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सोमवार, 26 मार्च 2018

समीक्षा: हिरण सुगंधों के- आचार्य भगवत दुबे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

पुस्तक सलिला: 

हिरण सुगंधों के- आचार्य भगवत दुबे
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
पुस्तक परिचय: हिरण सुगंधों के, गीत-नवगीत संग्रह रचनाकार- आचार्य भागवत दुबे, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन ई २८ लाजपत नगर साहिबाबाद २०१००५, प्रथम संस्करण- २००४, मूल्य- रूपये १२०/-, पृष्ठ- १२१। 
                                       विविध विधाओं में गत ५ दशकों से सृजनरत वरिष्ठ रचनाधर्मी आचार्य भगवत दुबे रचित ‘हिरण सुगंधों के’ के नवगीत किताबी कपोल कल्पना मात्र न होकर डगर-डगर में जगर-मगर करते अपनों के सपनों, आशाओं-अपेक्षाओं, संघर्षों-पीडाओं के जीवंत दस्तावेज हैं। ये नवगीत सामान्य ग्राम्य जनों की मूल मनोवृत्ति का दर्पण मात्र नहीं हैं अपितु उसके श्रम-सीकर में अवगाहन कर, उसकी संस्कृति में रचे-बसे भावों के मूर्त रूप हैं। इन नवगीतों में ख्यात समीक्षक नामवर सिंह जी की मान्यता के विपरीत ‘निजी आत्माभिव्यक्ति मात्र’ नहीं है अपितु उससे वृहत्तर आयाम में सार्वजनिक और सार्वजनीन यथार्थपरक सामाजिक चेतना, सामूहिक संवाद तथा सर्वहित संपादन का भाव अन्तर्निहित है। इनके बारे में दुबे जी ठीक ही कहते हैं-
‘बिम्ब नये सन्दर्भ पुराने
मिथक साम्यगत लेकर
परंपरा से मुक्त
छान्दसिक इनका काव्य कलेवर
सघन सूक्ष्म अभिव्यक्ति दृष्टि
सारे परिदृश्य प्रतीत के
पुनः आंचलिक संबंधों से
हम जुड़ रहे अतीत के’

                                       अतीत से जुड़कर वर्तमान में भविष्य को जोड़ते ये नवगीत रागात्मक, लयात्मक, संगीतात्मक, तथा चिन्तनात्मक भावभूमि से संपन्न हैं। डॉ. श्याम निर्मम के अनुसार: ‘इन नवगीतों में आज के मनुष्य की वेदना, उसका संघर्ष और जीवन की जद्दोजहद को भली-भाँति देखा जा सकता है। भाषा का नया मुहावरा, शिल्प की सहजता और नयी बुनावट, छंद का मनोहारी संसार इन गीतों में समाया है। आम आदमी का दुःख-दर्द, घर-परिवार की समस्याएँ, समकालीन विसंगतियाँ, थके-हारे मन का नैराश्य और संवेदनहीनता को दर्शाते ये नवगीत नवीन भंगिमाओं के साथ लोकधर्मी, बिम्बधर्मी और संवादधर्मी बन पड़े हैं।’
श्रम ढहाकर ही रहेगा / अब कुहासे का किला 
झोपडी की अस्मिता को / छू न पाएँगे महल अब 
पीठ पर श्रम की / न चाबुक के निशां / बन पाएँगे अब 
बाँध को / स्वीकारना होगा / नहर का फैसला 
*
चुटकुले, चालू चले / औ' गीत हम बुनते रहे 
सींचते आँसू रहे / लतिकाओं, झाड़ों के लिए 
तालियाँ पिटती रहीं / हिंसक दहाड़ों  के लिए
मसखरी, अतिरंजना पर / शीश हम धुनते रहे 
*
उच्छृंखल हो रही हवाएँ / मौसम भी बदचलन हुआ है  
इठलाती फिरती हैं नभ पर / सँवर षोडशी नील घटाएँ 
फहराती ज्यों खुली साड़ियाँ / सुर-धनु की रंगीं ध्वजाएँ 
पावस ऋतु में पूर्ण सुसज्जित / रंगमंच सा गगन हुआ है 
*


                                       महाकाव्य, गीत, दोहा, कहानी, लघुकथा, गज़ल, आदि विविध विधाओं की अनेक कृतियों का सृजन कर राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुके आचार्य दुबे अद्भुत बिम्बों, सशक्त लोक-प्रतीकों, जीवंत रूपकों, अछूती उपमाओं, सामान्य ग्राम्यजनों की आशाओं-अपेक्षाओं की रागात्मक अभिव्यक्ति पारंपरिक पृष्ठभूमि की आधारशिला पर इस तरह कर सके हैं कि मुहावरों का सटीक प्रयोग, लोकोक्तियों की अर्थवत्ता, अलंकारों का आकर्षण इन नवगीतों में उपस्थित सार्थकता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, बेधकता तथा रंजकता के पंचतत्वों के साथ समन्वित होकर इन्हें अर्थवत्ता दे सका है।
दबे पाँव सूर्य गया / पश्चिम की ओर 
प्राची से प्रगट हुआ / चाँद नवकिशोर 
*
भूखा पेट कनस्तर खाली / चूल्हा ठंडा रहा 
अंगीठी सोयी मन मारे 
*
सूखे कवित्त-ताल / मुरझाए पद्माकर 
ग्रहण-ग्रस्त चंद 
गीतों से निष्कासित / वासंती छंद 
                                       आम आदमी का दैनंदिन दुःख-सुख इन नवगीतों का उत्स और लक्ष्य है। दुबे जी के गृहनगर जबलपुर के समीप पतित पावनी नर्मदा पर बने बरगी बाँध के निर्माण से डूब में आयी जमीन गँवा चुके किसानों की व्यथा-कथा कहता नवगीत पारिस्थितिक विषमता व पीड़ा को शब्द देता है:
विस्थापन कर दिया बाँध ने
ढूँढें ठौर-ठिकाना
बिके ढोर-डंगर, घर-द्वारे
अब सब कुछ अनजाना
बाड़ी, खेत, बगीचा डूबे
काटा आम मिठौआ
उड़ने लगे उसी जंगल में
अब काले कौआ

                                       दुबे जी ने भाष की विरासत को ग्रहण मात्र नहीं करते नयी पीढ़ी के लिए उसमें कुछ जोड़ते भे एहेन। अपनी अभिव्यक्ति के लिये उनहोंने आवश्यकतानुसार नव शब्द भी गढ़े हैं-
सीमा कभी न लाँघी हमने
मानवीय मरजादों की
भेंट चाहती है रणचंडी
शायद अब दनुजादों की

                                       ‘साहबजादा’ शब्द की तर्ज़ पर गढ़ा गया शब्द ‘दनुजादा’ अपना अर्थ आप ही बता देता है। ऐसे नव प्रयोगों से भाषा की अभिव्यक्ति ही नहीं शब्दकोष भी समृद्ध होता है।
                                       दुबे जी नवगीतों में कथ्य के अनुरूप शब्द-चयन करते हैं- खुरपी से निन्वारे पौधे, मोची नाई कुम्हार बरेदी / बिछड़े बढ़ई बरौआ, बखरी के बिजार आवारा / जुते रहे भूखे हरवाहे आदि में देशजता, कविता की सरिता में / रेतीला पड़ा / शब्दोपल मार रहा, धरती ने पहिने / परिधान फिर ललाम, आयेगी क्या वन्य पथ से गीत गाती निर्झरा, ओस नहाये हैं दूर्वादल / नीहारों के मोती चुगते / किरण मराल दिवाकर आधी में परिनिष्ठित-संस्कारित शब्दावली, हलाकान कस्तूरी मृग, शीतल तासीर हमारी है, आदमखोर बकासुर की, हर मजहबी विवादों की यदि हवा ज़हरी हुई, किन्तु रिश्तों में सुरंगें हो गयीं में उर्दू लफ्जों के सटीक प्रयोग के साथ बोतलें बिकने लगीं, बैट्समैन मंत्री की हालत, जब तक फील्डर जागें, सौंपते दायित्व स्वीपर-नर्स को, आवभगत हो इंटरव्यू में, जीत रिजर्वेशन के बूते आदि में आवश्यकतानुसार अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग जिस सहजता से हुआ है, वह दुबेजी के सृजन सामर्थ्य का प्रमाण है।
                                       गीतों के छांदस विधान की नींव पर आक्रामक युगबोधी तेवरपरक कथ्य की दीवारें, जन-आकांक्षाओं की दरार तथा जन-पीडाओं के वातायन के सहारे दुबे जी इन नवगीतों के भवन को निर्मित-अलंकृत करते हैं। इन नवगीतों में असंतोष की सुगबुगाहट तो है किन्तु विद्रोह की मशाल या हताशा का कोहरा कहीं नहीं है। प्रगतिशीलता की छद्म क्रन्तिपरक भ्रान्ति से सर्वथा मुक्त होते हुए भी ये नवगीत आम आदमी के लिये हितकरी परिवर्तन की चाह ही नहीं माँग भी पूरी दमदारी से करते हैं। शहरी विकास से क्षरित होती ग्राम्य संस्कृति की अभ्यर्थना करते ये नवगीत अपनी परिभाषा आप रचते हैं। महानगरों के वातानुकूलित कक्षों में प्रतिष्ठित तथाकथित पुरोधाओं द्वारा घोषित मानकों के विपरीत ये नवगीत छंद व् अलंकारों को नवगीत के विकास में बाधक नहीं साधक मानते हुए पौराणिक मिथकों के इंगित मात्र से कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अभिव्यक्त कर पाठक के चिंतन-मनन की आधारभूमि बनाते हैं। प्रख्यात नवगीतकार, समीक्षक श्री देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ के अनुसार- ‘अनेक गीतकारों ने अपनी रचनाओं में लोक जीवन और लोक संस्कृति उतारने की कोशिश पहले भी की है तथापि मेरी जानकारी में जितनी प्रचुर और प्रभूत मात्रा में भगवत दुबे के गीत मिलते हैं उतने प्रमाणिक गीत अन्य दर्जनों गीतकारों ने मिलकर भी नहीं लिखे होंगे।’
                                       "हिरण सुगंधों के" के नवगीत पर्यावरणीय प्रदूषण और सांस्कृतिक प्रदूषण से दुर्गंधित वातावरण को नवजीवन देकर सुरभित सामाजिक मर्यादाओं के सृजन की प्रेरणा देने में समर्थ हैं। नयी पीढ़ी इन नवगीतों का रसास्वादन कर ग्राम-नगर के मध्य सांस्कृतिक राजदूत बनने की चेतना पाकर अतीत की विरासत को भविष्य की थाती बनाने में समर्थ हो सकती है।
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संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ०७९९९५५९६१८, ९४२५१ ८३२४४, salilsanjiv@gmail.com,. 
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दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika :                            चित्र अलंकार: गुम्बद  ...

दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika :                            चित्र अलंकार: गुम्बद   ...:                             चित्र अलंकार: गुम्बद                                                                              ॐ          ...
                           चित्र अलंकार: गुम्बद 
                                                                            ॐ 
                                                                         कल्पना 
                                                                      धोखा नहीं है,
                                                                 इसे सच भी मत कहो। 
                                                               तर्क का आधार समुचित 
                                                                 दो निकट सच के रहो।  
                                                                   हो सके परिकल्पना 
                                                                      साकार सम्मुख  
                                                                        करो कोशिश,
                                                                          सुख मिले।   
                                                राह में बाधाएँ अनगिन, मिलीं तज शिकवे-गिले।  
                                                      बढ़ो                                              आगे 
                                                      चढ़ो                                             सीढ़ी 
                                                      याद                                              तेरी  
                                                      करे                                              पीढ़ी 
                                                      बीज                                             बोना 
                                                      सींच                                             पानी 
                                                       धरा                                             होगी 
                                                       तभी                                            धानी 
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रविवार, 25 मार्च 2018

व्यंग्य दोहावली

व्यंग्य दोहावली: * व्यंग्य उठाता प्रश्न जो, उत्तर दें हम-आप. लक्ष्य नहीं आघात है, लक्ष्य सके सच व्याप. * भोग लगाखें कर रए, पंडज्जी आराम. भूले से भी ना कहें, बे मूँ से "आ राम". * लिए आरती कह रहे, ठाकुर जी "जय राम". ठाकुर जी मुसका रहे, आज पड़ा फिर काम. * रावण ज्यादा राम कम, हैं बनिए के इष्ट. कपड़े सस्ते राम के, न्यून मुनाफा कष्ट. * वनवासी को याद कब, करें अवध जा राम. सीता को वन भेजकर, मूरत रखते वाम. * शीश कटा शम्बूक का, पढ़ा ज्ञान का ग्रंथ. आरक्षित सांसद कहाँ कहो, कहाँ खोजते पंथ? * जाति नहीं आधार हो, आरक्षण का मीत यही सबक हम सीख लें, करें सत्य से प्रीत. * हुए असहमत शिवा से, शिव न भेजते दूर. बिन सम्मति जातीं शिवा, पातीं कष्ट अपूर. * राम न सहमत थे मगर, सिय को दे वनवास. रोक न पाए समय-गति, पाया देकर त्रास. * 'सलिल' उपनिषद उठाते, रहे सवाल अनेक. बूझ मनीषा तब सकी, उत्तर सहित विवेक. * 'दर्शन' आँखें खोलकर, खोले सच की राह. आँख मूँद विश्वास कर, मिले न सच की थाह. * मोह यतीश न पालता, चाहें सत्य सतीश. शक-गिरि पर चढ़ तर्क को, मिलते सत्य-गिरीश. * राम न केवल अवध-नृप, राम सनातन लीक. राम-चरित ही प्रश्न बन, शंका हरे सटीक. * नंगा ही दंगा करें, बुद्धि-ज्ञान से हीन. नेता निज-हित साधता, दोनों वृत्ति मलीन. * 'सलिल' राम का भक्त है, पूछे भक्त सवाल. राम सुझा उत्तर उसे, मेटें सभी बवाल. * सिया न निर्बल थी कभी, मत कहिए असहाय. लीला कर सच दिखाया, आरक्षण-अन्याय. * सबक न हम क्यों सीखते, आरक्षण दें त्याग. मानव-हित से ही रखें, हम सच्चा अनुराग. * कल्प पूर्व कायस्थ थे, भगे न पाकर साथ. तब बोया अब काटते, विप्र गँवा निज हाथ. * नंगों से डरकर नहीं, ले पाए कश्मीर. दंगों से डर मौन हो, ब्राम्हण भगे अधीर. * हम सब 'मानव जाति' हैं, 'भारतीयता वंश'. परमब्रम्ह सच इष्ट है, हम सब उसके अंश. * 'पंथ अध्ययन-रीति' है, उसे न कहिए 'धर्म'. जैन, बौद्ध, सिख, सनातन, एक सभी का मर्म. * आवश्यकता-हित कमाकर, मानव भरता पेट. असुर लूट संचय करे, अंत बने आखेट. * दुर्बल-भोगी सुर लुटे, रक्षा करती शक्ति. शक्ति तभी हो फलवती, जब निर्मल हो भक्ति. * 'जाति' आत्म-गुण-योग्यता, का होती पर्याय. जातक कर्म-कथा 'सलिल', कहे सत्य-अध्याय. * 'जाति दिखा दी' लोक तब, कहे जब दिखे सत्य. दुर्जन सज्जन बन करे, 'सलिल' अगर अपकृत्य. * धंधा या आजीविका, है केवल व्यवसाय. 'जाति' वर्ण है, आत्म का, संस्कार-पर्याय. * धंधे से रैदास को, कहिए भले चमार. किंतु आत्म से विप्र थे, यह भी हो स्वीकार. * गति-यति लय का विलय कर, सच कह दे आनंद. कलकल नाद करे 'सलिल', नेह नर्मदा छंद. * श्रीराम नवमी, २५.३.२०१८

तंत्रोक्त रात्रि सूक्त काव्यानुवाद

हिंदी काव्यानुवाद-
तंत्रोक्त रात्रिसूक्त 
*
II यह तंत्रोक्त रात्रिसूक्त है II
I ॐ ईश्वरी! धारक-पालक-नाशक जग की, मातु! नमन I 
II हरि की अनुपम तेज स्वरूपा, शक्ति भगवती नींद नमन I१I
*
I ब्रम्हा बोले: 'स्वाहा-स्वधा, वषट्कार-स्वर भी हो तुम I
II तुम्हीं स्वधा-अक्षर-नित्या हो, त्रिधा अर्ध मात्रा हो तुम I२I
*
I तुम ही संध्या-सावित्री हो, देवी! परा जननि हो तुम I
II तुम्हीं विश्व को धारण करतीं, विश्व-सृष्टिकर्त्री हो तुम I३I  
*
I तुम ही पालनकर्ता मैया!, जब कल्पांत बनातीं ग्रास I
I सृष्टि-स्थिति-संहार रूप रच-पाल-मिटातीं जग दे त्रास I४I 
*
I तुम्हीं महा विद्या-माया हो, तुम्हीं महा मेधास्मृति हो I
II कल्प-अंत में रूप मिटा सब, जगन्मयी जगती तुम हो I५I
*
I महा मोह हो, महान देवी, महा ईश्वरी तुम ही हो I 
II सबकी प्रकृति, तीन गुणों की रचनाकर्त्री भी तुम हो I६I
*
I काल रात्रि तुम, महा रात्रि तुम, दारुण मोह रात्रि तुम हो I
II तुम ही श्री हो, तुम ही ह्री हो, बोधस्वरूप बुद्धि तुम हो I७I
*
I तुम्हीं लाज हो, पुष्टि-तुष्टि हो, तुम ही शांति-क्षमा तुम हो I
II खड्ग-शूलधारी भयकारी, गदा-चक्रधारी तुम हो I८I
*
I तुम ही शंख, धनुष-शर धारी, परिघ-भुशुण्ड लिए तुम हो I
II सौम्य, सौम्यतर तुम्हीं सौम्यतम, परम सुंदरी तुम ही हो I९I
*
I अपरा-परा, परे सब से तुम, परम ईश्वरी तुम ही हो I
II किंचित कहीं वस्तु कोई, सत-असत अखिल आत्मा तुम होI१०I
*
I सर्जक-शक्ति सभी की हो तुम, कैसे तेरा वंदन हो ?
II रच-पालें, दे मिटा सृष्टि जो, सुला उन्हें देती तुम हो I११I 
*
I हरि-हर,-मुझ को ग्रहण कराया, तन तुमने ही हे माता! I
II कर पाए वन्दना तुम्हारी, किसमें शक्ति बची माता!! I१२I
*
I अपने सत्कर्मों से पूजित, सर्व प्रशंसित हो माता!I
II मधु-कैटभ आसुर प्रवृत्ति को, मोहग्रस्त कर दो माता!!I१३II'
*
I जगदीश्वर हरि को जाग्रत कर, लघुता से अच्युत कर दो I
II बुद्धि सहित बल दे दो मैया!, मार सकें दुष्ट असुरों को I१४I
*
IIइति रात्रिसूक्त पूर्ण हुआII
१२-४-२०१७

चित्र अलंकार: झंडा / फागुन


फागुन
[ चित्र अलंकार: झंडा ]
*
ठण्ड के आलस्य को अलविदा कहकर 
बसंती उल्लास को ले साथ, मिलकर- 
बढ़ चलें हम ज़िदगी के अगम पथ पर
आम के बौरों से जग में फूल-फलकर.
रुक
नहीं
जाएँ,
हमें
मग
देख
कर,
पग
बढ़ाना है.
जूझ बाधा से
अनवरत अकेले
धैर्य यारों आजमाना है.
प्रेयसी मंजिल नहीं मायूस हो,
कहीं भी हो, खोज उसको आज पाना है.

आओ! पहनो बसंती चोला, फागुन मनाना है.
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salil. sanjiv@gmailcom, ७९९९५५९६१८
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शनिवार, 24 मार्च 2018

दोहा शतक श्यामल सिन्हा

दोहा शतक 
श्यामल सिन्हा















जन्म:
आत्मज:
जीवन संगिनी:
शिक्षा: 
प्रकाशन:
उपलब्धि:
सम्प्रति:
संपर्क: 


*
चित्रगुप्त मन में रहें, लग जाएगा पार। 
निराकार साकार हो, लेगा पार उतार।।
*
सागर हो तुम दया के, भरो सदा भंडार।
आशुतोष करिए कृपा, लें पूजा स्वीकार।।
*
श्यामल कच्छप भले ही, करे आदि में देर।
कर प्रयास होता जयी, अगर न हो अंधेर।।
*
माना बन सकता नहीं, तुलसी संत कबीर। 
क्यों ण माथ पर लगाऊँ, अक्षर-ब्रम्ह अबीर।।
*
सपना बीता दुख भरा, आया मुदित प्रभात। 
आओ! दिन कर लें सुदिन, सार्थक कर लें बात।।
*
प्यार पनपता प्रेम से, होते व्यर्थ अधीर। 
प्रेम बिना असफल सभी, राजा रंक वज़ीर।।
*
श्यामाभित दोहा लिखें, श्यामल जैसे नीर।
धूप-छाँव सुख-चैनमय, हर लें आँसू-पीर।।
*
दुख की तुरपाई करें, और रफू हो संग।
जब तन में हो हौसला, तब मन बने विहंग।।
*
क्या कह दें गुरु आपसे, है मन में संताप। 
भाव-जाप नहीं जाने, तन करता है पाप ।।
*
मन-बर्तन खाली हुआ, गरल भरा भंडार। 
ले आओ अमृत सुधा, बन कर तारनहार।।   
*
भवसागर में डूबता, कौन लगाये पार। 
खोज रहा गुर-नाव को, पार लगे मझधार।।
*
करता भूल सदा तभी, है खाली भंडार। 
सुपथ मिल गया सृजन का, शेष न रहा विकार।।
*
आया था बाज़ार में, मन लेकर अविचार। 
शरण गही आचार्य की, अद्भुत हुआ सुधार।।
*
भाल विराजे शशि जहाँ, शशिधर उनका नाम। 
नहीं मिले सबको कभी, उनका पावन धाम।।
*
नहीं सोचता निष्कलुष, मन में है संताप। 
अंतर्मन में धधकती, ज्वाला अपने आप।।
*
अहंकार मन में भरा,  तन-मन बहुत उदास। 
भटक रहा मन अकारण, मोती मिली न घास।।  
*
कभी न भाया मन उसे, क्यों ललचाती हाय।
आस निराश न हो कहीं, बंद मिलन अध्याय।।
*
मुझ सा अज्ञानी नहीं, रख पाता है सब्र।
हार न लेकिन मानता, भले रुला दे अब्र।।
*
आ जाओ सब भूलकर, दिल में शेष न सब्र।
मौसम तुम्हें पुकारता, बीती यादें जब्र।।   
*
आओ! मिलकर सँभालें, रिश्तों की दीवार।
बूँद-बूँद में समंदर, का कर लें दीदार।।
*
तुरपाई दुख की करें, रफू शोक भी संग।  
मन में रखकर हौसला, तन हो सके विहंग।।
*
तुम अनाथ के नाथ हो, रख दो सर पर हाथ। 
नहीं हाथ आते कभी, मेरे भोलेनाथ।।
*
हर लो हर संकट-बला, आओ कृष्ण मुरार। 
भवसागर में नाव है, ले जाओ भव पार।।  
*
धूप बुलाती सुबह की, बिखरी सुन्दर घाम। 
झूला झूले ओस भी, कर ले कुछ विश्राम।।
*
मन का भेद न कह कभी, हाल न कर बेहाल। 
सुख जोड़ा तो खो गया, बाँटा मालामाल।।
*
मन तन-साँचे में ढला, बढ़ता गया विकार। 
मिथ्या माया मोहती, भरमाता संसार।।
*
न्याय कहा अन्याय दे, आनन-फानन हाल। 
जीवन कोल्हू बैल की, दुलकी- दुलकी चाल।।
*
मेले में मन अकेला, भीड़ भरा संसार। 
मोहक माया जाल है, होते आर ना पार।।
*
सरगम को जाने बिना, लगा रहे सुर आज। 
तबला डफली मूक हैं, ढोलक बेआवाज़।।  
*
माया महाप्रपंचिनी, ठगती नर निरुपाय। 
नर औरों को ठग न खुद, बचने करे उपाय।।
*
बासंती मौसम निरख, फागुन है बेहाल।
'श्यामल' गुझिया खा रहे, भूले रोटी-दाल।।
*
कौन चाहता दर्द को, हँसी-खुशी की लूट।
मन आनंदित हो अगर, दुख से जाओ छूट।।
*
प्यार परोसे आँख से, नेह दिखाये थाल। 
तीर चला चंचल-चिता, पूछ रही क्या हाल।।
*
जिनको पाला प्यार से, वे भी हैं अब दूर। 
मजबूरी उनकी कहें, या वे हैं मगरूर।।
*
कभी न श्यामल दूर था, हुआ नहीं मगरूर। 
कृपा आपकी हो सदा, सादर नमन हुजूर।।
*
आँखें जब करने लगीं, आँखों से संवाद। 
आँखों में आँखें रखें, प्रेम-भवन बुनियाद।।
*
मान रहे हैं स्वयं को, सारे गुण की खान। 
रिश्तों की कीमत नहीं, करें आप अपमान।। 
*
आँखें जब करने लगीं, आँखों से संवाद। 
मन मुकुलित हो प्रीत से, डूब-डूब आबाद।।   
*
नहीं कर सका साधना, जीवन हुआ मुहाल। 
सपना अपना नहीं है , फिर भी मालामाल।।
*
कागज-कलम न वह रखे, अपने हाथ किताब।
सारी दुनिया का करे, पल-पल तुरंत हिसाब।।
*
भुजा बढ़ा मिलते नहीं, उनको बहुत गुरूर। 
दिल से वो निकले नहीं, आँखों से हैं दूर।।
*
नेह न अँखियों बरसता, कैसा आया फाग। 
हूक उठे डरता जिया, रात बिताई जाग।।
*
नेह-तरसता मन सखी, आया देखो फाग। 
हूक उठे डरता जिया, हिया लग गई आग।।
*
नैन हेरते पथ सखी, सूना-सूना फाग। 
लुक-छिपकर आए पिया, ननद न जाए।।   
*
स्नेह जताया ह्रदय ने, ह्रदय कहे आभार। 
ह्रदय हँसा पाकर ह्रदय, कहा नमन साभार।।
*
नहीं अश्रु है ज़िन्दगी, है मनहर मुस्कान। 
कभी ठिठकती शाम है,, मधुरिम कभी विहान।।
*
औरों को छलते रहे, ले झूठी मुस्कान। 
नहीं लगे छलिया कभी, हो कैसे इंसान।। 
पा न सका तो क्या हुआ, पाली मन में चाह। 
चाहत फूलों की रही, किंचित रही न डाह।।
तार जुड़े रखना सदा, जीवन सके न हार।
सुन गुहार प्रभु! मान लूँ, तुमको तारणहार।।
*
तेरे दर पर आ गया, लेकर कर में हार।
शुभाशीष पा मैं चला, चरणों में मन हार।।
*
सीख रहा हूँ लिख सकूँ, समय लगे आचार्य।
पहला ख़त पा प्यार का, करें न अस्वीकार्य।। 
*
हो काशी की सुबह या लखनऊ की हो शाम। 
मेरे संग चलती दुआ, सबको करूँ सलाम।।   
*
श्यामल जी की कलम का, लोहा मानें छंद। 
नर तो नर खुश हो रहे, पढ-सुन आनंदकंद।।
*
कितना भी टेढ़ा चले, जीत न सके वजीर। 
प्यादा बढ़कर भी नहीं, बनाता शाह अमीर।।
*
महफ़िल में आ गए हैं, है कुछ बात ज़रूर। 
सबकी सुन ली आपने, हमसे सुनें हुज़ूर।।
*
आलिंगन बस ख्वाब था, लगा नहीं कुछ हाथ। 
धागा कच्चा प्रीत का, बगिया बिना पराग।।  
*
लाल गाल पर सज रहा, है गुलाल हो लाल। 
देख श्यामली को हुआ, चुप श्यामल बेहाल।।
*
बहुत हुआ अब रूठ मत, चुका जा रहा सब्र।
आस टूटकर श्वास की, बना नहीं दे कब्र।।
*
जीभ चिढ़ा ठेंगा दिखा, वह कर गई कमाल। 
नजर उठा देखा नहीं, मन में रहा मलाल।।
*
आलिंगन के स्वप्न से, मन है मालामाल। 
धागे बुन कर प्रीत के, सचमुच हुआ निहाल।।
*
प्रेम नगर तो खो गया, नीड़ नहीं है आज। 
शाहजहाँ कोई नहीं, कहीं नहीं मुमताज।।   
*
पंख हुए बेहौसला, कैसे भरें उड़ान। 
औंधे मुँह सपने गिरे, नहीं बची पहचान।।
*
प्यार परोसे हरि मिले, हरि-हर जोहे बाट। 
स्नेह बीज की खाद पर, फसल उगाए ठाट।।
*
अविरल ही बहता रहा, इन आँखों का नीर। 
जाहिर कर नहीं पाया, मैं निज मन की पीर।।
*
सुख बाँटे बढ़ता सदा, घट जाए दुख बाँट। 
सुख साझा करी सदा, दुख में भी हों ठाट।।
*
लेती कब?, देती सदा, प्रकृति करें स्वीकार। 
पुलक प्यार दें प्यार को, रखती नहीं उधार।।
*
सुंदरता तब ही भली, जब तज दे अभिमान। 
अपनेपन बिन कब लगे, अच्छा कहें मकान।।
*
जीवन को खोने न दो, जीवन है अनमोल। 
बात है ये छोटी सी, नाप-तौल कर बोल।।  
*
बेईमानों की खुली, देखो आज दुकान। 
चीनी में चीटे लगे, राम कहें कर दान।।
*
बोते हैं सब कैक्टस, काँटे रहे न दूर। 
गैर हो गए खास अब, अपने गैर हजूर।।
*
दीन-हीन को मत रुला, तुझे लगेगी आह। 
तू होगा बेचैन वे, बढ़ पाएँगे वाह।।
*
महल बनाया घास का, आप बन गया शाह। 
शैय्या कर तृणमूल की, रहता बेपरवाह।।
*
पढ़ते आए हैं नयन, मुख को बना किताब।
क्या पाया, क्या खो दिया, कभी न किया हिसाब।।   
*
काम सदा करते रहे, लेकर तेरा नाम। 
जो पाया माँ से मिला, मन है माँ का धाम।।
*
प्रेम साधना है अगर, करिए प्रीत अगाध। 
स्नेह-सलिल जो डूबता, हँसता रहे अबाध।।
*
रहते हैं जो ताक में, रखते दुष्ट विचार। 
छुरी पीठ में घोपते, कर कलुषित आचार।।
*
सुख-दुख में हो सँग सदा, नमन तुम्हें साभार। 
जीवन यूँ चलता रहे, होगा बेड़ा पार।।  
*
जो रहते हैं ताक में, नाव बहे मँझधार। 
उन्हें बहता साथ ले, पल में भाटा-ज्वार।।
*
बचपन की थी अमीरी, बच्चों के थे खेल। 
महल बनाए रेत के, माचिस की थी रेल।।
*
बात न आस्था की करे, देखे मजहब-जात। 
आडंबर-हथियार ले, करे घात पर घात।।
*
सच बोलो न असत्य तुम, गहो न संदल झूठ। 
दुनिया चाहे खुश रहे , या जाए जग रूठ।।  
*
नगपति कहलाते मगर, चंद्र रखे अहिं माथ।   
विषधर गले लपेट दें, अमृत हाथों-हाथ।।
*
बचपन सारा खो गया, बाकी बचा मलाल !
समय नहीं रूकता कभी, कैसे रखें संभाल।।
*
बन जाता है कटु वचन, बिना धार औजार। 
दो-धारी तलवार बन, करता विकट प्रहार।।
*
लहर उफनती आ गई, देख घाट की प्यास। 
आतुरता है मिलन की, मिलकर रहे न पास।।
*
महल बनाया घास का, आप बन गया शाह। 
शैया कर तृणमूल की, रहता बेपरवाह।।
*
बिखर गए रिश्ते सभी, बना अहम  दीवार। 
सबकी अपनी है व्यथा, कौन लगाए पार।।  
*
राह ताकते कट गई, रात न आए तात। 
मन अधीर होता विकल, कटे न काली रात।।
*
तुम मेरे स्वर-राग हो, रच दो कोई गीत। 
सुमधुर सरगम ताल हो, मन जीते मन जीत।।
*
जानी ताल न सुर कभी, दिए जा रहे  थाप। 
सरगम  पहचाने नहीं, राग रहे आलाप।।  
*
भय-चिंता किंचित नहीं, प्रभु हैं तारणहार। 
सुख-दुख में शामिल रहे, मिल पूरा परिवार।।
*
मन छोटा उनका मगर, बँगला आलीशान। 
सत्य न छिपता है प्रगट, झूठी सारी शान।।
*
रहने दो चुपचाप ही, करना नहीं सवाल।
जुबां खोलकर क्यों करूँ, तुम ही कहो बवाल।।* 
किसका हाल सुनाएँ क्या, हाल हुआ बेहाल। 
रेंगें सीना तानकर, कृमि ऊँचा कर भाल।।
*
हँसी सुबह की धूप की, लगे जायकेदार। 
गौरैया के साथ ही, आती रहे बहार।।
*
खूब मजे लो सफर का, कम कर के सामान। 
जीवन बीते खुशनुमा, यदि कम हों अरमान।।
*
सुध-स्नेह में घोलता, रहा हलाहल बैन। 
भेद रहे हैं ह्रदय को, कातिल भृकुटी-नैन।।
*
चलो मना लें  मिल उसे, भले बोल दें झूठ। 
राहें हैं सबकी जुदा, टूटे मीत न रूठ।।
*
संझा हुई पुकार सुन, आ जाओ घनश्याम। 
चित विकल घबरा रहा, कहाँ गए अभिराम।।
*
शतकवीर श्यामल हुए, अभिनंदन सौ बार।
दोहा-उपवन मेँ बही, हर सूँ नई बहार।।
*
मार्ग दिखाया आपने, वंदन है आचार्य। 
स्नेह सदा बढ़ता रहे, होगा बेड़ा पार।।
***

दोहा शतक शुचि 'भवि'

ॐ 
दोहा शतक 
शुचि भवि
*














दोहा शतक 
हे माँ वीणावादिनी, दे मुझको वरदान।
चले निरंतर लेखनी, जब तक है 'भवि' जान।।
*
आशीषों से हों भरे, जीवन के सोपान।
हार और ‘भवि’ जीत क्या, बनो नेक इंसान।।
*
सीधे-सच्चे को कहाँ, मिलता अब सम्मान।
दुम जिसकी जितनी हिले, उसका उतना मान।।
*
बहुत दुखद है बात यह, बस मतलब का साथ।
मतलब निकले भूलता, बायाँ दायाँ हाथ।।
*
रंग-बिरंगे फूल हैं, खिले हुए चहुँ ओर।
धरती का यह रूप लख, मन नाचे बन मोर।।
*
ईश  तुम्हारे  साथ हैं, करते रहो प्रयास ।
जीवन में कितने मिलें, तुम्हें विरोधाभास।।
*
नाकाफ़ी इस दौर में, 'भवि' जी तोड़ प्रयास।
चाटुकारिता के बिना, रखो नहीं कुछ आस।।
*
सोचो 'भवि' है मतलबी, कितना वह इंसान।।
मतलब में इंसान को, बोले जो भगवान।।
*
बातों से उस शख़्स की, कैसे हो पहचान।
जिसके मन में कंस है, होंठों पर भगवान।।
*
ईश कहे जो आपको, तो समझें सच आप।
उसके मन में है भरा, निश्चित कोई पाप।।
*
श्रेष्ठ हुए हैं जन्म से, कौन जगत में लोग।
कर्मों से ही श्रेष्ठता, का बनता संयोग।।
*
जीवन जब नीरस लगे, समझो हुए तबाह।
याद करो 'भवि' ईश को, देगा नव उत्साह।।
*
मन हो पावन आपका, रौशन आँगन-द्वार।
ईश करे घर में सदा ,’भवि’ हों ख़ुशियाँ-प्यार।।
*
मन मयूर सा झूमता, सुन क़दमों की चाप।
यादों में आहट बिना, जबसे आए आप।।
*
हद से हद मानव यहाँ, रह सकता सौ साल।  
छोड़ो उसके बाद के, सपनों का जंजाल।।
*
जो भी करना आज तू, कर ले उसको आज।
वरना तेरा शेष कुछ, रोज़ बचेगा काज।।
*
'भवि' अपनी मासूमियत, रखो सुरक्षित यार।
मन पर हो सकता नहीं, कभी उम्र का वार।।
*
केवल मतलब के समय, जो पूजे भगवान।
पीड़ित दुख-दारिद्र्य से, रहता वह इंसान।।   
*
अपने दिल से पूछिए, क्या उसको दरकार ।
उसे प्यार की प्यास है, या बस कारोबार।।
*
टेढ़े जग में टूटता, मानव का भी दर्प।
बिल में जाने के लिए, सीधा होता सर्प।।
*
मानवता सबसे बड़ा, जग में भवि है धर्म।
साध लिया तुमने अगर, उत्तम होंगे कर्म।।
*
कर बुलंद ख़ुद को समझ, सबके हैं भगवान।
करते वे सब पर कृपा, निर्धन या धनवान।।
*
ग़ुस्सा होता नाक पर, लालच में रख ध्यान।
विष बाहर का बेअसर, भीतर का बलवान।।
*
कथनी-करनी है अलग, जिनकी मेरे ईश।
न्याय करेंगे किस तरह, ‘भवि’ वो न्यायाधीश।।
*
दामन अपना देखिए, कैसा है किरदार।
केवल कहने से नहीं, जाता भ्रष्टाचार।।   
*
लेखन हो जिनका विविध, बनो उन्हीं के शिष्य।
उत्तम गुरु के साथ ही, उत्तम बने भविष्य।।
*
चलती जिससे सृष्टि है, उस पर ही अब शोक।
‘भवि’ बेटी के जन्म पर, क्यों हो कहिए रोक।।
*
कितना भारी नाम हो, कितनी ऊँची ज़ात।
किसको भला कुकर्म से, जग में मिली निजात।।
*
कटु वचनों से क्या कहीं, बनती है कुछ बात।
बोलो मीठे बोल तो, सुधरेंगे हालात।।
*
ख़ुद ही ख़ुद को कह रहे, तुम ज्ञानी-विद्वान।
दुनिया दे आदर तुम्हें, भवि है वो सम्मान।।
*
बचे कैमरे से मगर, यह सोचें श्रीमान।
कहाँ ईश की दृष्टि से, ओझल है इंसान।।
*
धन-दौलत, यश कुछ नहीं, ‘भवि’ आएगा हाथ।
तू कर्मों पर ध्यान दे, जो जाएँगे साथ।।   
*
शिष्य मिले अच्छा तभी, बढ़ता गुरु का मान।
चहुँदिश उसके ज्ञान का, होता तब सम्मान।।
*
पहले जैसी अब कहाँ, पर्वों में झंकार।
अब तो हैं बस नाम के, पर्व तीज त्यौहार।।
*
स्वच्छ हवा-पानी नहीं, दूषित हृदय विचार।
करें देव भी किस तरह, अर्घ्य आज स्वीकार।।
*
जन्नत का दर था कभी, 'भवि' हर घर का द्वार।
मगर जहन्नुम हो गया, अब सारा संसार।।
*
होठों पर छाई हँसी, अंतस रोता पीर।
'भवि' मन की मजबूरियाँ, देतीं सीना चीर।।
*
अपने कर्मों पर करें, दिल से सभी विचार।
असभ्यता के रोग का, तब होगा उपचार।।
*
डिग्री प्रतिभा तब तलक,'भवि' समझो बेकार।
जब  तक  है  इस देश  में, आरक्षण  की मार।।  
*
अहंकार ने खा लिया, उसका सारा ज्ञान।
वरना रावण था बड़ा, 'भवि' ज्ञानी-विद्वान।।
*
बूँद-बूँद विश्वास से, बनती है पहचान।
पल भर में कोई कभी, होता नहीं महान।।
*
झूठे उस इंसान को, शायद नहीं गुमान।
कौन बचा 'भवि' ईश की, लाठी से इंसान।।
*
फल अनाज पानी हवा, शुद्ध नहीं कुछ आज।
'भवि' कैसे इस हाल में, जीवित रहे समाज।।
*
पूजन करते राम का, रघुकुल से अंजान।
वचन निभाते 'भवि' नहीं, तुम हो मृतक समान।।
*
सोने  सी  काया  हमें, देते  हैं  करतार।
मिट्टी करते हैं हमीं, यह स्वर्णिम उपहार।।
*
मँहगाई से ज़िंदगी, किसकी है दुश्वार।
थिरक रहा हर हाथ में, 'भवि' मोबाइल यार।।  
*
तन के सुख में इस क़दर, झूम रहा संसार।
मन के सुख की बात अब, ’भवि’ करना बेकार।।
*
निर्भर मन की दौड़ पर, सारा जोश-उमंग।
मन हारा तो जानिए, 'भवि' जीवन बेरंग।।
*
राधा सोचे किसलिए, दुनिया का डर लाज।
उसके दिल पर एक बस, मोहन का ही राज।।
*
जीवन का 'भवि' देखिए, दर्शन बिल्कुल साफ़।
करनी अपनी भोगना, ईश करें क्यों माफ़।।
*
कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप।
सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
*
धूप सेंकना-रेडियो, चाय गप्प अख़बार।
मोबाइल में खो गया,जाने क्या-क्या यार।। 
*
कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप।
सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
*
कल जो मेरे साथ था, आज हुआ है दूर।
सच में होता वक़्त का, बड़ा अजब दस्तूर।।   
*
माना है सच्चा कथन, वक़्त बड़ा बलवान।
लेकिन हिम्मत हारना, कायर की पहचान।।
*
अंग्रेज़ों की चाल से, फैला ऐसा रोग।
भूले अपनी संस्कृति, हम भारत के लोग।।
*
संवत्सर से ‘भवि’ शुरू, अपना है नववर्ष।
एक जनवरी की धमक, है अंग्रेज़ी हर्ष।।
*
धन-दौलत की है नहीं, भवि मुझको दरकार।
सिर्फ़ प्रेम से प्रेम का, मिलता रहे उधार।।  
*
ऐसा भी क्या क्रोध में, कर जाना ‘भवि’ काम।
खा जाए जो ज़िंदगी, सारी इज़्ज़त-नाम।।
*
कर्मों पर ही चल रहा, 'भवि' सारा संसार।
थोथी बातों से नहीं, होगा बेड़ा पार।।
*
जिनकी गर्मी का कभी, दिल पर था 'भवि' राज।
उन रिश्तों की ठंड से, लहू जम रहा आज।।
*
सरदी लेकर आ गया, नया-नवेला साल।
फाल्गुन कहने आ रहा, खेलो रंग-गुलाल।।
*
काग़ज़-दिल  मेरा  लिए, कितने  ही जज़्बात।
कोई समझे तो कहूँ, 'भवि' मैं दिल की बात।।
*
दिल में ख़ुशियाँ चाहिए, जीवन में 'भवि' रंग।
बिना डोर के कब उड़ी, नभ में कहें पतंग।।
*
जीवन का हर स्वाद है, 'भवि' जिनसे आबाद।
भूल  रहे  क्यों आज हम, उन हाथों का स्वाद।।    
*
दुख सबको मिलते नहीं, मानें ईश-प्रसाद।
ईश-कृपा जो मानता, उसे न हो अवसाद।।
*
अट्टहास 'भवि' हर तरफ़, करता अत्याचार।
काँप  रही थर-थर धरा, ऐसी बहे बयार।।
*
लाख शोर झूठे करें, झूठा अब परिवेश।
सच की ख़ुश्बू से मगर, महकेगा ‘भवि’ देश।।
*
छुरे लिए भवि हाथ में, हुआ ज्ञान का अंत।
लाल रंग सरसों हुई, रोए आज वसंत।।
*
हावी बम-बंदूक है, ग़ायब केसर-सेब।
निगल गया कश्मीर को, आतंकी आसेब।।   
*
एक दिवस मत कीजिए, 'भवि' बेटी को याद।
प्रभु का यह वरदान ही, करती जग आबाद।।
*
घर के कोने में पड़ा, सिसक रहा ईमान।
सच में कितना गिर गया, इस युग में इंसान।।  
*
जीवित की चिंता नहीं, मुर्दों पर 'भवि' ध्यान।
करे तरक़्क़ी किस तरह, मेरा हिंंदुस्तान।।
*
ये जो मेरे नयन हैं, देखें नित घनश्याम।
'सावन की अंधी' कहो, या दो कोई नाम।।
*
करो निभाने का जतन, जब तक लेना साँस।
बचना तुम उससे मगर, रिश्ता जो हो फाँस।।
*
टूटा सपना जब जुड़े, दिल में भरे उमंग।
अगर ईश गुण तुम धरो, होगे मस्त मलंग।।  
*
सभी चाहते सुख मगर, दुखी सकल संसार।
क्यों 'भवि' ऐसा हो रहा, आओ करें विचार।।
*
बच्चे अपने आजकल, क्यों भूले आचार।
इस पर भी तो हम कभी, मिलकर करें विचार।।
*
आया 'भवि' संसार में, मानव अतिथि समान।
जीवन का है खेल कुल, चार दिनों की शान।।   
*
आदर चाहो तो सदा, सबको दो सम्मान।
बच्चो जीवन मंत्र यह, है कितना आसान।।   
*
बुरा समय सबसे बड़ा, जादूगर है मित्र।
यही बताता है हमें, सबका सही चरित्र।।
*
जीवन में दुख लाख हों, नहीं ईश को भूल।
कर्म-लगन-विश्वास से, समय बने अनुकूल।।
*
चुग़ली-निंदा के समय, रखें सदा यह ध्यान।
इसमें औरों का नहीं, अपना है नुक़सान।।
*
नाहक़ ही मन को दुखी, कर मत मेरे यार।
कलियुग में संभव नहीं, सतयुग वाला प्यार।।
*
टूटा धागा गाँठ से, जुड़ सकता है यार।
यदि टूटा विश्वास तो, रिश्ता बचे न प्यार।।
*
चैन-सुकूं की बात अब, करना है बेकार।
दिल पर तेरे इश्क़ का, छाया हुआ बुख़ार।।   
*
साँसें महकेंगी भला, कब तक होगा प्यार।
पीछे से कोई अगर, करे प्यार में वार।।
*
कुछ भी कर सकते नहींं, 'भवि' इसमें तुम यार।
अगर किसी के बस गया, दिल-दिमाग़ में प्यार।।
*
कितना ऊँचे तुम उठो, रहे सदा यह ध्यान।
तुमको 'भवि' तहज़ीब का, महकाना उद्यान।।
*
ख़ामोशी का कम नहींं, अपना रुतबा मित्र।
नज़रों की क्यों गुफ़्तगू, लगती तुम्हें विचित्र।।
*
अनुभव से मुझको मिला, 'भवि' यह जीवन ज्ञान।
धैर्य-भक्ति से आपको, मिल सकते भगवान।।
*
'भवि' अधीन दिल के हुए, रहे नहींं आज़ाद।
तुम्हीं कहो अब कुछ नई, कैसे हो ईजाद।।
*
प्रेम अमर यूँ ही नहीं, उनका है भरपूर।
कृष्ण-राधिका ने रखा,लज्जा का 'भवि' नूर।।  
*
भूल गया इंसान क्यों, नारी का सम्मान।
जिसके आगे ख़ुद रहे, नतमस्तक भगवान।।
*
कर्मों के अनुसार ही, न्याय ईश का जान।
तेरे कर्मों का सदा, फल देते भगवान।।
*
होली में हम क्यों पिएँ, अनायास भवि भंग।
जब टेसू के साथ है,दिल में तेरा रंग।।
*
सभी जानते थे मुझे, जब तक घर था गाँव।
किसको ‘भवि’ पहचानती, आख़िर शहरी छाँव।।
*
दिल से दिल के हैं जुड़े, जहाँ नहीं ‘भवि’ तार।
ऐसे रिश्तों में कभी, समय न कर बेकार।। 
*
गहने-कपड़े का उसे, बेशक है अरमान।
लेकिन पहले चाहती, हर नारी सम्मान।।
*
माना चहुँदिश गंदगी, यत्र-तत्र दुर्गंध।
जीवन में सत्कर्म की, रखिए व्याप्त सुगंध।।  
*
जीवन का सबसे सरल, यही एक है मंत्र ।
सबसे सम व्यवहार हो, सबके प्रति सम तंत्र।।
*
दुनिया में हर आदमी, उसे बनाता मित्र। 
धन से पहले जो सदा, देखे उच्च चरित्र।।
*
देखे इस संसार में, मानव रूप अनेक।
पर कोई दिखता नहीं, मुझको तुम सम नेक।।
*
जो डूबा उसने किया, अमृत का ‘भवि’ पान।
केवल उथला जो रहा, उसका किसको ध्यान।।
*
ख़ुद पर है विश्वास तो, रखिए यह विश्वास।
डोर प्रेम की दूर के, रिश्ते करती पास।।  १०१ 
*
कुछ और दोहे 
बेटी निर्धन बाप की,जबसे हुई जवान।
भूला है संसार वो,क्या सोचे पकवान।।
*
चाहे हो सौ साल की, या कोई नादान।
औरत केवल भोग का, होती है सामान।।
*
सबसे हँसकर भी ज़रा, मिला करो कम यार।
ठीक नहीं है आजकल, बहुत लुटाना प्यार।।
*
दर्पण जैसा मित्र हो, परछाईं सा मीत।
धर्मराह हो फिर स्वयं, होगी तेरी जीत।।
*
नाम रटो तुम ईश का, बेशक सुबहोशाम।
लेकिन सब बेकार है, बिना किए सद्काम।।
*
शुभकर्मों में ‘भवि’ सदा, रहते हैं जो हाथ।
पकड़े रहते हैं सदा, उन हाथों को नाथ।।
*
पावरफुल आशीष ही, मिलता उनके हाथ।
बच्चों किस्मत दे बदल, मात-पिता का साथ।।
*
घर बेशक चमका रही, झाड़ू सुबहो-शाम।
मन से कैसे साफ़ हो, द्वेष-बैर औ' काम।।
*
जीवन में चाहो अगर, रहो नहीं बदहाल।
ईश कृपा पर तुम सदा, रहना बस ख़ुशहाल।।
*
अक्षर मन का आईना, और भाव  दिल-जान।
लेखन को 'भवि' तू नहीं, काम समझ आसान।।
*
बस्तर सा सुंदर नहीं, ज़िला मगर ‘भवि’ काश।
ख़त्म वहाँ से हो सके, राजनीति का पाश।।
*
बूँद स्वाति की जिस तरह, ले लेती है सीप।
धारण कर लो ईश गुण,नहीं रहोगे चीप।।
*
चाटुकारिता से बड़ा, हुनर नहीं है आज।
मंच-पोस्ट ग्रुप हर जगह, भवि इसका ही राज।।
*
कापी जँच पाती नहीं, आ जाता परिणाम।
इम्तिहान क्या आजकल, ‘भवि’ क्या है अंजाम।।
*
तू चंदा मैं चाँदनी, पावन अपनी प्रीत।
ऐसे में दिल झूमता, पाकर तुमसा मीत।।
*
आन-बान की शान की, एक अलग पहचान।
परंपराओं की धरा, 'भवि' है राजस्थान।।
*