया की कूक आदि।
कल्पना जी ने नवल भाषिक प्रयोग करने में कमी नहीं की है: जोश की समिधा, वसुधा का वैभव, निकृष्ट नादां, स्वत्व स्वामिनी, खुशरंग हिना आदि ऐसे ही प्रयोग हैं। महलों का माला से स्वागत, वैतरिणी जगताप हरिणी, पीड़ाहरिणी तुम भागीरथी, विजन वनों की गोद में, साधना से सफल पल-पल, चाह चित से कीजिए, श्री गणेश हो शुभ कर्मों का जैसी अभिव्यक्तियाँ सूक्ति की तरह जिव्हाग्र पर प्रतिष्ठित होने का सामर्थ्य रखती हैं
कल्पना जी के इन नवगीतों में राष्ट्रीय गौरव (यही चित्र स्वाधीन देश का, हस्ताक्षर हिंदी के, हिंदी की मशाल, सुनो स्वदेशप्रेमियों, मिली हमें स्वतंत्रता, जयभारत माँ, पूछ रहा है आज देश), पारिवारिक जुड़ाव (बेटी तुम, अनजनमी बेटी, पापा तुम्हारे लिए, कहलाऊं तेरा सपूत, आज की नारी, जीवन संध्या, माँ के बाद के बाद आदि), सामाजिक सरोकार (मद्य निषेध सजा पन्नो पर, हमारा गाँव, है अकेला आदमी, महानगर में, गाँवों में बसा जीवन, गरम धूप में बचपन ढूँढे, आँगन की तुलसी आदि) के गीतों के साथ भारतीय संस्कृति के उत्सवधर्मिता और प्रकृति परकता के गीत भी मुखर हुए हैं। ऐसे नवगीतों में दिवाली, दशहरा, राम जन्म, सूर्य, शरद पूर्णिमा, संक्रांति, वसंत, फागुन, सावन, शरद आदि आ सके हैं।
पर्यावरण और प्रकृति के प्रति कल्पना जी सजग हैं। जंगल चीखा, कागा रे! मुंडेर छोड़ दे, आ रहा पीछे शिकारी, गोल चाँद की रात, क्यों न हम उत्सव् मनाएं?, जान-जान कर तन-मन हर्षा, फिर से खिले पलाश आदि गीतों में उनकी चिंता अन्तर्निहित है। सामान्यतः नवगीतों में न रहनेवाले साग, मुरब्बे, पापड़, बड़ी, अचार, पायल, चूड़ी आदि ने इन नवगीतों में नवता के साथ-साथ मिठास भी घोली है। बगिया, फुलबगिया, पलाश, लता, हरीतिमा, बेल, तरुवर, तृण, पल्लव, कोयल, पपीहे, मोर, भँवरे, तितलियाँ, चूजे, चिड़िया आदि के साथ रहकर पाठक रुक्षता, नीरसता, विसंगतियोंजनित पीड़ा, विषमता और टूटन को बिसर जाता है।
सारतः विवेच्य कृति का जयघोष करती जिजीविषाओं का तूर्यनाद है। इन नवगीतों में भारतीय आम जन की उत्सवधर्मिता और हर्षप्रियता मुखरित हुई है। कल्पना जी जीवन के संघर्षों पर विजय के हस्ताक्षर अंकित करते हुए इन्हें रचती हैं। इन्हें भिन्न परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करना इनके साथ न्याय न होगा। इन्हें गीत-नवगीत के निकष पर न कसकर इनमें निहित रस सलिला में अवगाहन कर आल्हादित अभीष्ट है। कल्पना जी को बधाई जीवट, लगन और सृजन के लिये। सुरुचिपूर्ण और शुद्ध मुद्रण के लिए अंजुमन प्रकाशन का अभिनन्दन।
१३-१-२०१५
समयजयी सिद्धसंत देवरहा बाबा
*
देव भूमि भारत आदिकाल से संतों-महात्माओं की साधना स्थली है. हर पल समाधिस्थ रहनेवाले समयजयी सिद्ध दंत देवरहा बाबा संसार-सरोवर में कमल की तरह रहते हुए पूर्णतः निर्लिप्त थे.
आचार्य शंकर ने जीवन की इस मुक्तावस्था के सम्बन्ध में कहा है:
समाधिनानेन समस्तवासना ग्रंथेर्विनाशोsकर्मनाशः.
अंतर्वहि सर्वत्र एवं सर्वदा स्वरूपवि स्फूर्तिरयत्नतः स्यात..
अर्थात समाधि से समस्त वासना-ग्रंथियाँ नष्ट हो जाती हैं. वासनाओं के नाश से कर्मों का विनाश हो जाता है, जिससे स्वरूप-स्थिति हो जाती है. अग्नि के ताप से जिस तरह स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार समाधि से सत्व-राज-तम रूप मल का निवारण हो जाता है. हरि ॐ तत्सत...
बाबा मेरे जन्म-जन्मान्तर के गुरु हैं, वे विदेह हैं. अनादि काल से अनवरत चली आ रही भारतीय सिद्ध साधन बाबा में मूर्त है. धूप, सीत, वर्षा आदि संसारीं चक्रों से सर्वथा अप्रभावित, अष्टसिद्ध योगी बाबा सबपर सदा समान भाव से दया-दृष्टि बरसाते रहते थे. वे सच्चे अर्थ में दिगम्बर थे अर्थात दिशाएँ ही उनका अम्बर (वस्त्र) थीं. वे वास्तव में धरती का बिछौना बिछाते थे, आकाश की चादर ओढ़ते थे. शुद्ध जीवात्मायें उनकी दृष्टि मात्र से अध्यात्म-साधन के पथ पर अग्रसर हो जाती थीं. वे सदैव परमानंद में निमग्न रहकर सर्वात्मभाव से सभी जीवों को कल्याण की राह दिखाते हैं.
जय अनादि,जय अनंत,
जय-जय-जय सिद्ध संत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
धरा को बिछौनाकर, नील गगन-चादर ले.
वस्त्रकर दिशाओं को, अमृत मन्त्र बोलते..
सत-चित-आनंदलीन, समयजयी चिर नवीन.
साधक-आराधक हे!, देव-लीन, थिर-अदीन..
नश्वर-निस्सार जगत,
एकमात्र ईश कंत..
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
''दे मत, कर दर्शन नित, प्रभु में हो लीन चित.''
देते उपदेश विमल, मौन अधिक, वाणी मित..
योगिराज त्यागी हे!, प्रभु-पद-अनुरागी हे!
सतयुग से कलियुग तक, जीवित धनभागी हे..
'सलिल' अनिल अनल धरा,
नभ तुममें मूर्तिमंत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
पूज्यपाद बाबाजी द्वारा लिखाया गया और 'योगिराज देवरहा बाबा के चमत्कार' शीर्षक पुस्तक में प्रकाशित लेख का कुछ अंश बाबाश्री के आशीर्वाद-स्वरूप प्रस्तुत है:
''धारणा, ध्यान और समाधि- इन तीनों का सामूहिक नाम संयम है. संयम से अनेक प्रकार की विभूतियाँ प्राप्त होती हैं परन्तु योगी का लक्ष्य विभूति-प्राप्ति नहीं है, परवैराग्य प्राप्ति है. 'योग दर्शन' में विभूतियों का वर्णन केवल इसलिए किया गया है कि योगी इनके यथार्थ रूप को समझकर उनसे आकृष्ट न हो. योगदर्शन का विभूतिपाद साधनपाद की ही कड़ी है..... विभूतिपाद में इसी प्रकार की विभूतियों का विस्तार से वर्णन हुआ है-जैसे सब प्राणियों की वाणी का ज्ञान, परचित्त ज्ञान, मृत्यु का ज्ञान, लोक-लोकान्तरों का ज्ञान, आपने शरीर का ज्ञान, चित्त के स्वरूप का ज्ञान इत्यादि. संयम के ही द्वारा योगी अंतर्ध्यान हो सकता है, अधिक से अधिक शक्ति प्राप्त कर सकता है, परकाया में प्रवेश कर सकता है, लोक-लोकान्तरों में भ्रमण कर सकता है और अष्टसिद्धियों और नवनिधियों को प्राप्तकर सकता है.
बच्चा! योग एक बड़ी दुर्लभ और विचित्र अवस्था है. योगी की शक्ति और ज्ञान अपरिमित होते हैं. उसके लिये विश्व की कोई भी वस्तु असंभव नहीं है. ईश्वर की शक्ति माया है और योगी की शक्ति योगमाया है. 'सर्वम' के सिद्धांत को योगी कभी भी प्रत्यक्ष कर सकता है. आज विज्ञान ने जिस शक्ति का संपादन किया है, वह योगशक्ति का शतांश या सहस्त्रांश भी नहीं है. योगी के लिये बाह्य उपादानों की अपेक्षा नहीं है.
मैं तो यह कहता हूँ कि यदि योगी चाहे तो अपने सत्य-संकल्प से सृष्टि का भी निर्माण कर सकता है. वह ईश्वर के समान सर्वव्यापक है. अष्टसिद्धियाँ भी उसके लिये नगण्य हैं. वह अपनी संकल्प-शक्ति से एक ही समय में अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है. उसे शरीर से कहीं आना-जाना नहीं पड़ता.
बच्चा! योगी को न विश्वास की परवाह है, न प्रदर्शन की आवश्यकता है, जो सिद्धियों का प्रदर्शन करता है, उसे योगी कहना ही नहीं चाहिए.
एक कथा है: आपने किसी योगिराज गुरुसे योग की शिक्षा प्राप्तकर एक महात्मा योग-साधना करने लगे. कुछ समय पश्चात् महात्मा को सिद्धियाँ प्राप्त होने लगीं. महात्मा एक दिन आपने गुरुदेव के दर्शन करने के लिये चल दिए. योगिराज का आश्रम एक नदी के दूसरे किनारे पर था. नदी में बड़ी बाढ़ थी और चारों ओर तूफ़ान था. महात्मा को नदी पारकर आश्रम में पहुँचना था. अपनी सिद्धि के बलपर महात्मा योंही जलपर चल दिए और नदी को पारकर आश्रम में पहुँचे. गुरुदेव ने नदी पार करने के साधन के सम्बन्ध में पूछा तो महात्मा ने अपनी सिद्धि का फल बता दिया. योगिराज ने कहा कि तुमने दो पैसे के बदले अपनी वर्षों की तपस्या समाप्त कर ली. तुम योग-साधन के योग्य नहीं हो.
१३.१.२०१४
***

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

सलिल सृजन १२ जनवरी, सरस्वती, विवेकानंद, सॉनेट, दोहा, नवगीत,

सलिल सृजन १२ जनवरी
दोहा सलिला सूरज मजदूरी करे, लगातार दिन-रात। मिले मंजूरी कुछ नहीं, तपे आप बेबात।।
• हिंदी-संतति कर रही, अंग्रेजी में बात। परदेसन के पग कमल, घरवाली की लात।। •
करें अंजना को नमन, नित्य सुमिर हनुमान। दें आशीष करें कृपा, पल पल सिय-भगवान।।
१२.१.२०१४
•••
मुक्तिका
*
इस-उस में उलझा रही
आस व्यर्थ भटका रही
मस्ती में हैं लीन मन
मौन जिह्वा बतला रही
कलकल-कलरव सुन विहँस
किलकिल चुप बिसरा रही
शब्द संपदा बचा रख
सबक सीख; सिखला रही
नयन मूँद कर देख हरि
नियति तुझे मिलवा रही
१२-१-२०२३
***
बाल सॉनेट
चिड़िया
*
चूँ चूँ चिड़िया फुर्र उड़े।
चुग्गा चुग चुपचाप।
चूजे चें-चें कर थके।।
लपक चुगाती आप।।
पंखों में लेती लुका।
कोई करे न तंग।
प्रभु का करती शुक्रिया।।
विपदा से कर जंग।।
पंख उगें तब नीड़ से
देखी आप निकाल।
उड़ गिर उठ नभ नाप ले
व्यर्थ बजा मत गाल।।
खोज संगिनी घर बसा।
लूट जिंदगी का मजा।।
***
सॉनेट
विवेकानंद
*
मिल विवेक आनंद जब दिखलाते हैं राह।
रामकृष्ण सह सारदा मिल करते उद्धार।
नर नरेंद्र-गुरु भक्ति जब होती समुद अथाह।।
बनें विवेकानंद तब कर शत बाधा पार।।
गुरु-प्रति निष्ठा-समर्पण बन जीवन-पाथेय।
संकट में संबल बने, करता आत्म प्रकाश।
विधि-हरि-हर हों सहायक, भाव-समाधि विधेय।।
धरती को कर बिछौने, ओढ़े हँस आकाश।।
लगन-परिश्रम-त्याग-तप, दीन-हीन सेवार्थ।
रहा समर्पित अहर्निश मानव-मानस श्रेष्ठ।
सर्व धर्म समभाव को जिया सदा सर्वार्थ।।
कभी न छू पाया तुम्हें, काम-क्रोध-मद नेष्ठ।।
जाकर भी जाते नहीं, करते जग-कल्याण।
स्वामि विवेकानंद पथ, अपना तब हो त्राण।।
१२-१-२०२२
***
विमर्श
क्या सरस्वती वास्तव में एक फारसी देवी अनाहिता हैं ?
*
या कुन्देंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणा वर दण्ड मंडित करा, या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभितभिर्सदा वंदिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निश्शेष जाड्यापहा।
“देवी सरस्वती चमेली के रंग के चंद्रमा की तरह श्वेत हैं, जिनकी शुद्ध सफेद माला ठंडी ओस की बूंदों की तरह है, जो दीप्तिमान सफेद पोशाक में सुशोभित हैं, जिनकी सुंदर भुजा वीणा पर टिकी हुई है, और जिसका सिंहासन एक सफेद कमल है। जो ब्रह्मा को अच्युत रखतीं और शिवादि देवों द्वारा वन्दित हैं, मेरी रक्षा करें । आप मेरी सुस्ती, और अज्ञानता को
दूर करिये। "
ऋग्वेद में सरस्वती को "सरम वरति इति सरस्वती" के रूप में समझाया गया है - "वह जो पूर्ण की ओर बहती है वह सरस्वती है" - ३ री - ४ थी
सहस्राब्दी, ई.पू. में नदी स्वरास्वती एक प्रमुख जलधारा थी। यह खुरबत की खाड़ी से सुरकोटदा और कोटड़ा तक और नारा-हकरा-घग्गर-सरस्वती चैनलों के माध्यम से, मथुरा के माध्यम से ऊपर की ओर फैल गयी। यह दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तानों में से एक, मरुस्थली रेगिस्तान से सीधे बहती थी। इस नदी को वेदों में "सभी नदियों की माँ" के रूप में वर्णित किया गया है, जिसे सबसे शुद्ध और शुभ माना जाता है। प्रचलित मानसूनी हवाओं के कारण जब यह नदी सूख गई, तो इसके किनारे रहने वाली सभ्यता कुभा नदी में चली गई, और उस नदी का नाम बदलकर अवेस्तां सरस्वती (हराहवती) कर दिया। उपनिषदों में यह माना जाता है कि जब देवताओं को अग्नि / अग्नि को समुद्र में ले जाने की आवश्यकता थी, तो इसके जल की शुद्धता के लिए सरस्वती को जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि यह कार्य पूरा हुआ, लेकिन कुछ का मानना ​​है कि इस प्रक्रिया में नदी सूख गई।
फारसी कनेक्शन
अरदेवी सुरा अनाहिता ( Arədvī Sārā Anāhitā)); एक इंडो-ईरानी कॉस्मोलॉजिकल फिगर की एवेस्टन भाषा का नाम 'वाटर्स' (अबान) की दिव्यता के रूप में माना जाता है और इसलिए प्रजनन क्षमता, चिकित्सा और ज्ञान से जुड़ा है। अर्देवी सुरा अनाहिता मध्य में अर्दवीसुर अनाहिद या नाहिद है और आधुनिक फारसी, अर्मेनियाई में अनाहित। सरस्वती की तरह, अनाहिता को उसके पिता अहुरा मज़्दा (ब्रह्मा) से शादी करने के लिए जाना जाता है। दोनों तीन कार्यों के तत्वों के अनुरूप हैं। जॉर्ज डूमज़िल ने प्रोटो-इंडो-यूरोपीय धर्म में शक्ति संरचना पर काम करने वाले एक दार्शनिक ने कहा कि अनाहिता वी 85-87 में योद्धाओं द्वारा 'आर्द्र, मजबूत और बेदाग' के रूप में विकसित किया गया है, तत्वों को तीसरे, दूसरे और दूसरे को प्रभावित करता है। पहला समारोह। और उन्होंने वैदिक देवी वाक्, परिभाषित भाषण के मामले में एक समान संरचना पर ध्यान दिया, जो पुरुष देवता मित्रा-वरुण (पहला कार्य), इंद्र-अग्नि (दूसरा कार्य) और दो अश्व (तीसरा कार्य) को बनाए रखने के रूप में प्रतिनिधित्व करता है। सरस्वती के बारे में कहा जाता है कि वह मां के गर्भ में भ्रूण का रोपण करती है।
आर्टेमिस, कुंवारी शिकारी
मिथरिक पंथ में, अनहिता को मिथरा की कुंवारी माँ माना जाता था। क्या यह सही है? यह देखना दिलचस्प है कि 25 दिसंबर को एक प्रसिद्ध फ़ारसी शीतकालीन त्योहार मैथैरिक परंपराओं से ईसाई धर्म में आया और क्रिसमस मनाया।रोमन साम्राज्य में मिथ्रावाद इतना लोकप्रिय था और ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण पहलुओं के समान था कि कई चर्च पिता निश्चित रूप से, इसे संबोधित करने के लिए मजबूर थे। इन पिताओं में जस्टिन मार्टियर, टर्टुलियन, जूलियस फर्मिकस मेटरनस और ऑगस्टाइन शामिल थे, जिनमें से सभी ने इन हड़ताली पत्राचारों को प्रस्तोता शैतान के लिए जिम्मेदार ठहराया। दूसरे शब्दों में, मसीह की आशा करते हुए, शैतान ने आने वाले मसीहा की नकल करके पैगनों को मूर्ख बनाने के बारे में निर्धारित किया। हकीकत में, इन चर्च पिताओं की गवाही इस बात की पुष्टि करती है कि ये विभिन्न रूपांकनों, विशेषताओं, परंपराओं और मिथकों को ईसाई धर्म से प्रभावित करते हैं।
जापान में सरस्वती
बेनज़ाइटन हिंदू देवी सरस्वती का जापानी नाम है। बेन्ज़िटेन की पूजा 8 वीं शताब्दी के माध्यम से 6 वीं शताब्दी के दौरान जापान में पहुंची, मुख्य रूप से गोल्डन लाइट के सूत्र के चीनी अनुवादों के माध्यम से , जो उसके लिए समर्पित एक खंड है। लोटस सूत्र में उसका उल्लेख भी किया गया है और अक्सर एक पूर्वाग्रह , सरस्वती के विपरीत एक पारंपरिक जापानी लुटे का चित्रण किया जाता है , जो एक कड़े वाद्य यंत्र के रूप में जाना जाता है, जिसे वीणा कहा जाता है।
हड़प्पा की मुहरों में सरस्वती और उषा
One of the frequently occurring signs in the seal is the compound symbol which occurs on 236 seals. Many scholars have held that the Indus symbols are often conjugated. Thus the symbol can be seen as a compound between and the symbol which may represent the sceptre which designated royal authority and may thus be read as ‘Ras’. The symbol-pair occurs in 131 texts and in many copper plate inscriptions which shows its great religious significance. The ending ‘Tri’ or ’Ti’ is significant and cannot but remind one of the great Tri-names like Saraswati and Gayatri. As Uksha was often shortened to ‘Sa’ the sign-pair becomes Sarasa-tri or Sarasvati.
१२-१-२०२०
***
नवगीत
कौन नहीं?
*
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
इसके पग में
जात-पाँत की
बेड़ी पड़ी हुई।
कर को कसकर
ऊँच-नीच जकड़े
हथकड़ी मुई।
छूत-अछूत
न मन से बिसरा
रहा अड़ाता टाँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
तिलक-तराजू
की माया ने
बाँध दई ठठरी।
लोकतंत्र के
काँध लदी
परिवारवाद गठरी।
मित्रो! कह छलते
जनगण को जब-तब
रचकर स्वांग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
वैताली ममता
काँधे पर लदा
स्वार्थ वैताल।
चचा-भतीजा
आप ठोंकते
खोद अखाड़ा ताल।
सैनिक भूखा
करे सियासत
आरक्षण की माँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
१२.१.२०१७
***
नवगीत:
.
दर्पण का दिल देखता
कहिए, जग में कौन?
.
आप न कहता हाल
भले रहे दिल सिसकता
करता नहीं खयाल
नयन कौन सा फड़कता?
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन
.
पूछे नहीं सवाल
नहीं किसी से हिचकता
कभी न देता टाल
और न किंचित ललकता
रूप-अरूप निहारता
लेकिन रहता मौन
.
रहता है निष्पक्ष
विश्व हँसे या सिसकता
सब इसके समकक्ष
जड़ चलता या फिसलता
माने सबको एक सा
हो आधा या पौन
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)
***
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
१२-१-२०१५
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मुक्तिका:
है यही वाजिब...
संजीव 'सलिल'
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है यही वाज़िब ज़माने में बशर ऐसे जिए।
जिस तरह जीते दिवाली रात में नन्हे दिए।।
रुख्सती में हाथ रीते ही रहेंगे जानते
फिर भी सब घपले-घुटाले कर रहे हैं किसलिए?
घर में भी बेघर रहोगे, चैन पाओगे नहीं,
आज यह, कल और कोई बाँह में गर चाहिए।।
चाक हो दिल या गरेबां, मौन ही रहना 'सलिल'
मेहरबां से हो गुजारिश- 'और कुछ फरमाइए'।।
आबे-जमजम की सभी ने चाह की लेकिन 'सलिल'
कोई तो हो जो ज़हर के घूँट कुछ हँसकर पिए।।
१२.१.२०१३
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