कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 22 मार्च 2018

120 दोहे

120 दोहे
********
1
हे गणपति हे गजानन, हे  गणेश भगवान।
रिद्धि-सिद्धि के साथ दें, हमें अभय वरदान।।

2
द्वापर युग में इन्द्र का, तोड़ा ज्यों अभिमान।
त्यों सबकी रक्षा करें, कलियुग से भगवान।।

3
इन्द्र देव के वज्र से,हनु पर हुआ प्रहार।
कहलाए हनुमान तब,जग में पवनकुमार।।

4
कर देती नौ रात में,जीवन का उद्धार।
माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।।

5
जय हो शिव के ध्यान की,जय शंकर भगवान।
जग है शिव के ध्यान में,शिव को जग का ध्यान।।

6
लोग सफलता के लिए, करते क्या-क्या काम।
मगर सफल होता वही, जिसे चाहते राम।।

7
देव तरसते हैं जिसे, ऐसी मानव देह।
ऐ मानव क्यों है नहीं, तुझको इससे नेह।।

8
ऊपरवाले ने रचा, इसको मेरे मीत।
इसीलिए सबसे मधुर, मन का है संगीत।।

9
कुत्तों की भी आदमी, जैसी ही तक़दीर।
कोई जूठन खा रहा, कोई मुर्ग़-पनीर।।

10
अच्छा तो है बोलना, साफ़-साफ़ दो टूक।
लेकिन ऐसा हर जगह, अच्छा नहीं सुलूक।।

11
निष्क्रिय होकर मत करें,जीवन को बेरंग।
पड़े-पड़े तो लौह भी,खा जाता है ज़ंग।।

12
अपनी नेकी की रखें, ऐसी भी कुछ राह।
जिनका हो संसार में,केवल ख़ुदा गवाह।।

13
साथ किताबी ज्ञान के,जो दे जीवनज्ञान।
शिक्षक वही प्रणम्य है, जिसके शिष्य महान।।

14
हाथी-विषधर-शेर से,पा लेता जो पार।
अपने ही दिल से वही, मानव जाता हार।।

15
इच्छा और लगाव से,थकता है इंसान।
वरना ये हर जीव से,होता है बलवान।।

16
मानव का सबसे बड़ा, दुश्मन है अभिमान।
अंतर रावण-राम का, इसकी है पहचान।।

17
एक तुम्हें त्रुटि बता रहा, शेष लोग हैं मौन।
शुभचिंतक सोचो तुम्हीं, यहाँ तुम्हारा कौन।।

18
हम दोनोंं में बढ़ रही, रोज़ बहस-तकरार।
इसका मतलब रास्ते पर है अपना प्यार।।

19
अपने मन में जो तुम्हें, मिले नहीं भगवान।
फिर वो मिल सकते नहीं, ढूँढो सकल जहान।।

20
भूलचूक-ग़लती-क्षमा,आपस में तकरार।
इन सब बातों के बिना, कैसा रिश्ता-प्यार।।

21
इच्छाएँ ही ज़िंदगी, करती हैं दुश्वार।
लेकिन मारे किस तरह,तमन्नाएँ संसार।।

22
गायत्री-गीता-गऊ,गुरु का करिए मान।
जीवन होगा आपका,अपनेआप महान।।

23
नदियाँ अपनी राह में, कितना करें कटाव।
मगर दिशा में वो नहीं, करती हैं बदलाव।।

24
लड़ते हैं जिनके लिए,हम मानव नादान।
कभी सुना है, हों लड़े ख़ुदा और भगवान।।

25
अपनों से ही रूठने,लड़ने का अधिकार।
ग़ैरों से कैसा गिला,क्या झगड़ा-तकरार।।

26
होता वो सबसे अधिक, पावरफ़ुल इंसान।
अपनी पावर की जिसे, होती है पहचान।।

27
जीना पड़ता है उसे, जननी का किरदार।
यूँ ही हो जाता नहींं, कोई रचनाकार।।

28
आख़िर चमके किस तरह,मेरा हिंदुस्तान।
यहाँ सफ़ाई भी नहीं, होती बिन अभियान।।

29
अपने पर कुछ भूलकर, करना नहीं गुमान।
जीवन में जो हो रहा,सब है ईश विधान।।

30
मीठा सुनना ही नहीं, उसकी है तक़दीर।
जिसकी बोली को नहीं, मिली मधुर तासीर।।

31
निर्धन होना पाप है, ठीक कह रहे आप।
मरना भी निर्धन मगर, इससे बढ़कर पाप।।

32
रिश्ता यूँ होता नहीं, कोई अमर-बुलंद।
गुल मरते हैं तब कहीं, बनता है गुलकंद।।

33
उसके जीवन को पढ़ो,देखो बिम्ब अनूप।
हर नारी में हैं छुपे,दुर्गा के नौ रूप।।

34
एक-दूसरे से रहें,कितने हम नाराज़।
ध्यान रहे जाए नहीं, और कहीं ये राज़।।

35
अच्छे लोगों के मधुर,कटु भी समझो बोल।
मोती कचरे में गिरे,फिर भी है अनमोल।।

36
दिलवाते हैं कर्म ही,हमें दंड-सम्मान।
जीवन में इस बात का, हरदम रखिए ध्यान।।

37
लंकापति को खा गया, ख़ुद उसका अभिमान।
वरना रावण की नहीं, जा सकती थी जान।।

38
रूप-बुद्धि सबको अलग,देते हैं करतार।
कैसे होगा सोचिए,सबका एक विचार।।

39
जीवन में हरगिज़ नहीं, छोड़ें उनका हाथ।
बुरे दिनों में आपका,दिया जिन्होंने साथ।।

40
उनके ऊपर प्रभु कृपा, समझो बड़ी असीम।
जिन गाँवों में आज भी,पीपल-बरगद-नीम।।

41
चाहे जितनी कोशिशें, कितना करें प्रयास।
फिर मिलना बचपन नहीं, या टूटा विश्वास।।

42
भले ख़ूबियों पर नहीं, तेरी करे विचार।
बख़्श नहीं सकता तुझे, ग़लती पर संसार।।

43
शुभ कामों का फल शुभ,ही होगा श्रीमान।
व्यर्थ कभी जाता नहीं, प्रभु सुमिरन या दान।।

44
मिसरी हो या फिटकरी, दोनों एक समान।
बाहर से अच्छा नहीं, अंदर का अनुमान।।

45
ठीक नहीं है तोड़ना, यूँ कोई अनुबंध।
किंतु निभाना भी ग़लत,बेमन का सम्बंध।।

46
शकुनि-मंथरा भी यहाँ, होते बिल्कुल फ़ेल।
भारत में जो चल रहा, राजनीति का खेल।।

47
अगर नाम की चाह है, तो करिए कुछ काम।
दुनिया में किसको मिला, बिना काम का नाम।।

48
सरपर जो मँडरा रहा, नहीं दिख रहा काल।
बाक़ी है इंसान को,सब कुछ यहाँ ख़याल।।

49
कर पाएगी कौन सी,मुश्किल उसको बैक।
जिसने बस में कर लिया, सच्चाई का ट्रैक।।

50
सच्चे हो तो कुछ नहीं, देना कहीं जवाब।
दुनिया के आरोप से,कितना लगे ख़राब।।

51
बेजा है नाराज़गी, का उनसे अंदाज़।
जहाँ स्वयं कहना पड़े,हम तुमसे नाराज़।।

52
पक्ष रखो अपना तभी, होगा बेड़ापार।
मौन रहे तो और भी,दुख देगा संसार।।

53
दुनिया में हर बात का, होता है कुछ अर्थ।
उचित कहीं पर मौन है, कहीं बोलना व्यर्थ।।

54
हे माँ जैसे कष्ट में,होता अपनेआप।
हैरत में हम बोलते, अरे बाप रे बाप।।

55
आज नहीं तो क्या हुआ,कल निखरेगा चित्र।
छोड़ो मत उम्मीद का,दामन मेरे मित्र।।

56
पैसे से पहले करें,लोगों का सम्मान।
चार लोग ही आपको, छोड़ेंगे शमशान।।

57
कभी किसी पर भी नहीं, क़ायम करिए राय।
कार और घर देखकर, या फिर उसकी आय।

58
दिल पर ली जाती नहीं, उन लोगों की बात।
जिनकी यादों से सजी,है दिल की बारात।।

59
घर पावन जैसे नहीं, है बिन तुलसी मित्र।
ये शरीर होता नहीं, बिन हरि भजन पवित्र।।

60
बोल न सकने के सबब,पशु होते हैरान।
हद से बाहर बोलकर, दुख सहता इंसान।।

61
वादे-शर्तों से नहीं, निभते हैं संबंध।
दिल-दिल मिलने से टिके,रिश्तों का अनुबंध।।

62
आत्मज्ञान का ख़ुद-ब-ख़ुद,हासिल होगा गोल।
अनुशासित यदि ज़िंदगी, मन पर है कंट्रोल।।

63
पुनर्जन्म पर हर बहस,और तर्क है व्यर्थ।
जन्म-मृत्यु का जब तलक,पता नहीं है अर्थ।।

64
महका दे माहौल जो,होता है वो इत्र।
जिससे महके ज़िंदगी, उसको कहते मित्र।।

65
दर्पण की उसके लिए, आख़ि
81
ऊपरवाला किस तरह, करता मालामाल।
करके देखें तो सही, अपना हृदय विशाल।।

82
बहुत भरोसे आजतक, टूटे कई क़रार।
लेकिन आदत है वही, करना सबसे प्यार।।

83
माफ़ उसे मत कीजिए, जिसके दिल में खोट।
जिसका मक़सद आपके, दिल पर करना चोट।।

84
मन तो सबके पास है, इसमें क्या है ख़ास।
ख़ास बात है आपके, रहे मनोबल पास।।

85
मानव के मन में बना, शायद कोई छिद्र।
कितना भी मिलता इसे, रहता सदा दरिद्र।।

86
रिश्तों के संसार में, जैसै फूल-सुगंध।
होता है बिल्कुल वही, पति-पत्नी संबंध।।

87
चलिए ढूँढें हम उसे, है वो किसके पास।
आपस में तो है नहीं, आपस का विश्वास।।

88
मछली से होती बड़ी,कछुए की तक़दीर।
जल-धरती दोनों जगह,है उसकी जागीर।।

89
सच्चाई का देखते, झूठे आज हिसाब।
इससे बढ़कर और क्या, होगा वक़्त ख़राब।।

90
जैसे तन की पीर का,हल्दी करे निदान।
दर्द दूर मन का करे,वैसे ही मुस्कान।।

91
सरल इस क़दर भी रखो,मत अपना व्यक्तित्व।
ख़तरे में जो डाल दे,मान और अस्तित्व।।

92
आत्मसात हर बात जो,कर ले हर हालात।
सच्चा योगी है वही, जिसमें है ये बात।।

93
पतझड़ के बिन पेड़ पर,आती नहीं बहार।
जीवन बिन संघर्ष के,कैसे हो गुलज़ार।।

94
सरल-भला भी आजकल, होना एक गुनाह।
बहुत बुरे हालात हैं, ख़ैर करे अल्लाह।।

95
चलो मोहब्बत का रचें,हम ऐसा संसार।
मँहगाई जैसा घटे,कभी न अपना प्यार।।

96
औरों को ख़ुश देख जो,ख़ुश होते इंसान।
उसे दुखी होने नहीं, देते हैं भगवान।।

97
चैनसुकूं की बात अब,करना है बेकार।
पहले जैसा अब कहाँ,है जीवनसंसार।।

98
हिचकोले हों राह में,कितने रहें तनाव।
डूब नहीं सकती मगर,कभी सत्य की नाव।।

99
जग में चुभने के लिए,काँटे हैं बदनाम।
इस धोखे में फूल भी,कर जाते ये काम।।

100
किसी के दुख के न बनें,कारण मेरे कर्म।
मेरी नज़रों में यही, पहला मानव धर्म।।

101
दवा और उसके लिए, दुआ हुई बेकार।
जो भी इस संसार में, "मैं" का हुआ शिकार।।

102
उठे अगर तो देव हो,गिरने पर हैवान।
हे प्रभु! तूने भी अजब,जीव रचा इंसान।।

103
पत्थर रखकर पेटपर, जीना है आसान।
अच्छा लगता है किसे,वरना सरपर भार।।

104
धर्म नहीं अंधा यक़ीं,केवल है बकवास।
बिन समझे कुछ मानना, सिर्फ़ अंधविश्वास।।

105
उदाहरण देना कहीं, बेहद है आसान।
उदाहरण तुम ख़ुद बनो,तो है काम महान।

106
सम्पूर्ण कोई नहीं, पर 'कुछ' हर इंसान।
सबकी बातों को सुनें,सबसे सीखें ज्ञान।।

107
ख़ामोशी का कम नहीं, अपना रुतबा मित्र।
लोग समझ पाते नहीं, बेशक इसका चित्र।।

108
ठहरो कहना बाद में,तुम मन के जज़्बात।
वर्तमान युग में सुनो,पहले धन की बात।

109
लोगों से आसेवफ़ा, मत करिए बेकार।
दिली नहीं इस दौर में,ज़रूरतन है प्यार।।

110
समझा गर्देराह जो,चंदन और गुलाल।
जग में जीवन की वही, समझ सका है चाल।।

111
मीठा लहजा झूठ की,होती है दयकार।
सच कैसे भी बोल तू,कड़वा होगा यार।।

112
वृन्दावन चाहे कहो,उसको राधाधाम।
वृन्दा-तुलसी-राधिका, सब राधा के नाम।।

113
क़द-पद पर है मित्र का,निर्भर नहीं चरित्र।
मुश्किल में जो साथ दे,वही हमारा मित्र।।

114
रह सकते हैं साथ में,शीशा एवं संग।
दोनों यदि ये सोच लें,नहीं करेंगे जंग।

115
हमें ज़रूरी तो नहीं, चाहे हर इंसान।
मगर जिएँ ऐसा,रहें,ख़ुश हमसे भगवान।।

116
मन का शत्रु विवाद है, तन का दुश्मन स्वाद।
इनसे बचिए ज़िंदगी, ख़ुद होगी आबाद।।

117
धीरज करना है कठिन, मगर लिया ये साध।
फिर जीवन का हर सफ़र,समझो हुआ अबाध।।

118
श्याम-श्याम के जाप से,होंगे सारे काम।
पर राधेराधे जपो,आएँगे तब श्याम।।

119
आस और उम्मीद का,कम करिए सामान।
अपने जीवन का सफ़र,रखना यदि आसान।।

120
मेरे क़दमों से अभी, मंज़िल काफ़ी दूर।
मगर तसल्ली, साथ है, क़दमों का भरपूर।।

121
उलझी बातें भी मधुर,हो सकती हैं मित्र।
जलेबियाँ इस बात का,प्रस्तुत करतीं चित्र।।

doha salila


दोहा सलिला
स्वप्न निरंतर आँख में, दें तिनके सम पीर।
तजते आशा अश्रु भी, कौन धराए धीर?
*
दोहा दुनिया में रहें, कथ्य भाव लय सार।
बिंब सरसता सरलता, बिन दोहा निस्सार।।
*
पग-मग मिल पा लक्ष्य लें, पद-मद मिल दें शूल।
गति-यति-मति हों साथ तो, खिलते बगिया-फूल।।
*
सार-सार दोहा कहे, रखे जमाना याद।
व्यर्थ भटक विस्तार में, समय न कर बर्बाद।।


दोहा शतक सुरेश कुशवाहा 'तन्मय'

ॐ 
दोहा शतक 
सुरेश तन्मय 




















जन्म: प्रदेश।
आत्मजा: ।
जीवन साथ: ।
शिक्षा: ।
लेखन विधा: दोहा, गीत, नवगीत, कविता, , लघुकथा, ग़ज़ल, नज़्म, पोएट्री आदि।
प्रकाशित: । 
उपलब्धि: । 
संप्रति: । 
संपर्क:  
चलभाष:  
*

दोहा शतक 

अभिलाषाएँ अनगिनत, सपने कई हजार। 
भ्रमित मनुज भूला हुआ, कालचक्र की मार।। 
*
दोहरा जीवन जी रहे, सुविधाभोगी लोग। 
स्वांग संत का दिवस में, रैन अनेकों भोग।। 
*
पानी पीते छानकर, जब हों बीच समाज। 
सुरापान एकांत में, बड़े-बड़ों के राज।। 
*
योगी बन पाए नहीं, उपयोगी बन आप। 
दायित्वों के साथ कर, परहित तजिए पाप।। 
*
करता अभिनय राम का, लीला में वह ख़ास। 
मात-पिता को दे दिया, बिन सोचे वनवास।। 
*
सभी मुसाफिर है यहाँ, जाना है किस ओर। 
ज्ञात नहीं है किसी को, मंत्री संत्री चोर।। 
*
लगा रहे हैं कहकहे, कर के नित दातौन। 
मटमैली सी देहरी, सकुचाहट में मौन।। 
*
मोहपाश में है घिरा, अर्जुन सम जनतंत्र। 
कौरव दल के बढ़ रहे, मायावी षडयंत्र।। 
*   
ठहर गई है जिंदगी, मौन हो गए ओंट । 
रूके पाँव उम्मीद के, गुमसुम-गुमसुम चोट।। 

भूल गए सरकार जी, आना अपने गाँव।  
छीन ले गए थे कभी, मेलजोल की छाँव।। 
*
शकुनी से पाँसे चलें, ये सरकारी लोग। 
तब तक खुश होते नहीं, जब तक चढ़े न भोग।। 
*
जबसे मेरे गाँव में, पड़े शहर के पाँव। 
भाई-चारे हारता, जीते नफरत दाँव।। 
* 
लिखते पढ़ते सीखते, बढ़े आत्मविश्वास। 
मंजिल पर पहुँचे वही, जिसने किए प्रयास।। 
*
रिश्तों की संवेदना, संबंधों की भाप। 
उम्मीदों की बर्फ से, कौन सका है नाप।। 
*
पलँग बिछौने सुस्त है, कुर्सी पूछे कौन?
टेबल पर अखबार है, पड़ा बिनपढ़ा मौन।। 
*
लगे चिढ़ाने वे सभी, अभिनंदन-सम्मान। 
जिनके दम पर हम कभी, दिखलाते थे शान।। 
*
आँगन धमकाने लगा, गली-सड़क सुनसान। 
परछी-कमरे अजनबी , भूल गए पहचान।। 
*
ताने मारे देहरी, हँसता रोशनदान। 
दरवाजे बूढ़े हुए, जर्जर हुआ मकान।। 
*
सिसक रही हैखिड़कियाँ, दीवारें हैं मौन।  
ढीठ फर्श की बेरुखी, छत पूछे: 'तुम कौन?'  
*
अलमारी आलस भरी, किंचित नहीं उछाह। 
हुई अनमनी पुस्तकें, किसको है परवाह।। 
*   
पर्दे बेपर्दे हुए, चौखट चतुर सुजान। 
साँकल-कुंदे दे रहे, हमें विरागी ज्ञान।। 
*
लगा डराने आईना, म्लान हुई मुस्कान। 
बालकनी ने कह दिया, कुछ दिन के मेहमान।। 
*
दीवारें बहरी हुई, अंधे हुए किवाड़। 
गूंगा गुल्लक है व्यथित, पल-छिन हुए पहाड़।। 
*
जीवन-चादर में हुए, छोटे-बड़े सुराख। 
छिपा न पाए बढ़ रहे, कोशिश कर ली लाख।। 
*
खुद को जब धो-माँज लें, तब करिए प्रभु-जाप। 
बाहर-भीतर एक हो, मिटे सकल संताप।। 
*
स्वयं हाशिये पर चले, नियत उम्र के बाद। 
बना रहेगा अंत तक, परिजन-सुख-संवाद।। 
*
रखें भरोसा स्वयं पर, है सब कुछ आसान। 
पढ़ें-लिखें, सीखें-सुनें, बने अलग पहचान।। 
*
जब जीवन की जंग में, लगे टूटने आस। 
इसके पहले जीत लें, हम सबके विश्वास।। 
*
चलते-चलते एक दिन, रूक जाएगी श्वास। 
लेखे-जोखे कर्म के, होंगे प्रभु के पास।। 
*
जन्म हुआ तो मृत्यु भी, होना ही है सत्य। 
बना रहें संकल्प यह, करते रहें सुकृत्य।। 
*
पन्ना-पन्ना लिख दिया, चुकता किया हिसाब। 
अब पढ़ना है ध्यान से, खुद की लिखी किताब।। 
*
ओढ़ रजाई मखमली, जाग रहे बेचैन।
स्वेद-गंध, श्रम के बिना, करवट-करवट रैन।। 
*
बनी रहीं पगडंडियाँ, जीवन भर अवरोध। 
इनमें ही उलझे रहे, रहा न खुद का बोध।। 
*   
शहर जागते रैन-दिन, क्र न सकें विश्राम। 
सरपट दौड़े जिंदगी, घोडा बिना लगाम।। 
*
आते-जाते भीड़ में, अनजानी मुस्कान। 
प्रमुदित मन ठंडक मिले, अनुपमेय यह दान।। 
*
हँसी-ठिठोली-दिल्लगी, तब ही बढ़ती मीत । 
जब न कहीं अवमानना, दस दिश मिलती प्रीत।। 
*
संबंधों की राह में, आते कितने मोड़। 
कहीं प्रीत पगडंडियाँ, मार्ग कहीं दे छोड़।। 
*
चौके-चूल्हे बँट गये, बाग बगीचे खेत। 
दीवारें उठने लगी, घर में फैली रेत।। 
*
बूढ़ा बरगद ले रहा, है अब अंतिम श्वास। 
फिर होगा नव अंकुरण, पाले मन में आस।। 
*
पढ़-लिखकर अफसर बना, भूल गया माँ-बाप। 
पेट काट सहते रहे, जो जीवन भर ताप।। 
*
दर्पण में दिखने लगे, चेहरे विविध अनेक। 
खुद के भीतर झाँक सच, देख एक से एक।। 

चिन्ह समय के रेत पर, बनते-मिटते मौन। 
पल-पल परिवर्तन करे, मत पूछो कब-कौन।। 
*  
बुद्धि विलास बहुत हुआ, तजो कागजी ज्ञान। 
कुछ पल साधे मौन को, हो यथार्थ पर ध्यान।। 
*
खुद ही खुद को छल रहे, खुद बनकर अनजान। 
भटक रहे हो भूलकर, खुद की ही पहचान।। 
*
बदल रही हैं बोलियाँ, बदल रहे हैं ढंग। 
बौराये से फिर रहे, ज्यों खाए सब भंग।। 
*
अनुत्तरित हम ही रहे, जब भी किया सवाल। 
हमें मिली अवमानना, उनको रंग-गुलाल।। 
*
चमकदार संवेदना, रहें चमत्कृत शब्द। 
अधुनातन गायन-रुदन, तकनीकें उपलब्ध।। 
*
हुआ अजीरण बुद्धि का, बढ़े घमंडी बोल। 
लौट शून्य पर आएगी, यह दुनिया है गोल।। 
*
तृष्णाओं के जाल में, उलझे हैं दिन-रैन
सुख पाने की चाह में, और-और बेचैन।। 
*
जीवन से गायब हुआ, शब्द एक संतोष
यश पद धन के लोभ में, किसको है अब होश।। 
*
यश-अपयश के बीच में, बहती जीवन-धार
निश्छल मन करता रहे, जीव मात्र से प्यार।। 
*
अति वर्जित हर क्षेत्र में, अति का नशा विचित्र। 
अति से दुर्गति ही सदा, छिटके सभी सुमित्र।। 

कब बैठे सुख-चैन से, नहीं किसी को याद। 
कल के सुख की चाह में, आज हुआ बर्बाद।। 
*
फुर्सत मिलती है कहाँ, सबके मुख ये बोल। 
बीते समय प्रमाद में, खुद से करे मखौल।। 
*
फैल रही चारों तरफ, यश की मुदित बयार। 
पेड़ सहेगा कब तलक, खिले पुष्प का भार।। 
*
ज्यों-ज्यों खिलता पुष्प त्यों, बढ़े सुगंध अमंद। 
रसिक भ्रमर मोहित हुए, पीने को मकरंद।। 
*
कागज के संग कलम का, है अलिखित अनुबंध। 
प्रीत पगी स्याही मिले, रचें मधुरतम छंद।। 
*
आदर्शों की बात अब, करना है बेकार। 
छल-छद्मों से घिर गये, हैं आचार-विचार।। 
*
सजा मिले सच बोलते, झूठों की जयकार। 
हवा भाँपकर जो चले, उसका बेड़ा पार।। 
*
जाति-धर्म, दल -पंथ के, भेदभाव दे त्याग। 
समता भावों से मिले, जीवन में अनुराग।। 
*    
पथरीली पगडंडियाँ, उस पर नंगे पाँव। 
चिंताओं के बोझ से, गुमसुम सारा गाँव।। 
*
बारिश में कीचड़ लगे, गर्मी जले अलाव। 
ठंडी ठिठुराती यहाँ, फसल बिके बेभाव।। 
*
गाँव ताकता शहर को, शहर गाँव की ओर। 
इधर-उधर का सिलसिला, देख चकित है भोर।। 
*
गाँव ताकता शहर को, शहर ताकता गाँव। 
लगे केक्टस घेरने, अब तुलसी के ठाँव।। 
*
नव विकास की आँधियाँ, उड़ा ले गयी गाँव।
आँगन में बाकी नहीं, कहीं नीम की छाँव।। 
*
पड़ी दरारें खेत में, आया सूखा साल। 
भूख प्यास संत्रास से, पशु-धन है बेहाल।। 
*
पेड़ सभी कटने लगे, जो थे चौकीदार। 
कौन नियंत्रित अब करे, मौसम के व्यवहार।। 
*
कलप रही है कल्पना, कुढ़ता रहा समाज। 
साहुकार की डायरी, चढ़ा ब्याज पर ब्याज।। 
*
ऊब गयी है जिंदगी, गिने माह दिन साल। 
रीता मन कृशकाय तन, खोजे पंछी डाल।। 
*
नव संस्कृति के दौर में, संस्कृति विकल उदास। 
रंग-ढंग बदले सभी, बदले वस्त्र लिबास।।   
*
देह दिखाते चल रहे, भीड़ भरे बाजार। 
बदन उघाड़े घूमते, अधुनातन परिवार।। 
*
बदले घर-बाजार में, क्रय-विक्रय संबंध। 
विज्ञापन भ्रमजाल में, उलझे है मतिमंद।। 
*
कभी हँसे, रोए कभी, हो बाजारू नैन। 
भाग-दौड़ की जिंदगी, पल भर मिले न चैन।। 
*
भूल रहे निज बोलियाँ, भूले निज पहचान। 
नव विकास की दौड़ में, भटक गया इंसान।। 
*
नव विकास की दौड़ में, मची हुई है होड़। 
अपना अपनापन रहे, हम ही पीछे छोड़।। 
*
हो जाने पर गल्तियाँ, या कोई अपराध। 
आत्म-ग्लानि होती नहीं, होता नहीं विषाद।। 
*
प्रगतिवाद के दौर में, संस्कृति का उपहास। 
निजता पर भी अतिक्रमण, भस्मासुरी विकास।। 
*
रहा न पानी आँख में, हुई निर्वसन लाज। 
उच्छृंखल वातावरण, निडर विचरते बाज।। 
*
टूटे अब दिल फूल से, पैसे हुए दिमाग। 
दिल-दिमाग गाने लगे, हँस दरबारी राग।। 
*
सम्मानों की चाह में, भटकें कितना और। 
क्रय-विक्रय तुक-तान का, यह साहित्यिक दौर।। 
*
पाल कीर्ति-सम्मान की, मन में चाह अथाह।
करूणा सेवा प्रेम से, हम हैं बेपरवाह।। 
*
अखबारों में छप रहे, प्रतिदिन फोटो-नाम। 
सम्मानों के मोह में, चुका रहे हैं दाम।। 
*
बेशर्मी से कर रहे, खुद ही खुद का गान। 
बजा रहे हैं तालियाँ, अग्रगण्य मेहमान।। 
*
आत्मप्रशंसा में निपुण, ज्ञान ध्यान के बोल। 
ओढ़ मुखौटे सर्वदा, बने रहे अनमोल।। 
*
गीत-गज़ल में गिनतियाँ, ह्रस्व-दीर्घ के खेल। 
भाव हाशिये पर पड़े, बिन इंजन की रेल।। 
*
छंद मुक्त के नाम पर, कविताओं के ढेर। 
एक शब्द कर्नाटका, एक शब्द अजमेर।। 
*
भीतर की बेचैनियाँ, अर्थहीन संवाद। 
फीकी मुस्कानें लगे, बातचीत बेस्वाद।।  
*
बरगद पीपल नीम का, है पावन संयोग। 
त्रिविध ताप से मुक्त कर, हरे कष्ट भय रोग।। 
*
पेड़ों से छनकर हवा, करती हमें निरोग। 
घनी छाँह आश्रय बने, सुख पाते सब लोग।। 
*
खेत कटे जंगल कटे, तनते भवन विशाल। 
अपने ही विध्वंस को, आमंत्रित है काल।। 
*
सूर्य ताप बढ़ने लगा, बादल करे विलाप। 
अस्त -व्यस्त ऋतुएँ हुईं, उन्नति का अभिशाप।। 
*
जल जंगल की शुद्धता, रखें सर्वजन ध्यान। 
बचें प्रदूषण से सदा, हो सबका कल्याण।।  
*
जंगल में मंगल रहे, शहर गाँव गौठान। 
हँसी-खुशी गाते रहे, जन-जन मंगलगान।। 
*
निश्छल सेवा भाव से, मिले परम संतोष। 
मिटे ताप मन के सभी, संचित सारे दोष।। 
*
बीजगणित के सूत्र सम, जटिल जगत संबंध। 
उत्तर संशयग्रस्त है, प्रश्न हुए स्वच्छंद।। 

*
चार बरस की जिंदगी, पल-पल क्षरण विधान। 
श्वास-श्वास नित मर रहे, मूल्य समय का जान।। 
*
शुभ संकल्पों की सदा, गागर भरले मीत। 
जितना बाँटे भुला दे, बढ़ा सभी से प्रीत।।   
*
कर्म अशुभ करते रहे, दुआ न आए काम। 
मन की निर्मलता बिना, नहीं मिलेंगे राम।। 
*
जब-जब सोचा स्वार्थ-हित, तब-तब हुए उदास। 
जब भूले हित स्वयं के, हुआ सुखद अहसास।। 
*
यह जीवन फिर हो न हो, आगे सब अज्ञात। 
भेदभाव की बेड़ियाँ, भूलो जात-कुजात।। 
*
मिल-बैठें सब प्रेम से, यदि हो भिन्न विचार। 
कहें-सुनें सम्मान दें, बढ़े परस्पर प्यार।। १०१  
*
----------------------
शिकवे तो हमसे रहे, उनसे क्यों बतियाय
आओ मित्र हमें कहो, आपस में सुलझाय
शांतचित्त सोचें सभी, खोजें नये उपाय
छलनी छाने जो मिले, सारतत्व अपनाय
रंग-रूप छोटे-बड़े, अलग-अलग सब लोग
भिन्न-भिन्न मत-धर्म है, यही सुखद संयोग
सत्कर्मों के पेड़ पर, यश-कीर्ति फल-फूल
ध्यान रहे यह सर्वदा, रहें सींचते मूल
धैर्य धर्म का मूल है, सच इसके सोपान
पकड़ मूल सच जो पढ़े, वे ही हुए महान
बंजारों सा दिन ढला, मेहमानों सी रात
रैन-दिवस में कब-कहां, काल करेगा घात
रोज रात मरते रहे, प्रात: जीवन दान
फिर भी हैं भूले हुए, खुद से ही अनजान
सोते ही रह जाएंगे, एक दिन अंतिम बार
प्राण हंस उड़ जाएगा, इस दुनिया से पार
कांकरीट सीमेंट संग, दिल भी हुए कठोर
मीठे वचनों की जगह, तू-तू मैं-मैं शोर
जब-जब श्रीफल शॉल संग, पड़े गले में हार
तब-तब गर्वित हो बढ़ा, अहंकार का भार
शब्दों की चौपाल में, मची हुई हुड़दंग
सबके अपने तर्क हैं, सबके अपने ढंग
जब होता बेचैन मन, सब कुछ लगे उदास
करे कोई परिहास तो, लगे वही उपहास
एक-दूजे का कर रहे, आपस में गुणगान
गिरगिटियों के रंग से, जनता है हैरान
रंग-बिरंगी झंडियां, शुरू हो गये स्वांग
समय-बेसमय दे रहे, शहरी मुर्गे बांग
परजीवी काई अगर, नहीं हटायी जाय
निज स्वरूप ढंक जाएगा, ज्ञान ध्यान भरमाय
कौन भरे जल नारियल, सरस संतरे आम
एक बीज हो सौ गुना, है यह किसका काम
देहरी मंगलदीप हो, संध्या वंदनगान
आपस में सद्भावना, वह घर तीर्थ समान
सच को सच समझें तभी, साहस का संचार
तन-मन नित हर्षित रहे, उपजे निश्छल प्यार
भीतर-बाहर एक से, है जिनके व्यवहार
जीवन में उनके सदा, रहती सुखद बयार
दुख के दरवाजे घुसी, आशाओं की बेल
लिपटी हरित बबूल से, दूध-छांछ का खेल
कुछ पद पैसों से बिके, कुछ रिश्तों के लोग
शेष सिफारिश में गये, लोकतंत्र उद्योग
सीप पिये मोती बने, स्वाति जल की बूंद
भीतर उतरें मौन हो, देखे आंखें मूंद
मिटा दिए अपने किये, लिखे कहे सब बोल
जो न लिखे न कह गये, वे ही हैं अनमोल

बुधवार, 21 मार्च 2018

दोहा शतक हरि फैजाबादी

ॐ 
दोहा शतक 
डा.हरि फ़ैज़ाबादी













जन्म: १७.७.१९६५, फ़ैज़ाबाद उ.प्र. ।
आत्मज: स्व.श्रीमती विमला देवी-स्व. श्री वीरेन्द्र बहादुर श्रीवास्तव।
जीवनसंगिनी: श्रीमती अंजू श्रीवास्तव।
शिक्षा: एम.काम., बी.एड., एम.ए.(उर्दू),  पीएच. डी.(उर्दू)।
लेखन विधा: गद्य एवं पद्य (ग़ज़ल,दोहा,नात,भजन,गीत,मुक्तक,मनक़बत) आदि।
प्रकाशित: मिट्टी का योगदान ग़ज़ल संग्रह, जीवन की हर बात दोहा संग्रह, मीर होने की बेक़रारी है ग़ज़ल संग्रह (उर्दू), कण-कण में हनुमान---हनुमत दोहा चालीसा, साईं का पैग़ाम (साईं दोहा चालीसा)।
सम्मान: विभिन्न संस्थाओं द्वारा दो दर्जन से अधिक सम्मान ।
संपर्क: बी १०४ /१२ निराला नगर लखनऊ २२६०२० उ.प्र. ।
चलभाष: ०९४५०४८९७८९, ईमेल: hari.faizabadi@gmail.com ।
*

ॐ 
दोहा शतक 

हे गणपति हे गजानन, हे  गणेश भगवान।
रिद्धि-सिद्धि के साथ दें, हमें अभय वरदान।।
*
द्वापर युग में इंद्र का, तोड़ा ज्यों अभिमान।
त्यों सबकी रक्षा करें, कलियुग से भगवान।।
*
इंद्र देव के वज्र से, हनु पर हुआ प्रहार।
कहलाए हनुमान तब, जग में पवनकुमार।।
*
कर देती नौ रात में, जीवन का उद्धार।
माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।।
*
जय हो शिव के ध्यान की, जय शंकर भगवान।
जग है शिव के ध्यान में, शिव को जग का ध्यान।।
*
लोग सफलता के लिए, करते क्या-क्या काम।
मगर सफल होता वही, जिसे चाहते राम।।
*
देव तरसते हैं जिसे, ऐसी मानव देह।
ऐ मानव! क्यों है नहीं, तुझको इससे नेह।।
*
ऊपरवाले ने रचा, इसको मेरे मीत।
इसीलिए सबसे मधुर, है मन का संगीत।।
*
कुत्तों की भी आदमी, जैसी ही तक़दीर।
कोई जूठन खा रहा, कोई मुर्ग़-पनीर।।
*
अच्छा तो है बोलना, साफ़-साफ़ दो टूक।
लेकिन ऐसा हर जगह, अच्छा नहीं सुलूक।।
*
निष्क्रिय होकर मत करें, जीवन को बेरंग।
पड़े-पड़े तो लौह भी, खा जाता है ज़ंग।।
*
अपनी नेकी की रखें, ऐसी भी कुछ राह।
जिनका हो संसार में, केवल ख़ुदा गवाह।।
*
साथ किताबी ज्ञान के, जो दे जीवन-ज्ञान।
शिक्षक वही प्रणम्य है, जिसके शिष्य महान।।
*
हाथी-विषधर-शेर से, पा लेता जो पार।
अपने ही दिल से वही, मानव जाता हार।।
*
इच्छा और लगाव से,थकता है इंसान।
वरना ये हर जीव से,होता है बलवान।।
*
मानव का सबसे बड़ा, दुश्मन है अभिमान।
अंतर रावण-राम का, इसकी है पहचान।।
*
तुम्हें एक त्रुटि बताता, शेष लोग हैं मौन।
शुभचिंतक सोचो तुम्हीं, यहाँ तुम्हारा कौन।।
*
हम दोनोंं में बढ़ रही, रोज़ बहस-तकरार।
इसका मतलब रास्ते, पर है अपना प्यार।।
*
अपने मन में जो तुम्हें, मिले नहीं भगवान।
फिर वो मिल सकते नहीं, ढूँढो सकल जहान।।
*
भूल-चूक, ग़लती-क्षमा, आपस में तकरार।
इन सब बातों के बिना, कैसा रिश्ता-प्यार।।
*
गायत्री-गीता-गऊ, गुरु का करिए मान।
जीवन होगा आपका, अपनेआप महान।।
*
नदियाँ अपनी राह में, कितना करें कटाव।
मगर दिशा में वो नहीं, करती हैं बदलाव।।
*
लड़ते हैं जिनके लिए, हम मानव नादान।
कभी सुना है, हों लड़े, ख़ुदा और भगवान।।
*
अपनों से ही रूठने, लड़ने का अधिकार।
ग़ैरों से कैसा गिला, क्या झगड़ा-तकरार।।
*
होता वो सबसे अधिक, पावरफ़ुल इंसान।
अपनी पावर की जिसे, होती है पहचान।।
*
जीना पड़ता है उसे, जननी का किरदार।
यूँ ही हो जाता नहींं, कोई रचनाकार।।
*
आख़िर चमके किस तरह, मेरा हिंदुस्तान।
यहाँ सफ़ाई भी नहीं, होती बिन अभियान।।
*
अपने पर कुछ भूलकर, करना नहीं गुमान।
जीवन में जो हो रहा, सब है ईश-विधान।।
*
मीठा सुनना ही नहीं, है उसकी तक़दीर।
जिसकी बोली को नहीं, मिली मधुर तासीर।।
*
निर्धन होना पाप है, ठीक कह रहे आप।
मरना भी निर्धन मगर, इससे बढ़कर पाप।।
*
रिश्ता यूँ होता नहीं, कोई अमर-बुलंद।
गुल मरते हैं तब कहीं, बनता है गुलकंद।।
*
उसके जीवन को पढ़ो, देखो बिंब अनूप।
हर नारी में हैं छुपे, दुर्गा के नौ रूप।।
*
एक-दूसरे से रहें, कितने हम नाराज़।
ध्यान रहे जाए नहीं, और कहीं ये राज़।।
*
अच्छे लोगों के मधुर, कटु भी समझो बोल।
मोती कचरे में गिरे,फिर भी है अनमोल।।
*
दिलवाते हैं कर्म ही, हमें दंड-सम्मान।
जीवन में इस बात का, हरदम रखिए ध्यान।।
*
लंकापति को खा गया, ख़ुद उसका अभिमान।
वरना रावण की नहीं, जा सकती थी जान।।
*
रूप-बुद्धि सबको अलग, देते हैं करतार।
कैसे होगा सोचिए, सबका एक विचार।।
*
जीवन में हरगिज़ नहीं, छोड़ें उनका हाथ।
बुरे दिनों में आपका, दिया जिन्होंने साथ।।
*
उनके ऊपर प्रभु कृपा, समझो बड़ी असीम।
जिन गाँवों में आज भी, पीपल-बरगद-नीम।।
*
चाहे जितनी कोशिशें, कितना करें प्रयास।
फिर मिलना बचपन नहीं, या टूटा विश्वास।।
*
भले ख़ूबियों पर नहीं, तेरी करे विचार।
बख़्श नहीं सकता तुझे, ग़लती पर संसार।।
*
शुभ कामों का फल सदा, शुभ ही हो श्रीमान।
व्यर्थ कभी जाता नहीं, प्रभु सुमिरन या दान।।
*
मिसरी हो या फिटकरी, दोनों एक समान।
बाहर से अच्छा नहीं, अंदर का अनुमान।।
*
शकुनि-मंथरा भी यहाँ, होते बिल्कुल फ़ेल।
भारत में जो चल रहा, राजनीति का खेल।।
*
अगर नाम की चाह है, तो करिए कुछ काम।
दुनिया में किसको मिला, बिना काम का नाम।।
*
सर पर जो मँडरा रहा, नहीं दिख रहा काल।
बाक़ी है इंसान को, सब कुछ यहाँ ख़याल।।
*
सच्चे हो तो कुछ नहीं, देना कहीं जवाब।
दुनिया के आरोप से, कितना लगे ख़राब।।
*
पक्ष रखो अपना तभी, होगा बेड़ा पार।
मौन रहे तो और भी, दुख देगा संसार।।
*
दुनिया में हर बात का, होता है कुछ अर्थ।
उचित कहीं पर मौन है, कहीं बोलना व्यर्थ।।
*
'हे माँ' जैसे कष्ट में, बोलें अपने आप।
हैरत में हम बोलते, 'अरे बाप रे बाप'।।   
*
आज नहीं तो क्या हुआ, कल निखरेगा चित्र।
छोड़ो मत उम्मीद का, दामन मेरे मित्र।।
*
पैसे से पहले करें, लोगों का सम्मान।
चार लोग ही आपको, छोड़ेंगे शमशान।।
*
कभी किसी पर भी नहीं, क़ायम करिए राय।
कार और घर देखकर, या फिर उसकी आय।।
*
दिल पर ली जाती नहीं, उन लोगों की बात।
जिनकी यादों से सजी, है दिल की बारात।।
*
घर पावन जैसे नहीं, है बिन तुलसी मित्र।
ये शरीर होता नहीं, बिन हरि भजन पवित्र।।
*
बोल न सकने के सबब, पशु होते हैरान।
हद से बाहर बोलकर, दुख सहता इंसान।।
*
वादे-शर्तों से नहीं, निभते हैं संबंध।
दिल-दिल मिलने से टिके, रिश्तों का अनुबंध।।
*
आत्मज्ञान का ख़ुद-ब-ख़ुद, हासिल होगा गोल।
अनुशासित यदि ज़िंदगी, मन पर है कंट्रोल।।
*
पुनर्जन्म पर हर बहस, और तर्क है व्यर्थ।
जन्म-मृत्यु का जब तलक, पता नहीं है अर्थ।।
*
महका दे माहौल जो, होता है वो इत्र।
जिससे महके ज़िंदगी, उसको कहते मित्र।।
*
दर्पण की उसके लिए, आख़िर क्या दरकार।
जिसे दिया हो ईश ने, दिल का सच्चा यार।।
*
धन्यवाद उसका करें, तोड़े जो विश्वास।
खोली उसने आँख भी, दिल यदि किया उदास।।
*
मर्यादा इंसान की, खा जाती ज्यों भूख।
त्यों दिल की इंसानियत, धन में जाती सूख।।
*
माना सब कटने नहीं, पूर्वजन्म के पाप।
लेकिन जितनी हो सके,कोशिश करिए आप।।
*
चमक नहीं सकता किसी, फ़ेसवाश से फ़ेस।
अगर आपका मन मलिन,स्वच्छ नहीं है बेस।।
*
रिश्तों में कुछ मित्र ही, मिलते देवसमान।
बाक़ी होते आदमी, या फिर कुछ इंसान।।
*
सोच-समझकर ही करें, जीवन में हर बात।
जीवन में नुक़सान ही, करते हैं जज़्बात।।
*
फ़िल्मी दुनिया की तरह, अब सारा संसार।
आप सफल तो आपका, हर कोई है यार।।   
*
चलकर ख़ुद ही आपके, आएँगे प्रभु पास।
मन में यदि प्रह्लाद या, शबरी सा विश्वास।।
*
रक्षा मेरे मित्र की, करना ऐ भगवान।
गड्ढे को भी मानता, वो समतल मैदान।।
*
अपने जैसा ही मुझे, लगता हर इंसान।
बड़ी कठिन मेरे लिए, दुनिया की पहचान।।
*
हरदम ख़ाली पेट जो,रहता है दिन-रात।
कर पाए वो किस तरह, कोई पूरी बात।।
*
जिन लोगों को भी लगा, जग में "मैं का रोग।
बिल्कुल रावण की तरह, नष्ट हुए वो लोग।।
*
रामचन्द्र को राज की, जगह मिला वनवास।
नामुमकिन है वक़्त की, करवट का आभास।
*
बदल चुके हैं प्यार के, आज सभी आधार।
मैं नाहक़ ही ढो रहा, पहले वाला प्यार।।
*
ऊपरवाला किस तरह, करता मालामाल।
करके देखें तो सही, अपना हृदय विशाल।।
*
बहुत भरोसे आज तक, टूटे कई क़रार।
लेकिन आदत है वही, करना सबसे प्यार।।
*
माफ़ उसे मत कीजिए, जिसके दिल में खोट।
जिसका मक़सद आपके, दिल पर करना चोट।।
*
मन तो सबके पास है, इसमें क्या है ख़ास।
ख़ास बात है आपके, रहे मनोबल पास।।
*
मानव के मन में बना, शायद कोई छिद्र।
कितना भी मिलता इसे, रहता सदा दरिद्र।।
*
रिश्तों के संसार में, जैसै फूल-सुगंध।
होता है बिल्कुल वही, पति-पत्नी संबंध।।
*
चलिए ढूँढें हम उसे, है वो किसके पास।
आपस में तो है नहीं, आपस का विश्वास।।
*
मछली से होती बड़ी, कछुए की तक़दीर। 
जल-धरती दोनों जगह, है उसकी जागीर।।
*
सच्चाई का देखते, झूठे आज हिसाब।
इससे बढ़कर और क्या, होगा वक़्त ख़राब।।
*
जैसे तन की पीर का, हल्दी करे निदान।
दर्द दूर मन का करे, वैसे ही मुस्कान।।
*
सरल इस क़दर भी रखो, मत अपना व्यक्तित्व।
ख़तरे में जो डाल दे, मान और अस्तित्व।।
*
आत्मसात हर बात जो, कर ले हर हालात।
सच्चा योगी है वही, जिसमें है यह बात।।
*
पतझड़ के बिन पेड़ पर, आती नहीं बहार।
जीवन बिन संघर्ष के, कैसे हो गुलज़ार।।
*
सरल-भला भी आजकल, होना एक गुनाह।
बहुत बुरे हालात हैं, ख़ैर करे अल्लाह।।
*
चलो मोहब्बत का रचें, हम ऐसा संसार।
मँहगाई जैसा घटे, कभी न अपना प्यार।।
***
औरों को ख़ुश देख जो, ख़ुश होते इंसान।
उसे दुखी होने नहीं, देते हैं भगवान।।
*
चैन-सुकूं की बात अब, करना है बेकार।
पहले जैसा अब कहाँ, है जीवन-संसार।।
*
हिचकोले हों राह में, कितने रहें तनाव।
डूब नहीं सकती मगर, कभी सत्य की नाव।।
*
जग में चुभने के लिए, काँटे हैं बदनाम।
इस धोखे में फूल भी, कर जाते यह काम।।
*
दवा और उसके लिए, दुआ हुई बेकार।
जो भी इस संसार में, "मैं" का हुआ शिकार।।
*
उठे अगर तो देव हो, गिरने पर हैवान।
हे प्रभु! तूने भी अजब, जीव रचा इंसान।।
*
पत्थर रखकर पेट पर, जीना है आसान। 
अच्छा लगता है किसे, वरना सर पर भार।।
*
धर्म नहीं अंधा यक़ीं, केवल है बकवास।
बिन समझे कुछ मानना, सिर्फ़ अंधविश्वास।।
*
उदाहरण देना कहीं, है बेहद आसान।
उदाहरण तुम ख़ुद बनो, तो है काम महान।
*
ख़ामोशी का कम नहीं, अपना रुतबा मित्र।
लोग समझ पाते नहीं, बेशक इसका चित्र।।   
*
उलझी बातें भी मधुर,हो सकती हैं मित्र।
जलेबियाँ इस बात का,प्रस्तुत करतीं चित्र।।१०१ 
*

मंगलवार, 20 मार्च 2018

दोहा


दोहा सलिला
महल बनाते हो गया, हाय! कब्र से प्यार।
ताजमहल का हो गया, सपने में दीदार।।
*
टकरा, झुक, उठ, मिल, बसीं, आँखें होकर चार।
कहतें थीं इंकार पर, कर बैठीं इकरार।।
*
अभिनेत्री के निधन पर, मना रहे हैं शोक।
वीर शहीदों की खबर, सुन करते हैं जोक।।
*