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शनिवार, 16 दिसंबर 2023

आयुर्वेद, हृदयाघात, लौकी, इला घोष, स्मृति शुक्ल, सुमनलता श्रीवास्तव, माँ, चौपदे, नवगीत, कैंसर


 
हृदयाघात (हार्ट अटैक) - उपचार लौकी
भारत में लगभग ३००० वर्ष पूर्व हुए महर्षि वागवट जी लिखित पुस्तक अष्टांग हृदयम में उन्होंने बीमारियों को ठीक करने के लिए ७००० सूत्र लिखे हैं। तदनुसार हृदय-घात होने का अर्थ दिल की नलियों मे अवरोध (ब्लॉकेज) होना है। इसका कारण रक्त अम्लता (असीडीटी) बढ़ना है ।अम्लता दो तरह की होती है एक होती है पेट की अम्लता और दूसरी रक्त की अम्लता। पेट में अम्लता बढ़ने पर जलन होती है, खट्टी डकार आती है, मुँह से लार निकलती है। अम्लता अधिक बढ़ जाये तो हायपर एसिडिटी होती है। यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त में मिल जाती है तो रक्त अम्लता (ब्लड एसिडिटी) होती है जो दिल की नलियों में से न निकल पाने पर उन्हें अवरुद्ध (ब्लॉक) कर देती है। तभी हृदयाघात होता है।

इलाज क्या है ?

वागवट जी लिखते हैं कि रक्त में अम्लता बढ़ने पर क्षारीय खाद्य का सेवन करो। दो तरह की चीजें होती हैं अम्लीय और क्षारीय। अमल और क्षार को मिलाने पर परिणाम उदासीन (न्यूट्रल) होता है।

रसोई में बहुत सी चीजें क्षारीय हैं जिनका सेवन कर हृदयाघात को दूर रखा जा सकता है। घर मे आसानी से क्षारीय वस्तु है लौकी या दुधी (बॉटल गोर्ड)। आप रोज २०० मिलीग्राम लौकी-रस शौच के पश्चात खाली पेट या नाश्ते के आधे घंटे बाद पिएँ या कच्ची लौकी खाएँ।लौकी के रस को अधिक क्षारीय बनाने के लिए ५-७ तुलसी के पत्ते, ५-७ पुदीने के पत्ते और काला नमक (सेंधा नमक) मिल लें।आयोडीन युक्त नमक अम्लीय है, इसे कतई न लें। लगभग २-३ माह में हृदय नलिका का अवरोध दूर हो जाता है।

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भावांजलि
बहुमुखी प्रतिभा की धनी डॉक्टर इला घोष
डॉ. साधना वर्मा
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[लेखक: डॉ. साधना वर्मा, प्राध्यापक अर्थशास्त्र विभाग, शासकीय मानकुँवर बाई कला वाणिज्य स्वशासी महिला महाविद्यालय जबलपुर। ]
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मस्तिष्क में सहेजी पुरानी यादें किताब के पृष्ठों पर टंकित कहानियों की तरह होती हैं। एक बार खेलकर पढ़ना-जुड़ना आरंभ करते ही घटनाओं का अटूट सिलसिला और स्मरणीय व्यक्तित्वों की छवियाँ उभरती चली आती हैं। तीन दशक से अधिक के अपने प्राध्यापकीय जीवन पर दृष्टिपात करती हूँ तो जिन व्यक्तित्वों की छवि अपने मन पर अंकित पाती हूँ उनमें उल्लेखनीय नाम है असाधारण व्यक्तित्व-कृतित्व की धनी डॉक्टर इला घोष जी का । वर्ष १९८५ में विवाह के पूर्व मैंने भिलाई, रायपुर तथा बिलासपुर के विविध महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था। विवाह के पश्चात पहले १९८६ मेंशासकीय तिलक महाविद्यालय कटनी और फिर १९८७ में शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर में मेरी पदस्थापना हुई। शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर में पदभार ग्रहण करते समय मेरे मन में बहुत उथल-पुथल थी। बिलासपुर और कटनी के महाविद्यालय अपेक्षाकृत छोटे और कम विद्यार्थियों की कक्षाओं वाले थे। शासकीय महाकौशल महाविद्यालय में प्रथम प्रवेश करते समय यही सोच रही थी कि मैं यहाँ शिक्षण विभाग में पदस्थ वरिष्ठ और विद्वान प्राध्यापकों के मध्य तालमेल बैठा सकूँगी या नहीं?
सौभाग्य से महाविद्यालय में प्रवेश करते ही कुछ सहज-सरल और आत्मीय व्यक्तित्वों से साक्षात हुआ। डॉ. इला घोष, डॉ. गीता श्रीवास्तव, डॉ. सुभद्रा पांडे, डॉ. चित्रा चतुर्वेदी आदि ने बहुत आत्मीयता के साथ मुझ नवागंतुक का स्वागत किया। कुछ ही समय में अपरिचय की खाई पट गई और हम अदृश्य मैत्री सूत्र में बँधकर एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन गए। महाविद्यालय में विविध दायित्वों का निर्वहन करते समय एक-दूसरे के परामर्श और सहयोग की आवश्यकता होती ही है। इला जी अपने आकर्षक व्यक्तित्व, मंद मुस्कान, मधुर वाणी, सात्विक खान-पान, सादगीपूर्ण रहन-सहन तथा अपनत्व से पूरे वातावरण को सुवासित बनाए रखती थी। संस्कृत भाषा व साहित्य की गंभीर अध्येता, विदुषी व वरिष्ठ प्राध्यापक तथा नवोन्मेषी शोधकर्त्री होते हुए भी उनके व्यवहार में कहीं भी घमंड नहीं झलकता था। वे अपने से कनिष्ठों के साथ बहुत सहज, सरल, मधुर एवं आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करती रही हैं।
कुशल प्रशासक, अनुशासित प्राध्यापक एवं दक्ष विभागाध्यक्ष के रूप से कार्य करने में उनका सानी नहीं है। महाविद्यालय में विद्यार्थियों को प्रवेश देते समय, छात्रसंघ के चुनावों के समय, स्नेह सम्मेलन अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मासिक, षडमात्रिक व वार्षिक परीक्षाओं के कार्य संपादित कराते समय कनिष्ठ प्राध्यापक कभी-कभी असहजता या उलझन अनुभव करते थे किंतु इला जी ऐसे अवसरों पर हर एक के साथ तालमेल बैठते हुए, सबको शांत रखते हुए व्यवस्थित तरीके से काम करने में सहायक होती थीं। मैंने उनका यह गुण आत्मसात करने की कोशिश की और क्रमश: वरिष्ठ होने पर अपने कनिष्ठों के साथ सहयोग करने का प्रयास करती रही हूँ।
महाविद्यालयों में समाज के विभिन्न वर्गों से विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। संपन्न या प्रभावशाली परिवारों के छात्र वैभव प्रदर्शन कर गर्वित होते, राजनैतिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी नियमों की अवहेलना कर अन्य छात्रों को प्रभवित करने की कुचेष्टा करते जबकि ग्रामीण तथा कमजोर आर्थिक परिवेश से आये छात्र अपने में सिमटे-सँकुचे रहते। प्राध्यापक सबके साथ समानता का व्यवहार करें, बाह्य तत्वों का अवांछित हस्तक्षेप रोकें तो कठिनाइयों और जटिलताओं से सामना करना होता है। ऐसी दुरूह परिस्थितियों में इलाजी मातृत्व भाव से पूरी तरह शांत रहकर, सभी को शांत रहने की प्रेरणा देती। उनका सुरुचिपूर्ण पहनावा, गरिमामय व्यवहार, संतुलित-संयमित वार्तालाप उच्छृंखल तत्वों को बिना कुछ कहे हतोत्साहित करता। अन्य प्राध्यापक भी तदनुसार स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करते और महाविद्यालय का वातावरण सौहार्द्रपूर्ण बना रहता।
अपनी कुशलता और निपुणता के बल पर यथासमय पदोन्नत होकर इलाजी ने शासकीय महाविद्यालय कटनी, स्लीमनाबाद, दमोह, जुन्नारदेव आदि में प्राचार्य के पद पर कुशलतापूर्वक कार्य करते हुए मापदंड इतने ऊपर उठा दिए जिनका पालन करना उनके पश्चातवर्तियों के लिए कठिन हो गया। आज भी उन सब महाविद्यालयों में इला जी को सादर स्मरण किया जाता है। उनके कार्यकाल में महाविद्यालयों में निरन्तर नई परियोजनाएँ बनीं, भवनों का निर्माण हुआ, नए विभाग खुले और परीक्षा परिणामों में सुधार हुआ। संयोगवश मेरे पति इंजी. संजीव वर्मा, संभागीय परियोजना अभियंता के पद पर छिंदवाड़ा में पदस्थ हुए। उनके कार्यक्षेत्र में जुन्नारदेव महाविद्यालय भी था जहाँ छात्रावास भवन निर्माण का कार्य आरंभ कराया गया था। कार्य संपादन के समय उनके संपर्क में आये तत्कालीन प्राध्यापकों और प्राचार्य ने इलाजी को सम्मान सहित स्मरण करते हुए उनके कार्य की प्रशंसा की जबकि इलाजी तब सेवा निवृत्त हो चुकी थीं। यही अनुभव मुझे जुन्नारदेव में बाह्य परीक्षक के रूप में कार्य करते समय हुआ।
किसी कार्यक्रम की पूर्व तैयारी करने में इला जी जिस कुशलता, गहन चिंतन के साथ सहभागिता करती हैं, वह अपनी मसाल आप है। हरि अनंत हरि कथा अनंता.... इला जी के समस्त गुणों और प्रसंगों की चर्चा करने में स्थानाभाव के आशंका है। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा, इतना ज्ञान, इतनी विनम्रता, संस्कृत हिंदी बांग्ला और अंग्रेजी की जानकारी, प्राचीन साहित्य का गहन अध्ययन और उसे वर्तमान परिवेश व परिस्थितियों के अनुकूल ढालकर नवीन रचनाओं की रचना करना सहज कार्य नहीं है। इला जी एक साथ बहुत सी दिशाओं में जितनी सहजता, सरलता और कर्मठता के साथ गतिशील रहती हैं वह आज के समय में दुर्लभ है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् जहाँ अधिकांश जन अपन में सिमटकर शिकायत पुस्तिका बन जाते हैं वहाँ इला जी समाजोपयोगी गतिविधियों में निरंतर संलग्न हैं। उनकी कृतियाँ उनके परिश्रम और प्रतिभा की साक्षी है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि इलाजी शतायु हों और हिंदी साहित्य को अपनी अनमोल रत्नों से समृद्ध और संपन्न करती रहें।
१५-१२-२०१९
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पुस्तक परिचय:
"दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा शतक मंजूषा भाग १"
समीक्षक- प्रो. स्मृति शुक्ल
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[पुस्तक विवरण: दोहा-दोहा नर्मदा (दोहा शतक मञ्जूषा भाग १), आई एस बी एन ८१७७६१००७४, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१.५ से. x १४ से., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १६०, मूल्य २५०/-, प्रकाशक समन्वय ,४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१]
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आचार्य संजीव 'सलिल' हिंदी साहित्य में अनवरत स्तरीय लेखन कर रहे हैं। वे विगत बीस वर्षों से अंतरजाल पर भी सक्रिय हैं और हिंदी की विभिन्न विधाओं में सार्थक रच रहे हैं। 'कलम के देव', 'भूकंप के साथ जीना सीखें', 'लोकतंत्र का मकबरा', 'मीत मेरे' आदि कृतियों के साथ आपके नवगीत संग्रहों 'काल है संक्रांति का' ने खासी प्रसिद्धि पाई है। ‘सड़क पर’ आपका सद्य प्रकाशित नवगीत संग्रह है। आचार्य संजीव 'सलिल' और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' दोहा शतक मञ्जूषा भाग एक, 'दोहा सलिला-निर्मला' दोहा शतक मञ्जूषा भाग दो एवं 'दोहा दीप्त दिनेश' दोहा शतक मञ्जूषा भाग तीन प्रकाशित हुआ है। इन तीनों संग्रहों में पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों के सौ-सौ दोहों को संकलित किया गया है। इस प्रकार आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा ने पैंतालीस दोहाकारों के चार हजार पाँच सौ दोहों के साथ सलिल जी द्वारा रचित लगभग ५०० दोहे और अन्य १०० दोहे मिलकर लगभग ५१०० दोहों को पुस्तकाकार प्रकाशित कर हिंदी साहित्य के प्राचीन छंद दोहा को पुनः नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास किया है। दोेहा पुरातन काल से आज तक प्रयुक्त हो रहा अत्यंत लोकप्रिय छंद है। सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ ने विक्रम संवत् ६९० में अपभ्रंश में दोहा लिखा-
जेहि मन पवन न सँचरई, रवि-ससि नाहिं पवेस।
तेहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस।।
‘दोहा-दोहा नर्मदा’ संकलन के प्रथम पृष्ठ पर ‘दोहा-दोहा विरासत’ शीर्षक से सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ के इस दोहे के साथ देवसेन जैन, हेमचंद्र, चंदरबरदाई, बाबा फरीद, सोमप्रभ सूरि, अमीर खुसरो, जैनाचार्य मेरूतंग, कबीर, तुलसी, रत्नावली, अब्दुर्ररहीम खानखाना, बिहारी, रसनिधि से लेकर किशोर चंद कपूर संवत् १९५६ तक ३४ दोहा व सर्जक कवियों का कालक्रमानुसार विवरण देना आचार्य संजीव 'सलिल' की अनुसंधानपरक दृष्टि का परिचायक है साथ ही यह बेहद मूल्यवान जानकारी है।
आचार्य संजीव 'सलिल' ने पिंगल शास्त्र का गहन अध्ययन किया है । आपने परंपरागत छंदों के साथ ३५० से अधिक नवीन छंदों की भी रचना की है। वे नये रचनाकारों को सदैव छंद रचना का प्रशिक्षण देते रहे हैं और उनके लिखे हुए का परिष्कार करते रहे हैं । समन्वय प्रकाशन से प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' में पंद्रह वरिष्ठ-कनिष्ठ दोहाकारों के सौ-सौ दोहे संकलित हैं । संपादक ने इस संग्रह की भूमिका ‘दोहा गाथा सनातन’ शीर्षक से लिखी है। यह भूमिका भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह संग्रहणीय है । इस भूमिका में आचार्य संजीव सलिल लिखते हैं कि- ‘‘दोहा विश्व की सभी भाषाओं के इतिहास में सबसे प्राचीन छंद होने के साथ बहुत प्रभावी और तीव्र गति से संप्रेषित होने वाला छंद है। इतिहास गवाह है कि दोहा ही वह छंद है जिससे पृथ्वीराज चौहान और रायप्रवीण के सम्मान की रक्षा हो सकी और महाराजा जयसिंह की मोहनिद्रा भंग हुई।’’ दोहा रचना के प्रमुख तत्वों का भी गहन और वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन संपादकीय में किया गया है।पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ ही उनके दोहो पर समीक्षात्मक टीप देने का कार्य संपादकद्वय ने किया है जो सराहनीय है ।
‘दोहा-दोहा नर्मदा’ में प्रथम क्रम पर आभा सक्सेना ‘दूनवी’ के दोहे संकलित हैं । आभाजी ने प्रथम दोहे में ईश्वर आराधना करते हुए विनय की है उनके भाव सदैव उदात्त हों, सत्य,शिव और सुंदर का समवेत स्वर उनके दोहों में अनुगुंजित होता रहे । अपने गुरू का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव भी व्यक्त किया है। आभा सक्सेना के दोहों का प्रारंभ हिंदुओं के सबसे बड़े पाँच दिवसीय त्यौहार दीपावली से हुआ है। धनतेरस दीपावली, करवाचौथ के बाद उन्होंने अपने बचपन को स्मृत किया है । यह बहुत स्वाभाविक भी है कि त्यौहार अक्सर अतीत के गलियारों में ले जाते हैं ।
यादों के उजले दिये, मन-रस्सी पर डार।
बचपन आया झूलने, माँ-आँगन कर पार।।
पुरवाई का मेघ को चिट्ठी देना और सावन में खूब बरसकर नदियाँ ताल भरने का संदेशा देना इस दोहे को बहुत भावपरक बनाता है, साथ ही प्रकृति में मानवीय कार्य व्यापारों का समावेश करता है ।
पुरवाई ने मेघ को, दी है चिठिया लाल ।
अब की सावन में बरस, भर दे नदियाँ ताल ।।
ग्रीष्म में सूरज के बढ़ते ताप को एक दोहे में आभा जी ने बहुत सुंदर अभिव्यक्ति दी है । उनके इस दोहे ने पद्माकर के ऋतु वर्णन को स्मृत करा दिया । आभा जी के दोहे में जीवन के अनेक प्रसंग है राजनीति, धर्म, अध्यात्मक, प्रेम, परिवार, जीवन-जगत दर्शन, ऋतुएँ और प्रकृति अर्थात जीवन का कोई पक्ष अछूता नहीं है । दोहों में मात्राओं का निर्वाह पूरी सतर्कता से किया गया है ।
चुन काफिया-रदीफ लो, मनमाफिक सरकार ।
गज़ल बने चुटकी बजा, हो सुनकर अश'आर ।।
आभा सक्सेना ने इस दोहे में चुटकी बजाकर गजल बनाने की बात कही है जो मेरे गले इसलिये नहीं उतरी कि गज़ल महज मनमाफिक काफिया या रदीफ के चुनने से ही नहीं बन जाती। बहर और शब्दों के वजन, मक्ता-मतला के साथ काफिया-रदीफ का ध्यान रखा जाए तभी मुअद्दस ग़ज़ल बन पाती है ।
दोहाकार आभा सक्सेना के दोहों की समीक्षा में आचार्य संजीव सलिल ने ‘यमकीयता’ शब्द का नवीन प्रयोग किया है । हिन्दी साहित्य में अभी तक इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया । यमक शब्द में ‘इयता’ प्रत्यय लगाकर यह शब्द निर्मित किया गया है, पर यह शब्द प्रयोग की दृष्टि से उचित नहीं है । कबीरदास ने- ‘सद्गुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावन हार।।' इस दोहे में अनंत शब्द का चार बार प्रयोग करके यमक अलंकार का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है लेकिन उनके लिये भी किसी आलोचक ने यमकीयता घोलना शब्द का प्रयोग नहीं किया है। काव्य-रचना के अनुकूल शब्द तथा अर्थ को प्रस्तुत करने की प्रतिभा आभा जी के पास है । धूप का कुलाँचे मारना, मूँड़ उघार कर सोना, आस के पखेरु का उड़ना, जीवन का पापड़ होना, चपल हठीली रश्मियाँ आदि प्रयोग नवीन होने के साथ दोहों में भाव प्रवणता भरते हैं।
कालीपद प्रसाद के दोहों में उनके गहन और सुदीर्घ जीवनानुभवों का ताप पूरी प्रखरता से मौजूद है। उनके दोहों में मनुष्य को सिखावन है और नीतिगत बातें है। भारतीय धर्मशास्त्र सदैव हमें आत्मालोचन की सीख देता है। कालीपद जी एक दोहा में लिखते हैं-
अपनी ही आलोचना, मुक्ति प्राप्ति की राह।
गलती देखे और की, जो न गहे वह थाह।।
ईर्ष्या-तृष्णा वृत्ति जो, उन सबका हो नाश।
नष्ट न होती साधुता, रहता सत्य अनाश।।
जीवन सत्य का दिग्दर्शन वाले ये दोहे कहीं-कहीं मध्यकालीन संतों का स्मरण कराते हैं-
सिंधु सदृष संसार है, गहरा पारावार।
यह जीवन है नाव सम, जाना सागर पार।।
कालीपद ‘प्रसाद’ जी के दोहे हमें जीवन का मर्म सिखाते हैं, विपरीत परिस्थितियों में हौसला रखने तथा कर्मशील बनने की प्रेरणा देते हैं।
डाॅ. गोपालकृष्ण भट्ट ‘आकुल’ के दोहों में विनष्ट होते पर्यावरण के प्रति चिंता और जल संरक्षण की बात कही गई है। राजभाषा हिंदी की वैज्ञानिकता और उसके महत्व तथा वर्तमान स्थिति पर भी ‘आकुल’ जी ने दोहे रचे हैं। छंद्धबद्ध साहित्य और छंदों के निष्णात कवियों के अभाव पर लिखा दोहा साहित्य के प्रति चिंता से जन्मा है-
छंदबद्ध साहित्य का, हुआ पराक्रम क्षीण।
वैसे ही कुछ रह गये, कविवर छंद प्रवीण।।
चंद्रकांता अग्निहोत्री एक समर्थ दोहाकार हैं । उनके दोहों में बहुत उदात्त भाव शब्दबद्ध हुए हैं। परनिंदा का त्याग, तृष्णा, लोभ, मोह माया और अहंकार से ऊपर उठने का भाव उनके दोहों में अनुगूँजित है।
अहंकार की नींव पर कैसा नव निर्माण।
साँसों में अटके रहे, दीवारों के प्राण।।
छगनलाल गर्ग ‘विज्ञ’ दोहा रचने में माहिर हैं। गर्ग जी के दोहों का मूल कथ्य प्रेम है। लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम तक की यात्रा इन दोहों में हैं। दोहों में अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा बिखरी है। गर्ग जी के श्रृंगारिक दोहों में बिहारी के दोहों की भाँति भावों, अनुभावों और आंगिक भंगिमाओं का चित्रण हुआहै-
नशा नजर रस नयन में, लाज-लाल मुख रेख।
झुक सजनी भयभीत मन, झिझक विहग सी लेख।।
छाया सक्सेना ‘प्रभु’ के दोहे उनकी हृदयगत उदारता और सरलता के परिचायक हैं। उन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से कुछ न कुछ अपने दोहों में लिया है। सहज-सरल भाषा में अपने हृदयगत उद्गारों को दोहों में पिरो दिया है। दोहों में प्रचलित मुहावरों का प्रयोग भी वे बहुत खूबसूरती से करती हैं-
दीवारों के कान हैं, सोच-समझकर बोल।
वाणी के वरदान को, ले पहले तू तोल।।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग भी उनके दोहों में परिलक्षित होता है।
त्रिभवन कौल की जन्मस्थली जम्मू-कश्मीर ने उन्हें प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति तीव्र लगाव से अनुरंजित किया तो भारतीय वायुसेना की कर्मस्थली ने उन्हें अगाध राष्ट्र-प्रेम से आपूरित किया। अनुशासन बद्ध जीवन ने उनके सृजन को छंदों के अनुशासन में बँधना सिखाया।‘षठं शाठ्यं समाचरेत’ इस सूक्ति को उन्होंने अपना सिद्धांत मानते हुए यह माना है कि जो देश के साथ विश्वासघात करे वह क्षमा के योग्य नहीं और आतंकी को केवल कब्र में ही ठौर मिलना चाहिये। वन, पर्वत, नदियों के संरक्षण की चिंता के साथ ही आज की राजनीति पर भी अनेक अर्थपूर्ण दोहे त्रिभुवन कौल जी ने लिखे हैं। वर्तमान समय में लेखन को भी व्यवसाय समझ लिया गया है। बहुत कुछ निरर्थक भी लिखा जा रहा है इस सत्य का उद्घाटन करते हुए त्रिभुवन कौल लिखते हैं -
हीरों सा व्यापार है, लेखन नहीं दुकान।
जब से रज-कण आ गये, गुमी कहीं पहचान।।
प्रेम बिहारी मिश्र ने अपने दोहों में बड़ी सहजता से हृदय के उद्गारों को अभिव्यक्त किया गया है। भूमंडलीकरण के दौर में परिवर्तित सामाजिक परिवेश को अपने दोहों में चित्रित करने वाले प्रेमबिहारी मिश्र लिखते हैं-
चना चबैना बाजरा, मक्का रोटी साग ।
सब गरीब से छिन गया, हुआ अमीरी राग ।।
दीन-धर्म पैसा यहाँ, पैसा ही है प्यार ।
अमराई छूटी यहाँ, नकली बहे बयार ।।
मिथलेश राज बड़गैया के नारी मन की कोमल संवेदनाएँ उनके दोहों में भावपूर्ण सलिला बनकर प्रवाहित है। प्रेम, श्रृंगार, संयोग, वियोग आदि भावों को उन्होंने अपने दोहों में सँजोया है-
मैं मीरा सी बावली, घट-घट ढूँढूँ श्याम।
मन वृंदावन हो गया, नैन हुए घनश्याम।।
रामेश्वर प्रसाद सारस्वत जी के दोहे सार्थक शब्द चयन और निश्छल अभिव्यक्ति के कारण सम्प्रेषणीय बन गए हैं। सारस्वत जी ने अनेक दोहों में ‘आँखों में पानी नहीं’, ‘आँख में आँख डालना’, ‘हाथ को हाथ न सूझना’, ‘मन के घोड़े दौड़ाना’, ‘आँख मिचौली खेलना’, ‘ताल ठोंकना’, ‘सूखकर काँटा होना’ आदि मुहावरों का सार्थक प्रयोग करके दोहों की अभिव्यंजना शक्ति में वृद्धि की है। बीते समय की जीवन शैली और आज की जीवन शैली का अंतर अनेक दोहों में स्पष्ट है। विकास की अंधी दौड़ के दुष्परिणामों को भी सारस्वत जी अभिव्यक्त करते हैं-
अंधी दौड़ विकास की, छोड़े नहीं वजूद।
इत टिहरी जलमग्न है, उत डूबा हरसूद।।
विजय बागरी एक संवेदनशील दोहाकार हैं। आचार्य संजीव 'सलिल' ने लिखा है कि- ‘‘युगीन विसंगतियों और त्रासदियों को संकेतों से मूर्त करने में वे व्यंजनात्मकता और लाक्षणिकता का सहारा लेते हैं।’’ विजय जी के दोहों में वर्तमान समय की विसंगतियाँ पूरी सच्चाई के साथ मूर्त हुई हैं। आज साहित्य जगत में छद्म बुद्धिवाद फैला हुआ है। अपने पैसों से ही सम्मान समारोह आयोजित कराके अखबारों में खबरें प्रकाशित की जाती हैं। इस सच्चाई को विजय जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है-
छलनाओं का हो रहा, मंचों से सत्कार।
सम्मानों की सुर्खियाँ, छाप रहे अखबार।।
हम संसार में आकर भूल जाते हैं कि यहाँ हमारा डेरा स्थायी नहीं है, जीवन क्षणिक है। विजय जी संत कवियों की भाँति इस आर्ष सत्य का उद्घाटन करते हैं-
है उधार की जिंदगी, साँसें साहूकार।
रिश्ते-नाते दरअसल, मायावी बाजार।।
विनोद जैन ‘वाग्वर’ ने अपने दोहों में आज के मनुष्य की स्वार्थपरता, राजनीति के छल-छद्म, मूल्यों का अवमूल्यन, भ्रष्टाचार और तमाम तरह विभेदों को उजागर किया है । आजादी के इतने वर्षों के पश्चात् भी आम आदमी कितना लाचार और बेबस है-
हम कितने स्वाधीन हैं, कितने बेबस आज।
आजादी के नाम पर गुंडे करते राज।।
श्रीधर प्रसाद द्विवेदी के दोहों का कथ्य विविधता पूर्ण और शिल्प समृद्ध है । वर्तमान समय में मनुष्य तकनीक के जाल में उलझ रहा है। उपभोक्तावादी समय में मनुश्य की संवेदनाओं की तरलता शुष्क हो गई है। द्विवेदी जी ने लिखा है -
विकट समय संवेदना, गई मनुज से दूर।
अपनों से संबंध अब, होते चकनाचूर।।
श्यामल सिन्हा के दोहों में भाव प्रवणता है। सुख-दुख,हास-रुदन, विरह-मिलन, आशा-निराशा आदि भावों का चित्रण करने में सिन्हा जी सिद्धहस्त है। प्रेम में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। रीतिकाल में बिहारी ने अपने दोहों में नायक और नायिका को नेत्रों से प्रेमपूर्ण संवाद करते दिखाया है । श्यामल सिन्हा भी लिखते हैं-
आँखें जब करने लगी, आँखों से संवाद।
आँखों में आँखे रखें, प्रेम भवन बुनियाद।।
श्यामल जी के कुछ दोहे सार्थक शब्द चयन के अभाव में अर्थपूर्ण नहीं बन पाये तथा पाठक के हृदय को छूने में असमर्थ हैं। जैसे-
अहंकार मन में भरा, तन-मन बहुत उदास।
भटक रहा मन अकारण, मोती मिला न घास।।
इस दोहे में असंगति दोष भी है। मोती के साथ घास शब्द केवल तुकबंदी के लिए रखा गया है। इस कारण काव्य में औचित्य का निर्वाह नहीं हो पाया है।
'दोहा-दोहा नर्मदा' में संकलित अंतिम दोहाकार सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ के दोहों में समसामयिक परिवेश की समस्त गतिविधियाँ, परिवर्तनों की एक-एक आहट मौजूद है। मानव मन की अभिलाषाएँ, लिप्साएँ, और भावनाएँ अपने वास्तविक रूप में उभरी हैं । किसी प्रकार मुलम्मा चढ़ाकर उन्हें प्रस्तुत नहीं किया गया है । अभिव्यक्ति की सादगी ही उनके दोहों को विशिष्ट बनाती है-
बूढ़ा बरगद ले रहा, है अब अंतिम श्वास।
फिर होगा नव अंकुरण, पाले मन में आस।।
नव अंकुरण की इसी आशा की डोर थामे हम चलते रहते हैं। आशा ही विपरीत परिस्थिति में हमें टूटने नहीं देती। निष्कर्षतः 'दोहा-दोहा नर्मदा' संपादक द्वय आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में विश्व वाणी हिंदी संस्थान, जबलपुर से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण कृति है। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने 'दोहा शतक मंजूषा १' में पंद्रह दोहाकार रूपी अनमोल मोतियों को एक साथ पिरोया है। उन्होंने अत्यंत कुशलतापूर्वक अपने आचार्यत्व का निर्वाह किया है। अनेक दोहों को परिष्कृत कर उनका संस्कार किया है। सभी पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ उनके दोहों पर बहुत ही विवेकपूर्ण ढंग से सम्यक समीक्षा भी लिखी है। 'दोहा-दोहा नर्मदा की भूमिका' आपके काव्य काव्य-शास्त्रीय ज्ञान का मुकुर है। पाठक को दोहा का इतिहास और स्वरूप समझने में यह भूमिका बहुत उपयोगी है।
इस संकलन के प्रत्येक पृष्ठ पर पाद टिप्पणी के रूप में तथा भूमिका में आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ द्वारा रचित एक सौ बहत्तर दोहे निस्संदेह इस संग्रह की उपलब्धि हैं। इन दोहों में दोहा छंद का स्वरूप, इतिहास, प्रकार दोहा रचने के लिए आवश्यक तत्वों जैसे शब्दों का चारुत्व, मौलिक प्रयोग, रस, अलंकार, भावों की अभिव्यक्ति में समर्थ शब्दों का चयन, अर्थ-गांभीर्य, कम शब्दों में अर्थों की अमितता, लालित्य, सरलता, काव्य दोष, काव्य गुणों आदि की चर्चा करके नये दोहाकारों को दोहा रचना की सिखावन दी है। निश्चय ही 'दोहा शतक मंजूषा भाग-एक' छंदबद्ध कविता को स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण कृति है। जनमानस के हृदय में स्पंदित होने वाले लोकप्रिय छंद दोहा की अभ्यर्थना में माँ सरस्वती के चरणों में अर्पित एक अति सुंदर सुमन है।
दोहा- 'दोहा दोहा नर्मदा' दोहा शतक मञ्जूषा भाग १
संपादक- आचार्य संजीव वर्मा‘सलिल’ एवं प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा
समीक्षक- प्रो. (डॉ.) स्मृति शुक्ल
प्रकाशन-ंसमन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर, रायपुर, बैंगलुरू
पृष्ठ १६०, प्रथम संस्करण- २०१८, आई एस बी एन ८१-७७६१-००७-४, मूल्य- २५०/-
***
संपर्क समीक्षक: प्रो. स्मृति शुक्ल, ए१६, पंचशील नगर, नर्मदा मार्ग, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९९९३४१९३७४
***
कृति चर्चा:
जिजीविषा : पठनीय कहानी संग्रह
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: जिजीविषा, कहानी संग्रह, डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव, द्वितीय संस्करण वर्ष २०१५, पृष्ठ ८०, १५०/-, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक जेकट्युक्त, बहुरंगी, प्रकाशक त्रिवेणी परिषद् जबलपुर, कृतिकार संपर्क- १०७ इन्द्रपुरी, ग्वारीघाट मार्ग जबलपुर।]
*
हिंदी भाषा और साहित्य से आम जन की बढ़ती दूरी के इस काल में किसी कृति के २ संस्करण २ वर्ष में प्रकाशित हो तो उसकी अंतर्वस्तु की पठनीयता और उपादेयता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है। यह तथ्य अधिक सुखकर अनुभूति देता है जब यह विदित हो कि यह कृतिकार ने प्रथम प्रयास में ही यह लोकप्रियता अर्जित की है। जिजीविषा कहानी संग्रह में १२ कहानियाँ सम्मिलित हैं।
सुमन जी की ये कहानियाँ अतीत के संस्मरणों से उपजी हैं। अधिकांश कहानियों के पात्र और घटनाक्रम उनके अपने जीवन में कहीं न कहीं उपस्थित या घटित हुए हैं। हिंदी कहानी विधा के विकास क्रम में आधुनिक कहानी जहाँ खड़ी है ये कहानियाँ उससे कुछ भिन्न हैं। ये कहानियाँ वास्तविक पात्रों और घटनाओं के ताने-बाने से निर्मित होने के कारण जीवन के रंगों और सुगन्धों से सराबोर हैं। इनका कथाकार कहीं दूर से घटनाओं को देख-परख-निरख कर उनपर प्रकाश नहीं डालता अपितु स्वयं इनका अभिन्न अंग होकर पाठक को इनका साक्षी होने का अवसर देता है। भले ही समस्त और हर एक घटनाएँ उसके अपने जीवन में न घटी हुई हो किन्तु उसके अपने परिवेश में कहीं न कहीं, किसी न किसी के साथ घटी हैं उन पर पठनीयता, रोचकता, कल्पनाशक्ति और शैली का मुलम्मा चढ़ जाने के बाद भी उनकी यथार्थता या प्रामाणिकता भंग नहीं होती ।
जिजीविषा शीर्षक को सार्थक करती इन कहानियों में जीवन के विविध रंग, पात्रों - घटनाओं के माध्यम से सामने आना स्वाभविक है, विशेष यह है कि कहीं भी आस्था पर अनास्था की जय नहीं होती, पूरी तरह जमीनी होने के बाद भी ये कहानियाँ अशुभ पर चुभ के वर्चस्व को स्थापित करती हैं। डॉ. नीलांजना पाठक ने ठीक ही कहा है- 'इन कहानियों में स्थितियों के जो नाटकीय विन्यास और मोड़ हैं वे पढ़नेवालों को इन जीवंत अनुभावोब में भागीदार बनाने की क्षमता लिये हैं। ये कथाएँ दिलो-दिमाग में एक हलचल पैदा करती हैं, नसीहत देती हैं, तमीज सिखाती हैं, सोई चेतना को जाग्रत करती हैं तथा विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।'
जिजीविषा की लगभग सभी कहानियाँ नारी चरित्रों तथा नारी समस्याओं पर केन्द्रित हैं तथापि इनमें कहीं भी दिशाहीन नारी विमर्ष, नारी-पुरुष पार्थक्य, पुरुषों पर अतिरेकी दोषारोपण अथवा परिवारों को क्षति पहुँचाती नारी स्वातंत्र्य की झलक नहीं है। कहानीकार की रचनात्मक सोच स्त्री चरित्रों के माध्यम से उनकी समस्याओं, बाधाओं, संकोचों, कमियों, खूबियों, जीवत तथा सहनशीलता से युक्त ऐसे चरित्रों को गढ़ती है जो पाठकों के लिए पथ प्रदर्शक हो सकते हैं। असहिष्णुता का ढोल पीटते इस समय में सहिष्णुता की सुगन्धित अगरु बत्तियाँ जलाता यह संग्रह नारी को बला और अबला की छवि से मुक्त कर सबल और सुबला के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
'पुनर्नवा' की कादम्बिनी और नव्या, 'स्वयंसिद्धा' की निरमला, 'ऊष्मा अपनत्व की' की अदिति और कल्याणी ऐसे चरित्र है जो बाधाओं को जय करने के साथ स्वमूल्यांकन और स्वसुधार के सोपानों से स्वसिद्धि के लक्ष्य को वरे बिना रुकते नहीं। 'कक्का जू' का मानस उदात्त जीवन-मूल्यों को ध्वस्त कर उन पर स्वस्वार्थों का ताश-महल खड़ी करती आत्मकेंद्रित नयी पीढ़ी की बानगी पेश करता है। अधम चाकरी भीख निदान की कहावत को सत्य सिद्ध करती 'खामियाज़ा' कहानी में स्त्रियों में नवचेतना जगाती संगीता के प्रयासों का दुष्परिणाम उसके पति के अकारण स्थानान्तारण के रूप में सामने आता है। 'बीरबहूटी' जीव-जंतुओं को ग्रास बनाती मानव की अमानवीयता पर केन्द्रित कहानी है। 'या अल्लाह' पुत्र की चाह में नारियों पर होते जुल्मो-सितम का ऐसा बयान है जिसमें नायिका नुजहत की पीड़ा पाठक का अपना दर्द बन जाता है। 'प्रीती पुरातन लखइ न कोई' के वृद्ध दम्पत्ति का देहातीत अनुराग दैहिक संबंधों को कपड़ों की तरह ओढ़ते-बिछाते युवाओं के लिए भले ही कपोल कल्पना हो किन्तु भारतीय संस्कृति के सनातन जवान मूल्यों से यत्किंचित परिचित पाठक इसमें अपने लिये एक लक्ष्य पा सकता है।
संग्रह की शीर्षक कथा 'जिजीविषा' कैंसरग्रस्त सुधाजी की निराशा के आशा में बदलने की कहानी है। कहूँ क्या आस निरास भई के सर्वथा विपरीत यह कहानी मौत के मुंह में जिंदगी के गीत गाने का आव्हान करती है। अतीत की विरासत किस तरह संबल देती है, यह इस कहानी के माध्यम से जाना जा सकता है, आवश्यकता द्रितिकों बदलने की है। भूमिका लेख में डॉ. इला घोष ने कथाकार की सबसे बड़ी सफलता उस परिवेश की सृष्टि करने को मन है जहाँ से ये कथाएँ ली गयी हैं। मेरा नम्र मत है कि परिवेश निस्संदेह कथाओं की पृष्ठभूमि को निस्संदेह जीवंत करता है किन्तु परिवेश की जीवन्तता कथाकार का साध्य नहीं साधन मात्र होती है। कथाकार का लक्ष्य तो परिवेश, घटनाओं और पात्रों के समन्वय से विसंगतियों को इंगित कर सुसंगतियों के स्रुअज का सन्देश देना होता है और जिजीविषा की कहानियाँ इसमें समर्थ हैं।
सांस्कृतिक-शैक्षणिक वैभव संपन्न कायस्थ परिवार की पृष्ठभूमि ने सुमन जी को रस्मो-रिवाज में अन्तर्निहित जीवन मूल्यों की समझ, विशद शब्द भण्डार, परिमार्जित भाषा तथा अन्यत्र प्रचलित रीति-नीतियों को ग्रहण करने का औदार्य प्रदान किया है। इसलिए इन कथाओं में विविध भाषा-भाषियों,विविध धार्मिक आस्थाओं, विविध मान्यताओं तथा विविध जीवन शैलियों का समन्वय हो सका है। सुमन जी की कहन पद्यात्मक गद्य की तरह पाठक को बाँधे रख सकने में समर्थ है। किसी रचनाकार को प्रथम प्रयास में ही ऐसी परिपक्व कृति दे पाने के लिये साधुवाद न देना कृपणता होगी।
१५-१२-२०१८
***
मुक्तक
हर दिन होली, रात दिवाली हो प्यारे
सुबह - साँझ पल हँसी-ख़ुशी के हों न्यारे
सलिल न खोने - पाने में है तंत अधिक
हो अशोक सद्भाव सकल जग पर वारे
***
एक रचना
अंधे पीसें
*
अंधे पीसें
कुत्ते खांय
*
शीर्षासन कर सच को परखें
आँख मूँद दुनिया को निरखें
मनमानी व्याख्या-टीकाएँ
सोते - सोते
ज्यों बर्राएँ
अंधे पीसें
कुत्ते खांय
*
आँखों पर बाँधे हैं पट्टी
न्याय तौलते पीकर घुट्टी
तिल को ताड़, ताड़ को तिल कर
सारे जग को
मूर्ख बनायें
अंधे पीसें
कुत्ते खांय
*
तुम जिंदा हो?, कुछ प्रमाण दो
देख न मानें] भले प्राण दो
आँखन आँधर नाम नैनसुख
सच खों झूठ
बता हरषाएं
अंधे पीसें
कुत्ते खांय
१२ - १२- २०१५
***
माँ को अर्पित चौपदे
बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ
मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ
खेल-कूद शाला नटखटपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ
खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ
गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ
कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ
***
नवगीत:
पत्थरों की फाड़कर छाती
उगे अंकुर
.
चीथड़े तन पर लपेटे
खोजते बाँहें
कोई आकर समेटे।
खड़े हो गिर-उठ सम्हलते
सिसकते चुप हो विहँसते।
अंधड़ों की चुनौती स्वीकार
पल्लव लिये अनगिन
जकड़कर जड़ में तनिक माटी
बढ़े अंकुर।
.
आँख से आँखें मिलाते
बनाते राहें
नये सपने सजाते।
जवाबों से प्रश्न करते
व्यवस्था से नहीं डरते।
बादलों की गर्जना-ललकार
बूँदें पियें गिन-गिन
तने से ले अकड़ खांटी
उड़े अंकुर।
.
घोंसले तज हौसले ले
चल पड़े आगे
प्रथा तज फैसले ले।
द्रोण को ठेंगा दिखाते
भीष्म को प्रण भी भुलाते।
मेघदूतों का करें सत्कार
ढाई आखर पढ़ हुए लाचार
फूलकर खिल फूल होते
हँसे अंकुर।
.
***
नवगीत :
कैंसर!
मत प्रीत पालो
.
अभी तो हमने बिताया
साल भर था साथ
सच कहूँ पूरी तरह
छूटा ही नहीं है हाथ
कर रहा सत्कार
अब भी यथोचित मैं
और तुम बैताल से फिर
आ लदे हो काँध
अरे भाई! पिंड तो छोड़ो
चदरिया निज सम्हालो
.
मत बनो आतंक के
पर्याय प्यारे!
बनो तो
आतंकियों के जाओ द्वारे
कांत श्री की
छीन पाओगे नहीं तुम
जयी औषधि-हौसला
ले पुनः हों हम
रखे धन काला जो
जा उनको सम्हालो
.
शारदासुत
पराजित होता नहीं है
कलमधारी
धैर्य निज खोता नहीं है
करो दो-दो हाथ तो यह
जान लो तुम
पराजय निश्चित तुम्हारी
मान लो तुम
भाग जाओ लाज अब भी
निज बचालो
१५-१२-२०१४
.

विश्वेश्वरैया,

 विश्वेश्वरैया उवाच 

मूल अंग्रेजी, हिंदी अनुवाद आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

If you buy what you do not need you will need, what you can not buy.   

यदि तुम वह खरीदते हो जिसकी आवश्यकता नहीं है तो तुम्हें उसकी आवश्यकता होगी जो तुम खरीद नहीं सकते।

*

To give real service you must add some thing that can no tbe bought and measured with money.  

सच्ची सेवा करने के लिए तुम्हें  वह करना चाहिए जो खरीदा नहीं जा सकता और रुपए से तौला नहीं जा सकता।
*
Hard work performed in a disciplined mannar in most cases will keep the worker fit and prolong his life.   

अनुशासन सहित किया गया कड़ा परिश्रम करनेवाले को चुस्त और दीर्घजीवी बनाता है।
*
Every man who has become great ows his achievement to incessent life.   

हर वह मनुष्य जो महान बनता है, सतत परिश्रम से उपलब्धि अर्जित करता है।
*
The way to build a nation is the way to build a good citizen. The majority of the citizens should be efficient, of good character and possess a high sence of duty.   
एक श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने का मार्ग श्रेष्ठ नागरिक बनाना है। अधिकांश नागरिकों को सक्षम, सच्चरित्र और कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। 
***  



गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

सॉनेट, रश्मि, व्यंग्य मुक्तिका, नर्मदा, Poem, श्री राधे, नव गीत, दोहा, हाइकु, व्यंग्य गीत

 सलिल सृजन १४ दिसंबर 

सॉनेट 

चंद्र मणि

गगन अँगूठी रत्न चंद्र मणि जगमग चमके,

अवलोके जो दाँतों में अँगुलियाँ दबाए,

धरती मैया सुता निहारे बलि बलि जाए,

तारक दीप्ति मंद हो कहिए कैसे दमके?

गड़ गड़ मेघा रूठे क्रोधित गरजे-बमके

पवन वेग से दौड़े-भागे खून जलाए,

मिले चंद्र मणि नहीं; इंद्र बरसात कराए,

सूरज कर दीदार न पाए दिन भए तमके।

भोले भण्डारी हँस लेते सजा शीश पर,

नाग कंठ में लटकाकर हर करें सुरक्षा,

अमिय-जहर का साथ अनूठा जग जग हेरे।

जैसा भाव दिखे वैसा ही कवि कहते अक्सर,

दे प्रज्ञान चित्र, विक्रम को भाए कक्षा,

निरख चंद्र मणि रूप सलिल साथी को टेरे।

१४.१२.२०२३ 

सॉनेट

रश्मि
रश्मि कौंधती प्राची में तब पौ फटती है,
रश्मिरथी नीलाभ गगन को रँगें सुनहरा,
पंछी करते कलरव झूमे पवन मसखरा,
आलस की कुहराई रजाई भी हटती है।
आँखें खुलें मनुजता भू पर पग धरती है,
गिरि चढ़, नापे समुद, गगन में भी वह विचरा,
रश्मि सूर्य शशि की मोहे पग वहाँ भी धरा,
ग्रह-उपग्रह जय करने की कोशिश करती है।
रश्मि ज्ञान की दे विवेक सत-सुंदर-शिव भी,
नश्वर माया की छाया से मुक्त हो सकें,
काया साधन पा साधें जन-गण के हित को।
रहने योग्य रहे यह धरती, मिले विभव भी,
क्रोध घृणा विद्वेष सके हर मानव मन खो,
रश्मि प्रकाशित करें निरंतर जीवन-पथ को।
१४.१२.२०२३
•••

व्यंग्य मुक्तिका
घना कोहरा, घुप्प अँधेरा मुँह मत खोलो।
अंध भक्त हो नेता जी की जय जय बोलो।।
संविधान की गारंटी का मोल नहीं है।
नेता जी की गारंटी सुन मटको-डोलो।।
करो विभाजित नित समाज को, मेल मिटाओ।
सद्भावों के शर्बत में नफ़रत विष घोलो।।
जो बीता सो बीता कह आगे मत बढ़ना।
खोद विवादों के मुर्दे जीवन को तोलो।।
मार कुल्हाड़ी आप पैर पर आप हाथ से।
हँस लेना लेकिन पहले थोड़ा तो रो लो।।
१४.१२.२०२३
•••

सॉनेट

नर्मदा
नर्मदा सलिला सनातन,
करोड़ों वर्षों पुरानी,
हर लहर कहती कहानी।
रहो बनकर पतित पावन।।
शिशु सदृश यह खूब मचले,
बालिका चंचल-चपल है,
किशोरी रूपा नवल है।
युवा दौड़े कूद फिसले।।
सलिल अमृत पिलाती है,
शिवांगी मोहे जगत को।
भीति भव की मिटाती है।।
स्वाभिमानी अब्याहा है,
जगज्जननी सुमाता है।
शीश सुर-नर नवाता है।।
संजीव
१४-१२-२०२२
जबलपुर,७•४७
●●●
***
Poem:Again and again
Sanjiv
*
Why do I wish to swim
Against the river flow?
I know well
I will have to struggle
More and more.
I know that
Flowing downstream
Is an easy task
As compared to upstream.
I also know that
Well wishers standing
On both the banks
Will clap and laugh.
If I win,
They will say:
Their encouragement
Is responsible for the success.
If unfortunately
I lose,
They will not wait a second
To say that
They tried their best
To stop me
By laughing at me.
In both the cases
I will lose and
They will win.
Even then
I will swim
Against the river flow
Again and again.
***
अभिनव प्रयोग
मुक्तिका
श्री राधे
*
अनहद-अक्षर अजर-अमर हो श्री राधे
आत्मा आकारित आखर हो श्री राधे
इला इडा इसरार इजा हो श्री राधे
ईक्षवाकु ईश्वर ईक्षित हो श्री राधे
उदधि उबार उठा उन्नत हो श्री राधे
ऊब न ऊसर उपजाऊ हो श्री राधे
एक एक मिल एक रंग हो श्री राधे
ऐंचातानी जग में क्यों हो श्री राधे?
और न औसर और लुभाओ श्री राधे
थके खोजकर क्यों ओझल हो श्री राधे
अंत न अंतिम 'सलिल' कंत हो श्री राधे
अ: अ: आहा छवि अब हो श्री राधे
(प्रथमाक्षर स्वर)
१४-१२-२०१९
***
नव गीत :
क्यों करे?
*
चर्चा में
चर्चित होने की चाह बहुत
कुछ करें?
क्यों करे?
*
तुम्हें कठघरे में आरोपों के
बेड़ा हमने।
हमें अगर तुम घेरो तो
भू-धरा लगे फटने।
तुमसे मुक्त कराना भारत
ठान लिया हमने।
'गले लगे' तुम,
'गले पड़े' कह वार किया हमने।
हम हैं
नफरत के सौदागर, डाह बहुत
कम करें?
क्यों करे?
*
हम चुनाव लड़ बने बड़े दल
तुम सत्ता झपटो।
नहीं मिले तो धमकाते हो
सड़कों पर निबटो।
अंग हमारे, छल से छीने
बतलाते अपने।
वादों को जुमला कहते हो
नकली हैं नपने।
माँगो अगर बताओ खुद भी,
जाँच कमेटी गठित
मिल करें?
क्यों करे?
*
चोर-चोर मौसेरे भाई
संगा-मित्ती है।
धूल आँख में झोंक रहे मिल
यारी पक्की है।
नूराकुश्ती कर, भत्ते तो
बढ़वा लेते हो।
भूखा कृषक, अँगूठी सुख की
गढ़वा लेते हो।
नोटा नहीं, तुम्हें प्रतिनिधि
निज करे।
क्यों करे?
संजीव
१४-१२-२०१८
***
जो बूझे सो ज्ञानी
छन्नी से छानने पर जो पदार्थ ऊपर रह जाता है उसे क्या कहते हैं?, जो नीचे गिर जाता है उसे क्या कहते हैं?, जो उपयोगी पदार्थ हो उसे क्या कहते हैं?, जो निरुपयोगी परार्थ हो उसे क्या कहते हैं?
छानन का क्या मतलब है?
*
नवगीत
संसद-थाना
जा पछताना।
जागा चोर, सिपाही सोया
पाया थोड़ा, ज्यादा खोया
आजादी है
कर मनमाना।
जो कुर्सी पर बैठा-ऐंठा
ताश समझ जनता को फेंटा
मत झूठों को
सच बतलाना।
न्याय तराजू थामे अंधा
काले कोट कर रहे धंधा
हो अन्याय
न तू चिल्लाना।
बदमाशों के साथ प्रशासन
लोकतंत्र है महज दु:शासन
चूहा बन
मनमाना खाना।
पंडा-डंडा, झंडी-झण्डा
शाकाहारी है खा अंडा
प्रभु को दिखा
भोग खुद खाना।
14.12.2016
***
एक दोहा-
चीका, बळी, फेदड़ी, तेली, खिजरा, खाओ खूब
भारत की हर भाषा बोलो, अपनेपन में डूब
***
उत्तर प्रदेश डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ की स्मारिका १९८८ में प्रकाशित मेरे हाइकु
१.
ईंट रेट का
मन्दिर मनहर
देव लापता
*
२.
क्या दूँ मीता?
भौतिक सारा जग
क्षणभंगुर
*
गोली या तीर
सी चुभन गंभीर
लिए हाइकु
*
स्वेद-गंग है
पावन सचमुच
गंगा जल से
*
पर पीड़ा से
अगर न पिघला
तो मानव क्या?
*
मैले मन को
उजला तन क्यों
देते हो प्रभु?
*
चाह नहीं है
सुख की दुःख
साथी हैं सच्चे
*
मद-मदिरा
मत मुझे पिला, दे
नम्र भावना
*
इंजीनियर
लगा रहा है चूना
क्यों खुद को ही?
***
नवगीत
*
शब्दों की भी मर्यादा है
*
हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा
क्यों उल्लास-ख़ुशी हुडदंगा?
शब्दों का मत दुरूपयोग कर.
शब्द चाहता यह वादा है
शब्दों की भी मर्यादा है
*
शब्द नाद है, शब्द ताल है.
गत-अब-आगत, यही काल है
पल-पल का हँस सदुपयोग कर
उत्तम वह है जो सादा है
शब्दों की भी मर्यादा है
*
सुर, सरगम, धुन, लय, गति-यति है
समझ-साध सदबुद्धि-सुमति है
कर उपयोग न किन्तु भोग कर
बोझ अहं का नयों लादा है?
शब्दों की भी मर्यादा है
१४-१२-२०१६
***
व्यंग्य गीत
*
बंदर मामा
चीन्ह -चीन्ह कर
न्याय करे
*
जो सियार वह भोगे दण्ड
शेर हुआ है अति उद्दण्ड
अपना & तेरा मनमानी
ओह निष्पक्ष रचे पाखण्ड
जय जय जय
करता समर्थ की
वाह करे
*
जो दुर्बल वह पिटना है
सच न तनिक भी पचना है
पाटों बीच फँसे घुन को
गेहूं के सँग पिसना है
सत्य पिट रहा
सुने न कोई
हाय करे
*
निर्धन का धन राम हुआ
अँधा गिरता खोद कुँआ
दोष छिपा लेता है धन
सच पिंजरे में कैद सुआ
करते आप
गुनाह रहे, भरता कोई
विवश मरे
१२.१२. १५
***
नवगीत:
नवगीतात्मक खंडकाव्य रच
महाकाव्य की ओर चला मैं
.
कैसा मुखड़ा?
लगता दुखड़ा
कवि-नेता ज्यों
असफल उखड़ा
दीर्घ अंतरा क्लिष्ट शब्द रच
अपनी जय खुद कह जाता बच
बहुत हुआ सम्भाव्य मित्रवर!
असम्भाव्य की ओर चला मैं
.
मिथक-बिम्ब दूँ
कई विरलतम
निकल समझने
में जाए दम
कई-कई पृष्ठों की नवता
भारी भरकम संग्रह बनता
लिखूं नहीं परिभाष्य अन्य सा
अपरिभाष्य की ओर चला मैं
.
नवगीतों का
मठाधीश हूँ
अपने मुँह मिट्ठू
कपीश हूँ
वहं अहं का पाल लिया है
दोष थोपना जान लिया है
मानक मान्य न जँचते मुझको
तज अमान्य की ओर चला मैं
***
नवगीत:
निज छवि हेरूँ
तुझको पाऊँ
.
मन मंदिर में कौन छिपा है?
गहन तिमिर में कौन दिपा है?
मौन बैठकर
किसको गाऊँ?
.
हुई अभिन्न कहाँ कब किससे?
गूँज रहे हैं किसके किस्से??
कौन जानता
किसको ध्याऊँ?
.
कौन बसा मन में अनजाने?
बरबस पड़ते नयन चुराने?
उसका भी मन
चैन चुराऊँ?
***
दोहा
हहर हहर कर हर रही, लहर-लहर सुख-चैन
सिहर-कहर चुप प्राण-मन, आप्लावित हैं नैन
१४-१२-२०१४
***

बुधवार, 13 दिसंबर 2023

गीत, मुक्तिका, सॉनेट, व्यंग्य लेख, नवगीत

 मुक्तिका

कर नियंत्रित कामनाएँ

हों निमंत्रित भावनाएँ

रब रखे महफूज सबको

मिटाकर सब यातनाएँ

कोशिशें अच्छी न हारें

खूब जूझें जीत जाएँ

स्नेह सुख सम्मान सम पा

खिलखिलाएँ सुत-सुताएँ

रहे निर्झर सा सलिल-मन

नेह नर्मद नित नहाएंँ

भोर अँगना में चिरैया

उतर फुदकें चहचहाएँ

साँस आखिर तक रहे दम

पसीना जमकर बहाएँ

१३.१२.२०२३

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सॉनेट

कामना

*
कामना हो साथ हर दम
काम ना छोड़े अधूरा
हाथ जो ले करे पूरा
कामनाएँ हों न कम
का मनाया?; का मिला है?
अनमना है; उन्मना है
क्यों इतै नाहक मुरझना?
का मना! तू कब खिला है?
काम ना- ना काम मोहे
काम ना हो तो परेशां
काम ना या काम चाहे?
भला कामी या अकामी?
बनो नामी या अनामी?
बूझता जो वही सामी
संजीव
१३-१२-२२
जबलपुर, ७•०४
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द्विपदियाँ
फ़िक्र वतन की नहीं तनिक, जुमलेबाजी का शौक
नेता को सत्ता प्यारी, जनहित से उन्हें न काम
*
कुर्सी पाकर रंग बदल, दें गिरगिट को भी मात
काम तमाम तमाम काम का, करते सुबहो-शाम
१३-१२-२०२०
***
मुक्तक
*
कुंज में पाखी कलरव करते हैं
गीत-गगन में नित उड़ान नव भरते हैं
स्नेह सलिल में अवगाहन कर हाथ मिला-
भाव-नर्मदा नहा तारते तरते हैं
*
मनोरमा है हिंदी भावी जगवाणी
सुशोभिता मम उर में शारद कल्याणी
लिपि-उच्चार अभिन्न, अनहद अक्षर है
शब्द ब्रह्म है, रस-गंगा संप्राणी है
*
जैन वही जो अमन-चैन जी-जीने दे
पिए आप संतोष सलिल नित, पीने दे
परिग्रह से हो मुक्त निरंतर बाँट सके-
तपकर सुमन सु-मन जग को रसभीने दे
*
उजाले देख नयना मूँदकर परमात्म दिख जाए नमन कर
तिमिर से प्रगट हो रवि-छवि निरख मन झूमकर गाए नमन कर
मुदित ऊषा, पुलक धरती, हुलस नभ हो रहा हर्षित चमन लख
'सलिल' छवि ले बसा उर में करे भव पार मिट जाए अमन कर
१२-१२-२०२०, ६.४५
***
व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।
हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।
'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।
लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।
हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।
'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
१३-१२-२०१८
***
द्विपदी भय की नाम-पट्टिका पर, लिख दें साहस का नाम.
कोशिश कभी न हारेगी, बाधा को दें पैगाम.
१३-१२-२०१७
***
मुक्तिका
*
मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा.
जो छिपा है राज खोलूँगा.
*
अनतुले अब तक रहे हैं जो
बिना हिचके उन्हें तोलूँगा.
*
कालिया है नाग काला धन
नाच फन पर नहीं डोलूँगा.
*
रूपए नकली हैं गरल उसको
मिटा, अमृत आज घोलूँगा
*
कमीशनखोरी न बच पाए
मिटाकर मैं हाथ धो लूँगा
*
क्यों अकेली रहे सच्चाई?
सत्य के मैं साथ हो लूँगा
*
ध्वजा भारत की उठाये मैं
हिन्द की जय 'सलिल' बोलूँगा
***
गीत
खाट खड़ी है
*
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
हल्ला-गुल्ला,शोर-शराबा
है बिन पेंदी के लोटों का.
*
नकली नोट छपे थे जितने
पल भर में बेकार हो गए.
आम आदमी को डँसने से
पहले विषधर क्षार हो गए.
ऐसी हवा चली है यारो!
उतर गया है मुँह खोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
नाग कालिया काले धन का
बिन मरे बेमौत मर गया.
जल, बहा, फेंका घबराकर
जान-धन खाता कहीं भर गया.
करचोरो! हर दिन होना है
वार धर-पकड़ के सोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
बिना परिश्रम जोड़ लिया धन
रिश्वत और कमीशन खाकर
सेठों के हित साधे मिलकर
निज चुनाव हित चंदे पाकर
अब हर राज उजागर होगा
नेता-अफसर की ओटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
१३-१२-२०१६
***
नवगीत:
*
लेटा हूँ
मखमल गादी पर
लेकिन
नींद नहीं आती है
.
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बर्तनवाली बाई
देह सांवरी नयन कटीले
अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन
खनके चूड़ी
जाने क्या गाती है
मुझ जैसे
लक्ष्मी पुत्र को
बना भिखारी वह जाती है
.
उस करवट ने साफ़-सफाई
करनेवाली छवि दिखलाई
आहा! उलझी लट नागिन सी
नर्तित कटि ने नींद उड़ाई
कर ने झाड़ू जरा उठाई
धक-धक धड़कन
बढ़ जाती है
मुझ अफसर को
भुला अफसरी
अपना दास बना जाती है
.
चित सोया क्यों नींद उड़ाई?
ओ पाकीज़ा! तू क्यों आई?
राधे-राधे रास रचाने
प्रवचन में लीला करवाई
करदे अर्पित
सब कुछ
गुरु को
जो
वह शिष्या
मन भाती है
.
हुआ परेशां नींद गँवाई
जहँ बैठूँ तहँ थी मुस्काई
मलिन भिखारिन, युवा, किशोरी
कवयित्री, नेत्री तरुणाई
संसद में
चलभाष देखकर
आत्मा तृप्त न हो पाती है
मुझ नेता को
भुला सियासत
गले लगाना सिखलाती है
१३-१२-२०१४
***
गीत
क्षितिज-फलक पर...
*
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
रजनी की कालिमा परखकर,
ऊषा की लालिमा निरख कर,
तारों शशि रवि से बातें कर-
कहदो हासिल तुम्हें हुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
राजहंस, वक, सारस, तोते
क्या कह जाते?, कब चुप होते?
नहीं जोड़ते, विहँस छोड़ते-
लड़ने खोजें कभी खुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
मेघ जल-कलश खाली करता,
भरे किस तरह फ़िक्र न करता.
धरती कब धरती कुछ बोलो-
माँ खाती खुद मालपुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
रमता जोगी, बहता पानी.
पवन विचरता कर मनमानी.
लगन अगन बन बाधाओं का
दहन करे अनछुआ-छुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
*
चित्र गुप्त ढाई आखर का,
आदि-अंत बिन अजरामर का.
तन पिंजरे से मुक्ति चाहता
रुके 'सलिल' मन-प्राण सुआ क्या?
क्षितिज-फलक पर
लिखा हुआ क्या?...
१३-१२-२०१२
***