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शुक्रवार, 2 जून 2017

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शोध परक लेख :

अग्र सदा रहता सुखी 
आचार्य
​ संजीव वर्मा 'सलिल'

संपर्क
​- 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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अग्र सदा रहता सुखी, अगड़ा कहते लोग

पृष्ठ रहे पिछड़ा 'सलिल', सदा मनाता सोग 
सब दिन जात न एक समान


मानव संस्कृति का इतिहास अगड़ों और पिछड़ों की संघर्ष कथा है. बाधा और संकट हर मनुष्य के जीवन में आते हैं, जो जूझकर आगे बढ़ गया वह 'अगड़ा' हुआ. इसके विपरीत जो हिम्मत हारकर पीछे रह गया 'पिछड़ा' हुआ. अवर्तमान राजनीति में अगड़ों और पिछड़ों को एक दूसरे का विरोधी बताया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. वास्तव में वे एक दूसरे के पूरक हैं. आज का 'अगड़ा' कल 'पिछड़ा' और आज का 'पिछड़ा' कल 'अगड़ा' हो सकता है. इसीलिए कहते हैं- 'सब दिन जात न एक समान'.  

मन के हारे हार है 

जो मनुष्य भाग्य भरोसे बैठा रहता है उसे वह नहीं मिलता जिसका वह पात्र है. संस्कृत का एक श्लोक है- 

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथै:

नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:

.

उद्यम से ही कार्य सिद्ध हो, नहीं मनोरथ है पर्याप्त 

सोते सिंह के मुख न घुसे मृग, सत्य वचन यह मानें आप्त 

लोक में दोहा प्रचलित है-

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत 

अग्रधारा लक्ष्य पाती 
जो
​ मन से नहीं हारते और निरंतर प्रयास रात होकर आगे आते हैं या नेतृत्व  करते हैं वे ही समाज की अग्रधारा में कहे जाते हैं. हममें से हर एक को अग्रधारा में सम्मिलित होने का प्रयास करते रहना चाहिए. किसी धारा में असंख्य लहरें, लहर में असंख्य बिंदु और बिंदु में असंख्य परमाणु होते हैं. यहाँ सब अपने-अपने प्रयास और पुरुषार्थ से अपना स्थान बनाते हैं, कोइ किसी का स्थान नहीं छीनता न किसी को अपना स्थान देता है. इसलिए न तो किसी से द्वेष करें न किसी के अहसान के तले दबकर स्वाभिमान गँवायें. 
अग्रधारा लक्ष्य पाती, पराजित होती नहीं 
कौन
​ आगे कौन पीछे, देख ​पथ खोती नहीं 
​बहुउपयोगी अग्र है 
जो
​ आगे रहेगा वह पीछे वालों का पाठ-प्रदर्शक या मार्गदर्शक अपने आप बन जाता है. उसके संघर्ष, पराक्रम, उपलब्धि, जीवट, और अनुकरण अन्यों के लिए प्रेरक बन जाते हैं. इस तरह वह चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने अन्यों के साथ और अन्य उसके साथ जुड़ जाते हैं. 
बहुउपयोगी अग्र है, अन्य सदा दें साथ 
बढ़ा उसे खुद भी बढ़ें, रखकर ऊँचा माथ 
अग्र साथ दे सभी का 
आगे
​ जाने के लिए आवश्यक यह है कि पीछे वालों को साथ लिया जाय तथा उनका साथ दिया जाय. कुशल नायक 'काम करो' नहीं कहता, वह 'आइये, काम करें' कहकर सबको साथ लेकर चलता और मंजिल वार्ता है. 
अग्र साथ दे सभी का, रखे सभी को संग 
वरण
​ सफलता का करें, सभी जमे तब रंग
अन्य स्थानों की तरह शब्दकोष में भी अग्रधारा आगरा-स्थान ग्रहण करती है. ​आइये आगरा और अग्र के साथियों से मिलें-

​​
अग्र- वि. सं. अगला, पहला, मुख्य, अधिक. अ. आगे. पु. अगला भाग, नोक, शिखर, अपने वर्ग का सबसे अच्छा पदार्थ, बढ़-चढ़कर होना, उत्कर्ष, लक्ष्य आरंभ, एक तौल, आहार की के मात्रा, समूह, नायक.

अग्रकर-पु. हाथ का अगला हिस्सा, उँगली, पहली किरण
अग्र
- पु. नेता, नायक, मुखिया.
अग्रगण्य-वि. गिनते समय प्रथम, मुख्य, पहला.

अग्र
गामी/मिन-वि. आगे चलनेवाला. पु. नायक, अगुआ, स्त्री. अग्रगामिनी
 

अग्रदल-पु. फॉरवर्ड ब्लोक भारत का एक राजनैतिक दल जिसकी स्थापना नेताजी सुभाषचन्द्र बोसने की थी, सेना की अगली टुकड़ी
अग्र
-वि. पहले जन्मा हुआ, श्रेष्ठ. पु. बड़ा भाई, ब्राम्हण, अगुआ.

अग्रजन्मा/जन्मन-पु. बड़ा भाई, ब्राम्हण.
अग्र
जा-स्त्री. बड़ी बहिन.
अग्र
जात/ जातक -पु. पहले जन्मा, पूर्व जन्म का.

अग्रजाति-स्त्री. ब्राम्हण.
अग्रजिव्हा-स्त्री. जीभ का अगला हिस्सा.
अग्रणी-वि. आगे चलनेवाला, प्रथम, श्रेष्ठ, उत्तम. पु. नेता, अगुआ, एक अग्नि.
अग्रतर-वि. और आगे का, कहे हुए के बाद का, फरदर इ.
अग्रदाय-अग्रिम देय, पहले दिया जानेवाला, बयाना, एडवांस, इम्प्रेस्ट मनी.-दानी/निन- पु. मृतकके निमित्त दिया पदार्थ/शूद्रका दान ग्रहण करनेवाला निम्न/पतित ब्राम्हण,-दूत- पु. पहले से  पहुँचकर किसी के आने की सूचना देनेवाला.-निरूपण- पु. भविष्य-कथन, भविष्यवाणी, भावी. -सुनहु भरत भावी प्रबल. राम.,
अग्रपर्णी/परनी-स्त्री. अजलोमा का वृक्ष.
अग्रपा- सबसे पहले पाने/पीनेवाला.-पाद- पाँव का अगला भाग, अँगूठा.
अग्रपूजा- स्त्री. सबसे पहले/सर्वाधिक पूजा/सम्मान.
अग्रपूज्य- वि. सबसे पहले/सर्वाधिक सम्मान.
अग्रप्रेषण-पु. देखें अग्रसारण.
अग्रप्रेषित-वि. पहले से भेजना, उच्चाधिकारी की ओर आगे भेजना, फॉरवर्डेड इ.-बीज- पु. वह वृक्ष जिसकी कलम/डाल काटकर लगाई जाए. वि. इस प्रकार जमनेवाला पौधा.
अग्रभाग-पु. प्रथम/श्रेष्ठ/सर्वाधिक/अगला भाग -अग्र भाग कौसल्याहि दीन्हा. राम., सिरा, नोक, श्राद्ध में पहले दी जानेवाली वस्तु.
अग्रभागी/गिन-वि. प्रथम भाग/सर्व प्रथम  पाने का अधिकारी.
अग्रभुक/-वि. पहले खानेवाला, देव-पिटर आदि को खिलाये बिना खानेवाला, पेटू.
अग्रभू/भूमि-स्त्री. लक्ष्य, माकन का सबसे ऊपर का भाग, छत.
अग्रमहिषी-स्त्री. पटरानी, सबसे बड़ी पत्नि/महिला.-मांस-पु. हृदय/यकृत का रक रोग.
अग्रयान-पु. सेना की अगली टुकड़ी, शत्रु से लड़ने हेतु पहले जानेवाला सैन्यदल. वि. अग्रगामी.
अग्रयायी/यिन वि. आगे बढ़नेवाला, नेतृत्व करनेवाला
अग्रयोधी/धिन-पु. सबसे आगे बढ़कर लड़नेवाला, प्रमुख योद्धा.
अग्रलेख- सबसे पहले/प्रमुखता से छपा लेख, सम्पादकीय, लीडिंग आर्टिकल इ.
​ अग्रलोहिता-स्त्री. चिल्ली शाक.
अग्रवक्त्र-पु. चीर-फाड़ का एक औज़ार.
अग्रवर्ती/तिन-वि. आगे रहनेवाला.
अग्रशाला-स्त्री. ओसारा, सामने की परछी/बरामदा, फ्रंट वरांडा इं.
अग्रसंधानी-स्त्री. कर्मलेखा, यम की वह पोथी/पुस्तक जिसमें जीवों के कर्मों का लिखे जाते हैं.
अग्रसंध्या-स्त्री. प्रातःकाल/भोर.
अग्रसर-वि. पु. आगेजानेवाला, अग्रगामी, अगुआ, प्रमुख, स्त्री. अग्रसरी

अग्रसारण-पु. आगे बढ़ाना, अपनेसे उच्च अधिकारी की ओर भेजना, अग्रप्रेषण.
अग्रसारा-स्त्री. पौधे का फलरहित सिरा.
अग्रसारित-वि. देखें अग्रप्रेषित.
अग्रसूची-स्त्री. सुई की नोक,  प्रारंभ में लगी सूची, अनुक्रमाणिका.
अग्रसोची-वि. समय से पहले/पूर्व सोचनेवाला, दूरदर्शी. अग्रसोची सदा सुखी मुहा.
अग्रस्थान-पहला/प्रथम स्थान.
अग्रहर-वि. प्रथम दीजानेवाली/देय वस्तु.
अग्रहस्त-पु. हाथ का अगला भाग, उँगली, हाथी की सूंड़  की नोक.


अग्रहायण-पु. अगहन माह,
अग्र​हार-पु. राजा/राज्य की प्र से ब्राम्हण/विद्वान को निर्वाहनार्थ मिलनेवाला भूमिदान, विप्रदान हेतु खेत की उपज से निकाला अन्न.
अग्रजाधिकार- पु. देखें ज्येष्ठाधिकार.
अग्रतः/तस- अ. सं. आगे, पहले, आगेसे.
अग्रवाल- पु. वैश्यों का एक वर्गजाति, अगरवाल.
अग्रश/अग्रशस/अग्रशः-अ. सं. आरम्भ से ही.
अग्रह- पु.संस्कृत ग्रहण न करना, गृहहीन, वानप्रस्थ. 
अग्र ना होता जन्मना 
अग् होना सौभाग्य की बात है. भाग्य जन्म से मिलता है किन्तु सौभाग्य मनुष्य कर्म से अर्जित करता है. इसलिए अग्र होना या ना होना मनुष्य के पुरुषार्थ, कर्मों और कर्मों के पीछे छिपी नियत तथा दिशा पर निर्भर करता है.
अग्र न होता जन्मना, बने कर्मणा अग्र 
धीरज धर मत उग्र हों, और नहीं हों व्यग्र  

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​​संपर्क-२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com ​

गुरुवार, 1 जून 2017

chhandmuktakmuktikanavgeetkhandchhavimadhubhar

ॐ 
हिंदी के मात्रिक छंद : १ 
८ मात्रा के वासव जातीय छंद : अखंड, छवि/मधुभार 
संजीव 
*
विश्व वाणी हिंदी का छांदस कोश अप्रतिम, अनन्य और असीम है। संस्कृत से विरासत में मिले छंदों के साथ-साथ अंग्रेजी, जापानी आदि विदेशी भाषाओँ तथा पंजाबी, मराठी, बृज, अवधी आदि आंचलिक भाषाओं/ बोलिओं के छंदों को अपनाकर तथा उन्हें अपने अनुसार संस्कारित कर हिंदी ने यह समृद्धता अर्जित की है। हिंदी छंद शास्त्र के विकास में ध्वनि विज्ञान तथा गणित ने आधारशिला की भूमिका निभायी है।
विविध अंचलों में लंबे समय तक विविध पृष्ठभूमि के रचनाकारों द्वारा व्यवहृत होने से हिंदी में शब्द विशेष को एक अर्थ में प्रयोग करने के स्थान पर एक ही शब्द को विविधार्थों में प्रयोग करने का चलन है। इससे अभिव्यक्ति में आसानी तथा विविधता तो होती है किंतु शुद्घता नहीँ रहती। विज्ञान विषयक विषयों के अध्येताओं तथा हिंदी सीख रहे विद्यार्थियों के लिये यह स्थिति भ्रमोत्पादक तथा असुविधाकारक है। रचनाकार के आशय को पाठक ज्यों का त्यो ग्रहण कर सके इस हेतु हम छंद-रचना में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों के साथ प्रयोग किया जा रहा अर्थ विशेष यथा स्थान देते रहेंगे।
अक्षर / वर्ण = ध्वनि की बोली या लिखी जा सकनेवाली लघुतम स्वतंत्र इकाई। 
शब्द = अक्षरों का सार्थक समुच्चय। 
मात्रा / कला / कल = अक्षर के उच्चारण में लगे समय पर आधारित इकाई। 
लघु या छोटी मात्रा = जिसके उच्चारण में इकाई समय लगे। भार १, यथा अ, इ, उ, ऋ अथवा इनसे जुड़े अक्षर, चंद्रबिंदी वाले अक्षर 
दीर्घ, हृस्व या बड़ी मात्रा = जिसके उच्चारण में अधिक समय लगे। भार २, उक्त लघु अक्षरों को छड़कर शेष सभी अक्षर, संयुक्त अक्षर अथवा उनसे जुड़े अक्षर, अनुस्वार (बिंदी वाले अक्षर)। 
पद = पंक्ति, चरण समूह। 
चरण = पद का भाग, पाद। 
छंद = पद समूह। 
यति = पंक्ति पढ़ते समय विराम या ठहराव के स्थान। 
छंद लक्षण = छंद की विशेषता जो उसे अन्यों से अलग करतीं है। 
गण = तीन अक्षरों का समूह विशेष (गण कुल ८ हैं, सूत्र: यमाताराजभानसलगा के पहले ८ अक्षरों में से प्रत्येक अगले २ अक्षरों को मिलाकर गण विशेष का मात्राभार / वज़्न तथा मात्राक्रम इंगित करता है. गण का नाम इसी वर्ण पर होता है। यगण = यमाता = लघु गुरु गुरु = ४, मगण = मातारा = गुरु गुरु गुरु = ६, तगण = ता रा ज = गुरु गुरु लघु = ५, रगण = राजभा = गुरु लघु गुरु = ५, जगण = जभान = लघु गुरु लघु = ४, भगण = भानस = गुरु लघु लघु = ४, नगण = न स ल = लघु लघु लघु = ३, सगण = सलगा = लघु लघु गुरु = ४)।
तुक = पंक्ति / चरण के अन्त में शब्द/अक्षर/मात्रा या ध्वनि की समानता ।
गति = छंद में गुरु-लघु मात्रिक क्रम।
सम छंद = जिसके चारों चरण समान मात्रा भार के हों।
अर्द्धसम छंद = जिसके सम चरणोँ का मात्रा भार समान तथा विषम चरणों का मात्रा भार एक सा हो किन्तु सम तथा विषम चरणोँ क़ा मात्रा भार समान न हों।
विषम छंद = जिसके चरण असमान हों।
लय = छंद पढ़ने या गाने की धुन या तर्ज़।
छंद भेद = छंद के प्रकार। 
वृत्त = पद्य, छंद, वर्स, काव्य रचना । ४ प्रकार- क. स्वर वृत्त, ख. वर्ण वृत्त, ग. मात्रा वृत्त, घ. ताल वृत्त।
जाति = समान मात्रा भार के छंदों का समूहनाम।
प्रत्यय = वह रीति जिससे छंदों के भेद तथा उनकी संख्या जानी जाए। ९ प्रत्यय: प्रस्तार, सूची, पाताल, नष्ट, उद्दिष्ट, मेरु, खंडमेरु, पताका तथा मर्कटी।
दशाक्षर = आठ गणों तथा लघु - गुरु मात्राओं के प्रथमाक्षर य म त र ज भ न स ल ग ।
दग्धाक्षर = छंदारंभ में वर्जित लघु अक्षर - झ ह र भ ष। देवस्तुति में प्रयोग वर्जित नहीं। 
गुरु या संयुक्त दग्धाक्षर छन्दारंभ में प्रयोग किया जा सकता है। 
अष्ट मात्रिक छंद / वासव छंद
जाति नाम वासव (अष्ट वसुओं के आधार पर), भेद ३४, संकेत: वसु, सिद्धि, विनायक, मातृका, मुख्य छंद: अखंड, छवि, मधुभार आदि।
वासव छंदों के ३४ भेदों की मात्रा बाँट लघु-गुरु मात्रा संयोजन के आधार पर ५ वर्गों में निम्न अनुसार होगी:
अ वर्ग. ८ लघु: (१) १. ११११११११,
आ वर्ग. ६ लघु १ गुरु: (७) २. ११११११२ ३. १११११२१, ४. ११११२११, ५. १११२१११, ६. ११२११११, ७. १२१११११, ८. २११११११,
इ वर्ग. ४ लघु २ गुरु: (१५) ९. ११११२२, १०. १११२१२, ११. १११२२१, १२, ११२१२१, १३. ११२२११, १४, १२१२११, १५. १२२१११, १६. २१२१११, १७. २२११११, १८. ११२११२,, १९. १२११२१, २०. २११२११, २२. १२१११२, २३. २१११२१, 
ई वर्ग. २ लघु ३ गुरु: (१०) २४. ११२२२, २५. १२१२२, २६. १२२१२, २७. १२२२१, २८. २१२२१, २९. २२१२१, ३०. २२२११, ३१. २११२२, ३२. २२११२, ३३. २१२१२
उ वर्ग. ४ गुरु: (१) २२२२
छंद की ४ या ६ पंक्तियों में विविध तुकान्तों प्रयोग कर और भी अनेक उप प्रकार रचे जा सकते हैं।
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ८ मात्रा
लक्षण छंद:
अष्ट कला चुन 
वासव रचिए। 
सम तुकांत रख
रस भी चखिए।
उदाहरण:
कलकल बहती 
नदिया कहती 
पतवार थाम
हिम्मत न हार 
***
अ वर्ग. मलयज छंद: ८ लघु (११११११११)
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ८ लघु मात्राएँ, प्रकार एक। 
लक्षण छंद:
सुरभित मलयज 
लघु अठ कल सज 
रुक मत हरि भज 
भव शव रव तज 
उदाहरण:
१. अनवरत सतत 
बढ़, न तनिक रुक 
सजग रह न थक 
'सलिल' न चुक-झुक 
-------- 
आ वर्ग. अष्टक छंद: ६ लघु १ गुरु (११११११२) 
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ६ लघु तथा १ गुरु मात्राएँ, प्रकार ७। 
लक्षण छंद:
शुभ अष्टक रच 
छै लघु गुरु वर 
छंद निहित सच 
मधुर वाद्य सुर 
उदाहरण:
१. कर नित वंदन 
शुभ अभिनन्दन 
मत कर क्रंदन 
तज पर वंचन 
--------
इ वर्ग. अष्टांग छंद: ४ लघु २ गुरु (११११२२)
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ४ लघु तथा २ गुरु मात्राएँ, प्रकार १५। 
लक्षण छंद:
चौ-द्वै लघु-गुरु
अष्टांग सृजित 
सत्काव्य मधुर 
सत्कार्य अजित 
उदाहरण:
१. संभाव्य न सच 
सर्वदा घटित। 
दुर्भाग्य न पर 
हो सदा विजित। 
--------
ई वर्ग. पर्यावरणी छंद: २ लघु ३ गुरु (११२२२)
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति २ लघु तथा ३ गुरु मात्राएँ, प्रकार १०। 
लक्षण छंद:
मात्रा द्वै लघु 
पूजें त्रै गुरु
पर्यावरणी 
लगा रोपणी 
उदाहरण:
१. नहीं फैलने 
दें बीमारी। 
रहे न बाकी 
अब लाचारी। 
--------
उ. ४ गुरु: धारावाही छंद (२२२२)
छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ४ लघु तथा २ गुरु मात्राएँ, प्रकार १। 
लक्षण छंद:
धारावाही 
चौपालों से 
शिक्षा फ़ैली 
ग्रामीणों में 
उदाहरण:
१. टेसू फूला 
झूले झूला 
गौरा-बौरा 
गाये भौंरा। 
--------
अखण्ड छंद 
*
छंद-लक्षण: वासव जाति, प्रति पंक्ति ८ मात्रा, सामान्यतः ४ पंक्तियाँ, ३२ मात्राएँ।
लक्षण छंद:
चार चरण से, दो पद रचिए 
छंद अखंड न, बंधन रखिए।
अष्ट मात्रिक पंक्ति-पंक्ति हो-
बिम्ब भाव रस, गति लय लखिए। 
उदाहरण:
१. सुनो प्रणेता! 
बनो विजेता। 
कहो कहानी, 
नित्य सुहानी। 
तजो बहाना, 
वचन निभाना।
सजन सजा ना! 
साज बजा ना!
लगा डिठौना, 
नाचे छौना 
चाँद चाँदनी, 
पूत पावनी।
है अखंड जग, 
आठ दिशा मग 
पग-पग चलना, 
मंज़िल वरना।
२. कवि जी! युग की 
करुणा लिख दो. 
कविता अरुणा-
वरुणा लिख दो. 
सरदी-गरमी-
बरखा लिख दो. 
बुझना-जलना- 
चलना लिख दो 
रुकना-झुकना- 
तनना लिख दो 
गिरना-उठना-
बढ़ना लिख दो 
पग-पग सीढ़ी 
चढ़ना लिख दो
----------------
मधुभार / छवि छंद
*
छंद-लक्षण: जाति वासव, प्रति पंक्ति ८ मात्रा, चरणान्त पयोधर, जगण (लघु गुरु लघु)। 
लक्षण छंद:
रचें मधुभार, 
कला अठ धार 
जगण छवि अंत, 
रखें कवि कंत
उदाहरण:
१. करुणानिधान! 
सुनिए पुकार
रख दास-मान, 
भव से उबार 
२. कर ले सितार, 
दें छेड़ तार 
नित तानसेन, 
सुध-बुध बिसार
३. जब लोकतंत्र, 
हो लोभतंत्र 
बन कोकतंत्र, 
हो शोकतंत्र
१-६-२०१४ 
----------------


घनाक्षरी / मनहरण कवित्त
... झटपट करिए
संजीव 'सलिल'
*
लक्ष्य जो भी वरना हो, धाम जहाँ चलना हो,
काम जो भी करना हो, झटपट करिए.
तोड़ना नियम नहीं, छोड़ना शरम नहीं,
मोड़ना धरम नहीं, सच पर चलिए.
आम आदमी हैं आप, सोच मत चुप रहें,
खास बन आगे बढ़, देशभक्त बनिए-
गलत जो होता दिखे, उसका विरोध करें,
'सलिल' न आँख मूँद, चुपचाप सहिये.
*
छंद विधान: वर्णिक छंद, आठ चरण,
८-८-८-७ पर यति, चरणान्त लघु-गुरु.
*********
मुक्तक 
न मन हो तो नमन मत करना कभी 
नम न हो तो भाव मत वरना कभी 
अभावों से निभाओ तो बात बने 
स्वभावों को मौन मत करना कभी 
१-६-२०१६
***

मुक्तक
*
नटनागर को
आज राधिका कहाँ मिलेगी?
मिली आधुनिक 
तो क्या उसकी दाल गलेगी?
माखन-मिसरी
छोड़, रोज पिज्जा माँगेगी
फेंक बाँसुरी
डिस्कों में क्या कमर हिलेगी??
***

मुक्तक
कभी दुआ तो कभी बद्दुआ से लड़ते हुए
जयी जवान सदा सरहदों पे बढ़ते हुए .
उठाये हाथ में पत्थर मिले वतनवाले
शहादतों को चढ़ा, पुष्प चित्र मढ़ते हुए .

*
मुक्तक
चरण छुए आशीष मिल गया, किया प्रणाम खुश रहो बोले
नम न नयन थे, नमन न मन से किया, हँसे हो चुप बम भोले
गले मिल सकूँ हुआ न सहस, हाथ मिलाऊँ भी तो कैसे?
हलो-हलो का मिला न उत्तर, हाय-हाय सुन तनिक न डोले 
***

१-६-२०१७
***


*
एक रचना 
*
छंद बहोत भरमाएँ 
 राम जी जान बचाएँ 
*
वरण-मातरा-गिनती बिसरी
 गण का? समझ न आएँ
 राम जी जान बचाएँ
*
दोहा, मुकतक, आल्हा, कजरी,
बम्बुलिया चकराएँ
 राम जी जान बचाएँ
*
कुंडलिया, नवगीत, कुंडली,
जी भर मोए छकाएँ
 राम जी जान बचाएँ
*
मूँड़ पिरा रओ, नींद घेर रई
 रहम न तनक दिखाएँ
 राम जी जान बचाएँ
*
कर कागज़ कारे हम हारे
 नैना नीर बहाएँ
राम जी जान बचाएँ
*
ग़ज़ल, हाइकू, शे'र डराएँ
गीदड़-गधा बनाएँ
राम जी जान बचाएँ
*
ऊषा, संध्या, निशा न जानी
सूरज-चाँद चिढ़ाएँ
राम जी जान बचाएँ
*


नवगीत :
माँ जी हैं बीमार...
संजीव 'सलिल'
*
*
माँ जी हैं बीमार...
*
प्रभु! तुमने संसार बनाया.
संबंधों की है यह माया..
आज हुआ है वह हमको प्रिय
जो था कल तक दूर-पराया..
पायी उससे ममता हमने-
प्रति पल नेह दुलार..
बोलो कैसे हमें चैन हो?
माँ जी हैं बीमार...
*
लायीं बहू पर बेटी माना.
दिल में, घर में दिया ठिकाना..
सौंप दिया अपना सुत हमको-
छिपा न रक्खा कोई खज़ाना.
अब तो उनमें हमें हो रहे-
निज माँ के दीदार..
करूँ मनौती, कृपा करो प्रभु!
माँ जी हैं बीमार...
*
हाथ जोड़ कर करूँ वन्दना.
अब तक मुझको दिया रंज ना.
अब क्यों सुनते बात न मेरी?
पूछ रही है विकल रंजना..
चैन न लेने दूँगी, तुमको
जग के तारणहार.
स्वास्थ्य लाभ दो मैया को हरि!
हों न कभी बीमार..
****
१-६-२०१०

---------
मुक्तिका:
जंगल काटे...
संजीव 
'सलिल'
*
जंगल काटे, पर्वत खोदे, बिना नदी के घाट रहे हैं.
अंतर में अंतर पाले वे अंतर्मन-सम्राट रहे हैं?.
.
जननायक जनगण के शोषक, लोकतंत्र के भाग्य-विधाता.
निज वेतन-भत्ता बढ़वाकर अर्थ-व्यवस्था चाट रहे हैं..
.
सत्य-सनातन मूल्य, पुरातन संस्कृति की अब बात मत करो.
नव विकास के प्रस्तोता मिल इसे बताते. हाट रहे हैं..
.
मखमल के कालीन मिले या मलमल के कुरते दोनों में
अधुनातनता के अनुयायी बस पैबन्दी टाट रहे हैं..
.
पट्टी बाँधे गांधारी सी, न्याय-व्यवस्था निज आँखों पर.
धृतराष्ट्री हैं न्यायमूर्तियाँ, अधिवक्तागण भाट रहे हैं..
.
राजमार्ग निज-हित के चौड़े, जन-हित की पगडंडी सँकरी.
जात-पाँत के ढाबे-सम्मुख ऊँच-नीच के खाट रहे हैं..
.
'सेवा से मेवा' ठुकराकर 'मेवा हित सेवा' के पथ पर
पग रखनेवाले सेवक ही नेता-साहिब लाट रहे हैं..
.
मिथ्या मान-प्रतिष्ठा की दे रहे दुहाई बैठ खाप में
'सलिल' अत्त के सभी सयाने मिल अपनी जड़ काट रहे हैं..
*
हाट = बाज़ार, भारत की न्याय व्यवस्था की प्रतीक मूर्ति की आँखों पर
पट्टी चढी है, लाट साहिब = बड़े अफसर, खाप = पंचायत, जन न्यायालय, अत्त के
सयाने = हद से अधिक होशियार = व्यंगार्थ वास्तव में मूर्ख.
१-६-२०१०

samiksha