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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

अक्टूबर ११, रुहेली, चाँद, हरिगीतिका, भवन, दोहा, बात, मुक्तिका, नवगीत

सलिल सृजन अक्टूबर ११ 

धरती की बर्बाद चाँद पे जा रए हैं २३
चंदा डर सेन पीरो, जे मुस्का रए हैं
एक दूसरे की छाती पै बम फेंकें २२
***
गीत
चंदा! हमैं वरदान दै
(रुहेली)
*
चंदा! हमैं वरदान दै,
पाँयन तुमारिन सै परैं।
पूनम भौत भाती हमैं
उम्मीद दै जाती हमैं।
उजियारते देवा तुमई
हर साँझ हरसाते हमैं।
मम्मा! हमैं कछु ज्ञान दै,
अज्ञान सागर सै तरैं।।
दै सूर्य भैया उजारो
बहिन उसा नैं पुकारो।
तारों सैं यारी पुरानी
रजनी में सासन तुमारो।
बसबे हमें स्थान दै,
लै बिना ना दर सै टरैं।।
तुम चाहते हौ सांत हौं
सबसै मिलें हम प्रेम से।
किरपा तुमारी मिलै तौ
तुम पै बसें हम छेम से।
खुस हो तुरत गुनगान सें ,
हम सब बिनै तुम सै करैं।।
११-१०-२०२३
***
दोहा मुक्तिका:
संदेहित किरदार.....
*
लोकतंत्र को शोकतंत्र में, बदल रही सरकार.
असरदार सरदार सशंकित, संदेहित किरदार..
योगतंत्र के जननायक को, छलें कुटिल-मक्कार.
नेता-अफसर-सेठ बढ़ाते, प्रति पल भ्रष्टाचार..
आम आदमी बेबस-चिंतित, मूक-बधिर लाचार.
आसमान छूती मंहगाई, मेहनत जाती हार..
बहा पसीना नहीं पल रहा, अब कोई परिवार.
शासक है बेफिक्र, न दुःख का कोई पारावार..
राजनीति स्वार्थों की दलदल, मिटा रही सहकार.
देश बना बाज़ार- बिकाऊ, थाना-थानेदार..
अंधी न्याय-व्यवस्था, सच का कर न सके दीदार.
काले कोट दलाल- न सुनते, पीड़ित का चीत्कार..
जनमत द्रुपदसुता पर, करे दु:शासन निठुर प्रहार.
कृष्ण न कोई, कौन सकेगा, गीता-ध्वनि उच्चार?
सबका देश, देश के हैं सब, तोड़ भेद-दीवार.
श्रृद्धा-सुमन शहीदों को दें, बाँटें-पायें प्यार..
सिया जनास्था का कर पाता, वनवासी उद्धार.
सत्ताधारी भेजे वन को, हर युग में हर बार..
लिये खडाऊँ बापू की जो, वही बने बटमार.
'सलिल' असहमत जो वे भी हैं, पद के दावेदार..
'सलिल' एक है राह, जगे जन, सहे न अत्याचार.
अफसरशाही को निर्बल कर, छीने निज अधिकार..
***
नवगीत:
कम लिखता हूँ...
*
क्या?, कैसा है??
क्या बतलाऊँ??
कम लिखता हूँ,
बहुत समझना...
*
पोखर सूखे,
पानी प्यासा.
देती पुलिस
चोर को झाँसा.
खेतों संग
रोती अमराई.
अन्न सड़ रहा,
फिके उदासा.
किस्मत में
केवल गरीब की
भूखा मरना...
*
चूहा खोजे,
मिला न दाना.
चमड़ी ही है
तन पर बाना.
कहता भूख,
नहीं बीमारी,
जिला प्रशासन
बना बहाना.
न्यायालय से
छल करता है
नेता अपना...
*
शेष न जंगल,
यही अमंगल.
पर्वत खोदे-
हमने तिल-तिल.
नदियों में
लहरें ना पानी.
न्योता मरुथल
हाथ रहे मल.
जो जैसा है
जब लिखता हूँ
बहुत समझना...
***
मुक्तिका :
भजे लछमी मनचली को..
*
चाहते हैं सब लला, कोई न चाहे क्यों लली को?
नमक खाते भूलते, रख याद मिसरी की डली को..
गम न कर गर दोस्त कोई नहीं तेरा बन सका तो.
चाह में नेकी नहीं, तू बाँह में पाये छली को..
कौन चाहे शाक-भाजी-फल खिलाना दावतों में
चाहते मदिरा पिलाना, खिलाना मछली तली को..
ज़माने में अब नहीं है कद्र फनकारों की बाकी.
बुलाता बिग बोंस घर में चोर डाकू औ' खली को..
राजमार्गों पर हुए गड्ढे बहुत, गुम सड़क खोजो.
चाहते हैं कदम अब पगडंडियों को या गली को..
वंदना या प्रार्थना के स्वर ज़माने को न भाते.
ऊगता सूरज न देखें, सराहें संध्या ढली को..
'सलिल' सीता को छला रावण ने भी, श्री राम ने भी.
शारदा तज अवध-लंका भजे लछमी मनचली को..
***
लेख :
भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र
*
वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम नमाम्यहम् - समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश
वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव
चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम।
सनातन भारतीय शिल्प विज्ञान के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की
कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च
तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों
को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञान का उद्देश्य है।
मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिये ऐसा
घर बनाते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो
बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश
समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं। एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर
करता है। यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-
पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई,
ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की
दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिये अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर
निष्कर्ष पर पहुँचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किये जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है।
* भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है। पूर्व, उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय)
तथा पूर्व-पश्चिम (वायव्य) दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण-
पूर्व (आग्नेय) से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित दिशा से प्रवेश
अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है।
* भवन के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची, मद्य, मांस
आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो।
* मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है।
* शयन कक्ष में मन्दिर न हो।
* वायव्य दिशा में अविवाहित कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो। इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है।
* शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए। मानव शरीर एक चुम्बक की
तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है। मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक
दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएँ आपस में टकराने के कारण
प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी। फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं। सोते
समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक
प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है। पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य
से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना
मना है।
* भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है।* शयन तथा भंडार कक्ष यथासंभव सटे हुए न हों।
* शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं।
* पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह इस तरह हो कि पूजा करनेवाले का मुँह पूर्व
या ईशान दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम या नैऋत्य की ओर रहे। बहुमंजिला
भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है। पूजास्थल पर हवन कुण्ड या
अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें।
* रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे। चूल्हा
आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४'' स्थान छोड़कर रखें। रसोई, शौचालय एवं पूजा
एक दूसरे से सटे न हों। रसोई में अलमारियाँ दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान दिशा में
रखें।
* बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो. दीवारों का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर
लाल या काला न हो। युद्ध, हिंसक जानवरों, भूत-प्रेत, दुर्घटना या अन्य भयानक दृश्यों के चित्र न हों। अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों।
* सीढ़ियाँ दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों।
सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो. सीढियों की संख्या विषम हो।
* कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है। दक्षिण या
नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है।
* स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना ईशान, पूर्व या उत्तर में गीजर
तथा स्विच बोर्ड आग्नेय दिशा में हों।
* शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान, पूर्व या उत्तर में, सेप्टिक टेंक उत्तर या पूर्व में हो।
* मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो। यह स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो।
* घर के पश्चिम में ऊँची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है।
* घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों।
तहखाना ईशान, उत्तर या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो। सूर्य किरनें तहखाने तक
पहुँचना चाहिए।
* मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो।
* घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है।
वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य 'इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है। नारद
संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-
'अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह।'
अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन -
धन्यादि का लाभ प्राप्त करता है।
***
हरिगीतिका:
मानव सफल हो निकष पर पुरुषार्थ चारों मानकर.
मन पर विजय पा तन सफल, सच देवता पहचान कर..
सौरभमयी हर श्वास हो, हर आस को अनुमान कर.
भगवान को भी ले बुला भू, पर 'सलिल' इंसान कर..
*
अष्टांग की कर साधना, हो अजित निज उत्थान कर.
थोथे अहम् का वहम कर ले, दूर किंचित ध्यान कर..
जो शून्य है वह पूर्ण है, इसका तनिक अनुमान कर.
भटकाव हमने खुद वरा है, जान को अनजान कर..
*
हलका सदा नर ही रहा नारी सदा भारी रही.
यह काष्ट है सूखा बिचारा, वह निरी आरी रही..
इसको लँगोटी ही मिली उसकी सदा सारी रही.
माली बना रक्षा करे वह, महकती क्यारी रही..
*
माता बहिन बेटी बहू जो, भी रही न्यारी रही.
घर की यही शोभा-प्रतिष्ठा, जान से प्यारी रही..
यह हार जाता जीतकर वह, जीतकर हारी रही.
यह मात्र स्वागत गीत वह, ज्योनार की गारी रही..
*
हमने नियति की हर कसौटी, विहँस कर स्वीकार की.
अब पग न डगमग हो रुकेंगे, ली चुनौती खार की.
अनुरोध रहिये साथ चिंता, जीत की ना हार की..
हर पर्व पर है गर्व हमको, गूँज श्रम जयकार की..
*
उत्सव सुहाने आ गये हैं, प्यार सबको बाँटिये.
भूलों को जाएँ भूल, नाहक दण्ड दे मत डाँटिये..
सबसे गले मिल स्नेह का, संसार सुगढ़ बनाइये.
नेकी किये चल 'सलिल', नेकी दूसरों से पाइये..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
ऐसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें, सुना सरगम 'सलिल' सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
दिल से मिले दिल तो बजे त्यौहार की शहनाइयाँ.
अरमान हर दिल में लगे लेने विहँस अँगड़ाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या सँग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप अपने काव्य को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियां संभाव्य को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यहे एही इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध है हम यह न भूलें एकता में शक्ति है.
है इल्तिजा सबसे कहें सर्वोच्च भारत-भक्ति है..
इसरार है कर साधना हों अजित यह ही युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
*
मुक्तिका:
*
काम कर बेकाम, कोई क्यों निठल्ला रह मरे?
धान इस कोठे का बनिया दूजे कोठे में भरे.
फोड़ सर पत्थर पे मिलता है अगर संतोष तो
रोकता कोई नहीं, मत आप करने से डरे
काम का परिणाम भी होता रहा जग में सदा
निष्काम करना काम कब चाहा किसी ने नित करे?
नाम ने बदनाम कर बेनाम होने ना दिया
तार तो पाता नहीं पर चाहता है नर तरे
कब हरे हमने किसी के दर्द पहले सोच लें
हुई तबियत हरी, क्यों कोई हमारा दुःख हरे
मिली है जम्हूरियत तो कद्र हम करते नहीं
इमरजेंसी याद करती रूह साये से डरे
बेहतर बहता रहे चुपचाप कोई पी सके
'सलिल' कोई आ तुझे अपनी गगरिया में भरे
११-१०-२०१५
***
नवगीत
बचपन का
अधिकार
उसे दो
याद करो
बीते दिन अपने
देखे सुंदर
मीठे सपने
तनिक न भाये
बेढब नपने
अब अपना
स्वीकार
उसे दो
पानी-लहरें
हवा-उड़ानें
इमली-अमिया
तितली-भँवरे
कुछ नटखटपन
कुछ शरारतें
देखो हँस
मनुहार
उसे दो
इसकी मुट्ठी में
तक़दीरें
यह पल भर में
हरता पीरें
गढ़ता पल-पल
नई नज़ीरें
आओ!
नवल निखार
इसे दो
***
लघुकथा
सफलता
*
गुरु छात्रों को नीति शिक्षा दे रहे थे- ' एकता में ताकत होती है. सबको एक साथ हिल-मिलकर रहना चाहिए- तभी सफलता मिलती है.'
' नहीं गुरु जी! यह तो बीती बात है, अब ऐसा नहीं होता. इतिहास बताता है कि सत्ता के लिए आपस में लड़ने वाले जितने अधिक नेता जिस दल में होते हैं' उसके सत्ता पाने के अवसर उतने ज्यादा होते हैं. समाजवादियों के लिए सत्ता अपने सुख या स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं जनसेवा का माध्यम थी. वे एक साथ मिलकर चले, धीरे-धीरे नष्ट हो गए. क्रांतिकारी भी एक साथ सुख-दुःख सहने कि कसमें खाते थे. अंतत वे भी समाप्त हो गए. जिन मौकापरस्तों ने एकता की फ़िक्र छोड़कर अपने हित को सर्वोपरि रखा, वे आज़ादी के बाद से आज तक येन-केन-प्रकारेण कुर्सी पर काबिज हैं.' -होनहार छात्र बोला.
गुरु जी चुप!
११-१०-२०१४
***
दोहा सलिला
दोहे बात ही बात में
*
बात करी तो बात से, निकल पड़ी फिर बात
बात कह रही बात से, हो न बात बेबात
*
बात न की तो रूठकर, फेर रही मुँह बात
बात करे सोचे बिना, बेमतलब की बात
*
बात-बात में बढ़ गयी, अनजाने ही बात
किये बात ने वार कुछ, घायल हैं ज़ज्बात
*
बात गले मिल बात से, बन जाती मुस्कान
अधरों से झरता शहद, जैसे हो रस-खान
*
बात कर रही चंद्रिका, चंद्र सुन रहा मौन
बात बीच में की पड़ी, डांट अधिक ज्यों नौन?
*
आँखों-आँखों में हुई, बिना बात ही बात
कौन बताये क्यों हुई, बेमौसम बरसात?
*
बात हँसी जब बात सुन, खूब खिल गए फूल
ए दैया! मैं क्या करूँ?, पूछ रही चुप धूल
*
बात न कहती बात कुछ, रही बात हर टाल
बात न सुनती बात कुछ, कैसे मिटें सवाल
*
बात काट कर बात की, बात न माने बात
बात मान ले बात जब, बढ़े नहीं तब बात
*
दोष न दोषी का कहे, बात मान निज दोष
खर्च-खर्च घटत नहीं, बातों का अधिकोष
*
बात हुई कन्फ्यूज़ तो, कनबहरी कर बात
'आती हूँ' कह जा रही, बात कहे 'क्या बात'
११-१०-२०११
***

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

अक्टूबर १०, राजस्थानी, चित्रगुप्त, कजरी, लघुकथा, दोहा, चंद्रयान, मानसिक स्वास्थ्य दिवस

सलिल सृजन अक्टूबर १०
*
आज वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य दिवस 
सॉनेट 
तन वीणा मन तार साथ हों तो जीवन में हो आनंद 
कम न एक से  तनिक दूसरा यही सनातन सत्य सखे!
एक टूटता तो दूजा भी खंडित हो गा सके न छंद 
इसको काँटा अगर चुभे तो वह भी पीड़ित रहे सखे!!
तन हो स्वस्थ्य और मन भी तो उसे रतन टाटा जानो 
जो न कमाया जोड़े; बाँटे खुश हो सुख दे औरों को 
जो जोड़े बिन काम उसे ही दीन-दुखी दानव मानो 
देता-लेता ऊपरवाला माध्यम बना रहा हमको 
सत्य समझ देकर मत दाता होने का घमंड पालो 
मतदाता हो जिसे चुनोगे वही तुम्हें धोखा देगा 
सुत ही आग लगाएगा यह जान उसे देखो-पालो 
तुमने लिया पिता से जैसे वैसे सुत तुमसे लेगा  
हल पल स्वास्थ्य दिवस जीवन में तन  का मन का ध्यान रखो 
अपने साथ दूसरों का भी स्वास्थ्य सुधारो मान रखो 
*** 
कजरी 
हरे रामा! चंद्रयान एक भेजा हरिकोटा से हे रामा!
हरे रामा! बाईस अक्टूबर सन दो हजार अठ हे रामा!
हरे रामा! भूवैज्ञानिक फ़ोटू खनिज रसायन रे रामा!
हरे रामा! सौ किलोमीटर दूरी से खींचे फ़ोटू रामा! 
हरे रामा! हाई रिजोल्यूशन सेन्सिंग रिमोट से की रामा!
हरे रामा! चंद्रयान एक भेजा हरिकोटा से हे रामा!

हरे रामा! चंद्रयान दो भेजा हरिकोटा से हे रामा!
हरे रामा! बाईस जुलाई उन्नीस को उड़ पाया रे रामा! 
हरे रामा! जीएसएलवी तीन करे प्रक्षेपित रे रामा!
हरे रामा! आर्बिटर-रोवर-लैंडर शामिल रे रामा!
हरे रामा! दक्षिण ध्रुव पर क्रेटर पानी पाना रे रामा!
हरे रामा! यान करे प्रक्षेपित रॉकेट बूस्टर रे रामा! 
हरे रामा! डी आरबिटिंग मैनोवर नौ सेकेंड रहा रामा!
हरे रामा! आर्गन चालीस पाया बाहरी मण्डल में रामा!
हरे रामा! साराभाई क्रेटर का खींचा फोटू रामा!
हरे रामा! सात सितंबर उन्नीस लैंडिंग विफल हुई रामा!

हरे रामा! यान तीन एल वी एम थ्री ने लांच किया रामा! 
हरे रामा! चौदह जुलाई तेइस को यह यान उड़ा रामा!
हरे रामा तेइस अगस्त तेइस को शशि पर उतरा रामा!
हरे रामा! सॉफ्ट लैंडिंग दक्षिण ध्रुव पर कीर्तिमान रामा!
हरे रामा! आल्टी मीटर, वेलोसिटी मीटर साथ गए रामा!
हरे रामा! लैंडर और प्रणोदन दो मॉड्यूल जुड़े रामा!
हरे रामा! प्लाज्मा के घनत्व का मापन किया हरे रामा!
हरे रामा! भू पर्पटी-मेंटल संरचना समझी रामा!
हरे रामा! खनिज-मृदा-पानी का किया अध्ययन रे रामा!
हरे रामा! दुनिया लोहा माने भारत कुशल-दक्ष रामा!
हरे रामा! फहर तिरंगा छोड़े चिह्न पदों के हे रामा!
हरे रामा! बिंदु शक्ति-शिव नामित नमन करें हम हे रामा!      
१०.१०.२०२४  
***
राजस्थानी मुक्तिका
*
घाघरियो घुमकाय
मरवण घणी सुहाय
*
गोरा-गोरा गाल
मरते दम मुसकाय
*
नैणा फोटू खैंच
हिरदै लई मँढाय
*
तारां छाई रात
जाग-जगा भरमाय
*
जनम-जनम रै संग
ऐसो लाड़ लड़ाय
*
देवी-देव मनाय
मरियो साथै जाय
१०-१०-२०२०
***
मुक्तिका
(१४ मात्रिक मानव जातीय छंद, यति ५-९)
मापनी- २१ २, २२ १ २२
*
आँख में बाकी न पानी
बुद्धि है कैसे सयानी?
.
है धरा प्यासी न भूलो
वासना, हावी न मानी
.
कौन है जो छोड़ देगा
स्वार्थ, होगा कौन दानी?
.
हैं निरुत्तर प्रश्न सारे
भूल उत्तर मौन मानी
.
शेष हैं नाते न रिश्ते
हो रही है खींचतानी
.
देवता भूखे रहे सो
पंडितों की मेहमानी
.
मैं रहूँ सच्चा विधाता!
तू बना देना न ज्ञानी
.
संजीव, १०.१०.२०१८
***
वन्दन
शरणागत हम
*
शरणागत हम
चित्रगुप्त प्रभु!
हाथ पसारे आये।
*
अनहद, अक्षय,अजर,अमर हे!
अमित, अभय,अविजित अविनाशी
निराकार-साकार तुम्हीं हो
निर्गुण-सगुण देव आकाशी।
पथ-पग, लक्ष्य, विजय-यश तुम हो
तुम मत-मतदाता प्रत्याशी।
तिमिर हटाने
अरुणागत हम
द्वार तिहांरे आये।
*
वर्ण, जात, भू, भाषा, सागर
अनिल, अनल,दिश, नभ, नद,गागर
तांडवरत नटराज ब्रम्ह तुम,
तुम ही बृज-रज के नटनागर।
पैग़ंबर, ईसा,गुरु बनकर
तारों अंश सृष्टि हे भास्वर!
आत्म जगा दो
चरणागत हम
झलक निहारें आये।
*
आदि-अंत, क्षय-क्षर विहीन हे!
असि-मसि,कलम-तूलिका हो तुम
गैर न कोई सब अपने हैं-
काया में हैं आत्म सभी हम।
जन्म-मरण,यश-अपयश चक्रित
छाया-माया,सुख-दुःख हो सम।
द्वेष भुला दो
करुणाकर हे!
सुनों पुकारें, आये।
*****
गुजराती अनुवाद
વન્દના
શરણાગત અમે
શરણાગત અમે
ચિત્રગુપ્ત પ્રભુ
હાથ પસારી આવ્યા .
અમાપ ,અખુંટા ,અજર ,અમર છે
અમિત ,અભય, અવિજયી, અવિનાશી,
નિરાકાર, સાકાર તમે છો
નિર્ગુણ ,સગુણ દેવ આકાશી
પથ -પગ લક્ષ્ય વિજય,યશ તમે છો
તમેજ મત -મતદાતા ,પ્રત્યાશી
અંધકાર મટાવા
સૂર્ય સમક્ષ અમે
દ્વાર તમારે આવ્યા .
વર્ણ ,જાત , ભૂ, ભાષા ,સાગર
અનિલ, અગ્નિ ,ખૂણો ,નભ, નદી ,ગાગર
તાંડવકરનાર નટરાજ બ્રહ્મ તમે
તમેજ બૃજ -રજ ના નટનાગર
પૈગમ્બર,ઈસા, ગુરુ બનીને
તારાજ અંશ શ્રુષ્ટિ છે ભાસ્વર
આત્મા જગાડવાને
ચરણાગત અમે
ઝલક નિહારવાને આવ્યા.
આદિ -અંત ,ક્ષય -ક્ષર વિહીન છે
કટાર-અંજન , કલમ તૂલિકા તમે છો
પારકા નથી કોઈ બધાંજ તમે છો
કાયા માં છે પોતાના બધા અમે
જન્મ -મરણ , યશ-અપયશ ચક્રીત
છાયા-માયા ,સુખ -દુઃખ સર્વ સરખા
દ્વેષ ભુલાવો
કરુણાકર છો
સાંભળો પોકારવાને આવ્યા .
મૂળ રચના :આચાર્ય સંજીવ વર્મા "સલિલ"
ભાવાનુવાદ :કલ્પના ભટ્ટ
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मुक्तक सलिला
*
जीवन की आपाधापी ही है सरगम-संगीत
रास-लास परिहास इसी में मन से मन की प्रीत
जब जी चाहे चाहों-बाँहों का आश्रय गह लो
आँख मिचौली खेल समय सँग, हँसकर पा लो जीत
*
प्रीत की रीत सरस गीत हुई
मीत सँग श्वास भी संगीत हुई
आस ने प्यास को बुझने न दिया
बिन कहे खूब बातचीत हुई
*
क्या कहूँ, किस तरह कहूँ बोलो?
नित नई कल्पना का रस घोलो
रोक देना न कलम प्रभु! मेरी
छंद ही श्वास-श्वास में घोलो
*
छंद समझे बिना कहे जाते
ज्यों लहर-साथ हम बहे जाते
बुद्धि का जब अधिक प्रयोग किया
यूं लगा घाट पर रहे जाते
*
गेयता हो, न हो भाव रहे
रस रहे, बिम्ब रहे, चाव रहे
बात ही बात में कुछ बात बने
बीच पानी में 'सलिल' नाव रहे
*
छंद आते नहीं मगर लिखता
देखने योग्य नहीं, पर दिखता
कैसा बेढब है बजारी मौसम
कम अमृत पर अधिक गरल बिकता
*
छंद में ही सवाल करते हो
छंद का क्यों बवाल करते हो?
है जगत दन्द-फन्द में उलझा
छंद देकर निहाल करते हो
*
छंद-छंद में बसे हैं, नटखट आनंदकंद
भाव बिम्ब रस के कसे कितने-कैसे फन्द
सुलझा-समझाते नहीं, कहते हैं खुद बूझ
तब ही सीखेगा 'सलिल' विकसित होगी सूझ
*
खून न अपना अब किंचित बहने देंगे
आतंकों का अरि-खूं से बदला लेंगे
सहनशीलता की सीमा अब ख़त्म हुई
हर ईंटे के बदले में पत्थर देंगे
*
खून न अपना अब किंचित बहने देंगे
आतंकों का अरि-खूं से बदला लेंगे
सहनशीलता की सीमा अब ख़त्म हुई
हर ईंटे के बदले में पत्थर देंगे
* ·
कहाँ और कैसे हो कुछ बतलाओ तो
किसी सवेरे आ कुण्डी खटकाओ तो
बहुत दिनों से नहीं ठहाके लगा सका
बहुत जल चुका थोड़ा खून बढ़ाओ तो
*
क्षणिका :
पुज परनारी संग
श्री गणेश गोबर हुए
रूप - रूपए का खेल
पुजें परपुरुष साथ पर
लांछित हुईं न लक्ष्मी
दोहा :
तुलसी जब तुल सी गयी, नागफनी के साथ
वह अंदर यह हो गयी, बाहर विवश अनाथ.
सोरठा :
घटे रमा की चाह, चाह शारदा की बढ़े
गगन न देता छाँह, भले शीश पर जा चढ़े
जनक छंद :
नोबल आया हाथ जब
उठा गर्व से माथ तब
आँख खोलना शेष अब
हाइकु :
ईंट रेत का
मंदिर मनहर
देव लापता
मुक्तक :
मेरा गीत शहीद हो गया, दिल-दरवाज़ा नहीं खुला
दुनियादारी हुई तराज़ू, प्यार न इसमें कभी तुला
राह देख पथराती अखियाँ, आस निराश-उदास हुई
किस्मत गुपचुप रही देखती, कभी न पाई विहँस बुला
शे'र :
लिए हाथों में अपना सर चले पर
नहीं मंज़िल को सर कर सके अब तक
१०-१०-२०१६
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लघुकथा:
बुद्धिजीवी और बहस
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'आप बताते हैं कि बचपन में चौपाल पर रोज जाते थे और वहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलता थ. क्या वहाँ पर ट्यूटर आते थे?'
'नहीं बेटा! वहाँ कुछ सयाने लोग आते थे जिनकी बातें शेष सभी लोग सुनते-समझते और उनसे पूछते भी थे.'
'अच्छा, तो वहाँ टी. वी. की तरह बहस और आरोप भी लगते होंगे?'
'नहीं, ऐसा तो कभी नहीं होता था'
'यह कैसे हो सकता है? लोग हों, वह भी बुद्धिजीवी और बहस न हो... आप गप्प तो नहीं मार रहे?'
दादा समझाते रहे पर पोता संतुष्ट न हो सका.
१०-१०-२०१४
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दोहा सलिला :
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शत वंदन मैया सजा, अद्भुत रूप अनूप
पूनम का राकेश हँस, निरखे रूप अरूप
सलिल-धार बरसा रहे, दर्शन कर घन श्याम
किये नीरजा ने सभी, कमल तुम्हारे नाम
मृदुल कीर्ति का कर रहीं, शार्दूला गुणगान
प्रतिभा अनुपम दिव्य तव, सकता कौन बखान
कुसुम किरण जिस चमन में, करती शर संधान
वहाँ बहार न लुट सके, मधुकर करते गान
मैया भारत भूमि को, ऐसे दें महिपाल
श्री प्रकाश से दीप्त हो, जिनका उन्नत भाल
कर महेश की वंदना, मिले अचल आनंद
ॐ प्रकाश निहारिये, रचकर सुमधुर छंद
प्रणव नाद कर भारती से पायें आशीष
सीता-राम सदय रहें, कृपा करें जगदीश
कंकर-कंकर में बसे, असित अजित अमरीश
धूप-छाँव सुख-दुःख तुम्हीं, श्वेत-श्याम अवनीश
ललित लास्य तुम हास्य तुम, रुदन तुम्हीं हो मौन
कहाँ न तुम?, क्या तुम नहीं? कह सकता है कौन?
रहा ज्ञान पर बुद्धि का, अंकुश प्रति पल नाथ
प्रभु-प्रताप से छंद रच, धन्य कलम ले हाथ
प्रभु सज्जन अमिताभ की, किरण छुए आकाश
नव दुर्गा को नमन कर, पाये दिव्य-प्रकाश
स्नेह-सलिल का आचमन, हरता सकल विकार
कलकल छलछल निनादित, नेह नर्मदा धार
१०-१०-२०१३

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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

गेंदा

लेख :
गेंदा : एक बहु उपयोगी पुष्प
संजीव वर्मा 'सलिल' 
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गेंद सदृश गेंदा कुसुम, गोल; न लेकिन पोल।
सज्जा-औषधि-सुलभता, गुणी न पीटे ढोल।।

            गेंदा बहु उपयोगी, सर्व सुलभ फूलों का पौधा है। नयनाभिराम दृश्य रचना, सज्जा, पुष्पगुच्छ, पुष्प हार तथा रोगोपचार इसके उपयोग हैं। कद तथा रंगों की विविधता इसका वैशिष्ट्य है। भू-दृश्य की सुन्दरता बढ़ाने, शादी-विवाह में मण्डप सजाने, देवोपासना, सम्मान आदि  कार्यों में सदा बहार, अपेक्षाकृत दीर्घजीवी तथा सस्ता गेंदा अहम् भूमिका निभाता है। यह क्यारियों एवं हरबेसियस बॉर्डर के लिए उपयुक्त पौधा है। मुर्गियों के दाने में भी यह पीले वर्णक का अच्छा स्रोत है।भारत में अफ्रीकन गेंदा और फ्रेंच गेंदा की खेती की जाती है। इसे गुजराती में 'गलगोटा', मारवाड़ी में 'हंजारी गजरा फूल' भी कहा जाता है। पौधों की विभिन्न ऊँचाई एवं विभिन्न रंग-छटा के कारण भू-दृश्य की सुंदरता बढ़ाने में इसका बहुत अधिक महत्व है। इसके अन्य नाम चेंदुमली, टेगेटेस, गलगोटा/गलगोटिया (गुजराती), हंजारी गजरा फूल (मारवाड़ी), मेरिगोल्ड (अंग्रेजी) आदि हैं। इसे बगिया, छत, टेरेस, बालकनी आदि स्थानों पर जमीन या गमले में उगाया जा सकता है। गेंदे के फूल को सुखाकर उसके बीज बनाए, बोए-उगाए जा सकते हैं। गीली मिट्टी में यह कलम से भी ऊग जाता है। गेंदा नेपाल का सांस्कृतिक फूल है।
प्रकार
अफ्रीकी मेरी गोल्ड (गेंदा) का पौधा लगभग १ मीटर ऊँचा तथा फूल बहुदलीय चमकीले पीले या नारंगी रंग के होते हैं। फ्रेंच मेरिगोल्ड (गेंदी) का पौधा लगभग आधा मीटर ऊँचा, सघन तथा फूल बहुदलीय पीले-लाल-नारंगी मिश्रित रंग के होते हैं। सिग्नेट मेरिगोल्ड के फूल अपेक्षाकृत छोटे, नाजुक तथा एकल पंक्ति पंखुरियों युक्त पीले रंग के होते हैं। मैक्सिकन मिंट मेरिगोल्ड के पौधे, पत्तियाँ तथा फूल छोटे होते हैं इसका उपयोग रसोई में तथा औषधि के रूप में किया जाता है। लेमन जेम मेरिगोल्ड की खुशबू नीबू जैसी होती है। इसके चमकीले एकल पीले फूलों का उपयोग जड़ी-बूटी के रूप में अधिक होता है। मेक्सिको से आई टैगेट्स लेमोनी सुगंधित पत्तों तथा चमकीले पील-डेजी जैसे फूलों की सजावटी झाड़ी होती है।
बीजारोपण / पौधरोपण
गेंदे के विकसित फूल को धूप में सुखा लें। फूल को तोड़ कर की बीजनिकाल लें। गमले के पेंदी में छेद कर दें ताकि अधिक पानी बह सके। गमले या क्यारी में भुरभुरी मिट्टी की मोती सतह पर बीज फैलाकर मिट्टी की सतह बिछाकर ढाँक दें। इसे दबाना नहीं है। रोज हलम पानी छिड़कते रहें। कुछ दिनों में बीजों से अंकुर निकलेंगे। अंकुर बढ़कर लगभग ३'' लंबे हो जाएँ तो उन्हें अलग अलग लगा दें। गेंदे की मिट्टी नं होने चाहिए, अधिक पानी न दें। पौधों के बीच में ८'' से १०'' का अंतर रखें। मैंने प्लास्टिक शीशियों, पोलीथीन थैली, पुट्ठे के डब्बों आदि में भी गेंदे के पौधे उगाए है। गेंदा बारहमासी फूल है। इसे हल्की धूप चाहिए। गेंदे का पौधा कमजोर होता है। तेज हवा में पौधे की टहनियाँ टूट जाती हैं। पौधा ऊच हो तो उसे सहारा देना होता है। मैंने टूटी हुई टहनियों को कलम की तरह लगाकर भी पौधे तैयार किए हैं। कली को फूल बनकर खिलने और बढ़ने दें किंतु फूल की पत्तियाँ मुरझाने लगें तो फूल को पौधे सेअलग कर दें ताकि पौधे की ऊर्जा बचे तथा अनावश्यक भार से टहनी न टूटे। गेंदे के लिए पत्तियों, गोबर आदि की खाद उपयुक्त होती है। गेंदे की जड़ों में इतना ही पानी दें की मिट्टी नं रहे। अधिक पानी में पौधा सड़ सकता है।
लाभ 
गेंदा अपनी जड़ों द्वारा जमीन में अफ्लाटर्थोनाईल रसायन छोड़कर निमॅटोड/सूत्रकृमि को नष्ट करता । इसके फूल मधुमक्खियों को आकर्षित करते कर परागीकरण में सहायक होते हैं। गेंदे के फूलों की गंध मच्छर, मक्खी आदि कीट-पतंगों को दूर भगाती है। गेंदे की पत्तियों का रस मलने से मधुमक्खी का दंश अपने आप बाहर निकल जाता है, दर्द और सुजन से राहत मिलती है। गेंदे के रंग-बिरंगे फूल सकर्तमाक ऊर्जा का प्रसारकर आपको खुशी देते हैं। वास्तु के अनुसार गेंदे के फूल सुंदरता और पवित्रता बढ़ाते हैं, विघ्नेश गणेश जी को गेंद प्रिय है। देवी को गेंदे का हार पहनाकर प्रसन्न किया जाता है। गेंदे का फूल साज-सज्ज में अधिक समय तक तरोताजा बना रहता है। गेंदे में ल्यूटिन होता है जो आँखों के लिए लाभदायक है।
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राष्ट्रीय फूल

  
राष्ट्रीय फूल

फूलों की दुनिया में गुलाब राजा है। कविता, फिल्म, थिएटर और संगीत में सम्मानित, यह काफी समझ में आता है कि गुलाब संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और मालदीव का राष्ट्रीय फूल क्यों है। हालाँकि, मेलबर्न क्षेत्र में हमारे द्वारा वितरित किए जाने वाले कई गुलदस्ते, बाउटोनीयर और सेंटरपीस के लिए गुलाब पसंदीदा फूल हो सकते हैं, लेकिन असली सुंदरता फूलों की विविधता में पाई जाती है जो दुनिया के कुछ राष्ट्रीय फूलों का निर्माण करते हैं। मेलबर्न के फूलों ने हमारे १०          पसंदीदा राष्ट्रीय फूलों और उनके प्रतिनिधित्व वाले देशों को चुना है।

१. गोल्डन वैटल - ऑस्ट्रेलिया
पीले फूलों के छोटे-छोटे गुच्छों से सुसज्जित यह सुगंधित झाड़ी ऑस्ट्रेलिया के राजधानी क्षेत्र का मूल निवासी है और इतिहास में ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय फूल के रूप में स्थापित है। इस क्षेत्र के कुछ पहले निवासियों ने अपने घर बनाने के लिए बबूल का इस्तेमाल किया, जिसके बाद से इसका उपनाम "वाटल" पड़ गया। कुछ प्रकार के गोल्डन वैटल का इस्तेमाल आदिवासी लोग हथियार और औजार बनाने के लिए भी करते थे।


२. आइरिस - फ्रांस
आइरिस को फ़्लूर-डी-लिस भी कहा जाता है। यह १२ वीं शताब्दी से फ्रांस देश का आधिकारिक रूप से प्रतिनिधित्व कर रहा है, देश के प्रतीक चिन्ह और राष्ट्रीय प्रतीक दोनों के रूप में। इससे पहले, यह रोमन साम्राज्य के शासक वर्ग का आधिकारिक फूल था। फूल का नाम ग्रीक शब्द "इंद्रधनुष" से लिया गया है, और यह सही भी है; यह बर्फ़ के सफ़ेद से लेकर गहरे बैंगनी तक २००  से ज़्यादा अलग-अलग रंगों में आता है!

३. लिली ऑफ द वैली - फिनलैंड और यूगोस्लाविया

इस नाज़ुक पौधे में छोटे बेल के आकार के फूल होते हैं जो बहुत ही मीठी खुशबू देते हैं, जिससे यह इत्र और दुल्हन के गुलदस्ते दोनों में पसंदीदा बन जाता है। यह जंगलों और किसी भी अन्य ठंडी, छायादार जगह में पनपता है। यह फूल बागवानों के लिए अभिशाप और वरदान दोनों है। यह वरदान है क्योंकि यह कॉलोनियों में उगता है और तेज़ी से फैलता है। यह अभिशाप है क्योंकि - आपने अनुमान लगाया - यह बहुत तेज़ी से फैलता है और थोड़े समय में पूरे बगीचे पर कब्ज़ा कर सकता है।


४. ट्यूलिप - हॉलैंड, हंगरी और तुर्की

शानदार ट्यूलिप हंगरी से आता है, जहाँ यह ओटोमन साम्राज्य के साथ तुर्की तक पहुँचा और फिर अंततः हॉलैंड पहुँचा। वास्तव में, ट्यूलिप एक समय इतना लोकप्रिय था कि १६००  के दशक में डच वाणिज्य की एक पूरी शाखा इसके इर्द-गिर्द ही आधारित थी। ट्यूलिप पूरी दुनिया में अपने आभिजात्य सौन्दर्य के लिए पर्यटकों में बहुत प्रसिद्ध है।  

५. जैस्मिन - पाकिस्तान और सीरिया 

 चमेली की खेती हज़ारों सालों से इसके छोटे, तारे के आकार के फूलों और मादक सुगंध के लिए की जाती रही है। इसकी सादगी और शुद्ध सफेद रंग शुद्धता और शांति का प्रतीक है। सौंदर्य प्रसाधनों, इत्र, खाना पकाने, अरोमाथेरेपी, मालाओं, बालों की सजावट और विभिन्न सांस्कृतिक समारोहों में इस्तेमाल होने वाले इस फूल को देखकर यह समझ में आता है कि यह कई देशों का पसंदीदा फूल क्यों है।
                                                                                                                                                                                                             
६. सूरजमुखी - यूक्रेन

यूक्रेन का पसंदीदा राष्ट्रीय फूल बनने से पहले इस खुशनुमा फूल की खेती मूल रूप से अमेरिका में की जाती थी। वास्तव में, दुनिया के 60% सूरजमुखी अब यूरोप और रूस में उगाए जाते हैं। पारंपरिक लोककथाओं में सूरजमुखी उर्वरता , सौर ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। यह सूरजमुखी की अनोखी प्रवृत्ति से उजागर होता है कि वह अपना "सिर" घुमाता है और आकाश में सूरज का अनुसरण करता है, और रात होने पर ज़मीन की ओर झुक जाता है।

७. ऑर्किड - हांगकांग और होंडुरास

ऑर्किड बेहद लोकप्रिय हैं और व्यापक रूप से उगाए जाते हैं। इस फूल के 25,000 से ज़्यादा प्रकार हैं और हर दिन और भी ज़्यादा खोजे जा रहे हैं। ऑर्किड मानव चेहरे से मिलते-जुलते हैं क्योंकि उनमें द्विपक्षीय समरूपता होती है, शायद यही वजह है कि वे इतने लोकप्रिय हैं। इन बेहतरीन अनोखे फूलों को सजावट और गुलदस्ते में बेशकीमती माना जाता है और इन्हें तुर्की में "साहलेप" नामक पारंपरिक पेय में शामिल किया जाता है। 16वीं शताब्दी के दौरान, यह पेय पदार्थ लंदन, इंग्लैंड में पहुंचा, जहाँ कॉफ़ी की शुरुआत से पहले इसे सड़क किनारे की दुकानों में बेचा जाता था।

८. गुलदाउदी और चेरी ब्लॉसम - जापान

जापान हमारी सूची में एकमात्र ऐसा देश है जो दो राष्ट्रीय फूलों का दावा करता है। चेरी के फूल थोड़े समय के लिए खिलते हैं, और वे जीवन की नाजुक सुंदरता का प्रतीक हैं। जबकि चेरी का फूल जापान का राष्ट्रीय फूल है, गुलदाउदी सदियों से जापानी शाही परिवार का प्रतीक रहा है और हर साल "खुशी के त्यौहार" के दौरान मनाया जाता है।

 ९. काली मिर्च - लाइबेरिया

राष्ट्रीय फूल के रूप में में काली मिर्च के पेड़ को देखना अजीब लग सकता है; हालाँकि, मौसमी फूलों की व्यवस्था में इस्तेमाल किए जाने पर काली मिर्च की टहनियाँ और स्प्रे काफी प्रभावी हो सकते हैं। जब आप किसी व्यवस्था में जोड़ने के लिए एक अद्वितीय दृश्य पॉप की तलाश कर रहे हों, तो काली मिर्च आपके लिए सबसे उपयुक्त है। भारत में काली मिर्च मसाले के रूप में बहुत लोकप्रिय है। इसका तीखा स्वाद इसे खाद्य पदार्थों में मिलाने पर उन्हें स्वादिष्ट बनाता है। केरल दक्षिण भारत में काली मिर्च व्यवसाय का साधन भी है। 



१० . कमल - भारत

मूल रूप से जलीय फूल, कमल का भारतीय जन-जीवन  में बहुत महत्व है। झीलों और तालाबों में उगने वाला यह पवित्र फूल प्राचीन भारत की पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हिंदू पवित्र ग्रंथ - भगवद गीता में, कमल के फूल का उपयोग वैराग्य के रूपक के रूप में किया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कमल कीचड़ वाले पानी में उगता है और अछूता रहता है। यह फूल सुंदरता और ज्ञान का भी प्रतीक है क्योंकि सरस्वती - विद्या की देवी को इस पर बैठे हुए चित्रित किया गया है। कमल की कोमलता और सुंदरता इसे कमलवदन, कमलनयन, मुख कमल,कर कमल, चरण कमल आदि उपमाओं में स्थान दिलाता है। 

११. एडेलवाइस – ऑस्ट्रिया

लियोन्टोपोडियम अल्पिनम के वनस्पति नाम से जाना जाने वाला यह पहाड़ी फूल यूरोप के सबसे प्रसिद्ध फूलों में से एक है। रानी फूल के रूप में संदर्भित, यह अल्पकालिक सितारा जैसा बारहमासी सूरजमुखी परिवार से संबंधित है। ऑस्ट्रिया के यूरो सिक्कों पर चित्रित होने के अलावा, पारंपरिक रूप से लोक चिकित्सा में उपयोग किए जाने वाले इस फूल को पेट और श्वसन संबंधी बीमारियों के इलाज में एक उपाय माना जाता है।

१२. प्रोटिया – दक्षिण अफ्रीका

प्रोटिया फूल का आटिचोक जैसा दिखना अपने आप में एक खूबसूरती है। यह कई अलग-अलग रंगों में उपलब्ध है, लेकिन गुलाबी रंग के प्रोटिया सबसे सुंदर हैं। उन्हें ग्रह पर सबसे पुराने फूल वाले पौधों में से एक माना जाता है, जो ३०० मिलियन साल पहले के हैं। १७३५ में, वनस्पतिशास्त्री कार्ल लिनिअस, जिन्हें वर्गीकरण के पिता के रूप में भी जाना जाता है, ने प्रोटिया का नामकरण और वर्गीकरण किया। प्रोटिया नाम प्रोटीस को दर्शाता है, जो पोसिडॉन का बेटा है। प्रोटीस का मतलब आकार बदलने वाला होता है, और चूंकि यह फूल कई अलग-अलग आकार और रंगों में पाया जाता है, इसलिए यह नाम इसके लिए सबसे उपयुक्त है।

१३. बौना पोइंसियाना - बारबाडोस

इसे बारबाडोस का गौरव कहा जाता है तथापि यह अमेरिका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का मूल निवासी है।  यह फूल भारत और फिलीपींस दोनों में पाया जा सकता है। गर्मी पसंद करने वाला पौधा, बारबाडोस का गौरव, पूरे साल फूल देता है, इसकी शाखाएँ काँटेदार होती हैं और इसकी पत्तियाँ बड़ी होती हैं। पाँच बाह्यदलों वाले इसके फूल लगभग 1 ½ इंच व्यास के होते हैं। पोइंसियाना को उनके फूलों के लिए बेशकीमती माना जाता है, जो परागणकों को आकर्षित करते हैं और परिदृश्यों में रंग भरते हैं। सबसे आम प्रजाति, डेलोनिक्स रेजिया, को आमतौर पर रॉयल पोइंसियाना या फ्लेमबॉयंट ट्री के रूप में जाना जाता है।


१४. ब्लैक ऑर्किड – बेलीज़

बेलीज में १०० से ज़्यादा तरह के ऑर्किड पनपते हैं, बेलीज का राष्ट्रीय फूल ब्लैक ऑर्किड है। यह कॉकलेशेल या क्लैमशेल ऑर्किड के रूप में भी जाना जाता है, और वास्तव में काला नहीं, गहरे नीले रंग का होता है जिसमें गहरे बैंगनी रंग की नसें होती हैं, जिससे यह जंगल की छतरी में छिपते समय काला दिखाई देता है। ब्लैक आर्किड के ३ लैटिन नाम एनसाइक्लिया कोक्लीटा, एनाचेलियम कोक्लीटम, और एपिडेंड्रम कोक्लीटम हैं। ऑर्किड को कॉकल शेल ऑर्किड या क्लैमशेल ऑर्किड के नाम से भी जाना जाता है। लगभग पूरे साल फूल खिलते रहने वाले ऑर्किड की यह किस्म मुख्य रूप से नम क्षेत्रों में स्थित पेड़ों पर उगती है। बल्बनुमा, हरे-पीले गुच्छेदार तने, जो छह इंच तक लंबे हो सकते हैं, के साथ आमतौर पर दो से तीन पत्तियाँ होती हैं।

१५ . पैसिफ़िक डॉगवुड - ब्रिटिश कोलंबिया

ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत का आधिकारिक फूल कोई फूल नहीं है - बल्कि एक पेड़ है। १९५६ में पैसिफ़िक डॉगवुड को देश के आधिकारिक फूल के रूप में अपनाया गया था। पैसिफ़िक डॉगवुड कॉर्नेसी (डॉगवुड परिवार) में है, जिसमें लगभग १२ जेनेरा और १०० प्रजातियाँ हैं जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय पहाड़ी क्षेत्रों में मिलती हैं। चमकीले, आकर्षक फूलों के साथ, यह फूल जंगली और खेती दोनों रूपों में उग सकता है। वर्तमान में, डॉगवुड केवल ब्रिटिश कोलंबिया के दक्षिण-पश्चिमी कोने में उगता है, विक्टोरिया और वैंकूवर द्वीप दोनों ही इसके बचे हुए घर हैं।


१६ . क्रिसमस ऑर्किड – कोलंबिया

यह ऑर्किड एक एपिफाइटिक ऑर्किड है, जिसमें रसीले पत्ते होते हैं और यह कोलंबिया देश का स्थानिक है। कोलंबियाई झंडे की तरह, फूल में एक होंठ होता है जो नीला, लाल और पीला होता है। कैटलिया ट्रेनी के रूप में भी जाना जाता है, इस ऑर्किड का नाम १९ वीं शताब्दी के कोलंबियाई वनस्पतिशास्त्री जोस जेरोनिमो ट्रियाना के नाम पर रखा गया था। समुद्र तल से १५०० - २०००  मीटर की ऊँचाई पर उगने वाला क्रिसमस ऑर्किड, अपने आवास के विनाश के कारण, एक लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में वर्गीकृत है।

१७. कैला लिली – इथियोपिया और सेंट हेलेना

इसे अरुम लिली के नाम से भी जाना जाता है।  अफ्रीका और स्वाज़ीलैंड में मिलनेवाला यह फूल बहुत ही प्यारा और जाना-पहचाना है। आमतौर पर यह सफ़ेद रंग का होता है, और इसकी ऊँचाई ३ फ़ीट तक हो सकती है। पत्तियाँ, जो चौड़ी और गहरे हरे रंग की होती हैं, आमतौर पर अठारह इंच तक लंबी होती हैं। फूल के बीच में पीले रंग का स्पैडिक्स होता है और यह एक सुखद मीठी खुशबू पैदा करता है। कैला लिली इथियोपिया का आधिकारिक फूल है क्योंकि यह बहुत ज़्यादा मात्रा में उगता है और देश के लोग इसे शांति का प्रतीक मानते हैं।

१८. भालू की ब्रीच - ग्रीस

वैज्ञानिक रूप से इसे एकेंथस मोलिस के नाम से जाना जाता है, यह देश के चार पुष्प प्रतीकों में से सबसे पसंदीदा है। यह न केवल अपने सजावटी सौंदर्य के लिए पसंदीदा है, बल्कि सदियों से ग्रीक और रोमन दोनों समाजों की वास्तुकला में भी इसका उपयोग किया जाता रहा है। घुमावदार पत्ते अक्सर स्तंभों के ऊपर या कलाकृति में पत्थर के काम में उकेरे हुए देखे जाते हैं। इसमें लगभग २५० वंश और लगभग २५०० प्रजातियाँ हैं। इस परिवार के पौधों में सरल, विपरीत, कटे हुए पत्ते होते हैं जिनके किनारे पूरे (या कभी-कभी दांतेदार, लोबदार या काँटेदार) होते हैं और इनमें स्टिप्यूल नहीं होते । पत्तियों में सिस्टोलिथ , कैल्शियम कार्बोनेट कंक्रीट हो सकते हैं, जो सतह पर धारियों के रूप में दिखाई देते हैं।

१९. कैमोमाइल – रूस

कैमोमाइल एक फलदार, पुष्पयुक्त, सुगंधित खुशबू वाला फूल है जो डेज़ी परिवार का सदस्य है। एशिया के पश्चिमी क्षेत्रों का मूल निवासी यह फूल हर जगह स्वतंत्र रूप से और प्रचुर मात्रा में उगने के लिए जाना जाता है। इसके विभिन्न औषधीय उपयोगों के कारण, इस फूल को मध्य यूरोप में एक आवश्यक उपचार माना जाता है। नीले कैमोमाइल तेल को बहुत सुखदायक माना जाता है, सूखे फूलों के साथ मिलाकर इसे लगाने से आराम मिलता है। कैमोमाइल टी सबसे स्वस्थ पेय पदार्थों में से एक है और यह हर्बल टी में काफी लोकप्रिय भी है। कैमोमाइल मूल रूप से एक जड़ी-बूटी है जो फूल से ली जाती है।

२०. थीस्ल – स्कॉटलैंड और लोरेन

थीस्ल एक आम नाम है जिसका इस्तेमाल पौधों के एक फूल वाले समूह के लिए किया जाता है जिसके किनारों पर तीखे कांटे होते हैं। उनके कांटे पूरे पौधे पर भी होंगे - तने और पत्तियों दोनों पर। कांटे एक सुरक्षात्मक अनुकूलन के रूप में काम करते हैं जो पौधे को शाकाहारी जानवरों के लिए अवांछनीय बनाता है। कप या कलश के समान एक क्लैस्पिंग आकार वाला एक इनवोल्यूकर थीस्ल के प्रत्येक फूल के सिर को घेरता है । एक पके हुए थीस्ल फूल के आम तौर पर पंखदार पपस को थीस्ल-डाउन के रूप में जाना जाता है ।

२१. रोज़ - स्लोवाकिया

जापानी गुलाब के नाम से भी जाना जाने वाला एक पर्णपाती झाड़ी, दुनिया भर में न केवल प्रेम और सौंदर्य बल्कि युद्ध और राजनीति के प्रतीक के रूप में भी पहचाना जाता है। यह फूल सबसे ज़्यादा पसंद किए जाने वाले उपहारों में से एक है, क्योंकि बहुत कम लोग गुलाब को पसंद करते हैं। गुलाब सबसे पहले 35 मिलियन साल पहले स्लोवाकिया में दिखाई दिया था - जब दुनिया आज से अलग थी। गुलाब की खुशबू इसका मुख्य आकर्षण है, इसलिए यह फूल दुनिया भर में भावनाओं से जुड़ा हुआ है। गुलाब अच्छी तरह से सूखा हुआ, नम मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है, जिसमें पूर्ण या आंशिक रूप से छायादार सूरज का लाभ होता है।

२२. लाल कार्नेशन – स्पेन

स्पैनिश में आमतौर पर क्लेवेल के नाम से जाने जाने वाले लाल कार्नेशन्स प्राचीन स्पेन से ही आभार और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पारंपरिक फूल हैं। किसान अपने खूबसूरत सफेद घरों को लाल कार्नेशन्स से सजाते थे। यह फूल स्पेन की कई परंपराओं और संस्कृति का हिस्सा रहा है, जो मोह और प्रेम का प्रतीक है। लाल, चमकीले कार्नेशन्स हर साल जून के महीने में छह से आठ सप्ताह तक खिलते हैं। स्पेनियों के अनुसार, लाल कार्नेशन्स की सुंदरता अनिद्रा, अवसाद, कमजोरी और तनाव को दूर करने में मदद करती है।

२३. लैवेंडर – पुर्तगाल

लैवेंडर एक विस्तृत पुदीना परिवार लैमिआसे के ३९ फूल देने वाले पौधों में से एक प्रजाति है, और पुर्तगाल में, यह पौधा एक बेहद लोकप्रिय खाना पकाने वाला घटक है। फूल में शक्तिशाली तेल होते हैं जिनका उपयोग मुख्य रूप से इत्र, आवश्यक तेल, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य स्वास्थ्य और सौंदर्य उत्पादों में किया जाता है। लैवेंडर में नींद लाने वाले प्रभाव होते हैं और इसलिए, पुर्तगाल में लोग इसे अपने तकिए के नीचे रखते हैं। लोग फूल के चमकीले बैंगनी रंग को भी पसंद करते हैं और इसे कई सजावटी वस्तुओं में इस्तेमाल करते हैं। मुख्य रूप से मुख्य भूमि यूरेशिया के शुष्क, गर्म क्षेत्रों में पाया जाता है। 


२४. रत्चफ्रूक – थाईलैंड

रत्चफ्रूक को २००१ में थाईलैंड का राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया था। यह एक बड़ा पेड़ है जिस पर चमकीले पीले फूल खिलते हैं। रत्चफ्रूक गुच्छों में उगते हैं और ऐसा लगता है कि वे बारिश की बूंदों की तरह गिरने वाले हैं। थाईलैंड में, रत्चफ्रूक का मतलब शाही पेड़ होता है। यह पेड़ थाईलैंड के दिवंगत राजा, राजा भूमिबोल अदुल्यादेज को भी समर्पित है। राजा का जन्म सोमवार को हुआ था और थाईलैंड में सोमवार का रंग पीला होता है। इसलिए, रत्चफ्रूक इन सभी परिदृश्यों के लिए बिल्कुल सही बैठता है। यह पाकिस्तान , भारत, श्रीलंका और म्यांमार सहित एशिया के कई अन्य देशों में भी फलता-फूलता है । इस पेड़ का आधिकारिक वनस्पति नाम कैसिया फिस्टुला लिन है ।

२५. लिनेया – स्वीडन

लिनिया एक बहुत ही नाजुक जंगली फूल है जो स्वीडन में उत्तरी स्प्रूस जंगलों की गहरी छाया में उगता है। फूल का नाम लिनिअस के नाम पर रखा गया है, जिन्हें वर्गीकरण के स्वीडिश पिता के रूप में भी जाना जाता है। फूल अपनी अनूठी उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध है। सबसे पहले, तने बेहद पतले होते हैं और प्रत्येक तने में कम से कम दो फूल होते हैं। अब, दिलचस्प बात यह है कि लिनिया एक ही क्षेत्र में विभिन्न रंगों में पाया जा सकता है। हालाँकि, सबसे लोकप्रिय गुलाबी लिनिया है जो बेहद सुगंधित है और घंटी की तरह दिखता है।

२६. मेपल लीफ – कनाडा

मेपल का पत्ता न केवल कनाडा का राष्ट्रीय फूल है, बल्कि उनके झंडे का भी एक हिस्सा है। इसलिए, आप केवल कल्पना कर सकते हैं कि यह कनाडाई लोगों के लिए कितना महत्व रखता है। १९९६ में, मेपल के पत्ते को आधिकारिक तौर पर कनाडा का राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया था। सबसे बढ़कर, उनका राष्ट्रगान, 'द मेपल लीफ फॉरएवर' रचा गया था और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कनाडाई सेना की वर्दी पर मेपल के पत्ते का प्रतीक भी था। मेपल-लीफ ओक उत्तरी अमेरिका में सबसे दुर्लभ ओक में से एक है। जंगल में इस पेड़ की केवल मुट्ठी भर आबादी है, जो सभी पश्चिमी अर्कांसस के ओवाचिटा पहाड़ों में चट्टानी, उच्च-ऊंचाई वाले स्थानों पर हैं।

२७. फ्लेम लिली (कलिहारी)- जिम्बाब्वे

दुनिया भर में, फ्लेम लिली को अक्सर पवित्रता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन ज़िम्बाब्वे में, यह देश के इतिहास में गहराई से जुड़ा हुआ है। यह वास्तव में १९८० से उनका राष्ट्रीय फूल रहा है जब देश को स्वतंत्रता मिली थी। फ्लेम लिली गहरे गुलाबी से लेकर नारंगी, पीले और लाल रंग की कई तरह की रंगत ले लेती है। लेकिन अपनी जीवंतता के बावजूद, यह जानलेवा है। इसमें कोल्चिसिन नामक विषैला एल्कलॉइड होता है, जो निगलने पर जानलेवा हो सकता है। यह  एक सुंदर बहुवर्षीय वृक्षारोही लता है; यह कोल्चिकेसी परिवार का सदस्य है। इसे सुंदर पुष्पों के कारण अग्निशिखा के भी कहा जाता है। यह जंगल में सामान्य रूप से मिलता है। िसके राइजोम आयताकार, अँग्रेजी के V के आकार के सफेद रंग के होते हैं ।

२८. येलो ट्रम्पेट – वर्जिन आइलैंड्स

अपने चमकीले पीले रंग और आकर्षक तुरही के आकार की संरचना के कारण, पीले तुरही के फूल को अनदेखा करना मुश्किल है। उष्णकटिबंधीय अमेरिका का मूल निवासी, यह वर्जिन द्वीप समूह का प्रादेशिक फूल है। यह फूल गुच्छों में उगता है और साल भर खिलता रहता है। ये दो खूबियाँ इसे सजावट के लिए सबसे बेहतरीन फूलों में से एक बनाती हैं।येलो ट्रम्पेट मॉर्निंग ग्लोरी एक दुर्लभ प्रजाति है। तेज़ी से बढ़ने वाली बेलें मध्य गर्मियों से शरद ऋतु तक छोटे, मक्खन जैसे पीले फूलों से ढकी रहती हैं और हमिंगबर्ड, मधुमक्खियों और तितलियों को आकर्षित करति हैं। इस जोरदार बेल को एक जाली, चेन-लिंक बाड़ या आर्बर की आवश्यकता होती है।

२९. सीइबो एरिथ्रिना - उरुग्वे - अर्जेन्टीना 

ज्वलंत लाल रंग के सीबो एरिथ्रिना को कॉक्सपुर या कॉक्सकॉम्ब जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। इसका यह नाम इसलिए रखा गया है क्योंकि इसका लाल रंग मुर्गे के सिर पर मौजूद कंघी के समान होता है। यह न केवल उरुग्वे बल्कि पैराग्वे, ब्राजील और अर्जेंटीना का मूल निवासी है। कॉक्सपुर कोरल ट्री का फूल अर्जेंटीना और उरुग्वे दोनों का राष्ट्रीय फूल है। यह पौधा अक्सर जलमार्ग, दलदल और आर्द्रभूमि के किनारे जंगली में उगता है। यह औसतन २६ फीट की ऊंचाई तक बढ़ता है और गर्मियों में फूल देता है। फूल लाल होते हैं और अक्सर रेसमी प्रकार के पुष्पक्रम में व्यवस्थित होते हैं।

३०. ट्यूडर रोज़ - इंग्लैंड

इंग्लैंड का पुष्प बैज ट्यूडर गुलाब है। इसे यूनियन गुलाब भी कहा जाता है, जो दो अंग्रेजी घरों: लैंकेस्टर और यॉर्क के एक साथ आने का प्रतीक है। इस पुष्प प्रतीक में चमकीले लाल रंग के पांच सफेद आंतरिक पंखुड़ियाँ और पांच लाल बाहरी पंखुड़ियाँ होती हैं। यह फूल वास्तव में वनस्पति जगत में मौजूद नहीं है, लेकिन इसका प्रतीक इंग्लैंड में बहुत आम है। इसे हैम्पटन कोर्ट पैलेस बिल्डिंग और यहाँ तक कि २० पेन्स  के सिक्कों पर भी उकेरा गया है। ट्यूडर गुलाब (यूनियन गुलाब) इंग्लैंड का पारंपरिक पुष्प हेराल्डिक प्रतीक है और इसका नाम और उत्पत्ति ट्यूडर हाउस से ली गई है , जिसने लैंकेस्टर हाउस और यॉर्क हाउस को एकजुट किया था । ट्यूडर गुलाब में पाँच सफ़ेद आंतरिक पंखुड़ियाँ होती हैं, जो यॉर्क हाउस का प्रतिनिधित्व करती हैं, और पाँच लाल बाहरी पंखुड़ियाँ लैंकेस्टर हाउस का प्रतिनिधित्व करती हैं।

३१. चाकोनिया – त्रिनिदाद और टोबैगो

त्रिनिदाद और टोबैगो का पुष्प चिह्न चाकोनिया फूल है। इसे 'वाइल्ड पॉइन्सेटिया' के नाम से भी जाना जाता है, इस फूल को इसके उग्र रंग और सिंदूरी रंग के लंबे छींटों से पहचाना जा सकता है। यह फूल लगभग उसी समय खिलता है जब देश अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाता है, अर्थात अगस्त में। चाकोनिया (वार्सज़ेविक्ज़िया कोकसिनिया), जिसे "वाइल्ड पॉइंसेटा" या "त्रिनिदाद और टोबैगो का गौरव" कहा जाता है, रूबिएन्सी परिवार का एक ज्वलंत लाल वन फूल है। यह शीर्षक त्रिनिदाद और टोबैगो के अंतिम स्पेनिश गवर्नर डॉन जोस मारिया चाकोन के सम्मान में है। यह फूल जो अपने शानदार सिंदूर के लंबे छिड़काव से जाना जाता है

३२. हीलाला – टोंगा

टोंगा का राष्ट्रीय फूल हीलाला है। यह यहाँ काफी लोकप्रिय है, और इसका उपयोग कई कामों में किया जाता है, जिसमें माला बनाना भी शामिल है। इसकी पंखुड़ियों का रंग गुलाबी से लेकर कारमाइन तक होता है। मज़ेदार तथ्य: हीलाला टोंगन फूलों में सबसे उच्च श्रेणी का और सबसे मूल्यवान फूल है। यह मुख्य रूप से इसकी उत्पत्ति के कारण है। किंवदंती है कि यह फूल टोंगन लोगों की पैतृक मातृभूमि पुलोटू से आया है। ४ से २० मीटर तक लंबा हो सकता है और इसका तना ३० सेंटीमीटर व्यास का हो सकता है। गार्सिनिया सेसिलिस पर फूल लगते हैं जिनका रंग हल्के पीले या गुलाबी रंग से लेकर कोरल लाल या कारमाइन तक होता है और फल पकने पर पीले सफेद से लाल रंग के होते हैं।

३३. रोज़ ऑफ़ शेरोन – दक्षिण कोरिया

दक्षिण कोरिया के प्रादेशिक फूल को शेरोन का गुलाब कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम हिबिस्कस सिरिएकस है, जो हिबिस्कस परिवार को दर्शाता है जिससे यह आता है। इस फूल की कई किस्में हैं, जो सभी बहुत ही चमकीले रंगों में आती हैं। ब्लू सैटिन, इसका एक प्रोटोटाइप है, जो लाल केंद्र वाला एक नीला फूल है। मिनिफ्रेन एक और उदाहरण है, और इसमें बैंगनी केंद्र वाला एक सफेद फूल होता है। हिबिस्कस सिरिएकस नाम का एक पौधा है. इसे अल्थीया या दक्षिण में हार्डी हिबिस्कस भी कहा जाता है. यह मैलो परिवार का पौधा है और इसके फूल सफ़ेद, लाल, बैंगनी, गुलाबी, मैजेंटा, और लैवेंडर रंग के हो सकते हैं. यह एक पर्णपाती झाड़ी है, यानी हर शरद ऋतु में इसके पत्ते झड़ जाते हैं और वसंत में फिर से उग आते हैं.
***

अक्टूबर ९, मुक्तिका, सॉनेट, नवगीत, नेपाल, ध्वनि, हरिगीतिका, बुंदेली गीत,

सलिल सृजन अक्टूबर ९
मगही कुण्डलिया 

उतर चाँद की गोद में, बइठल करल किलोल
अंतरिक्ष के खेल में, दागे बहुतेक गोल
दागे बहुतेक गोल, न इसरो हिम्मत हारल 
दक्षिण ध्रुव पर घूम-घूमकर धूम मचाइल 
विक्रम अऊ प्रज्ञान, बधाई दे भू-अंबर 
फोटू खींचल नीक, दक्षिणी ध्रुव पर जाकर 
***
हाड़ौती मुक्तिका 
 
सैकल रॉकेट लाबों सीखां
अपनों पाँव जमाबो सीखां 
फिसल-संमहल ठोकर खा इसरो 
उठ आगे बढ़ जाबो सीखां
सुणीं सबी की आड़ी-ऊली   
चुप रह काम दिखाबों सीखां 
चंदा मामा की ड्योढ़ी म्हां 
झट झंडों फहराबों सीखां
राम-राम नासा सूं बोल्यां     
सबसूं पैला आबो सीखां
***

अक्षर गीत
*
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गाएँ अक्षर गीत।
माँ शारद को नमस्कार कर
शुभाशीष पा हँसिए मीत।
स्वर :
'अ' से अनुपम; अवनि; अमर; अब,
'आ' से आ; आई; आबाद।
'इ' से इरा; इला; इमली; इस,
'ई' ईश्वरी; ईख; ईजाद।
'उ' से उषा; उजाला; उगना,
'ऊ' से ऊर्जा; ऊष्मा; ऊन।
'ए' से एड़ी; एक; एकता,
'ऐ' ऐश्वर्या; ऐनक; ऐन।
'ओ' से ओम; ओढ़नी; ओला,
'औ' औरत; औषधि; औलाद।
'अं' से अंक; अंग, अंगारा,
'अ': खेल-हँस हो फौलाद।
*
व्यंजन :
'क' से कमल; कलम; कर; करवट,
'ख' खजूर; खटिया; खरगोश।
'ग' से गणपति; गज; गिरि; गठरी,
'घ' से घट; घर; घाटी; घोष।
'ङ' शामिल है वाङ्मय में
पंचम ध्वनि है सार्थक रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'च' से चका; चटकनी; चमचम,
'छ' छप्पर; छतरी; छकड़ा।
'ज' जनेऊ; जसुमति; जग; जड़; जल,
'झ' झबला; झमझम, झरना।
'ञ' हँस व्यञ्जन में आ बैठा,
व्यर्थ न लड़ना; करना प्रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ट' टमटम; टब; टका; टमाटर,
'ठ' ठग; ठसक; ठहाका; ठुमरी।
'ड' डमरू; डग; डगर; डाल; डफ,
'ढ' ढक्कन; ढोलक; ढल; ढिबरी।
'ण' कण; प्राण; घ्राण; तृण में है
मन लो जीत; तभी है जीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'त' तकिया; तबला; तसला; तट,
'थ' से थपकी; थप्पड़; थान।
'द' दरवाजा; दवा, दशहरा,
'ध' धन; धरा; धनुष; धनवान।
'न' नटवर; नटराज; नगाड़ा,
गिर न हार; उठ जय पा मीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'प' पथ; पग; पगड़ी; पहाड़; पट,
'फ' फल; फसल; फलित; फलवान।
'ब' बकरी; बरतन, बबूल; बस,
'भ' से भवन; भक्त; भगवान।
'म' मइया; मछली; मणि; मसनद,
आगे बढ़; मत भुला अतीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'य' से यज्ञ; यमी-यम; यंत्री,
'र' से रथ; रस्सी; रस, रास।
'ल' लकीर; लब; लड़का-लड़की;
'व' से वन; वसंत; वनवास।
'श' से शतक; शरीफा; शरबत,
मीठा बोलो; अच्छी नीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ष' से षट; षटकोण; षट्भुजी,
'स' से सबक; सदन; सरगम।
'ह' से हल; हलधर; हलवाई,
'क्ष' क्षमता; क्षत्रिय; क्षय; क्षम।
'त्र' से त्रय, त्रिभुवन; त्रिलोचनी,
'ज्ञ' से ज्ञानी; ज्ञाता; ज्ञान।
'ऋ' से ऋषि, ऋतु, ऋण, ऋतंभरा,
जानो पढ़ो; नहीं हो भीत
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
***
माहिया
(पंजाबी छंद)
विधान
१२-१०-१२
सम तुकांत पहला-तीसरा चरण।
मानव शशि पर जाना
द्वेष-घृणा-नफरत
तुम साथ न ले जाना।
रंगों का बंँटवारा
धर्म व मजहब में
चंदा पर भी होगा?
खाई जो है खोदी
जनता के मन में
चंदा पर भी होगी?
९-१०-२०२३
•••
व्यंग्य गीत
हिंदी लिखते डर लगता है
शब्द-अर्थ बेघर लगता है
खाल बाल की एक निकाले
दूजा डाल अक्ल पर ताले
खींचेगा बेमतलब टाँग
'शब्द बदल' कर देगा माँग
वह गर्दभ का स्वर लगता है
हिंदी लिखते डर लिखता है
होती आस्था पल में घायल
करें सियासत पल पल पागल
अच्छा अपना, बुरा और का
चिंतन स्वार्थी हुआ दौर का
बिखरा उजड़ा घर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
पैसे दे किताब छपवाओ
हाथ जोड़ घर घर दे आओ
पढ़े न कोई, बेचे रद्दी
फिर दूजी दो बनकर जिद्दी
दस्यु प्रकाशक हर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
कथ्य भाव रस से नहिं नाता
गति-यति-लय द्रोह रहा मन भाता
मठाधीश बन चेले पाले
दे-ले अभिनंदन घोटाले
लघु रवि बड़ा तिमिर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
इसको हैडेक हुआ पेट में
फ्रीडमता लेडियाँ भेंट लें
'लिव इन' नया मंच नित भाए
सुना चुटकुले कवि कहलाए
सूना पूजा-घर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
९-१०-२०२२
●●●
सॉनेट
वीणा
वीणा की झंकार, मौन सुन
आँख मूँद ले पहले पगले!
छेड़े मन के तार कौन सुन।
सँभल न दुनिया तुझको ठग ले।
तू है कौन?, कहाँ से आया?
जाना कहाँ न तुझको मालुम
करे सफर, सामान जुटाया।
मेला-ठेला देख गया गुम।
रो-पछता मत, मन बहला ले
गिर, रो चुप हो, धीरज धरना
लूट न लुटना, खो दे, पा ले।
जैसे भी हो बढ़ना-तरना।
वीणा-तार कहें क्या सुन ले
टूटे तार न सपने बुन ले।
९-१०-२०२२
●●●
सॉनेट
शरत्चंद्र
*
शरत्चंद्र की शुक्ल स्मृति से
मन नीलाभ गगन हो हँसता
रश्मिरथी दे अमृत, झट से
कंकर हो शंकर भुज कसता
सलज उमा, गणपति आहट पा
मग्न साधना में हो जाती
ऋद्धि-सिद्धि माँ की चौखट आ
शीश नवा, माँ के जस गाती
हो संजीव सलिल लहरें उठ
गौरी पग छू सकुँच ठिठकती
अंजुरी भर कर पान उमा झुक
शिव को भिगा रिझाकर हँसती
शुक्ल स्मृति पायस सब जग को
दे अमृत कण शरत्चंद्र का
९-१०-२०२२, १५-४३
●●●
मुक्तक-
माँ की मूरत सजीं देख भी आइये।
कर प्रसादी ग्रहण पुण्य भी पाइये।।
मन में झाँकें विराजी हैं माता यहीं
मूँद लीजै नयन, क्यों कहीं जाइये?
*
आस माता, पिता श्वास को जानिए
साथ दोनों रहे आप यदि ठानिए
रास होती रहे, हास होता रहे -
ज़िन्दगी का मजा रूठिए-मानिए
*
९-१०-२०१६
***
एक रचना:
*
ओ मेरी नेपाली सखी!
एक सच जान लो
समय के साथ आती-जाती है
धूप और छाँव
लेकिन हम नहीं छोड़ते हैं
अपना गाँव।
परिस्थितियाँ बदलती हैं,
दूरियाँ घटती-बढ़ती हैं
लेकिन दोस्त नहीं बदलते
दिलों के रिश्ते नहीं टूटते।
मुँह फुलाकर रूठ जाने से
सदियों की सभ्यताएँ
समेत नहीं होतीं।
हम-तुम एक थे,
एक हैं, एक रहेंगे।
अपना सुख-दुःख
अपना चलना-गिरना
संग-संग उठना-बढ़ना
कल भी था,
कल भी रहेगा।
आज की तल्खी
मन की कड़वाहट
बिन पानी के बदल की तरह
न कल थी,
न कल रहेगी।
नेपाल भारत के ह्रदय में
भारत नेपाल के मन में
था, है और रहेगा।
इतिहास हमारी मित्रता की
कहानियाँ कहता रहा है,
कहता रहेगा।
आओ, हाथ में लेकर हाथ
कदम बढ़ाएँ एक साथ
न झुकाया है, न झुकाएँ
हमेशा ऊँचा रखें अपना माथ।
नेता आयेंगे-जायेंगे
संविधान बनेंगे-बदलेंगे
लेकिन हम-तुम
कोटि-कोटि जनगण
न बिछुड़ेंगे, न लड़ेंगे
दूध और पानी की तरह
शिव और भवानी की तरह
जन्म-जन्म साथ थे, हैं और रहेंगे
ओ मेरी नेपाली सखी!
***
मुक्तिका :
सूखी नदी भी रेत सीपी शंख दे देती हमें
हम मनुज बहती नदी को नित्य गन्दा कर रहे
.
कह रहे मैया! मगर आँसू न इसके पोंछते
झाड़ पत्थर रेत मछली बेच धंधा कर रहे
.
काल आ मारे हमें इतना नहीं है सब्र अब
गले मिलकर पीठ पर चाकू चलाकर हँस रहे
.
व्यथित प्रकृति रो रही, भूचाल-तूफां आ रहे
हम जलाने लाश अपनी आप चंदा कर रहे
.
सूरज ठहाका लगाता है, देख कोशिश बेतुकी
मलिन छवि भायी नहीं तो दीप मंदा कर रहे
.
वाह! शाबाशी खुदी को दे रहे कर रतजगा
बाँह में ये, चाह में वो आह फंदा कर रहे
.
सभ्यता-तरु पौल डाला, मूल्य अवमूल्यित किये
पांच अँगुली हों बराबर, 'सलिल' रंदा कर रहे
९-१०-२०१५
***
काव्य का रचना शास्त्र : १
।-संजीव 'सलिल'
-ध्वनि कविता की जान है...
ध्वनि कविता की जान है, भाव श्वास-प्रश्वास।
अक्षर तन, अभिव्यक्ति मन, छंद वेश-विन्यास।।
अपने उद्भव के साथ ही मनुष्य को प्रकृति और पशुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ा। सुन्दर, मोहक, रमणीय प्राकृतिक दृश्य उसे रोमांचित, मुग्ध और उल्लसित करते थे। प्रकृति की रहस्यमय-भयानक घटनाएँ उसे डराती थीं । बलवान हिंस्र पशुओं से भयभीत होकर वह व्याकुल हो उठता था। विडम्बना यह कि उसका शारीरिक बल और शक्तियाँ बहुत कम। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके पास देखे-सुने को समझने और समझाने की बेहतर बुद्धि थी।
बाह्य तथा आतंरिक संघर्षों में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने और अन्यों की अभिव्यक्ति को ग्रहण करने की शक्ति का उत्तरोत्तर विकास कर मनुष्य सर्वजयी बन सका। अनुभूतियों को अभिव्यक्त और संप्रेषित करने के लिए मनुष्य ने सहारा लिया ध्वनि का। वह आँधियों, तूफानों, मूसलाधार बरसात, भूकंप, समुद्र की लहरों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ आदि से सहमकर छिपता फिरता। प्रकृति का रौद्र रूप उसे डराता।
मंद समीरण, शीतल फुहार, कोयल की कूक, गगन और सागर का विस्तार उसमें दिगंत तक जाने की अभिलाषा पैदा करते। उल्लसित-उत्साहित मनुष्य कलकल निनाद की तरह किलकते हुए अन्य मनुष्यों को उत्साहित करता। अनुभूति को अभिव्यक्त कर अपने मन के भावों को विचार का रूप देने में ध्वनि की तीक्ष्णता, मधुरता, लय, गति की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति, लालित्य-रुक्षता आदि उसकी सहायक हुईं। अपनी अभिव्यक्ति को शुद्ध, समर्थ तथा सबको समझ आने योग्य बनाना उसकी प्राथमिक आवश्यकता थी।
सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य।
जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य।।
भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्त करने का यह प्रयास ही कला के रूप में विकसित होता हुआ साहित्य के रूप में प्रस्फुटित हुआ। सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है जिसके निकष पर किसी रचना को परखा जाना चाहिए। सनातन भारतीय चिंतन में 'सत्य-शिव-सुन्दर' की कसौटी पर खरी कला को ही मान्यता देने के पीछे भी यही भावना है। 'शिव' अर्थात 'सर्व कल्याणकारी, 'कला कला के लिए' का पाश्चात्य सिद्धांत पूर्व को स्वीकार नहीं हुआ। साहित्य नर्मदा का कालजयी प्रवाह 'नर्मं ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो सबको आनंद दे, वही नर्मदा' को ही आदर्श मानकर सतत सृजन पथ पर बढ़ता रहा।
मानवीय अभिव्यक्ति के शास्त्र 'साहित्य' को पश्चिम में 'पुस्तकों का समुच्चय', 'संचित ज्ञान का भंडार', जीवन की व्याख्या', आदि कहा गया है। भारत में स्थूल इन्द्रियजन्य अनुभव के स्थान पर अन्तरंग आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया। यह अंतर साहित्य को मस्तिष्क और ह्रदय से उद्भूत मानने का है। आप स्वयं भी अनुभव करेंगे के बौद्धिक-तार्किक कथ्य की तुलना में सरस-मर्मस्पर्शी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। विशेषकर काव्य (गीति या पद्य) में तो भावनाओं का ही साम्राज्य होता है।
होता नहीं दिमाग से, जो संचालित मीत।
दिल की सुन दिल से जुड़े, पा दिलवर की प्रीत।।
साध्य आत्म-आनंद है :काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है। भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है। आजकल दूरदर्शन पर आ रहे कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन पर केन्द्रित होने के कारण समाज को कुछ दे नहीं पा रहे जबकि साहित्य का सृजन ही समाज को कुछ देने के लिये किया जाता है।
जन-जन का आनंद जब, बने आत्म-आनंद।
कल-कल सलिल-निनाद सम, तभी गूँजते छंद।।
काव्य के तत्व:
बुद्धि भाव कल्पना कला, शब्द काव्य के तत्व।
तत्व न हों तो काव्य का, खो जाता है स्वत्व।।
बुद्धि या ज्ञान तत्व काव्य को ग्रहणीय बनाता है। सत-असत, ग्राह्य-अग्राह्य, शिव-अशिव, सुन्दर-असुंदर, उपयोगी-अनुपयोगी में भेद तथा उपयुक्त का चयन बुद्धि तत्व के बिना संभव नहीं। कृति को विकृति न होने देकर सुकृति बनाने में यही तत्व प्रभावी होता है।
भाव तत्व को राग तत्व या रस तत्व भी कहा जाता है। भाव की तीव्रता ही काव्य को हृद्स्पर्शी बनाती है। संवेदनशीलता तथा सहृदयता ही रचनाकार के ह्रदय से पाठक तक रस-गंगा बहाती है।
कल्पना लौकिक को अलौकिक और अलौकिक को लौकिक बनाती है। रचनाकार के ह्रदय-पटल पर बाह्य जगत तथा अंतर्जगत में हुए अनुभव अपनी छाप छोड़ते हैं। साहित्य सृजन के समय अवचेतन में संग्रहित पूर्वानुभूत संस्कारों का चित्रण कल्पना शक्ति से ही संभव होता है। रचनाकार अपने अनुभूत तथ्य को यथावत कथ्य नहीं बनाता। वह जाने-अनजाने सच=झूट का ऐसा मिश्रण करता है जो सत्यता का आभास कराता है।
कला तत्त्व को शैली भी कह सकते हैं। किसी एक अनुभव को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं। हर रचनाकार का किसी बात को कहने का खास तरीके को उसकी शैली कहा जाता है। कला तत्व ही 'शिवता का वाहक होता है। कला असुंदर को भी सुन्दर बना देती है।
शब्द को कला तत्व में समाविष्ट किया जा सकता है किन्तु यह अपने आपमें एक अलग तत्व है। भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द ही होता है। रचनाकार समुचित शब्द का चयन कर पाठक को कथ्य से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है।
साहित्य के रूप :
दिल-दिमाग की कशमकश, भावों का व्यापार।
बनता है साहित्य की, रचना का आधार।।
बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है। हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है। अमर साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे साहित्य को 'रचनात्मक साहित्य' कहा है।
लक्ष्य और लक्षण ग्रन्थ :
रचनात्मक या रागात्मक साहित्य के दो भेद लक्ष्य ग्रन्थ और लक्षण ग्रन्थ हैं । साहित्यकार का उद्देश्य अलौकिक आनंद की सृष्टि करना होता है जिसमें रसमग्न होकर पाठक रचना के कथ्य, घटनाक्रम, पात्रों और सन्देश के साथ अभिन्न हो सके।
लक्ष्य ग्रन्थ में रचनाकार नूतन भावः लोक की सृष्टि करता है जिसके गुण-दोष विवेचन के लिए व्यापक अध्ययन-मनन पश्चात् कुछ लक्षण और नियम निर्धारित किये गए हैं ।
लक्ष्य ग्रंथों के आकलन अथवा मूल्यांकन (गुण-दोष विवेचन) संबन्धी साहित्य लक्षण ग्रन्थ होंगे। लक्ष्य ग्रन्थ साहित्य का भावः पक्ष हैं तो लक्षण ग्रन्थ विचार पक्ष।
काव्य के लक्षणों, नियमों, रस, भाव, अलंकार, गुण-दोष आदि का विवेचन 'साहित्य शास्त्र' के अंतर्गत आता है 'काव्य का रचना शास्त्र' विषय भी 'साहित्य शास्त्र' का अंग है।
साहित्य के रूप -- १. लक्ष्य ग्रन्थ : (क) दृश्य काव्य, (ख) श्रव्य काव्य।
२.लक्षण ग्रन्थ: (क) समीक्षा, (ख) साहित्य शास्त्र।
***
मौसम बदल रहा
मौसम बदल रहा है, टेर रही अमराई
परिवर्तन की आहट, पनघट तज पछताई 
जन-आकांक्षा नभ को छूती, नहीं अचंभा
छाँव हुई जन प्रतिनिधि, ज्यों बिजली का खंभा
आश्वासन की गर्मी, सूरज पीटे डंका
शासन भरमाता है, जनगण-मन में शंका
अपचारी ने निष्ठा, बरगद पर लटकाई

मौनी बाबा गायब, दूजा बड़बोला है
रंग भंग में मिलकर बाकी ने घोला है
पत्नी रुग्णा लेकिन रास रचाये बुढ़ापा
सुत से छोटी बीबी,लाई घर में स्यापा
घोटालों में पीछे, ना सुत नहीं जमाई

अच्छे दिन आए हैं, रखो साल भर रोजा
घाटा घटा सकें हम, यही रास्ता खोजा
हिंदी की बिंदी भी रुचे, न माँ-मस्तक पर
धड़क रहा दिल जन का, सुन द्वारे पर दस्तक
क्यों विरोध की खातिर ही विरोध हो भाई?
***
नवगीत

आस कबीर
नहीं हो पायी
हास भले कल्याणी है
प्यास प्राण को
देती है गति
रास न करने
देती है मति
परछाईं बन
त्रास संग रह
रुद्ध कर रहा वाणी है
हाथ हाथ के
साथ रहे तो
उठा रख सकें
विनत माथ को
हाथ हाथ मिल
कर जुड़ जाए
सुख दे-पाता प्राणी है
नयन मिलें-लड़
झुक-उठ-बसते
नयनों में तो
जीवन हँसते
श्वास-श्वास में
घुलकर महके
जीवन चोखी ढाणी है
***
नवगीत:

नेताजी को
श्रद्धांजलि है
नेताजी की
अनुयायी के
विरोध में हैं
कहते बिलकुल
अबोध ये हैं
कई बरस का
साथ न प्यारा
प्यारी सत्ता
नहीं मित्रता
नेताजी की
अपनी कथनी
अपना काम
मुँह पर
गाँधीजी का नाम
गह नव आशा
गढ़ नव भाषा
निज हितकारक
साफ़-सफाई
नेताजी की
९-१०-२०१४
***
नवगीत:
उत्सव का मौसम
*
उत्सव का मौसम
बिन आये ही सटका है...
*
मुर्गे की टेर सुन
आँख मूँद सो रहे.
उषा की रूप छवि
बिन देखे खो रहे.
ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है.....
*
नाक बहा, टाई बाँध
अंगरेजी बोलेंगे.
अब कान्हा गोकुल में
नाहक ना डोलेंगे..
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है...
*
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है.
पद-मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है..
मलिन बिम्ब देख-देख
मन-दर्पण चटका है...
*
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है.
राजनीति कहे साध्य
केवल खलनायक है.
पगडंडी भूल
राजमार्ग राह भटका है...
*
मँहगाई आयी
दीवाली दीवाला है.
नेता है, अफसर है
पग-पग घोटाला है.
अँगने को खिड़की
दरवाजे से खटका है...
***
हरिगीतिका:
*
उत्सव सुहाने आ गये हैं, प्यार सबको बाँटिये.
भूलों को जाएँ भूल, नाहक दण्ड दे मत डाँटिये..
सबसे गले मिल स्नेह का, संसार सुगढ़ बनाइये.
नेकी किये चल 'सलिल', नेकी दूसरों से पाइये..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
ऐसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें, सुना सरगम 'सलिल' सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
दिल से मिले दिल तो बजे त्यौहार की शहनाइयाँ.
अरमान हर दिल में लगे लेने विहँस अँगड़ाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या सँग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप अपने काव्य को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियां संभाव्य को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यहे एही इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध है हम यह न भूलें एकता में शक्ति है.
है इल्तिजा सबसे कहें सर्वोच्च भारत-भक्ति है..
इसरार है कर साधना हों अजित यह ही युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
९-१०-२०११
***
नवगीत:
समय पर अहसान अपना...
*
समय पर अहसान अपना
कर रहे पहचान,
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हम समय का मान करते,
युगों पल का ध्यान धरते.
नहीं असमय कुछ करें हम-
समय को भगवान करते..
अमिय हो या गरल- पीकर
जिए मर म्रियमाण.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हमीं जड़, चेतन हमीं हैं.
सुर-असुर केतन यहीं हैं..
कंत वह है, तंत हम हैं-
नियति की रेतन नहीं हैं.
गह न गहते, रह न रहते-
समय-सुत इंसान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
पीर हैं, बेपीर हैं हम,
हमीं चंचल-धीर हैं हम.
हम शिला-पग, तरें-तारें-
द्रौपदी के चीर हैं हम..
समय दीपक की शिखा हम
करें तम का पान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
***
बुंदेली गीत:
हाँको न हमरी कार.....
*
पोंछो न हमरी कार
ओ बलमा!
हाँको न हमरी कार.....
हाँको न हमरी कार,
ओ बलमा!
हाँको न हमरी कार.....
*
नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,
गोरी काया मक्खन-मलाई.
तुम कागा से सुघड़,
कहे जग -
'बिजुरी-मेघ' पुकार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
संग चलेंगी मोरी गुइयां,
तनक न हेरो बिनको सैयां.
भरमाये तो कहूँ राम सौं-
गलन ना दइहों दार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
बनो डिरेवर, हाँको गाड़ी.
कैहों सबसे 'बलम अनाड़ी'.
'सलिल' संग केसरिया कुल्फी-
खैहों, न करियो रार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
***
नव गीत:
कैसी नादानी??...
*
मानव तो रोके न अपनी मनमानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
जंगल सब काट दिये
दरके पहाड़.
नदियाँ भी दूषित कीं-
किया नहीं लाड़..
गलती को ले सुधार, कर मत शैतानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पाट दिये ताल सभी
बना दीं इमारत.
धूल-धुंआ-शोर करे
प्रकृति को हताहत..
घायल ऋतु-चक्र हुआ, जो है लासानी...
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पावस ही लाता है
हर्ष सुख हुलास.
तूने खुद नष्ट किया
अपना मधु-मास..
मेघ बजें, कहें सुधर, बचा 'सलिल' पानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
****
बाल गीत / नव गीत:
खोल झरोखा....
*
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फांदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
***
बाल गीत:
माँ-बेटी की बात
*
रानी जी को नचाती हैं महारानी नाच.
झूठ न इसको मानिये, बात कहूँ मैं साँच..
बात कहूँ मैं साँच, रूठ पल में जाती है.
पल में जाती बहल, बहारें ले आती है..
गुड़िया हाथों में गुड़िया ले सजा रही है.
लोरी गाकर थपक-थपक कर सुला रही है.
मारे सिर पर हाथ कहे: ''क्यों तंग कर रही?
क्यों न रही सो?, क्यों निंदिया से जंग कर रही?''
खीज रही है, रीझ रही है, हो बलिहारी.
अपनी गुड़िया पर मैया की गुड़िया प्यारी..
रानी माँ हैरां कहें: ''महारानी सो जाओ.
आँख बंद कर अनुष्का! सपनों में मुस्काओ.
तेरे पापा आ गए, खाना खिला, सुलाऊँ.
जल्दी उठना है सुबह, बिटिया अब मैं जाऊँ?''
बिटिया बोली ठुमक कर: ''क्या वे डरते हैं?'
क्यों तुमसे थे कह रहे: 'तुम पर मरते हैं?
जीते जी कोई कभी कैसे मर सकता?
बड़े झूठ कहते तो क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता?''
मुझे डाँटती: ''झूठ न बोलो तुम समझाती हो.
पापा बोलें झूठ, न उनको डाँट लगाती हो.
मेरी गुड़िया नहीं सो रही, लोरी गाओ, सुलाओ.
नाम न पापा का लेकर, तुम मुझसे जान बचाओ''..
हुई निरुत्तर माँ गोदी में ले बिटिया को भींच.
लोरी गाकर सुलाया, ममता-सलिल उलीच..
९-१०-२०१०
***