कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

सोरठा, रेन, भुजंगप्रयात, ग़ज़ल, दोहा, समीक्षा, नदी काव्य, नवगीत, हिमकर श्याम, सुबोध श्री, पंकज मिश्र 'अटल', कुण्डलिया

सोरठे
जिनके कच्चे कान, उन्हें पकड़ कर खींचिए।
नानी आए याद, खूब मसलिए भींचिए।।
*
सलिल सम्हलकर बोल, बड़बोले नादान हैं।
खतरनाक वे मित्र, जिनके कच्चे कान हैं।।
*
बोला-गोला जान, लौट नहीं पाता कभी।।
जिनके कच्चे कान, करें भरोसा मत कभी।।
*
सोरठ दोहा
रैन भिगोए नैन, बैन न कटु कहती कभी।
कहती सो पा चैन, हो बेचैन न मनु सभी।।
रैन-रैनपति लग्न, तारागण बारात ले।
झूम-नाच मुद मग्न, मंत्र-वचन अंबर कहे।।
रैन न जाए जाग, लोरी उषा सुना रही।
तेरा अमर सुहाग, रवि लख आशीषे दिशा।।
शरत्पूर्णिमा रैन, लगे फिरंगन नार सी।
डूबे सागर नैन, मावस में हँस चंद्रमा।।
७-४-२०२३
***
मुक्तिका
आधार छंद/ वाचिक भुजंग प्रयात
मापनी 122 122 122 122
पदांत- हुए है
समांत - आए
*
सभी को खिलौना बनाए हुए है।
खुदी में खुदा को समाए हुए है।।

जिसे वोट लेना बताए हमें वो।
किए वायदे क्या निभाए हुए है।।

लिए हाथ में आइना देखता जो
खुदी पे खुदी को रिझाए हुए है।।

न कुर्सी, न सत्ता, न नेता, न दिल्ली।
हमें गाँव अपना लुभाए हुए है।।

सुनाती न दादी, न नानी कहानी।
सदी बचपना क्यों गँवाए हुए है।।

नहीं लोक की तंत्र में फ़िक्र बाकी।
करे जुल्म जुल्मी, छिपाए हुए है।।

नहीं बात जन की, करे बात मन की।
खुदी को खुदा खुद बनाए हुए है।।
७-४-२०२३
***
: साहित्य संस्कार : पुरुष विमर्श विशेषांक :
३० अप्रैल तक रचनाएँ आमंत्रित
जबलपुर। त्रैमासिक पत्रिका साहित्य संस्कार के पुरुष विमर्श विशेषांक हेतु हिंदी साहित्य की सभी विधाओं में स्तरीय रचनाएँ आमंत्रित है। रचनाएँ भेजने की अंतिम तिथि ३० अप्रैल २०२३ है। रचना पुरुष के अवदान, अनदेखी, उपेक्षा, शोषण आदि पहलू को केंद्र में रखकर हो। पत्रिका में गीत, नवगीत, क्षणिका, कविता, लघुकथा, निबंध, कहानी, लेख, लघुकथा तथा पुस्तक समीक्षा आदि प्रकाशित की जाती हैं। पुरुष अस्मिता पर संकट, उसके संरक्षण व संवर्धन हेतु किए जा रहे प्रयास व संघर्ष आदि का भी स्वागत है। रचनाओं के साथ मौलिक-अप्रकाशित होने का प्रमाणपत्र, रचनाकार का है रिजोल्यूशन चित्र, डाक का पता, ईमेल, चलभाष/वॉट्सऐप क्रमांक आदि ९४२५१८३२४४ पर वॉट्सऐप या salil.sanjiv@gmail.com पर ईमेल करिए।
***
दोहे
*
चेत सके चित् चैत में, साँस-साँस सत् साथ।
कहे हाथ से हाथ मिल, जिओ उठाकर माथ।।
*
हम नंदन वैशाख के, पके न; आया चैत।
द्वैत हृदय में बसाए, जिह्वा पर अद्वैत।।
*
महुआ महुआ के तले, मोहे गंध बिखेर।
ढाई आखर बाँचती, नैन मूँद अंधेर।।
*
चैती देख पलाश को, तन-मन रही निसार।
क्रुद्ध-तप्त सूरज जला, बरसाता अंगार।।
*
ज्यों की त्यों चादर धरी, हुए कबीरा खेत।
बन कमाल खलिहान ने, चादर धरी समेट।।
*
कल तक मालामाल थे, आज खेत कंगाल।
कल खाली खलिहान थे, अब हैं मालामाल।।
*
बूँद पसीने की गिरी, भू पर उपजी बाल।
देख फसल खलिहान में, मिहनत हुई निहाल।।
*
७-४-२०२२
***
नदी काव्य
*
स्वर्ण रेखा!
अब न हो निराश,
रही तट पर गूँज
आप आ गीता।
काश,
फिर मंगल
कर सके जंगल,
पा पुन: सीता।
अवध
और रजक
गँवा निष्ठा सत
मलिन कर सरयू
गँवा देते राम।
नदी मैया है
जमुन जल राधा,
काट भव बाधा
कान्ह को कर कृष्ण
युग बदलता है।
बीन कर कचरा
रोप पौधा एक
बना उसको वृक्ष
उगा फिर सूरज
हो न जो बीता।
सुन-सुना गीता।।
स्वर्ण रेखा = एक नदी
****
शब्दों की खोज*
*पागलपंती*
पागलपंती शब्द का उद्गम पागलपंथी संप्रदाय से हुआ है।
यह आंदोलन 1833 में अंग्रेज सेना की मदद से कुचला गया था। पागलपंथी आंदोलन करीम शाह और मुस्लिम फकीर मजनू शाह के अन्य शिष्यों द्वारा स्थापित किया गया था। मदारिया सूफी इस पंथ के नेता थे। 1813 में करीम शाह की मृत्यु के बाद, इसका नेतृत्व उनके बेटे टीपू शाह ने किया था। करीम शाह और टीपू शाह की माँ की पत्नी चांद बीबी ने भी समुदाय में एक प्रभावशाली स्थान हासिल किया, जिसे पीर-माता (संत-माता) के नाम से जाना जाता है।
(विकिपीडिया)
गोरखनाथ के बारह पंथ में पागलपंथी का उल्लेख मिलता है।
सत्यनाथी ,धर्मनाथी ,रामपंथी ,नाटेश्वरी, कन्हड़,कपिलानी, वैरागपंथी, माननाथी,आईपंथी, पागलपंथी,धजपंथी और गंगानाथी ।
कार्यशाला
कुंडलिया
*
मानव जब दानव बने, बढ़ता पापाचार ।
शरण राम की लीजिए, आएँ ले अवतार ।। -आशा शैली
आएँ ले अवतार, जगत की पीड़ा हरने
पापी प्रभु से जूझ, मरें भव सागर तरने
दुष्कर्मी थे मिला, विशेषण जिनको दानव
वर्ना थे वे हाड़-मांस के हम से मानव - संजीव
*
७-४-२०२०
***
कृति चर्चा:
युद्धरत हूँ मैं : जिजीविषा गुंजाती कविताएँ
*
(कृति विवरण: युद्घरत हूँ मैं, हिंदी गजल-काव्य-दोहा संग्रह, हिमकर श्याम, प्रथम संस्करण, २०१८, आईएसबीएन ९७८८१९३७१९०७७, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २१२, मूल्य २७५रु., नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, कवि संपर्क बीच शांति एंक्लेव, मार्ग ४ ए, कुसुम विहार, मोराबादी, राँची ८३४००८, चलभाष ८६०३१७१७१०)
*
आदिकवि वाल्मीकि द्वारा मिथुनरत क्रौंच युगल के नर का व्याध द्वारा वध किए जाने पर क्रौंच के चीत्कार को सुनकर प्रथम काव्य रचना हो, नवजात शावक शिकारी द्वारा मारे जाने पर हिरणी के क्रंदन को सुनकर लिखी गई गजल हो, शैली की काव्य पंक्ति 'अवर स्वीटैस्ट सौंग्स आर दोस विच टैल अॉफ सैडेस्ट थॉट' या साहिर का गीत 'हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं' यह सुनिश्चित है कि करुणा और कविता का साथ चोली-दामन का सा है। दुनिया की कोई भी भाषा हो, कोई भी भू भाग हो आदमी की अनुभूति और अभिव्यक्ति समान होती है। पीड़ा, पीड़ा से मुक्ति की चेतना, प्रयास, संघर्ष करते मन को जब यह प्रतीति हो कि हर चुनौती, हर लड़ाई, हर कोशिश करते हुए अपने आप से 'युद्धरत हूँ मैं' तब कवि कविता ही नहीं करता, कविता को जीता है। तब उसकी कविता पिंगल और व्याकरण के मानक पर नहीं, जिंदगी के उतार-चढ़ाव पर बहती हुई नदी की उछलती-गिरती लहरों में निहित कलकल ध्वनि पर परखी जाती है।
हिमकर श्याम की कविता दिमाग से नहीं, दिल से निकलती है। जीवन के षट् राग (खटराग) में अंतर्निहित पंचतत्वों की तरह इस कृति की रचनाएँ कहनी हैं कुछ बातें मन की, युद्धरत हूँ मैं, आखिर कब तक?, झड़ता पारिजात तथा सबकी अपनी पीर पाँच अध्यायों में व्यवस्थित की गई हैं। शारदा वंदन की सनातन परंपरा के साथ बहुशिल्पीय गीति रचनाएँ अंतरंग भावनाओं से सराबोर है।
आरंभ में ३ से लेकर ६ पदीय अंतरों के गीत मन को बाँधते हैं-
सुख तो पल भर ही रहा, दुख से लंबी बात
खुशियाँ हैं खैरात सी, अनेकों की सौग़ात
उलझी-उलझी ज़िंदगी, जीना है दुश्वार
साँसों के धन पर चले जीवन का व्यापार
चादर जितनी हो बड़ी, उतनी ही औक़ात
व्यक्तिगत जीवन में कर्क रोग का आगमन और पुनरागमन झेल रहे हिमकर श्याम होते हुए भी शिव की तरह हलाहल का पान करते हुए भी शुभ की जयकार गुँजाते हैं-
दुखिया मन में मधु रस घोलो
शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो
छंद नया है, राग नया है
होंठों पर फिर फाग नया है
सरगम के नव सुर पर डोलो
शूलों की सेज पर भी श्याम का कवि-पत्रकार देश और समाज की फ़िक्र जी रहा है।
मँहगा अब एतबार हो गया
घर-घर ही बाजार हो गया
मेरी तो पहचान मिट गई
कल का मैं अखबार हो गया
विरासत में अरबी-फारसी मिश्रित हिंदी की शब्द संपदा मसिजीवी कायस्थ परिवारों की वैशिष्ट्य है। हिमकर ने इस विरासत को बखूबी तराशा-सँभाला है। वे नुक़्तों, विराम चिन्हों और संयोजक चिन्ह का प्रयोग करते हैं।
'युद्धरत हूँ मैं' में उनके जिजीविषाजयी जीवन संघर्ष की झलक है किंतु तब भी कातरता, भय या शिकायत के स्थान पर परिचर्चा में जुटी माँ, पिता और मामा की चिंता कवि के फौलादी मनोबल की परिचायक है। जिद्दी सी धुन, काला सूरज, उपचारिकाएँ, किस्तों की ज़िंदगी, युद्धरत हूँ मैं, विष पुरुष, शेष है स्वप्न, दर्द जब लहराए आदि कविताएँ दर्द से मर्द के संघर्ष की महागाथाएँ हैं। तन-मन के संघर्ष को धनाभाव जितना हो सकता है, बढ़ाता है तथापि हिमकर के संकल्प को डिगा नहीं पाता। हिमकर का लोकहितैषी पत्रकार ईसा की तरह व्यक्तिगत पीड़ा को जीते हुए भी देश की चिंता को जीता है। सत्ता, सुख और समृद्धि के लिए लड़े-मरे जा रहे नेताओं, अफसरों और सेठों के हिमकर की कविताओं के पढ़कर मनुष्य होना सीखना चाहिए।
दम तोड़ती इस लोकतांत्रिक
व्यवस्था के असंख्य
कलियुगी रावणों का हम
दहन करना भी चाहें तो
आखिर कब तक
*
तोड़ेंगे हम चुप्पी
और उठा सकेंगे
आवाज़
सर्वव्यापी अन्याय के ख़िलाफ़
लड़ सकेंगे तमाम
खौफ़नाक वारदातों से
और अपने इस
निरर्थक अस्तित्व को
कोई अर्थ दे सकेंगे हम।
*
खूब शोर है विकास का
जंगल, नदी, पहाड़ की
कौन सुन रहा चीत्कार
अनसुनी आराधना
कैसी विडंबना
बिखरी सामूहिक चेतना
*
यह गाथा है अंतहीन संघर्षों की
घायल उम्मीदों की
अधिकारों की है लड़ाई
वजूद की है जद्दोजहद
समय के सत्य को जीते हुए, जिंदगी का हलाहल पीते हुए हिमकर श्याम की युगीन चिंताओं का साक्षी दोहा बना है।
सरकारें चलती रहीं, मैकाले की चाल
हिंदी अपने देश में, अवहेलित बदहाल
कैसा यह उन्माद है, सर पर चढ़ा जुनून
खुद ही मुंसिफ तोड़ते, बना-बना कानून
चाक घुमाकर हाथ से, गढ़े रूप आकार
समय चक्र धीमा हुआ, है कुम्हार लाचार
मूर्ख बनाकर लोक को, मौज करे ये तंत्र
धोखा झूठ फरेब छल, नेताओं के मंत्र
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा प्रकाशित सहयोगाधारित दोहा शतक मंजूषा के भाग २ 'दोहा सलिला निर्मला' में सम्मिलित होने के लिए मुझसे दोहा लेखन सीखकर श्याम ने मुझे गत ५ दशकों की शब्द साधना का पुरस्कार दिया है। सामान्यतः लोग सुख को एकाकी भोगते और दुख को बाँटते हैं किंतु श्याम अपवाद है। उसने नैकट्य के बावजूद अपने दर्द और संघर्ष को छिपाए रखा।इस कृति को पढ़ने पर ही मुझे विद्यार्थी श्याम में छिपे महामानव के जीवट की अनुभूति हुई।
इस एक संकलन में वस्तुत: तीन संकलनों की सामग्री समाविष्ट है। अशोक प्रियदर्शी ने ठीक ही कहा है कि श्याम की रचनाओं में विचार की एकतानता तथा कसावट है और कथन भंगिमा भी प्रवाही है। कोयलांचल ही नहीं देश के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार हरेराम त्रिपाठी 'चेतन' के अनुसार 'रचनाकार अपनी सशक्त रचनाओं से अपने पूर्व की रचनाओं के मापदंडों को झाड़ता और उससे आगे की यात्रा को अधिक जिग्यासा पूर्ण बनाकर तने हुए सामाजिक तंतुओं में अधिक लचीलापन लाता है। मानव-मन की जटिलताओं के गझिन धागों को एक नया आकार देता है।'
इन रचनाओं से गुजरने हुए बार-बार यह अनुभूति होना कि किसी और को नहीं अपने आपको पढ़ रहा हूँ, अपने ही अनजाने मैं को पहचानने की दिशा में बढ़ रहा हूँ और शब्दों की माटी से समय की इबारत गढ़ रहा हूँ। मैं श्याम की जिजीविषा, जीवट, हिंदी प्रेम और रचनाधर्मिता को नमन करता हूँ।
हर हिंदी प्रेमी और सहृदय इंसान श्याम को जीवन संघर्ष का सहभागी और जीवट का साक्षी बन सकता है इस कृति को खरीद-पढ़कर। मैं श्याम के स्वस्थ्य शतायु जीवन की कामना करता हुए आगामी कृतियों की प्रतीक्षा करता हूँ।
७-४-२०१९
***
षट्पदी
बीस साल में जेल है, दो दिन में है बेल.
पकड़ो-छोडो में हुआ, चोर-पुलिस का खेल.
चोर-पुलिस का खेल, पंगु है न्याय व्यवस्था,
लाभ मिले शक का, सुधरे किस तरह अवस्था?
कहे सलिल कविराय, छूटता है क्यों रईस?
मारे-कुचले फिर भी नायक?, हाय! यही है टीस
**
***
पुस्तक सलिला-
‘सरहदें’ कवि कलम की चाह ले कर सर हदें
[पुस्तक परिचय- सरहदें, ISBN 978.93.83969.72.2, कविता संग्रह, सुबोध श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१. ५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड, मूल्य १२० रु., अंजुमन प्रकाशन, ९४२ आर्य कन्या चैराहा, मुटठीगंज, इलाहाबाद २११००३, ९४५३००४३९८, anjumanprakashan@gmail.com , कवि संपर्कः माॅडर्न विला, १०/५१८ खलासी लाइंस, कानपुर २०८००१, चलभाष ०९३०५५४०७४५, subodh158@gmail.com ।]
0
मूल्यों के अवमूल्यन, नैतिकता के क्षरण तथा संबंधों के हनन को दिनानुदिन सशक्त करती तथाकथित आधुनिक जीवनशैली विसंगतियों और विडंबनाओं के पिंजरे में आदमी को दम तोड़ने के लिये विवश कर रही है। कवि-पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव की कविताएॅं बौद्धिक विलास नहीं, पारिस्थितिक जड़ता की चट्टान को तोड़ने में जुटी छेनी की तरह हैं। आम आदमी अवश्वास और निजता की हदों में कैद होकर घुट रहा है। सुबोध जी की कविताएॅं ऐसी हदों को सर करने की कोशिश से उपजी हैं। कवि सुबोध का पत्रकांर उन्हें वायवी कल्पनाओं से दूरकर जमीनी सामाजिकता सम जोड़ता है। उनकी कविताएॅं अनुभूत की सहज-सरल अभिव्यक्ति करती हैं। वर्तमान नकारात्मक पत्रकारिता के समय में एक पत्रकांर को उसका कवि आशावादी बनाता है।
सब कुछ खत्म/नहीं होता
सब कुछ/खत्म हो जाने के बाद भी
बाकी रह जाता है/कहीं कुछ
फिर सृजन को।
हाॅं, एक कतरा उम्मीद भी/खड़ी कर सकती है
हौसले और विष्वास की/बुलंद इमारत।
अपने नाम के अनुरूप् सुबोध ने कविताओं को सहज बोधगम्य रखा है। वे आतंक के सरपरस्तों को न तो मच्छर के दहाडने की तरह नकली चुनौती देते हैं, न उनके भय से नतमस्तक होते हैं अपितु उनकी साक्षात शांति की शक्ति और हिंसा की निस्सारिता से कराते हैं-
तुम्हें/भले ही भाती हो
अपने खेतों में खड़ी/बंदूकों की फसल
लेकिन-/मुझे आनंदित करती है
पीली-पीली सरसों/और/दूर तक लहलहाती
गेहूॅं की बालियों से उपजता/संगीत।
तुम्हारे बच्चों को/शायद
लोरियों सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट/लेकिन/सुनो
कभी खाली पेट नहीं भरा करती
बंदूकें/सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।
सुबोध की कविताएॅं आलंकारिकता का बहिष्कार नहीं करतीं, नकारती भी नहीं पर सुरुचिपूर्ण तरीके कथ्य और भाषा की आवश्यकता के संप्रेषण को अधिक प्रभावी बनाने के लिये उपकरण की तरह अनुरूप उपयोग करती हैं।
उसके बाद/फिर कभी नहीं मिले/हम-तुम
लेकिन/मेरी जि़ंदगी को/महका रही है
अब तक/खुशबू/तेरी याद की
क्योकि/यहाॅं नहीं है/कोई सरहद।
‘अहसास’ शीर्षक अनुभाग में संकलित प्रेमपरक रचनाएॅं लिजलिजेपन से मुक्त और यथार्थ के समीप हैं।
आॅंगन में/जरा सी धूप खिली
मुंडेर पे बैठी/ चिडि़या ने/फुदककर
पंखों में छिपा मुॅंह/बाहर निकाला
और/चहचहाई/तो यूॅं लगा/कि तुम आ गये।
कवि मानव मन की गहराई से पड़ताल कर, कड़वे सच को भी सहजता और अपनेपन से कह पाता है-
जितना/खौफनाक लगता है/सन्नाटा
उससे भी कहीं ज्यादा/डर पैदा करता है
कोई/खामोश आदमी।
दोनों ही स्थितियाॅं/तकरीबन एक सी हैं
फर्क सिर्फ इतना है कि/सन्नाटा/टूटता है तो
फिर पहले जैसा हो जाता है/माहौल/लेकिन
चुप्पी टूटने पे/अक्सर/बदला-बदला सा
नज़र आता है/आदमी।
संग्रह के आकर्षण में डाॅ. रेखा निगम, अजामिल तथा अशोक शुक्ल 'अंकुश' के चित्रों ने वृद्धि की है। प्रतिष्ठित कलमकार दिविक रमेश जी की भूमिका सोने में सुहागे की तरह है।
000
रसानंद दे छंद नर्मदा २४: ६-४-२०१६
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय तथा भुजंगप्रयात छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए कुण्डलिनी छंद से.
कुण्डलिनी का वृत्त है दोहा-रोला युग्म
*
कुण्डलिनी हिंदी के कालजयी और लोकप्रिय छंदों में अग्रगण्य है। एक दोहा (दो पंक्तियाँ, १३-११ पर यति, विषम चरण के आदि में जगण वर्जित, सम चरणान्त गुरु-लघु या लघु- लघु-लघु) तथा एक रोला (चार पंक्तियाँ, ११-१३यति, विषम चरणान्त गुरु-लघु या लघु- लघु-लघु, सम चरण के आदि में जगण वर्जित,सम चरण के अंत में २ गुरु, लघु-लघु-गुरु, या ४ लघु) मिलकर षट्पदिक (छ: पंक्ति) कुण्डलिनी छंद को आकार देते हैं। दोहा और रोला की ही तरह कुण्डलिनी भी अर्ध सम मात्रिक छंद है। दोहा का अंतिम या चौथा चरण रोला प्रथम चरण बनाकर दोहराया जाता है। दोहा का प्रारंभिक शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश रोला का अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश होता है। प्रारंभिक और अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश की समान आवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो जहाँ से आरम्भ किया वही लौट आये, इस तरह शब्दों के एक वर्तुल या वृत्त की प्रतीति होती है। सर्प जब कुंडली मारकर बैठता है तो उसकी पूँछ का सिरा जहाँ होता है वहीं से वह फन उठाकर चतुर्दिक देखता है।
१. कुण्डलिनी छंद ६ पंक्तियों का छंद है जिसमें एक दोहा और एक रोला छंद होते हैं।
२. दोहा का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण होता है।
३. दोहा का आरंभिक शब्द, शब्दांश, शब्द समूह या पूरा चरण रोला के अंत में प्रयुक्त होता है।
४. दोहा तथा रोला अर्ध सम मात्रिक छंदहैं अर्थात इनके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ होती हैं।
अ. दोहा में २ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में १३+११=२४ मात्राएँ होती हैं. दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे) चरण में १३ मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ११ मात्राएँ होती हैं।
आ. दोहा के विषम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है। शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते।
इ. दोहा के विषम चरण का अंत रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए।
ई. दोहा के सम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है।
उ. दोहा के लघु-गुरु मात्राओं की संख्या के आधार पर २३ प्रकार होते हैं।
उदाहरण: समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
जहाँ देर है वहीं है, सच मानो अंधेर।।
५. रोला भी अर्ध सम मात्रिक छंद है अर्थात इसके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ होती हैं।
क. रोला में ४ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में ११+१३=२४ मात्राएँ होती हैं। दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें) चरण में ११ मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे, छठवें, आठवें) चरण में १३ मात्राएँ होती हैं।
का. रोला के विषम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है।
कि. रोला के सम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है। शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते।
की. रोला के सम चरण का अंत रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए।
उदाहरण: सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़।
हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़।।
भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय।
नाचें गायें झूम, सियासत भूल हर समय।।
६. कुण्डलिनी:
समय-समय की बात है, समय-समय का फेर
जहाँ देर है वहीं है, सच मानो अंधेर
सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़
हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़
भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय
नाचें गायें झूम, सियासत भूल हर समय
कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान।
दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान।।
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक।
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक।।
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया।
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया।। - नवीन चतुर्वेदी
कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित
कुण्डलिया है जादुई
२११२ २ २१२ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
छन्द श्रेष्ठ श्रीमान।
२१ २१ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
दोहा रोला का मिलन
२२ २२ २ १११ = १३ मात्रा / अंत में लघु लघु लघु [प्रभाव लघु गुरु] के साथ यति
इसकी है पहिचान।।
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
इसकी है पहिचान,
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
मानते साहित सर्जक।
२१२ २११ २११ = १३ मात्रा
आदि-अंत सम-शब्द,
२१ २१ ११ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
साथ, बनता ये सार्थक।।
२१ ११२ २ २११ = १३ मात्रा
लल्ला चाहे और
२२ २२ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
चाहती इसको ललिया।
२१२ ११२ ११२ = १३ मात्रा
सब का है सिरमौर
११ २ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
छन्द प्यारे कुण्डलिया।।
२१ २२ २११२ = १३ मात्रा
उदाहरण -
०१. भारत मेरी जान है, इस पर मुझको नाज़।
नहीं रहा बिल्कुल मगर, यह कल जैसा आज।।
यह कल जैसा आज, गुमी सोने की चिड़िया।
बहता था घी-दूध, आज सूखी हर नदिया।।
करदी भ्रष्टाचार- तंत्र ने, इसकी दुर्गत।
पहले जैसा आज, कहाँ है? मेरा भारत।। - राजेंद्र स्वर्णकार
०२. भारत माता की सुनो, महिमा अपरम्पार ।
इसके आँचल से बहे, गंग जमुन की धार ।।
गंग जमुन की धार, अचल नगराज हिमाला ।
मंदिर मस्जिद संग, खड़े गुरुद्वार शिवाला ।।
विश्वविजेता जान, सकल जन जन की ताकत ।
अभिनंदन कर आज, धन्य है अनुपम भारत ।। - महेंद्र वर्मा
०३. भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल।
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल।।
तज भेदों के, शूल / अनवरत, रहें सृजनरत।
मिलें अँगुलिका, बनें / मुष्टिका, दुश्मन गारत।।
तरसें लेनें. जन्म / देवता, विमल विनयरत।
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत।।
(यहाँ अंतिम पंक्ति में ११ -१३ का विभाजन 'नित' ले मध्य में है अर्थात 'सलिल' पखारे पग नि/त पूजे, माता भारत में यति एक शब्द के मध्य में है यह एक काव्य दोष है और इसे नहीं होना चाहिए। 'सलिल' पखारे चरण करने पर यति और शब्द एक स्थान पर होते हैं, अंतिम चरण 'पूज नित माता भारत' करने से दोष का परिमार्जन होता है।)
०४. कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान।
इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान।।
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर।
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर।।
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर।
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर।।
('सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर' यहाँ 'बेहतर' पढ़ने पर अंतिम पंक्ति में २४ के स्थान पर २५ मात्राएँ हो रही हैं। उर्दूवाले 'बेहतर' या 'बिहतर' पढ़कर यह दोष दूर हुआ मानते हैं किन्तु हिंदी में इसकी अनुमति नहीं है। यहाँ एक दोष और है, ११ वीं-१२ वीं मात्रा है 'बे' है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता। 'सलिल' न बेहतर मानव से' करने पर अक्षर-विभाजन से बच सकते हैं पर 'मानव' को 'मा' और 'नव' में तोड़ना होगा, यह भी निर्दोष नहीं है। 'मानव से अच्छा न, 'सलिल' कोई कंप्यूटर' करने पर पंक्ति दोषमुक्त होती है।)
०५. सुंदरियाँ घातक 'सलिल', पल में लें दिल जीत।
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत।।
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर।
बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर।।
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ।
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ।।
(इस कुण्डलिनी की हर पंक्ति में २४ मात्राएँ हैं। इसलिए पढ़ने पर यह निर्दोष प्रतीत हो सकती है। किंतु यति स्थान की शुद्धता के लिये अंतिम ३ पंक्तियों को सुधारना होगा।
'अवढरदानी बिछुड़ / हो गये थे प्रलयंकर', 'रीझें सुर पर असुर / ससुर तजकर किन्नरियाँ', 'नीर-क्षीर बन करें / पूर्ण जीवन सुंदरियाँ' करने पर छंद दोष मुक्त हो सकता है।)
०६. गुन के गाहक सहस नर, बिन गन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय।।
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब लगै अपावन।।
कह 'गिरधर कविराय', सुनो हे ठाकुर! मन के।
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के।। - गिरधर
कुण्डलिनी छंद का सर्वाधिक और निपुणता से प्रयोग करनेवाले गिरधर कवि ने यहाँ आरम्भ के अक्षर, शब्द या शब्द समूह का प्रयोग अंत में ज्यों का त्यों न कर, प्रथम चरण के शब्दों को आगे-पीछे कर प्रयोग किया है। ऐसा करने के लिये भाषा और छंद पर अधिकार चाहिए।
०७. हे माँ! हेमा है कुशल, खाकर थोड़ी चोट
बच्ची हुई दिवंगता, थी इलाज में खोट
थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आये
अभिनेता हैं खास, आम जन हुए पराये
सहकर पीड़ा-दर्द, जनता करती है क्षमा?
समझें व्यथा-कथा, आम जन का कुछ हेमा
यहाँ प्रथम चरण का एक शब्द अंत में है किन्तु वह प्रथम शब्द नहीं है।
०८. दल का दलदल ख़त्म कर, चुनिए अच्छे लोग।
जिन्हें न पद का लोभ हो, साध्य न केवल भोग।।
साध्य न केवल भोग, लक्ष्य जन सेवा करना।
करें देश-निर्माण, पंथ ही केवल वरना।।
कहे 'सलिल' कवि करें, योग्यता को मत ओझल।
आरक्षण कर ख़त्म, योग्यता ही हो संबल।।
यहाँ आरम्भ के शब्द 'दल' का समतुकांती शब्द 'संबल' अंत में है। प्रयोग मान्य हो या न हो, विचार करें।
०९. हैं ऊँची दूकान में, यदि फीके पकवान।
जिसे- देख आश्चर्य हो, वह सचमुच नादान।।
वह सचमुच नादान, न फल या छाँह मिलेगी।
ऊँचा पेड़ खजूर, व्यर्थ- ना दाल गलेगी।।
कहे 'सलिल' कविराय, दूर हो ऊँचाई से।
ऊँचाई दिख सके, सदा ही नीचाई से।।
यहाँ प्रथम शब्द 'है' तथा अंत में प्रयुक्त शब्द 'से' दोनों गुरु हैं। प्रथम दृष्टया भिन्न प्रतीत होने पर भी दोनों के उच्चारण में लगनेवाला समय समान होने से छंद निर्दोष है।
***

***
नवगीत-
*
एसिड की
शीशी पर क्यों हो
नाम किसी का?
*
अल्हड, कमसिन, सपनों को
आकार मिल रहा।
अरमानों का कमल
यत्न-तालाब खिल रहा।
दिल को भायी कली
भ्रमर गुंजार करे पर-
मौसम को खिलना-हँसना
क्यों व्यर्थ खल रहा?
तेज़ाबी बारिश की जिसने
पात्र मौत का-
एसिड की
शीशी पर क्यों हो
नाम किसी का?
*
व्यक्त असहमति करना
क्या अधिकार नहीं है?
जबरन मनमानी क्या
पापाचार नहीं है?
एसिड-अपराधी को
एसिड से नहला दो-
निरपराध की पीर
तनिक स्वीकार नहीं है।
क्यों न किया अहसास-
पीड़ितों की पीड़ा का?
एसिड की
शीशी पर क्यों हो
नाम किसी का?
*
अपराधों से नहीं,
आयु का लेना-देना।
नहीं साधना स्वार्थ,
सियासत-नाव न खेना।
दया नहीं सहयोग
सतत हो, सबल बनाकर-
दण्ड करे निर्धारित
पीड़ित जन की सेना।
बंद कीजिए नाटक
खबरों की क्रीड़ा का
एसिड की
शीशी पर क्यों हो
नाम किसी का?
***
पुस्तक सलिला-
‘‘बोलना सख्त मना है’’ नवगीत की विसंगतिप्रधान भावमुद्रा
[पुस्तक परिचय- बोलना सख्त मना है, ISBN 978-93-85942-09-9, नवगीत संग्रह, पंकज मिश्र ‘अटल’,वर्ष २०१६, आकार २०.५ से.मी. x ७.५ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड, मूल्य १०० रु., बोधि प्रकाशन एफ ७७ ए सेक्टर ९, मार्ग ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६, ०१४१ २५०३९८९, bodhiprakashan@gmail.com, कवि संपर्क सृजन, कुमरा गली, रोशनगंज, शाहजहाॅंपुर २४१००१, चलभाष 99366031136 ।]
0
साहित्य को सशक्त हथियार और पारंपरिकता को तोड़ने व वैचारिक क्रांति करने का उद्देश्य मात्र माननेवाले रचनाकार पंकज मिश्र की इस नवगीत संग्रह से पूर्व दो पुस्तकें ‘चेहरों के पार’ तथा ‘नए समर के लिये’ प्रकाशित हो चुकी र्हैं। विवेच्य संकलन की भूमिका में नवगीतकार अपनी वैचारिक प्रतिबद्वता से अवगत कराकर पाठक को रचनाओं में अंतप्र्रवहित भावों का पूर्वाभास करा देता है। उसके अनुसार ‘‘माध्यम महत्वपूर्ण तो है, पर उतना नहीं जितना कि वह विचार, लक्ष्य या मंतव्य जो समाज को चैतन्यता से पूर्ण कर दे, उसे जागृत कर दे और सकारात्मकता के साथ आगे पढ़ने को बाध्य कर दे। मैंने अपने नवगीतों में अपने आस-पास जो घटित हो रहा है, जो मैं महसूस कर रहा हूॅं और जो भोग रहा हूॅं, उस भोगे हुए यथार्थ को कथ्य रूप में अभिव्यक्ति प्रदान की है।’’ इसका अर्थ यह हुआ कि रचनाकार केवल भोगे हुए को अभिव्यक्ति दे सकता है, अनुभूत को नहीं। तब किसी अनपढ, किसी शोषित़ के दर्द की अभ्व्यिक्ति कोई पढ़ा-लिखा यंा अशोषित कैसे कर सकतंा है? तब कोई स्त्रीए पुरुष की, कोई प्रेमचंद किसी धीसू या जालपा की बात नहीं कह सकेगा क्योंकि उसने वह भोगा नहीं, देखा मात्र है। यह सोच एकांगी ही नहीं गलत भी है। वस्तुतः अभिव्यक्त करने के लिये भोगना जरूरी नहीं, अनुभूति को भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। अतः भोगे हुए यथार्थ कथ्य रूप में अभिव्यक्त करने का दावा अतिशयोक्ति ही हो सकता है।
कवि के अनुसार उसके आस-पास वर्जनाएॅं, मूल्य नहीं मूल्यों की चर्चाएॅं, खोखलेपन और दंभ को पूर्णता मान भटकती-बिखरती पीढ़ी, तिक्त-चुभते संवाद और कथन, खीझ और बासीपन, अति तार्किकता, दम तोड़ती भावनाएॅं, खुद को खोती-चुकती अवसाद धिरी भीड़ है और इसी को से जन्मे हैं उसके नवगीत। यह वक्तव्य कुछ सवाल खड़े करता है. क्या समाज में केवल नकारात्मकता ही है, कुछ भी-कहीं भी सकारात्मक नहीं है? इस विचार से सहमति संभव नहीं क्योंकि समाज में बहुत कुछ अच्छा भी होता है। यह अच्छा नवगीत का विषय क्यों नहीं होे सकता? किसी एक का आकलन सब के लिये बाध्यता कैसे हो सकता है? कभी एक का शुभ अन्य के लिये अशुभ हो सकता है तब रचनाकार किसी फिल्मकार की तरह एक या दोनों पक्षों की अनुभूतियों को विविध पात्रों के माध्यम से व्यक्त कर सकता है।
कवि की अपेक्षा है कि उसके नवगीत वैचारिक क्रांति के संवाहक बनें। क्रांति का जन्म बदलाव की कामना से होता है, क्रांति को ताकत त्याग-बलिदान-अनुशासन से मिलती है। क्रांति की मशाल आपसी भरोसे से रौशन होती है किंतु इन सबकी कोई जगह इन नवगीतों में नहीं है। गीत से जन्में नवगीत में शिल्प की दृष्टि से मुखड़ा-अंतरा, अंतरों में सामान्यतः समान पंक्ति संख्या और पदभार, हर अंतरे के बाद मुखड़े के समान पदभार व समान तुक की पंक्तियाॅं होती हैं। अटल जी ने इस शिल्पानुशासन से रचनाओं को गति-यति युक्त कर गेय बनाया है। हिंदी में स्नातकोत्तर कवि अभिव्यक्ति सामथ्र्य का धनी है। उसका शब्द-भंडार समृद्ध है। कवि का अवचेतन अपने परिवेश में प्रचलित शब्दों को बिना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करता है इसलिए भाषा जीवंत है। भाषा को प्राणवान बनाने के लिये कवि गुंफित, तिक्त, जलजात, कबंध, यंत्रवत, वाष्प, वीथिकाएॅं जैसे संस्क्रतनिष्ठ शब्द, दुआरों, सॅंझवाती, आखर आदि देशज शब्द, हाकिम, जि़ंदगी, बदहवास, माफिक, कुबूल, उसूल जैसे उर्दू शब्द तथा फुटपाथ, कल्चर, पेपरवेट, पेटेंट, पिच, क्लासिक, शोपीस आदि अंग्रेजी शब्द यथास्थान स्वाभाविकता के साथ प्रयोग करता है। अहिंदी शब्दों का प्रयोग करतें समय कवि सजगतापूर्वक उन्हें हिंदी शब्दों की तरह वापरता है। पेपरों तथा दस्तावेजों जैसे शब्दरूप सहजता से प्रयोग किये गये हैं।
हिंदी मातृभाषा होने के कांरण कवि की सजगता हटी और त्रुटि हुई। शीष, क्षितज जैसी मुद्रण त्रुटियाॅं तथा अनुनासिक तथा अनुस्वार के प्रयोग में त्रुटि खटकती है। संदर्भ का उच्चारण सन्दर्भ है तो हॅंसकर को अहिंदीभाषी हन्सकर पढ़कर हॅंसी का पात्र बन जाएगा। हॅंस और हंस का अंतर मिट जाना दुखद है। इसी तरह बहुवचन शब्दों में कहीं ‘एॅं’ का प्रयोग है, कहीं ‘यें’ का देखें ‘सभ्यताएॅं’और ‘प्रतिमायें’। कवि ने गणित से संबंधित शब्दों का प्रयौग किया है। ये प्रयोग अभिव्यक्ति को विशिष्ट बनाते हैं किंतु सटीकता भी चाहते हैं। ‘अपनापन /घिर चुका आज / फिर से त्रिज्याओं में’ के संबंध में तथ्य यह है कि त्रिज्या वृत के केंद्र से परिधि तक सीधी लकीर होती है, त्रिज्याएॅं चाप के बिना किसी को घेर नहीे सकतीं। ‘बन चुकी है /परिधि सारी /विवशतायें’, गूॅंगी /चुप्पी में लिपटी /सारी त्रिज्याएॅं हैं’, घुट-घुटकर जीता है नगरीय भूगोल, बढ़ने और घटनें में ही घुटती सीमाएॅं है, रेखाएॅं /घुलकर क्यों /तिरता प्रतिबिंब बनीं?’, ‘धुॅंधलाए /फलकों पर/आधा ही बिंब बनीं’, ‘आकांश बनने /में ही उनके/कट गए डैने’, ‘ड्योढि़याॅं/हॅंसती हैं/आॅंगन को’, इतिहास के /सीने पे सिल/बोते रहे’, ‘लड़ रहीं/लहरें शिलाओं से’, लिपटकर/हॅंसती हवाओं से’, ‘एक बौना/सा नया/सूरज उगाते हम’जैसे प्रयोग ध्यान आकर्षित करते हैं किंतु अधिक सजगता भी चाहते हैं।
अटल जी के ये नवगीत पारंपरिक कथ्य को तोड़ते और बहुत कुछ जोड़ते हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता पर सहज अनुभूतिजन्य अभिव्यक्ति को वरीयता होने पर रस औ भाव पक्ष गीत को अधिक प्रभावी होंगे। यह संकलन अटल जी से और अधिक की आशा जगाता है। नवगीतप्रेमी इसे पढ़कर आनंदित होगे। सुरुचिपूर्ण आवरण, मुद्रण तथा उपयुक्त मूल्य के प्रति प्रकाशक का सजग होना स्वागतेय है।
७-४-२०१६


***

मुक्तक:


.
मान किया, अभिमान किया, अपमान किया- हरि थे मुस्काते
सौंवी न हो गलती यह भी प्रभु आप ही आप रहे चेताते
काल चढ़ा सिर पर न रुका, तब चक्र सुदर्शन कृष्ण चलाते
शीश कटा भू लोट रहा था, प्राण गए हरि में ही समाते
***
मुक्तिका:

.
गैर से हमको क्यों गिला होगा?
आइना सामने मिला होगा
झील सी आँख जब भरी होगी
कोई उसमें कमल खिला होगा
गर हकीकत न बोल पायी तो
होंठ उसने दबा-सिला होगा
कब तलक चैट से मिलेगा वह
क्या कभी खत्म सिलसिला होगा
हाय! ऐसे न मुस्कुराओ तुम
ढह गया दिल का हर किला होगा
झोपड़ी खाट धनुष या लाठी
जब बनी बाँस ही छिला होगा
काँप जाते हैं कलश महलों के
नीव पत्थर कोई हिला होगा
***
मुक्तिका:
.
पल में न दिल में दिल को बसाने की बात कर
जो निभ सके वो नाता निभाने की बात कर
मुझको तो आजमा लिया, लूँ मैं भी आजमा
तू अब न मुझसे पीछा छुड़ाने की बात कर
आना है मुश्किलात को आने भी दे ज़रा
आ जाए तो महफिल से न जाने की बात कर
बचना 'सलिल' वो चाहता मिलना तुझे गले
पड़ जाए जो गले तो भुलाने की बात कर
बेचारगी और तीरगी से हारना न तुम
यायावरी को अपनी जिताने की बात कर
...
क्षणिका
बाँस
.
ज़िन्दगी भर
नेह-नाते
रहे जिनसे.
रह गए हैं
छूट पीछे
आज घर में.
साथ आया वह
न जिसकी
कभी भायी फाँस.
उठाया
हाँफा न रोया
वीतरागी बाँस
*
***
लघु कथा:
बाँस
.
गेंड़ी पर नाचते नर्तक की गति और कौशल से मुग्ध जनसमूह ने करतल ध्वनि की. नर्तक ने मस्तक झुकाया और तेजी से एक गली में खो गया.
आश्चर्य हुआ प्रशंसा पाने के लिये लोग क्या-क्या नहीं करते? चंद करतल ध्वनियों के लिये रैली, भाषण, सभा, समारोह, यहाँ ताक की खुद प्रायोजित भी कराते हैं. यह अनाम नर्तक इसकी उपेक्षा कर चला गया जबकि विरागी-संत भी तालियों के मोह से मुक्त नहीं हो पाते. मंदिर से संसद तक और कोठों से अमरोहों तक तालियों और गालियों का ही राज्य है.
संयोगवश अगले ही दिन वह नर्तक फिर मिला गया. आज वह पीठ पर एक शिशु को बाँधे हाथ में लंबा बाँस लिये रस्से पर चल रहा था और बज रही थीं तालियाँ लेकिन वह फिर गायब हो गया.
कुछ दिन बाद नुक्कड़ पर फिर दिख गया वह... इस बार कंधे पर रखे बाँस के दोनों ओर जलावन के गट्ठर टँगे थे जिन्हें वह बेचने जा रहा था..
मैंने पुकारा तो वह रुक गया. मैंने उसके नृत्य और रस्से पर चलने की कला की प्रशंसा कर पूछा कि इतना अच्छा कलाकार होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा से दूर क्यों चला जाता है? कला साधना के स्थान पर अन्य कार्यों को समय क्यों देता है?
कुछ पल वह मुझे देखता रहा फिर लम्बी साँस भरकर बोला : 'क्या कहूँ? कला साधना और प्रशंसा तो मुझे भी मन भाती है पर पेट की आग न तो कला से, न प्रशंसा से बुझती है. तालियों की आवाज़ में रमा रहूँ तो बच्चे भूखे रह जायेंगे.' मैंने जरूरत न होते हुए भी जलावन ले ली... उसे परछी में बैठकर पानी पिलाया और रुपये दिए तो वह बोल पड़ा: 'सब किस्मत का खेल है. अच्छा-खासा व्यापार करता था. पिता को किसी से टक्कर मार डी. उनके इलाज में हुए खर्च में लिए कर्ज को चुकाने में पूँजी ख़त्म हो गयी. बचपन का साथी बाँस और उस पर सीखे खेल ही पेट पालने का जरिया बन गये.' इससे पहले कि मैं उसे हिम्मत देता वह फिर बोला: 'फ़िक्र न करें, वे दिन न रहे तो ये भी न रहेंगे. अभी तो मुझे कहीं झुककर कहीं तनकर बाँस की तरह परिस्थितियों से जूझना ही नहीं, उन्हें जीतना भी है.' और वह तेजी से आगे बढ़ गया. मैं देखते रह गया उसके हाथ में झूलता बाँस
*
***
नवगीत:
.
बाँस हैं हम
.
पत्थरों में उग आते हैं
सीधी राहों पर जाते हैं
जोड़-तोड़ की इस दुनिया में
काम सभी के हम आते हैं
नहीं सफल के पीछे जाते
अपने ही स्वर में गाते हैं
यह न समझो
नहीं कूबत
फाँस हैं हम
बाँस हैं हम
.
चाली बनकर चढ़ जाते हैं
तम्बू बनकर तन जाते हैं
नश्वर माया हमें न मोहे
अरथी सँग मरघट जाते हैं
वैरागी के मन भाते हैं
लाठी बनकर मुस्काते हैं
निबल के साथी
उसीकी
आँस हैं हम
बाँस हैं हम
.
बन गेंड़ी पग बढ़वाते हैं
अगर उठें अरि भग जाते हैं
मिले ढाबा बनें खटिया
सबको भोजन करवाते हैं
थके हुए तन सो जाते हैं
सुख सपनों में खो जाते हैं
ध्वज लगा
मस्तक नवाओ
नि-धन का धन
काँस हैं हम
बाँस हैं हम
७-४-२०१५
***
क्षणिका
*
कर पाता दिल
अगर वंदना
तो न टूटता
यह तय है.
*
निंदा करना
बहुत सरल है.
सराहना ही
मुश्किल है.
*
असंतोष-कुंठा कब उपजे?,
बूझे कारण कौन?
सलिल' सियासत स्वार्थ साधती
जनगण रहता मौन.
*
मैं हूँ
अदना शब्द-सिपाही.
अर्थ सहित दें
शब्द गवाही..
*
मुक्तक
दोस्तों की आजमाइश क्यों करें?
मौत से पहले ही बोलो क्यों मरें..
नाम के ही हैं. मगर हैं साथ जो-
'सलिल' उनके बिन अकेले क्यों रहें?.
*
दिल लगाकर दिल्लगी हमने न की.
दिल जलाकर बंदगी तुमने न की..
दिल दिया ना दिल लिया, बस बात की-
दिल दुखाया सबने हमने उफ़ न की..
७-४-२०१०
***

गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

सॉनेट, सोरठा, लघुकथा, नवगीत, दोहा,माखनलाल चतुर्वेदी, शिव, तुम

सोरठा सलिला

बही रसों की धार, कवियों की महफ़िल जमी।
कविता का श्रृंगार, अलंकार लालित्यमय।।

सुमिरे जिसको रोज, रैन रहे बेचैन मन।
कभी हमारी खोज, चैन गँवा वह भी करे।।

बंदी कर चितचोर, आँख रैन जगती रहे।
जा न सके बरजोर, बंदी ले बंदी बना।।

नित सुधियों का कोष, रैन सहेजे मौन रह।
जब कर ले संतोष, शाहों की शाह तब।।

पाकर कंत बसंत, रैन महकती चहकती।
पालें चाह अनंत, नैन कथा कह अनकही।।
६-४-२०१३
•••
सॉनेट
तन-मन

तन में मन है, सुमन सुरभि सम।
माटी हो जाता, तन बिन मन।
लचक अधिक रख नाहक मत तन।।
खुश रह, खुश रख, मिट जाए गम।।
तन्मय मन हो, हो मन्मय तन।
चादर बुनकर ओढ़, स्वच्छ रख।
प्रभुको दे आखिर में फल चख।।
ज्यों की त्यों धर सके कर जतन।।
अनगिन जन फिर भी जग निर्जन।
इकतारा बन बज तुन तिन तिन।
तान न ढीला छोड़, कर जतन।।
कर धन संचय, हो मत निर्धन।
जोड़ बावरे! हँस मन से मन।
एक-नेक, दो रहें न तन-मन।।
६-४-२०२२
•••
***
दोहा मुक्तिका
ताल दे लता याद वह, आ ले बाँहें थाम
लाडो कह कह लिपटता, अपना बन बेदाम
*
अश्क बहा मत रोक ले, हो अशोक भूधाम
सुधा बरस हर श्वास में, रहे कृष्ण का नाम
*
रेखा खींच सरोज की, बीच सलिल ले नाम
मन मंदिर में शारदा, लख आए घनश्याम
*
तुलसी जब तुल सी गई, कैक्टस जा ब्रजधाम
कुंज करीब मिटा रहा, घायल गोप गुलाम
***
एक दोहा
करे जीव संजीव वह, करे वही निष्प्राण
माटी से मूर्त गढ़े, कर चेतन संप्राण
६-४-२०२१
दोहा-दोहा खेलिए
नियम
१. आखिरी दोहे के अंतिम शब्द/अक्षर से अगला दोहा आरंभ करें।
२. दोहा खुद का लिखा न हो तो दोहे के साथ दोहाकार का नाम अवश्य दें।
३. किसी अन्य के दोहे पर टीका-टिप्पणी न करें।
४. दोहे के कथ्य की पूरी जवाबदारी प्रस्तुतकर्ता की होगी।
५. प्रबंधक का आदेश / निर्णय सब पर बंधनकारी होगा।
६. एक शब्द या अक्षर पर एक से अधिक दोहे आने पर जो दोहा सबसे पहले आया हो, उसे आधार मानकर आगे बढ़ा जाए।
७. बीच के किसी दोहे पर टिप्पणी या उससे जुड़ा दोहा, मूल दोहे के साथ ही जवाब में दें ताकि संदर्भ सहित पढ़ा जा सके।
*
सदय रहें माँ शारदा, ऋिद्धि सिद्धि गणराज
हिंदी के सिर सज सके, जगवाणी का ताज
अगला दोहा ज से आरंभ करें
*
समय बिताने के लिए यह एक रोचक क्रीड़ा है। इसमें कितने भी प्रतिभागी भाग ले सकते हैं। आरंभक एक दोहा प्रस्तुत करे जिसका प्रथम चरण गुरु लघु से आरम्भ हो। दोहे के अंतिम शब्द से आरंभ कर अगला प्रतिभागी दोहा प्रस्तुत करे। यह क्रम चलता रहेगा। खेल के दो प्रकार हैं - १. प्रतिभागियों का क्रम तय हो, जिसकी बारी हो वही दोहा प्रस्तुत करे। २. क्रम अनिश्चित हो, जो पहले दोहा बना ले प्रस्तुत कर दे। किसी दोहे के अंत में पहले दोहे का पहला शब्द आने पर खेल ख़त्म हो जाएगा। इसे निरंतर कई दिनों तक खेला जा सकता है।
उदाहरण
दोहा-सलिला
बोल रहे सब सगा पर, सगा न पाया एक
हैं अनेक पर एक भी, मिला न अब तक नेक
नेक नेकियत है कहाँ, खोज खोज हैरान
अपने भीतर झाँक ले, बोल पड़ा मतिमान
मान न मान मगर करे, मन ही मन तू गान
मौन न रह पाए भले, मन में ले तू ठान
ठान अगर ले छू सके, हाथों से आकाश
पैर जमकर धरा पर, तोड़ मोह का पाश
पाश न कोई है जिसे, मनुज न सकता खोल
कर ले दृढ़ संकल्प यदि, मन ही मन में बोल
६-४-२०२०
***
स्वतंत्रता सेनानी और निर्भीक पत्रकार माखनलाल
*
देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आजादी की लड़ाई और पत्रकारिता दोनों क्षेत्रों में जिन लोगों ने अद्भुत काम किया उनमें माखनलाल चतुर्वेदी व गणेश शंकर विद्यार्थी अग्रणी हैं। खासकर हिंदी पट्टी की पत्रकारिता में इनका काम काफी महत्वपूर्ण है।
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में हुआ था। माखनलाल जब 16 वर्ष के हुए तब ही स्कूल में अध्यापक बन गए थे. उन्होंने 1906 से 1910 तक एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य किया. लेकिन जल्द ही माखनलाल ने अपने जीवन और लेखन कौशल का उपयोग देश की स्वतंत्रता के लिए करने का निर्णय ले लिया.
उन्होंने असहयोग आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन जैसी कई गतिविधियों में भाग लिया. इसी क्रम में वो कई बार जेल भी गए और जेल में कई अत्याचार भी सहन किए,लेकिन अंग्रेज उन्हें कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सके।
अध्यापन किया
1910 में अध्यापन का कार्य छोड़ने के बाद माखन लाल राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सम्पादक का काम देखने लगे थे. उन्होंने प्रभा” और “कर्मवीर” नाम की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सम्पादन का काम किया
माखनलाल ने अपनी लेखन शैली से देश के एक बहुत बड़े वर्ग में देश-प्रेम भाव को जागृत किया. उनके भाषण भी उनके लेखो की तरह ही ओजस्वी और देश-प्रेम से ओत-प्रोत होते थे.
उन्होंने 1943 में “अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन” की अध्यक्षता की. उनकी कई रचनाए तब देश के युवाओं में जोश भरने और उन्हें जागृत करने के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुई.
नव छायावादी शैली
माखनलाल की लेखन शैली नव-छायावाद का एक नया आयाम स्थापित करने वाली थी. जिनमे भी चतुर्वेदी की कुछ रचनाए “हिम-तरंगिनी, कैसा चाँद बना देती हैं,अमर राष्ट्र और पुष्प की अभिलाषा तो हिंदी साहित्य में सदियों तक तक अमर रहने वाली रचनाएँ हैं, और कई युगों तक यह आम-जन को प्रेरित करती रहेगी।
हिंदी साहित्य को योगदान
माखनलाल की कुछ प्रमुख कालजेयी रचनाए हैं – हिम तरंगिनी,समर्पण,हिम कीर्तनी,युग चरण,साहित्य देवता दीप से दीप जले,कैसा चाँद बना देती हैं और पुष्प की अभिलाषा. जिनमें से वेणु लो गूंजे धरा’,हिम कीर्तिनी,हिम तरंगिणी,युग चरण,साहित्य देवता तो सुप्रसिद्ध लेख हैं।
इसके अलावा कुछ कविताएं जैसे अमर राष्ट्र, अंजलि के फूल गिरे जाते हैं, आज नयन के बंगले में, इस तरह ढक्कन लगाया रात ने, उस प्रभात तू बात ना माने, किरणों की शाला बंद हो गई छुप-छुप, कुञ्ज-कुटीरे यमुना तीरे, गाली में गरिमा घोल-घोल, भाई-छेड़ो नहीं मुझे, मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक, संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते।
साहित्य एकेडमी का अवार्ड जीतने वाले पहले व्यक्ति
माखनलाल 1955 में साहित्य एकेडमी का अवार्ड जीतने वाले पहले व्यक्ति हैं। हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान देने के कारण ही पंडितजी को 1959 में सागर यूनिवर्सिटी से डी.लिट् की उपाधि भी प्रदान की गयी।
पद्म भूषण सम्मान मिला
1963 में माखनलाल चतुर्वेदी को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपूर्व योगदान के कारण पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।
माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य की विधा में दिए योगदान के सम्मान में बहुत सी यूनिवर्सिटी ने विविध अवार्ड्स के नाम उनके नाम पर रखे.मध्य प्रदेश सांस्कृतिक कौंसिल द्वारा नियंत्रित मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी देश की किसी भी भाषा में योग्य कवियों को “माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार” देती हैं. पंडितजी के देहांत के 19 वर्ष बाद 1987 से यह सम्मान देना शुरू किया गया।
उनके नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय बना
भोपाल,मध्य प्रदेश में स्थित माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय पूरे एशिया में अपने प्रकार का पहला विश्व विद्यालय हैं. इसकी स्थापना पंडितजी के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता और लेखन के द्वारा दिए योगदान को सम्मान देते हुए 1991 में हुई.
साहित्य जगत का यह अनमोल हीरा 30 जनवरी 1968 को खो दिया. पंडितजी उस समय 79 वर्ष के थे,और देश को तब भी उनके लेखन से बहुत उम्मीदें थी.
पंडित माखन लाल चतुर्वेदी को सम्मान देते हुए पोस्टेज स्टाम्प की शुरुआत की. यह स्टाम्प पंडितजी के 88वें जन्मदिन 4 अप्रैल 1977 को ज़ारी हुआ।
***
शिव परमात्मा !
* वो निराकार हैं , ज्योतिर्लिंगम ----ज्योति पुंज हैं !
* वो सूक्ष्म से सूक्ष्म हैं हर किसी की आत्मा में उनका निवास है !
* मंदिरों में उनका उनका अंडाकार शिव लिंग ब्रह्माण्ड का प्रतीक है जिनके अंदर समस्त सृष्टि समायी है !
* गीता में जो कहा है -की वो सूक्ष्म से सूक्ष्म हैं वो विशाल से
विशाल हैं वो निराकार परमात्मा के लिए है ---शिव ही निराकार
परमात्मा हैं ---दूसरा कोई और नहीं !
* ॐ उनका एक अक्षर का नाम है यह अक्षर इसलिए है यह नाम
कभी समाप्त नहीं होगा ---आपका कंठ थक जायेगा लेकिन ॐ
नहीं , क्यों की इसमें समस्त स्वरों का संगम है - पृथ्वी या अन्य ---ग्रहों के घूर्णन से जो ध्वन्यात्मक नाद उतपन्न होता है वो
ॐ है !
*ॐ ---परमेश्वर का वो नाम है जो पूरे विश्व के अध्यात्म का केंद्र बिंदु है ----OMNICIENT --सर्वज्ञ ,OMNIPOTENT --
सर्वशक्तिशाली , OMNIPRESENT --सर्व व्यापी -, OMEGA ---प्रभु की ख़ुशी , --- OMAR -- भोला ----ऐसे शब्द हैं जो ॐ की
विश्व व्यापकता की और संकेत करते हैं !
* सिख धर्म कहता है ---एक ओंकार ही सत्य है ---
एको जपो एको सालाहि !
एको सिमरि एको मन आहि,!!
ऐकस के गन गाऊ अनंत !,
मनि तनि जापि एक भगवंत !!
***
जैन धर्म का महामंत्र कहता है ----
"ओमणमो ------"-----उस निराकार ओम को नमन !
****
* मक्का में मुसलमान संगे अस्वद की उसी प्रकार परिक्रमा ---करते हैं जैसे हम शिव की !
*-- ॐ को ९० अंश घडी की दिशा में घुमाने पर इसको अल्लाह भी पढ़ा जा सकता है !
****
* शिव अर्थात ॐ निराकार परमात्मा ही सत्य है -----इस सत्य को मानने से पूरी मानवजाति ईश्वर के नाम पर एक होगी --
यही सत्य पूरी मानव जाति को एक करने की शक्ति रखता है !
* ॐ ही " देवनामधा " ( ऋग्वेद ) -----अर्थात समस्त देवताओं के नाम को धारण करते है ----एक परमात्मा ही समस्त देवताओं फरिश्तों की शक्तियों को धारण करते हैं !
* शिव निराकार परमात्मा है निराकार ब्रह्म हैं -----साकार ब्रह्म के रूप में वो ही ब्रह्मा , विष्णु , शंकर , राम , कृष्ण हैं !
*विश्व शांति का सूत्र है---- "सत्य शिवम सुंदरम"
६-४-२०१९
***
चार लघुकथाएँ
१. एकलव्य
*
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
*****
२. खाँसी
*
कभी माँ खाँसती, कभी पिता. उसकी नींद टूट जाती, फिर घंटों न आती। सोचता काश, खाँसी बंद हो जाए तो चैन की नींद ले पाए।
पहले माँ, कुछ माह पश्चात पिता चल बसे। उसने इसकी कल्पना भी न की थी.
अब करवटें बदलते हुए रात बीत जाती है, माँ-पिता के बिना सूनापन असहनीय हो जाता है। जब-तब लगता है अब माँ खाँसी, अब पिता जी खाँसे।
तब खाँसी सुनकर नींद नहीं आती थी, अब नींद नहीं आती है कि सुनाई दे खाँसी।
***
३. साँसों का कैदी
*
जब पहली बार डायलिसिस हुआ था तो समाचार मिलते ही देश में तहलका मच गया था। अनेक महत्वपूर्ण व्यक्ति और अनगिनत जनता अहर्निश चिकित्सालय परिसर में एकत्र रहते, डॉक्टर और अधिकारी खबरचियों और जिज्ञासुओं को उत्तर देते-देते हलाकान हो गए थे।
गज़ब तो तब हुआ जब प्रधान मंत्री ने संसद में उनके देहावसान की खबर दे दी, जबकि वे मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे। वस्तुस्थिति जानते ही अस्पताल में उमड़ती भीड़ और जनाक्रोश सम्हालना कठिन हो गया। प्रशासन को अपनी भूल विदित हुई तो उसके हाथ-पाँव ठन्डे हो गए। गनीमत हुई कि उनके एक अनुयायी जो स्वयं भी प्रभावी नेता थे, वहां उपस्थित थे, उन्होंने तत्काल स्थिति को सम्हाला, प्रधान मंत्री से बात की, संसद में गलत सूचना हेतु प्रधानमंत्री ने क्षमायाचना की।
धीरे-धीरे संकट टला.… आंशिक स्वास्थ्य लाभ होते ही वे फिर सक्रिय हो गए, सम्पूर्ण क्रांति और जनकल्याण के कार्यों में। बार-बार डायलिसिस की पीड़ा सहता तन शिथिल होता गया पर उनकी अदम्य जिजीविषा उन्हें सक्रिय किये रही। तन बाधक बनता पर मन कहता मैं नहीं हो सकता साँसों का कैदी।
***
४. गुरु जी
*
मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है, क्या आप मुझे शिष्य बना नहीं सिखायेंगे?
बार-बार अनुरोध होने पर न स्वीकारने की अशिष्टता से बचने के लिए सहमति दे दी। रचनाओं की प्रशंसा, विधा के विधान आदि की जानकारी लेने तक तो सब कुछ ठीक रहा।
एक दिन रचनाओं में कुछ त्रुटियाँ इंगित करने पर उत्तर मिला- 'खुद को क्या समझते हैं? हिम्मत कैसे की रचनाओं में गलतियाँ निकालने की? मुझे इतने पुरस्कार मिल चुके हैं। फेस बुक पर जो भी लिखती हूँ सैंकड़ों लाइक मिलते हैं। मेरी लिखे में गलती हो ही नहीं सकती। आइंदा ऐसा किया तो...'
आगे पढ़ने में समय ख़राब करने के स्थान पर शिष्या को ब्लोक कर चैन की सांस लेते कान पकड़े कि अब नहीं बनेंगे किसी के गुरु। ऐसों को गुरु नहीं गुरुघंटाल ही मिलने चाहिए।
***
***
त्वरित प्रतिक्रिया
कृष्ण-मृग हत्याकांड
*
मुग्ध हुई वे हिरन पर, किया न मति ने काम।
हरण हुआ बंदी रहीं, कहा विधाता वाम ।।
*
मुग्ध हुए ये हिरन पर, मिले गोश्त का स्वाद।
सजा हुई बंदी बने, क्यों करते फ़रियाद?
*
देर हुई है अत्यधिक, नहीं हुआ अंधेर।
सल्लू भैया सुधरिए, अब न कीजिए देर।।
*
हिरणों की हत्या करी, चला न कोई दाँव।
सजा मिली तो टिक नहीं, रहे जमीं पर पाँव।।
*
नर-हत्या से बचे पर, मृग-हत्या का दोष।
नहीं छिप सका भर गया, पापों का घट-कोष।।
*
आहों का होता असर, आज हुआ फिर सिद्ध।
औरों की परवा करें, नर हो बनें न गिद्ध।।
*
हीरो-हीरोइन नहीं, ख़ास नागरिक आम।
सजा सख्त हो तो मिले, सबक भोग अंजाम ।।
*
अब तक बचते रहे पर, न्याय हुआ इस बार।
जो छूटे उन पर करे, ऊँची कोर्ट विचार।।
*
फिर अपील हो सभी को, सख्त मिल सके दंड।
लाभ न दें संदेह का, तब सुधरेंगे बंड।।
*
न्यायपालिका से विनय करें न इतनी देर।
आम आदमी को लगे, होता है अंधेर।।
*
सरकारें जागें न दें, सुविधा कोई विशेष।
जेल जेल जैसी रहे, तनहा समय अशेष।।
६-४-२०१८
***

गीत -
अपने सपने कहाँ खो गये?
*
तुमने देखे,
मैंने देखे,
हमने देखे।
मिल प्रयास कर
कभी रुदन कर
कभी हास कर।
जाने-अनजाने, मन ही मन, चुप रह लेखे।
परती धरती में भी
आशा बीज बो गये।
*
तुमने खोया,
मैंने खोया ,
हमने खोया।
कभी मिलन का,
कभी विरह का,
कभी सुलह का।
धूप-छाँव में, नगर-गाँव में पाया मौक़ा।
अंकुर-पल्लव ऊगे
बढ़कर वृक्ष हो गये।
*
तुमने पाया,
मैंने पाया,
हमने पाया।
एक दूजे में,
एक दूजे कोको,
गले लगाया।
हर बाधा-संकट को, जीता साथ-साथ रह।
पुष्पित-फलित हुए तो
हम ही विवश हो गये।
६-४-२०१६
नवगीत:
.
क्षुब्ध पहाड़ी
विजन झुरमुट
झाँकता शिरीष
.
गगनचुम्बी वृक्ष-शिखर
कब-कहाँ गये बिखर
विमल धार मलिन हुई
रश्मिरथी तप्त-प्रखर
व्यथित झाड़ी
लुप्त वनचर
काँपता शिरीष
.
सभ्य वनचर, जंगली नर
देख दंग शिरीष
कुल्हाड़ी से हारता है
रोज जंग शिरीष
कली सिसके
पुष्प रोये
झुलसता शिरीष
.
कर भला तो हो भला
आदम गया है भूल
कर बुरा पाता बुरा है
जिंदगी है शूल
वन मिटे
बीहड़ बचे हैं
सिमटता शिरीष
.
बीज खोजो और रोपो
सींच दो पानी
उग अंकुर वृक्ष हो
हो छाँव मनमानी
जान पायें
शिशु हमारे
महकता शिरीष
५-४-२०१५
***
गीत :
.
खेत उगलते हैं सोना पर
खेतिहरों का दीवाला है
.
जो बोये-काटे वह भूखा
जो हथिया ले वही सुखी है
मिल दलाल लें लूट मुनाफा
उत्पादक मर रहा दुखी है
भूमि छीनते हो किसान की
कैसे भूमि-पुत्र हो? बोलो!
जनप्रतिनिधि सोचो-शर्माओ
मत ज़मीर अपना यूं बेचो
निज सुविधा त्यागो, जनगण सा
जीवन जियों, बनो साधारण
तब ही तो कर पाओगे तुम
आमजनों का कष्ट निवारण
गंगा सुखी लोकनीति की
भरा स्वार्थ का परनाला है
.
वनवासी से छीन लिये वन
है अधनंगा श्रमिक शहर में
शिखर मानकों के फेकें हैं
तोड़-तोड़कर सतत गव्हर में
दलहित साध्य हुआ सूरों को
गौड़ देशहित मान रहे हो
जयचंदी है मूढ़ सियासत
घोल कुएँ में भाँग रहे हो
सर्वदली सरकार बनाओ
मतभेदों का शमन करो मिल
भारत पहली विश्वशक्ति हो
भारत माँ की शपथ गहो नित
दीनबन्धु बन पोछों आँसू
दीन-हीन के सँग मेहनत कर
तभी खुलेगा भारत के
उन्नति पथ का लौही ताला है
...
***
नवगीत:
.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
महुआ महका,
टेसू दहका,
अमुआ बौरा खूब.
प्रेमी साँचा,
पनघट नाचा,
प्रणय रंग में डूब.
अमराई में,
खलिहानों में,
तोता-मैना झूम
गुप-चुप मिलते,
खुस-फुस करते,
सबको है मालूम.
चूल्हे का
दिल भी हुआ
हाय! विरह से लाल.
कुटनी लकड़ी
जल मरी
सिगड़ी भई निहाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
सड़क-इमारत
जीवन साथी
कभी न छोड़ें हाथ.
मिल खिड़की से,
दरवाज़े ने
रखा उठाये माथ.
बरगद बब्बा
खों-खों करते
चढ़ा रहे हैं भाँग.
पीपल भैया
शेफाली को
माँग रहे भर माँग.
उढ़ा
चमेली को रहा,
चम्पा लकदक शाल.
सदा सुहागन
छंद को
सजा रही निज भाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
२६.२.२०१५
*
***
नवगीत:
.
जब भी
झाँका
दिल के अन्दर
पाया
गहरा
एक समन्दर
.
संयम-नियम
तुला पर साधा
परमपिता
को भी आराधा
पार कर गया
सब भव-बाधा
खोया-पाया
आधा-आधा
चाहा मन्दिर
पाया मन्दर
जब भी
झाँका
दिल के अन्दर
पाया
गहरा
एक समन्दर
.
कब क्या बीता
भूलो मीता!
थोड़ा मीठा
थोड़ा तीता
राम न खुद
पर चाहें सीता
पढ़ते नहीं
पढ़ाते गीता
आया गोरख
भाग मछन्दर
जब भी
झाँका
दिल के अन्दर
पाया
गहरा
एक समन्दर
.
खुद के मानक
खुद गढ़ दह ना
तीसमारखाँ
खुद को कह ना
यह नवगीत
उसे मत कहना
झगड़े-झंझट
नाहक तह ना
मिले सुधा जब
हो मन चंदर
जब भी
झाँका
दिल के अन्दर
पाया
गहरा
एक समन्दर
२३-२४ फरवरी २०१५
*
***
नवगीत:
*
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
झाड़ू लेकर
राजनीति की
बात करें.
संप्रदाय की
द्वेष-नीति की
मात करें.
आश्वासन की
मृग-मरीचिका
ख़त्म करो.
उन्हें हराओ
जो निर्बल से
घात करें.
मैदानों में
शपथ लोक-
सेवा की लो.
मतदाता क्या चाहे
पूछो जा द्वारे
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
मन्दिर-मस्जिद
से पहले
शौचालय हो.
गाँव-मुहल्ले
में उत्तम
विद्यालय हो.
पंडित-मुल्ला
संत, पादरी
मेहनत कर-
स्वेद बहायें,
पूज्य खेत
देवालय हों.
हरियाली संवर्धन हित
आगे आ रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
जाती जन्म से
नहीं, कर्म से
बनती है.
उत्पादक अन-
उत्पादक में
ठनती है.
यह उपजाता
वह खाता
बिन उपजाये-
भू उसकी
जिसके श्रम-
सीकर सनती है.
अन-उत्पादक खर्च घटे
वह विधि ला रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
श्रम की
सबसे अधिक
प्रतिष्ठा करना है.
शोषक पूँजी को
श्रम का हित
वरना है.
चौपालों पर
संसद-ग्राम
सभाएँ हों-
अफसरशाही
को उन्मूलित
करना है.
बहुत हुआ द्लतंत्र
न इसकी जय गा रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
.
बिना बात की
बहसें रोको,
बात करो.
केवल अपनी
कहकर तुम मत
घात करो.
जिम्मेवारी
प्रेस-प्रशासन
की भारी-
सिर्फ सनसनी
फैला मत
आघात करो.
विज्ञापन की पोल खोल
सच बतला रे!
झोपड़-झुग्गी से
बँगलेवाले हारे
१५-१६.२.२०१५
*
***
नवगीत:
.
हमने
बोये थे गुलाब
क्यों
नागफनी उग आयी?
.
दूध पिलाकर
जिनको पाला
बन विषधर
डँसते हैं,
जिन पर
पैर जमा
बढ़ना था
वे पत्त्थर
धँसते हैं.
माँगी रोटी,
छीन लँगोटी
जनप्रतिनिधि
हँसते हैं.
जिनको
जनसेवा
करना था,
वे मेवा
फँकते हैं.
सपने
बोने थे जनाब
पर
नींद कहो कब आयी?
.
सूत कातकर
हमने पायी
आज़ादी
दावा है.
जनगण
का हित मिल
साधेंगे
झूठा हर
वादा है.
वीर शहीदों
को भूले
धन-सत्ता नित
भजते हैं.
जिनको
देश नया
गढ़ना था,
वे निज घर
भरते हैं.
जनता
ने पूछा हिसाब
क्यों
तुमने आँख चुरायी?
.
हैं बलिदानों
के वारिस ये
जमी जमीं
पर नजरें.
गिरवी
रखें छीन
कर धरती
सेठों-सँग
हँस पसरें.
कमल कर रहा
चीर हरण
खेती कुररी
सी बिलखे.
श्रम को
श्रेय जहाँ
मिलना था
कृषक क्षुब्ध
मरते हैं.
गढ़ ही
दे इतिहास नया
अब
‘आप’ न हो रुसवाई.
*
***
नवगीत:
.
समय न्यायाधीश की
लगती अदालत.
गीत!
हाज़िर हो.
.
लगा है इलज़ाम
तुम पर
गिरगिटों सा
बदलते हो रंग.
श्रुति-ऋचा
या अनुष्टुप बन
छेड़ दी थी
सरसता की जंग.
रूप धरकर
मन्त्र का
या श्लोक का
शून्य करते भंग.
काल की
बनकर कलम तुम
स्वार्थ को
करते रहे हो तंग.
भुलाई ना
क्यों सखावत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
छेड़ते थे
जंग हँस
आक्रामकों
से तुम.
जान जाए
या बचे
करते न सुख
या गम.
जूझते थे,
बूझते थे,
मनुजता को
पूजते थे.
ढाल बनकर
देश की
दस दिशा में
घूमते थे.
मिटायी क्यों
हर अदावत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
पराजित होकर
न हारे,
दैव को
ले आये द्वारे.
भक्ति सलिला
में नहाये,
कर दिये
सब तम उजारे.
बने संबल
भीत जन का-
‘त्राहि’ दनु हर
'हर' पुकारे.
दलित से
लगकर गले तुम
सत्य का
बनते रहे भुजदंड.
अनय की
क्यों की मलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
एक पल में
जिरह-बखतर
दूसरे पल
पहन चीवर.
योग के सँग
भोग अनुपम
रूप को
वरकर दिया वर.
नव रसों में
निमज्जित हो
हर असुन्दर
किया सुंदर.
हास की
बनकर फसल
कर्तव्य का ही
भुला बैठे संग?
नाश की वर
ली अलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
श्रमित काया
खोज छाया,
लगी कहने-
‘जगत माया’.
मूर्ति में भी
अमूरत को
छिपा- देखा,
पूज पाया.
सँग सुन्दर के
वरा शिव,
शिवा को
मस्तक नवाया.
आज का आधार
कल कर,
स्वप्न कल का
नव सजाया.
तंत्र जन का
क्यों नियामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
स्वप्न टूटा,
धैर्य छूटा.
सेवकों ने
देश लूटा.
दीनता का
प्रदर्शन ही -
प्रगतिवादी
बेल-बूटा.
छंद से हो तंग
कर रस-भंग
कविता गढ़ी
श्रोता रहा सोता.
हुआ मरकर
पुनर्जीवित
बोल कैसे
गीत-तोता?
छंद अब भी
क्यों सलामत?
गीत!
हाज़िर हो.
.
हो गये इल्जाम
पूरे? तो बतायें,
शेष हों कुछ और
तो वे भी सुनायें.
मिले अनुमति अगर
तो मैं अधर खोलूँ.
बात पहले आप तोलूँ
बाद उसके सत्य बोलूँ
मैं न मैं था,
हूँ न होऊँ.
अश्रु पोछूं,
आस बोऊँ.
बात जन की
है न मन की
फ़िक्र की
जग या वतन की.
साथ थी हर-
दम सखावत
प्रीत!
हाज़िर हो.
.
नाम मुझको
मिले कितने,
काम मैंने
किये कितने.
याद हैं मुझको
न उतने-
कह रहा है
समय जितने.
छंद लय रस
बिम्ब साधन
साध्य मेरा
सत सुपावन
चित रखा है
शांत निश-दिन
दिया है आनंद
पल-छिन
इष्ट है परमार्थ
आ कह
नीत!
हाज़िर हो.
.
स्वयंभू जो
गढ़ें मानक,
हो न सकते
वे नियामक.
नर्मदा सा
बह रहा हूँ.
कुछ न खुद का
गह रहा हूँ.
लोक से ले
लोक को ही,
लोक को दे-
लोक का ही.
रहा खाली हाथ
रखा ऊँचा माथ,
सब रहें सानंद
वरें परमानन्द.
विवादों को भूल
रच नव
रीत!
हाज़िर हो.
६-४-२०१५
***
नवगीत:
.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
आते-जाते रंग देखता
चेहरे के
चुप-दंग हो.
कब कबीर ने यह चाहा
तुम उसे देख
यूं तंग हो?
गंद समेटी सिर्फ इसलिए
प्रिय! तुम
निर्मल गंग हो
सोचा न पाया पल आयेगा
तुम्हीं नहीं
जब सँग हो.
होली हो ली
अब क्या होगी?
भग्न आस-सन्तूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
फाग-राग का रिश्ता-नाता
कब-किसने
पहचाना है?
द्वेष-घृणा की त्याज्य सियासत
की होली
धधकाना है.
जड़ जमीन में जमा जुड़ सकें
खेत-गाँव
सरसाना है.
लोकनीति की रंग-पिचकारी
संसद में
भिजवाना है.
होली होती
दिखे न जिसको
आँखें रहते सूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
२.३.२०१५
*
***
नवगीत:
.
ठेठ जमीनी जिंदगी
बिता रहा हूँ
ठाठ से
.
जो मन भाये
वह लिखता हूँ.
नहीं और सा
मैं दीखता हूँ.
अपनी राहें
आप बनाता.
नहीं खरीदा,
ना बिकता हूँ.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
कलकल बहता
निर्मल रहता.
हर मौसम की
यादें तहता.
पत्थर का भी
वक्ष चीरता-
सुख-दुःख सम जी,
नित सच कहता.
जीने खातिर
हँस मरता हूँ.
अश्रु पोंछकर
मैं तरता हूँ.
खेत गोड़ता झूमता
दूर रहा हूँ
खाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
रासो गाथा
आल्हा राई
पंथी कजरी
रहस बधाई.
फाग बटोही
बारामासी
ख्याल दादरा
गरी गाई.
बनरी सोहर
ब्याह सगाई.
सैर भगत जस
लोरी भाई.
गीति काव्य मैं, बाँध मुझे
मत मानक की
लाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
***
***
नवगीत:
.
उम्र भर
अक्सर रुलातीं
हसरतें.
.
इल्म की
लाठी सहारा
हो अगर
राह से
भटका न पातीं
गफलतें.
.
कम नहीं
होतीं कभी
दुश्वारियाँ.
हौसलों
की कम न होतीं
हरकतें.
नेकनियती
हो सुबह से
सुबह तक.
अता करता
है तभी वह
बरकतें
२५.२.२०१५
*
नवगीत :
.
हवाओं में
घुल गये हैं
बंद मादक
छंद के.
.
भोर का मुखड़ा
गुलाबी
हो गया है.
उषा का नखरा
शराबी
हो गया है.
कूकती कोयल
न दिखती
छिप बुलाती.
मदिर महुआ
तंग
काहे तू छकाती?
फिज़ाओं में
कस गये हैं
फंद मारक
द्वन्द के.
.
साँझ का दुखड़ा
अँधेरा
बो रहा है.
रात का बिरवा
अकेला
रो रहा है.
कसमसाती
चाँदनी भी
राह देखे.
चाँद कब आ
बाँह में ले
करे लेखे?
बुलावों को
डँस गये हैं
व्यंग्य मारक
नंद के.
*
***
नवगीत:
*
अहंकार का
सिर नीचा
.
अपनेपन की
जीत है
करिए सबसे प्रीत
सहनशीलता
हमेशा
है सर्वोत्तम रीत
सद्भावों के
बाग़ में
पले सृजन की नीत
कलमकार को
भुज-भींचा
अहंकार का
सिर नीचा
.
पद-मद का
जिस पर चढ़ा
उतरा शीघ्र बुखार
जो जमीन से
जुड़ रहा
उसको मिला निखार
दोष न
औरों का कहो
खुद को रखो सँवार
रखो मनोबल
निज ऊँचा
अहंकार का
सिर नीचा
.
पर्यावरण
न मलिन कर
पवन-सलिल रख साफ
करता दरिया-
दिल सदा
दोष अन्य के माफ़
निबल-सबल को
एक सा
मिले सदा इन्साफ
गुलशन हो
मरु गर सींचा
अहंकार का
सिर नीचा
१५.२.२०१५
*
***
नवगीत:
*
द्रोण में
पायस लिये
पूनम बनी,
ममता सनी
आयी सुजाता,
बुद्ध बन जाओ.
.
सिसकियाँ
कब मौन होतीं?
अश्रु
कब रुकते?
पर्वतों सी पीर
पीने
मेघ रुक झुकते.
धैर्य का सागर
पियें कुम्भज
नहीं थकते.
प्यास में,
संत्रास में
नवगीत का
अनुप्रास भी
मन को न भाता.
युद्ध बन जाओ.
.
लहरियां
कब रुकीं-हारीं.
भँवर
कब थकते?
सागरों सा धीर
धरकर
मलिनता तजते.
स्वच्छ सागर सम
करो मंथन
नहीं चुकना.
रास में
खग्रास में
परिहास सा
आनंद पाओ
शुद्ध बन जाओ.
२०-२१.२.२०१५.
*
***
नवगीत
.
मैं नहीं नव
गीत लिखता
उजासों की
हुलासों की
निवासों की
सुवासों की
खवासों की
मिदासों की
मिठासों की
खटासों की
कयासों की
प्रयासों की
कथा लिखता
व्यथा लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
उतारों की
चढ़ावों की
पड़ावों की
उठावों की
अलावों की
गलावों की
स्वभावों की
निभावों की
प्रभावों की
अभावों की
हार लिखता
जीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
चाहतों की
राहतों की
कोशिशों की
आहटों की
पूर्णिमा की
‘मावसों की
फागुनों की
सावनों की
मंडियों की
मन्दिरों की
रीत लिखता
प्रीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
*
***
नवगीत :
.
खिल-खिलकर
गुल झरे
पलाशों के
.
ऊषा के
रंग में
नहाये से.
संध्या को
अंग से
लगाये से.
खिलखिलकर
हँस पड़े
अलावों से
.
लजा रहे
गाल हुए
रतनारे.
बुला रहे
नैन लिये
कजरारे.
मिट-मिटकर
बन रहे
नवाबों से
.
***
नवगीत :
.
प्रिय फागुन की धूप
कबीरा
गाती सी.
.
अलसाई सी
उठी अनमनी
झुँझलाती.
बिखरी अलकें
निखरी पलकें
शरमाती.
पवन छेड़ता
आँख दिखाती
धमकाती.
चुप फागुन की धूप
लिख रही
पाती सी.
.
बरसाने की
गैल जा रही
राधा सी.
गोकुल ठांड़ी
सुगढ़ सलौनी
बाधा सी.
यमुना तीरे
रास रचाती
बलखाती.
छिप फागुन की धूप
आ रही
जाती सी.
***
नवगीत:
.
मत बंदी नवगीत को करो
.
आम आदमी समझ न पाए
ऐसे शब्द न जन को भाये.
सरल-सहज भाषा-शैली हो
अलंकार मन-चित्त रमाये.
बिम्ब-प्रतीक यथा आवश्यक,
लय-रस-छंद साधना दुष्कर
जिन्हें न साध्य हो सका संयम
औरों को अक्षम बतलाये.
कानी अपनी टेंट न देखे
रहे और पर दृष्टि गड़ाये.
दम्भ कुएँ का मेंढक पाले
जहँ-तहँ कूद छलांग लगाये
मत 'जड़ है', नवगीत को कहो
.
बहता पानी रहे निर्मला
जो रुकता वह सड़ता जाए.
पाँच दशक पहले की भाषा
कैद न नवगीतों को भाये.
स्वागत रचनाकार नए का
अदा पुरानी मत दुहराये.
अपना कथ्य भाव अनुभूति
निज शब्दों-शैली में गाये.
शिशु घुटनों-बल चलना सीखे
ऊँची कूद न उसको भाये.
लंबी कूद लगानेवाले
गिरी-शिखरों पर कब चढ़ पाये.
निज मुँह मिट्ठू आप मत बनो
.
दावा मठाधीश होने का
बार-बार नाहक दोहराये.
व्यर्थ श्रेष्ठता- नवोदितों की
भूल न यदि मिल ठीक कराये.
तुकबन्दी अपने गीतों में
रख, औरों को हीन बताये
ऐसे दोहरे आचरणों को
नवता का प्रतिमान बनाये
फल तजकर नवगीत, गजल की
जय-जय नयी कलम नित गाये
गजलकार को गीतकार का
पुरस्कार-सम्मान दिलाये
नवगीतों में नवता से इंकार मत करो
६-४-२०१५

***
नवगीत :
संजीव
.
प्रिय फागुन की धूप
कबीरा
गाती सी.
.
अलसाई सी
उठी अनमनी
झुँझलाती.
बिखरी अलकें
निखरी पलकें
शरमाती.
पवन छेड़ता
आँख दिखाती
धमकाती.
चुप फागुन की धूप
लिख रही
पाती सी.
.
बरसाने की
गैल जा रही
राधा सी.
गोकुल ठांड़ी
सुगढ़ सलौनी
बाधा सी.
यमुना तीरे
रास रचाती
बलखाती.
छिप फागुन की धूप
आ रही
जाती सी.
२३-२-२०१५
*
नवगीत
.
पूज रहे हैं
मूरत
कहते चित्र गुप्त है
.
है आराध्य हमारा जो
वह है अविनाशी
कहते फिर बतलाते कैसा
मनुज विनाशी
पैदा हुआ-मरा कैसे-कब
कहाँ? कह रहे
झगड़े-झंझट खड़े कर रहे
काबा-काशी
शिव वैरागी को अर्पित
करते हैं राशी
कहते कंकर-कंकर में वह
छिपा-सुप्त है.
.
तुमने उसे बनाया या
वह तुम्हें बनाता?
तुम आते-जाते हो या
वह आता-जाता?
गढ़ते-मढ़ते, तोड़-फाड़ते
बिना विचारे
देख हमारी करनी वह
छिप-छिप मुस्काता
कैसा है यह बुद्धिमान
जो आप ठगाता?
मैंने दिया विवेक, कहाँ वह
हुआ लुप्त है?
.
५.४.२०१४

एक दोहा

सगा कह रहे सब मगर, सगा न पाया एक।

हैं अनेक पर एक भी मिला न अब तक नेक।।

६-४-२०१०








































***
नवगीत:
.
मत बंदी नवगीत को करो
.
आम आदमी समझ न पाए
ऐसे शब्द न जन को भाये.
सरल-सहज भाषा-शैली हो
अलंकार मन-चित्त रमाये.
बिम्ब-प्रतीक यथा आवश्यक,
लय-रस-छंद साधना दुष्कर
जिन्हें न साध्य हो सका संयम
औरों को अक्षम बतलाये.
कानी अपनी टेंट न देखे
रहे और पर दृष्टि गड़ाये.
दम्भ कुएँ का मेंढक पाले
जहँ-तहँ कूद छलांग लगाये
मत 'जड़ है', नवगीत को कहो
.
बहता पानी रहे निर्मला
जो रुकता वह सड़ता जाए.
पाँच दशक पहले की भाषा
कैद न नवगीतों को भाये.
स्वागत रचनाकार नए का
अदा पुरानी मत दुहराये.
अपना कथ्य भाव अनुभूति
निज शब्दों-शैली में गाये.
शिशु घुटनों-बल चलना सीखे
ऊँची कूद न उसको भाये.
लंबी कूद लगानेवाले
गिरी-शिखरों पर कब चढ़ पाये.
निज मुँह मिट्ठू आप मत बनो
.
दावा मठाधीश होने का
बार-बार नाहक दोहराये.
व्यर्थ श्रेष्ठता- नवोदितों की
भूल न यदि मिल ठीक कराये.
तुकबन्दी अपने गीतों में
रख, औरों को हीन बताये
ऐसे दोहरे आचरणों को
नवता का प्रतिमान बनाये
फल तजकर नवगीत, गजल की
जय-जय नयी कलम नित गाये
गजलकार को गीतकार का
पुरस्कार-सम्मान दिलाये
नवगीतों में नवता से इंकार मत करो
६-४-२०१५

***
नवगीत
.
पूज रहे हैं
मूरत
कहते चित्र गुप्त है
.
है आराध्य हमारा जो
वह है अविनाशी
कहते फिर बतलाते कैसा
मनुज विनाशी
पैदा हुआ-मरा कैसे-कब
कहाँ? कह रहे
झगड़े-झंझट खड़े कर रहे
काबा-काशी
शिव वैरागी को अर्पित
करते हैं राशी
कहते कंकर-कंकर में वह
छिपा-सुप्त है.
.
तुमने उसे बनाया या
वह तुम्हें बनाता?
तुम आते-जाते हो या
वह आता-जाता?
गढ़ते-मढ़ते, तोड़-फाड़ते
बिना विचारे
देख हमारी करनी वह
छिप-छिप मुस्काता
कैसा है यह बुद्धिमान
जो आप ठगाता?
मैंने दिया विवेक, कहाँ वह
हुआ लुप्त है?
.
५.४.२०१४

सगा कह रहे सब मगर, सगा न पाया एक।

हैं अनेक पर एक भी, मिल न अब तक नेक।।

६-४-२०१०

*

पुल निर्माण की तकनीक

तकनीक 
पुल निर्माण की तकनीक 
*
बहते हुए पानी में निर्माण कार्य करना हमेशा से मुश्किल रहा है। इसके लिए अनेक उपाय करने पड़ते हैं।

पुल का अभिकल्पन (डिजाइन) करते समय पानी की अधिकतम और न्यूनतम गहराई, पानी के बहाव की गति, पानी के नीचे की मिट्टी की प्रकृति, पुल का भार, पुल पर चलने वाले वाहनों का भार आदि के हिसाब से पुल की नींव (Foundation) का प्रकार तय किया जाता है, और फिर नींव का अभिकल्पन किया जाता है।

पानी में बने पुल की नींव की सामान्यतः दो प्रकार की होती है-  १. पाइल (pile) नींव तथा २. कूप (Well)   नींव। 

बहते हुए पानी में काम  करने के लिए पानी में एक टेम्पररी एकसेस के लिए एक मजबूत लोहे का प्लेटफॉर्म बना लिया जाता है।


इस पुल की सहायता से पानी में लकड़ी की बल्ली (wood pile) वृत्ताकार आकार में धंसा दी जाती हैं। इनके बीच में रेत से भरे बोरे फंसा दिए जाते हैं। अब शुरू होता है इस वृत्त में रेत या मिट्टी भरने का काम। जब मिट्टी पानी के सतह से ऊपर आ जाती है तो लोहे के पुल से फाउंडेशन के निर्माण हेतु इंजीनियर, मजदूर और मशीन अपना काम शुरू करते हैं।



पुल की संरचना को हम दो भागों में बांटते हैं- १. अधो संरचना (Sub structure) तथा २. ऊपरी संरचना (Super structure)

पल का जो भाग जमीन के स्तर के नीचे होता है उसे अधो संरचना कहा जाता है। इस हम नींव के नाम से जानते हैं। 
पुल के बीच में पुल को रोकने के लिए जो आधार बनाया जाता है उसे स्तंभ/खंबा  (Pier) कहते हैं। दो पियर के बीच की दूरी span कही जाती है। स्पैन के हिसाब से ही पुल का प्रकार तय किया जाता है। इसे हम इस प्रकार बांट सकते है -सॉलिड स्लैब - 10–15 मीटर के स्पेन के लिए
गर्डर - 60–80 मीटर तक के स्पेन के लिए, सेगमेंट - 80 मीटर से ज़्यादा स्पेन के लिए

जहाँ नदियों का जल स्तर अधिक ऊँचा  नहीं होता और ज्यादा वक्त उनकी चौड़ाई कम रहती है वहाँ गर्डर का इस्तेमाल किया जाता है। गर्डर को सीधे इसकी जगह पर या कास्टिंग यार्ड में बना सकते हैं। कास्टिंग यार्ड में बने हुए गर्डर को क्रेन की सहायता से पियर कैप के ऊपर रख दिया जाता है।


यह गंगा नदी पर बना cable stayed pre cast segment type bridge है। यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित श्रीरामपुर घाट पर बना है। वर्तमान में अपनी तरह का ये भारत का सबसे लंबा पुल है। इसकी लंबाई 2544 मीटर है।





सेगमेंट ब्रिज वहां के लिए डिजाइन किए जाते हैं जहां पानी का स्तर काफी ऊंचा हो। जिसके कारण स्पान काफी अधिक हो जाता है। इस के लिए पहले कास्टिंग यार्ड में सेगमेंट्स को कास्ट कर लिया जाता है। फिर इन्हें उठाकर एक - एक करके पियर के दोनों तरफ जोड़ते जाते हैं। एक तरीका है लॉन्चर से लॉन्च करने का, इस तरह -

या फिर इस तरह -

सेगमेंट कुछ इस तरह का दिखता है -

सेगमेंट्स को आपस में जोड़ने के लिए High Tensile Stand wire का प्रयोग किया जाता है। इसे सेगमेंट के बीच से गुजार कर बहुत शक्तिशाली जैक से खींचा जाता है और सीमेंट कंपाउंड से जाम कर दिया जाता है। दो सेगमेंट के बीच की दरार को एपॉक्सी से भर देते हैं।

अंत में जब ब्रिज बनकर तैयार हो जाए तब लोड टेस्टिंग की जाती है। यह चेक करने के लिए कि जिस लोड के लिए ब्रिज डिजाइन किया गया है उतने लोड में सुरक्षित है अथवा नहीं।

बुधवार, 5 अप्रैल 2023

दोहा यमक, लघुकथा, नवगीत, माखन दादा, ममता शर्मा, दोहा गजल

दोहा 

डैड रहें रिच या पुअर, तनिक न पड़ता फर्क।

योग्य बनो आगे बढ़ो, छोड़ी तर्क-वितर्क।।

५-४-२०२३
***
लघुकथा:
अकल के अंधे
*
२ अप्रैल २०२० एक सामान्य दिन और तारीख, बिलकुल अन्य दिनों की तरह।
पोंगा पंडित को बहुत दिनों से अपने लोगों द्वारा अनदेखा किया जा रहा था। चर्चा में न बने रहना उनका शगल तो था ही, राजनीति में बने रहने के लिए चर्चित होना भी जरूरी था। क्या करें कि नाम चर्चा में आ जाए। कुछ सूझ ही नहीं रहा था, तभी प्रधान मंत्री जी ने ५ अप्रैल को रात ९ बजे ९ मिनिट के लिए बिजली बंद कर बालकनी या दरवाजे पर दिया. मोमबत्ती, लालटेन आदि जलाने की अपील जनता जनार्दन से की।
उन्हें लगा यही मौका है, इसे तुरन्त भुनाना चाहिए पर कैसे?
संयोगवश ५ और ४ का योग ९ होने पर उनका ध्यान गया। दिमाग पर जोर दिया तारीख और माह का योग ९, समय ९ बजे, दिया जलने की अवधि ९ मिनिट, बचपन में शिक्षक द्वारा बताये गए ९ के पहाड़े की विशेषताएं याद हो आईं। पोंगा पंडित मुस्कुराये चलो. काम बन गया। तुरंत एक लेख बनाया। महान पंडितों की गणना के आधार पर घोषणा, ९ पूर्णता का प्रतीक...
रात नौ बजे ९ मिनिट ९ x ९ = ८१ = ८ + १ = ९
माह और तारीख का योग ४ + ५ + ९
तीनों को जोड़ें ९ + ९ + ९ = २७ = २ + ७ = ९
तीनों का गुणा करें ९ x ९ x ९ = ७२९ = ७ + २ + ९ = १ + ८ = ९
महापूर्ण योग , महा मंगलकारी, किस राशि पर कैसा प्रभाव? जानने के लिए संपर्क करें और अपना चलभाष क्रमांक, फीस और एटीएम नंबर दे दिया।
अपने अलग-अलग नंबरों से कई वॉट्सऐप समूहों, फेसबुक पटलों, आदि में डालने में जुट गए।
'निठल्लों की तरह क्या मोबाइल से चिपके हो, कुछ करते क्यों नहीं? चलो झाड़ू ही लगा लो, मैं तब तक बर्तन माँज लूँ। नहीं तो चाय-वाय कुछ नहीं मिलेगी' पंडिताइन ने घुड़की दी।
पंडित जी ने सोचा इसे खुश कर दूँ तो दिन भर चैन रहेगा, सो बोले 'डार्लिंग! देखो तो कितनी बढ़िया गणना की है अब चारों तरफ चर्चा तो होगी ही, कुंडली मिलवाने वालों से कमाई भी हो जाएगी। पंडितानी पंडित जी से ज्यादा पढ़ी-लिखी थीं, तुरंत बोलीं "ये क्या आधा-अधूरा गया बघारते हो? वर्ष २०२० का क्या हुआ? मुहूर्त की बात करते हो चैत्र माह का अंक १ हुआ, विक्रम संवत २०७७ = १६ = ७, तिथि है द्वादशी = ३ सबका योग ११ = २ , सबका गुणा २१ = ३। अब क्या होगा तुम्हारी ९ के फंडे का?"
"ए भागवान! बंद रखो अपनी जबान। भगवान् अक्लमंद पत्नी किसी को न दे। तुम तो मेरी खटिया ही खड़ी करा दोगी। बना बनाया काम बिगाड़ दोगी। तय मानो कमाई तो होंगई ही, नाम भी उछल जायेगा, तुम चाय बनाने का जुगाड़ करों, मैं तुम्हारे हुकुम का पालन करता हूँ। ये भारत है, यहाँ कम नहीं हैं अकल के अंधे।"
५-४-२०२०
***
गले मिले दोहा यमक
*
काहे को रोना मचा, जीना किया हराम
कोरोना परदेश से, लाये ख़ास न आम
बिना सिया-सत सियासत, है हर काम सकाम
काम तमाम न काम का, बाकि काम तमाम
हेमा की तस्वीर से, रोज लड़ाते नैन
बीबी दीखते झट कहें हे माँ, मन बेचैन
बौरा-गौरा को नमन, करता बौरा आम.
खास बन सके, आम हर, हे हरि-उमा प्रणाम..
देख रहा चलभाष पर, कल की झलकी आज.
नन्हा पग सपने बड़े, कल हो कल का राज..
२०२०
***
गीत
सबसे पहले देश
*
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
रक्षा करी विदेशी से लड़
शस्त्र हाथ में लेकर
बापू के सत्याग्रह से जुड़
जूझे कमल उठाकर
पत्रकार-कवि तेजस्वी हे!
कसर न छोड़ी लेश
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
विद्यार्थी जी के पथ पर चल
जान हथेली पर ले
लक्ष्मण सिंह-सुभद्रा को पथ दिखलाया आशिष दे
हिम तरंगिणी, हिम किरीटनी
ने दी कीर्ति अशेष
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
सत्ता दल पद कभी न चाहा
करी स्वार्थ बिन सेवा
शर्म करें दल नेता चमचे
चाह रहे जो मेवा
नोटा चुने हराओ इनको
जागृत रहो विशेष
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
करी पुष्प ने अभिलाषा यह
बिछे राह पर जाकर
गुजरें माँ के सेवक पग धर
चाह नहीं प्रभु का सिर
त्यागी-बलिदानी अजरामर
कमी न छोड़ी लेश
माखन दादा ने सिखलाया
सबसे पहले देश
*
***
कृति चर्चा:
मैं हूँ एक भाग हिमालय का : मन मंदाकिनी का काव्य प्रवाह
*
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
(कृति विवरण: मैं हूँ एक भाग हिमालय का, काव्य संग्रह, ममता शर्मा, प्रथम संस्करण २०१८, आईएसबीएन ९७८०४६३६४४९६६, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १२०, मूल्य१८५ रु., प्रकाशक वर्जिन साहित्य पीठ दिल्ली)
*
कविता की नहीं जाती, हो जाती है। अनुभूति के शिखर से अभिव्यक्ति सलिला प्रवाहित होकर कलकल निनाद करे तो कविता हो जाती है। मानव जीवन पल-पल परिवर्तन का साक्षी बनता है। भावात्म शब्द-तन मे वास कर परिवर्तनजनित प्रतिक्रिया के प्रागट्य का साक्षी बनता है। यह निर्विवाद सत्य है कि नारी मन पुरुष मन की तुलना में अधिक भाव प्रवण और ममतामय होता है। 'मैं हूँ भाग हिमालय का' की कविताएँ व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंध की प्रतीति से उद्भूत हैं।
'आज धरा के आँगन में फिर
सूरज ऊषा लेकर आया
देख अचानक संग उन्हें
रजनी-नेत्रों में जल भर आया।
फट ले अपनी काली चूनर
झटपट वो विभावरी भागी
तभी अचानक पाँखें खोले
चिड़िया भी चूँ-चूँ कर जागी।'
प्रकृति के साथ तादात्म्य-स्थापन ब्रह्म-साक्षात का प्रथम चरण है। रंग उड़ा, रंग उड़ा, हर दिशा ही रंग उड़ा' हर दिशा में रंग दिखना लगे तो कबीर सब कुछ लुटा देता है पर लोई को घर में ही ब्रह्म का पारा पाँव पसारे मिल जाता है। उसे मम्मी के भाल, पूजा के थाल, गणपति और हाथी, मोती के बैल और पकवानों का कतारों में अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र रंग ही रंग दिखता है। निराकुल मीरा कहती हैं 'मैं तो साँवरी के रँग राँची' ममता की प्रतीति भिन्न होना स्वाभाविक है। 'मन को लगाएँ किससे / मैं बतियाऊँ किससे' के गिले-शिकवे भुलाकर 'चंपकवन में एक रूपसी / गर्वीली मतवाली आली' होकर स्वरूप निहारती वह जान ही नहीं पाती 'आया कौन मन के दर्पण में....बिना रोके-टोके' लेकिन आ ही गया तो जाने का द्वार नहीं है। 'यही तो जीवन है अभिराम / यही तो जीवन है सुखधाम।' रंगरसिया साथ हो तो 'पीली-पीली सरसों फैली / फैली चारों ओर' का प्रतीति होनी ही है। यह प्रतीति संकुचन नहीं विस्तार और नव सृजन के पथ पर पग धरती है- 'है बस नियमों थोड़ा सा अहसास जागा / हाँ, मैं भी हूँ हिस्सा धरा का जरा सा', कामना जागती है 'भूमि पा अब बीज जाए / हो उजाला सूर्य का / चंदा का किरणें गुनगुनाएँ'।
सृजनाकांक्षी चेतना 'मुसाफिर हूँ मैं / हर क्षण चलती ही रहती हूँ' कहते हुए भी गंतव्य के प्रति सचेत रहती है-'रहा बचपन जवानी, सब में बेसुध / कुछ खबर ले-ले'।
'काठ का हाँडी चढ़ी तो पल में बात समझ गई'। कौन सी बात? यही कि 'जो करना आज ही कर लो'। क्योंकि 'हम क्या हैं? / केवल सितारों की राख / या हैं हम / संपूर्ण ब्रह्मांड'।
अनुभूतियों का इंद्रधनुषी रंग 'मैं हूँ एक भाग हिमालय का' में सर्वत्र व्याप्त है। गीत-सागर राकेश खंडेलवाल लिखित आमुख से समृद्ध
यह कृति कवयित्री की काव्य-सृजन प्रतिभा की प्रथम पुष्प है जो पूत के पाँव पालने में दिखते हैं कहावत को चरितार्थ करती है।
'ठुमुक चलत रामचंद्र' का पैंजनियों का रुनझुन ले आनंदित होते समय पुष्प-वाटिका, पंचवटी या लंकापुरी में राम की छवि न खोजें तो विवेच्य कृति बालारुणी ऊषा की रम्य छवि-दर्शन का सा आनंद देती है। कवयित्री की प्रतिभा आगामी काव्य संग्रहों में परवान पर चढ़कर विश्ववाणी हिंदी के साहित्य कोष को समृद्ध करेगी, यह विश्वास किया जा सकता है।
५-४-२०१९
***
आनुप्रासिक दोहे
*
दया-दफीना दे दिया, दस्तफ्शां को दान
दरा-दमामा दाद दे, दल्कपोश हैरान
(दरा = घंटा-घड़ियाल, दफीना = खज़ाना, दस्तफ्शां = विरक्त, दमामा = नक्कारा, दल्कपोश = भिखारी)
*
दर पर था दरवेश पर, दरपै था दज्जाल
दरहम-बरहम दामनी, दूर देश था दाल
(दर= द्वार, दरवेश = फकीर, दरपै = घात में, दज्जाल = मायावी भावार्थ रावण, दरहम-बरहम = अस्त-व्यस्त, दामनी = आँचल भावार्थ सीता, दाल = पथ प्रदर्शक भावार्थ राम )
*
दिलावरी दिल हारकर, जीत लिया दिलदार
दिलफरेब-दीप्तान्गिनी, दिलाराम करतार
(दिलावरी = वीरता, दिलफरेब = नायिका, दिलदार / दिलाराम = प्रेमपात्र)
५-४-२०१७
***
नवगीत:
.
क्षुब्ध पहाड़ी
विजन झुरमुट
झाँकता शिरीष
.
गगनचुम्बी वृक्ष-शिखर
कब-कहाँ गये बिखर
विमल धार मलिन हुई
रश्मिरथी तप्त-प्रखर
व्यथित झाड़ी
लुप्त वनचर
काँपता शिरीष
.
सभ्य वनचर, जंगली नर
देख दंग शिरीष
कुल्हाड़ी से हारता है
रोज जंग शिरीष
कली सिसके
पुष्प रोये
झुलसता शिरीष
.
कर भला तो हो भला
आदम गया है भूल
कर बुरा पाता बुरा है
जिंदगी है शूल
वन मिटे
बीहड़ बचे हैं
सिमटता शिरीष
.
बीज खोजो और रोपो
सींच दो पानी
उग अंकुर वृक्ष हो
हो छाँव मनमानी
जान पायें
शिशु हमारे
महकता शिरीष
***
नवगीत:
.
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
महाकाव्य बब्बा की मूँछें, उजली पगड़ी
खण्डकाव्य नाना के नाना किस्से रोचक
दादी-नानी बन प्रबंध काव्य करती हैं बतरस
सुन अंग्रेजी-गिटपिट करते बच्चे भौंचक
ईंट कहीं की, रोड़ा आया और कहीं से
अपना
आप विधाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
लक्षाधिक है छंद सरस जो चाहें रचिए
छंदहीन नीरस शब्दों को काव्य न कहिए
कथ्य सरस लययुक्त सारगर्भित मन मोहे
फिर-फिर मुड़कर अलंकार का रूप निरखिए
बिम्ब-प्रतीक सलोने कमसिन सपनों जैसे
निश-दिन
खूब दिखाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
दृश्य-श्रव्य-चंपू काव्यों से भाई-भतीजे
द्विपदी, त्रिपदी, मुक्तक अपनेपन से भीजे
ऊषा, दुपहर, संध्या, निशा करें बरजोरी
पुरवैया-पछुवा कुण्डलि का फल सुन खीजे
बौद्धिकता से बोझिल कविता
पढ़ता
पर बिसराता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
गीत प्रगीत अगीत नाम कितने भी धर लो
रच अनुगीत मुक्तिका युग-पीड़ा को स्वर दो
तेवरी या नवगीत शाख सब एक वृक्ष की
जड़ को सींचों, माँ शारद से रचना-वर लो
खुद से
खुद बतियाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
५-४-२०१५
***
नवगीत:
.
रचनाओं की हर रामायण
अक्षर-अक्षर मिलकर गढ़ते
कथ्य भाव रस बिम्ब बनाते
क्षर शब्दों की सार्थक दुनिया
.
शब्द-शब्द मिल वाक्य बनाते
वाक्य अनुच्छेदों में ढलते
अनुच्छेद मिल कथा-कहानी
बन जाते तो सपने पलते
बनते सपने युग के नपने
लगे पतीले ऊपर ढकने
पुरुषार्थी कोशिश कर हारे
लगे राम की माला जपने
दे जाती है साँझ सलोने
सपने लेकिन ढलते-ढलते
नानी के अधरों पर लाती
हँसी शरारत करती मुनिया
.
किसने जीवन यहाँ बिताया
केवल सुख पा, सहा न दुखड़ा
किसने आँसू नहीं बहाये
किसका सुख से खिला न मुखड़ा
किस अंतर में नहीं अंतरा
इश्क-मुश्क का गूँजा कहिए
सम आकारिक पंक्ति-लहरियाँ
बन नवगीत बह रही गहिए
होते तब जीवंत खिलौने
शिशु-नयनों में पलते-पलते
खेले हास-रास के सँग जब
श्वास-आस की जीवित गुड़िया
.
गीतकार पाठक श्रोता का
नाता होता बहुत अनूठा
पल में खुश हो जाता बच्चा
पल भर पहले था जो रूठा
टटकापन-देशजता रुचती
अधुनातानता भी मन भाती
बन्ना-गारी के सँग डी जे
सुनते-नाचें झूम बराती
दिखे क्षितिज पर देखे चंदा
धवल चाँदनी हँसते-खिलते
घूँघट डाले हनीमून पर
जाती इठलाकर दुलहनिया
४.४.२०१५
...
*
PAN Card explained:-
http://api.ning.com/.../FWS5kDBkS5i.../PanCard.jpg
PAN is a 10 digit alpha numeric number,
where the first 5 characters are letters,
the next 4 numbers and the last one a letter again.
These 10 characters can be divided in five parts as can be seen below.
The meaning of each number has been explained further.
1. First three characters are alphabetic series running from AAA to ZZZ
2. Fourth character of PAN represents the status of the PAN holder. • C — Company • P — Person • H — HUF(Hindu Undivided Family) • F — Firm • A — Association of Persons (AOP) • T — AOP (Trust) • B — Body of Individuals (BOI) • L — Local Authority • J — Artificial Juridical Person • G — Government
3. Fifth character represents first character of the PAN holder’s last name/surname.
4. Next four characters are sequential number running from 0001 to 9999.
5. Last character in the PAN is an alphabetic check digit.
Nowadays, the DOI (Date of Issue) of PAN card is mentioned at the right (vertical) hand side of the photo on the PAN card.
***
दोहा सलिला
ठिठुर रहा था तुम मिलीं, जीवन हुआ बसंत.
दूर हुईं पतझड़ हुआ, हेरूँ हर पल कन्त..
तुम मैके मैं सासरे, हों तो हो आनंद.
मैं मैके तुम सासरे, हों तो गाएँ छन्द.
तू-तू मैं-मैं तभी तक, जब तक हों मन दूर.
तू-मैं ज्यों ही हम हुए, साँस हुई संतूर..
*
दो हाथों में हाथ या, लो हाथों में हाथ.
अधरों पर मुस्कान हो, तभी सार्थक साथ..
*
नयन मिला छवि बंदकर, मून्दे नयना-द्वार.
जयी चार, दो रह गये, नयना खुद को हार..
५-४-२०१३
***
खबरदार कविता:
खबर: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है.
दोहा गजल:
असरकार सरकार क्यों?, हुई न अब तक यार.
करता है कमजोर जो, 'सलिल' वही गद्दार..
*
अफसरशाही राह का, रोड़ा- क्यों दरकार?
क्यों सेना में सियासत, रोके है हथियार..
*
दें जवाब हम ईंट का, पत्थर से हर बार.
तभी देश बच पायेगा, चेते अब सरकार..
*
मानवता के नाम पर, रंग जाते अखबार.
आतंकी मजबूत हों, थम जाते हथियार..
*
५-४-२०१०