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शनिवार, 24 मार्च 2018

doha shatak basant sharma

ॐ 
दोहा शतक 
बसंत कुमार शर्मा










जन्म५.३.१९६६, धौलपुर, राजस्थान। 
आत्मज: श्रीमती कमला शर्मा-श्री दौलतराम शर्मा।
जीवन संगिनी: मंजरी शर्मा। 
शिक्षा: एम.कॉम.
संप्रति: उप मुख्य परिचालन प्रबंधक भारतीय रेल यातायात सेवा पश्चिम मध्य रेलवे जबलपुर। 
लेखन विधा: छंद, मुक्तक, गीत, दोहा, ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ। 
प्रकाशन: साझा काव्य संकलन उत्कर्ष १-२, गीतिका लोक, कुण्डलिनी लोक, अब तो, दोहा दर्पण, गीतिका है मनोरम सभी के लिए, मुक्तक मंजूषा, दोहा प्रसंग, तन दोहा मन मुक्तिका।    
संपर्क: ३६६/२ रेल अधिकारी  आवास, सिविल लाइन्स, जबलपुर म.प्र.  
चलभाष: ९४७९३५६७०२, ९७५२४१७९०७, ईमेल: basant5366@gmail.com
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दोहा शतक 
लेकर नाम गणेश का, मन में रख विश्वास। 
कर्म  करो सब   प्रेम से, पूरी होगी आस।। 
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गणपति का घर आगमन, देता है संदेश। 
विपदा होगीं दूर सब,  मिट जायेंगे क्लेश।। 
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देवों  के  भी  देवता,  पूजित  प्रथम गणेश। 
ऋद्धि-सिद्धि के साथ प्रभु, घर में करो प्रवेश।। 
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घर-आँगन में सज रहा, माता का दरबार। 
दुर्गा  माँ  की  भक्ति में, आनंदित संसार।। 
*
छुए न मन को छल कपट, जब तक तन में जान। 
देना   मातु  सरस्वती,   मुझको  यह  वरदान।। 
मानवता  संसार से,  हो न कभी भी लुप्त। 
आकर मातु जगाइए, पड़े हुए  सब सुप्त।। 
*
खुला  हुआ   सबके  लिए,  भोले का दरबार। 

रोक-टोक कुछ भी नहीं, मिलता सबको प्यार।। 
*
कान्हा  तेरी   बाँसुरी,  लेती मन को मोह। 
मधुर-मधुर आरोह है, मधुर-मधुर अवरोह।। 
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कुछ तो जादू कर रही, मुरली की धुन खास। 
गाय  रँभाती  जा रही,  मनमोहन के पास।। 
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राजमहल भी तज दिया, छोड़े भोग-विलास। 
मीरा  होकर  बावरी, चली  कृष्ण के पास।।   
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सरहद  पर रहता खड़ा, लिये हथेली जान। 
ऐसे वीर जवान पर, क्यों न करें अभिमान।। 
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न्योछावर तन-मन किया, किया न कोई शोक। 
ऐसे  वीर  जवान  को,  मेरी  शत-शत ढोक।। 
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सुख में दुख में हर जगह, आ जाता है काम। 
हे आँसू! तू धन्य  है, मेरा तुझे सलाम।। 
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जो था दर  दर घूमता, करवाने सब काज। 
दर्शन दुर्लभ  हो गये, उस  नेता के आज।। 
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नेता  भाषण दे  रहे, भूखे  मरें  किसान। 
उनके घर रोटी नहीं, इनके घर पकवान।। 
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दे गरीब रिश्वत यहाँ, काट-काट कर पेट। 
नेता-अफसर  के सतत, बढ़ते जाते रेट।। 
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भरें  तिजोरी  रात  दिन, लगे हुए हैं रोग। 
नहीं भरोसा आज का, कल को जोड़ें लोग।। 
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सावन सूखा ही गया, हुई नहीं बरसात। 
खेतों में  पीले पड़े, कोमल-हरियल पात।। 
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लिखो छंद दोहा भजन, गजल कथा नवगीत। 
शेर -शायरी  कुण्डली,  रचो बढ़ाओ प्रीत।। 
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पानी  को तरसे कभी, कभी न मिलती धूप। 
जिन्दा है पीपल मगर, बिगड़ गया है रूप।।    
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बुद्ध यहाँ  पैदा हुए, मिला यहीं पर ज्ञान। 
नाहक उनके  देश में, लड़ते हैं इंसान।। 
*
जाति-धर्म के नाम पर, नेता  माँगें  वोट। 
चमचे भी कुछ जुगत कर, कमा रहे हैं नोट।। 
*
सदा सत्य पकड़े  रहो, है यह सच्चा मीत। 
झूठ  हमेशा  हारता,  होती  सच की जीत।। 
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हँसते-हँसते कीजिये, आप अतिथि सत्कार। 
छोटी सी मुस्कान भी, देती  ख़ुशी  अपार।। 
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तन से श्रम करते रहो, मन को रखो फ़क़ीर। 
आती अच्छी नींद फिर, रहता स्वस्थ  शरीर।। 
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आओ हम सब खोल लें, बंद हृदय के द्वार। 
आर-पार बहती  रहे, शीतल प्रेम बयार।। 
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सदाचार सद्भावना, मानवता का मूल। 
आदत इसे बनाइये,  खिलें प्रेम  के फूल।। 
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स्नेह-प्रेम, सद्भाव  का, सस्ता-सरल उपाय। 
आओ! सब मिल-बैठकर, पी लें कॉफ़ी-चाय।।  
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मन से मन जब मिल गया, मिला हाथ से हाथ। 
एक दूसरे का हुआ, जीवन भर का साथ।। 
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होतीं  सबसे गल्तियाँ,  तुरत कीजिये माफ़। 
मान  बढ़ेगा  आपका, हृदय रहेगा साफ़।। 
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खुशियाँ सब तुझको मिलें, मिले न कोई पीर। 
मेरे  नयनों   से  बहे,  तेरे   दुख  का नीर।। 
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भीड़-भाड़ है सड़क पर, लगा हुआ है जाम। 
गाँव छोड़कर शहर में, मिला किसे आराम।।  
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जाने कैसे  हो  गये,  हरियाणा के जाट। 
पूरे भारत देश की, खड़ी कर रहे खाट।। 
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आरक्षण की आग में,  झुलस रहा है देश। 
नेताओं  के हैं मजे,  कलुषित  है  परिवेश।। 
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जो भी  देखो कर रहा,  रेलों का नुकसान। 
जाट कभी गुर्जर कभी, कभी पटेल महान।। 
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फसल कटी पैसा मिला, नहीं बचा कुछ काम। 
जाटों ने मिलकर किया, सबका चक्का जाम।। 
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पिद्दी सा यह देश है, जिद्दी पाकिस्तान। 
कब तक झेलेगा इसे, चुप रह हिंदुस्तान।। 
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पाक सुधर सकता नहीं, कर लो कितनी बात। 
बातचीत  को   छोड़कर, अब मारो दो लात।। 
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मैदानों में जीत है, टेबल पर है हार। 
हमें समझ आई नहीं, अपनी ही सरकार।।  
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सारी दुख तकलीफ का, मिला हमें उपचार।   
सुमिरन गुरुवर का किया, दिल में बारंबार।। 
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तरसें महलों बीच हम, दिखती कहीं न धूप। 
शुद्ध हवा भी खो गयी, लुप्त हुए जलकूप।। 
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लालबहादुर  ने  किया, सबसे शुभ आह्वान। 
इज्जत मिले किसान को, वीरों को सम्मान।। 
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सरकारी परियोजना, बस कागज़ का फूल। 
दिखने में अच्छी लगे, झोंक आँख में धूल।। 
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जाति-धर्म-दल हो गये, नेता के हथियार। 
भोली जनता पर करें, मिलकर खूब प्रहार।। 
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वे तो सोए चैन से, सुनी नहीं फरियाद। 
हम ही तड़पे रात भर, कर-कर उनकी याद।। 
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यहाँ -वहाँ  पर बन गईं, पत्थर की दीवार। 
कच्चे आँगन जो मिला, था अदभुत वह प्यार।। 
करवा चौथ मनाइए, पत्नी जी के साथ। 
जीवन भर मत छोड़िये, पकड़ा है जो हाथ।। 
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घर पर जल्दी आइये, पूरा कर सब काम। 
मिले नहीं पतिदेव बिन, पत्नी को आराम।। 
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चाँद निरखता चाँद को, मधुर सुहानी रात। 
पति की पूजा रोज हो, बन जाए फिर बात।। 
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करक चतुर्थी में मिला, पति जी को सम्मान। 
फूले-फूले फिर रहे,  प्यार चढ़ा परवान।। 
*    
सबको मिले न एक सा, सावन जी का प्यार। 
धरती प्यासी  है कहीं,   कहीं  मूसलाधार।। 
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हरियाली  करने  लगी, धरती का श्रृंगार। 
श्रावण जैसा मास कब, आता बारंबार।। 
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कुहू -कुहू  कोयल करे, वन में नाचे मोर। 
जियरा ये धक-धक करे, कहाँ छिपा चितचोर।। 
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तितली-भँवरे खुश हुए, मन में सजी उमंग। 
कलियों को भाने लगा, अब भँवरों का संग।। 
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बहुत दिनों के बाद में, निकली है कुछ धूप। 
बैठ लॉन में पीजिए, गरम टमाटर सूप।।   
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घंटी बजती द्वार पर, जाकर खोले कौन?
ओढ़ रजाई खाट पर, पड़े हुए सब मौन।। 
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पंछी कोटर छोड़कर, निकले बाहर आज। 
छूना है आकाश को, है बुलंद परवाज।। 
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बौर आम  पर छा रहा, आया है मधुमास। 
मौसम है ये प्रीति का, दिला रहा अहसास।। 
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वासंती मौसम हुआ, फूल बिखेरें रंग। 
चलो बाग़ में घूम लें, आप-स्वप्न-हम संग।। 
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बड़े-बड़े जो देश हैं, डाल रहे हैं फूट। 
हथियारों को बेचकर, मचा रहे हैं लूट।। 
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हर घर में दीपक जले, अंधकार हो नष्ट। 
खुशहाली से दूर हों, जनता के सब कष्ट।।   
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चार चरण दो पंक्तियाँ, मात्राएँ चौबीस। 
तेरह-ग्यारह बाद यति, दोहा लिखो नफीस।। 
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भारत की संसद हुई, है सब्जी-बाजार। 
हर दिन बेहद शोरगुल, कान पक गये यार।। 
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लोकतंत्र को कर  रहे, नेतागण बदनाम। 
भत्ते-वेतन अत्यधिक, करें न कोई काम।। 
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संसद करते ठप्प मिल, मचा-मचा कर शोर। 
खुद के अंदर झाँक लें, मिल जाएगा चोर।। 
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धीरे-धीरे उम्र  के, बीते बरस पचास। 
झोली खुशियों से भरी, मन में है उल्लास।।    
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दुनिया में मिलता रहा, मुझे सभी का प्यार।
जीवन के सपने सभी, आज हुए साकार।। 
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स्वतंत्रता के नाम पर, मत करिये विद्रोह। 
इतना भी अच्छा नहीं, आतंकी से मोह।। 
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पढ़ने-लिखने हित खुला, सरकारी संस्थान। 
हाय! वहीं पर हो रहा, भारत का अपमान।। 
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गर्म हवाएँ कर रहीं, सबका मन बेचैन। 
हरियाली को देखने, तरस रहे हैं नैन।। 
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भले आज हम हो गए, कम्प्यूटर में दक्ष। 
मगर देश में जल बिना, सूख रहे हैं वृक्ष।। 
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जगह-जगह पर दिख रहे, तरबूजे के ढेर। 
गर्मी से राहत मिले, बीस रुपैया सेर।। 
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सबसे बढ़िया पीजिए, गन्ने जी का जूस।   
कम पैसे में कीजिए, हँस राहत महसूस।। 
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कोल्ड ड्रिंक मत पीजिये, होती  है बेकार। 
मीठी लस्सी में  मिले, अपनों जैसा प्यार।। 
*
जब अनार देने लगा, निज मूँछों पर ताव। 
मौसम्मी के चढ़ गए, आसमान पर भाव।। 
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लीची जी कहने लगीं, तू मुझसे रह दूर। 
तेरे बस का कुछ नहीं, तू ठहरा मजदूर।।   
*
पंछी सब गायब हुए, नहीं घोंसले आज। 
सुबह-सुबह करती नहीं, गौरैया आवाज।। 
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स्वागत करना अतिथि का, रही हमारी रीत। 
कितना भी अनजान हो, हो जाती है प्रीत।। 
*
नहीं किसी का टिक सका, जग में कभी गरूर। 
लाखों के मालिक यहाँ, हो जाते मजदूर।। 
*
पूर्ण समर्पण से करो, चाहे जो हो काम। 
मिले सफलता आपको, हो जग में यश-नाम।। 
*
बिना त्याग होते नहीं,  हैं रिश्ते मजबूत। 
जहाँ त्याग की भावना, होता प्रेम अकूत।। 
*
दौलत से जो  पा रहे, दुनिया में सम्मान। 
जैसे ही दौलत गयी,  झेलें फिर अपमान।। 
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आप कभी मत मानिए, उल्टे-सीधे तर्क। 
मेहनत निष्ठा लगन से, करते रहिये वर्क।। 
*
देश छोड़कर जा रहीं, क्यों प्रतिभाएँ आज?
कुछ तो गड़बड़ है यहाँ, जो इतनीं नाराज।।  
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सारी दुनिया कर रही, अब भारत का योग। 
सबका तन मन स्वस्थ हो, हर्षित हों सब लोग।। 
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करी प्राणायाम हँस, नित अनुलोम-विलोम |
स्वस्थ रहेंगे फेफड़े, उच्चारो यदि ओम।। 
खेती जो आतंक की, करता है दिन-रात। 
हाय वकालत कर रहा, चीन उसी की तात।। 
*
बहुत दिनों के बाद में, हुई आज बरसात। 
प्रमुदित पौधों के हुए, आज प्रफुल्लित गात।। 
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बारिश से सड़कें धुलीं, गायब सारी धूल। 
नव उमंग लेकर खिले, आस-पास में फूल।। 
*
रामू  हरिया खेत में, बैठे  मौन-उदास। 
सूखा गया आषाढ़ तो, अब सावन से आस।। 
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सावन नाचा झूमकर, मचा रहा उत्पात। 
गाँव-शहर में बाढ़ से, बिगड़ रहे हालात।। 
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नालों के भी आजकल, बढ़े हुए हैं भाव। 
जबरन घर  में घुस हमें, दिखा रहे हैं ताव।। 
*
पहली-पहली जब हुई, मौसम की बरसात। 
भीषण गर्मी से मिली, थोड़ी बहुत निजात।।  
*
आज घटाएँ कर रहीं, पानी की बौछार। 
तपती धरती को मिला, आसमान का प्यार।।  
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हिरन मरा, नर भी मरे, मौन रहा कानून। 
बरी सदा  होते रहे, जो थे अफलातून।। 
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सोच-समझकर बोलना, बोलो जो भी बोल। 
कभी-कभी बिन बात के, खुल जाती है पोल।। 
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सड़कों पर बरसात का, जमकर हुआ प्रहार। 
चाँदी ठेकेदार की, खूब हुई इस बार।।   
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माँग भरेगा वह तभी, जब पूरी हो माँग। 

पूरी करो न माँग अब, तोड़ो उसकी टाँग।। 
*
देश-विदेशों में बढ़ा, भारत का सम्मान। 
सकल विश्व अब कर रहा, भारत का गुणगान।। 
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सदा रही है एकता, भारत की पहचान। 
जाति-धर्म-दल बाद में, पहले हम इंसान।।   
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राष्ट्रभक्ति जिसके हृदय, बसती है हर वक्त। 
कहने  में संकोच क्या, हम हैं उसके भक्त।।१०१  
*
कुछ और दोहे 
जो भी हो जिसका, रहे, मेरे तो प्रभु राम
उनके ही  सानिध्य में, मिला चैन आराम
जगह जगह जाकर किया, सबका ही उद्धार
सबके  प्रभु  श्री  राम  हैं, मानवता का सार
मन में सुमिरन जो करे, एक बार बस राम
छोटा हो या फिर बड़ा, बन जाता हर काम
जब  भी पृथ्वी पर बढ़ा, दानव अत्याचार
धनुष वाण ले राम ने, किया असुर संहार
बात पते  की  है यही, करना सदा यकीन
सुख ने आ दुख से कहा, मैं हूँ तुझमें लीन
बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष (११.५.१७)
सदा शांति मन में रखो,  होना कभी न क्रुद्ध |
मध्य मार्ग को खोज लो, करो कभी मत युद्ध ||
राग   द्वेष  छूटे  सभी,  और हुआ मन शुद्ध |
त्यागे सुख, दुख देखकर, तब कहलाये बुद्ध ||
परमारथ  करते रहो, इसमें ख़ुशी अपार |
केवल खुद के ही लिए, जीना है बेकार ||
हरियाली का दिन मना, वृक्ष लगाकर आज
कागज़ मत बर्बाद कर, रख धरती की लाज
नारों  में मत उलझिए, करते रहिये काम |
मानव केवल कर्म से, पाता जग में नाम ||
धूल और कालिख उड़े, सड़कें रहतीं जाम |
गाँव छोड़ कर शहर में, रहती मस्त अवाम ||
हर आँगन में पेड़ हो, हर आँगन में गाय |
स्वच्छ रहे पर्यावरण, बड़ा सटीक उपाय ||
गौ माता का जो रखे, अपने घर में ध्यान |
दूध-दही खाकर सदा, स्वस्थ रहे इंसान ||
जन जन के संघर्ष को, जिसने दी आवाज |
ऐसे वीर सुभाष पर, है हम सबको नाज ||
भाषाएँ हैं अनगिनत, तरह तरह के वेश
हिंदी  बिंदी  के बिना, सूना  भारत देश
हिंदी भाषा का करें, हम सब मिल उत्थान
काम काज के साथ में, दिल से हो सम्मान
संसद में  होने लगी, हिंदी  में कुछ बात
निश्चित ही अब एक दिन, सुधरेंगे हालात
गूगल इनपुट टूल से, लिखना अब आसान
हिंदी  छायी  नेट पर,  भारत  की है शान
जर्मन  रूस  अमेरिका, चीन और जापान
निज भाषा में ही हुआ, इन सबका उत्थान
हिंदी  में  होने  लगे, हर सरकारी काज
करे राजभाषा सदा, सबके दिल पर राज
बनकर अर्जुन युद्ध कर, है यह कार्य पवित्र |
स्थापित  कर धर्म को, ज्यादा सोच न मित्र ||
विचलित मत  हो कर्म से,  है यह तेरा धर्म |
फल ईश्वर के हाथ है, सखा समझ यह मर्म ||
अविनाशी  आत्मा सदा, छोड़ो जग का मोह |
होना  ही है एक दिन, सबसे  यहाँ विछोह ||
चलना  सच के मार्ग  पर, निश्चित होगी  जीत |
थोड़ा सा बस धैर्य रख, विचलित मत हो मीत ||
जीवन भर सहती रही, सड़क हमारा भार |
बदले  में हमने दिए,  गड्ढों के उपहार ||
बादल  गरजे  तो  बहुत,  हुई नहीं बरसात |
आसमान सुनता कहाँ, धरती की कुछ बात ||
मीठी  है,  तीखी कभी, अंदर तक है मार |
मुझको तो अदभुत लगा, दोहों का संसार ||
तपे पतीला आँच पर, चमचा चमचम खाय |
अन्न  उगाता है कृषक, आढतिया ले जाय ||
बगुले   बैठे   घेरकर, हर नदिया  का तीर |
किसने समझी है यहाँ, मछली मन की पीर ||
दीपावली
लक्ष्मी जी का आगमन, लाया हर्ष अपार  ||
विघ्न हरण गणपति करें, आकर सबके द्वार  |
आँगन  में   रंगोलिया, सजते तोरण  द्वार |
गुझियाँ लेकर आ गया, दीपों का त्यौहार ||
लड़ियाँ मिलकर सड़क पर, जमा रहीं हैं रंग ||
नाच  रही  है  फुलझड़ी, प्रिय अनार के संग |
आग  लगी जब पूँछ में, दौड़ चला रॉकेट |
कर लेगा वह आज ही, आसमान से भेट ||
कठिन नहीं कुछ भी यहाँ, सबसे करे अपील |
लिए  आग  को पेट में,  उड़ती  है  कंदील ||
मना  रहे  दीपावली,   जगमग  है संसार |
मिटटी की खुशबू लिए, आये दीप हजार ||
नए  नए  कपड़े  पहन, सखी सहेली संग |
बाल टोलियाँ नाचती, दिल में लिए उमंग ||
सूरज जा कर छुप गया, चंदा भी न समीप |
अंधकार  से  लड़  रहे,  छोटे छोटे दीप ||
विपदाएँ आयीं नहीं, कभी हमारे गाँव |
माँ के आँचल की रही, सबके सिर पर छाँव ||
पंछी बन  उड़ते रहो, खुला हुआ आकाश |
अपने पंखों पर सदा, रखो अटल विश्वास ||
खोलो मन की खिड़कियाँ, और हृदय के द्वार |
आर-पार  बहती  रहे,   शीतल  प्रेम बयार ||
आगे हाथ बढ़ा दिया, दिल में रखकर प्यार |
अपना सा लगने लगा, मुझको  ये संसार ||
औरों की खातिर जिये, बाँटे सबको प्यार
यादों  में रखता  सदा, उसको  ये संसार
आज सुबह जब मिल गया, खत का उन्हें जबाब |
कली  कली दिल की खिली, मुखड़ा हुआ गुलाब ||
पथराये  से हैं  नयन,  होठों पर है प्यास |
फिर भी ये मौसम लगे, जाने क्यों मधुमास ||
यादों  के बादल घने, मन है बहुत उदास |
दूर हुआ मुझसे बहुत, फिर भी लगता पास ||
दुनिया  मुझको चाहती, प्यारा यह अहसास |
लेकिन तू  मुझको लगे, अपनों में भी खास ||
खुशियों  का होता रहा, थोड़ा सा आभास |
लेकिन तेरे  बिन लगा, जीवन ये वनवास ||
सुबह हुआ जब सूर्य के, आने का ऐलान |
कलियों की पलकें खुली, लिए अधर मुस्कान ||
कलियों ने भिजवा दिया, भँवरों को पैगाम |
गाँव   हमारे आइये, दिल को अपने थाम ||
पुलकित तन, मन है मुदित, अरुणिम हुए कपोल |
चली सजनियाँ  द्वार पर,  सुन  कागा  के बोल ||
पुष्पों की मधुरिम महक, और पिया का ध्यान |
मन को घायल कर रही, मधुर मधुर मुस्कान ||
प्रीतम  से  नजरें  मिली, आई  थोड़ी  लाज |
भाव-भंगिमा कह गयी, सब कुछ बिन आवाज ||
गागर में सागर भरें, मन को कर दें तृप्त |
बूढ़े  बच्चे  सब रहे, इन दोहों के भक्त ||
थोड़े दिन ही रह सका,  मौसम यहाँ हसीन |
ऋतु बसंत के बाद में, जमकर तपी जमीन ||
मौसम का कश्मीर में, कैसा है बदलाव |
पुष्पनगर में  दे रहे, शूल मूँछ पर ताव ||
खत्म कभी होते नहीं, घात और प्रतिघात |
प्रेम और  बस प्रेम  से, बदलेंगे  हालात ||
मत से था मतलब कभी, मत पाकर अब मस्त |
मत देकर कुछ माँग मत, साहब जी हैं व्यस्त ||
इतना भी क्या दे रहे, अब मूंछों पर ताव
थोड़ा सा तो दीजिये, प्रेम-भाव को भाव
कुछ सोने में व्यस्त हैं, कुछ सोने में मस्त |
तुम सोना चाहो अगर, रहो कर्म में व्यस्त ||
धूप छाँव  बरसात  के, करे प्रकट उदगार |
नोंक जरा सी कलम की, सहती कितना भार ||
जयचंदों ने देश का, किया बहुत नुकसान
अब गौरी ही एक दिन, लेगा उनके प्रान
जिसने तपती रेत पर, बना दिए पदचाप |
निश्चय वह संसार मे, पाता सदा प्रताप ||
कौओं जैसी बोलियाँ, साँपों जैसी चाल |
करते भारत देश में, नेता रोज बवाल ||
पले हुए हैं देश में, तरह  तरह के नाग |
गिरगिट जैसे रंग हैं, रोज उगलते आग ||
आज  हमारे  देश  में, हों  न अगर  जयचंद |
कभी न कुछ भी कर सकें, दुश्मन के छल छंद ||
कथनी करनी हो सदा, भीतर बाहर एक |
ढूंढें से मिलते नहीं,  बन्दे  ऐसे  नेक ||
जरा जरा सी बात पर, मचता यहाँ बबाल |
नाजुक बंधन प्यार का, रखिये इसे सँभाल ||
सत्य  अहिंसा  अपरिग्रह,  ब्रह्मचर्य अस्तेय |
पालन करना हर नियम, हो जीवन का ध्येय ||
रिश्तों  में जब प्रेम का, हो न कभी रविवार |
सुख-दुख बाँटे मिल सभी, तब बनता परिवार ||
यादों  के सपने लिए, आये पास कपोत |
जगा गए मेरे हृदय, पुनः प्रीत की जोत ||
बगिया  में  खिलने लगे, रंग बिरंगे रोज |
मिल जाता हमको सुबह, रोज प्रेम का डोज ||
हिंदी भाषा सा कहाँ, सरल सुगम साहित्य |
भाषाओँ  के गगन  में, हिंदी है आदित्य ||
ज्ञान और विज्ञान का, हो हिंदी में शोध |
एक राष्ट्र अवधारणा, का है इसमें बोध ||
जन गण की बोली यही, यही राष्ट्र की शान |
दे  हर  भाषा को जगह, हिंदी हुई महान ||
हों चाहे कितने कठिन, दुनिया में हालात |
अगर प्रेम से बात हो, बन जाती हर बात ||
इक बबूल के पेड़ पर, बसा बया का गाँव
भरी  दोपहर  में मिले, उसको ठंडी छाँव
सर्दी, गर्मी,  बारिशें,  हो आँधी तूफ़ान
रहे बया का घोंसला, हरदम सीना तान
फल का राजा आम है, मँहगा उसका दाम |
आम  आदमी   दूर से, देख रहा है आम ||
फूलों  से  कुर्सी  सजी, साहब जी की रोज |
जन गण को मिलते रहे, बस काँटों के डोज ||
मर जाता रावण अगर, सब के मन का आज
हो जाता  फिर  देश में, रामचन्द्र  का राज
रोज  हुआ  सीता हरण, प्रति दिन अत्याचार
रावण ने पल पल किया, छल का ही व्यापार
कल की चिंता मत करो, कल होता बेकार
आज हमारे  हाथ में,  जी लो उसको यार  
चाँद दूज का दे गया, हमको ये सन्देश
छोटे बनकर के रहो, पूजें  लोग विशेष
भोगों  ने बांटा सदा, और  दिए हैं रोग |
कला जोड़ने की  हमें, सिखलाता है योग ||
देश  विदेशों में बढ़ी,  आज योग की शान |
सारे  रोगों का मिला, सबको मुफ्त निदान ||
राजा  रंक  फ़क़ीर  को, दिखलाई  तस्वीर |
जो देखा वह लिख गए, अद्भुत संत कबीर ||
पंछी को  मिलतीं  कहाँ, आज पेड़ की छाँव |
दे न अतिथि की सूचना, अब कौवे की काँव ||
खून एक  इंसान का, क्यूँ करते हो फर्क |
यही फर्क तो कर रहा, सबका बेड़ा गर्क ||
नहीं किसी का टिक सका, जग में कभी गरूर
लाखों के मालिक  यहाँ,  हो  जाते  मजदूर
भरी दुपहरी  झेलता, सिर पर धूप बबूल |
काँटों के सँग खिल रहे, सुंदर सुंदर फूल ||
गर्मी से व्याकुल सभी, बालक और अधेड़ |
मजे धूप  के ले रहा, अमलतास का पेड़ ||
अमलतास से मिल रहा, सबको आज सुकून |
मौसम  वासंती  हुआ, भले  माह  है जून ||
अमलतास ने कर दिया, धरती का श्रंगार |
बादल सजकर हो रहे, मिलने को तैयार ||
आँगन में झूला सजा, मन में सजी उमंग |
कर के तेरी याद पिय, फरकत हैं सब अंग ||
रोम रोम पुलकित करे, ठंडी पड़े फुहार |
पर साजन तेरे बिना,  सूना  है संसार ||

चित्र अलंकार: "ध्वज"

अभिनव प्रयास:
चित्र अलंकार "ध्वज" 

-
मन 
कहता
जो, बात सुनो.
आगे बढ़ो, बढ़ो आगे.
जाग, उठो, पग धरो धरा पर
गिर-उठ, सँभल न रुक-चुक-थक
हिकमत कर, कुछ कदम नवल रख
पग-पग चल, कर में रख कर
भाग - दौडो, कूदो - फाँदो,
हर बाधा को पार करो.
हर मौसम में
खिल
फूलों
सम,
धरा
हरी
कर,
हरे
रहो.
खुद
मत
लड़ो,
बढ़ो
आगे
आगे बढ़ो, बढ़ो आगे.
कर प्रयास तो मिले सफलता
मिले न तो फिर, कुछ साहस कर.
अपने नहीं सभी के हित में मंजिल पा
नव मंजिल वर, जीत न रुको, चलो आगे.
आगे बढ़ो, न थक रुक चुक, आगे बढ़ो, बढ़ो आगे.
***
२४.३.२०१८
प्रेषक:
संजीव वर्मा 'सलिल'
विश्ववाणी हिंदी संस्थान'
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष: ७९९९५५९६१८, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

दोहा शतक प्रेम बिहारी मिश्र

ॐ 
दोहा सलिला 
प्रेम बिहारी मिश्र















आत्मज: स्व. श्रीमती नन्ही मिश्र- स्व. श्री कैलाश बिहारी मिश्र।
जीवन संगिनी: श्रीमती सुलेखा मिश्र।
जन्म: १३ दिसंबर १९४६, ग्वालियर (म.प्र.)।
संप्रति: सहायक निदेशक, सीमा सुरक्षा बल (सेवा-निवृत्त), संस्थापक-संचालक दिल्ली कविता मंडल, महासचिव सुख-दुख के साथी, संयुक्त सचिव द्वारका फोरम, सदस्य सीनियर सिटीजन एसोसिएशन।
लेखनविधाएँ : कविता, गीत, ग़ज़ल, गीतिका, छन्द, मुक्तक, दोहा, माहिया, हाइकू, क्षणिकाएं, कविता।
प्रकाशन: एक मुक्तक संग्रह, आठ साझा काव्य संकलनों, एवं पत्र-पत्रिकाओं में।
प्रसारण: दूरदर्शन सहित तीन टी.वी. चैनलों एवं द्वारका-रेडियो पर कविताएँ/वार्ता/साक्षात्कार प्रसारित।
संपर्क: सी-५०१, चित्रकूट अपार्टमेंट्स, प्लाट न. ९, सेक्टर-२२, द्वारका, नई दिल्ली -११००७७।
दूरभाष:  ०९७१८६५१९, ई-मेल: pbmishra.bsf@gmail.com।

*

दोहा सलिला

वंदन वीणावादिनी, भर दो मन सुविचार।
करें निराशा दूर सब, पग-पग बाँटें प्यार।।
*
कर दो जगमग शारदे, शब्दों का संसार।
प्रज्ञा दो उज्ज्वल हमें, भावों में रसधार।।
*
तनिक न चिंता नाम की, नहीं दाम से काम।
निश्छल मन की बात मैं, करता रहता आम।।
*
टूट रहे परिवार सब, प्रीति रही है छूट।
घर-घर में शकुनी बसे, पनप रही है फूट।।
*
समझाए समझे नहीं, बैठा कुमति चकोर।
करे कामना चाँद की, बैरी मन बरजोर।।
*
चना चबैना बाजरा, मक्का रोटी साग।
सब ग़रीब से छिन गया, हुआ अमीरी राग।।
*
बिजली की है रोशनी, घी का दिया न पास।
डी.जे. की है धूम अब, मंगल गीत उदास।।
*
कलियों के काँटे चुभे, तितली के मन फाँस।
भौरों की आवाज नम, भरते गहरी साँस।।
*
दीन-धर्म पैसा यहाँ, पैसा ही है प्यार।
अमराई छूटी यहाँ, नकली मिले बयार।।
*
काट-काटकर पेड़ सब, सजा लिए घर-बार। 
खेत हटे जंगल घटे, सहें प्रकृति की मार।।
*
पर्वत को जो तोड़ता, रहा वृक्ष को चीर।
अपने हाथों फोड़ता, अपनी ही तक़दीर।।
*
जीवन देते वृक्ष जो, कैसा उनसे बैर।
उन्हें काट कर काटते, खुद अपने ही पैर।।
*
ज़हर हवा में घोलते, कैसा करते पाप।
गड्ढा ख़ुद ही खोदते, जिसमें गिरते आप।।
*
पेड़ गए पौधे गए, नहीं बरसता मेह।
साँसे लेकर विष भरी, भटक रही है देह।।
*
एसी कूलर लग गए, गई नीम की छाँव।
कंकरीट के वन बढे, निगल रहे हैं गाँव।।
*
मात-पिता में मानते, जब ईश्वर का रूप।
शूल फूल बनते तभी, शीतल लगती धूप।।
*
एक घनेरी छाँव है, मात-पिता का हाथ।
जब तक सिर पर है रखा, ईश्वर रहते साथ।।
*
तिनका बैठा अर्श पर, इतराता है खूब।
पंख दिए जिसने उसे, भूल गर्व में डूब।।
*
मात-पिता से दूर हो, कितना ख़ुश नादान।
उनका ही है अंश पर, बन जाता अन्जान।।
*
मात-पिता से भी बड़ा, सुख-वैभव है आज।
चरण वंदना तज रहे, सुत को आती लाज।।
*
फटे हुए जो पहन कर, तुझको देते ताज।
तेरी उतरन के लिए, तरस रहे वो आज।।
*
कुत्ते बिल्ली रख लिए, किन्तु न उनको ठौर।
जो तुमको देते रहे, अपने मुँह का कौर।।
*
भुला दिया उस कोख को, जन्मे जहाँ सपूत।
किसके होंगे मीत जो, बेचें शर्म कपूत।।
*
मात-पिता को छोड़कर, मत इतराएँ आप।
पत्ता टूटा पेड़ से, सूखे अपने आप।।
*
मान अतिथि को देवता, हुई पुरानी बात।
अब घर में आफत लगें, खुद के ही पित-मात।।
*
हर मंजिल आसां करे, वृद्ध जनों का प्यार।
मात-पिता की चरण रज, माथे का श्रृंगार।।
*
बने पखेरू उड़ गए, भूल गए निज धाम।
ढूँढ रहे हैं छाँव अब, बिना वृक्ष अविराम।।
*
हुई अमावस ज़िंदगी, चाँद गया परदेस।
दीपक रीता हो गया, मिला नहीं संदेस।।
*
चरखी-माँझे में भरे, जीवन के सब रंग।
मिली ज़रा सी ढील तो, अटकी तुरत पतंग।।
*
पूरब के सूरज गए, ऐसे पश्चिम दौड़।
लौट न पाए फिर कभी, चक्रव्यूह को तोड़।।
*
पंख मिले तो उड़ गए, नीड़ न रहे सम्हाल।
तिनका-तिनका जो गढ़ें , रीढ़ बिना बेहाल।।
*
पिता भाग्य को कोसते, अम्मा है बेहाल।
हवा कौन सी ले गई, घर से मेरा लाल।।
*
राखी ले बहिना सजी, छोड़-छाड़ सब काज।
छत से गिनती रह गई, कितने उड़े जहाज।।
*
चमक-दमक में खो गए, गोरी के भरतार।
सौतन पछुआ ने रचे, ऐसे स्वांग हज़ार।।
*
खुशियाँ पश्चिम को गईं, बचा नहीं कुछ और।
आँखों में आँसू बसे, मिला न किंचित ठौर।।
*
जीवन भर उड़ता रहा, छू न सका आकास।
ऋण धरती का भूल कर, कहाँ लगाई आस।।
*
भर आए जो बिन कहे, देख पराई पीर।
सागर से भी है बड़ा, उन नयनों का नीर।।
*
इधर-उधर भटका करूँ, किंतु न मिलती थाह।
मन-खेतों में नित उगें, तृष्णा, चिंता, आह।।
*
औरों की थाली दिखे, व्यंजन से भरपूर।
ऐसे जीव सदा रहें, सच्चे सुख से दूर।।
*
सुख-दुःख दोनों मीत हैं, आते-जाते  साथ।
अपनी-अपनी सोच है, किसका पकड़ें हाथ।।
*
अपने मन में मैल है, दे औरों को दोष।
अपना चश्मा साफ़ कर, हो उज्वलता-घोष।।
*
यदि तेरे मन पाप है, निश्चित है संताप।
जलता काला कोयला, बन अंगारा आप।।
*
बिना परिश्रम चाहते, सभी सुखों की खान।
ऐसे नर को क्या कहें, हैरत में भगवान।।
*
दमक रही ज्यों दामिनी, मन में मचा बवाल।
चमक रही त्यों चाँदनी, कैसा माया जाल।।
*
महल द-महले घर बड़े, व्यर्थ सभी बिन प्रीत।
तूने दुनिया जीत ली, जीत सके दिल जीत।।
*
अलग-अलग हर खेल की, अलग-अलग है रीत।
सब कुछ हारें प्यार में, इससे बड़ी न जीत।।
*
वे छत पर जो आ गए, नाच उठे सब मोर।
मावस पूनम हो गयी, मचा गली में शोर।।
*
हँस कर वे शर्मा गए, नैन हुए जब चार।
दृग में उतरी चाँदनी, बसा प्रणय संसार।।
*
चरखी पकड़े दिख गए, इंद्रधनुष के रंग।
पेच नैन के लड़ गए, पल में कटी पतंग।।
*
उतरी छत पर चाँदनी, चाँद खड़ा है संग।
मीठी-मीठी आग में, जलता सारा अंग।।
*
नूपुर नित्य सँवारती, थिरकें सारे अंग।
चपला चपल निहारती, मन में जगे अनंग।।
*
प्यार बना व्यापार अब, मिले न सच्चा नेह।
चातक प्यासा ही रहे, बरसे कितना मेह।।
*
मन बसते प्रभु आपके, आप नहीं कमज़ोर।
पहचानो बस स्वयं को, पा जाओगे ठौर।।
*
अपनी धरती छोड़ कर, ओढ़ रहे आकाश।
धन के धागे जोड़ कर, तोड़ रहे विश्वास।।
*
भूल गया ऋण जगत का, व्यर्थ न पूँजी जोड़।
भेष नाम भाषा तलक, यहीं मिले दे छोड़।।
*
दरवाजे से दर सटा, मगर नहीं पहचान।
आज पड़ोसी हो गए, अनजाने महमान।।
*
हाय! विदूषक हो गए, कविओं के सम्राट।
कुछ तो हैं बाज़ार-पटु, कुछ हैं चारण-भाट।।
*
दर्पण धुँधले हो गए, कुटिल जमी है धूल।
फलते रहते शूल अब, दुर्लभ गंधित फूल।।
*
बेटी घर की जान है, है अपना अभिमान।
त्याग तपस्या प्यार की, ईश्वर निर्मित खान।।
*
गर बेटी को कोसते, और लगें वे भार।
लक्ष्मी दुर्गा पूजना, बिल्कुल है बेकार।।
*
बाक़ी रिश्ते जगत में, धन-दौलत के मीत।
माँ है मूरत त्याग की, दूर करे भव-भीत।।
*
जिस नारी को कोस कर, बनता स्वयं महान।
उस नारी की कोख में, पलती तेरी जान।।
*
मन बैरी वाचाल है, जब-तब मारे डंक।
चाह बढ़ाए दस गुनी, ज्यों जीरो का अंक।।
*
अब तो बीच बजार में, बिकते नेता मोल।
काले धन के खेल में, बोली अपनी बोल।।
*
वोट मिलें अब नोट में, मेरा देश महान।
नेता बिकते नोट में, नोट बने भगवान।।
*
चलती ज्यूँ गज गामिनी, नाचे जैसे मोर।
आते-जाते बल पड़ें, कटि नदिया में घोर।।
*
वारिद कुंतल केश हैं, दामिन दृग वाचाल।
पर्वत-घाटी सब भरे, अंग-अंग भूचाल।।
*
जहँ-तहँ चपल निहारती, अधर धरे मुस्कान।
पग-पग पर भरमा रही, छोड़ नयन से बान।।
*
नागिन जैसी चाल है, अधर मदिर मुस्कान।
चल-फिर हँस घायल करें, आँखें तीर कमान।।
*
सत्य अहिंसा सो गए, भूल गए सब राम।
गाँधी टोपी बिक गई, दो कौड़ी के दाम।।
*
मैं छोटी सरिता भली, हरती सबकी प्यास।
सागर बनकर क्या करूँ, गरजे-तोड़े आस।।
*
मन मूरख वाचाल है, भरमा पाता त्रास।
ज्यों मृग छौना रेत में, करता जल की आस।।
*
रोटी दें जो जगत को, रोते वही किसान।
बच्चे बिलखें भूख से, देते अपनी जान।।
*
बादल सम यह मन बना, बहे हवा कर गेह। 
पानी हो बरसे वहीं, जहाँ मिल सके नेह।।
*
उजले कपड़े पहन कर, विषधर घूमें आज।
जनसेवक खुद को कहें, तनिक न आती लाज।।
*
मन यदि तेरे प्रीत है, फिर कैसी है भीत।
शक्ति छिपी वह प्रीत में, बने शत्रु भी मीत।।
*
पात-पात झर कर कहे, पतझर से कर प्यार। 
नव कोंपल का मिलेगा, वासंती उपहार।।
*
हुई दम्भ की दौड़ अब, और अहं की होड़।
सबसे प्रबल जुगाड़ है, बाक़ी बातें छोड़।।
*
जो देखो सो बुन रहा, मकड़ी जैसा जाल।
मानव खुद से खेलता, अब शतरंजी चाल।।
*
रिश्ते-नातों का हुआ, आज बुरा क्या हाल।
घर-घर शकुनी चल रहा, ज्यों चौसर की चाल।।
*
नई रोशनी खा गई,  आपस का विश्वास।
रिश्तों में है गाँठ अब, खोई सभी मिठास।।
*
धन की अंधी दौड़ में, रोगों का भंडार।
नफ़रत की है होड़ अब, प्यार पड़ा बेज़ार।।
*
स्वार्थ बड़ा भगवान से, बैठे हैं कर जोड़।
ऐसे जन को क्या कहें, रहे स्वयं को तोड़।।
*
घर में मंदिर है बड़ा, दिल में बैठा चोर।
मन प्रपंच का विष भरा, राम नाम का शोर।।
*
मंदिर के ठेके बिकें, पूजा है व्यापार।
कैसे-कैसे ठग यहाँ, बन बैठे अवतार।।
*
करें दलाली धर्म की, बढ़ा-बढ़ाकर केश।
लें धंधे के काम वे, गीता के संदेश।।
*
जो बोता जो काटता, रहता खस्ता हाल।
मण्डी भरें तिजोरियाँ, नेता मालामाल।।
*
इस जग को जो पालता, भरता पेट किसान।
खुद वह भूखा सो रहा, धरती का भगवान।।
*
कृषकों के उत्थान की, बनें योजना लाख।
बातें करते हैं बड़ी, मिली ख़ाक में साख।।
*
नील गगन में बैठकर, इतराता है चाँद।
झेल झमेले जगत के, झट भागेगा फाँद।।
*
पाल ईर्ष्या, छल-कपट, करे क्रोध से राग।  
कैसा पागल आदमी, जले लगाकर आग।।
*
मैं तो छोटा ही भला, बनूँ स्वाति की बूँद।
कहीं कीट मोती बने, पड़ा आँख जो मूँद।।
*
मानव का तो भाग्य है, कर्मों का ही दान।
कर्म करे सो जानता, जीवन का विज्ञान।।
*
शब्दकोष से अब हटे , शत्रु, धूर्त, मक्कार।
मार-काट धोखा-धड़ी, कपट, ठगी, व्यभिचार।।
*
मेल-जोल का बल गढ़ें, होली के औज़ार।
सबको उन्नति पथ मिले, खुले मिलें सब द्वार।।
*
अंत करें आतंक का, होली के अंगार।
ख़त्म न हों सुख के कभी, झोली में भंडार।।
*
होली में पूरा जले, आतंकी संसार।
बैर-भाव सब भूलकर, बढ़े आपसी प्यार।।
*
बम बनकर कर ख़त्म तू, दहशत का व्यापार।
तोप-तमंचों की जगह, प्यार बने हथियार।।
*
बड़ा पेड़-जड़ हो अगर, मिट्टी में कम हीन।
ज़रा तेज़ आँधी चले, मिट्टी में मिल दीन।।
*
माटी उड़ी जमीन से , जाऊँगी आकाश।
हो न सकी आकाश की, रहा न धरती-पाश।।
****

doha shatak rameshvar prasad sarasvat

ॐ 
दोहा शतक 
रामेश्वर प्रसाद सारस्वत 

















जन्म:   १-४-१९५४ सोंखखेड़ा, मथुरा उ॰प्र॰  
आत्मज: श्रीमती शांति देवी-श्री नत्थीलाल सारस्वत ।
जीवन संगिनी: श्रीमती वीणा सारस्वत । 
शिक्षा: बी॰एससी॰, बी॰वी॰एससी॰ एण्ड सी॰ए॰आई॰आई॰बी॰।
लेखन विधा: गीत, कविता, निबंध।
प्रकाशन:  नानी का गाँव बाल,  चटोरी चिड़िया,  काठ का घोड़ा,  छुटकी की चुटकी सभी बाल कविता-संग्रह ।  
उपलब्धि:  'विशिष्ट सम्मान' भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, समन्वय सृजन सम्मान- २०१० सहारनपुर, 
 बाल-वाटिका, भीलवाड़ा द्वारा कविता-संग्रह काठ का घोड़ा सम्मानित २०१४,  बाल साहित्यकार सम्मान २०१५ 
धरोहर स्मृति न्यास, बिजनौर, राष्ट्रीय जनकल्याण समिति भारत द्वारा विशिष्ट नागरिक सम्मान,
साहित्य वारिधी २००९-१०, दोहा शिरोमणि शारदामंच खटीमा, कल्याण सिंह बिष्ट स्मृति बाल साहित्य सम्मान २०१७, 
साहित्य सागर सम्मान २०१७।
संप्रति: परियोजना निदेषक, पंजाब नेशनल बैंक, शताब्दी ग्राम विकास न्यास, माटकी-झरौली, सहारनपुर उ॰प्र॰। 
संपर्क: १००-पंत विहार, सहारनपुर उ॰प्र॰। 
चलभाष: ९५५७८२८९५० , ईमेल:   rpsaraswat1454@gmail.com  ।
*

जहरीली नदियाँ हुईं, सिकुड़े जीवन सूत्र।
अमृतधारा थीं कभी, अब ढोतीं मल-मूत्र।।
*
लोभ-लालसा की कहाँ, सीमा है निर्दिष्ट।
जितना पाएँ कम पड़े, रहें अतृप्त अशिष्ट।।
*
सुजला सुफला श्यामला, शस्यों से भरपूर।
मानव दोहन में लगा, होकर मद में चूर।।
*
रौंद दिए जंगल सभी, नदियाँ लील-निचोड़।
मरघट तक ले आ गई, यह विकास की होड़।।
*
अंधाधुंध कटान से, चीरा माँ का वक्ष।
रुक पाएगा अब भला, क्यों अकाल दुर्भिक्ष।।
*
मानव करने में लगा, जीवन से खिलवाड़।
शामिल अंधी दौड़ में, ले विकास की आड़।।
*
खनन संपदा की मची, ऐसी लूट-खसोट।
औने-पौने बेच दी, ले खादी की ओट।।
*
तपती धरती पूछती, रह-रह यही सवाल।  
कब बरसोगे देवता, करने जगत निहाल।।
*
सनन-सनन लू चल रही, लगें थपेड़े खूब।
झुलसे तरु कुम्हला रहे, जली धरा की दूब।।
*
तप्त हवा सी लग रही, फैली चहुँ दिश रेत।
नहीं दिखाई पड़ रहे, जीवन के संकेत।।
*
भीषण गर्मी पड़ रही, भूजल हुआ विलुप्त।
इंद्रदेव किस लोक में, करें मंत्रणा गुप्त।।   
*
धूल भरी आँधी उठी, आए बादल झूम।
बिन बरसे जाते कहाँ, धूम-धाम से घूम।।
*
यमुना साँसें गिन रही, सिसक रही है गंग।
नहरें छल कर ले गयीं, सलिला-सलिल तरंग।।
*
अंधी दौड़ विकास की, मर्यादाएँ ध्वस्त।
कंकरीट के देश में, सब अपने में मस्त।।
*
जेठ तपे जितना प्रबल, लू, पछुआ के संग।
उतना सावन बरसकर, बिखराता है रंग।।
*
जेठ दुपहरी तप रही, बढ़ती दिन-दिन प्यास।
तरु की छाया ढूँढता, पंछी हुआ उदास।।
*
पूरा पोखर पी गया, कितना प्यासा जेठ।
फिर भी नजर तरेरता, तिरछी मूँछें ऐंठ।।
*
घूँट-घूँट को तरसते, परबस डंगर-ढोर।
बरखा बैरन लापता, दीखे ओर न छोर।।
*
कैसी है यह त्रासदी, या विधिना का खेल।
पानी के दिन फिर गए, बिकता ज्यों घी-तेल।।
*
कहाँ गईं वे बावड़ी, ठंडे जल की स्रोत।
ग्रसे गए किस शाप से, कुएँ-ताल पा मौत।। 
*
प्याऊ-पोखर गुम हुए, सूखे मन से लोग।
घर-चौराहे हर तरफ, लगा बिसलरी रोग।।
*
अच्छे दिन की बाट में, बीता कैसे साल।
निर्मोही मौसम हुआ, करता रोज धमाल।।
*
धूल भरी आँधी उठी, धरा रूप विकराल।
छप्पर-छानी उड़ गए, घर के बिगड़े हाल।।
*
जेठ दुपहरी तप रही, हर बरगद की छाँव।
कहो कौन सुलगा गया, जले गाँव के गाँव।।
*
मन के घोड़े दौड़ते, सरपट बिना लगाम।
नहीं किसी को सूझता, क्या बरखा क्या घाम।।  
*
पावस नाचे झूम के, पुरवा गाए गीत।
हरियाली धरती हुई, पा अंबर की प्रीत।।
*
चकाचौंध है हर तरफ, है दूधिया प्रकाश।
मनुआ अंधी दौड़ में, सीने में ले प्यास।।
*
राजनीति में हो रहे, कैसे-कैसे खेल।
मुलजिम छुट्टा घूमता, बेकसूर को जेल।।
*
संविधान में ही बचा, लोकतंत्र है आज।
सुप्रीमो ही कर रहे, अब जनगण पर राज।।
*
ऐसा मैंने कब कहा, रोज पलटते बोल।
करनी-कथनी में सदा, नेता रखते झोल।।
*
धुली-धुली सी लग रही, चूने से लबरेज।
शायद मंत्री की लगे, इसी सड़क पर मेज।।  
*
सच को सच कहना नहीं, करो झूठ बदनाम।
अब विपक्ष का रह गया, संसद में यह काम।।
*
हावी लॉकर पर हुआ, गणित बिठाता तंत्र।
सैंया लोभी मिल रचें, रोज नये षड़यन्त्र।।।।
*
खत जब सूरज ने लिखा, पुरवाई के नाम।
सुबह हँसी गुलदाउदी, बहका बेला शाम।।
*
सुबह सुरमई हो रही, और दूधिया शाम।
चुप-चुप मौसम दे रहा, प्यार भरा पैगाम।।
*
नैना झुक-झुक कर करें, खट्टी-मीठी बात।
प्रीति निगोड़ी ले उड़े, बिन ब्याहे जजबात।।
*
ताजे फूलों सी हँसी, चंदा जैसा बिंब।   
स्मृति तल में तैरता, उसका ही प्रतिबिंब।।
*
छूट गए अब गाँव के, तपते सुखद अलाव।
किस्से और कहानियों, का  पूर्ण अभाव।।
*
हमने तो इस दौर से, किया अजब अनुबंध।
उड़कर भी साधे रखा, धरती से संबंध।।
*
बिजली ने जब रूठकर, दिखलाए निज रंग।
हम भी फिर मन मार के, रहे चाँदनी-संग।।
*
आँखमिचौली खेलकर, बिजली सारी रात।
निंदिया को देती रही, पल-पल हँस शह-मात।।
*
देखा परखा है बहुत, हमने यह हर बार।
मन कब कहने में रहा, रहे सदा मन मार।।
*
पल-पल बूढ़ी हो रही, है बरगद की छाँव।
कहीं आस अटकी हुई, लौटेगा वह गाँव।।
*
पल-पल वह सहती रही, यादों का उन्माद।
दिल पर पत्थर रख लिया, भूली सब संवाद।।
*
गुलमोहर खुश हो रहा, फूला हरसिंगार।
बरगद पीपल नीम से, बतिया रही बयार।।
*
बाहर चल स्वीकारिए, कुदरत के उपहार।   
नया सवेरा कह रहा, खोलें मन के द्वार।।
*
नीम खड़ा बौरा रहा, सजे जमुन के पात।
जेठ हठीला दे रहा, बेमन ये सौगात।।
*
सुबह सुरमई हो रही, लगे सुहानी शाम।
मुई दुपहरी कटखनी, सब आराम हराम।।
*
बूँदा-बाँदी हो रही, उठती सौंधी गंध।
आसमान से जुड़ रहे, धरती के संबंध।।
*
बच्चे ने पाई नहीं, माँ के पय की गंध।
बोलो फिर कैसे जुड़े, नेह पगे संबंध।।
*
पानी का संकट विकट, गहराया दुष्काल।
चल कर फिर से खोजिए, नदियाँ-पोखर-ताल।।
*
नदी सूख काँटा हुई, रेत-लोटती नाव।
पानी के हैं लग रहे, अब मनमाने भाव।।
*
राजनीति के ताल में, घुटनों-घुटनों कीच।
फेंकू, पप्पू नाम दो, या फिर कह लो नीच।।
*
साम, दाम अरु दण्ड से, जीतो आज चुनाव।
जिसको जो भाए चलो, वही शकुनिया दाँव।।
*
शुचिता की बातें हुईं, करना आज फिजूल।
अब तो मात्र विपक्ष को, चटवाना है धूल।।
*
छल-बल हर दल में भरा, धन-बल भी भरपूर।
राजनीति में स्वच्छता, अब तो कोसों दूर।।
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तू मुझको नकटा कहे, मुझको तू है नीच।
हम दोनों ही पशु निरे, हमें सुहाती कीच।।
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राजनीति के पंक में, खुशी-खुशी जा लोट।
अच्छा-बुरा न सोच कुछ, हथिया जन का वोट।।
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किंचित भी देना नहीं, अब विपक्ष को एज।
फण्डा केवल एक ही, कर चुनाव मैनेज।।
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सर्दी में भी हँस रहे, ये गुलाब के फूल।
जो सब को प्रतिकूल है, इनको है अनुकूल।।
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सरसों शैशव काल में, होती ईख जवान।
गेहूँ तो हरिया रहे, बोरे में हैं धान।।
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गेंदे की पसरी हुई, है मदमाती गंध।
गुपचुप उसका हो गया, सुरज से अनुबंध।।
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जाड़ा आ सम्मुख खड़ा, ठोके अपनी ताल।
आग पकड़ने से डरे, अब कमजोर पुआल।।
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एक साथ कैसे सधैं, जीवन के संकेत।
इधर नदी दम तोड़ती, उधर सूखते खेत।।
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धीरे-धीरे हो रहा, है जड़ता का अंत।
अब सरसों के खेत मैं, कविता पढ़े बसंत।।
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पद्मावत को देखकर, मनवा हुआ अधीर।
बिना शीश लड़ते रहे, कहाँ गए वे वी।।
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एक निमष भूला नहीं, मुझको मेरा गाँव।
चल पड़ते उस ओर को, बरबस मन के पाँव।।
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उसकी भोर सुहावनी, मस्त सुरमई शाम।
गाँव हमारा स्वर्ग था, सब विधि सुख का धाम।।
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सदा रजाई में दिखे, बाहर दिखे न पाँव।
एक कोट-पतलून में, ढक जाता था गाँव।।
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समय सभी के पास था, सब थे मस्त मलंग।
गली-गली तब गाँव की, एक दूसरे संग।।
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लोभी मन गदगद हुआ, लख अलबेले ठाठ।
विस्मृत करने में लगा, बचपन का हर पाठ।।
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माँ की ममता का मिला, हमको यही निचोड़।
उसके बिन सूना लगे, जीवन का हर मोड़।।
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अंधी दौड़ विकास की, छोड़े नहीं वजूद।
इत टिहरी जलमग्न है, उत डूबा हरसूद।।
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तन भीगा बरसात में, मनवा उसके नेह।
याद रहेगा उम्र भर, सखि सावन का मेह।।
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सावन में झर-झर गया, हुआ प्रफुल्लित गात।
अंकुर फूटे नेह के, चहक उठे दिन रात।।
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जीवन जीने के लिए, जी इसको भरपूर।
आभासी  संसार से, रख अपने को दूर।।
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जन प्रतिनिधि सब नाम के, सब जनता से दूर।
प्रजातंत्र के खेल में, जन के सपने चूर।।
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ऐसे कैसे सौंप दूँ, मैं अपनी तकदीर।
पाँच वर्ष के बाद फिर, बदलूँगा तसवीर।।
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जंगल के कानून का, देखो तो अंधेर।
लगा मुखौटे भेड़िए, बन बैठे हैं शेर।।
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कोमल, चंचल तितलियाँ, करें प्रदर्शित प्रीत।
तत्पर हैं, चिंतित नहीं, हार मिले या जीत।।
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जीवन के सब सिलसिले, उलझाते हैं डोर।
कहने को आजाद हैं, पर ओझल हैं छोर।।
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दया-धर्म की नीतियाँ, अब तो हुईं फिजूल।
नील-गाय को मारने, केंद्र बताता रूल।।
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करते खण्डित मूर्ति को, फैलाते उन्माद।
कुछ लोगों के जीन में, दंगा, घृणा, फसाद।।
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निज युग के अनुरूप ही, कवि रचता इतिहास।
चंद शब्द लेकर भला, क्यों होता उपहास।।
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नकटों से नकटे मिलें, बजें बेसुरे बीन।
अब कौओं के सामने, कोयल के स्वर दीन।।
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कह रहीम कब के गए, सुनी न उनकी बात।
पानी अब दुर्लभ हुआ, परखो अब औकात।।
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जीवन की उलझन बढ़े, पा नकली प्रस्ताव।
कैसे दरिया पार हो, ले कागज की नाव।।
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भूले भटके ही करें, अब तो प्रभु को याद।
हर बाबा अब देश में, बेच रहा उत्पाद।।
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गौरैया सुन ले जरा, प्यार भरा संदेश।
तू भी तो खुद को बदल, बदल रहा परिवेश।।
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अब विकास के मायने, बहुमंजिला मकान।
किश्त चुकाने में चुकें, जीवन के अरमान।।
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कड़वी वाणी बोलकर, फैलाते उन्माद।
मानव दीखते किंतु हैं, सच दानव-जल्लाद।।
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आज हो रहा देश में, देख-देख मन खिन्न।
राष्ट्र-प्रेम की बात पर, मत क्यों होता भिन्न।।
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जब भी दुश्मन ने किए, सीने पर आघात।
मिल लोहा लेते रहे, कागज, कलम, दवात।।
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बंदे अपने को भला, क्यों कहता नाचीज।
बरगद तो होगा तभी, जब हो उसका बीज।।
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केवल अच्छे काम से, होता जग में नाम।
लगे निखट्टू का भला, किसको प्यारा चाम।।
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दृढ़ इच्छा, दृढ़ नियम से, सपने हों साकार।
बिना जतन के तो मिले, जीवन में बस हार।।
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आँख-आँख डालकर, जो नर करते बात।
दृढ़ इच्छा से जगत में, देते सबको मात।।
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आँखों में पानी नहीं, दिल में प्रेम न नेंक।
वे दुनिया को लूटते, छल के पाँसे फेंक।।
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धवल-वस्त्र धारण किए, पर दिल में है खोट।
बगुला-रूपी नर यहाँ, देते सबको चोट।।
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बिना नमक के कब रुचे, तरकारी का स्वाद।
ऐसे ही बिन भजन के, जीवन है बरबाद ।।
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जिसके जैसे कर्म हैं, पाता वैसे भोग।
सुख न बिना सत्कर्म के, चाहे साधो जोग।।१०१ 
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जिनको पाने के लिए हम इतने बेचैन।
क्या उनको मालूम है, हम कितने बेचैन।।
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वालमीकि रैदास या, बाबा तुलसीदास।
जाति-वर्ग से जोड़कर, क्यों होता उपहास।।
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रहिमन संत कबीर या, गुरु नानक रैदास।
इनके चिंतन से मिटे, तृषित मनों की प्यास ̊
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नीर लूट कर हँस रहा, निमर्म टिहरी बाँध। ० 
गंगा मैली हो रही, तन से उठे सड़ाँध।।
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