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मंगलवार, 23 अगस्त 2022

घनाक्षरी,बाल गीत, पारुल,जनकछंदी गीत,कल्पना रामानी,'व्योम', चित्र अलंकार,नवगीत, जयमाल,

नवान्वेषित दण्डक छंद
यगणादित्य घनाक्षरी
*
विधान- बारह यगण
संकेत-यगण = १२२, आदित्य = १२।
*
कन्हैया! कन्हैया! पुकारें हमेशा, तुम्हें राधिका जी! गुहारें हमेशा, सभी गीत गाएँ तुम्हारे हमेशा।
नहीं कर्म भूलें, नहीं मर्म भूलें, लड़ें राक्षसों से नहीं धर्म भूलें, तुम्हीं को मनाएँ-बुलाएँ हमेशा।।
कहा था तुम्हीं ने 'उठो पार्थ प्यारे!, लड़ो कौरवों से नहीं हारना रे!, झुका या डरो ना बुराई से जूझो।
करो कर्म सारे, न सोचो मिले क्या?, मिला क्या?, गुमा क्या?, रहा क्या? हमेशा।।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
२३-८-२०१९
दोहा
*
हो प्रशांत मन सिंधु सा, गिरि सा दृढ़ संकल्प.
स्वप्न सदा शुभ देखना, जिसका नहीं विकल्प.
२३-८-२०१७
***
- स्मृति के वातायन से
हिन्दयुग्म
बाल गीत
पारुल
रुन-झुन करती आयी पारुल।
सब बच्चों को भायी पारुल।
बादल गरजे, तनिक न सहमी।
बरखा लख मुस्कायी पारुल।
चम-चम बिजली दूर गिरी तो,
उछल-कूद हर्षायी पारुल।
गिरी-उठी, पानी में भीगी।
सखियों सहित नहायी पारुल।
मैया ने जब डाँट दिया तो-
मचल-रूठ-गुस्सायी पारुल।
छप-छप खेले, ता-ता थैया।
मेंढक के संग धायी पारुल।
'सलिल' धार से भर-भर अंजुरी।
भिगा-भीग मस्तायी पारुल।
मंगलवार ७-७-२००९
अभिनव प्रयोग
जनकछंदी (त्रिपदिक) गीत
*
मेघ न बरसे राम रे!
जन-मन तरसे साँवरे!
कब आएँ घन श्याम रे!!
*
प्राण न ले ले घाम अब
झुलस रहा है चाम अब
जान बचाओ राम अब
.
मेघ हो गए बाँवरे
आए नगरी-गाँव रे!
कहीं न पाई ठाँव रे!!
*
गिरा दिया थक जल-कलश
स्वागत करते जन हरष
भीगे-डूबे भू-फ़रश
.
कहती उगती भोर रे
चल खेतों की ओर रे
संसद-मचे न शोर रे
*
काटे वन, हो भूस्खलन
मत कर प्रकृति का दमन
ले सुधार मानव चलन
.
सुने नहीं इंसान रे
भोगे दण्ड-विधान रे
कलपे कह 'भगवान रे!'
*
तोड़े मर्यादा मनुज
करे आचरण ज्यों दनुज
इससे अच्छे हैं वनज
.
लोभ-मोह के पाश रे
करते सत्यानाश रे
क्रुद्ध पवन-आकाश रे
*
तूफ़ां-बारिश-जल प्रलय
दोषी मानव का अनय
अकड़ नहीं, अपना विनय
.
अपने करम सुधार रे
लगा पौध-पतवार रे
कर धरती से प्यार रे
***
पुस्तक सलिला
"खेतों ने खत लिखा" गीतिकाव्य के नाम
*�
[पुस्तक विवरण- खेतों ने खत लिखा, गीत-नवगीत, कल्पना रामानी, वर्ष २०१६ ISBN ९७८-८१-७४०८-८६९-७, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, आकार डिमाई, पृष्ठ १०४, मूल्य २००/-, अयन प्रकाशन १/२० महरौली, नई दिल्ली ११००३०, लेखिका संपर्क ६०१/५ हेक्स ब्लॉक, सेक्टर १०, खारघर, नवी मुम्बई ४१०२१०, चलभाष ७४९८८४२०७२, ईमेल kalpanasramani@gmail.com]
*
गीत-नवगीत के मध्य भारत-पकिस्तान की तरह सरहद खींचने पर उतारू और एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के दुष्प्रयास में जुटे समीक्षक समूह की अनदेखी कर मौन भाव से सतत सृजन साधना में निमग्न रहकर अपनी रचनाओं के माध्यम से उत्तर देने में विश्वास रखनेवाली कल्पना रामानी का यह दूसरा गीत-नवगीत संग्रह आद्योपांत प्रकृति और पर्यावरण की व्यथा-कथा कहता है। आवरण पर अंकित धरती के तिमिर को चीरता-उजास बिखेरता आशा-सूर्य और झूमती हुई बालें आश्वस्त करती हैं कि नवगीत प्रकृति और प्रकृतिपुत्र के बीच संवाद स्थापितकर निराश में आशा का संचार कर सकने में समर्थ है। अपने नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' में सूर्य की विविध भाव-भंगिमाओं पर ८ तथा नए साल पर ६ रचनाएँ देने के बाद इस संकलन में सूर्य तथा नव वर्ष पर केंद्रित ३-३ रचनाएँ पाकर सुख हुआ। एक ही समय में समान अनुभूतियों से गुजरते दो रचनाकारों की भावसृष्टि में साम्य होते हुए भी अनुभति और अभिव्यक्ति में विविधता स्वाभाविक है। कल्पना जी ने 'शत-शत वंदन सूर्य तुम्हारा', 'सूरज संक्रांति क्रांति से' तथा 'भक्ति-भाव का सूर्य उगा' रचकर तिमिरांतक के प्रति आभार व्यक्त किया है। 'नव वर्ष आया', 'शुभारंभ है नए साल का' तथा 'नए साल की सुबह' में परिवर्तन की मांगल्यवाहकता तथा भविष्य के प्रति नवाशा का संकेत है।
सूरज की संक्रांति क्रांति से / जन-जन नीरज वदन हुआ
*
एक अंकुर प्रात फूटा / हर अँगन में प्रीत बनकर
नींद से बोला- 'उठो / नव वर्ष आया
कल्पना जी ने अपने प्रथम नवगीत संग्रह से अपने लेखन के प्रति आशा जगाई है।जंगल, हरियाली, बाग़-बगीचे, गुलमोहर, रातरानी, बेल, हरसिंगार, चंपा, बाँस, गुलकनेर, बसन्त, पंछी, कौआ, कोयल, सावन, फागुन, बरखा, मेघ, प्रात, दिन, सन्ध्या, धूप, शीत आदि के माध्यम से गीत-गीत में प्रकृति से साक्षात कराती यह कृति अधिक परिपक्व रचनाएँ समाहित किये है। मौसम के बदलते रंग जन-जीवन को प्रभावित करते हैं-
धड़क उठेंगी फिर से साँसें / ज्यों मौसम बदलेगा चोला
*
देखो उस टपरी में अम्मा / तन को तन से ताप रही है
आधी उधड़ी ओढ़ रजाई / खींच-खींचकर नाप रही है
जर्जर गात, कुहासा कथरी / वेध रहा बनकर हथगोला
*
'बेबस कमली' की व्यथा-कथा कल्पना जी की रचना सामर्थ्य की बानगी है। एक दिन बिना नहाये काम पर जाने का दंड उससे काम छुड़ाकर दिया जाता है-
रूठी किस्मत, टूटी हिम्मत / ध्वस्त हुए कमली के ख्वाब
काम गया क्या दे पायेगी / बच्चों को वो सही जवाब?
लातों से अब होगी खिदमत / मुआ मरद है क्रूर / कसाई
*
हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के कटघरों से मुक्त कल्पना जी कथ्य की आवश्यकतानुसार शब्दों का प्रयोग करती हैं।इन नवगीतों में जलावतन, वृंत, जर्जर, सन्निकट, वृद्धाश्रम, वसन, कन्दरा, आम्र, पीतवर्णी, स्पंदित, उद्घोष, मृदु, श्वेताभ जैसे तत्सम शब्द आखर, बतरस, बतियाते, चौरा, बिसरा, हुरियारों, पैंजन, ठेस, मारग, चौबारे, पुरवाई, अगवानी, सुमरन, जोगन आदि तद्भव शब्दों के साथ गलबहियाँ डाले हैं तो खत, ज़िंदा, हलक, नज़ारा, आशियां, कारवां, खौफ, रहगुजर, क़ातिल, फ़क़ीर, इनायत, रसूल, खुशबू आदि उर्दू शब्द कोर्ट, डी जे, पास, इंजीनियर, डॉक्टर जैसे अंग्रेजी शब्दों के साथ आँख मिचौली खेल रहे हैं।
कल्पना जी परंपरा का अनुसरण करने के साथ-साथ नव भाषिक प्रयोग कर पाठकों-श्रोताओं का अभिव्यक्ति सामर्थ्य बढ़ाती हैं। सरसों की धड़कन, ओस चाटकर सोई बगिया, लातों से अब होगी खिदमत, मुआ मरद है क्रूर कसाई, ख़ौफ़ ही बेख़ौफ़ होकर अब विचरता जंगलों में, अंजुरी अनन्त की, देव! छोड़ दो अब तो होना / पल में माशा पल में तोला, उनके घर का नमक न खाना, लहरें आँख दिखाएँ तो भी / आँख मिला उन पर पग धरना, 'पल में माशा, पल में तोला' जैसे मुहावरे, 'घड़ा देखकर प्यासा कौआ / चला चोंच में पत्थर लेकर' जैसी बाल कथाएँ, गुणा-भाग, कर्म-कलम, छान-छप्पर, लेख-जोखा, बिगड़ते-बनते, जोड़-तोड़, रूखी-सूखी, हल-बैल-बक्खर, काया-कल्प, उमड़-घुमड़, गिल्ली-डंडा, सुख-दुःख, सूखे-भीगे, चाक-चौबंद, झील-ताल, तिल-गुड़, शिकवे-गिले, दान-पुण्य आदि शब्द युग्म तथा दिनकर दीदे फाड़ रहा, सून सकोरा, सूखी खुरचन, जूते चित्र बनाते आये, जोग न ले अमराई, घने पेड़ का छायाघर, सूरज ने अरजी लौटाई, अमराई को अमिय पिलाओ, घिरे अचानक श्याम घन घने, खोल गाँठें गुत्थियों की, तिल-तिल बढ़ता दिन बंजारा, खेतों ने खत लिखा, पालकी बसन्त की, दिन बसन्ती ख्वाब पाले, रात आई रातरानी ख्वाब पाले, गीत कोकिला गाती रहना, बेला महके कहाँ उगाऊँ हरसिंगार, गुलकनेर यादों में छाया, हमें बुलाते बाग़-बगीचे, धान की फसल पुकारे, कभी न होना धूमिल चंदा जैसे सरस प्रयोग मन में चाशनी सी घोल देते हैं।
'खेतों ने खत लिखा सूर्य को', 'नज़रें नूर बदन नूरानी', 'सर्प सारे सर उठा, अर्ध्य अर्पित अर्चना का', 'कन्दरा से कोकिला का मौन बोला', आदि में अनुप्रास की मोहक छटा यत्र-तत्र दर्शनीय है। 'देखो उस टपरी में अम्मा / तन को तन से ताप रही है' में पुनरावृत्ति अलंकार, 'चाट गया जल जलता तापक', 'रात आई रातरानी' आदि में यमक अलंकार, 'कर्म कलम', 'दिन भट्टी' आदि में रूपक अलंकार हैं।
'एक मन्त्र दें वृक्षारोपण' कहते समय यह तथ्य अनदेखा हुआ है कि वृक्ष नहीं, पौधा रोपा जाता है। 'साथ चमकता पथ जब चलता' में तथ्य दोष है क्योंकि पथ नहीं पथिक चलता है। 'उगी पुनः नयी प्रभात' के स्थान पर 'उगा पुनः नया प्रभात' होना था। 'माँ होती हैं जाँ बच्चों की' के सन्दर्भ में स्मरणीय है कि किसी शब्द के अंत में 'न' आने पर एक मात्रा कम करने के लिए उसे पूर्व के दीर्घाक्षर में समाहित कर दीर्घाक्षर पर बिंदी लगाई जाती है। 'जान' के स्थान पर 'जां' होगा 'जाँ' नहीं।
हिंदी के आदि कवि अमीर खुसरो को प्रिय किंतु आजकल अल्प प्रचलित 'मुकरी' विधा की रचनाओं का नवगीत में होना असामान्य है। बेहतर होता कि समतुकांती मुकरियों का प्रयोग अंतरे के रूप में करते हुए कुछ नवगीत रचे जाते। ऐसा प्रयोग रोचक और विचारणीय होता।
नवगीत को लेकर कल्पना जी की संवेदनशीलता कुछ पंक्तियों में व्यक्त हुई है- 'दिनचर्या के गुणा-भाग से / रधिया ने नवगीत रचा', 'रच लो जीवन-गीत, कर्म की / कलम गहो हलधर', 'भाव, भाषा, छंद, रस-लय / साथ सब ये गीत माँगें', 'गीत सलोने बिखरे चारों ओर', 'गर्दिशों के भूलकर शिकवे-गिले / फिर उमंगों के / चलो नवगीत गायें'। नवगीत को सामाजिक विसंगतियों, विडंबनाओं, त्रासदियों और टकरावों से उपजे दर्द, पीड़ा और हताश का पर्याय मानने-बतानेवाले साम्यवादी चिन्तन से जुड़े समीक्षकों को नवगीत के सम्बन्ध में कल्पना जी की सोच से असहमति और उनके नवगीतों को स्वीकारने में संकोच हो सकता है किन्तु इन्हीं तत्वों से सराबोर नयी कविता को जनगण द्वारा ठुकराया जाना और इन्हीं प्रगतिवादियों द्वारा गीत के मरण की घोषणा के बाद भी गीत की लोकप्रियता बढ़ती जाना सिद्ध करता है नवगीत के कथ्य और कहन के सम्बन्ध में पुनर्विचार कर उसे उद्भव कालीं दमघोंटू और सामाजिक बिखरावजनित मान्यताओं से मुक्त कर उत्सवधर्मी नवाशा से संयुक्त किया जाना समय की माँग है। इस संग्रह के गीत-नवगीत यह करने में समर्थ हैं।
'बाँस की कुर्सी', 'पालकी बसन्त की', दिन बसन्ती ख्वाबवाले', 'मन जोगी मत बन', 'कलम गहो हलधर' आदि गीत इस संग्रह की उपलब्धि हैं। सारत:, कल्पना जी के ये गीत अपनी मधुरता, सरसता, सामयिकता, सरलता और पर्यावरणीय चेतना के लिए पसंद किये जाएंगे। इन गीतों में स्थान-स्थान पर सटीक बिम्ब और प्रतीक अन्तर्निहित हैं। 'सर्प सारे सिर उठा चढ़ते गए / दबती रहीं ये सीढ़ियाँ', 'एक अंकुर प्रात फूटा / हर अँगन में प्रीत बनकर', घने पेड़ के छाया घर में / आये आज शरण में इसकी / ज़ख़्मी जूते भर दुपहर में', दाहक रहे दिन भाटी बन / भून रहे बेख़ता प्राण-मन', 'बनी रहें इनायतें रसूल दानवन्त की / जमीं पे आई व्योम वेध पालकी बसन्त की', 'क्रूर मौसम के किले को तोड़कर फिर / लौट आये दिन बसन्ती ख्वाबवाले' जैसी अभिव्यक्तियाँ पाठक के साथ रह जाती हैं। कल्पना जी के मधुर गीत-नवगीत फिर-फिर पढ़ने की इच्छा शेष रह जाना और अतृप्ति की अनुभूति होना ही इस संग्रह की सफलता है।
***
पुस्तक सलिला
"रिश्ते बने रहें" पाठक से नवगीत के
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*�
[पुस्तक विवरण- रिश्ते बने रहें, गीत-नवगीत, योगेंद्र वर्मा 'व्योम', वर्ष २०१६ ISBN ९७८-९३-८०७५३-३१-७, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, आकार डिमाई, पृष्ठ १०४, मूल्य २००/-, गुंजन प्रकाशन सी १३० हिमगिरि कॉलोनी, कांठ रोड, मुरादाबाद २४४००१ गीतकार संपर्क- ए एल ४९ सचिन स्वीट्स क्व पीछे, दीनदयाल नगर प्रथम, कांठ रोड मुरादाबाद २४४००१ चलभाष ९४१२८०५९८१ ईमेल vyom70 @gmail.com]
*
समय के साथ सतत होते परिवर्तनों को सामयिक विसंगतियों और सामाजिक विडंबनाओं मात्र तक सीमित न रख, उत्सवधर्मिता और सहकारिता तक विस्तारित कर ईमानदार संवेदनशीलता सहित गति-यतिमय लयात्मत्कता से सुसज्ज कर नवगीत का रूप देनेवाले समर्थ नव हस्ताक्षरों में श्री योगेंद्र वर्मा 'व्योम' भी हैं। उनके लिए नवगीत रचना घर-आँगन की मिट्टी में उगनेवाले रिश्तों की मिठास को पल्लवित-पोषित करने की तरह है। व्योम जी कागज़ पर नवगीत नहीं लिखते, वे देश-काल को महसूसते हुए मन में उठ रहे विचारों साथ यात्राएँ कर अनुभूतियों को शब्दावरण पहना देते हैं और नवगीत हो जाता है।
कुछ यात्राएँ /बाहर हैं /कुछ मन के भीतर हैं
यात्राएँ तो / सब अनंत हैं / बस पड़ाव ही हैं
राह सुगम हो / पथरीली हो / बस तनाव ही हैं
किन्तु नयी आशाओंवाले / ताज़े अवसर हैं
गत सात दशकों से विसंगति और वैषम्यप्रधान विधा मानने की संकीर्ण सोच से हटकर व्योम जी के गीत मन के द्वार पर स्वप्न सजाते हैं, नई बहू के गृहप्रवेश पर बन्दनवार लगाते हैं, आँगन में सूख रही तुलसी की चिंता करते हैं, बच्चे को भविष्य के बारे में बताते हैं, तन के भीतर मन का गाँव बसाते हैं, पुरखों को याद कर ताज़गी अनुभव करते हैं, यही नहीं मोबाइल के युग में खत भी लिखते हैं।
मोबाइल से / बातें तो काफ़ी / हो जाती हैं
लेकिन शब्दों की / खुशबुएँ / कहाँ मिल पाती हैं?
थके-थके से / खट्टे-मीठे / बीते सत्र लिखूँ
कई दिनों से / सोच रहा हूँ , तुमको पत्र लिखूँ
निराशा और हताशा पर नवाशा को वरीयता देते ये नवगीत घुप्प अँधेरे में आशा- किरण जगाते हैं।
इस बच्चे को देखो / यह ही / नवयुग लाएगा
संबंधों में मौन / शिखर पर / बंद हुए संवाद
मौलिकता गुम हुई / कहीं, अब / हावी हैं अनुवाद
घुप्प अँधेरे में / आशा की / किरण जगाएगा
व्योम जी का कवि ज़िंदगी की धूप-छाँव, सुख-दुःख समभाव से देखता है। वे गली में पानी भरने से परेशान नहीं होते, उसका भी आनंद लेते हैं। उन्हें फिसलना-गिरना भी मन भाता है यूँ कहें कि उन्हें जीना आता है।
गली-मुहल्लों की / सड़कों पर / भरा हुआ पानी
चोक नालियों के / संग मिलकर / करता शैतानी
ऐसे में तो / वाहन भी / इतराकर चलते हैं...
... कभी फिसलना / कभी सँभलना / और कभी गिरना
पर कुछ को / अच्छा लगता है / बन जाना हिरना
उतार-चढ़ाव के बावज़ूद जीवन के प्रति यह सकारात्मक दृष्टि नवगीतों का वैशिष्ट्य है।व्योम जी का कवि अंधानुकरण में नहीं परिवर्तन हेतु प्रयासों में विश्वास करता है।
संबंधों सपनों / की सब /परिभाषाएँ बदलीं
तकनीकी युग में / सबकी / अभिलाषाएँ बदलीं
संस्कृति की मीनार / यहाँ पर / अनगिन बार ढही
विवेच्य संकलन के नवगीत विसंगतियों, त्रासदियों और विडंबनाओं की मिट्टी, खाद, पानी से परिवर्तन की उपज उगाते हैं। ये नवगीत काल्पनिक या अतिरेकी अभाव, दर्द, टकराव, शोषण, व्यथा, अश्रु और कराह के लिजलिजेपन से दूर रहकर शांत, सौम्य, मृदुभाषी हैं। वे हलाहल-पान कर अमृत लुटाने की विरासत के राजदूत हैं। उनके नवगीत गगनविहारी नहीं, धरती पर चलते-पलते, बोलते-मुस्काते हैं।
गीतों को / सशरीर बोलते-मुस्काते / देखा है मैंने / तुमने भी देखा?
साधक है वह / सिर्फ न कवि है / एक तपस्वी जैसी छवि है
शांत स्वभाव, / सौम्य मृदुभाषी / मुख पर प्रतिबिंबित ज्यों रवि है
सदा सादगी / संग ताज़गी को / गाते देखा है मैंने / तुमने भी देखा?
राजनैतिक स्वार्थ और वैयक्तिक अहं जनित सामाजिक टकरावों के होते हुए भी ये नवगीत स्नेह-सरसिज उगाने का दुस्साहस कर आर्तनादवादियों को चुनौती देते हैं।
इन विषमता के पलों में / स्वार्थ के इन मरुथलों में
नेह के सरसिज उगायें / हों सुगंधित सब दिशाएँ
भूमिका में श्री माहेश्वर तिवारी ठीक लिखते हैं कि इन नवगीतों की भाषा अपनी वस्तु-चेतना के अनुरूप सहज, सरल और बोधगम्य है। ये नवगीत बतियाहट से भरे हैं। मेरी दृष्टि में व्योम जी रचित ये नवगीत 'मुनिया ने / पीहर में / आना-जाना छोड़ दिया', ' दहशत है अजब सी / आज अपने गाँव में', 'अपठनीय हस्ताक्षर जैसे / कॉलोनी / के लोग', 'जीवन में हम / ग़ज़लों जैसा / होना भूल गए', 'उलझी / वर्ग पहेली जैसा / जीवन का हर पल', 'जीन्स-टॉप में / नई बहू ने / सबको चकित किया', 'संबंधों में मौन / शिखर पर / बंद हुए संवाद', 'गौरैया / अब नहीं दीखती / छतों-मुँडेरों पर', 'सुना आपने? / राजाजी दौरे पर आयेंगे / सुनहरे स्वप्न दिखायेंगे' जैसी विसंगतियों में जीने के बाद भी आम आदमी की आशा-विश्वास के साक्षी बने रह सके हैं। ये गीत नेता, पत्रकार, अधिकारी, मठाधीश या साहित्यकार नहीं माँ और पिता बने रह सके हैं। 'माँ का होना / मतलब दुनिया / भर का होना है' तथा 'याद पिता की / जगा रही है / सपनों में विश्वास'। नवगीत भली भाँति जानते, मानते और बताते हैं 'माँ को खोना / मतलब दुनिया / भर को खोना है' तथा 'जब तक पिता रहे / तब तक ही / घर में रही मिठास'।
अपनी थाती और विरासत के प्रति बढ़ते अविश्वास, सामाजिक टकराव राजनैतिक संकीर्णताओं के वर्तमान संक्रमण काल में व्योम जी के नवगीत सूर्य तरह प्रकाश और चंद्रमा की तरह उजास बिखरते रहें। उनके नवगीतों की आगामी मंजूषा से निकलने वाले नवगीत रत्नों की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
२३-८-२०१६
***
चित्र अलंकार :
हिंदी पिंगल ग्रंथों में चित्र अलंकार की चर्चा है जिसमें ध्वज, धनुष, पिरामिड आदि के शब्द चित्र की चर्चा। वर्तमान में इस अलंकार में लिखनेवाले अत्यल्प हैं। मेरा प्रयास ध्वज अलंकार :
भोर हुई
सूरज किरण
झाँक थपकती द्वार।
पुलकित सरगम गा रही
कलरव संग बयार।।
चलो
हम
ध्वज
फहरा
दें।
संग
जय
हिन्द
गुँजा
दें।
***
नवगीत:
*
मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
कलम नहीं
पेडों की रहती
कभी पेड़ के साथ.
झाड़ न लेकिन
झुके-झुकाता
रोकर अपना माथ.
आजीवन फल-
फूल लुटाता
कभी न रोके हाथ
गम न करे
न कभी भटकता
थामे प्याला-साकी
मानव! क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
तिनके चुन-चुन
नीड बनाते
लाकर चुग्गा-दाना।
जिन्हें खिलाते
वे उड़ जाते
पंछी तजें न गाना।
आह न भरते
नहीं जानते
दुःख कर अश्रु बहाना
दोष नहीं
विधना को देते,
जियें ज़िंदगी बाकी
मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
जैसा बोये
वैसा काटे
नादां मनुज अकेला
सुख दे, दुःख ले
जिया न जीवन
कह सम्बन्ध झमेला.
सीखा, नहीं सिखाया
पाया, नहीं
लुटाना जाना।
जोड़ा, काम न आया
आखिर छोड़ी
ताका-ताकी
मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
***
याद आ रही है फ़िल्मी गीतों की कुछ पंक्तियाँ जिनका केंद्रीय विषय है आँख या आँख के पर्यायवाची शब्द नैन, नज़र,निगाह आदि. अन्य पाठक इसमें योगदान करें, गैर फ़िल्मी पंक्तियाँ भी दे सकते हैं. रचनाकार का नाम या अन्य जानकारियों का भी स्वागत है.
*
आँख:
भूल सकता है भला कौन ये प्यारी आँखें
रंज में डूबी हुई नींद से भारी आँखें
.
मेरी हर साँस ने, हर आस ने चाहा है तुम्हें
जब से देखा है तुम्हें तब से सराहा है तुम्हें
बस है गयी हैं मेरी आँखों में तुम्हारी आँखें
.
तुम जो नज़रों को उठाओ तो सितारे झुक जाएँ
तुम जो पलकों को झुकाओ तो ज़माने झुक जाएँ
क्यों न बन जाएँ इन आँखों की पुजारी आँखें
.
जागती रात को सपनों का खज़ाना मिल जाए
तुम जो मिल जाओ तो जीने का बहन मिल जाए
अपनी किस्मत पे करें नाज़ हमारी आँखें
***
आँखों-आँखों में बात होने दो
मुझको अपनी बाँहों में सोने दो
*
जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें
राख के ढेर में शोला है, न चिंगारी है
*
उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता
जिस मुल्क की सरहद की निगहबान हैं आँखें
*
नैन:
सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन
मधुर तुम्हारे मिलन बिन दिन तरसेसे नहीं रैन
.
वो अम्बुआ का झूलना, वो पीपल छाँव
घूंघट में जब चाँद था, मेंहदी लगी थी पाँव
आज उजड़ कर रह गया, वो सपनों का गाँव
.
संग तुम्हारे दो घडी, बीत गए दो पल
जल भर कर मेरे नैन में, आज हुए ओझल
सुख लेकर दुःख दे गयीं दो अँखियाँ चंचल
***
हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए
तेरे नैनों की भूल-भुलैयाँ में बॉबी खो जाए
*
नज़र :
जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी याद में
नज़रों को हम बिछायेंगे
चाहे कहीं भी तुम रही, चाहेंगे तुमको उम्र भर
तुमको न भूल पाएंगे
२३-८-२०१५
***
विमर्श- अनावश्यक कुप्रथा: वरमाल या जयमाल???
*
आजकल विवाह के पूर्व वर-वधु बड़ा हार पहनाते हैं। क्यों? इस समय वर के मिटे हुल्लड़ कर उसे उठा लेते हैं ताकि वधु माला न पहना सके। प्रत्युत्तर में वधु पक्ष भी यही प्रक्रिया दोहराता है।
दुष्परिणाम:
वहाँ उपस्थित सज्जन विवाह के समर्थक होते हैं और विवाह की साक्षी देने पधारते हैं तो वे बाधा क्यों उपस्थित करते हैं? इस कुप्रथा के दुपरिणाम देखने में आये हैं, वर या वधु आपाधापी में गिरकर घायल हुए तो रंग में भंग हो गया और चिकित्सा की व्यवस्था करनी पडी। सारा कार्यक्रम गड़बड़ा गया. इस प्रसंग में वधु को उठाते समय उसकी साज-सज्जा और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो जाते हैं. कोई असामाजिक या दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति हो तो उसे छेड़-छाड़ का अवसर मिलता है. यह प्रक्रिया धार्मिक, सामाजिक या विधिक (कानूनी) किसी भी दृष्टि से अनिवार्य नहीं है.
औचित्य:
यदि जयमाल के तत्काल बाद वर-वधु में से किसी एक का निधन हो जाए या या किसी विवाद के कारण विवाह न हो सके तो क्या स्थिति होगी? सप्तपदी, सिंदूर दान या वचनों का आदान-प्रदान न हुआ तो क्या केवल माला को अदला-बदली को विवाह माना जाएगा?हिन्दू विवाह अधिनियम ऐसा नहीं मानता।ऐसी स्थिति में वधु को वर की पत्नी के अधिकार और कर्तव्य (चल-अचल संपत्ति पर अधिकार, अनुकम्पा नियुक्ति या पेंशन, वर का दूसरा विवाह हो तो उसकी संतान के पालन-पोषण का अधिकार) नहीं मिलते।सामाजिक रूप से भी उसे अविवाहित माना जाता है, विवाहित नहीं। धार्मिक दृष्टि से भी वरमाल को विवाह की पूर्ति अन्यथा बाद की प्रक्रियाओं का महत्त्व ही नहीं रहता।
कारण:
धर्म, समाज तथा विधि तीनों दृष्टियों से अनावश्यक इस प्रक्रिया का प्रचलन क्यों, कब और कैसे हुआ?
सर्वाधिक लोकप्रिय राम-सीता जयमाल प्रसंग का उल्लेख राम-सीता के जीवनकाल में रचित वाल्मीकि रामायण में नहीं है. रामचरित मानस में तुलसीदास प्रसंग का मनोहारी चित्रण किया है। तभी श्री राम के ३ भाइयों के विवाह सीता जी की ३ बहनों के साथ संपन्न हुए किन्तु उनकी जयमाल का वर्णन नही है।
श्री कृष्ण के काल में द्रौपदी स्वयंवर में ब्राम्हण वेषधारी अर्जुन ने मत्स्य वेध किया। जिसके बाद द्रौपदी ने उन्हें जयमाल पहनायी किन्तु वह ५ पांडवों की पत्नी हुईं अर्थात जयमाल न पहननेवाले अर्जुन के ४ भाई भी द्रौपदी के पति हुए। स्पष्ट है कि जयमाल और विवाह का कोई सम्बन्ध नहीं है। रुक्मिणी का श्रीकृष्ण ने और सुभद्रा का अर्जुन के पूर्व अपहरण कर लिया था। जायमाला कैसी होती?
ऐतिहासिक प्रसंगों में पृथ्वीराज चौहा और संयोगिता का प्रसंग उल्लेखनीय है। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद रिश्तेदार होते हुए भी एक दूसरे के शत्रु थे। जयचंद की पुत्री संयोगिता के स्वयंवर के समय पृथ्वीराज द्वारपाल का वेश बनाकर खड़े हो गये। संयोगिता जयमाल लेकर आयी तो आमंत्रित राजाओं को छोड़कर पृथ्वीराज के गले में माल पहना दी और पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को लेकर भाग गये। इस प्रसंग से बढ़ी शत्रुता ने जयचंद के हाथों गजनी के मो. गोरी को भारत आक्रमण के लिए प्रेरित कराया, पृथ्वीराज चौहान पराजितकर बंदी बनाये गये, देश गुलाम हुआ।
स्पष्ट है कि जब विवाहेच्छुक राजाओं में से कोई एक अन्य को हराकर अथवा निर्धारित शर्त पूरी कर वधु को जीतता था तभी जयमाल होता था अन्यथा नहीं।
मनमानी व्याख्या:
तुलसी ने राम को मर्यादपुषोत्तम मुग़लों द्वारा उत्साह जगाने के लिए कई प्रसंगों की रचना की। प्रवचन कारों ने प्रमाणिकता का विचार किये बिना उनकी चमत्कारपूर्ण सरस व्याख्याएँ चढ़ोत्री बढ़े। वरमाल तब भी विवाह का अनिवार्य अंग नहीं थी। तब भी केवल वधु ही वर को माला पहनाती थी, वर द्वारा वधु को माला नहीं पहनायी जाती थी। यह प्रचलन रामलीलाओं से प्रारम्भ हुआ। वहां भी सीता की वरमाला को स्वीकारने के लिये उनसे लम्बे राम अपना मस्तक शालीनता के साथ नीचे करते हैं। कोई उन्हें ऊपर नहीं उठाता, न ही वे सर ऊँचा रखकर सीता को उचकाने के लिए विवश करते हैं।
कुप्रथा बंद हो:
जयमाला वधु द्वारा वर डाली जाने के कारण वरमाला कही जाने लगी। रामलीलाओं में जान-मन-रंजन के लिये और सीता को जगजननी बताने के लिये उनके गले में राम द्वारा माला पहनवा दी गयी किन्तु यह धार्मिक रीति न थी, न है। आज के प्रसंग में विचार करें तो विवाह अत्यधिक अपव्ययी और दिखावे के आयोजन हो गए हैं। दोनों पक्ष वर्षों की बचत खर्च कर अथवा क़र्ज़ लेकर यह तड़क-भड़क करते हैं। हार भी कई सौ से कई हजार रुपयों के आते हैं। मंच, उजाला, ध्वनिविस्तारक सैकड़ों कुसियों और शामियाना तथा सैकड़ों चित्र खींचना, वीडियो बनाना आदि पर बड़ी राशि खर्चकर एक माला पहनाई जाना हास्यास्पद नहीं तो और क्या है?
इस कुप्रथा का दूसरा पहलू यह है की लाघग सभी स्थानीयजन तुरंत बाद भोजन कर चले जाते हैं जिससे वे न तो विवाह सम्बन्ध के साक्षी बन पते हैं, न वर-वधु को आशीष दे हैं, न व्धु को मिला स्त्रीधन पाते हैं। उन्हें के २ कारण विवाह का साक्षी बनना तथा विवाह पश्चात नव दम्पति को आशीष देना ही होते हैं। जयमाला के तुरंत बाद चलेजाने पर ये उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाते। अतः, विवेकशीलता की मांग है की जयमाला की कुप्रथा का त्याग किया जाए। नारी समानता के पक्षधर वर द्वारा वधु को जीतने के चिन्ह रूप में जयमाला को कैसे स्वीकार सकते हैं? इसी कारण विवाह पश्चात वार वधु से समानता का व्यवहार न कर उसे अपनी अर्धांगिनी नहीं अनुगामिनी और आज्ञानुवर्ती मानता है। यह प्रथा नारी समानता और नारी सम्मान के विपरीत और अपव्यय है। इसे तत्काल बंद किया जाना उचित होगा।
२३-८-२०१४
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सामयिक व्यंग्य कविता:
दवा और दाम
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देव! कभी बीमार न करना...
*
यह दुनिया है विकट पहेली.
बाधाओं की साँस सहेली.
रहती है गंभीर अधिकतर-
कभी-कभी करती अठखेली.
मुश्किल बहुत ज़िंदगी लेकिन-
सहज हुआ जीते जी मरना...
*
मर्ज़ दिए तो दवा बनाई.
माना भेजे डॉक्टर भाई.
यह भी तो मानो हे मौला!
रूपया आज हो गया पाई.
थैले में रुपये ले जाएँ-
दवा पड़े जेबों में भरना...
*
तगड़ी फीस कहाँ से लाऊँ?
कैसे मँहगे टेस्ट कराऊँ??
ओपरेशन फी जान निकले-
ब्रांडेड दवा नहीं खा पाऊँ.
रोग न हो परिवार में कोई-
सबको पड़े रोग से डरना...
२२-८-२०१२
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सोमवार, 22 अगस्त 2022

कृष्ण,अनिरुद्ध प्रसाद विमल,सोनिया वर्मा

 अलग-अलग नज़रिए से रू-ब-रू करवाता काव्य" कृष्ण"- सोनिया वर्मा

कथा,कहानियों के पात्र कभी मरते नहीं हैं। कुछ लोग अपना जीवन इस तरह से जीते हैं जो समाज के लिए आदर्श स्थापित करे या यूं कहें कि समस्याओं का समाधान दें। हमारे भारत के इतिहास में ऐसे बहुत लोग हैं जो आज न होते हुए भी अपने विचारों, आदर्शों ,कर्तव्यों और उम्दा जीवनशैली के माध्यम से आज भी जीवित हैं और चिरकाल तक जीवित रहेंगे।
कुछ ऐसे भी लोग हुए जिन्होंने समाज को शिक्षित करने ,आदर्श स्थापित करने के लिए अपने जीवन को तपस्या बना दिया। मानव व समाज की भलाई के लिए आजीवन जूझते रहे ऐसा एक नाम ज़हन में आता है श्रीकृष्ण । श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं से युक्त हैं। यह चेतना का सर्वोच्च स्तर होता है। इसीलिए प्रभु श्रीकृष्ण जग के नाथ जगन्नाथ और जग के गुरु जगदगुरु कहलाते हैं।
कृष्ण के जीवन की सभी घटनाओं को लोग जानते है,समझते है और आवश्यकता अनुसार सीख भी लेते हैं,परन्तु इन्हीं घटनाओं को क्या कभी किसी ने कृष्ण के नज़रिये से सोचने या समझने का प्रयास किया है ? शायद नहीं।
"कृष्ण" अनिरुद्ध प्रसाद विमल जी द्वारा रचित प्रबंध काव्य है।विमल जी स्वयं मानते है कि कृष्ण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखना आसान नहीं है फिर भी विमल जी ने एक प्रयास की है।
प्रबंध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं।"कृष्ण" पुस्तक में कृष्ण के जीवन के वृतांत क्रमबद्ध है।जिससे यह प्रबंध काव्य का एक रूप महाकाव्य बनता है। महाकाव्य किसी महापुरुष के जीवन का वर्णन होता है।
श्रीकृष्ण, हिन्दू धर्म में भगवान हैं। वे विष्णु के 8वें अवतार माने गए हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता है। कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्जित महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। कृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से लिखा गया है।भगवद्गीता कृष्ण और अर्जुन का संवाद है जो ग्रंथ आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस उपदेश के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है।
"कृष्ण" पुस्तक में घटनाएं कृष्ण के जन्म से शुरू न होकर अंत से हो रहीं हैं क्योंकि कृष्ण अपने अंत समय में अपने पूरे जीवन के घटनाओं को स्मरण कर रहें हैं इसलिए घटनाओं का क्रम निश्चित नहीं हैं ।कृष्ण के लिए किसी का श्राप टालना या अंत करना बहुत कठिन नही था,परंतु समाज को समानता और निष्पक्ष दंड देने की सीख देने के लिए असहाय, दर्द को सहते कृष्ण सोचते है कि "माता गांधारी का यह शाप है या जन्मों का मिला कोई अभिशाप है सोचता हूँ फिर कभी मैं जिस कृष्ण ने असंभव को संभव किया नियति के हर दौर को निष्फल किया उसके लिये कहाँ कठिन था बदलना ऋषि दुर्वासा का श्राप या गांधारी का । इन यादवों का नाश भी अनिवार्य था राक्षस दुराचारियों की तरह ही ये मूर्ख , लंपट और दंभी हो गये थे सुरा - सुन्दरी में डूबकर ये मदमत्त प्रकृति के प्रतिकूल आचरण करने लगे थे निज अपनी प्रजा का बोझ बनकर रह गये थे ।"पृष्ठ 8
कृष्ण सत्य और धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य को सदैव तत्पर रहने की सीख देने और इस राह में यदि आपके अपने भी हो तो उनको भी दंड बिना भेदभाव देने के लिए निम्न घटना के कारक बनते हैं... कृष्ण कहते हैं
"कि अन्याय , अधर्म , अहंकार के अंत के लिए ही कृष्ण का जन्म हुआ था यही मेरे जीवन का उद्देश्य भी रहा है । जिन आदर्शों की स्थापना के लिए कृष्ण ने अपनी देह का बूंद - बूंद रक्त बहाया वही आदर्श जब ढहने लगे थे अपने ही वंश वृक्ष के हाथों तो धर्म की रक्षा के लिये मुझे शस्त्र उठाना ही था चूँकि ये यह भी जानते थे कि मेरे सिवा इन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता मृत्यु नहीं दे सकता ।"पृष्ठ 10
कृष्ण जैसा योद्धा कोई नहीं हुआ जो कृष्ण के वंश या यादवों का सम्पूर्ण नाश कर सके इसलिए इनके दुराचारी होने पर स्वयं कृष्ण को यह करना पड़ा।इसके लिए कृष्ण मानते है कि उनका जन्म ही पापों और पापियों के नाश के लिए हुआ है नहीं तो आसमान से उन पर इतनी कृपा बाल्यकाल से ही क्यों बरसाती है ?
मानव या असुर बनना इंसान के हाथ में है ।जैसा आप चाहोगे वैसे बनोगे।मानव और असुर के व्यवहार का अंतर बताते हुए कृष्ण कहते है कि
"सच में मनुज है वही जो मनुज के काम आये सीख दे निज कर्म से जो कहे वह कर दिखाये , सिद्धान्त और व्यवहार दोनों हो मनुज का एक जैसा यही अंतर बनाता आदमी को है असुर- सा "।पृष्ठ 49
समय किसी के बांधने से नहीं बंधता और न ही रोकने से रूकता है ।मानव हो या देव या अन्य कोई जीव।जो जन्मा है उसका अंत होना ही है।इसे मनुष्य या कोई देव नही बदल सकता ...... "जो कृष्ण अपने समय का सूर्य था नर में नारायण था । जन मन का तारणहार हुआ कर संहार सारे दुष्कर्म का सृष्टि का पालनहार हुआ वही कृष्ण आज सचमुच कितना लाचार है । हाय , कितना लाचार है यह कृष्ण"। पृष्ठ 55
सर्वशक्तिमान होते हुए भी कृष्ण आज स्वयं को लाचार महसूस कर रहे हैं । चाह कर भी कुछ कर नही पा रहें हैं।जिससे वह संसार को यही सीख दे रहें हैं कि
"संसार में रहो जरूर पर अनासक्त होकर रहो त्याग का अर्थ है निष्काम कर्म करते रहो ।" पृष्ठ 58
कर्म कर फल की इच्छा मत कर हो या नेकी कर दरिया में डाल जैसी लोकोक्ति निष्काम कर्म के लिए ही कही गयी है।थोड़े फायदे की चाह में मनुष्य जन्म-जन्मांतर के बंधन में बंधता चला जाता है।पुत्र को बुढ़ापे की लाठी मान लेना , दोस्तों से सहयोग की अपेक्षा करना जैसे बंधन दुख का कारण बन जाते है ।मन चाहा प्राप्त न होने पर रोष,दुख व अवसाद का जन्म होता है।आवश्यकता से अधिक और चादर से ज्यादा पैर फैलाने का परिणाम कभी अच्छा नही होता । परन्तु मनुष्य तो मनुष्य है , इसे दिखावे की ज़िंदगी ही रास आती है चाहे परिणाम कुछ भी हो। संसार में स्त्री आदर की पात्र है स्त्री से ही सृष्टि है होती है जहाँ पूजा स्त्री की देवत्व का वास होता है स्त्रियों के सम्मान के लिए कृष्ण वस्त्र चोर तक कहलाएँ ।जिसका वास्तविक कारण निम्न हैं ....कृष्ण के जीवन की इक घटना से हमे यह सीख मिलती हैं
जरूरत से ज़्यादा कुछ भी लेगा पड़ लोभ , स्वार्थ के वशीभूत शोषण - दोहन करेगा उस दिन मनुज सच में अपने ही हाथों अपना नाश करेगा ।
सीख दी थी गोपिकाओं को साथ - साथ जगत को भी कि जल में निर्वस्त्र नहाना अपराध है । गोपियों के इस कथन के उत्तर में “ कि यहाँ तो कोई नहीं था " आपने कहा था- 'कैसे नहीं था कोई ' यमुना तो थी , यमुना का जल तो था जानती हो तुम सभी अनजान बिल्कुल हो नहीं कण - कण में ब्रह्म का वास है जड़ - चेतन सब में बसते हैं प्रभु ।पृष्ठ 65
नवयुवाओं को कदम-क़दम पर नया-नया पाठ कृष्ण सीखाते रहें हैं । जो जिस तरह से चाहे ग्रहण करें।इससे मनुष्यों की हानि नहीं होगी ।अकारण कोई आपके जीवन में दखल दे तो उसकी मंशा सही नही हैं यही सीख समाज को देने के लिए कृष्ण कहते हैं कि जिस तरह गांधारी अपने सौ पुत्रों का वध का कारण मुझे मानती थी परंतु मैं तो निमित्त मात्र हूँ और कौरवों के विनाश का बीज तब ही रोपित हुआ था जब शकुनि बेवज़ह आकर रहने लगा था।हमारी सभ्यता यह है कि "घर में अतिथि का निरुद्देश्य ठहरना सभ्य समाज में , सभ्य घरों में , सुसंस्कृत वंश में उचित नहीं समझा जाता है कभी ।"पृष्ठ96
पीड़ित, दर्द से कराहते कृष्ण को फिर अपनी सखी के साथ घटित घटना विचलित करने लगती है।उनका मानना है कि ऐसे वीरों का नाश हो जाना ही चाहिए जो मौन अनाचार देखें या सहें...
"जब विवेक ही मर गया था तो सच में जीवित ही कोई कहाँ था नारी अपमान देखकर जो रहा खड़ा अधर्म के पक्ष में ऐसी वीरता का शमन हो जाना ही उचित था।"पृष्ठ 104
राष्ट्रवाद को भूलकर जब शासक शोषक बन जाए ।राष्ट्रधर्म को भूलकर राजनीति के दल-दल में धँसता जाए तो उस राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं। यही कृष्ण भी कहते है किः-
"मैंने सच में कुछ भी नहीं किया था जहाँ राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए वहाँ ये सभी सिंहासन से चिपक गये थे राष्ट्रवाद से व्यक्तिवाद , वंशवाद जब - जब प्रमुख होगा लहू के दलदल में किसी भी राष्ट्र का रथ ऐसे ही फँसेगा।"पृष्ठ108
कृष्ण भविष्य-दृष्टा तो थे ही तभी तो एक राज्य का कैसे उत्थान होगा? राजा का व्यवहार कैसा हो? किन -किन को संरक्षण दिया जाएँ?आदि ऐसे सभी आवश्यक तथ्यों पर कृष्ण प्रकाश डाले हैं। कृषकों के लिए राज्य कोष हमेशा खुला रहना चाहिए वे अन्नदाता है इनकी उपेक्षा खात्मे की ओर ले जाएगी। ऐसा कृष्ण विचार कर रहें है ....
"प्रजा का दुख राजा का दुख होगा ताप त्रय तीनों का भागी राजा होगा , जन - जन के हित अधिकारों की रक्षा राजा अर्पित कर प्राण करेगा । है कृषकों का देश यह हमारा भारतवर्ष रात - दिन वे करते हैं उपज का काम अन्नदाता हैं कृषक खेतों में खटते अविराम कोष राज्य का खुला रहेगा उनके लिए सहर्ष"।पृष्ठ109
संसार नश्वर है।व़क्त किसी के लिए नहीं रुकता।हर एक जीव को गिनती की साँसें मिली हैं।आप जो करोंगे जैसा करोंगे वैसा ही पाओंगे।प्रकृति के नियम कोई नहीं बदल सकता।फिर घुट-घुट कर क्यों जीना। प्रेम से रहो,प्रेममय जीवन जियो।प्रेम से हर समस्या का समाधान संभव है।कृष्ण आज राधा कि इक झलक पाने के लिए अंत समय उसकी प्रतिक्षा में व्यतित कर रहे है।प्रेम में लेनदेन नहीं होता यह तो निश्छल होता है।जब लेनदेन हो तो प्रेम व्यापार बन जाता है।
"यह चिरन्तन शाश्वत सत्य सार्वभौम , सार्वजन्य कि प्रेम सबकुछ सह सकता है आँसू नहीं सह सकता है । और तुमने पोंछ लिया था अपनी आँखों से बहती अविरल अश्रुधारा को यह कहते हुए अब ये आँसू कभी नहीं बहेंगे । क्या सचमुच तुम्हारा यह ऋण मैं कभी चुका सकूँगा मानवीय मूल्यों के लिए किया गया एक नारी का यह त्याग संसार के लिए मानवता के लिए ऋण ही तो है।"पृष्ठ 130
"कृष्ण" काव्य हमें, घटनाओं को अलग-अलग पहलुओं से देखने और सोचने पर बाध्य करता हैं।इसे पढ़ते व़क्त हमने यह महसूस किया कि किसी भी परिस्थिति में हार न मानकर उसका हल खोजने का प्रयास करें सफलता अवश्य मिलेगी। कृष्ण की सभी लीलाओं को अगर जीवन से जोड़े तो हर समस्या का समाधान अवश्य मिलेगा।अगर आप कृष्ण के नज़रिए से उनके जीवन की घटनाओं को समझना चाहते हैं तो इस पुस्तक को आपको अवश्य पढ़ना चाहिए।सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा जो कृष्ण ने समाज को दी वह है प्रेम की। सच्चा प्रेम मोह - माया से परे होता हैं आप कृष्ण को पढ़ेंगें तो जान पाएँगे।पुस्तक की भाषा सरल व सहज है ।घटनाओं का क्रम पाठक को बांधें रखता है। नगन्य के बराबर प्रिंटिंग की त्रुटियाँ हैं।पुस्तक का कवर बहुत सुन्दर और नाम को सार्थक करता हुआ है।छपाई भी बहुत अच्छी है इसके लिए श्वेतवर्णा प्रकाशन को बहुत
बधाई
कृष्ण के जीवन को अलग नज़रिए से पेश करने के लिए आदरणीय अनिरुद्ध प्रसाद विमल जी को भी
बधाई
और शुभकामना।
समीक्ष्य पुस्तकः- कृष्ण
विधाः- प्रबंध काव्य
रचनाकारः- अनिरुद्ध प्रसाद विमल
प्रकाशकः-श्वेतवर्णा प्रकाशन
संस्करणः- प्रथम(2021)
मूल्यः- Rs.160
पृष्ठः- 136