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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

अष्टावक्र, रेफ, स्त्री विमर्श, मातृ वंदना, मुक्तिका, गीत, सॉनेट, हाइकु गीत, मुक्तक

 सलिल सृजन- २२ दिसंबर 

हाइकु गीत
जोड़-घटाना
प्रेम-नफरत को,
जीवन जीना.....
गुणा करना / परिश्रम का मीत / मत थकना।
भाग करना / थकावट का, जीत / मत रुकना।।
याद रखना
वस्त्र फ़टे या दिल
तुरंत सीना.....
प्रेम परिधि / संदेह के चाप से / कट न सके।
नेह निधि / आय घट-बढ़ से / घट न सके।।
नहीं फलता
गैर का प्राप्य यदि
तुमने छीना.....
जीवन रेखा / सरल हो या वक्र / टूट न सके।
भाग्य का लेखा / हाथ में लिया हाथ / छूट न सके।।
लाज का पर्दा
लोहे से मजबूत
किंतु है झीना.....
संजीव
२२-१२-२०२२, २०.३३
जबलपुर
***
सॉनेट
गणपति
*
जय जय गणपति!, ऋद्धि-सिद्धिपति, मंगलकर्ता, हे प्रथमेश।
भव बाधा हर, हे शब्देश्वर!, सदय रहो प्रभु जोड़ूँ हाथ।
जयति गजानन, जय मतिदाता, शिवा तनय जय, हे विघ्नेश।।
राह न भटकूँ, कहीं न अटकूँ, पैर न पटकूँ, बल दो नाथ।।
वंदन-चंदन, कर अभिनंदन, करूँ स्तवन नित, हे सर्वेश!
जगजननी-जगपिता की कृपा, हो हम पर ऐसा वर दो।
विधि-हरि, शारद-रमा कृपा पा, भज पाएँ हम तुम्हें हमेश।।
करें काम निष्काम भाव से, शांति निकेतन सा घर दो।।
सत्य सनातन कह पाएँ जो ऐसी रचनाएँ हो दैव।
समयसाsक्षी घटनाओं में देखें-दिखा प्रगति की रेख।
चित्र गुप्त हो हरदम उज्जवल, निर्मल हो आचार सदैव।।
सकल सृष्टि परिवार हमारा, प्रकृति मैया पाएँ लेख।।
जय जय दीनानाथ! दयामय, द्रुतलेखी जय जय कलमेश!
रहे नर्मदा जीवन यात्रा, हर लो सारे कष्ट-कलेश।।
२२-१२-२०२१
***
सॉनेट
विवाह
*
चट मँगनी पट माँग भराई।
दुलहा सूरज दुल्हन धूप है।
उषा निहारे खूब रूप है।।
सास धरा को बहू सुहाई।।
द्वार हरिद्रा-छाप लगाई।
छाप पाँव की शुभ अनूप है।
सुतवधु रानी, पुत्र भूप है।।
जोड़ी विधि ने भली मिलाई।।
भौजाई की कर पहुनाई।
है हर्षाई ननदी कोयल।
नाचे मिट्ठू, देवर झूमे।।
ससुर गगन दे मुँह दिखराई।
सँकुचाई बरबस वधु चंचल
नजर बजा सूरज वधु चूमे।।
२२-१२-२०२१
***
सॉनेट
नारी
*
शारद-रमा-उमा की जय-जय, करती दुनिया सारी।
भ्रांति मिटाने साथ हाथ-पग बढ़ें तभी हो क्रांति।
एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से भारी नारी।।
सफल साधना तभी रहे जब जीवन में सुख-शांति।।
जाया-माया, भोगी-भोग्या, चित-पट अनगिन रंग।
आशा पुष्पा दे बगिया को, सुषमा-किरण अनंत।
पूनम तब जब रहे ज्योत्सना, रजनीपति के संग।।
उषा-दुपहरी-संध्या सहचर दिनपति विभा दिगंत।।
शिक्षा-दीक्षा, रीति-नीति बिन सार्थक हुई न श्वासा।
क्षुधा-पिपासा-तृष्णा बिना हो, जग-जीवन बेरंग।
कीर्ति-प्रतिष्ठा, सज्जा-लज्जा से जीवन मधुमासा।।
राधा धारा भक्ति-मुक्ति की, शुभ्रा-श्वेता संग।।
अमला विमला धवला सरला, सुख प्रदायिनी नारी।
मैया भगिनि भामिनि भाभी पुत्री सखी दुलारी।।
२२-१२-२०२१
***
सुभाषित
*अस्थिरं जीवितं लोके, अस्थिरे धनयौवने।*
*अस्थिरा: पुत्रदाराश्च, धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरं*।।
अस्थिर जीवित लोक, धन यौवन स्थिर है नहीं।
सुत-स्त्री अस्थिर यहाँ, धर्म-कीर्ति स्थिर रहे।।
अर्थात्- इस जगत में जीवन सदा नही रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा नहीं रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा नहीं रहने वाले हैं ;केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं॥
***
प्रात नमन स्वीकार कीजिए हे माधव।
स्वप्न सभी साकार कीजिए हे माधव।।
राघव सा लाघव, सीता सी मर्यादा
युत हमको आचार दीजिए हे माधव।।
वृंदा को जो छले न ऐसे हरि हों हम
शूर्पणखा हित लखन भेजिए हे माधव।।
नगरवधू से मुक्त समूचा भारत हो
गृहवधुओं सज्जित गृह करिए हे माधव।।
नेता हों रणछोड़; न लूटें जनगण को
गो गिरि वन नद पीड़ा हरिए हे माधव।।
हिरणकशिपु सेठों की भस्म करें लंका
जनहित-पथ पर फिर पग धरिए हे माधव।।
कंस प्रशासन ऐश कर रहा जन-धन पर
दर्प हरें कालिय फण नचिए हे माधव।।
न्याय व्यवस्था बंदी काले कोटों की
इन्हें दूर कर श्वेत-सरल करिए माधव।।
श्रीराधे को हृदय बसी छवि जो मधुरिम
वह से सलिल-हृदय में हँस बसिए माधव।।
२२-१२-२०१९
***
मुक्तक:
*
दे रहे सब कौन सुनता है सदा?
कौन किसका कहें होता है सदा?
लकीरों को पढ़ो या कोशिश करो-
वही होता जो है किस्मत में बदा।
*
ठोकर खाएँ नहीं हम हार मानते।
कारण बिना नहीं किसी से रार ठानते।।
कुटिया का छप्पर भी प्यारा लगता-
संगमर्मरी ताजमहल हम न जानते।।
*
तम तो पहले भी होता था, ​अब भी होता है।
यह मनु पहले भी रोता था, अब रोता है।।
पहले थे परिवार, मित्र, संबंधी उसके साथ-
आज न साया संग इसलिए धीरज खोता है।।
२२.१२.२०१८
***
मुक्तक
*
जब बुढ़ापा हो जगाता रात भर
याद के मत साथ जोड़ो मन इसे.
प्रेरणा, जब थी जवानी ली नहीं-
मूढ़ मन भरमा रहा अब तू किसे?
२२-१२-२०१६
***
सामयिक गीत :
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
तुम ही नहीं सयाने जग में
तुम से कई समय के मग में
धूल धूसरित पड़े हुए हैं
शमशानों में गड़े हुए हैं
अवसर पाया काम करो कुछ
मिलकर जग में नाम करो कुछ
रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही
झिला रहे हो, झेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
दलबंदी का दलदल घातक
राजनीति है गर्हित पातक
अपना पानी खून बताएँ
खून और का व्यर्थ बहाएँ
सच को झूठ, झूठ को सच कह
मैली चादर रखते हो तह
देशहितों की अनदेखी कर
अपनी नाक नकेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
२१-१२-२०१५
***
मुक्तिका:
नए साल का अभिनंदन
अर्पित है अक्षत-चंदन
तम हरने दीपक जलता
कब कहता है लगी अगन
कोशिश हार न मानेगी
मरु को कर दे नंदन वन
लक्ष्य वही वर पाता है
जो प्रयास में रहे मगन
बाधाओं को विजय करे
दृढ़ हो जिसका अंतर्मन
गिर मत रुक, उठ आगे बढ़
मत चुकने दे 'सलिल' लगन
बंदूकों से 'सलिल' न डर
जीता भय पर सदा अमन
२२.१२.२०१४
***
धूप -छाँव: बात निकलेगी तो फिर
गुजरे वक़्त में कई वाकये मिलते हैं जब किसी साहित्यकार की रचना को दूसरे ने पूरा किया या एक की रचना पर दूसरे ने प्रति-रचना की. अब ऐसा काम नहीं दिखता। संयोगवश स्व. डी. पी. खरे द्वारा गीता के भावानुवाद को पूर्ण करने का दायित्व उनकी सुपुत्री श्रीमती आभा खरे द्वारा सौपा गया. किसी अन्य की भाव भूमि पर पहुँचकर उसी शैली और छंद में बात को आगे बढ़ाना बहुत कठिन मशक है. धूप-छाँव में हेमा अंजुली जी के कुछ पंक्तियों से जुड़कर कुछ कहने की कोशिश है. आगे अन्य कवियों से जुड़ने का प्रयास करूंगा ताकि सौंपे हुए कार्य के साथ न्याय करने की पात्रता पा सकूँ. पाठक गण निस्संकोच बताएं कि पूर्व पंक्तियों और भाव की तारतम्यता बनी रह सकी है या नहीं? हेमा जी को उनकी पंक्तियों के लिये धन्यवाद।
हेमा अंजुली
इतनी शिद्दत से तो उसने नफ़रत भी नहीं की ....
जितनी शिद्दत से हमने मुहब्बत की थी.
.
सलिल:
अंजुली में न नफरत टिकी रह सकी
हेम पिघला फिसल बूँद पल में गई
साथ साये सरीखी मोहब्बत रही-
सुख में संग, छोड़ दुख में 'सलिल' छल गई
*
हेमा अंजुली
तुम्हारी वो एक टुकड़ा छाया मुझे अच्छी लगती है
जो जीवन की चिलचिलाती धूप में
सावन के बादल की तरह
मुझे अपनी छाँव में पनाह देती है
.
सलिल
और तुम्हारी याद
बरसात की बदरी की तरह
मुझे भिगाकर अपने आप में सिमटना
सम्हलना सिखा आगे बढ़ा देती है.
*
हेमा अंजुली
कभी घटाओं से बरसूँगी ,
कभी शहनाइयों में गाऊँगी,
तुम लाख भुलाने कि कोशिश कर लो,
मगर मैं फिर भी याद आऊँगी ...
.
सलिल
लाख बचाना चाहो
दामन न बचा पाओगे
राह पर जब भी गिरोगे
तुम्हें उठायेंगे
*
हेमा अंजुली
छाने नही दूँगी मैं अँधेरो का वजूद
अभी मेरे दिल के चिराग़ बाकी हैं
.
सलिल
जाओ चाहे जहाँ मुझको करीब पाओगे
रूह में खनक के देखो कि आग बाकी है
*
हेमा अंजुली
सूरत दिखाने के लिए तो
बहुत से आईने थे दुनिया में
काश! कि कोई ऐसा आईना होता
जो सीरत भी दिखाता
.
सलिल
सीरत 'सलिल' की देख टूट जाए न दर्पण
बस इसलिए ही आइना सूरत रहा है देख
***
मुक्तक
मन-वीणा जब करे ओम झंकार
गीत हुलास कर खटकाते हैं द्वार
करे संगणक स्वागत टंकण यंत्र-
सरस्वती मैया की जय-जयकार
***
मातृ वंदना -
*
ममतामयी माँ नंदिनी-करुणामयी माँ इरावती।
सन्तान तेरी मिल उतारें, भाव-भक्ति से आरती...
लीला तुम्हारी हम न जानें, भ्रमित होकर हैं दुखी।
सत्पथ दिखाओ माँ, बने सन्तान सब तेरी सुखी॥
निर्मल ह्रदय के भाव हों, किंचित न कहीं अभाव हों-
सात्विक रहे आचार, माता सदय रहो निहारती..
कुछ काम जग के आ सकें, महिमा तुम्हारी गा सकें।
सत्कर्म कर आशीष मैया!, पुत्र तेरे पा सकें॥
निष्काम औ' निष्पक्ष रह, सब मोक्ष पायें अंत में-
निश्छल रहें मन-प्राण, वाणी नित तम्हें गुहारती...
चित्रेश प्रभु केकृपा मैया!, आप ही दिलवाइये।
जैसे भी हैं, हैं पुत्र माता!, मत हमें ठुकराइए॥
कंकर से शंकर बन सकें, सत-शिव औ' सुंदर वर सकें-
साधना कर सफल, क्यों मुझ 'सलिल' को बिसारती...
२१-१२-२०१२
***
विचार-विमर्श नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल'
*
दिल्ली ही नहीं अन्यत्र भी भारत हो या अन्य विकसित, विकासशील या पिछड़े देश, भाषा-भूषा, धर्म, मजहब, आर्थिक स्तर, शैक्षणिक स्तर, वैज्ञानिक उन्नति या अवनति सभी जगह नारी उत्पीडन एक सा है. कहीं चर्चा में आता है, कहीं नहीं किन्तु इस समस्या से मुक्त कोई देश या समाज नहीं है.
फतवा हो या धर्मादेश अथवा कानून नारी से अपेक्षाएं और उस पर प्रतिबन्ध नर की तुलना में अधिक है. एक दृष्टिकोण 'जवान हो या बुढ़िया या नन्हीं सी गुडिया, कुछ भी हो औरत ज़हर की है पुड़िया' कहकर भड़ास निकलता है तो दूसरा नारी संबंधों को लेकर गाली देता है.
यही समाज नारी को देवी कहकर पूजता है यही उसे भोगना अपना अधिकार मानता है.
'नारी ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया' यदि मात्र यही सच है तो 'एक नहीं दो-दो मात्राएँ नर से भारी नारी' कहनेवाला पुरुष आजीवन माँ, बहन, भाभी, बीबी या कन्या के स्नेहानुशासन में इतना क्यों बंध जाता है 'जोरू का गुलाम कहलाने लगता है.
स्त्री-पीड़ित पुरुषों की व्यथा-कथा भी विचारणीय है.
घर में स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखनेवाला युवा अकेली स्त्री को देखते ही भोगने के लिए लालायित क्यों हो जाता है?
ऐसे घटनाओं के अपराधी को दंड क्या और कैसे दिया जाए? इन बिन्दुओं पर विचार-विमर्श आवश्यक प्रतीत होता है. आपका स्वागत है।
२२-१२-२०१२
***
विमर्श : रेफ युक्त शब्द
राकेश खंडेलवाल
रेफ़ वाले शब्दों के उपयोग में अक्सर गलती हो जाती हैं। हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है। '
१. कर्म, धर्म, सूर्य, कार्य
२. प्रवाह, भ्रष्ट, ब्रज, स्रष्टा
३. राष्ट्र, ड्रा
जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है, जिसके ऊपर यह लगता है। रेफ़ के उपयोग में ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वर के ऊपर नहीं लगाया जाता। यदि अर्ध 'र' के बाद का वर्ण आधा हो, तब यह बाद वाले पूर्ण वर्ण के ऊपर लगेगा, क्योंकि आधा वर्ण में स्वर नहीं होता। उदाहरण के लिए कार्ड्‍‍स लिखना गलत है। कार्ड्स में ड् स्वर विहीन है, जिस कारण यह रेफ़ का भार वहन करने में असमर्थ है। इ और ई जैसे स्वरों में रेफ़ लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए स्पष्ट है कि किसी भी स्वर के ऊपर रेफ़ नहीं लगता।
ब्रज या क्रम लिखने या बोलने में ऐसा लगता है कि यह 'र' की अर्ध ध्वनि है, जबकि यह पूर्ण ध्वनि है। इस तरह के शब्दों में 'र' का उच्चारण उस वर्ण के बाद होता है, जिसमें यह लगा होता है ,
जब भी 'र' के साथ नीचे से गोल भाग वाले वर्ण मिलते हैं, तब इसके /\ रूप क उपयोग होता है, जैसे-ड्रेस, ट्रेड, लेकिन द और ह व्यंजन के साथ 'र' के / रूप का उपयोग होता है, जैसे- द्रवित, द्रष्टा, ह्रास।
संस्कृत में रेफ़ युक्त व्यंजनों में विकल्प के रूप में द्वित्व क उपयोग करने की परंपरा है। जैसे- कर्म्म, धर्म्म, अर्द्ध। हिंदी में रेफ़ वाले व्यंजन को द्वित्व (संयुक्त) करने का प्रचलन नहीं है। इसलिए रेफ़ वाले शब्द गोवर्धन, स्पर्धा, संवर्धन शुद्ध हैं।
''जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है। '' के संबंध में नम्र निवेदन है कि रेफ कभी भी 'शब्द' पर नहीं लगाया जाता. शब्द के जिस 'अक्षर' या वर्ण पर रेफ लगाया जाता है, उसके पूर्व बोला या उच्चारित किया जाता है।
- संजीव सलिल:
''हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है.'' के संदंर्भ में निवेदन है कि हिन्दी में 'र' का संयुक्त रूप से प्रयोग चार तरीकों से होता है। उक्त अतिरिक्त ४. कृष्ण, गृह, घृणा, तृप्त, दृष्टि, धृष्ट, नृप, पृष्ठ, मृदु, वृहद्, सृष्टि, हृदय आदि। यहाँ उच्चारण में छोटी 'इ' की ध्वनि समाविष्ट होती है जबकि शेष में 'अ' की।
यथा: कृष्ण = krishn, क्रम = kram, गृह = ग्रिह grih, ग्रह = grah, श्रृंगार = shringar, श्रम = shram आदि।
राकेश खंडेलवाल :
एक प्रयोग और: अब सन्दर्भ आप ही तलाशें:
दोहा:-
सोऽहं का आधार है, ओंकार का प्राण।
रेफ़ बिन्दु वाको कहत, सब में व्यापक जान।१।
बिन्दु मातु श्री जानकी, रेफ़ पिता रघुनाथ।
बीज इसी को कहत हैं, जपते भोलानाथ।२।
हरि ओ३म तत सत् तत्व मसि, जानि लेय जपि नाम।
ध्यान प्रकाश समाधि धुनि, दर्शन हों बसु जाम।३।
बांके कह बांका वही, नाम में टांकै चित्त।
हर दम सन्मुख हरि लखै, या सम और न बित्त।४।
रेफ का अर्थ:
-- वि० [सं०√रिफ्+घञवार+इफन्] १. शब्द के बीच में पड़नेवाले र का वह रूप जो ठीक बाद वाले स्वरांत व्यंजन के ऊपर लगाया जाता है। जैसे—कर्म, धर्म, विकर्ण। २. र अक्षर। रकार। ३. राग। ४. रव। शब्द। वि० १. अधम। नीच। २. कुत्सित। निन्दनीय। -भारतीय साहित्य संग्रह.
-- पुं० [ब० स०] १. भागवत के अनुसार शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत् के पुत्र मेधातिथि के सात पुत्रों में से एक। २. उक्त के नाम पर प्रसिद्ध एक वर्ष अर्थात् भूखंड।
रेफ लगाने की विधि : डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', शब्दों का दंगल में
हिन्दी में रेफ अक्षर के नीचे “र” लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है?
यदि ‘र’ का उच्चारण अक्षर के बाद हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के नीचे लगेगी जिस के बाद ‘र’ का उच्चारण हो रहा है। यथा - प्रकाश, संप्रदाय, नम्रता, अभ्रक, चंद्र।
हिन्दी में रेफ या अक्षर के ऊपर "र्" लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र्’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? “र्" का उच्चारण जिस अक्षर के पूर्व हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के ऊपर लगेगी जिस के पूर्व ‘र्’ का उच्चारण हो रहा है । उदाहरण के लिए - आशीर्वाद, पूर्व, पूर्ण, वर्ग, कार्यालय आदि ।
रेफ लगाने के लिए जहाँ पूर्ण "र" का उच्चारण हो रहा है वहाँ उस अक्षर के नीचे रेफ लगाना है जिसके पश्चात "र" का उच्चारण हो रहा है। जैसे - प्रकाश, संप्रदाय , नम्रता, अभ्रक, आदि में "र" का पूर्ण उच्चारण हो रहा है ।
*
६३ ॥ श्री अष्टा वक्र जी ॥
दोहा:-
रेफ रेफ तू रेफ है रेफ रेफ तू रेफ ।
रेफ रेफ सब रेफ है रेफ रेफ सब रेफ ॥१॥
*
१५२ ॥ श्री पुष्कर जी ॥
दोहा:-
रेफ बीज है चन्द्र का रेफ सूर्य का बीज ।
रेफ अग्नि का बीज है सब का रेफैं बीज ॥१॥
रेफ गुरु से मिलत है जो गुरु होवै शूर ।
तो तनकौ मुश्किल नहीं राम कृपा भरपूर ॥२॥
*
चलते-चलते : अंग्रेजी में रेफ का प्रयोग सन्दर्भ reference और खेल निर्णायक refree के लिये होता है.
***

गुरुवार, 21 दिसंबर 2023

लाँगुरिया, चंद्रयान, सॉनेट, श्यामलाल उपाध्याय, गीत, दोहा, हाइकु गीत-मुक्तक

सलिल सृजन २१ दिसंबर 
*
|| लाँगुरिया लोकगीत ||
इसरो बारौ धरा छोड़ चंदा पै लैग्यो लाँगुरिया!

ध्वजा तिरंगी एल वी एम पे जिसको ऊजर रंग,
ए टी एल-केल्ट्रॉन-कार्टस खूब निभाओ संग,
धू-धू इंजन जलो, भगो रे रॉकेट राम-बान सम लाँगुरिया!
प्रोपल्शन-इंटर-लैंडर मॉड्यूल ने करो कमाल, 
भू कक्षा में परकम्मा कर सबने कियो धमाल,
इलिप्टिकल पार्किंग ऑर्बिट में घूमो लाँगुरिया!
विक्रम राजा काँध चढ़ो प्रज्ञान बनो बैताल,
मजनू लैला चंदा-द्वारे पहुँचो लै जैमाल,
सॉफ्ट लैंडिंग भई बजाऊत ताली लाँगुरिया!
उतर चाँद पै भारत-ईसरो की दै दई निसानी,
इत-उत घूमे छैल-छबीलो बता रओ है पानी,
गड्ढा देख फलाँगे झट ज्यों वानर लाँगुरिया!
सोलर पैनल च्यवनप्रास घाईं दै ऊर्जा-ताकत,
एन ए वी कैमरा दनादन फोटू लै जग ताकत,
सूर्य छाँव में आओ; थम कें सो गओ लाँगुरिया!
सब दुनिया नें भारत मैया का लोहा लौ मान,
इसरो अभियंता-वैज्ञानिक ठाँड़े सीना तान,
मंगल-सूरज जाबे की जिद ठाने लाँगुरिया!
२१.१२.२०२३
***
सॉनेट
हार
हार का कर हार धारण
जीत तब ही तो वरेगी
तिलक तेरा तब करेगी
हारकर मत बैठ, कर रण
हार को गुपचुप निहारो
कर्म की कर साधना नित
तभी होगा आत्म-परहित
भूल मत भूलो, सुधारो
हार को त्यौहार मानो
बंधु बाँधव मीत जानो
सबक सीखो समर ठानो
हार ही तब हार जाए
जीत तब ही निकट आए
हार से तू जीत पाए
संजीव
२१-१२-२०२२
९४२५१८३२४४
७•५८,जबलपुर
●●●
दोहा
सलिल हुआ संजीव पा,शशि-किरणों का साथ.
खिल-खिल खिला पलाश भी, उठा-उठाकर हाथ.
***
आचार्य श्याम लाल उपाध्याय के प्रति दोहांजलि
*
निर्मल निश्छल नर्मदा, वाक् अबाध प्रवाह
पाई शारद की कृपा, अग्रज! अगम-अथाह
*
शब्द-शब्द सार्थक कहें, संशय हरें तुरंत
छाया दें वट-वृक्ष सम, नहीं कृपा का अंत
*
आभा-किरण अनंत की, हरे सकल अज्ञान
शारद-सुत प्रतिभा अमित, कैसे सकूँ बखान?
*
तुम विराट के पग कमल, प्रक्षालित कर धन्य
'सलिल' कर रहा शत नमन, करिये कृपा अनन्य
*
'नियति निसर्ग' पढ़े-बढ़े, पाठक करे प्रणाम
धन्य भाग्य साहित्य पा, सार्थक ललित ललाम
*
बाल ह्रदय की सरलता, युवकोचित उत्साह
प्रौढ़ों सा गाम्भीर्य मिल, पाता जग से वाह
*
नियति भेद-निक्षेपते, आपद-विपद तमाम
वैदिक चिंतन सनातन, बाँटें नित्य अकाम
*
गद्य-पद्य के हिमालय, शब्द-पुरुष संजीव
ममता की मूरत मृदुल, वंदन करुणासींव!
*
श्याम-लाल का विलय या, लाल श्याम का मेल?
विद्यासागर! बताओ, करो न हमसे खेल
*
विद्यावारिधि! प्रणत युग, चाह रहा आशीष
करो कृपा अज्ञान हर, बाँटो ज्ञान मनीष
*
गद्य माल है गले में, तिलक समीक्षा भाल
पद्य विराजित ह्रदय में, दूजी कहाँ मिसाल?
*
राष्ट्र चिंतना ही रही, आजीवन तव ध्येय
धूप-छाँव दो पक्ष हों, पूरक और विधेय
*
देश सुखी-सानंद हो, दुश्मन हों संत्रस्त
श्रमी युवा निर्माण नव, करें न हों भयग्रस्त
*
धर्म कर्म का मर्म है, देश-प्रेम ही मात्र
सबल निबल-रक्षक बने, तभी न्याय का पात्र
*
दोहा-दोहा दे रहा, सार्थक-शुभ संदेश
'सलिल' ग्रहण कर तर सके, पाकर दिशा विशेष
*
गति-यति, मात्रा-भार है, सही-संतुलित खूब
पाठक पढ़कर गह सकें, अर्थ पाठ में डूब
*
दोहा-दोहा दुह रहा, गौ भाषा कर प्रीत
ग्रहण करे सन्देश जो, बना सके नव रीत
*
आस्था के अंकुर उगा, बना दिए वट-वृक्ष
सौरभ के स्वर मनोहर, सृजनकार है दक्ष
*
कविता-कानन में उगे, हाइकु संग्रह मौन
कम में कहते हैं अधिक, ज्यों होजान में नौन
*
बहे काव्य मन्दाकिनी, 'सलिल' नित्य अवगाह
गद्य सेतु से हो सके, भू दर्शन की चाह
*
'लोकनाथ' के 'कुञ्ज' में, 'ज्योतिष राय' सुपंथ
निरख 'पर्ण श्री' रच रहे, नित्य सार्थक ग्रंथ
२१-१२-२०१६
***
गीत -
एक दिन ही नया
*
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
मन सनातन सत्य
निश-दिन गुनगुनाना।
*
समय कब रुकता?
निरंतर चला करता।
स्वर्ण मृग
संयम सिया को
छला करता।
लक्ष्मण-रेखा कहे
मत पार जाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
निठुर है बाज़ार
क्रय-विक्रय न भूले।
गाल पिचका
आम के
हैं ख़ास फूले।
रोकड़़ा पाए अधिक जो
वह सयाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
सबल की मनमानियाँ
वैश्वीकरण है।
विवश जन को
दे नहीं
सत्ता शरण है।
तंत्र शोषक साधता
जन पर निशाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
२०. १२.२०१५
***
कविता क्या???
लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार कविता ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों१। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय२ चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ३, रसमय वाक्य४, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार५, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा६, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन७, ध्वनि को काव्य की आत्मा८, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय९, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।
सन्दर्भ :
१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,
२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,
३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,
***
हाइकु गीत:
आँख का पानी
संजीव 'सलिल'
*
आँख का पानी,
मर गया तो कैसे
धरा हो धानी?...
*
तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.
आसमान भी
हौसलों की ऊँचाई
के आगे झुका.
कहती नानी
सूखने मत देना
आँख का पानी....
*
रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.
मिट्टी में मिला
रावण जैसा ध्यानी
टूटे सपने.
आँख से पानी
न बहे, पर रहे
आँख का पानी...
*
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.
गुनहगार
हैं नेता-अधिकारी
झूठे-मक्कार.
आँख में पानी
देखकर रो पड़ा
आँख का पानी...
***
हाइकु मुक्तक :
जापानी छंद / पाँच सात औ' पाँच / देता आनंद
तजिए द्वंद / सदा कहिए साँच / तजिए गंद
तोड़िए फंद / साँच को नहीं आँच / सूर्य अमंद
आनंदकंद / मन दर्पण काँच / परमानंद
२१-१२-२०१४
***

मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

सलिल सृजन १९ दिसंबर, भाषा, कैथी, सॉनेट, सरस्वती, अभियान, दोहे, चुटकी, चित्रगुप्त, नवगीत

सलिल सृजन १९ दिसंबर
*
भाषा
जो जनगण-मन की आशा है
जो भावों की परिभाषा है
जिसमें रस-सलिला बहती है
शब्द सिंधु अपनी भाषा है।
*
हर अनुभूति ग्रहण करती है
ज्यों की त्यों झट-पट कहती है
कहा हुआ शब्दों में लिखती
सुन-पढ़ मति समझा करती है।
*
भाषा माँ जैसे भाती है
धीरे-धीरे ही आती है
कभी बोलती मीठी बोली
कभी दर्द में भी गाती है।
१९.१२.२०२३
*
विरासत 
कायस्थों की लिपि 'कैथी'
*
कैथी एक ऐतिहासिक लिपि है जिसे मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता था। खासकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाने के भी प्रमाण पाये जाते हैं।
कैथी एक पुरानी लिपि है जिसका प्रयोग कम से कम 16 वी सदी मे धड़ल्ले से होता था। मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था। इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक लिपि का दर्ज़ा दिया गया था।

गुप्त वंश के उत्थान के दौरान अस्तित्व में आयी कैथी भाषा वर्ष १८८० तक जनमानस की भाषा बन चुकी थी । न्यायालयों में, बही खाते में तथा यत्र तत्र इनके प्रयोग की पराकाष्ठा थी । परन्तु एक किताब ("कल्चर एंड पावर ऑफ़ बनारस ") के अध्ययन के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि किस तरह से इस भाषा के साथ अन्याय हुआ. इस किताब के पृष्ठ संख्या १९० पर ब्रज भाषा के अवसान की व्याख्या के दौरान इस भाषा के अवसान का भी जिक्र है... हुआ कुछ यूँ था की ब्रज भाषा और हिंदी देवनागरी की भाषा को लेकर एक विवाद हुआ था.. हिंदी भाषा के एक बहुत बड़े विद्वान या यूँ कहें कि चैंपियन श्री श्रीधर पाठक और एक सज्जन थे श्री राधा चरण गोस्वामी जी .. ये दोनो हिंदी भाषा को कवियों कि भाषा बनाये जाने पर जोर दे रहे थे, और १९१० के पहले हिंदी साहित्य सम्मलेन में ब्रज भाषा को कोई स्थान नहीं दिया गया जबकि ब्रज भाषा उस वक्त के लेखकों या यूँ कहें कि कवियों की आधिकारिक भाषा बन गयी थी... सोने पे सुहागा तो तब हुआ जब एक साल के बाद हिंदी साहित्य के दूसरे सम्मेलन में श्री बद्री नाथ भट्ट जी ने ब्रज भाषा के लिए अपशब्द का प्रयोग किया.. सिलसिला यही से शुरू होता है... १९१४ में पांचवें हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान प्रख्यात कवि, जो श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के आश्रित थे , उन्होंने ब्रज भाषा का साथ देने वालों को राष्ट्र भाषा हिंदी का दुश्मन करार दे दिया और यहीं से ब्रज भाषा के साथ साथ अन्य लिपियों का भी समापन होने लगा..
बात शुरू हुई थी कैथी पर, तो वापस आते हैं कि कैथी कैसे समाप्त हुई .. एक बंगाली शिक्षाविद थे , और उस दौरान भी लाल सलाम जोरों पर था । उन्होंने देखा कि बिहार में जो किताबें आती हैं वो बनारस से छप कर आती हैं... और यही एक बात थी जो बिहार के कायस्थों को उत्तर प्रदेश के कायस्थों से जोड़ती थी.. (शिक्षा आयोग की रिपोर्ट १८८४ पैराग्राफ ३३४). उन्होंने शिक्षा आयोग को पत्र लिखकर ये बात बताई कि कैथी बिहारी हिन्दुओं की धार्मिक पहचान बनती जा रही है, जो कि हिंदी भाषा के लिए खतरनाक हो सकती है , इसलिए आनन् फानन में हिंदी साहित्य सम्मेलन की नौवीं बैठक बुलाई गयी और काफी विवेचना के बाद ये प्रस्ताव पारित किया ...
"सभा के अनुसार नागरी से अति उत्कृष्ट कोई भाषा नहीं है, और नागरी शब्द ही भारत के लिए उपयुक्त है . इसी कारण से सभा कैथी भाषा के उन्नयन के लिए कोई उत्साह और सहयोग ना करने का निर्णय लेती है ।"
इसे यन. पी. यस. की वार्षिक रिपोर्ट १९२३ के पैराग्राफ १३ और १४ से देखा जा सकता है ..और इस प्रकार कैथी को दरकिनार कर उर्दू को कोर्ट की भाषा बना दी गयी , क्यूंकि उस वक्त की रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजो ने एक सर्वे में पाया कि धनी वर्ग के ज्यादातर लोग हिंदी या उर्दू का इस्तेमाल करते है तो उन्होंने इसे ही आधिकारिक भाषा बना दी .. और लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को बाद में अनिवार्य कर दिया...इस प्रकार कायस्थों की प्रचलित भाषा कैथी का अंत हो गया।
***
जानकारी
दुर्घटना-मुआवजा 
*
अगर किसी व्यक्ति की accidental death होती है और वह व्यक्ति पिछले तीन साल से लगातार इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल कर रहा था तो उसकी पिछले तीन साल की एवरेज सालाना इनकम की दस गुना राशि उस व्यक्ति के परिवार को देने के लिए सरकार बाध्य है ।
आपको आश्चर्य हो रहा होगा यह सुनकर लेकिन यही सरकारी नियम है। उदहारण के तौर पर अगर किसी की सालाना आय क्रमशः पहले दूसरे और तीसरे साल चार लाख पांच लाख और छः लाख है तो उसकी औसत आय पांच लाख का दस गुना मतलब पचास लाख रूपए उस व्यक्ति के परिवार को सरकार से मिलने का हक़ है।
ज़्यादातर जानकारी के अभाव में लोग यह क्लेम सरकार से नहीं लेते हैं ।
जानेवाले की कमी तो कोई पूरी नहीं कर सकता है किंतु पैसा पास में हो तो भविष्य सुचारु रूप से चल सकता है ।
लगातार तीन साल तक रिटर्न दाखिल नहीं किया है तो ऐसे केस में सरकार एक डेढ़ लाख देकर किनारा कर लेती है। लगातार तीन साल तक लगातार रिटर्न फ़ाइल किया गया है तो केस ज़्यादा मजबूत होता है और यह माना जाता है कि मरनेवाला व्यक्ति अपने परिवार का रेगुलर अर्नर था और अगर वह जिन्दा रहता तो अपने परिवार के लिए अगले दस सालो में वर्तमान आय का दस गुना तो कमाता ही जिससे वह अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन-पोषण कर पाता ।
सर्विस वाले रेगुलर अर्नर रिटर्न फ़ाइल नहीं करते जिसकी वजह से न तो कंपनी द्वारा काटा हुआ पैसा सरकार से वापस लेते हैं और न ही इस प्रकार से मिलने वाले लाभ का हिस्सा बन पाते हैं। आप अपने वकील से पूरी जानकारी लें और रिटर्न जरूर फ़ाइल करें ।
***
पुरुष विमर्श -
तपस्यारत ऋषि को अल्पसंख्यक वस्त्रों, सौन्दर्य, भाव-भंगिमा से मुग्ध कर तप-च्युत करनेवाली अप्सरा नहीं, ऋषि लांछित होता है। क्यों?
इसी विरासत को ग्रहण कर नग्न प्राय आधुनिकाएँ पुरुष को यौन अपराधों का दोषी ठहराकर अश्लील साहित्य परोसना और अमर्यादित आचरण करना स्त्री विमर्श मान रही हैं.
आप का मत?

सॉनेट
सरस्वती
सरस वती माँ स रसवती
रहें हमेशा ही रस-लीन।
रस-निधि दें, मैं याचक हीन।।
सदय रहें माँ सरस्वती।।
मैया! गाऊँ निश-दिन गान।
कह न सकूँ महिमा तेरी।
करो कृपा अब बिन देरी।।
हो मेरा जीवन रसखान।।
स्वीकारो दंडौत प्रणाम
बन जाएँ सब बिगड़े काम
हो जाए मम नाम अनाम।।
भव-बंधन काटो मैया!
'सलिल' गहे कर की छैंया
शरण मिले पकड़ूँ पैंया।।
१९-१२-२०२२
जबलपुर, १०•३२
९४२५१८३२४४
●●●
सॉनेट
शारदा
*
शारदा माता नमन शत, चित्र गुप्त दिखाइए।
सात स्वर सोपान पर पग सात हमको दे चला।
नाद अनहद सुनाकर, भव सिंधु पार कराइए।।
बिंदु-रेखा-रंग से खेलें हमें लगता भला।।
अजर अक्षर कलम-मसि दे, पटल पर लिखवाइए।
शब्द-सलिला में सकें अवगाह, हों मतिमान हम।
भाव-रस-लय में विलय हों, सत्सृजन करवाइए।।
प्रकृति के अनुकूल जीवन जी सकें, हर सकें तम।।
अस्मिता हो आस मैया, सुष्मिता हो श्वास हर।
हों सकें हम विश्व मानव, राह वह दिखलाइए।
जीव हर संजीव, दे सुख, हों सुखी कम कष्ट कर।।
क्रोध-माया-मोह से माँ! मुक्त कर मुस्काइए।।
साधना हो सफल, आशा पूर्ण, हो संतोष दे।
शांति पाकर शांत हों, आशीष अक्षय कोष दे।।
१९-१२-२०२१
***
सॉनेट
अभियान
*
सृजन सुख पा-दे सकें, सार्थक तभी अभियान है।
मैं व तुम हम हो सके, सार्थक तभी अभियान है।
हाथ खाली थे-रहेंगे, व्यर्थ ही अभिमान है।।
ज्यों की त्यों चादर रखें, सत्कर्म कर अभियान है।।
अरुण सम उजियार कर, हम तम हरें अभियान है।
सत्य-शिव-सुंदर रचें, मन-प्राण से अभियान है।
रहें हम जिज्ञासु हरदम, जग कहे मतिमान है।।
सत्-चित्-आनंद पाएँ, कर सृजन अभियान है।।
प्रीत सागर गीत गागर, तृप्ति दे अभियान है।
छंद नित नव रच सके, मन तृप्त हो अभियान है।
जगत्जननी-जगत्पितु की कृपा ही वरदान है।।
भारती की आरती ही, 'सलिल' गौरव गान है।।
रहे सरला बुद्धि, तरला मति सुखद अभियान है।
संत हो बसंत सा मन, नव सृजन अभियान है।।
१९-१२-२०२१
***
सामयिक दोहे
तीर अगिन तूणीर में, चुना मरो अब झेल।
जो न साथ होगी तुरत, जेल न पाए बेल।।
तंत्र नाथ है लोक का, मालिक सत्ताधीश।
हुआ न होगा फिर कभी, कोई जुमलाधीश।।
छप्पन इंची वक्ष का, झेले वार तमाम।
जन पदच्युत कर दे बता, करना आता काम।।
रोजी छीनी भाव भी, बढ़ा रही है खूब।
देशभक्ति खेती मिटा, सेठ भक्ति में डूब।।
मूरत होगी राम की, सिया न होंगी साथ।
रेप करेंगे विधायक, भगवा थाने हाथ।।
अहंकार की होड़ है, तोड़ सके तो तोड़।
आग लगाता देश में, सत्ता का गठजोड़।।
'सलिल' सियासत है नहीं, तुझको किंचित साध्य।
जन-मन का दुख-दर्द कह, भारत माँ आराध्य।।
१९-१२-२०१९
***
चुटकी गीत
*
इच्छा है यदि शांति की
कर ले इच्छा शांत।
*
बरस इस बरस मेघ आ!
नमन करे संसार।
न मन अगर तो नम न हो,
तज मिथ्या आचार।।
एक राह पर चलाचल
कदम न होना भ्रांत।
इच्छा है यदि शांति की
कर ले इच्छा शांत।
*
कह - मत कह आ रात तू ,
खुद आ जाती रात।
बिना निकाले निकलती
सपनों की बारात।।
क्रांति-क्रांति चिल्ला रहे,
खुद भय से आक्रांत।
इच्छा है यदि शांति की
कर ले इच्छा शांत।
छंद: दोहा
१९-१२-२०१८
***
चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
*
षट्पदी
श्वास-आस में ग्रह-उपग्रह सा पल-पल पलता नाता हो.
समय, समय से पूर्व, समय पर सच कहकर चेताता हो.
कर्म भाग्य का भाग्य बताये, भाग्य कर्म के साथ रहे-
संगीता के संग आज, कल-कल की बात बताता हो.
जन्मदिवस पर केक न काटें, कभी बुझायें ज्योति नहीं
दीप जला दीवाली कर लें, तिमिर भाग छिप जाता हो
१९-१२-२०१७
***
नव गीत
मालिक को
रक्षक लूट रहे
*
देश एक है हम अनेक
खोया है जाग्रत विवेक
परदेशी के संग लडे
हाथ हमारे रहे जुड़े
कानून कई थे तोड़े
हौसले रहे कब थोड़े?
पाकर माने आज़ादी
भारत माँ थी मुस्कादी
चाह था
शेष न फूट रहे
मालिक को
रक्षक लूट रहे
*
जब अपना शासन आया
अनुशासन हमें न भाया
जनप्रतिनिधि चाहें सुविधा
जनहित-निजहित में दुविधा
शोषक बन बैठे अफसर
धनपति शोषक हैं अकसर
जन करता है नादानी
कानून तोड़ मनमानी
तुम मानो
हमको छूट रहे
मालिक को
रक्षक लूट रहे
*
धनतंत्र हुआ है हावी
दलतंत्र करे बरबादी
दमतोड़ रहा जनतंत्र
फल-फूल रहा मनतंत्र
सर्वार्थ रहे क्यों टाल
निज स्वार्थ रहे हैं पाल
टकराकर
खुद से टूट रहे
मालिक को
रक्षक लूट रहे
*
घात लगाये पडोसी हैं
हम खुद को कहते दोषी हैं
ठप करते संसद खुद हम
खुद को खुद ही देते गम
भूखे मजदूर-किसान
भूले हैं भजन-अजान
निज माथा
खुद ही कूट रहे
मालिक को
रक्षक लूट रहे
*
कुदरत सचमुच नाराज
ला रही प्रलय गिर गाज
तूफ़ान बवंडर नाश
बिछ रहीं सहस्त्रों लाश
कह रहा समय सम्हलो भी
मिल संग सुपंथ चलो भी
सच्चे हों
शेष न झूठ रहे
१९-१२-२०१५
***
नव गीत:
नए साल को
आना है तो आएगा ही
.
करो नमस्ते
या मुँह फेरो
सुख में भूलो
दुःख में टेरो
अपने सुर में गाएगा ही
नए साल को
आना है तो आएगा ही
.
एक दूसरे
को मारो या
गले लगाओ
हँस मुस्काओ
दर्पण छवि दिखलाएगा ही
नए साल को
आना है तो आएगा ही
.
चाह न मिटना
तो खुद सुधरो
या कोसो जिस-
तिस को ससुरों
अपना राग सुनाएगा ही
नए साल को
आना है तो आएगा ही
१९-१२-२०१४
***

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

अदम गौड़वी

सॉनेट 
अदम गौड़वी
*
ठाकुर थे न रुची ठकुराई 
देख गरीबी मन रोया था, 
तन सोया; मन कब सोया था, 
तजी निगोड़ी व्यर्थ पढ़ाई। 
ठकुरसुहाती नहीं सुहाई,
गज़लों में युग-सच बोया था,
कभी नहीं ईमां खोया था,
सत्ता की की खूब धुनाई। 
मिली गजल को जुबां अदम से,  
शेर-शेर आईन बन गया, 
कही नंगई लोक राज की। 
कड़वा सच लिख दिया कलम से, 
लाज बचाई लोक-लाज की। 
१८.१२.२०२३ 
***
भारतीयता 
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
*
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
राजनीति 
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे
स्त्री विमर्श 
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
*
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
*
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
*
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
गजल 
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
शब्द चित्र 
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
*
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
*
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
*
अदम गौड़वी
मूल नाम- रामनाथ सिंह
जन्म : २२ अक्तूबर १९४७, अट्टा ग्राम, परसपुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश
मृत्यु : १८ दिसंबर २०११, संजय गाँधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस, लखनऊ,
उत्तर प्रदेश 
कृतियाँ : धरती की सतह पर, समय से मुठभेड़, 
पुरस्कार : मध्य प्रदेश सरकार १९९८, दुष्यंत कुमार पुरस्कार, अवधी / हिंदी योगदान  हेतु शहीद शोभा संस्थान द्वारा माटी रतन सम्मान। 
*
रचनाएँ 
चुनिंदा अश'आर
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!
०१
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे

सुरा व सुंदरी के शौक़ में डूबे हुए रहबर
दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे

ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे

सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे
०२
आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे
०३
भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है
अहले हिन्दुस्तान अब तलवार के साये में है

छा गई है जेहन की परतों पर मायूसी की धूप
आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है

बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ
और कश्ती कागजी पतवार के साये में है

हम फ़कीरों की न पूछो मुतमईन वो भी नहीं
जो तुम्हारी गेसुए खमदार के साये में है
०४
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.
०५
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
०६
काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्‍था विश्‍वास लेकर क्‍या करें

लोकरंजन हो जहां शम्‍बूक-वध की आड़ में
उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्‍स का एहसास लेकर क्‍या करें

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें

चाँद है ज़ेरे क़दम. सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया

शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले
कोठियों की लॉन का मंज़र सलौना हो गया

ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया

यूँ तो आदम के बदन पर भी था पत्तों का लिबास
रूह उरियाँ क्या हुई मौसम घिनौना हो गया

'अब किसी लैला को भी इक़रारे-महबूबी नहीं'
इस अहद में प्यार का सिम्बल तिकोना हो गया.

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए

छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए
१०
घर में ठन्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है

बगावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है

सुलगते ज़िस्म की गर्मी का फिर अहसास हो कैसे
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है
११
विकट बाढ़ की करुण कहानी नदियों का संन्‍यास लिखा है
बूढ़े बरगद के वल्‍कल पर सदियों का इतिहास लिखा है

क्रूर नियति ने इसकी किस्‍मत से कैसा खिलवाड़ किया है
मन के पृष्‍ठों पर शाकुंतल अधरों पर संत्रास लिखा है

छाया मदिर महकती रहती गोया तुलसी की चौपाई
लेकिन स्‍वप्निल स्‍मृतियों में सीता का वनवास लिखा है

नागफनी जो उगा रहे हैं गमलों में गुलाब के बदले
शाखों पर उस शापित पीढ़ी का खंडित विश्‍वास लिखा है

लू के गर्म झकोरों से जब पछुआ तन को झुलसा जाती
इसने मेरे तनहाई के मरुथल में मधुमास लिखा है

अर्धतृप्ति उद्दाम वासना ये मानव जीवन का सच है
धरती के इस खंडकाव्‍य पर विरहदग्‍ध उच्छ्‌वास लिखा है
***


अदम गोंडवी ने हिंदी में कविता लिखी, जो हाशिए की जातियों, दलितों, गरीब लोगों की दुर्दशा को उजागर करती है. उन्होंने हिंदी में कविता लिखी, जो हाशिए की जातियों, दलितों, गरीब लोगों की दुर्दशा को उजागर करती है। एक गरीब किसान परिवार में जन्मे, हालाँकि, उनके पास काफी कृषि योग्य भूमि थी। गोंडवी की कविता सामाजिक टिप्पणी के लिए जानी जाती थी, जो भ्रष्ट राजनेताओं और प्रकृति में क्रांतिकारी विचारों के प्रति घृणा करती थी। समाज के संचालन के लिए संवेदना ज़रूरी शर्त है। भौतिक प्रगति के साथ, हमने सबसे मूल्यवान जो चीज़ खोई है, वह है संवेदनशीलता। व्यवस्था से जोंक की तरह चिपके हुए लोग, आख़िर संवेदनहीन व्यवस्था के प्रति विद्रोह का रुख कैसे अख़्तियार करें? बहुत कम शायर हिंदी गज़ल साहित्य को संवेदना का स्वर देने की कोशिश करते हैं, जिनकी आवाज़ में जड़ व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव है। उनकी कलम हमेशा आज़ाद रही  जिसने कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाया। एक ऐसा गज़लगो, जिसने ग़ज़ल की दुनिया में दुष्यंत के तेवर को बरकरार रखा। एक ऐसा रचनाकार, जिसकी रचनाएँ नारों में तब्दील हो गईं। 

श्रीमती मांडवी सिंह एवं श्री देवी कलि सिंह के सुपुत्र अदम का मूल नाम रामनाथ सिंह था। बचपन में वो बीमार रहते थे इस वजह से ज्यादा पढ़ नहीं पाए। वह एक वैद्य के पास 11 साल तक रहे जो कि फारसी के भी विद्वान थे। उन्होंने ही उन्हें 'अदम' नाम दिया क्योंकि वह वंचितों के लिए लड़ते थे। अदम खुद भी अपनी पहचान बदलना चाहते थे और वह ठाकुर रामनाथ सिंह से अदम गोंडवी हो गए। वह बहुत विद्वान थे। मैं उनके साथ भी रहा हूं।वह इतना पढ़ते थे कि देश के सभी विचारकों के अलावा उन्होंने दुनिया के हर विचारक सुकरात, मार्क्स, लेनिन हर किसी को पढ़ा। वह पढ़े-लिखे दृष्टिवान हिंदी कवि थे।एक छोटे से गाँव से निकलकर अदम ने हिंदी गज़लकों की दुनिया में अपना विशिष्ट स्थान बनाया और भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। एक ऐसा कवि जो बौद्धिक विलासिता से दूर किसान, गरीब, मज़दूर, दलित, शोषित और वंचित तबकों की बात करता है। एक ऐसा रचनाकार जिसकी रचनाओं में व्यवस्था के प्रति व्यंग्य और आक्रोश भी है और अथाह पीड़ा भी। अदम ने कभी भी सत्ता की सरपरस्ती स्वीकार नहीं की। वे लगातार भारतीय समाज में विद्यमान जड़ताओं और राजनीतिक मौकापरस्ती पर प्रहार करते रहे। अदम एकदम खाँटी अंदाज़ में अपने समय और परिवेश के नग्न यथार्थ को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत करते हैं। ज़िंदगी की बेबसी को व्यक्त करते हुए अदम कहते हैं-

‛आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी।’

अदम महिलाओं पर हिंसा और बलात्कार की घटनाओं का बयान बड़ी बेबाकी से करते हैं-

‛चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया।’

अदम हमेशा बेबाकी से सधे हुए लहज़े में अपनी बात रखते हैं। अदम संविधान में किए गए प्रावधानों के बावजूद आधारभूत ज़रूरतों से वंचित वर्ग की स्थिति का चित्रण करते हुए कहते हैं कि-

‛आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको।’

अदम गोंडवी हिंदी ग़ज़ल को शृंगार की परिधि से निकालकर आम जन के जीवन तक ले जाते हैं। ग्रामीण जीवन को एक विशेष पारदर्शी चश्मे से देखने वाले गोंडवी कहते हैं-

‛ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलक़श नज़ारों में
मुसलसल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में।’

भुखमरी के दौर में आमजन की ग़रीबी का मज़ाक उड़ाने वाली शानो-शौक़त का सजीव चित्रण करते हुए गोंडवी कहते हैं कि-

‛काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में।’

वे ग़रीब अवाम की भूख की बेबसी को बहुत स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करते हैं-

बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।

गोंडवी राजनीति में विचारधाराओं के घालमेल को भी बखूबी चित्रित करते हुए कहते हैं कि-

‛पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।’

अदम भारतीय राजनीति में ब्रिटिश सत्ता के बचे हुए अवशेषों के आधार पर कहते हैं कि-

‛जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।’

महंगाई पर तीक्ष्ण व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि-

‛ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे।’

आज की उथली राजनीति पर भी वो मौंजू व्यंग्य करते हैं-

‛एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे।’

अदम गोंडवी जनता को सिर्फ़ व्यवस्था की जकड़न में यथास्थिति में रहने की वकालत नहीं करते बल्कि बगावत का उद्घोष करते हुए कहते हैं-

‛जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो हवाश में।’

अदम गोंडवी स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय समाज में विद्यमान ऊँच-नीच, भेदभाव और सांप्रदायिकता की समस्या पर मुखर होकर कहते हैं-

‛हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुर्सी के लिए ज़ज्बात को मत छेड़िए।

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए।

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए।’

अदम गोंडवी आज की नौकरशाही में विद्यमान फीताशाही और पंचायती राज व्यवस्था की दुर्दशा का भी बखूबी बयान करते हैं-

‛जो उलझ कर रह गयी हैं फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में।’

गांधी के सपनों के भारत की तस्वीर को धूमिल होता देख अदम बोल पड़ते हैं-

‛देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गए

कल तलक जो हाशिए पर भी न आते थे नज़र
आजकल बाज़ार में उनके कलेंडर आ गए।’

गांधीवाद को धूल धूसरित होता देख, अदम सपाट लहज़े में कहते हैं-

‛वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है।

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का,
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है।’

नई पीढ़ी के वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित अदम पीड़ा के स्वर में बोल पड़ते हैं-

‛आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की।

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की।’

अदम गोंडवी सामाजिक दुर्दशा को देखते हुए झूठ लिखना स्वीकार नहीं करते हैं। वे कहते हैं-

‛घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है।’

आदम कविताओं में व्यक्त किए गए भाव का कारण भी बताते हैं-

‛याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की।’

आलोचकों का मानना है कि अदम को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह काबिल थे। अदम सत्ता के किसी पद्म सम्मान की परवाह किए बगैर सदैव भारत के आम आवाम की आवाज़ बनते रहे। सत्ता प्रतिष्ठानों और समाज की व्यवस्था को चुनौती देने वाले अदम की रचनाएँ नारों के रूप में तब्दील उनकी रचनाएँ, भारत के अलग-अलग हिस्सों में आज भी गूँजती रहती हैं।

हरेराम 'समीप'- अदम एक ऐसे अदम्य कवि थे, जिन्होंने अन्याय और शोषण के खिलाफ निडर होकर आवाज उठाई। 'अदम' का मतलब है वंचित। यह नाम उन्हें उनके गुरु ने दिया था। बचपन से ही वह क्रांतिकारी थे। उनका एक ही विषय था सामाजिक न्याय । अन्याय के खिलाफ उनके अंदर विद्रोह की आग भरी हुई थी। मनुष्यता का अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं था। वो उत्तर प्रदेश गोंडा से एक ठाकुर परिवार से थे और गरीबों, दलितों, वंचितों पर अत्याचार के खिलाफ उन्होंने अपने ही समुदाय के लोगों का विरोध किया। वहां से लड़ते-लड़ते समाज की लड़ाई और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की स्थिति पर उन्होंने लड़ाई लड़ी। अन्याय, अपमान, अत्याचार, इन तीन शब्द पर ही उनकी लड़ाई का आधार और विस्तार रहा।

विश्वनाथ त्रिपाठी- ग़ज़ल का रूप विधा संभाल पाना बड़ा मुश्किल काम है। अदम गोंडवी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह हिंदी के कवि थे मगर उन्होंने उर्दू की ग़ज़ल का अनुशासन उसी तरह संभाला है, जिस तरह एक उर्दू का कवि संभालता है। हिंदी का होते हुए ही भी वह उर्दू कवियों जैसी ग़ज़ल करते थे। दूसरा, उन्होंने किसानों, मजदूरों के जीवन पर और शोषितों, वंचितों के दुख और विसंगतियों पर खूब कविताएं लिखीं और इसके लिए उन्होंने अपनी भाषा रची, मुहावरे रचे, अपने बिम्ब रचे। सामंती व्यवस्था, समाज के पाखंड पर उन्होंने सटीक और चुभती हुई कविताएं लिखी हैं।