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बुधवार, 6 दिसंबर 2023

लघु कथा, गीत, मुक्तिका, ब्याहुल, सॉनेट, वंदना, नवगीत

गीत

नीलाभित नभ सिंदूरी हो गया किसी के नाम से।
सूर्य प्रणम्य प्रतीत हो रहे सुधिमय नम्र प्रणाम से।।
रश्मि रश्मि शाकुंतल सुषमा लिए सूर्य दुष्यंत सम।
नयन नयन से कहें-सुनें क्या; पूछो मौन दिगंत सम।।
पंछी गुंजाते शहनाई; लहरें गातीं मंगल गान-
वट पल्लव कर मंत्र-पाठ; आहुतियाँ देते संत सम।।
फुलबगिया में सँकुचाई सिय; अकथ कह गई राम से।
शाम मिली फिर मुग्धा राधा, हुलस पुलक घनश्याम से।
सूर्य प्रणम्य प्रतीत हो रहे सुधिमय नम्र प्रणाम से।
नीलाभित नभ सिंदूरी हो गया किसी के नाम से।।
ब्रह्मपुत्र नद किसको ध्याए, कल कल कल कर टेरता।
लहर लहर उत्कंठित पल पल, किसका पथ छिप हेरता।।
मेघदूत से यक्ष पठाता; व्यथा-कथा निज पाती में।
बैरागी मन को रागी चित; दसों दिशा से घेरता।।
उस अनाम को ही संबोधित; करते शत-शत नाम से।
वह आकुल मिलता है; खुद ही आकर निष्काम से।।
सूर्य प्रणम्य प्रतीत हो रहे सुधिमय नम्र प्रणाम से।
नीलाभित नभ सिंदूरी हो गया किसी के नाम से।।
किसे सुमिरता है युग युग से, लिए सुमिरनी गति-यति की।
व्यथा उमा-नंदा की कह-सुन; समय साक्ष्य दे जन-मति की।।
कहे गुवाहाटी शिव तनया गंगा से जा मिलो गले।
ब्रह्मपुत्र मंदाकिनी भेटें, लीला सरस समयपति की।।
नखत नवाशा जगा दमकते, खास बन गए आम से।
करतल ध्वनि कर मुदित शांत जन; लगते पूर्ण विराम से।।
सूर्य प्रणम्य प्रतीत हो रहे सुधिमय नम्र प्रणाम से।
नीलाभित नभ सिंदूरी हो गया किसी के नाम से।।
६-१२-२०२२,७-५४
रॉयल डे कासा, गुवाहाटी
●●●
झूलना
*
नर्मदा वर्मदा शर्मदा धर्मदा मातु दो नीर हर लो पिपासा।
प्राण-मन तृप्त हो, भू न अभिशप्त हो, दो उजाला न तम हो जरा सा।।
भारती तारती आरती हम करें हो सदय कर जगत यह हरा सा।
वायु निर्मल रहे कर सुवासित बहे भाव नव संचरे रस नया सा।।
***
सॉनेट
वंदना
*
वंदन देव गजानन शत-शत।
करूँ प्रणाम शारदा माता।
कर्मविधाता चित्र गुप्त प्रभु।।
नमन जगत्जननी-जगत्राता।।
अंतरिक्ष नवगृह हिंदी माँ।
दसों दिशाएँ सदा सदय हों।
छंदों से आनंदित आत्मा।।
शब्द शक्ति पा भाव अजय हों।।
श्वास-श्वास रस बरसाओ प्रभु!
अलंकार हो आस हास में।
सत-शिव-सुंदर कह पाऊँ विभु।।
रखूँ भरोसा सत्प्रयास में।।
नाद ताल लिपि अक्षर वाणी।
निर्मल मति दे माँ कल्याणी।।
६-१२-२०२१
***
नवगीत
*
जुगनू हुए इकट्ठे
सूरज को कहते हैं बौना।
*
शिल्प-माफिया छाती ठोंके,
मुखपोथी कुरुक्षेत्र।
अँधरे पुजते दिव्य चक्षु बन,
गड़े शरम से नेत्र।
खाल शेर की ओढ़ दहाड़े
'चेंपो' गर्दभ-छौना।
जुगनू हुए इकट्ठे
सूरज को कहते हैं बौना।
*
भाव अभावों के ऊँचे हैं,
हुई नंगई फैशन।
पाचक चूर्ण-गोलियाँ गटकें,
कहें न पाया राशन।
'लिव इन' बरसों जिया,
मौज कर कहें 'छला बिन गौना।
*
स्यापा नकली, ताल ठोंकते
मठाधीश षडयंत्री।
शब्द-साधना मान रुदाली
रस भूसे खल तंत्री।
मुँह काला कर गर्वित,
खुद ही कहते लगा डिठौना।
५-१२-२०१८
***
मुक्तक
.
नेह से कोई नआला
मन तरा यदि नेह पाला
नेह दीपक दिवाली का
नेह है पावन शिवाला
.
सुनीता पुनीता रहे जिंदगी
सुगीता कहे कर्म ही बंदगी
कर ईश-अर्पण न परिणाम सोच
महकती हों श्वासें सदा संदली
.
बंद कौन है काया की कारा में?
बंदा है वह बँधा कर्म-धारा में
काया बसी आत्मा ही कायस्थ
करे बंदगी, सार यही सारा में
.
गौ भाषा को दुह करे,
अर्थ-दुग्ध का पान.
श्रावण या रमजान हो,
दोहा रस की खान.
६.१२.२०१७
.

दोहा दुनिया
*
जो चाहें वह बेच दें, जब चाहे अमिताभ
अच्छा है जो बच गए, हे बच्चन अजिताभ
*
हे माँ! वर दे टेर सुन, हुआ करिश्मा आज
हेमा से हेमा कहे, डगमग तेरा ताज
*
हैं तो वे धर्मेन्द्र पर, बदल लिया निज धर्म
है पत्थर तन में छिपा, मक्खन जैसा मर्म
*
नूतन है हर तनूजा, रखे करीना याद
जहाँ जन्म ले बिपाशा, हो न वहाँ आबाद
*
नयनों में काजोल भर, हुई शबाना मौन
शबनम की बूँदें झरीं, कहो पी गया कौन?
*
जय ललिता की बोलिए, शंकर रहें प्रसन्न
कहें जय किशन अगर तो, हो संगीत प्रसन्न
**
अमिताभ = बहुत आभायुक्त, अजिताभ = जिसकी आभा अजेय हो, करिश्मा =चमत्कार, हेमा = धरती, सोना, धर्मेन्द्र = परम धार्मिक, नूतन = नयी, तनूजा = पुत्री, करीना = तरीका,बिपाशा = नदी, काजोल = काजल, शबाना = रात, शबनम = ओस, जय ललिता = पार्वती की जय,जय किशन = कृष्ण की जय
६.१२.२०१६
***
लघुकथा-
ओवर टाइम
*
अभी तो फैक्ट्री में काम का समय है, फिर मैं पत्ते खेलने कैसे आ सकता हूँ? ५ बजे के बाद खेल लेंगे।
तुम भी यार! रहे लल्लू के लल्लू। शाम को देर से घर जाकर कौन अपनी खाट खड़ी करवाएगा? चल अभी खेलते हैं काम बाकी रहेगा तभी तो प्रबंधन समय पर कराने के लिये देगा ओवर टाइम।
*
लघु कथा -
सहिष्णुता
*
कहा-सुनी के बाद वह चली गयी रसोई में और वह घर के बाहर, चलते-चलते थक गया तो एक पेड़ के नीचे बैठ गया. कब झपकी लगी पता ही न चला, आँख खुली तो थकान दूर हो गयी थी, कानों में कोयल के कूकने की मधुर ध्वनि पड़ी तो मन प्रसन्न हुआ. तभी ध्यान आया उसका जिसे छोड़ आया था घर में, पछतावा हुआ कि क्यों नाहक उलझ पड़ा?
कुछ सोच तेजी से चल पड़ा घर की ओर, वह डबडबाई आँखों से उसी को चिंता में परेशान थी, जैसे ही उसे अपने सामने देखा, राहत की साँस ली. चार आँखें मिलीं तो आँखें चार होने में देर न लगी.
दोनों ने एक-दुसरे का हाथ थामा और पहुँच गये वहीं जहाँ अनेकता में एकता का सन्देश दे नहीं, जी रहे थे वे सब जिन्हें अल्पबुद्धि जीव कहते हैं वे सब जो पारस्परिक विविधता के प्रति नहीं रख पा रहे अपने मन में सहिष्णुता।
६.१२.२०१५
***
गीत :...
सच है
*
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
ढाई आखर की पोथी से हमने संग-संग पाठ पढ़े हैं.
शंकाओं के चक्रव्यूह भेदे, विश्वासी किले गढ़े है..
मिलन-क्षणों में मन-मंदिर में एक-दूसरे को पाया है.
मुक्त भाव से निजता तजकर, प्रेम-पन्थ को अपनाया है..
ज्यों की त्यों हो कर्म चदरिया मर्म धर्म का इतना जाना-
दूर किया अंतर से अंतर, भुला पावना-देना सच है..
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
तन पाकर तन प्यासा रहता, तन खोकर तन वरे विकलता.
मन पाकर मन हुआ पूर्ण, खो मन को मन में रही अचलता.
जन्म-जन्म का संग न बंधन, अवगुंठन होता आत्मा का.
प्राण-वर्तिकाओं का मिलना ही दर्शन है उस परमात्मा का..
अर्पण और समर्पण का पल द्वैत मिटा अद्वैत वर कहे-
काया-माया छाया लगती मृग-मरीचिका लेकिन सच है
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
तुमसे मिलकर जान सका यह एक-एक का योग एक है.
सृजन एक ने किया एक का बाकी फिर भी रहा एक है..
खुद को खोकर खुद को पाया, बिसरा अपना और पराया.
प्रिय! कैसे तुमको बतलाऊँ, मर-मिटकर नव जीवन पाया..
तुमने कितना चाहा मुझको या मैं कितना तुम्हें चाहता?
नाप माप गिन तौल निरुत्तर है विवेक, मन-अर्पण सच है.
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
६.१२.२०१३
***
मुक्तिका:
है यही वाजिब...
*
है यही वाज़िब ज़माने में बशर ऐसे जिए।
जिस तरह जीते दिवाली रात में नन्हे दिए।।
रुख्सती में हाथ रीते ही रहेंगे जानते
फिर भी सब घपले-घुटाले कर रहे हैं किसलिए?
घर में भी बेघर रहोगे, चैन पाओगे नहीं,
आज यह, कल और कोई बाँह में गर चाहिए।।
चाक हो दिल या गरेबां, मौन ही रहना 'सलिल'
मेहरबां से हो गुजारिश- 'और कुछ फरमाइए'।।
आबे-जमजम की सभी ने चाह की लेकिन 'सलिल'
कोई तो हो जो ज़हर के घूँट कुछ हँसकर पिए।।
***
लोकभाषा-काव्य में श्री गणेश :
*
पारंपरिक ब्याहुलों (विवाह गीत) से दोहा : संकलित
पूरब की पारबती, पच्छिम के जय गनेस.
दक्खिन के षडानन, उत्तर के जय महेस..
*
बुन्देली पारंपरिक तर्ज:
मँड़वा भीतर लगी अथाई के बोल मेरे भाई.
रिद्धि-सिद्धि ने मेंदी रचाई के बोल मेरे भाई.बैठे गनेश जी सूरत सुहाई के बोल मेरे भाई.
ब्याव लाओ बहुएँ कहें मताई के बोल मेरे भाई.
दुलहन दुलहां खों देख सरमाई के बोल मेरे भाई.
'सलिल' झूमकर गम्मत गाई के बोल मेरे भाई.
नेह नर्मदा झूम नहाई के बोल मेरे भाई.
*अवधी मुक्तक:
गणपति कै जनम भवा जबहीं, अमरावति सूनि परी तबहीं.
सुर-सिद्ध कैलास सुवास करें, अनुराग-उछाह भरे सबहीं..
गौर की गोद मा लाल लगैं, जनु मोती 'सलिल' उर मा बसही.
जग-छेम नरमदा-'सलिल' बहा, कछु सेस असेस न जात कही..
६.१२.२०१२
***

मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

सॉनेट, कबीर, भोर, दिसंबर, जयललिता, दोहा, दंतेश्वरी, अतिशयोक्ति अलंकार,

सॉनेट
कबीर
*
ज्यों की त्यों चादर धर भाई
जिसने दी वह आएगा।
क्यों तैंने मैली कर दी है?
पूछे; क्या बतलायेगा?
काँकर-पाथर जोड़ बनाई
मस्जिद चढ़कर बांग दे।
पाथर पूज ईश कब मिलता?
नाहक रचता स्वांग रे!
दो पाटन के बीच न बचता
कोई सोच मत हो दुखी।
कीली लगा न किंचित पिसता
सत्य सीखकर हो सुखी।
फेंक, जोड़ मत; तभी अमीर
सत्य बोलता सदा कबीर।।
५-१२-२०२१
***
सॉनेट
भोर
*
भोर भई जागो रे भाई!
उठो न आलस करना।
कलरव करती चिड़िया आई।।
ईश-नमन कर हँसना।
खिड़की खोल, हवा का झोंका।
कमरे में आकर यह बोले।
चल बाहर हम घूमें थोड़ा।।
दाँत साफकर हल्का हो ले।।
लौट नहा कर, गोरस पी ले।
फिर कर ले कुछ देर पढ़ाई।
जी भर नए दिवस को जी ले।।
बाँटे अरुण विहँस अरुणाई।।
कोरोना से बचकर रहना।
पहन मुखौटा जैसे गहना।।
५-१२-२०२१
***
कब क्या दिसंबर
*
०१. एड्स जागरूकता दिवस, नागालैंड दिवस १९६३, सीमा सुरक्ष बल गठित १९६५, क्रांन्तिकारी राजा महेंद्र प्रताप जन्म १८८६
०२. संत ज्ञानेश्वर दिवस, अरविन्द आश्रम स्कूल पॉन्डिचेरी १९४२
०३. किसान दिवस, विश्व विकलाँग दिवस, शहीद खुदीराम बोस जन्म १८८९ शहीद ११-८-१९०८, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जयंती १८८४, यशपाल जन्म १९०३ चद्रसेन विराट जन्म १९३६, देवानंद निधन २०११, भारत-पाक युद्ध १९७१, भोपाल गैस रिसाव १९८४
०४. भारतीय जल सेना दिवस, सती प्रथा समापन आदेश जारी १८२९ (लार्ड विलियम बेंटिक), शेख अब्दुल्ला जन्म १९०५
०५. आर्थिक-सामाजिक विकास दिवस, महर्षि अरविन्द दिवस, पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर' जन्म १९१४, रामकृष्ण दीक्षित जन्म १९२८
०६. डॉ. अंबेडकर निधन १९५६, तुर्की महिला मताधिकार १९२९
०७. झंडा दिवस, भारत प्रथम विधवा विवाह १८५६, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जन्म १८७९
०८. तेजबहादुर सप्रू जन्म १८७५, क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) जन्म १८७९, शर्मिला टैगोर जन्म
०९. संविधान सभा प्रथम बैठक १९४६, महाकवि सूरदास जन्म १४८४, क्रन्तिकारी राव तुलाराम जन्म १८२५, शत्रुघ्न सिन्हा जन्म,
१०. मानव अधिकार दिवस, डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस निधन १९४२ चीन में
११. डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष १९४६, कवि प्रदीप जन्म, ओशो जन्म १९३१, अमरीकी अंतरिक्ष उतरे १९७२ (अपोलो)
१२. मैथिलीशरण गुप्त निधन १९६४, प्रो. सत्य सहाय निधन २०१०, प्रिवीपर्स समाप्ति कानून पारित १०७१
१३. भवानी प्रसाद तिवारी निधन
१४. ऊर्जा बचत दिवस, उपेंद्र नाथ अश्क जन्म १९१०, राजकपूर जन्म १९२४, शैलेन्द्र जन्म १९६६
१५. सरदार पटेल निधन १९५०
१६. बांगला देश दिवस १९७१, प्रथम परमाणु भट्टी कलपक्कम १९८५
१७. क्रन्तिकारी राजेंद्र लाहिड़ी निधन १९२७, भगत सिंह- स्कॉट के धोखे में सांडर्स को गोली मारी, नूरजहाँ निधन १६४५, सत्याग्रह स्थगित १९४०, पाक सेना सर्पण ढाका १९७१
१८. राष्ट्रीय संग्रहालय उद्घाटित १९६०
१९. रामप्रसाद बिस्मिल-अशफ़ाक़ उल्ला खान शहीद १९२७, गोवा विजय १९६१,
२०. क्रांतिकारी बाबा सोहन सिंह भखना शहीद १९६८, वनडे मातरम् रचना १८७६ (बंकिम चन्द्र चटर्जी)
२२. श्रीनिवास रामानुजम जन्म १८८७
२३. स्वामी श्रद्धानन्द निधन १९२६
२४. राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस, विश्व भारती स्थापना १९२१, मो.रफ़ी जन्म १९२४
२५. बड़ा दिन, मदन मोहन मालवीय जन्म १८६१, मो. अली जिन्ना जन्म, अटल बिहारी बाजपेयी जन्म १९२४, कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव जन्म, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी निधन, अभिनेत्री साधना निधन २०१५
२६. शहीद ऊधम सिंह जन्म १८९९, डॉ. किशोर काबरा जन्म १९३४, यशपाल निधन १९७६,
२७. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष स्थापित १९४५, जान गण मन गायन दिवस १९११ मिर्ज़ा ग़ालिब जन्म १७९७, बेनज़ीर भुट्टो हत्या २००७
२८. सुमित्रा नंदन पंत निधन १९७७, प्रथम सिनेमा गृह पेरिस १८९५, कश्मीर युद्ध १९४७
२९. कोलकाता मेट्रो कार्यारंभ १९७२
३०. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराकर भारत को स्वतंत्र घोषित किया, बाबर मारा १५३०
३१. स्वराज्य संकल्प लाहौर १९२९, विश्व युद्ध समाप्त १९४६, रघुवीर सहाय निधन, दुष्यंत कुमार निधन
***
दोहांजलि
*
जयललिता-लालित्य को
भूल सकेगा कौन?
शून्य एक उपजा,
भरे कौन?
छा गया मौन.
*
जननेत्री थीं लोकप्रिय,
अभिनेत्री संपूर्ण.
जयललिता
सौन्दर्य की
मूर्ति, शिष्ट-शालीन.
*
दीन जनों को राहतें,
दीं
जन-धन से खूब
समर्थकी जयकार में
हँसीं हमेशा डूब
*
भारी रहीं विपक्ष पर,
समर्थकों की इष्ट
स्वामिभक्ति
पाली प्रबल
भोगें शेष अनिष्ट
*
कर विपदा का सामना
पाई विजय विशेष
अंकित हैं
इतिहास में
'सलिल' न संशय लेश
***
***
दो द्विपदियाँ - दो स्थितियाँ
*
साथ थे तन न मन 'सलिल' पल भर
शेष शैया पे करवटें कितनी
*
संग थे तुम नहीं रहे पल भर
हैं मगर मन में चाहतें कितनी
***
दोहा सलिला-
कवि-कविता
*
जन कवि जन की बात को, करता है अभिव्यक्त
सुख-दुःख से जुड़ता रहे, शुभ में हो अनुरक्त
*
हो न लोक को पीर यह, जिस कवि का हो साध्य
घाघ-वृंद सम लोक कवि, रीति-नीति आराध्य
*
राग तजे वैराग को, भक्ति-भाव से जोड़
सूर-कबीरा भक्त कवि, दें समाज को मोड़
*
आल्हा-रासो रच किया, कलम-पराक्रम खूब
कविपुंगव बलिदान के, रंग गए थे डूब
*
जिसके मन को मोहती, थी पायल-झंकार
श्रंगारी कवि पर गया, देश-काल बलिहार
*
हँसा-हँसाकर भुलाई, जिसने युग की पीर
मंचों पर ताली मिली, वह हो गया अमीर
*
पीर-दर्द को शब्द दे, भर नयनों में नीर
जो कवि वह होता अमर, कविता बने नज़ीर
*
बच्चन, सुमन, नवीन से, कवि लूटें हर मंच
कविता-प्रस्तुति सौ टका, रही हमेशा टंच
*
महीयसी की श्रेष्ठता, निर्विवाद लें मान
प्रस्तुति गहन गंभीर थी, थीं न मंच की जान
*
काका की कविता सकी, हँसा हमें तत्काल
कथ्य-छंद की भूल पर, हुआ न किन्तु बवाल
*
समय-समय की बात है, समय-समय के लोग
सतहीपन का लग गया, मित्र आजकल रोग
५.१२.२०१६
***
देवी दंतेश्वरी के दामाद - हुर्रेमारा
----------------
दंतेश्वरी देवी और आदिवासी संयोजन की अनेक कहानियों में से एक है उनके दामाद हुर्रेमारा की। आदिवासी मान्यतायें न केवल उन्हें अपने परिवार के स्तर तक जोड़ती हैं अपितु वे देवी के भी बेटे-बेटियों, नाती-पोतों की पूरी दुनिया स्थापित कर देते हैं। देवी के ये परिजन आपस में लड़ते-झगडते भी हैं तथा प्रेम-मनुहार भी करते हैं।
कहते हैं देवी दंतेश्वरी की पुत्री मावोलिंगो को देख कर जनजातीय देव हुर्रेमारा आसक्त हो गये। उन्होंने मावोलिंगो से अपना प्रेम व्यक्त किया। यह प्यार अपनी परिणति तक पहुँचता इससे पहले ही लड़की की माँ अर्थात देवी दंतेश्वरी को इसकी जानकारी मिल गयी और उन्होंने विवाह को अपनी असहमति प्रदान कर दी। हुर्रेमारा भी कोई साधारण देव तो थे नहीं, उन्होंने कुछ समय तक प्रयास किया कि दंतेश्वरी मान जायें और अपनी पुत्री से उनके विवाह को स्वीकारोक्ति प्रदान कर दें। बात न बनते देख वे क्रोधित हो गये। उन्होंने अपनी बात मनवाने की जिद में शंखिनी-डंकिनी नदियों के पानी को ही संगम के निकट रोक दिया। अब जलस्तर बढने लगा और धीरे धीरे देवी दंतेश्वरी का मंदिर डूब जाने की स्थिति निर्मित हो गयी। दंतेश्वरी को हार कर हुर्रेमारा की जिद माननी ही पड़ी। इस तरह उनकी पुत्री मावोलिंगो से हुर्रेमारा का विवाह सम्पन्न हो सका।
बात यहीं समाप्त नहीं होती। दामाद हुर्रेमारा जब ससुराल पहुँचे तो उनके अपने ही नखरे थे। तुनक मुजाज हुर्रेमारा हर रोज नयी मांग रखते, अपने स्वागत की नयी नयी अपेक्षायें प्रदर्शित करते और किसी न किसी बात पर झगड़ लेते। अंतत: एक दिन सास-दामाद अर्थात दंतेश्वरी और हुर्रेमारा में ऐसी बिगडी कि अब दोनो ही एक दूसरे से मिलना पसंद नहीं करते। यद्यपि देवी के स्थान में हुर्रेमारा की और हुर्रेमारा के स्थान में देवी दंतेश्वरी की विशेष व्यवस्था की जाती है। दंतेवाड़ा से कुछ ही दूर भांसी गाँव के पास एक पहाड़ी तलहटी में हुर्रेमारा का स्थान है जहाँ वे अपनी पत्नी मावोलिंगो व अपने एक पुत्र के साथ रह रहे हैं। इस देव परिवार की अनेक संततियाँ हैं जो निकटस्थ अनेक गाँवों में निवासरत हैं और वहाँ के निवासियों द्वारा सम्मान पाती हैं।
===
***
अलंकार सलिला ३९
अतिशयोक्ति सीमा हनें
*
जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पक गये तथा गेहूँ का ह्रदय फट गया।
२. मैं तो राम विरह की मारी, मोरी मुंदरी हो गयी कँगना।
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।
३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।
४. बूँद-बूँद मँह जानहू।
५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई।
६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई।
७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ।
८. तेहि दुःख भये परास निपाते।
९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग।। -तुलसी
१०. देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।। -मैथिलीशरण गुप्त
११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही, सूखी गया तिय कोमल गात।
१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई. चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.
१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार।।
१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के, नदी नाद मद गैबरन के रलत है।
१५. ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें।
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ।। -जावेद अख्तर
१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार।
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।। -निदा फाज़ली
अतिशयोक्ति अलंकार के निम्न ८ प्रकार (भेद) हैं।
१. संबंधातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध दिखाया जाए अथवा जब अयोग्यता में योग्यता प्रदर्शित की जाए तब संबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. फबि फहरहिं अति उच्च निसाना।
जिन्ह मँह अटकहिं बिबुध बिमाना।।
फबि = शोभा देना, निसाना = ध्वज, बिबुध = देवता।
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी बताया गया है।
२. पँखुरी लगे गुलाब की, परिहै गात खरोंच
गुलाब की पँखुरी और गात में खरोंच का संबंध न होने पर भी बता दिया गया है।
३. भूलि गयो भोज, बलि विक्रम बिसर गए, जाके आगे और तन दौरत न दीदे हैं।
राजा-राइ राने, उमराइ उनमाने उन, माने निज गुन के गरब गिरबी दे हैं।।
सुजस बजाज जाके सौदागर सुकबि, चलेई आवै दसहूँ दिशान ते उनींदे हैं।
भोगी लाल भूप लाख पाखर ले बलैया जिन, लाखन खरचि रूचि आखर ख़रीदे हैं।।
यहाँ भुला देने अयोग्य भोग आदि भोगीलाल के आगे भुला देने योग्य ठहराये गये हैं।
४. जटित जवाहर सौ दोहरे देवानखाने, दूज्जा छति आँगन हौज सर फेरे के।
करी औ किवार देवदारु के लगाए लखो, लह्यो है सुदामा फल हरि फल हेरे के।।
पल में महल बिस्व करमै तयार कीन्हों, कहै रघुनाथ कइयो योजन के घेरे में।
अति ही बुलंद जहाँ चंद मे ते अमी चारु चूसत चकोर बैठे ऊपर मुंडेरे के।।
५. आपुन के बिछुरे मनमोहन बीती अबै घरी एक कि द्वै है।
ऐसी दसा इतने भई रघुनाथ सुने भय ते मन भ्वै है।।
गोपिन के अँसुवान को सागर बाढ़त जात मनो नभ छ्वै है।
बात कहा कहिए ब्रज की अब बूड़ोई व्है है कि बूडत व्है हैं।।
२. असम्बन्धातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध होने पर भी संबंध न दिखाया जाए अथवा जब योग्यता में अयोग्यता प्रदर्शित की जाए तब असंबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. जेहि वर वाजि राम असवारा। तेहि सारदा न बरनै पारा।।
वाजि = घोडा, न बरनै पारा = वर्णन नहीं कर सकीं।
२. अति सुन्दर लखि सिय! मुख तेरो। आदर हम न करहिं ससि केरो।।
करो = का। चन्द्रमा में मुख- सौदर्य की समानता के योग्यता होने पर भी अस्वीकार गया है।
३. देखि गति भासन ते शासन न मानै सखी
कहिबै को चहत गहत गरो परि जाय
कौन भाँति उनको संदेशो आवै रघुनाथ
आइबे को न यो न उपाय कछू करि जाय
विरह विथा की बात लिख्यो जब चाहे तब
ऐसे दशा होति आँच आखर में भरि जाय
हरि जाय चेत चित्त सूखि स्याही छरि जाय
३. चपलातिशयोक्ति-
जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।
उदाहरण-
१. तव सिव तीसर नैन उघारा। चितवत काम भयऊ जरि छारा।।
शिव के नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो गया।
२. आयो-आयो सुनत ही सिव सरजा तव नाँव।
बैरि नारि दृग जलन सौं बूडिजात अरिगाँव।।
४. अक्रमातिशयोक्ति-
जब कारण और कार्य एक साथ हों।
उदाहरण-
१. बाणन के साथ छूटे प्राण दनुजन के।
सामान्यत: बाण छूटने और लगने के बाद प्राण निकालेंगे पर यहाँ दोनों क्रियाएं एक साथ होना बताया गया है।
२. पाँव के धरत, अति भार के परत, भयो एक ही परत, मिली सपत पताल को।
३. सन्ध्यानों प्रभु विशिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।
४. क्षण भर उसे संधानने में वे यथा शोभित हुए।
है भाल नेत्र जवाल हर, ज्यों छोड़ते शोभित हुए।।
वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।।
५. अत्यंतातिशयोक्ति-
जब कारण के पहले ही कार्य संपन्न हो जाए।
उदाहरण:
१. हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जर गयी, गये निसाचर भाग।।
२. धूमधाम ऐसी रामचद्र-वीरता की मची, लछि राम रावन सरोश सरकस तें।
बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे काढ़े बाण तेजमान तरकस तें।।
६. भेदकातिशयोक्ति-
जहाँ उपमेय या प्रस्तुत का अन्यत्व वर्णन किया जाए, अभेद में भी भेद दिखाया जाए अथवा जब और ही, निराला, न्यारा, अनोखा आदि शब्दों का प्रयोग कर किसी की अत्यधिक या अतिरेकी प्रशंसा की जाए।
उदाहरण-
१. न्यारी रीति भूतल, निहारी सिवराज की।
२. औरे कछु चितवनि चलनि, औरे मृदु मुसकान।
औरे कछु सुख देत हैं, सकें न नैन बखान।।
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान।
वह चितवन औरे कछू, जेहि बस होत सुजान।।
७. रूपकातिशयोक्ति-
उदाहरण-
१. जब केवल उपमान या अप्रस्तुत का कथन कर उसी से उपमेय या प्रस्तुत का बोध कराया जाए अथवा उपमेय का लोप कर उपमान मात्र का कथा किया जाए अर्थात उपमान से ही अपमान का भी अर्थ अभीष्ट हो तब रूपकातिशयोक्ति होता है। रूपकातिशयोक्ति का अधिक विक्सित और रूढ़ रूप प्रतिक योजना है।
उदाहरण-
१. कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
कनकलता = स्वर्ण जैसी आभामय शरीर, चंद्रमा = मुख, धनुष = भ्रकुटी, बाण = नेत्र, कटाक्षकनकलता यहाँ नायिका के सौन्दर्य का वर्णन है। शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष आदि उप्मेयों का लोप कर केवल लता, चन्द्र, धनुष, बाण आदि का कथन किया गया है किन्तु प्रसंग से अर्थ ज्ञात हो जाता है।
२. गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमानु का उल्लेख न कर उपमान सिंह मात्र का उल्लेख है जिससे अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।
३.विद्रुम सीपी संपुट में, मोती के दाने कैसे।
है हंस न शुक यह फिर क्यों, चुगने को मुक्त ऐसे।।
४. पन्नग पंकज मुख गाहे, खंजन तहाँ बईठ।
छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जू दीठ।।
८. सापन्हवातिशयोक्ति-
यह अपन्हुति और रूपकातिशयोक्ति का सम्मिलित रूप है। जहाँ रूपकातिशयोक्ति प्रतिषेधगर्भित रूप में आती है वहाँ सापन्हवातिशयोक्ति होता है।
उदाहरण-
१. अली कमल तेरे तनहिं, सर में कहत अयान।
यहाँ सर में कमल का निषेध कर उन्हें मुख और नेत्र के रूप में केवल उपमान द्वारा शरीर में वर्णित किया गया है।
टिप्पणी: उक्त ३, ४, ५ अर्थात चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति तथा अत्यंतातिशयोक्ति का भेद कारण के आधार पर होने के कारण कुछ विद्वान् इन्हें कारणातिशयोक्ति के भेद-रूप में वर्णित करते हैं।
***

***

गीत -
*
महाकाल के पूजक हैं हम
पाश काल के नहीं सुहाते
नहीं समय-असमय की चिंता
कब विलंब से हम घबराते?
*
खुद की ओर उठीं त्रै ऊँगली
अनदेखी ही रहीं हमेशा
एक उठी जो औरों पर ही
देख उसी को ख़ुशी मनाते
*
कथनी-करनी एक न करते
द्वैत हमारी श्वासों में है
प्यासों की कतार में आगे
आसों पर कब रोक लगाते?
*
अपनी दोनों आँख फोड़ लें
अगर तुम्हें काना कर पायें
संसद में आचरण दुरंगा
हो निलज्ज हम रहे दिखाते
*
आम आदमी की ताकत ही
रखे देश को ज़िंदा अब तक
नेता अफसर सेठ बेचकर
वरना भारत भी खा जाते


५.१२.२०१५

***

नवगीत :
*
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
मर्जी हो तो पंगु को
गिरि पर देता है चढ़ा
अंधे को देता दिखा
निर्धन को कर दे धनी
भक्तों को लेता बचा
वो खुले-आम, बिन आड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
पानी बिन सूखा कहीं
पानी-पानी है कहीं
उसका कुछ सानी नहीं
रहे न कुछ उससे छिपा
मनमानी करता सदा
फिर पत्ते चलता ताड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
अपनी बीबी छुड़ाने
औरों को देता लड़ा
और कभी बंसी बजा
करता डेटिंग रास कह
चने फोड़ता हो सलिल
ज्यों भड़भूंजा भाड़ बिन
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
३-१२-२०१५
***

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

कहमुकरी, गृह प्रवेश, सरस्वती, पूर्णिमा निगम, मुक्तक गीत, मधु प्रमोद, समीक्षा

कहमुकरी
वस्त्र सफेद पहनतीं हरदम
नयनों में ममता होती नम
अधरों पर मुस्कान सजाएँ
माँ? नहिं शारद;
आ! गुण गाएँ
रहे प्रतीक्षा इसकी सबको
कौन न चाहे कहिए इसको?
इस पर आए सबको प्यार
सखि! दिलदार?,
नहिं रविवार
काया छोटी; अर्थ बड़े
लगता रच दें खड़े-खड़े
मोह न छूटे जैसे नग का
वैसे नथ का?;
ना सखि! क्षणिका
बिंदु बिंदु संसार बना दे
रेखा खींचे भाव नया दे
हो अंदाज न उसकी मति का
सखी! शिक्षिका?,
नहीं अस्मिता
साथ बहारें उसके आएँ
मन करता है गीत सुनाएँ
साथ उसी के समय बिताएँ
प्यारी! कंत?,
नहीं बसंत
कभी न रीते उसका कोष
कोई न देता उसको दोष
रहता दूर हमेशा रोष
भैया! होश?,
ना संतोष
समझ न आए उसकी माया
पीछा कोई छुड़ा न पाया
संग-साथ उसका मन भाया
मीता! काया?,
ना रे! छाया
कभी न करती मिली रंज री!
रहती मौन न करे तंज री!
एक बचाकर कई बनाए
सखी! अंजुरी?,
नहीं मंजुरी
४-१२-२०२२
***
वास्तु विमर्श
गृह प्रवेश
मनुष्य के लिये अपना घर होना किसी सपने से कम नहीं होता। अपना घर यानि की उसकी अपनी एक छोटी सी दुनिया, जिसमें वह तरह-तरह के सपने सजाता है। पहली बार अपने घर में प्रवेश करने की खुशी कितनी होती है इसे सब समझ सकते हैं; अनुभव कर सकते हैं लेकिन बता नहीं सकते। यदि आप धार्मिक हैं, शुभ-अशुभ में विश्वास रखते हैं तो गृह प्रवेश से पहले पूजा अवश्य करवायें।
गृह प्रवेश के प्रकार
१. अपूर्व गृह प्रवेश – नवनिर्मित घर में पहली बार प्रवेश।
२. सपूर्व गृह प्रवेश – जब किसी कारण से व्यक्ति अपने परिवार सहित प्रवास पर हो, अपने घर को कुछ समय के लिये खाली छोड़ देते तथा दुबारा रहने के लिये आए।
३. द्वान्धव गृह प्रवेश – जब किसी परेशानी या किसी आपदा के चलते घर को छोड़ना पड़े और कुछ समय पश्चात दोबारा उस घर में प्रवेश करें तो वह द्वान्धव गृह प्रवेश कहलाता है।
४. अस्थाई गृह प्रवेश - किराए के माकन आदि में प्रवेश।
इन सभी स्थितियों में गृह प्रवेश पूजा का विधान आवश्यक है ताकि कि इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
गृह प्रवेश की पूजा विधि
गृह प्रवेश के लिये शुभ दिन-तिथि-वार-नक्षत्र देख लें। किसी जानकार की सहायता लें, जो विधिपूर्वक पूजा करा सके अथवा स्वयं जानकारी लेकर यथोचित सामग्री एकत्रित कर पूजन करें। आपातस्थिति में कुछ भी न जुटा सकें तो विघ्न विनाशक श्री गणेश जी, जगत्पिता शिव जी, जगज्जननि दुर्गा जी, वास्तु देव तथा कुलदेव को दीप जलाकर श्रद्धा सहित प्रणाम कर ग्रह प्रवेश करें। पितृपक्ष तथा सावन माह में गृह प्रवेश न करें।
समय
माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ माह गृह प्रवेश हेतु शुभ हैं। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, पौष ग्रह प्रवेश हेतु शुभ नहीं हैं। सामान्यत: मंगलवार शनिवार व रविवार के दिन गृह प्रवेश वर्जित है। सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार तथा शुक्लपक्ष की द्वितीय, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी व त्रयोदशी गृहप्रवेश के लिये बहुत शुभ मानी जाती हैं।
गृह प्रवेश विधि
पूजन सामग्री- कलश, नारियल, शुद्ध जल, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, धूपबत्ती, पांच शुभ मांगलिक वस्तुएं, आम या अशोक के पत्ते, पीली हल्दी, गुड़, चावल, दूध आदि।
गृह के मुख्य द्वार पर आम्र पर्ण का बंदनवार बाँधकर रांगोली, अल्पना या चौक से सजाएँ। पूजा विधि संपन्न होने के बाद मंगल कलश के साथ सूर्य की रोशनी में नए घर में प्रवेश करना चाहिए।
घर को बंदनवार, रंगोली, फूलों से सजाकर; कलश में शुद्ध जल भरकर उसमें आम या अशोक के आठ पत्तों के बीच श्रीफल (नारियल) रखें। कलश व नारियल पर कुमकुम से स्वस्तिक का चिन्ह बनाएँ। गृह स्वामी और गृह स्वामिनी पाँच मांगलिक वस्तुएँ श्रीफल, पीली हल्दी, गुड़, अक्षत (चावल) व पय (दूध), विघ्नेश गणेश की मूर्ति, दक्षिणावर्ती शंख तथा श्री यंत्र लेकर मंगलकारी गीत गायन, शंख वादन आदि के साथ पुरुष पहले दाहिना पैर तथा स्त्री बाँया पैर रखकर नए घर में प्रवेश करें। इसके पूर्व पीतल या मिट्टी के कलश में जल भरकर द्वार पर कर आम के पाँच पत्ते लगाएँ, सिंदूर से स्वास्तिक बनाएँ। गृह स्वामिनी गणेश जी का स्मरण करते हुए ईशान कोण में जल से भरा कलश रखे। गृह स्वामी नारियल, पीली हल्दी, गुड़, चावल हाथ में ले, ग्रह स्वामिनी इन्हें साड़ी के पल्ले में रखें।
श्री गणेश का ध्यान करते हुए गणेश जी के मंत्र वाचन कर घर के ईशान कोण या पूजा घर में कलश की स्थापना करें। ततपश्चात भोजनालय में भी पूजा करें। चूल्हे, पानी रखने का स्थान, भंडार, आदि में स्वस्तिक बनाकर धूप, दीपक के साथ कुमकुम, हल्दी, चावल आदि से पूजन करें। भोजनालय में पहले दिन गुड़ व हरी सब्जियाँ रखना शुभ है। चूल्हे को जलाकर सबसे पहले उस पर दूध उफानना चाहिये, मिष्ठान बनाकर उसका भोग लगाना चाहिये। घर में बने भोजन से सबसे पहले भगवान को भोग लगायें। गौ माता, कौआ, कुत्ता, चींटी आदि के निमित्त भोजन निकाल कर रखें। इसके बाद सदाचारी विद्वानों व गरीब भूखे को भोजन कराएँ। ऐसा करने से घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है व हर प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।
पूजन
षट्कर्म, तिलक, रक्षासूत्रबन्धन, भूमि पूजन, कलश पूजन, दीप पूजन, देव आह्वान, सर्व देव प्रणाम,. स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान पश्चात् पूजा देवी पर वास्तु पुरुष का आह्वान-पूजन करें।
ॐ वास्तोष्पत्ते प्रतिजानीहि अस्मान् स्ववेशो अनमीवो भवा न:।
यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्व, शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।। (ऋग्वेद ७.५.४.१)
ॐ भूर्भुव: स्व: वास्तुपुरुषाय नम:। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
गन्धाक्षतं पुष्पाणि, धूपं, दीपं, नैवेद्यं समर्पयामि। ततो नमस्कारं करोमि।
ॐ विशंतु भूतले नागा: लोकपालश्च सर्वत:।
मंडलेs त्रावतिष्ठंतु ह्यायुर्बलकरा: सदा।।
वास्तुपुरुष देवेश! सर्वविघ्न विदारण।
शन्ति कुरुं; सुखं देहि, यज्ञेsस्मिन्मम सर्वदा।।
यज्ञ : अग्निस्थापन, प्रदीपन, अग्निपूजन आदि कर २४ बार गायत्री मंत्र की आहुति दें। खीर, मिष्ठान्न, गौ-घृत से ५ आहुति स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, राष्ट्र देवता तथा सर्व देवताओं को दें।
पूर्णाहुति, वसोर्धारा, आरती, प्रसाद वितरण आदि कर अनुष्ठान पूर्ण करें।
४.१२.२०२१
***
सरस्वती वंदना
*
तेरी वीणा का बन जाऊँ तार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान।
जय माँ सरस्वती
विद्या-बुद्धि की तुम ही हो दाता, तुम्हीं सुर की देवी हो माता।
मैं भी जानूँ सुरों का सार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
आए चरणों में जो भी तुम्हारे, दूर अग्यान हों उसके सारे।
मन का मिट जाए सब अंधकार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
तब बहा ग्यान की ऐसी धारा, भेद मिट जाए मन का सारा।
प्रेम ज्योति जले द्वार-द्वार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
***
पल-पल प्रीत पली - महकी काव्य कली
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
[पुस्तक विवरण - पल-पल प्रीत पली, काव्य संकलन, मधु प्रमोद, प्रथम संस्करण, २०१८, आईएसबीएन ९७८-८१-९३५५०१-३-७, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २००रु., प्रकाशक उषा पब्लिकेशंस, मीणा की गली अलवर ३०१००१, दूरभाष ०१४४ २३३७३२८, चलभाष ९४१४८९३१२०, ईमेल mpalawat24@gmail.com ]
*
मानव और अन्य प्राणियों में मुख्य अंतर सूक्षम अनुभूतियों को ग्रहण करना, अनुभूत की अनुभूति कर इस तरह अभिव्यक्त कर सकना कि अन्य जान सम-वेदना अनुभव करें, का ही है। सकल मानवीय विकास इसी धुरी पर केंद्रित रहा है। विविध भूभागों की प्रकृति और अपरिवेश के अनुकूल मानव ने प्रकृति से ध्वनि ग्रहण कर अपने कंठ से उच्चारने की कला विकसित की। फलत: वह अनुभूत को अभिव्यक्त और अभिव्यक्त को ग्रहण कर सका। इसका माध्यम बनी विविध बोलिया जो परिष्कृत होकर भाषाएँ बनीं। अभिव्यक्ति के अन्य माध्यम अंग चेष्टाएँ, भाव मुद्राएँ आदि से नाट्य व नृत्य का विकास हुआ जबकि बिंदु और रेखा से चित्रकला विकसित हुई। वाचिक अभिव्यक्ति गद्य व पद्य के रूप में सामने आई। विवेच्य कृति पद्य विधा में रची गयी है।
मरुभूमि की शान गुलाबी नगरी जयपुर निवासी कवयित्री मधु प्रमोद रचित १० काव्य कृतियाँ इसके पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं। आकाश कुसुम, दूर तुमसे रहकर, मन का आनंद, अकुल-व्याकुल मन, रू-ब-रू जो कह न पाए, भजन सरिता, भक्ति सरोवर पुजारन प्रभु के दर की, पट खोल जरा घट के के बाद पल-पल प्रीत पली की ९५ काव्य रचनाओं में गीत व हिंदी ग़ज़ल शिल्प की काव्य रचनाएँ हैं। मधु जी के काव्य में शिल्प पर कथ्य को वरीयता मिली है। यह सही है कि कथ्य को कहने के लिए लिए ही रचना की जाती है किन्तु यह भी उतना ही सही है कि शिल्पगत बारीकियाँ कथ्य को प्रभावी बनाती हैं।
ग़ज़ल मूलत: अरबी-फारसी भाषाओँ से आई काव्य विधा है। संस्कृत साहित्य के द्विपदिक श्लोकों में उच्चार आधारित लचीली साम्यता को ग़ज़ल में तुकांत-पदांत (काफिया-रदीफ़) के रूप में रूढ़ कर दिया गया है। उर्दू ग़ज़ल वाचिक काव्य परंपरा से उद्भूत है इसलिए भारतीय लोककाव्य की तरह गायन में लय बनाये रखने के लिए गुरु को लघु और लघु उच्चारित करने की छूट ली गयी है। हिंदी ग़ज़ल वैशिष्ट्य उसे हिंदी व्याकरण पिंगल के अनुसार लिखा जाना है। हिंदी छंद शास्त्र में छंद के मुख्य दो प्रकर मातृ और वार्णिक हैं। अत, हिंदी ग़ज़ल इन्हीं में से किसी एक पर लिखी जाती है जबकि फ़ारसी ग़ज़ल के आधार पर भारतीय भाषाओँ के शब्द भंडार को लेकर उर्दू ग़ज़ल निर्धारित लयखण्डों (बह्रों) पर आधारित होती हैं। मधु जी की ग़ज़लनुमा रचनाएँ हिंदी ग़ज़ल या उर्दू ग़ज़ल की रीती-निति से सर्वथा अलग अपनी राह आप बनाती हैं। इनमें पंक्तियों का पदभार समान नहीं है, यति भी भिन्न-भिन्न हैं, केवक तुकांतता को साधा गया है।
इन रचनाओं की भाषा आम लोगों द्वारा दैनंदिन जीवन में बोली जानेवाली भाषा है। यह मधु जी की ताकत और कमजोरी दोनों है। ताकत इसलिए कि इसे आम पाठक को समझने में आसानी होती है, कमजोरी इसलिए कि इससे रचनाकार की स्वतंत्र शैली या पहचान नहीं बनती। मधु जी बहुधा प्रसाद गुण संपन्न भाषा और अमिधा में अपनी बात कहती है। लक्षणा या व्यजना का प्रयोग अपेक्षाकृत कम है। उनकी ग़ज़लें जहाँ गीत के निकट होती हैं, अधिक प्रभाव छोड़ती हैं -
मन मुझसे बातें करता है, मैं मन से बतियाती हूँ।
रो-रोकर, हँस-हँसकर जीवन मैं सहज कर पाती हूँ।
पीले पत्ते टूटे सारे, देखो हर एक डाल के
वृद्ध हैं सारे बैठे हुए नीचे उस तिरपाल के
मधु जी के गीत अपेक्षाकृत अधिक भाव प्रवण हैं-
मैंने हँसना सीख लिया है, जग की झूठी बातों पर
सहलाये भूड़ घाव ह्रदय के रातों के सन्नाटों पर
विश्वासों से झोली भरकर आस का दीप जलाने दो
मुझको दो आवाज़ जरा तुम, पास तो मुझको आने दो
किसी रचनाकार की दसवीं कृति में उससे परिपक्वता की आशा करना बेमानी नाहने है किन्तु इस कृति की रचनाओं को तराशे जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। गीति रचनाओं में लयबद्धता, मधुरता, सरसता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता आदि होना उन्हें स्मरणीय बनाता है। इस संकलन की रचनाएँ या आभास देती हैं कि रचनाकार को उचित मार्गदर्शन मिले तो वे सफल और सशक्त गीतकार बन सकती हैं।
*
संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, विश्व वाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
***
कृति चर्चा :
गीत स्पर्श : दर्द के दरिया में नहाये गीत
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
[कृति विवरण: गीत स्पर्श, गीत संकलन, डॉ. पूर्णिमा निगम ‘पूनम’, प्रथम संस्करण २००७, आकार २१.से.मी. x १३.से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १२२, मूल्य १५० रु., निगम प्रकाशन २१० मढ़ाताल जबलपुर। ]
*
साहित्य संवेदनाओं की सदानीरा सलिला है। संवेदनाविहीन लेखन गणित की तरह शुष्क और नीरस विज्ञा तो हो सकता है, सरस साहित्य नहीं। साहित्य का एक निकष ‘सर्व हिताय’ होना है। ‘सर्व’ और ‘स्व’ का संबंध सनातन है। ‘स्व’ के बिना ‘सर्व’ या ‘सर्व’ के बिना ‘स्व’ की कल्पना भी संभव नहीं। सामान्यत: मानव सुख का एकांतिक भोग करना चाहता है जबकि दुःख में सहभागिता चाहता है।इसका अपवाद साहित्यिक मनीषी होते हैं जो दुःख की पीड़ा को सहेज कर शब्दों में ढाल कर भविष्य के लिए रचनाओं की थाती छोड़ जाते हैं। गीत सपर्श एक ऐसी ही थाती है कोकिलकंठी शायरा पूर्णिमा निगम ‘पूनम’ की जिसे पूनम-पुत्र शायर संजय बादल ने अपनी माता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में प्रकाशित किया है। आज के भौतिकवादी भोगप्रधान कला में दिवंगता जननी के भाव सुमनों को सरस्वती के श्री चरणों में चढ़ाने का यह उद्यम श्लाघ्य है।
गीत स्पर्श की सृजनहार मूलत: शायरा रही है। वह कैशोर्य से विद्रोहणी, आत्मविश्वासी और चुनौतियों से जूझनेवाली रही है। ज़िंदगी ने उसकी कड़ी से कड़ी परीक्षा ली किन्तु उसने हार नहीं मानी और प्राण-प्राण से जूझती रही। उसने जीवन साथी के साथ मधुर सपने देखते समय, जीवन साथी की ज़िंदगी के लिए जूझते समय, जीवनसाथी के बिछुड़ने के बाद, बच्चों को सहेजते समय और बच्चों के पैरों पर खड़ा होते ही असमय विदा होने तक कभी सहस और कलम का साथ नहीं छोड़ा। कुसुम कली सी कोमल काया में वज्र सा कठोर संकल्प लिए उसने अपनों की उपेक्षा, स्वजनों की गृद्ध दृष्टि, समय के कशाघात को दिवंगत जीवनसाथी की स्मृतियों और नौनिहालों के प्रति ममता के सहारे न केवल झेला अपितु अपने पौरुष और सामर्थ्य का लोहा मनवाया।
गीत स्पर्श के कुछ गीत मुझे पूर्णिमा जी से सुनने का सुअवसर मिला है। वह गीतों को न पढ़ती थीं, न गाती थीं, वे गीतों को जीती थीं, उन पलों में डूब जाती थीं जो फिर नहीं मिलनेवाले थे पर गीतों के शब्दों में वे उन पलों को बार-बार जी पाती थी। उनमें कातरता नहीं किन्तु तरलता पर्याप्त थी। इन गीतों की समीक्षा केवल पिंगलीय मानकों के निकष पर करना उचित नहीं है। इनमें भावनाओं की, कामनाओं की, पीरा की, एकाकीपन की असंख्य अश्रुधाराएँ समाहित हैं। इनमें अदम्य जिजीविषा छिपी है। इनमें अगणित सपने हैं। इनमें शब्द नहीं भाव हैं, रस है, लय है। रचनाकार प्राय: पुस्तकाकार देते समय रचनाओं में अंतिम रूप से नोक-फलक दुरुस्त करते हैं। क्रूर नियति ने पूनम को वह समय ही नहीं दिया। ये गीत दैनन्दिनी में प्रथमत: जैसे लिखे गए, संभवत: उसी रूप में प्रकाशित हैं क्योंकि पूनम के महाप्रस्थान के बाद उसकी विरासत बच्चों के लिए श्रद्धा की नर्मदा हो गई हिअ जिसमें अवगण किया जा सकता किन्तु जल को बदला नहीं जा सकता। इस कारण कहीं-कहीं यत्किंचित शिल्पगत कमी की प्रतीति के साथ मूल भाव के रसानंद की अनुभूति पाठक को मुग्ध कर पाती है। इन गीतों में किसी प्रकार की बनावट नहीं है।
पर्सी बायसी शैली के शब्दों में ‘ओवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोस विच टेल ऑफ़ सेडेस्ट थॉट’। शैलेन्द्र के शब्दों में- ‘हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’। पूनम का दर्द के साथ ताज़िंदगी बहुत गहरा नाता रहा -
भीतर-भीतर रट रहना, बहार हंसकर गीत सुनाना
ऐसा दोहरा जीवन जीना कितना बेमानी लगता है?
लेकिन इसी बेमानीपन में ज़िंदगी के मायने तलाशे उसने -
अब यादों के आसमान में, बना रही अपना मकान मैं
न कहते-कहते भी दिल पर लगी चोट की तीस आह बनकर सामने आ गयी -
जान किसने मुझे पुकारा, लेकर पूनम नाम
दिन काटे हैं मावस जैसे, दुःख झेले अविराम
जीवन का अधूरापन पूनम को तोड़ नहीं पाया, उसने बच्चों को जुड़ने और जोड़ने की विरासत सौंप ही दी -
जैसी भी है आज सामने, यही एक सच्चाई
पूरी होने के पहले ही टूट गयी चौपाई
अब दीप जले या परवाना वो पहले से हालात नहीं
पूनम को भली-भाँति मालूम था कि सिद्धि के लिए तपना भी पड़ता है -
तप के दरवाज़े पर आकर, सिद्धि शीश झुकाती है
इसीलिए तो मूर्ति जगत में, प्राण प्रतिष्ठा पाती है
दुनिया के छल-छलावों से पूनम आहात तो हुई पर टूटी नहीं। उसने छलियों से भी सवाल किये-
मैंने जीवन होम कर दिया / प्रेम की खातिर तब कहते हो
बदनामी है प्रेम का बंधन / कुछ तो सोची अब कहते हो।
लेकिन कहनेवाले अपनी मान-मर्यादा का ध्यान नहीं रख सके -
रिश्ते के कच्चे धागों की / सब मर्यादाएँ टूट गयीं
फलत:,
नींद हमें आती नहीं है / काँटे सा लगता बिस्तर
जीवन एक जाल रेशमी / हम हैं उसमें फँसे हुए
नेक राह पकड़ी थी मैंने / किन्तु जमाना नेक नहीं
'बदनाम गली' इस संग्रह की अनूठी रचना है। इसे पढ़ते समय गुरु दत्त की प्यासा और 'जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ है' याद आती है। कुछ पंक्तियाँ देखें-
रिश्ता है इस गली से भाई तख्तो-ताज का / वैसे ही जैसे रिश्ता हो चिड़ियों से बाज का
जिनकी हो जेब गर्म वो सरकार हैं यहाँ / सज्जन चरित्रवान नोचते हैं बोटियाँ
वो हाथ में गजरा लपेटे आ रहे हैं जो / कपड़े की तीन मिलों को चला रहे हैं वो
रेखा उलाँघती यहाँ सीता की बेटियाँ / सलमा खड़ी यहाँ पे कमाती है रोटियाँ
इनको भी माता-बहनों सा सत्कार चाहिए / इनको भी प्रजातन्त्र के अधिकार चाहिए
अपने दर्द में भी औरों की फ़िक्र करने का माद्दा कितनों में होता है। पूनम शेरदिल थी, उसमें था यह माद्दा। मिलन और विरह दोनों स्मृतियाँ उसको ताकत देती थीं -
तेरी यादे तड़पाती हैं, और हमें हैं तरसातीं
हुई है हालत मेरी ऐसी जैसे मेंढक बरसाती
आदर्श को जलते देख रही / बच्चों को छलते देख रही
मधुर मिलान के स्वप्न सुनहरे / टूट गए मोती मानिंद
अब उनकी बोझिल यादें हैं / हल्के-फुल्के लम्हात नहीं
ये यादें हमेशा बोझिल नहीं कभी-कभी खुशनुमा भी होती हैं -
एक तहजीब बदन की होती है सुनो / उसको पावन ऋचाओं सा पढ़कर गुनो
तन की पुस्तक के पृष्ठ भी खोले नहीं / रात भर एक-दूसरे से बोले नहीं
याद करें राजेंद्र यादव का उपन्यास 'सारा आकाश'।
एक दूजे में मन यूँ समाहित हुआ / झूठे अर्पण की हमको जरूरत नहीं
जीवन के विविध प्रसगों को कम से कम शब्दों में बयां करने की कला कोई पूनम से सीखे।
उठो! साथ दो, हाथ में हाथ दो, चाँदनी की तरह जगमगाऊँगी मैं
बिन ही भाँवर कुँवारी सुहागन हुई, गीत को अपनी चूनर बनाऊँगी मैं
देह की देहरी धन्य हो जाएगी / तुम अधर से अधर भर मिलाते रहो
लाल हरे नीले पिले सब रंग प्यार में घोलकर / मन के द्वारे बन्दनवारे बाँधे मैंने हँस-हँसकर
आँख की रूप पर मेहरबानी हुई / प्यार की आज मैं राजधानी हुई
राग सीने में है, राग होंठों पे है / ये बदन ही मेरा बाँसुरी हो गया
साँस-साँस होगी चंदन वन / बाँहों में जब होंगे साजन
गीत-यात्री पूनम, जीवन भर अपने प्रिय को जीती रही और पलक झपकते ही महामिलन के लिए प्रस्थान कर गयी -
पल भर की पहचान / उम्र भर की पीड़ा का दान बन गई
सुख से अधिक यंत्रणा / मिलती है अंतर के महामिलन में
अनूठी कहन, मौलिक चिंतन, लयबद्ध गीत-ग़ज़ल, गुनगुनाते-गुनगुनाते बाँसुरी सामर्थ्य रखनेवाली पूनम जैसी शख्सियत जाकर भी नहीं जाती। वह जिन्दा रहती है क़यामत मुरीदों, चाहनेवालों, कद्रदानों के दिल में। पूनम का गीत स्पर्श जब-जब हाथों में आएगा तब- तब पूनम के कलाम के साथ-साथ पूनम की यादों को ताज़ा कर जाएगा। गीतों में अपने मखमली स्पर्श से नए- नए भरने में समर्थ पूनम फिर-फिर आएगी हिंदी के माथे पर नयी बिंदी लिए।हम पहचान तो नहीं सकते पर वह है यहीं कहीं, हमारे बिलकुल निकट नयी काया में। उसके जीवट के आगे समय को भी नतमस्तक होना ही होगा।
३-१२-२०१९
***
मुक्तक सलिला
*
प्रात मात शारदा सुरों से मुझे धन्य कर।
शीश पर विलंब बिन धरो अनन्य दिव्य कर।।
विरंचि से कहें न चित्रगुप्त गुप्त चित्र हो।
नर्मदा का दर्श हो, विमल सलिल सबल मकर।।
*
मलिन बुद्धि अब अमल विमल हो श्री राधे।
नर-नारी सद्भाव प्रबल हो श्री राधे।।
अपराधी मन शांत निबल हो श्री राधे।
सज्जन उन्नत शांत अचल हो श्री राधे।।
*
जागिए मत हे प्रदूषण, शुद्ध रहने दें हवा।
शांत रहिए शोरगुल, हो मौन बहने दें हवा।।
मत जगें अपराधकर्ता, कुंभकर्णी नींद लें-
जी सके सज्जन चिकित्सक या वकीलों के बिना।।
*
विश्व में दिव्यांग जो उनके सहायक हों सदा।
एक दिन देकर नहीं बनिए विधायक, तज अदा।
सहज बढ़ने दें हमें, चढ़ सकेंगे हम सीढ़ियाँ-
पा सकेंगे लक्ष्य चाहे भाग्य में हो ना बदा।।
२-१२-२०१९
*
***
मुक्तक
.
संवेदना की सघनता वरदान है, अभिशाप भी.
अनुभूति की अभिव्यक्ति है, चीत्कार भी, आलाप भी.
निष्काम हो या काम, कारित कर्म केवल कर्म है-
पुण्य होता आज जो, होता वही कल पाप है.
छंद- हरिगीतिका
४-१२-२०१७
***
आव्हान
.
जीवन-पुस्तक बाँचकर,
चल कविता के गाँव.
गौरैया स्वागत करे,
बरगद देगा छाँव.
.
कोयल दे माधुर्य-लय,
देगी पीर जमीन.
काग घटाता मलिनता,
श्रमिक-कृषक क्यों दीन?
.
सोच बदल दे हवा, दे
अरुणचूर सी बाँग.
बीना बात मत तोड़ना,
रे! कूकुर ली टाँग.
.
सभ्य जानवर को करें,
मनुज जंगली तंग.
खून निबल का चूसते,
सबल महा मति मंद.
.
देख-परख कवि सत्य कह,
बन कबीर-रैदास.
मिटा न पाए, न्यून कर
पीडित का संत्रास.
.
श्वान भौंकता, जगाता,
बिना स्वार्थ लख चोर.
तू तो कवि है, मौन क्यों?
लिख-गा उषा अँजोर.
३-१२-२०१७
***
गीत
*
आकर भी तुम आ न सके हो
पाकर भी हम पा न सके हैं
जाकर भी तुम जा न सके हो
करें न शिकवा, हो न शिकायत
*
यही समय की बलिहारी है
घटनाओं की अय्यारी है
हिल-मिलकर हिल-मिल न सके तो
किसे दोष दे, करें बगावत
*
अपने-सपने आते-जाते
नपने खपने साथ निभाते
तपने की बारी आई तो
साये भी कर रहे अदावत
*
जो जैसा है स्वीकारो मन
गीत-छंद नव आकारो मन
लेना-देना रहे बराबर
इतनी ही है मात्र सलाहत
*
हर पल, हर विचार का स्वागत
भुज भेंटो जो दर पर आगत
जो न मिला उसका रोना क्यों?
कुछ पाया है यही गनीमत
३-१२-२०१६
***
स्वागत गीत:
नवगीत महोत्सव २०१४
*
शुभ नवगीत महोत्सव, आओ!
शब्दब्रम्ह-हरि आराधन हो
सत-शिव-सुंदर का वाचन हो
कालिंदी-गोमती मिलाओ
नेह नर्मदा नवल बहाओ
'मावस को पूर्णिमा बनाओ
शब्दचित्र-अंकन-गायन हो
सत-चित-आनंद पारायण हो
निर्मल व्योम ओम मुस्काओ
पंकज रमण विवेक जगाओ
संजीवित अवनीश सजाओ
रस, लय, भाव, कथ्य शुचि स्वागत
पवन रवीन्द्र आस्तिक आगत
श्रुति सौरभ पंकज बिखराओ
हो श्रीकांत निनाद गुँजाओ
रोहित ब्रज- ब्रजेश दिखलाओ
भाषा में कुछ टटकापन हो
रंगों में कुछ चटकापन हो
सीमा अमित सुवर्णा शोभित
सिंह धनंजय वीनस रोहित
हो प्रवीण मन-राम रमाओ
लख नऊ दृष्टि हुई पौबारा
लखनऊ में गूँजे जयकारा
वाग्नेर-संध्या हर्षाओ
हँस वृजेन्द्र सौम्या नभ-छाओ
रसादित्य जगदीश बसाओ
नऊ = नौ = नव
१०-११-२०१४
- १२६/७ आयकर कॉलोनी
विनायकपुर, कानपुर
समयाभाव के कारण पढ़ा नहीं गया
***
***
मुक्तक:
दे रहे हो तो सारे गम दे दो
चाह इतनी है आँखें नम दे दो
होंठ हँसते रहें हमेशा ही
लो उजाले, दो मुझे तम दे दो
*
(पूज्य मौसाजी श्री प्रमोद सक्सेना तथा मौसीजी श्रीमती कमलेश सक्सेना के प्रति)
शीश धर पैर में मैं नमन कर सकूँ
पीर मुझको मिले, शूल मुझको मिलें
धूल चरणों की मैं माथ पर धर सकूँ
ऐसी किस्मत नहीं, भाग्य ऐसा नहीं
रह सकूँ साथ में आपके मैं सदा-
दूर हूँ पर न दिल से कभी दूर हूँ
प्रार्थना देव से पीर कुछ हर सकूँ
३-१२-२०१५
***
गीत:
चलो चलें
*
चलो चलें अब और कहीं
हम चलो चलें.....
*
शहरी कोलाहल में दम घुटता हरदम.
जंगल कांक्रीट का लहराता परचम..
अगल-बगलवाले भी यहाँ अजनबी हैं-
घुटती रहती साँस न आता दम में दम..
ढाई इंच मुस्कान तजें,
क्यों और छलें?....
*
रहें, बाँहें, चाहें दूर न रह पायें.
मिटा दूरियाँ अधर-अधर से मिल गायें..
गाल गुलाबी, नयन शराबी मन मोहें-
मन कान्हा, तन गोपी रास रचा पायें..
आँखों में सतरंगी सपने,
पल न ढलें.....
*
चल मेले में चाट खाएँ, चटखारे लें,
पेंग भरें झूला चढ़ आसमान छू लें..
पनघट की पगडंडी पर खलिहान चले-
अमराई में शुक-मैना सब जग भूलें..
मिलन न आये रास जिन्हें
वे 'सलिल' जलें.....
४-१२-२०१०
***

रविवार, 3 दिसंबर 2023

नवगीत, सुमनलता श्रीवास्तव, शुभगति, छवि, गंग, सॉनेट, दोहा, रोला, कुंडलिया

सॉनेट 
मन-वीणा पर चोट लगी जब, तब झंकार हुई,
खून जरा सा सबने देखा सिसक रहा दिल मौन?
आँसू बहा न व्यर्थ, पीर कब बाँट सका है कौन?
रिश्तों की तुरपाई करते अँगुली चुभी सुई। 
अपनों के बेगानेपन की पीड़ा असह्य मुई,
बेगानों का अपनापन जैसे थाली में नौन,
करें पूर्णता का दावा नित पौआ-अद्धा-पौन,
मधु गगरी फोड़ी साकी ने कहकर 'आप चुई'। 
अहं-भवन में नहीं दरीचा, नहीं देहरी-द्वार, 
नींव भरम; छत वहम; मोह दीवारें रखतीं घेर,
छप्पर क्रोध; वासना तम सच सूरज रखते दूर। 
स्वार्थ कहे- 'मैं साथी तेरा; रह बाँहों में यार!    
संयम दिनकर दिन कर बोले- 'नहीं हुई है देर,
आँख खोल ले, आँख मूँदकर मत बन नाहक सूर। 
३.१२.२०२३ 
***
नवगीत
छंद लुगाई है गरीब की
*
छंद लुगाई है गरीब की
गाँव भरे की है भौजाई
जिसका जब मन चाहे छेड़े
ताने मारे, आँख तरेरे
लय; गति-यति की समझ न लेकिन
कहे सात ले ले अब फेरे
कैसे अपनी जान बचाए?
जान पडी सांसत में भाई
छंद लुगाई है गरीब की
गाँव भरे की है भौजाई
कलम पकड़ कल लिखना सीखा
मठाधीश बन आज अकड़ते
ताल ठोंकते मुख पोथी पर
जो दिख जाए; उससे भिड़ते
छंद बिलखते हैं अनाथ से
कैसे अपनी जान बचाये
इधर कूप उस ओर है खाई
छंद लुगाई है गरीब की
गाँव भरे की है भौजाई
यह नवगीती पत्थर मारे
वह तेवरिया लट्ठ भाँजता
सजल अजल बन चीर हर रही
तुक्कड़ निज मरजाद लाँघता
जाँघ दिखाता कुटिल समीक्षक
बचना चाहे मति बौराई
छंद लुगाई है गरीब की
गाँव भरे की है भौजाई
३-१२-२०१९
***
मुक्तक सलिला
*
प्रात मात शारदा सुरों से मुझे धन्य कर।
शीश पर विलंब बिन धरो अनन्य दिव्य कर।।
विरंचि से कहें न चित्रगुप्त गुप्त चित्र हो।
नर्मदा का दर्श हो, विमल सलिल सबल मकर।।
*
मलिन बुद्धि अब अमल विमल हो श्री राधे।
नर-नारी सद्भाव प्रबल हो श्री राधे।।
अपराधी मन शांत निबल हो श्री राधे।
सज्जन उन्नत शांत अचल हो श्री राधे।।
*
जागिए मत हे प्रदूषण, शुद्ध रहने दें हवा।
शांत रहिए शोरगुल, हो मौन बहने दें हवा।।
मत जगें अपराधकर्ता, कुंभकर्णी नींद लें-
जी सके सज्जन चिकित्सक या वकीलों के बिना।।
*
विश्व में दिव्यांग जो उनके सहायक हों सदा।
एक दिन देकर नहीं बनिए विधायक, तज अदा।
सहज बढ़ने दें हमें, चढ़ सकेंगे हम सीढ़ियाँ-
पा सकेंगे लक्ष्य चाहे भाग्य में हो ना बदा।।
२-१२-२०१९
***
कार्यशाला
मुक्तिका
दिल लगाना सीखना है आपसे
२१२२ २१२२ २१२
*
दिल लगाना सीखना है आपसे
जी चुराना सीखना है आपसे
*
वायदे को आप जुमला कह गए
आ, न आना सीखना है आपसे
*
आस मन में जगी लेकिन बैंक से
नोट लाना सीखना है आपसे
*
बस गए मन में निकलते ही नहीं
हक जमाना सीखना है आपसे
*
देशसेवा कर रहे हम भी मगर
वोट पाना सीखना है आपसे
*
सिखाने के नाम पर ले सीख खुद
गुरु बनाना सीखना है आपसे
*
ध्यान कर, कुछ ध्यान ही करना नहीं
ध्येय ध्याना सीखना है आपसे
*
मूँद नैना, दिखा ठेंगा हँस रहे
मुँह बनाना सीखना है आपसे
*
आह भरते देख, भरना आह फिर
आजमाना सीखना है आपसे
४.१२.२०१६
***
एक गीत
बातें हों अब खरी-खरी
*
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
जो न बात से बात मानता
लातें तबियत करें हरी
*
पाक करे नापाक हरकतें
बार-बार मत चेताओ
दहशतगर्दों को घर में घुस
मार-मार अब दफनाओ
लंका से आतंक मिटाया
राघव ने यह याद रहे
काश्मीर को बचा-मिलाया
भारत में, इतिहास कहे
बांगला देश बनाया हमने
मत भूले रावलपिडी
कीलर-सेखों की बहादुरी
देख सरहदें थीं सिहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
*
करगिल से पिटकर भागे थे
भूल गए क्या लतखोरों?
सेंध लगा छिपकर घुसते हो
क्यों न लजाते हो चोरों?
पाले साँप, डँस रहे तुझको
आजा शरण बचा लेंगे
ज़हर उतार अजदहे से भी
तेरी कसम बचा लेंगे
है भारत का अंग एक तू
दुहराएगा फिर इतिहास
फिर बलूच-पख्तून बिरादर
के होंठों पर होगा हास
'जिए सिंध' के नारे खोदें
कब्र दुश्मनी की गहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
*
२१-९-२०१६
***
छंद सप्तक १.
*
शुभगति
कुछ तो कहो
चुप मत रहो
करवट बदल-
दुःख मत सहो
*
छवि
बन मनु महान
कर नित्य दान
तू हो न हीन-
निज यश बखान
*
गंग
मत भूल जाना
वादा निभाना
सीकर बहाना
गंगा नहाना
*
दोहा:
उषा गाल पर मल रहा, सूर्य विहँस सिंदूर।
कहे न तुझसे अधिक है, सुंदर कोई हूर।।
*
सोरठा
सलिल-धार में खूब,नृत्य करें रवि-रश्मियाँ।
जा प्राची में डूब, रवि ईर्ष्या से जल मरा।।
*
रोला
संसद में कानून, बना तोड़े खुद नेता।
पालन करे न आप, सीख औरों को देता।।
पाँच साल के बाद, माँगने मत जब आया।
आश्वासन दे दिया, न मत दे उसे छकाया।।
*
कुण्डलिया
बरसाने में श्याम ने, खूब जमाया रंग।
मैया चुप मुस्का रही, गोप-गोपियाँ तंग।।
गोप-गोपियाँ तंग, नहीं नटखट जब आता।
माखन-मिसरी नहीं, किसी को किंचित भाता।।
राधा पूछे "मजा, मिले क्या तरसाने में?"
उत्तर "तूने मजा, लिया था बरसाने में??"
*
३.१२.२०१८
***
नवगीत
सड़क पर
.
फ़िर सड़क पर
भीड़ ने दंगे किए
.
आ गए पग
भटकते-थकते यहाँ
छा गए पग
अटकते-चलते यहाँ
जाति, मजहब,
दल, प्रदर्शन, सभाएँ,
सियासी नेता
ललच नंगे हुए
.
सो रहे कुछ
थके सपने मौन हो
पूछ्ते खुद
खुदी से, तुम कौन हो?
गएरौंदते जो,
कहो क्यों चंगे हुए?
.
ज़िन्दगी भागी
सड़क पर जा रही
आरियाँ ले
हाँफ़ती, पछ्ता रही
तरु न बाकी
खत्म हैं आशा कुंए
.
झूमती-गा
सड़क पर बारात जो
रोक ट्रेफ़िक
कर रही आघात वो
माँग कन्यादान
भिखमंगे हुए
.
नेकियों को
बदी नेइज्जत करे
भेडि.यों से
शेरनी काहे डरे?
सूर देखें
चक्षु ही अंधे हुए
३-१२-२०१७
***
नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
.
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
.
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
२-१२-२०१७
***
मुक्तक
*
क्या लिखूँ? कैसे लिखूँ? मैं व्यस्त हूँ
कहूँ क्यों जग से नहीं सन्यस्त हूँ
ज़माने से भय नहीं मुझको तनिक
आपके ही विरह से संत्रस्त हूँ
३-१२-२०१६
***
कृति चर्चा:
जिजीविषा : पठनीय कहानी संग्रह
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: जिजीविषा, कहानी संग्रह, डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव, द्वितीय संस्करण वर्ष २०१५, पृष्ठ ८०, १५०/-, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक जेकट्युक्त, बहुरंगी, प्रकाशक त्रिवेणी परिषद् जबलपुर, कृतिकार संपर्क- १०७ इन्द्रपुरी, ग्वारीघाट मार्ग जबलपुर।]
*
हिंदी भाषा और साहित्य से आम जन की बढ़ती दूरी के इस काल में किसी कृति के २ संस्करण २ वर्ष में प्रकाशित हो तो उसकी अंतर्वस्तु की पठनीयता और उपादेयता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है। यह तथ्य अधिक सुखकर अनुभूति देता है जब यह विदित हो कि यह कृतिकार ने प्रथम प्रयास में ही यह लोकप्रियता अर्जित की है। जिजीविषा कहानी संग्रह में १२ कहानियाँ सम्मिलित हैं।
सुमन जी की ये कहानियाँ अतीत के संस्मरणों से उपजी हैं। अधिकांश कहानियों के पात्र और घटनाक्रम उनके अपने जीवन में कहीं न कहीं उपस्थित या घटित हुए हैं। हिंदी कहानी विधा के विकास क्रम में आधुनिक कहानी जहाँ खड़ी है ये कहानियाँ उससे कुछ भिन्न हैं। ये कहानियाँ वास्तविक पात्रों और घटनाओं के ताने-बाने से निर्मित होने के कारण जीवन के रंगों और सुगन्धों से सराबोर हैं। इनका कथाकार कहीं दूर से घटनाओं को देख-परख-निरख कर उनपर प्रकाश नहीं डालता अपितु स्वयं इनका अभिन्न अंग होकर पाठक को इनका साक्षी होने का अवसर देता है। भले ही समस्त और हर एक घटनाएँ उसके अपने जीवन में न घटी हुई हो किन्तु उसके अपने परिवेश में कहीं न कहीं, किसी न किसी के साथ घटी हैं उन पर पठनीयता, रोचकता, कल्पनाशक्ति और शैली का मुलम्मा चढ़ जाने के बाद भी उनकी यथार्थता या प्रामाणिकता भंग नहीं होती ।
जिजीविषा शीर्षक को सार्थक करती इन कहानियों में जीवन के विविध रंग, पात्रों - घटनाओं के माध्यम से सामने आना स्वाभविक है, विशेष यह है कि कहीं भी आस्था पर अनास्था की जय नहीं होती, पूरी तरह जमीनी होने के बाद भी ये कहानियाँ अशुभ पर चुभ के वर्चस्व को स्थापित करती हैं। डॉ. नीलांजना पाठक ने ठीक ही कहा है- 'इन कहानियों में स्थितियों के जो नाटकीय विन्यास और मोड़ हैं वे पढ़नेवालों को इन जीवंत अनुभावोब में भागीदार बनाने की क्षमता लिये हैं। ये कथाएँ दिलो-दिमाग में एक हलचल पैदा करती हैं, नसीहत देती हैं, तमीज सिखाती हैं, सोई चेतना को जाग्रत करती हैं तथा विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।'
जिजीविषा की लगभग सभी कहानियाँ नारी चरित्रों तथा नारी समस्याओं पर केन्द्रित हैं तथापि इनमें कहीं भी दिशाहीन नारी विमर्ष, नारी-पुरुष पार्थक्य, पुरुषों पर अतिरेकी दोषारोपण अथवा परिवारों को क्षति पहुँचाती नारी स्वातंत्र्य की झलक नहीं है। कहानीकार की रचनात्मक सोच स्त्री चरित्रों के माध्यम से उनकी समस्याओं, बाधाओं, संकोचों, कमियों, खूबियों, जीवत तथा सहनशीलता से युक्त ऐसे चरित्रों को गढ़ती है जो पाठकों के लिए पथ प्रदर्शक हो सकते हैं। असहिष्णुता का ढोल पीटते इस समय में सहिष्णुता की सुगन्धित अगरु बत्तियाँ जलाता यह संग्रह नारी को बला और अबला की छवि से मुक्त कर सबल और सुबला के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
'पुनर्नवा' की कादम्बिनी और नव्या, 'स्वयंसिद्धा' की निरमला, 'ऊष्मा अपनत्व की' की अदिति और कल्याणी ऐसे चरित्र है जो बाधाओं को जय करने के साथ स्वमूल्यांकन और स्वसुधार के सोपानों से स्वसिद्धि के लक्ष्य को वरे बिना रुकते नहीं। 'कक्का जू' का मानस उदात्त जीवन-मूल्यों को ध्वस्त कर उन पर स्वस्वार्थों का ताश-महल खड़ी करती आत्मकेंद्रित नयी पीढ़ी की बानगी पेश करता है। अधम चाकरी भीख निदान की कहावत को सत्य सिद्ध करती 'खामियाज़ा' कहानी में स्त्रियों में नवचेतना जगाती संगीता के प्रयासों का दुष्परिणाम उसके पति के अकारण स्थानान्तारण के रूप में सामने आता है। 'बीरबहूटी' जीव-जंतुओं को ग्रास बनाती मानव की अमानवीयता पर केन्द्रित कहानी है। 'या अल्लाह' पुत्र की चाह में नारियों पर होते जुल्मो-सितम का ऐसा बयान है जिसमें नायिका नुजहत की पीड़ा पाठक का अपना दर्द बन जाता है। 'प्रीती पुरातन लखइ न कोई' के वृद्ध दम्पत्ति का देहातीत अनुराग दैहिक संबंधों को कपड़ों की तरह ओढ़ते-बिछाते युवाओं के लिए भले ही कपोल कल्पना हो किन्तु भारतीय संस्कृति के सनातन जवान मूल्यों से यत्किंचित परिचित पाठक इसमें अपने लिये एक लक्ष्य पा सकता है।
संग्रह की शीर्षक कथा 'जिजीविषा' कैंसरग्रस्त सुधाजी की निराशा के आशा में बदलने की कहानी है। कहूँ क्या आस निरास भई के सर्वथा विपरीत यह कहानी मौत के मुंह में जिंदगी के गीत गाने का आव्हान करती है। अतीत की विरासत किस तरह संबल देती है, यह इस कहानी के माध्यम से जाना जा सकता है, आवश्यकता द्रितिकों बदलने की है। भूमिका लेख में डॉ. इला घोष ने कथाकार की सबसे बड़ी सफलता उस परिवेश की सृष्टि करने को मन है जहाँ से ये कथाएँ ली गयी हैं। मेरा नम्र मत है कि परिवेश निस्संदेह कथाओं की पृष्ठभूमि को निस्संदेह जीवंत करता है किन्तु परिवेश की जीवन्तता कथाकार का साध्य नहीं साधन मात्र होती है। कथाकार का लक्ष्य तो परिवेश, घटनाओं और पात्रों के समन्वय से विसंगतियों को इंगित कर सुसंगतियों के स्रुअज का सन्देश देना होता है और जिजीविषा की कहानियाँ इसमें समर्थ हैं।
सांस्कृतिक-शैक्षणिक वैभव संपन्न कायस्थ परिवार की पृष्ठभूमि ने सुमन जी को रस्मो-रिवाज में अन्तर्निहित जीवन मूल्यों की समझ, विशद शब्द भण्डार, परिमार्जित भाषा तथा अन्यत्र प्रचलित रीति-नीतियों को ग्रहण करने का औदार्य प्रदान किया है। इसलिए इन कथाओं में विविध भाषा-भाषियों,विविध धार्मिक आस्थाओं, विविध मान्यताओं तथा विविध जीवन शैलियों का समन्वय हो सका है। सुमन जी की कहन पद्यात्मक गद्य की तरह पाठक को बाँधे रख सकने में समर्थ है। किसी रचनाकार को प्रथम प्रयास में ही ऐसी परिपक्व कृति दे पाने के लिये साधुवाद न देना कृपणता होगी।
२-१२-२०१५
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सवाल-जवाब:
Radhey Shyam Bandhu 11:20 pm (11 घंटे पहले)
आचार्य संजीव वर्मा सलिल आप तो कुछ जरूरत से ज्यादा नाराज लग रहे हैं । आप के साथ तो मैंने एेसी गुस्ताखी नहीं की फिर आप अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग करके अपनी मर्यादा क्यों भंग कर रहे हैं ? अनजाने में कोई बात लग गयी हो तो क्षमा करें आगे आप का ध्यान रखेंगे ।
राधेश्याम बन्धु
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आदरणीय बंधु जी!
नमन.
साहित्य सृजन में व्यक्तिगत राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं होता। मैंने एक विद्यार्थी और रचनाकार के नाते मर्यादाओं का आज तक पालन ही किया है । ऐसे रचनाकार जो खुद मानते हैं कि उन्होंने कभी नवगीत नहीं लिखा, उन्हें सशक्त नवगीतकार बताकर और जो कई वर्षों से सैंकड़ों नवगीत रच चुके हैं उन्हें छोड़कर मर्यादा भंग कौन कर रहा है? इस अनाचार का शिकार लगभग ५० नवगीतकार हुए हैं। गुण-दोष विवेचन समीक्षक का अधिकार है पर उन सबके संकलनों को शून्य नहीं माना जा सकता । राजधानी की चमक-दमक में जिन्हें महिमामंडित किया गया वे भी मेरे अच्छे मित्र हैं किन्तु सृजन का मूल्यांकन व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अतीतजीवी मठाधीशों की मायानगरी में आपसे यह आशा की थी कि आप निष्पक्ष होंगे किन्तु निराशा ही हाथ लगी। लखनऊ में जब नवोदितों के रचनाकर्म पर आक्षेप किये जा रहे थे, उनके सृजन को बेमानी बताया जा रहा है तब भी आप उनके समर्थन में नहीं थे।
वह आयोजन नवगीत के लिये था, किसी कृति विशेष या व्यक्ति विशेष पर चर्चा के लिये नहीं। वहाँ प्रतिवर्षानुसार पूर्वघोषित सभी कार्यवाही यथासमय सुचारू रूप से सम्पादित की गयी। आपका अपनी पुस्तक पर चर्चा करने का विचार था तो आप कहते, आपने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। कहा होता तो एक अतिरिक्त सत्र की व्यवस्था कर दी जाती। मेरे कक्ष में दोनों रात देर तक अघोषित चर्चा सत्र चले रहे और नये नवगीतकार अपनी शंकाओं और जिज्ञासाओं के उत्तर मुझसे, डॉ. रणजीत पटेल और श्री रामकिशोर दाहिया से प्राप्त करते रहे। पुस्तकों के अवलोकन और अध्ययन का कार्य भी निरंतर चला। आपने चाहा होता तो आपकी कृतियों पर भी चर्चा हो सकती थी। लखनऊ के कई सशक्त और प्रतिष्ठित नवगीतकारों को आपकी पुस्तक पर बहुत कुछ कहना था किन्तु आपको असुविधा से बचाने के लिये उन्हें मना किया गया था और उनहोंने खुद पर संयम बनाये रखते हुए निर्धारित विषयों की मर्यादा का ध्यान रखा।
आपको आयोजन में सर्वाधिक सम्मान और बोलने के अवसर दिये गये। प्रथम सत्र में शेष वक्ताओं ने एक नये नवगीतकार को मार्दर्शन दिया आपको २ नवगीतकारों के सन्दर्भ में अवसर दिया गया। आपने उनके प्रस्तुत नवगीतों पर कम और अपनी पुस्तक पर अधिक बोला।
द्वितीय सत्र में आपको नवगीत वाचन का अवसर दिया गया जबकि पूर्णिमा जी, व्योम जी तथा मुझ समेत कई नवगीतकार जो आयोजन के अभिन्न अंग हैं, उन्होंने खुद नवगीत प्रस्तुत नहीं किये।
तृतीय सत्र सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा चतुर्थ सत्र शोधपत्र वाचन के लिये था। यहाँ भी पूर्वघोषित के अलावा किसी ने शोध पत्र प्रस्तुत नहीं किये जबकि मेरा शोधपत्र तैयार था। जो पहली बार शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे थे उन्हें प्रोत्साहित किया गया ।
पंचम सत्र में नवगीत की कृतियों पर समीक्षाएं प्रस्तुत की गयीं।
षष्ठं सत्र में नवगीत के विविध पहलुओं पर सारगर्भित चर्चा हुई।
सप्तम सत्र में नवगीतकारों ने एक-एक नवगीत प्रस्तुत किया। किसी ने अधिक प्रस्तुति का मोह नहीं दिखाया। ऐसा आत्मानुशासन मैंने अन्यत्र नहीं देखा।
इन सभी सत्रों में आप किसी न किसी बहाने अपनी पुस्तक को केंद्र में रखकर बार-बार बोलते रहे। किसी भी आयोजन में आयोजन आवधि के पूर्व और पश्चात् प्रवास-भोजन व्यवस्था आयोजक नहीं करते, जबकि लखनऊ में यह आने से जाने के समय तक उपलब्ध कराई गयी। सबसे अधिक समय तक उस सुविधा को लेने वाले आप ही थे । इसके बाद भी अवसर न दिये जाने का आक्षेप लगाना आपको शोभा देता है क्या? श्री रामकिशोर दाहिया ने इसीलिये 'जिस पत्तल में खाया उसी में छेद किया' की बात कही।
रहा मेरा ध्यान रखने की बात तो आप कृपया, मुझ पर ऐसी अहैतुकी कृपा न करें। मैं अपने सृजन से संतुष्ट हूँ, मुझे माँ शारदा के अलावा अन्य किसी की कृपा नहीं चाहिए।
आप पुस्तक मेले में समय लेकर ''श्री राधेश्याम 'बन्धु' की समीक्षात्मक कृतियाँ - एक मूल्यांकन'' परिसंवाद का आयोजन करा लें। मैं पूर्णत: सहयोग करूँगा और आपकी पुस्तक पढ़ चुके साथियों से पहुँचकर विविध आयामों पर चर्चा करने अथवा आलेख भेजने हेतु अनुरोध करूंगा।
विश्वास रखें आप या अन्य किसी के प्रति मेरे मन में अनादर नहीं है। हम सब सरस्वतीपुत्र हैं। छिद्रान्वेषण और असहिष्णुता हमारे लिए त्याज्य है। मतभेदों को मनभेद न मानें तथापि इस कठिन काल में स्वसाधनों से ऐसा गरिमामय आयोजन करनेवाले और उन्हें सहयोग देनेवाले दोनों सराहना और अभिनन्दन के पात्र हैं, आक्षेप के नहीं।
१-१२-२०१५
***
नवगीत -
*
आपन मूं
आपन तारीफें
करते सीताराम
*
जो औरों ने लिखा न भाया
जिसमें-तिसमें खोट बताया
खुद के खुदी प्रशंसक भारी
जब भी मौका मिला भुनाया
फोड़-फाड़
फिर जोड़-तोड़ कर
जपते हरि का नाम
*
खुद की खुद ही करें प्रशंसा
कहे और ने की अनुशंसा
गलत करें पर सही बतायें
निज किताब का तान तमंचा
नट-करतब
दिखलाते जब-तब
कहें सुबह को शाम
*
जिन्दा को स्वर्गीय बता दें
जिसका चाहें नाम हटा दें
काम न देखें किसका-कितना
सच को सचमुच धूल चटा दें
दूर रहो
मत बाँह गहो
दूरी से करो प्रणाम
*
आपन मूं
आपन तारीफें
करते सीताराम
२-१२-२०१५
***

दिसंबर कब? क्या?, अभियान सारिणी

दिसंबर कब? क्या?
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1 दिसंबर -विश्व एड्स दिवस (विश्व)
सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस (भारत)
स्वतंत्रता पुनर्स्थापन दिवस (पुर्तगाल)
लाल सेब खाओ दिवस (अमेरिका)
प्रथम राष्ट्रपति दिवस (कजाकिस्तान)
एकीकरण दिवस (रोमानिया)
राष्ट्रीय दिवस (म्यान्मार)
गणतंत्रता दिवस (केंद्रीय अफ्रिका गणराज्य)
स्वशासन दिवस (आइसलैंड)
शिक्षक दिवस (पनामा)
2 दिसंबर -अंतरराष्ट्रीय दास प्रथा उन्‍मूलन दिवस (विश्व)
राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस (भारत)
विश्व कंप्यूटर साक्षरता दिवस
3 दिसंबर - अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस (विश्व)
भोपाल गैस त्रासदी दिवस (भारत)
5 दिसंबर - अंतरराष्ट्रीय मृदा दिवस
4 दिसंबर - भारतीय नौसेना दिवस
7 दिसंबर - भारतीय सशस्त्र सेना झण्डा दिवस
10 दिसंबर - विश्व मानवाधिकार दिवस
11 दिसम्बर - यूनिसेफ दिवस
14 दिसंबर - राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस
18 दिसंबर - अल्पसंख्यक अधिकार दिवस
19 दिसंबर - गोवा मुक्ति दिवस
20 दिसंबर - अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस
22 दिसंबर - राष्ट्रीय गणित दिवस
23 दिसंबर - किसान दिवस
24 दिसंबर - राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस
25 दिसंबर - सुशासन दिवस
8-14 दिसंबर - अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह
जन्म 
1 दिसंबर - काका कालेलकर , राजा महेन्द्र प्रताप
3 दिसंबर - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद , रमाशंकर यादव 'विद्रोही'
4 दिसंबर - इन्द्र कुमार गुजराल , रामस्वामी वेंकटरमण
8 दिसंबर - बालकृष्ण शर्मा नवीन , बालाजी बाजीराव
9 दिसंबर - सोनिया गाँधी , आदित्य चौधरी
10 दिसंबर - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
11 दिसंबर - दिलीप कुमार , ओशो , प्रणब मुखर्जी
14 दिसंबर - संजय गाँधी , राज कपूर , उपेन्द्रनाथ अश्क
22 दिसंबर - गुरु गोबिन्द सिंह
22 दिसंबर - श्रीनिवास रामानुजन्
23 दिसंबर - चौधरी चरण सिंह
24 दिसंबर - मुहम्मद रफ़ी , बनारसीदास चतुर्वेदी
25 दिसंबर - मदनमोहन मालवीय , अटल बिहारी वाजपेयी , नौशाद
26 दिसंबर - ऊधम सिंह
27 दिसंबर - ग़ालिब
28 दिसंबर - रतन टाटा , धीरूभाई अंबानी
निधन 
3 दिसंबर - ध्यान चन्द
5 दिसंबर - अमृता शेरगिल , अरबिंदो घोष
8 दिसंबर - विपिन सिंह रावत
6 दिसंबर - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
10 दिसंबर - अशोक कुमार
11 दिसंबर - कवि प्रदीप , रवि शंकर
12 दिसंबर - रामानन्द सागर , मैथिलीशरण गुप्त
15 दिसंबर - सरदार बल्लभ भाई पटेल
19 दिसंबर - अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ , राम प्रसाद बिस्मिल
21 दिसंबर - महावीर प्रसाद द्विवेदी , तेजी बच्चन
23 दिसंबर - पी. वी. नरसिंह राव
28 दिसंबर - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी , सुमित्रानंदन पंत
30 दिसंबर - दुष्यंत कुमार , विक्रम साराभाई
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रविवार

वन्दना/चिंतन सत्र- समय- प्रातः ६ बजे से ८बजे तक (प्रथम सत्र)
विषय: वंदना, प्रार्थना, भजन- लिख, पढ़ या गाकर प्रस्तुत करें। 
चिंतन, सुभाषितम् , उक्तियाँ, सूक्तियाँ, लोकोक्तियाँ, मुहावरे आदि का स्वागत है। यथोचित अर्थ या संदर्भ दीजिए।  
सृजन सत्र - समय- प्रातः 8 बजे से शाम 6 बजे तक (द्वितीय सत्र)
विषय: कला एवं मन रंजन- गायन, वादन, नर्तन, रेखांकन, चित्रांकन आदि। पाकविधि, श्रृंगार विधि, उद्यानिकी- गृहवाटिका, बोनसाई निर्माण विधि आदि। 
लाइव प्रसारण: समय- पूर्वा.११:०० बजे से अप.१२.३० बजे (रविवार)
मध्यकालीन तृतीय सत्र- विषय : संत समागम
संचालिका: डॉ. संगीता भारद्वाज "मैत्री", भोपाल 
मुक्त सृजन सत्र- रात्रि ८ बजे से प्रात: ६ बजे तक (चतुर्थ सत्र)
मुक्त रचना काल
१.गद्य / पद्य में स्वलिखित रचना। 
२. पाठक प्रतिक्रिया।
टीप- कट-पेस्ट/कॉपी-पेस्ट वर्जित। चित्र, सूचनाएँ, लिंक आदि पटल प्रबंधक को भेजिए। वे उपयुक्त पाने पर पटल पर प्रस्तुत करेंगे, अनुपयुक्त होने पर निरस्त करेंगे। 
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लघुकथा की आत्म कथा

 लघुकथा की आत्म कथा 

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मैं लघुकथा हूँ। 

मेरे दो तत्व 'लघुता' और 'कथा' हैं। 

लघुता क्या है?

लघुता का अर्थ वामन में विराट होना है, बिंदु में सिंधु होना है, कंकर में शंकर होना है। तभी तो  कहा गया है - 

प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर। 

चीटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूर।।  

मेरी आकारिक लघुता में विराट कथा तत्व का समावेशन आवश्यक है। कथा की विराटता से आशय उसकी मर्म बेधकता से है। 

आकारिक लघुता के लिए शब्दों की उपयुक्तता, सटीकता सार्थकता और मितव्ययिता होना ही चाहिए। 

कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भावोद्रेक लघुकथा का वैशिष्ट्य है। 

भाव का उद्रेक मर्म को छूता है। मर्म बेधकता लघुकथा का दूसरा लक्षण है। 

मर्म-बेधन के लिए रसोद्रेक होना चाहिए। अब तक लघुकथा में अधिकांशत: विडंबना और विसंगति जनित करुण रस का प्राधान्य रहा है। यह एकांगीपन आधुनिक लघुकथा में नहीं होना चाहिए। रस जितना प्रगाढ़ होगा, लघुकथा उतना अधिक असर छोड़ेगी। लघुकथा रसलीन होकर रसनिधि और रसखान बन सके तो भुलाई नहीं जा सकेगी। 

रस की एक बूँद ही 'तरस' को 'सरस' में बदल देती है। नीरस लघुकथा बिना रस के गन्ने की तरह है जिसे नष्ट कर दिया जाता है। रस की अधिकता 'सरस' में 'सड़न' पैदा कर देती है। इसलिए लघुकथा में रस टोकरी भर गुलाब फूल से प्राप्त बूँद मात्र इत्र की तरह हो।   

कथा क्या है?

कथा वह जो कही जाए। 

क्या, क्यों, कैसे, किसके द्वारा, किसके लिए और कब कही जाए? 

इन प्रश्नों का उत्तर ही लघुकथा में कथा तत्व का निर्धारण कर सकता है। इन प्रश्नों का उत्तर लघुकथाकार को अपने भीतर ही खोजना होता है। हर लघुकथाकार के लिए इन प्रश्नों के उत्तर अन्यों से भिन्न होंगे। लघुकथाकार किसी अन्य के उत्तरों को आदर्श माँ लेगा तो उसकी लघुकथा किसी कारखाने में बने उत्पाद की तरह अमौलिक अर्थात नकल प्रतीत होगी। 

शेष फिर 

संजीव      


जीवन सलिला में घटना सूर्य को देख, विचार हथेली पर कलम की अँगुली से एक ठोकर मारें। फैलते प्रकाश को समेटे लघुकथा जीवन में प्रकाश बिखेरती है। सकारात्मक चिंतन परक लघुकथाएँ लिखिए, नकारात्मकता से बचिए।