कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

गीत नदी मर रही है

गीत 
नदी मर रही है
*
नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,
नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी
नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-
भुलाया है हमने नदी माँ हमारी
नदी ही मनुज का
सदा घर रही है।
नदी मर रही है
*
नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी
नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,
नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-
नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी
नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है
नदी मर रही है
*
नदी है तो जल है, जल है तो कल है
नदी में नहाता जो वो बेअकल है
नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा
नदी में बहाता मनुज मैल-मल है
नदी अब सलिल का नहीं घर रही है
नदी मर रही है
*
नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ
नदी के किनारे सघन वन लगाओ
नदी को नदी से मिला जल बचाओ
नदी का न पानी निरर्थक बहाओ
नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है
नदी मर रही है
***
१२.३.२०१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला :
आचार्य संजीव 'सलिल'
*
'सलिल' स्नेह को स्नेह का, मात्र स्नेह उपहार.
स्नेह करे संसार में, सदा स्नेह-व्यापार..
*
स्नेह तजा सिक्के चुने, बने स्वयं टकसाल.
खनक न हँसती-बोलती, अब क्यों करें मलाल?.
*
जहाँ राम तहँ अवध है, जहाँ आप तहँ ग्राम.
गैर न मानें किसी को, रिश्ते पाल अनाम..
*
अपने बनते गैर हैं, अगर न पायें ठौर.
आम न टिकते पेड़ पर, पेड़ न तजती बौर..
*
वसुधा माँ की गोद है, कहो शहर या गाँव.
सभी जगह पर धूप है, सभी जगह पर छाँव..
*
निकट-दूर हों जहाँ भी, अपने हों सानंद.
यही मनाएँ दैव से, झूमें गायें छंद..
*
जीवन का संबल बने, सुधियों का पाथेय.
जैसे राधा-नेह था, कान्हा भाग्य-विधेय..
*
तन हों दूर भले प्रभो!, मन हों कभी न दूर.
याद-गीत नित गा सके, साँसों का सन्तूर..
*
निकट रहे बेचैन थे, दूर हुए बेचैन.
तरस रहे तरसा रहे, 'बोल अबोले नैन..
*
तनखा तन को खा रही, मन को बना गुलाम.
श्रम करता गम कम 'सलिल', औषध यह बेदाम.
*

सरस्वती

मुक्तिका
*
मन मंदिर जब रीता रीता रहता है।
पल पल सन्नाटे का सोता बहता है।।
*
जिसकी सुधियों में तू खोया है निश-दिन
पल भर क्या वह तेरी सुधियाँ तहता है?
*
हमसे दिए दिवाली के हँस कहते हैं
हम सा जल; क्यों द्वेष पाल तू दहता है?
*
तन के तिनके तन के झट झुक जाते हैं
मन का मनका व्यथा कथा कब कहता है?
*
किस किस को किस तरह करे कब किस मंज़िल 
पग बिन सोचे पग पग पीड़ा सहता है
*

गुरुवार, 18 मार्च 2021

अमृत महोत्सव २०२१ -२०२२

विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२१ -२०२२ 
सामूहिक रचना संकलन
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मियों के लिए स्वर्णिम अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से क्रांतिकारी शहीदों के आत्मोत्सर्ग, आजाद हिंद फौज के बलिदान, सत्याग्रहियों के संघर्ष, देश-विभाजन की पीड़ा, देश के नव निर्माण की लगन व परिश्रम, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय उपलब्धियाँ, देशभक्तों से जुड़े प्रेरक प्रसंग, राष्ट्रीय गौरव के क्षणों, लोक में व्याप्त उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास, जनगण के अरमानों आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५-७५ रचनाकारों की राष्ट्रीय भावधारा पर केंद्रित रचनाओं के  संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किए जाना है।
रचनाकार अपने संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, प्रकाशित पुस्तकें, डाक का पता, चलभाष क्रमांक, ईमेल) व चित्र ३० अप्रैल तक उक्त पते पर तथा विधाओं के सम्मुख दर्शाए गए सहसंपादकों को अविलंब भेजें। पहले ७५ स्तरीय रचनाएँ ही संकलित की जा सकेंगी। निराशा से बचने के लिए शीघ्रता कीजिए। रचनाओं कथ्य मौलिक, सामयिक, समाजोपयोगी तथा प्रभावी होने पर ही रचना का चयन किया जाएगा।
सबकी सहभागिता होने पर संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
संकलन पर स्वत्वाधिकार संपादक का तथा रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा।
प्रस्तावित संकलन -
विधा       -    सहसंपादक का नाम वाट्स ऐप क्रमांक 
निबंध     -    डॉ. मुकुल तिवारी ९४२४८३७५८५  
नवगीत   -   बसंत शर्मा ९४७९३५६७०२  
लोकगीत -   विजय बागरी ९६६९२५१३१९  
बालगीत  -     
बालकथा  - पुनीता भारद्वाज ९६९४९१४८६०
लघुकथा   - प्रेरणा गुप्ता ८२९९८७२८४१   
कहानी     -  सुरेंद्र सिंह पवार ९३००१०४२९६  
संस्मरण -   सदानंद कवीश्वर ९८१०४२०८२५ 
साक्षात्कार - विभा तिवारी 
    
 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
संस्मरण संकलन
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ संस्मरणकारो से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक प्रेरक संस्मरण आमंत्रित है। इन संस्मरणों का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम शब्द सीमा ७०० ।
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
संस्मरण का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
नवगीत संकलन
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ नवगीतकारों से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक नवगीत आमंत्रित है। इन नवगीतों का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम पंक्ति सीमा २५ ।
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
नवगीत का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
बाल कथा संकलन
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ बालकथाकारों से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक बालकथा आमंत्रित है। इन बालकथाओं का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम शब्द सीमा ५०० ।
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
बालकथा का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*

लघुकथा जबलपुर

जबलपुर संभाग में लघुकथा
*
जबलपुर संभाग आरंभ से लघुकथा का गढ़ रहा है। कुँवर प्रेमिल और मैंने बहुत सी सामग्री उपलब्ध करा दी है। दिवंगत लघुकथाकारों और जिनके संकलन नहीं हैं, ऐसे लघुकथाकारों की लघुकथाएँ तुरंत संरक्षित की जाना आवश्यक है। मैं "जबलपुर में लघुकथा" शीर्षक से संकलन तैयार कर रहा हूँ। सभी से अनुरोध है कि अपने परिचित लघुकथाकायरों के नाम, पते, चलभाष क्रमांक, चित्र व लघुकथाएँ मुझे वाट्सएप क्रमांक ९४२५१८३२४४ या ईमेल salil.sanjiv@gmail.com पर अविलंब भेजें। पूर्व प्रकाशित लघुकथाओं के साथ पत्रिका का नाम, वर्ष, माह तथा संपादक का संपर्क भेजें। सभी सहयोगियों का नामोल्लेख संकलन में किया जाएगा।
आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" 
संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान
*

मुक्तक

मुक्तक 
नववर्षोत्सव मंगलमय हो।
माँ की कृपा अमित-अक्षय हो।।
करें साधना सद्भावों की-
नित नव रचनाएँ निर्भय हो।।
१८-३-२०१८ 

निमाड़ी दोहा

निमाड़ी दोहा:
संजीव 'सलिल' 
*
जिनी वाट मंs झाड नी, उनी वांट की छाँव. ने
ह मोह ममता लगन, को नारी छे ठाँव.. 
१८-३-२०१० 
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

मुक्तिका

मुक्तिका
*
मन मंदिर जब रीता रीता रहता है।
पल पल सन्नाटे का सोता बहता है।।
*
जिसकी सुधियों में तू खोया है निश-दिन
पल भर क्या वह तेरी सुधियाँ तहता है?
*
हमसे दिए दिवाली के हँस कहते हैं
हम सा जल; क्यों द्वेष पाल तू दहता है?
*
तन के तिनके तन के झट झुक जाते हैं
मन का मनका व्यथा कथा कब कहता है?
*
किस किस को किस तरह करे कब किस मंज़िल 
पग बिन सोचे पग पग पीड़ा सहता है
*

बुधवार, 17 मार्च 2021

मुक्तिका

मुक्तिका 
*
आदमी भला मेरा गर करेंगे। १९  
सितारे बदी करने सेडरेंगे।। 
बिना मतलब मदद कर दे किसी की 
दुआ के फूल तुझ पर तब झरेंगे।। 
कलम थामे न जो कहते हकीकत 
आप ही वे बिना मारे मरेंगे।। 
नर्मदा नेह की जो नित नहाते  
बिना तारे किसी के खुद तरेंगे।। 
न रुकते जो 'सलिल' सम सतत बहते 
सुनिश्चित मानिये वे जय वरेंगे।। 
*
१७ मार्च २०१० 

मंगलवार, 16 मार्च 2021

दोहा यमक

 गले मिलें दोहा यमक

*
चिंता तज चिंतन करें, दोहे मोहें चित्त
बिना लड़े पल में करें, हर संकट को चित्त
*
दोहा भाषा गाय को, गहा दूध सम अर्थ
दोहा हो पाया तभी, सचमुच छंद समर्थ
*
सरिता-सविता जब मिले, दिल की दूरी पाट
पानी में आगी लगी, झुलसा सारा पाट
*
राज नीति ने जब किया, राजनीति थी साफ़
राज नीति को जब तजे, जनगण करे न माफ़
*
इह हो या पर लोक हो, करके सिर्फ न फ़िक्र
लोक नेक नीयत रखे, तब ही हो बेफ़िक्र
*
धज्जी उड़ा विधान की, सभा कर रहे व्यर्थ
भंग विधान सभा करो, करो न अर्थ-अनर्थ
*
सत्ता का सौदा करें, सौदागर मिल बाँट
तौल रहे हैं गड्डियाँ, बिना तराजू बाँट
*
किसका कितना मोल है, किसका कितना भाव
मोलभाव का दौर है, नैतिकता बेभाव
*
योगी भूले योग को, करें ठाठ से राज
हर संयोग-वियोग का, योग करें किस व्याज?
*
जनप्रतिनिधि जन के नहीं, प्रतिनिधि दल के दास
राजनीति दलदल हुई, जनता मौन-उदास
*
कब तक किसके साथ है, कौन बताये कौन?
प्रश्न न ऐसे पूछिए, जिनका उत्तर मौन
*
संजीव
१६-३-२०२०
९४२५१८३२४४

गीत तुम बिन

गीत 
तुम बिन
*
तुम बिन नेह, न नाता पगता
तुम बिन जीवन सूना लगता
*
ही जाती तब दूर निकटता
जब न बाँह में हृदय धड़कता
दिपे नहीं माथे का सूरज
कंगन चुभे, न अगर खनकता
तन हो तन के भले निकट पर
मन-गोले से मन ही दगता
*
फीकी होली, ईद, दिवाली
हों न निगाहें 'सलिल' सवाली
मैं-तुम हम बनकर हर पल को
बाँटें आजीवन खुशहाली
'मावस हो या पूनम लेकिन
आँख मूँद, मन रहे न जगता
*
अपना नाता नेह-खज़ाना
कभी खिजाना, कभी लुभाना
रूठो तो लगतीं लुभावनी
मानो तो हो दिल दीवाना
अब न बनाना कोई बहाना
दिल न कहे दिलवर ही ठगता
***
१६-३-२०१६

मुक्तिका

मुक्तिका :
मापनी- २१२२ २१२२ २१२
*
तू न देगा, तो न क्या देगा खुदा?
है भरोसा न्याय ही देगा खुदा।
*
एक ही है अब गुज़ारिश वक़्त से
एक-दूजे से न बिछुड़ें हम खुदा।
*
मुल्क की लुटिया लुटा दें लूटकर
चाहिए ऐसे न नेता ऐ खुदा!
*
तब तिरंगे के लिये हँस मर मिटे
हाय! भारत माँ न भाती अब खुदा।
*
नौजवां चाहें न टोंके बाप-माँ
जोश में खो होश, रोएँगे खुदा।
*
औरतों को समझ-ताकत कर अता
मर्द की रहबर बनें औरत खुदा।
*
लौ दिए की काँपती चाहे रहे
आँधियों से बुझ न जाए ऐ खुदा!
***
१६-३-२०१६
(टीप- 'हम वफ़ा करके भी तन्हा रह गए' गीत इसी मापनी पर है.)

सामयिक दोहे

दोहा दुनिया
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
*
१६-३-२०१८ 

नवगीत

नवगीत: बजा बाँसुरी ---...
*
बजा बाँसुरी
झूम-झूम मन...
*
जंगल-जंगल
गमक रहा है.
महुआ फूला
महक रहा है.
बौराया है
आम दशहरी-
पिक कूकी, चित
चहक रहा है.
डगर-डगर पर
छाया फागुन...
*
पियराई सरसों
जवान है.
मनसिज ताने
शर-कमान है.
दिनकर छेड़े
उषा लजाई-
प्रेम-साक्षी
चुप मचान है.
बैरन पायल
करती गायन...
*
रतिपति बिन रति
कैसी दुर्गति?
कौन फ़िराये
बौरा की मति?
दूर करें विघ्नेश
विघ्न सब-
ऋतुपति की हो
हे हर! सद्गति.
गौरा माँगें वर
मन भावन...
**************
१६-३-२०१०

अमृत महोत्सव

[16/03, 14:49] आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": ॐ
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
लघुकथा संकलन 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए असर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ लघुकथाकारों की स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित लघुकथाओं का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम शब्द सीमा ३०० शब्द। 
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
लघुकथा का कथ्य मौलिक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। 
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*
[16/03, 14:49] आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": ॐ
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
नवगीत संकलन 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ नवगीतकारों से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक नवगीत आमंत्रित है। इन नवगीतों का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम पंक्ति सीमा २५ । 
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
नवगीत का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*
[16/03, 14:49] आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": ॐ
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
बाल कथा संकलन 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ बालकथाकारों से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक बालकथा आमंत्रित है। इन बालकथाओं का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम शब्द सीमा ५०० । 
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
बालकथा का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*
[16/03, 14:49] आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": ॐ
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
संस्मरण संकलन 
*
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव रचनाधर्मिता के लिए अवसर है कि वे अपनी रचना के माध्यम से शहीदों के बलिदान, आजाद हिंद फौज के संघर्ष, सत्याग्रहियों की जिजीविषा, विभाजन की पीड़ा, नवनिर्माण की लगन, राष्ट्रीय एकता, उपलब्धियाँ, प्रेरक प्रसंग, गौरव के क्षण, उत्सवधर्मिता, आह्लाद, उल्लास आदि को शब्दित करें।
समर्थ ७५ संस्मरणकारो से स्वाधीनता की अमृत जयंती पर केंद्रित एक एक प्रेरक संस्मरण आमंत्रित है। इन संस्मरणों का संग्रह ऑनलाइन प्रकाशित किया जाना है।
अधिकतम शब्द सीमा ७०० । 
अपना संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, डाक का पता, चलभाष क्रमांक व ईमेल) व चित्र ३१ मार्च तक उक्त पते पर भेजें।
संस्मरण का कथ्य मौलिक, सकारात्मक तथा प्रभावी होने पर ही चयन किया जाएगा।
संकलन मुद्रित भी किया जा सकता है।
रचना पर स्वत्वाधिकार रचनाकार का होगा। संकलन का स्वत्वाधिकार संपादक का होगा।
सामग्री उक्त ईमेल या वाट्सएप पर भेजें।
*

सोमवार, 15 मार्च 2021

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
***

कहे कुंडलिया सत्य

 कहे कुंडलिया सत्य

*
दो नंबर पर हो गयी, छप्पन इंची चोट
जला बहाते भीत हो, पप्पू संचित नोट
पप्पू संचित नोट, न माया किसी काम की
लालू स्यापा करें, कमाई सब हराम की
रहे तीन के ना तेरह के, रोते अफसर
बबुआ करें विलाप, गँवाकर धन दो नंबर
*
दबे-दबे घर में रहें, बाहर हों उद्दंड
हैं शरीफ बस नाम के, बेपेंदी के गुंड
बेपेंदी के गुंड, गरजते पर न बरसते
पाल रहे आतंक, मुक्ति के हेतु तरसते
सीधा चले न सांप, मरोड़ो कई मरतबे
वश में रहता नहीं, उठे फण नहीं तब दबे
*
दिखा चुनावों ने दिया, किसका कैसा रूप?
कौन पहाड़ उखाड़ता, कौन खोदता कूप?
कौन खोदता कूप?, कौन किसका अपना है?
कौन सही कर रहा, गलत किसका नपना है?
कहता कवि संजीव, हुआ जो नहीं वह लिखा
कौन जयी हो? पत्रकार को नहीं था दिखा
*
हाथी, पंजा-साइकिल, केर-बेर सा संग
घर-आँगन में करें जो, घरवाले ही जंग
घरवाले ही जंग, सम्हालें कैसे सत्ता?
मतदाता सच जान, काटते उनका पत्ता
बड़े बोल कह हाय! चाटते धूला साथी
केर-बेर सा सँग, साइकिल-पंजा, हाथी
*
पटकी खाकर भी नहीं, सम्हले नकली शेर
ज्यादा सीटें मिलीं पर, हाय! हो गए ढेर
हाय! हो गए ढेर, नहीं सरकार बन सकी
मुँह ही काला हुआ, नहीं ठंडाई छन सकी
पिटे कोर्ट जा आप, कमल ने सत्ता झपटी
सम्हले नकली शेर नहीं खाकर भी पटकी
***

मानव छंद

छंद सलिला:
चौदह मात्रीय मानव छंद
संजीव
*
लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४, मात्रा बाँट ४-४-४-२ या ४-४-४--१-१, मूलतः २-२ चरणों में तुक साम्य किन्तु प्रसाद जी ने आँसू में तथा गुप्त जी ने साकेत में२-४ चरण में तुक साम्य रख कर इसे नया आयाम दिया। आँसू में चरणान्त में दीर्घ अक्षर रखने में विविध प्रयोग हैं. यथा- चारों चरणों में, २-४ चरण में, २-३-४ चरण, १-३-४ चरण में, १-२-४ चरण में। मुक्तक छंद में प्रयोग किये जाने पर दीर्घ अक्षर के स्थान पर दीर्घ मात्रा मात्र की साम्यता रखी जाने में हानि नहीं है. उर्दू गज़ल में तुकांत/पदांत में केवल मात्रा के साम्य को मान्य किया जाता है. मात्र बाँट में कवियों ने दो चौकल के स्थान पर एक अठकल अथवा ३ चौकल के स्थान पर २ षटकल भी रखे हैं. छंद में ३ चौकल न हों और १४ मात्राएँ हों तो उसे मानव जाती का छंद कहा जाता है जबकि ३ चौकल होने पर उपभेदों में वर्गीकृत किया जाता है.
लक्षण छंद:
चार चरण सम पद भुवना,
अंत द्विकल न शुरू रगणा
तीन चतुष्कल गुरु मात्रा,
मानव पग धर कर यात्रा
उदाहरण:
१. बलिहारी परिवर्तन की, फूहड़ नंगे नर्त्तन की
गुंडई मौज मज़ा मस्ती, शीला-चुन्नी मंचन की
२. नवता डूबे नस्ती में, जनता के कष्ट अकथ हैं
संसद बेमानी लगती, जैसे खुद को ही ठगती
३. विपदा न कोप है प्रभु का, वह लेता मात्र परीक्षा
सह ले धीरज से हँसकर, यह ही सच्ची गुरुदीक्षा
४. चुन ले तुझको क्या पाना?, किस ओर तुझे है जाना
जो बोया वह पाना है, कुछ संग न ले जाना है
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, मानव, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)

होली का रंग राजनीति के संग

होली का रंग राजनीति के संग 
संजीव 'सलिल'
*
होली हो ली हो रही होगी फिर-फिर यार
मोदी राहुल ममता माया जयललिता तैयार
जयललिता तैयार न जीवनसाथी-बच्चे
इसीलिये तो दाँव न चलते कोई कच्चे
कहे 'सलिल' कवि बच्चेवालों की जो टोली
बचकर रहे न गीतका दें ये भंग की गोली
*
होली अनहोली न हो, खायें अधिक न ताव.
छेड़-छाड़ सीमित करें, अधिक न पालें चाव..
अधिक न पालें चाव, भाव बेभाव बढ़े हैं.
बचें करेले सभी, नीम पर साथ चढ़े हैं..
कहे 'सलिल' कविराय, न भोली है अब भोली.
बचकर रहिये आप, मनायें जम भी होली..
*
होली जो खेले नहीं, वह कहलाये बुद्ध.
माया को भाये सदा, सत्ता खातिर युद्ध..
सत्ता खातिर युद्ध, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोलकर करता बातें.
लेकिन भीतर ही भीतर करता हैं घातें..
नकली कुश्ती देख भ्रमित है जनता भोली.
एक साथ मिल खर्चे बढ़वा खेलें होली..
*

हाइकु गजल

हाइकु गजल:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
आया वसंत / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत.. 
शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत.. 
*
प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बना लो मीत. 
जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत.. 
*
पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण.. 
हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत.. 
*
चूमता कली / मधुकर गुंजा / लजाती लली.. 
सूरज हु/उषा पर निसार/लाली अनंत.. 
*
प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत. 
क्यों कन्यादान? / 'सलिल'वरदान / दें एकदंत..
*