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बुधवार, 23 जुलाई 2014

Rashtreey Kayasth Mahaparishad: Cuttack sammelan 5-6 july 2014

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     ॐ               

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद 
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओंमंदिरोंपत्रिकाओं व सज्जनों का परिसंघ,

पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवासपड़ाव पोखर लेनआमगोलामुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३०६२१-२२४३९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेन्टनेपियर टाउनजबलपुर४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ ०७६१ २४१११३१salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१ब्लोक ६मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५०६१२ २६८४४४४arbindsinha@yahoo.com 
  कायास्थित ईश काअंश हुआ कायस्थ ।
। सब सबके सहयोग सेहों उन्नत आत्मस्थ ।।
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 पत्र क्रमांक: ४७७ महा/राकाम/२०१४                                               जबलपुर, दिनाँक: १७.०७.२०१४
                                                 
                अर्धवार्षिक सम्मेलन, संचालन/कार्यकारिणी समिति बैठक ५-६ जुलाई २०१४ 
संक्षिप्त कार्यवाही विवरण  
संचालन/कार्यकारिणी समिति बैठक, अपरान्ह ४-६ बजे, स्थान अशोका होटल कटक, कक्ष क्र.३०५

        परात्पर परमब्रम्ह चराचर के कर्मदेवता प्रभु चित्रगुप्त के ध्यान पश्चात अध्यक्ष श्री त्रिलोकी प्रसाद वर्मा की अध्यक्षता में संचालन समिति की बैठक प्रारंभ हुई। संगठन सचिव श्री अरूण श्रीवास्तव ‘विनीत’ ने बिठूर, कानपुर में दिनांक 13.4.2014 को संपन्न बैठक की कार्यवाही का वाचन किया जिसे पारित किया गया।
        उपाध्यक्ष श्री के. के. वर्मा तथा संगठन सचिव श्री अरूण कुमार श्रीवास्तव ‘विनीत’ द्वारा प्रस्तुत मौखिक प्रतिवेदन अनुमोदित किये गये। कोषाध्यक्ष श्री अरविन्द कुमार सिन्हा द्वारा प्रेषित आय-व्यय लेखा अपूर्ण विवरण तथा तत्कालीन महामंत्री के हस्ताक्षर के अभाव में पारित नहीं किया जा सका। अध्यक्ष जी ने आदेशित किया कि लेखा पूर्णकर आगामी बैठक में प्रस्तुत किया जाए। वरिष्ठ उपाध्यक्ष तथा संयुक्त महसचिव के संदेशों का वाचन किया गया। कोषाध्यक्ष ने अपने प्रतिवेदन में मीटिंग, ईटिंग और सिटिंग से बचने तथा नियमित सदस्य तथा संरक्ष्क बनाकर कोष को मजबूत करने का अनुरोध किया
        संस्था की सदस्यता के प्रसार तथा अभिलेखों के नियमित संचारण हेतु निर्णय लिया गया कि हर सदस्य से निर्धारित सदस्यता प्रपत्र (प्रारूपसंलग्न) भराकर सदस्यता शुल्क सहित कोषाध्यक्ष को भेजा जाए। कोषाध्यक्ष पावती क्रमांक/दिनांक, लेखा पुस्तिका में प्रविष्टि कर पृष्ठ क्रमांक व दिनांक अंकित करेंगे, कार्यालय सचिव परिचय पत्र सहित सदस्यता आवेदन महामंत्री को भेजेंगे। महामंत्री द्वारा सदस्यता पंजी में प्रविष्टि की जाँचकर सदस्यता क्रमांक तथा परिचय पत्र आवंटित करेंगे। प्रत्येक त्रिमाही में नये सदस्यों की सूची कार्यालय मंत्री तैयार कर अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन सचिव आदि को भेजेंगे। सूची में सरल क्रमांक, सदस्यता क्रमांक, सदस्यता अवधि, पावती क्रमांक व दिनांक, लेखा पुस्तिका पृष्ठ क्रमांक व दिनांक, नाम, जन्मतिथि, पूरा पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल पता, टिप्पणी आदि जानकारी होंगी। 
      संस्था की सदस्यता संबंधी विविध बिंदुओं पर चर्चा में महमंत्री ने सूचित किया कि वर्तमान संविधान निर्माण के कई वर्ष पूर्व से संस्था पुराने संविधान के अनुसार कार्यरत रही है। पुराने आजीवन तथा संरक्षक सदस्यों की सूची  प्राप्त न हो पाने के कारण उनको सूचना भेजना संभव नहीं हो पा रहा है। संविधान निर्माण के पहले से संस्था के ऐसे सदस्यों को दुबारा सदस्यता लेने के लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं होगा। अध्यक्ष ने उपस्थित सदस्यों से परामर्श कर व्यवस्था दी कि यदि पूर्व सदस्य लिखित में सूचित करें कि वे किस समय से, किस श्रेणी के सदस्य हैं तो उनके प्रकरण पर विचारकर पूर्व सदस्यता बहालकर नया सदस्यता क्रमांक व परिचय पत्र दिया जा सकेगा। इस हेतु अंतिम तिथि ३१ दिसंबर २०१४ होगी। इन प्रकरणों पर संगठन सचिव से परामर्शकर महामंत्री निर्णय लेंगे। कोई विवाद होने पर सदस्य के निवास क्षेत्र से संबंधित उपाध्यक्ष से परामर्श कर वरिष्ठ उपाध्यक्ष अंतिम निर्णय लेंगे। उक्त निर्धारित तिथि के बाद ऐसे सदस्यों को वर्तमान संविधान के अनुसार नवीन सदस्यता लेना होगा तथा २५० रू. प्रवेश शुल्क के साथ २५० रू. वार्षिक, कुल ५००० रु. आजीवन सदस्यता हेतु शुल्क देना होगा।
       गैर सदस्य पदाधिकारियों की वैधता पर व्यापक चर्चा के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब तक नियुक्त सभी पदाधिकारी ३१ अगस्त २०१४ के पूर्व सदस्यता प्रपत्र भरकर तथा शुल्क जमाकर अपने पद पर बने रह सकेंगे। जो पदाधिकारी इस तिथि तक नियमित सदस्यता ग्रहण नहीं करेंगे उनका मनोनयन/निर्वाचन स्वयमेव निरस्त हो जाएगा। भिलाई बैठक में पारित तथा बिठूर बैठक में अनुमोदित अनुसार संविधान में वर्णित संचालन समिति केे निर्धारित पदों के अलावा संगठन हित में मनोनीत पदाधिकारी कार्यकारिणी/संगठन समिति के सदस्य होंगे। मनोनीत संरक्षक, परामर्शदाता तथा मानद सदस्यों के लिये नियमित सदस्य होना स्वैच्छिक होगा।
        सर्वसम्मति से तय किया गया कि संगठन सचिव, उपाध्यक्ष संगठन प्रांतीय/जिला प्रभारी आदि अपने-अपने प्रभार-क्षेत्रों में संगठन कार्य हेतु ,त्रैमासिक भ्रमण कार्यक्रम महामंत्री/संगठन सचिव से परामर्श कर बनायेंगे तथा भ्रमण के बाद प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे जिन्हें महामंत्री/ संगठन सचिव के प्रतिवेदन में सम्मिलित किया जाएगा।
              बैठक का समापन करते हुए अध्यक्ष श्री त्रिलोकी प्रसाद वर्मा ने ब्रहमवत घाट ;ब्रहमा की खूंटी, बिठूर कानपुर में गंगा की जलधारा में नौका विहार करते हुए महावीर जयंती पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने के पश्चात भगवान जगन्नाथ के लीला्क्षेत्र पुरी के समीप ऐतिहासिक नगरी कटक में आयोजित बैठक को आत्मानिरीक्षण और आत्म परीक्षण का अवसर निरूपित करते हुए, ठोस निर्णय लेने की प्रेरणा दी। श्री वर्मा ने चित्रगुप्त डायरी में प्रकाशन हेतु सभी पदाधिकारियों/सदस्यों से नाम जन्मतिथि पिता/पति का नाम, पत्राचार का पता, पिन कोड, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल, दो पासपोर्ट चित्र, ब्लड ग्रुप, उप्लब्धियां आदि जानकारी डाॅ. यू.सी. श्रीवास्तव  वरिष्ठ उपाध्यक्ष २०९-२१० आयकर कालोनी, विनायकपुर कानपुर २०६०२६ के पते पर १५ अगस्त २०१४ तक भेजने का अनुरोध किया। लेखा संधारण हेतु पूर्व महामंत्री डाॅ. यू.सी. श्रीवास्तव ५ अगस्त २०१४ के पूर्व किसी रविवार को पटना में कोषाध्यक्ष के साथ लेखा पूर्णकर  आगामी बैठक में अवश्य प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने अपने पत्र दि.१३ अप्रैल २०१४ में चाहे अनुसार माह जुलाई से सितंबर २०१४ हेतु प्रभारी उपाध्यक्षों को भ्रमण कार्यक्रम प्रस्तावित कर भेजने हेतु अनुरोध  किया। जिसके अनुसार आगामी वार्षिक सम्मेलन हेतु ३ तिथियाॅं २२-२३ नवंबर २०१४ ,(मार्गशीर्ष कॄष्ण ३०)  तथा २०-२१ दिसम्बर २०१४ (पौष क्र. १३-१४ )अथवा २७ -२८ दिसंबर १४ (पौश सु ६-७ ) सुझाते हुए अध्यक्ष जी ने आमंत्रण प्रस्ताव, १५ अगस्त २०१४ तक भेजने का अनुरोध किया। अपने-अपने क्षेत्र में स्थान चयन उपाध्यक्ष करेंगे। वार्षिक सम्मेलन में सभी पदाधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य होगी। अध्यक्ष की सहमति से महामंत्री द्वारा उपस्थित पदाधिकारियों तथा संयोजक डाॅ. नीलमणि दास उपाध्यक्ष व उनके सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त कर बैठक समाप्त की घोषणा की गयी।

अर्धवार्षिक सम्मेलनः रविवार ६ जुलाई २०१४ 
स्थान- श्रीरामचंद्र भवन सभागार कटक, समय- प्रातः १०.३० बजे से

देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त जी तथा सरस्वती जी के पूजन पश्चात अध्यक्ष श्री त्रिलोकीप्रसाद वर्मा की अध्यक्षता तथा डा. टाहिलीचरण मोहंती के मुख्यातिथ्य में अर्धवार्षिक सम्मेलन का श्री गणेश हुआ। 
अतिथियों के स्वागत पश्चात संयोजक तथा उपाध्यक्ष प्रो. डा. नीलमणी दास ने स्वागत भाषण में भगवान जगन्नाथ की लीलाभूमि में पहली बार कायस्थ समाज का राष्ट्रीय सम्मिलन होने को ऐतिहासिक पल निरूपित करते हुए उड़ीसा के शासन-प्रशासन, न्याय व्यवस्था तथा सामाजिक समरसता में कायस्थों के अवदान का संकेत किया
स्थानीय वक्ताओं श्री रणधीर दास 'जीवनरंगा', प्रो. डा. टी. मोहंती, डा. हेमंत कुमार दास के सारगर्भित संबोधनों के पश्चात महामन्त्री श्री संजीव वर्मा 'सलिल' ने वैदिक काल से मानव जाति के अभ्युदय में कायस्थों के अवदान, भगवान चित्रगुप्त के माहात्म्य, उड़ीसा में कायस्थों के प्रवेश, करण कायस्थों के नामकरण, ३६० अल्लों (कुलों) आदि पर प्रकाश डाला। 
श्री कमलकान्त वर्मा उपाध्यक्ष, श्री अरूण कुमार श्रीवास्तव ‘विनीत’ संगठन  सचिव, श्री दिलीप कुमार निजी सचिव अध्यक्ष आदि के व्याख्यानों के पश्चात डा. दास द्वारा जातिवाद पर आधारित आरक्षण समाप्त किये जाने, कायस्थो को जनसंख्या के अनुपात में शासकीय सेवा व चुनावों आदि में प्रतिनिधित्व देने तथा राज्यपाल, कुलपति आदि पदों पर साहित्य-कला आदि क्षेत्रों से गैर राजनैतिक व्यक्तित्वों को उनके योगदान के आधार पर अवसर देने संबंधी प्रस्ताव महामन्त्री ने सदन से सर्व सम्मति से पारित कराये. गुन्जन कला सदन द्वारा ओडिस्सी नॄत्य की मनोहर प्र्स्तुति के पश्चात बिरादरी भोज से सम्मेलन का समापन हुआ.    

संलग्नः सदस्यता/सम्बद्धता आवेदन पत्र

  
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओंमंदिरोंपत्रिकाओं व सज्जनों का परिसंघ,पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवासपड़ाव पोखर लेनआमगोलामुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३०६२१-२२४३९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेन्टनेपियर टाउनजबलपुर४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ ०७६१ २४१११३१salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१ब्लोक ६मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५०६१२ २६८४४४४arbindsinha@yahoo.com 
  कायास्थित ईश काअंश हुआ कायस्थ ।
। सब सबके सहयोग सेहों उन्नत आत्मस्थ ।।
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कार्यालय के उपयोग हेतु-    शुल्क रु. ............................
शुल्क रु. .............  पावती क्र............. दिनांक. .............                                       
लेखा पंजी प्रष्ठ क्र.............   दिनांक. ............................ 
परिचय पत्र क्रमांक ........... दिनांक. ............................                                     २ चित्र

सदस्यता / संबद्धता आवेदन पत्र
सदस्यता शुल्क- प्रवेश शुल्क सिर्फ पहली बार २५० रु., वार्षिक २५० रु., आजीवन ५००० रु. 
सबद्धता शुल्क- स्थानीय संस्था ५१ रु., प्रान्तीय संस्था २५१ रु., राष्ट्रीय संस्था ५०१ रु. 

आवेदक व्यक्ति / संस्था का नामः  ............................................................................
(दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल)   ............................................................................
                                                     ............................................................................  
व्यक्ति के पिता/स्ंस्था अध्यक्ष का नामः ...................................................................
व्यक्ति कि माता/स्ंस्था सचिव का नामः....................................................................
मतदाता / पन्जीकरण क्रमांकः     ............................................................................. 
परिवार के सदस्य / संस्था पदाधिकारीः .................................................................................................................................
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अन्य जानकारीः ......................................................................................................
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स्थान  ..................                                                                                                  
दिनांक                                                                                                      हस्ताक्षर

टीप- आवेदन प्रपत्र पूरी तरह भरकर शुल्क तथा २ चित्रों सहित उक्त में से किसी को भेजें।

parasaeenama


परसाईनामा :

हरिशंकर परसाई अपनी मिसाल आप, न भूतो न भविष्यति  …

ताली पीटना 

महावीर और बुद्ध ऐसे संत हुए, जिन्होने कहा - ''सोचो। शंका करो। प्रश्न करो। तब सत्य को पहचानो। जरूरी नहीं कि वही शाश्वत सत्य है, जो कभी किसीने लिख दिया था।''

ये संत वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे और जब तक इन संतोंके विचारों का प्रभाव रहा तब तक विज्ञान की उन्नति भारतमें हुई। भौतिक और रासायनिक विज्ञान की शोध हुई। चिकित्सा विज्ञान की शोध हुई। नागार्जुन हुए, बाणभट्ट हुए। 

इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी में भारतके बड़े से बड़े दिमागने यही काम किया कि सोचते रहे - ईश्वर एक हैं या दो हैं, या अनेक हैं। हैं तो सूक्ष्म हैं या स्थूल। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। इसके साथ ही केवल काव्य रचना। विज्ञान नदारद। 

गल्ला कम तौलेंगे, मगर द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, मुक्ति और पुनर्जन्म के बारे में बड़े परेशान रहेंगे। कपड़ा कम नापेंगे, दाम ज्यादा लेंगे, पर पंच आभूषण के बारे में बड़े जाग्रत रहेंगे।

झूठे आध्यात्म ने इस देश को दुनिया में तारीफ दिलवाई, पर मनुष्य को मारा और हर डाला..


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सूक्ति सलिलाः -संजीव

सूक्ति सलिलाः 

संजीव
*
सत्य से आघात कर दो, है भला 
झूठ से सुविधा नहीं देना मुझे.. 

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

smaran: jagmohan prasad saxena 'chanchareek' -sanjiv

स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
संजीव
*
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक हैं जिनकी पहचान समय नहीं कर सका। उनका सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन,  मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खांटी राजस्थानी बोली, छरफरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है. वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।

लीलाविहारी आनंदकंद गोबर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शिकल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया। सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चन्द्र-बुध-शनि की युति नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दे रहे थे जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक चंचरीक को निरंतर मिलता रहा।    

बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। १९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा  पर चल पड़े जगमोहन। जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों  और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये। 

महाकाव्य त्रयी का सृजन:

चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३  दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। प्रथम कृति में कथा विकास  सहायक पदों  तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ)  के  आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा)  में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि (अभी क्लक्की अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।    

देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएं चंचरीक  सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में समपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में  शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व् डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य  सौभाग्य मिला। 

चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान क देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को ऊपर समग्र ग्रन्थ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए।  को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में उन पर पीठ स्थापित  की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए। 

दोहांजलि: 

ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि 
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि 

कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश 
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएं मथुरेश 

सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप 
शाकुन्तल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप 

चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य 
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य 

राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन 
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन 

सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष 
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष 

कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़ 
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज 

सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब 
चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब 

चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत 
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत 

दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम 

चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य 
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य 

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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

naam anaam: sanjiv

नाम अनाम 

संजीव 

*
पूर्वाग्रह पाले बहुत, जब रखते हम नाम 
सबको यद्यपि ज्ञात है, आये-गये अनाम 

कैकेयी वीरांगना, विदुषी रखा न नाम 
मंदोदरी पतिव्रता, नाम न आया काम 

रास रचाती रही जो, राधा रखते नाम 
रास रचाये सुता तो, घर भर होता वाम 

काली की पूजा करें, डरें- न रखते नाम 
अंगूरी रख नाम दें, कहें न थामो जाम 

अपनी अपनी सोच है, छिपी सोच में लोच 
निज दुर्गुण देखें नहीं, पर गुण लखें न पोच 

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parsaeenama :


परसाईनामा :
हरिशंकर परसाई अपनी मिसाल आप, न भूतो न भविष्यति  …

बेचारा भला आदमी

मैं देखता हूँ कि हर इस तरह का प्रशंसक 'भला' के पहले 'बेचारा' ज़रूर लगता है - "बेचारा भला आदमी है" । यह अकारण नहीं है । हमारी पूरी विचार-प्रक्रिया इन दो शब्दों के साथ चलने में झलकती है । हम 'भला' उसी को कहेंगे जो 'बेचारा' हो । जब तक हम किसी को 'बेचारा' ना बना दें, तब तक उसे भला नहीं कहेंगे । क्यों ? इसके दो कारण हैं - पहला तो यह कि जो बेचारा नहीं है, वह हमें अपने लिए 'चैलेंज' लगता है । उसे हम भला क्यूँ कहें ? दूसरा कारण यह है कि जो बेचारा है उसे हम दबा सकते हैं, लूट सकते हैं - उसका शोषण कर सकते हैं ।
जो हर काम के लिए चंदा दे देता है, वह बेचारा भला आदमी है । जो रिक्शा वाला कम पैसे ले लेता है, वह बेचारा भला आदमी है । जो लेखक बिना पैसे लिये, अखबार के लिए लिख देता है, उसे सम्पादक बेचारा भला आदमी कहते हैं । टिकट कलेक्टर बेचारा भला आदमी है, क्यूंकि वह बिना टिकट निकल जाने देता है । अपनी व्यवस्था ने बहुत सोच समझकर यह मुहावरा तैयार किया है ।

XXXXXX

मुझे इस 'बेचारा भला आदमी' से डर लगता है । अगर देखता हूँ कि मेरे बगल में ऐसा आदमी बैठा है, जो मुझे 'बेचारा भला आदमी' कहता है, तो मैं जेब संभाल लेता हूँ । क्या पता वह जेब काट ले !

बुधवार, 16 जुलाई 2014

हिंदी के मात्रिक छंद : २ ९ मात्रा के आंक जातीय छंद -संजीव

हिंदी के मात्रिक छंद : २ 
९ मात्रा के आंक जातीय छंद : गंग / निधि 
संजीव
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विश्व वाणी हिंदी का छांदस कोश अप्रतिम, अनन्य और असीम है। संस्कृत से विरासत में मिले छंदों  के साथ-साथ अंग्रेजी, जापानी आदि विदेशी भाषाओँ तथा पंजाबी, मराठी, बृज, अवधी आदि आंचलिक भाषाओं/ बोलिओं के छंदों को अपनाकर तथा उन्हें अपने अनुसार संस्कारित कर हिंदी ने यह समृद्धता अर्जित की है। हिंदी छंद शास्त्र के विकास में  ध्वनि विज्ञान तथा गणित ने आधारशिला की भूमिका निभायी है।

विविध अंचलों में लंबे समय तक विविध पृष्ठभूमि के रचनाकारों द्वारा व्यवहृत होने से हिंदी में शब्द विशेष को एक अर्थ में प्रयोग करने के स्थान पर एक ही शब्द को विविधार्थों में प्रयोग करने का चलन है। इससे अभिव्यक्ति में आसानी तथा विविधता तो होती है किंतु शुद्घता नहीँ रहती। विज्ञान विषयक विषयों के अध्येताओं तथा हिंदी सीख रहे विद्यार्थियों के लिये यह स्थिति भ्रमोत्पादक तथा असुविधाकारक है। रचनाकार के आशय को पाठक ज्यों  का त्यो ग्रहण कर सके इस हेतु हम छंद-रचना में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों के साथ प्रयोग किया जा रहा अर्थ विशेष यथा स्थान देते रहेंगे।

अक्षर / वर्ण = ध्वनि की बोली या लिखी जा सकनेवाली लघुतम स्वतंत्र इकाई।
शब्द = अक्षरों का सार्थक समुच्चय।
मात्रा / कला / कल = अक्षर के उच्चारण में लगे समय पर आधारित इकाई।
लघु या छोटी  मात्रा = जिसके उच्चारण में इकाई समय लगे।  भार १, यथा अ, इ, उ, ऋ अथवा इनसे जुड़े अक्षर, चंद्रबिंदी वाले अक्षर
दीर्घ, हृस्व या बड़ी मात्रा = जिसके उच्चारण में अधिक समय लगे। भार २, उक्त लघु अक्षरों को छड़कर शेष सभी अक्षर, संयुक्त अक्षर अथवा उनसे जुड़े अक्षर, अनुस्वार (बिंदी वाले अक्षर)।
पद = पंक्ति, चरण समूह।
चरण = पद का भाग, पाद।
छंद = पद समूह।
यति = पंक्ति पढ़ते समय विराम या ठहराव के स्थान।
छंद लक्षण = छंद की विशेषता जो उसे अन्यों से अलग करतीं है।
गण = तीन अक्षरों का समूह विशेष (गण कुल ८ हैं, सूत्र: यमाताराजभानसलगा के पहले ८ अक्षरों में से प्रत्येक अगले २ अक्षरों को मिलाकर गण विशेष का मात्राभार  / वज़्न तथा मात्राक्रम इंगित करता है. गण का नाम इसी वर्ण पर होता है। यगण = यमाता = लघु गुरु गुरु = ४, मगण = मातारा = गुरु गुरु गुरु = ६, तगण = ता रा ज = गुरु गुरु लघु = ५, रगण = राजभा = गुरु लघु गुरु = ५, जगण = जभान = लघु गुरु लघु = ४, भगण = भानस = गुरु लघु लघु = ४, नगण = न स ल = लघु लघु लघु = ३, सगण = सलगा = लघु लघु गुरु = ४)।
तुक = पंक्ति / चरण के अन्त में  शब्द/अक्षर/मात्रा या ध्वनि की समानता ।
गति = छंद में गुरु-लघु मात्रिक क्रम।
सम छंद = जिसके चारों चरण समान मात्रा भार के हों।
अर्द्धसम छंद = जिसके सम चरणोँ का मात्रा भार समान तथा विषम  चरणों का मात्रा भार एक सा  हो किन्तु सम तथा विषम चरणोँ क़ा मात्रा भार समान न हों।
विषम छंद = जिसके चरण असमान हों।
लय = छंद  पढ़ने या गाने की धुन या तर्ज़।
छंद भेद =  छंद के प्रकार।
वृत्त = पद्य, छंद, वर्स, काव्य रचना । ४ प्रकार- क. स्वर वृत्त, ख. वर्ण वृत्त, ग. मात्रा वृत्त, घ. ताल वृत्त।
जाति = समान मात्रा भार के छंदों का  समूहनाम।
प्रत्यय = वह रीति जिससे छंदों के भेद तथा उनकी संख्या जानी जाए। ९ प्रत्यय: प्रस्तार, सूची, पाताल, नष्ट, उद्दिष्ट, मेरु, खंडमेरु, पताका तथा मर्कटी।
दशाक्षर = आठ गणों  तथा लघु - गुरु मात्राओं के प्रथमाक्षर य म त र ज भ न स ल ग ।
दग्धाक्षर = छंदारंभ में वर्जित लघु अक्षर - झ ह  र भ ष। देवस्तुति में प्रयोग वर्जित नहीं।
गुरु या संयुक्त दग्धाक्षर छन्दारंभ में प्रयोग किया जा सकता है।                                                                                    
नौ मात्रिक छंद / आंकिक छंद

जाति नाम आंक (नौ अंकों के आधार पर), भेद ५५,  

आंकिक उपमान: 

नन्द:, निधि:, विविर, भक्ति, नग, मास, रत्न , रंग, द्रव्य, नव दुर्गा - शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री। गृह: सूर्य/रवि , चन्द्र/सोम, गुरु/बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतु, कुंद:, गौ:, 
नौगजा नौ गज का वस्त्र/साड़ी, नौरात्रि शक्ति ९ दिवसीय पर्व।, नौलखा नौ लाख का (हार), 
नवमी ९ वीं तिथि आदि।

वासव छंदों के ३४ भेदों की मात्रा बाँट लघु-गुरु मात्रा संयोजन के आधार पर ५ वर्गों में निम्न अनुसार होगी:

अ. नव निधि वर्ग (१ प्रकार)- १. १११११११११ 

छंद  लक्षणः प्रति पद ९ लघु मात्रायें- 

उदाहरणः
 १. चल अशरण शरण 
    कर पग पथ वरण 
    वर नित नव क्षरण
    मत डर शुभ मरण

२. दिनकर गगन पर
    प्रगटित शगुन कर
    कलरव सतत सुन
    छिप मन सपन बुन  

आ. सप्तेक वर्गः (८ प्रकार)- २. १११११११२ ३. ११११११२१, ४. १११११२११, ५. ११११२१११, ६. १११२११११, ७. ११२१११११, ८. १२११११११, ९. २१११११११

छंद लक्षणः प्रति पद ७ लघु १ गुरु मात्रायें

उदाहरणः
 १. हर पल समर है
    सत-शुभ अमर है
    तन-मन विवश क्यों?
    असमय अवश क्यों?

२. सब सच सच बोल
    मत रख कुछ झोल
    कह तब जब तोल
    सुन लहर-किलोल

इ. पंच परमेश्वर वर्ग (२१ प्रकार)- १०. १११११२२, ११. ११११२१२, १२. १११२११२, १३. ११२१११२, १४, १२११११२, १५. २१११११२, १६. २११११२१, १७. २१११२११, १८. २११२१११, १९. २१२११११, २०. २२१११११, २१. १२२११११, २२. ११२२१११, २३. १११२२११, २४. ११११२२१, २५.१२१२१११, २६. ११२१२११, २७.१११२१२१, २८.१२११२११, २९.११२११२१, ३०. १२१११२१

छंद लक्षणः प्रति पद ५ लघु २ गुरु मात्रायें

उदाहरणः
 १. कर मिलन मीता
    रख मन न रीता 
    पग सतत नाचें
    नित सुमिर गीता

२. जब घर आइए
    हँस सुख पाइए  
    प्रिय मुख चूमिए
    प्रभु गुण गाइए

ई. जननि कैकेयी वर्गः  (२० प्रकार) ३१. १११२२२, ३२. ११२१२२, ३३. ११२२१२, ३४. ११२२२१, ३५. १२१२२१, ३६. १२१२१२, ३७. १२११२२, ३८. १२२११२, ३९. १२२१२१, ४०. १२२१२११, ४१. २१११२२, ४२. २११२१२, ४३. २११२२१, ४४.२१२११२, ४५. २१२१२१, ४६. २१२२११, ४७. २२१११२, ४८. २२११२१, ४९. २२१२१२, ५०. २२२१११  

छंद लक्षणः प्रति पद ३ लघु ३ गुरु मात्रायें

उदाहरणः
 १. जननि कैकेयी
    प्रणत वैदेही 
    विहँस आशीषें
    'हॄदय को जीतें'

२. कुछ भी न भाये
    प्रिय याद आये...
    
    उनको बुलादो
    अब तो मिला दो
    मन-बाग सूखा
    कलियाँ खिला दो
    सुख ना सुहाये
    दिल को जलाये...

उ. जननि कैकेयी वर्गः (५ प्रकार)  ५१.१२२२२, ५२. २१२२२, ५३. २२१२२, ५४. २२२१२, ५५. २२२२१

छंद लक्षणः प्रति पद १ लघु ४ गुरु मात्रायें

उदाहरणः
 १. नहीं छोड़ेंगे
    कभी चाहों को
    हमीं मोड़ेंगे
    सदा राहों को
    नहीं तोड़ेंगे
    प्रिये! वादों को
    चलो ओढेंगे
    हसीं चाहों को
        
२. मीत! बोलो तो 
    राज खोलो तो
    खूब रूठे हो
    साथ हो लो तो

३. बातें बनाना
    राहें भुलाना
    शोभा न देता

    छोड़ो बहाना
    वादा निभाना!

छंद की ४ या ६ पंक्तियों में विविध तुकान्तों प्रयोग कर और भी अनेक उप प्रकार रचे जा सकते हैं।

छंद-लक्षण: प्रति पंक्ति ९ मात्रा
लक्षण छंद:

आंक छंद रचें, 
नौ हों कलाएँ।
मधुर स्वर लहर
गीत नव गाएँ।

उदाहरण:

सूरज उगायें,
तम को भगायें।
आलस तजें हम-
साफल्य पायें।
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निधि छंद: ९ मात्रा 
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लक्षण: निधि नौ मात्रिक छंद है जिसमें चरणान्त में लघु मात्रा होती है. पद (पंक्ति) में चरण संख्या एक या अधिक हो सकती है.
लक्षण छंद:
नौ हों कलाएं,
चरणांत लघु हो
शशि रश्मियां ज्यों
सलिल संग विभु हो
उदाहरण :

१. तजिए न नौ निधि
   भजिए किसी विधि
   चुप मन लगाकर-
   गहिए 'सलिल' सिधि
२. रहें दैव सदय, करें कष्ट विलय
   मिले आज अमिय, बहे सलिल मलय
   मिटें असुर अजय, रहें मनुज अभय
   रचें छंद मधुर, मिटे सब अविनय
३. आओ विनायक!, हर सिद्धि दायक
   करदो कृपा अब, हर लो विपद सब
   सुख-चैन दाता, मोदक ग्रहण कर
   खुश हों विधाता, हर लो अनय अब 
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गंग छंद: ९ मात्रा
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लक्षण: जाति आंक, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ९, चरणान्त गुरु गुरु
लक्षण छंद:
नयना मिलाओ, हो पूर्ण जाओ,
दो-चार-नौ की धारा बहाओ  
लघु लघु मिलाओ, गुरु-गुरु बनाओ
आलस भुलाओ, गंगा नहाओ
उदाहरण:
१. हे गंग माता! भव-मुक्ति दाता
   हर दुःख हमारे, जीवन सँवारो
   संसार की दो खुशियाँ हजारों
   उतर आस्मां से आओ सितारों
   ज़न्नत ज़मीं पे नभ से उतारो
   हे कष्टत्राता!, हे गंग माता!!
२. दिन-रात जागो, सीमा बचाओ
    अरि घात में है, मिलकर भगाओ
    तोपें चलाओ, बम भी गिराओ
    सेना अकेली न हो सँग आओ    
३. बचपन हमेशा चाहे कहानी 
    हँसकर सुनाये अपनी जुबानी
    सपना सजायें, अपना बनायें 
    हो ज़िंदगानी कैसे सुहानी?
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