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बुधवार, 16 दिसंबर 2020

मुक्तक, नवगीत

मुक्तक:
अधरों पर मुस्कान, आँख में चमक रहे
मन में दृढ़ विश्वास, ज़िन्दगी दमक कहे
बाधा से संकल्प कहो कब हारा है?
आओ! जीतो, यह संसार तुम्हारा है
*
नवगीत:
जितनी रोटी खायी
की क्या उतनी मेहनत?
.
मंत्री, सांसद मान्य विधायक
प्राध्यापक जो बने नियामक
अफसर, जज, डॉक्टर, अभियंता
जनसेवक जन-भाग्य-नियंता
व्यापारी, वकील मुँह खोलें
हुए मौन क्यों?
कहें न तुहमत
.
श्रमिक-किसान करे उत्पादन
बाबू-भृत्य कर रहे शासन
जो उपजाए वही भूख सह
हाथ पसारे माँगे राशन
कब बदलेगी परिस्थिति यह
करें सोचने की
अब ज़हमत
.
उत्पादन से वेतन जोड़ो
अफसरशाही का रथ मोड़ो
पर्यामित्र कहें क्यों पिछड़ा?
जो फैलाता कैसे अगड़ा?
दहशतगर्दों से भी ज्यादा
सत्ता-धन की
फ़ैली दहशत
.
१६-१२-२०१४

हाइकु

एक हाइकु-
बहा पसीना
चमक उठी देह
जैसे नगीना।
*
त्वरित कविता
*
दागी है कुलदीप, बुझा दो श्रीराधे
आगी झट से उसे लगा दो श्रीराधे
रक्षा करिए कलियों की माँ काँटों से
माँगी मन्नत शांति दिला दो श्रीराधे
*
संजीव
९४२५१८३२४४
१६-१२-२०१९

दोहा मुक्तिका

 दोहा मुक्तिका

संजीव
*
दोहा दर्पण में दिखे, साधो सच्चा रूप।
पक्षपात करता नहीं, भिक्षुक हो या भूप।।
*
सार-सार को गह रखो, थोथा देना फेंक।
मनुज स्वभाव सदा रखो, जैसे रखता सूप।।
*
प्यासा दर पर देखकर, द्वार न करना बंद।
जल देने से कब करे, मना बताएँ कूप।।
*
बिसरा गौतम-सीख दी, तज अचार-विचार।
निर्मल चीवर मलिन मन, नित प्रति पूजें स्तूप।।
*
खोट न अपनी देखती, कानी सबको टोंक।
सब को कहे कुरूप ज्यों, खुद हो परी अनूप।।
***
१६-१२-२०१८

गीत

गीत: 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
दरिंदों से मनुजता को जूझना है
.
सुर-असुर संघर्ष अब भी हो रहा है
पा रहा संसार कुछ, कुछ खो रहा है
मज़हबी जुनून पागलपन बना है
ढँक गया है सूर्य, कोहरा भी घना है
आत्मघाती सवालों को बूझना है
.
नहीं अपना या पराया दर्द होता
कहीं भी हो, किसी को हो ह्रदय रोता
पोंछना है अश्रु लेकर नयी आशा
बोलना संघर्ष की मिल एक भाषा
नाव यह आतंक की अब डूबना है
.
आँख के तारे अधर की मुस्कुराहट
आये कुछ राक्षस मिटाने खिलखिलाहट
थाम लो गांडीव, पाञ्चजन्य फूंको
मिटें दहशतगर्द रह जाएँ बिखरकर
सिर्फ दृढ़ संकल्प से हल सूझना है
.
जिस तरह का देव हो, वैसी ही पूजा
दंड के अतिरिक्त पथ वरना न दूजा
खोदकर जड़, मठा उसमें डाल देना
तभी सूझेगा नयन कर रुदन सूजा
सघन तम के बाद सूरज ऊगना है
१६-१२-२०१४ 

दोहा दोहा पालक

दोहा दोहा पालक :
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पलकर पल भर भूल मत, पालक का अहसान।
गंध हीन कटु स्वाद पर, पालक गुण की खान।।
*
पालक दृढ़ता से करे, शिशु-पालन दिन-रैन।
पालक से लोहा मिले, पाचक देती चैन।।
*
पालक पालन कर कभी, कहे न कर आभार।
पालक पोषण कर कहे, रखो संतुलित भार।।
*
पालक से पा 'लक' सदा, बजा चैन की बीन।
पालक में सी विटामिन, बीटा कैरोटीन।।
*
पालक संकट दूर कर, रक्षा करते आप।
कार्सीनोजन कैंसरी, कारक मेटे शाप।।
*
पालक दृष्टि कठोर रख, बोले कड़वे बैन।
मैक्युलर डिजेनरेशन, घटा सुधारे नैन।।
*
हैं ल्यूटिन जिआजेंटिन, ऐंटीऑक्सिडेंट।
रेटिना-केंद्र घनत्व के, रक्षक एक्सीलेंट।।
*
दे मजबूती कैल्शियम, हो हड्डी मजबूत।
पालक पालक सत्य ही, सद्गुण लिए अकूत।।
*
पालक में के विटामिन, फोलेट पोषक तत्व।
पालक पालित के लिए, सचमुच जीवन सत्व।।
*
ह्रदय अस्थि मस्तिष्क हित, पालक हितकर मीत।
जीवन-जोखिम कम करे, पालक अनुपम रीत।।
*
पेप्सिन-नाइट्रेट से, रक्तचाप सामान्य।
कर दे पालक झेलकर, विपदा असाsमान्य।।
*
पालक आयरन कोष है, दे दृढ़ता भरपूर।
लाल कोशिका की कमी, करे रक्त से दूर।।
*
इम्युनिटी ई विटामिन, बढ़ा रोकती रोग।
एंटी इंफ्लामेटरी, पालक सुंदर योग।।
*
फाइबर पाचन सुधारे, करे कब्ज को दूर।
त्वचा-झुर्रियाँ मिटाए, पालक गुण भरपूर।।
*
दाल-पराठे में मिला, खाएँ बना सलाद।
जूस पिएँ पालक रखे, स्वस्थ्य और आबाद।।
*
अति अच्छे को बुऱाकर, पहुँचाती नुकसान।
बहुत अधिक मत खाइए, पालक है गुणवान।।
***
१६-१२-२०२०







मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

बहुमुखी प्रतिभा की धनी डॉक्टर इला घोष डॉ. साधना वर्मा

भावांजलि
बहुमुखी प्रतिभा की धनी डॉक्टर इला घोष
डॉ. साधना वर्मा
*
[लेखक: डॉ. साधना वर्मा, प्राध्यापक अर्थशास्त्र विभाग, शासकीय मानकुँवर बाई कला वाणिज्य स्वशासी महिला महाविद्यालय जबलपुर। ]
*
मस्तिष्क में सहेजी पुरानी यादें किताब के पृष्ठों पर टंकित कहानियों की तरह होती हैं। एक बार खेलकर पढ़ना-जुड़ना आरंभ करते ही घटनाओं का अटूट सिलसिला और स्मरणीय व्यक्तित्वों की छवियाँ उभरती चली आती हैं। तीन दशक से अधिक के अपने प्राध्यापकीय जीवन पर दृष्टिपात करती हूँ तो जिन व्यक्तित्वों की छवि अपने मन पर अंकित पाती हूँ उनमें उल्लेखनीय नाम है असाधारण व्यक्तित्व-कृतित्व की धनी डॉक्टर इला घोष जी का । वर्ष १९८५ में विवाह के पूर्व मैंने भिलाई, रायपुर तथा बिलासपुर के विविध महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था। विवाह के पश्चात पहले १९८६ मेंशासकीय तिलक महाविद्यालय कटनी और फिर १९८७ में शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर में मेरी पदस्थापना हुई। शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर में पदभार ग्रहण करते समय मेरे मन में बहुत उथल-पुथल थी। बिलासपुर और कटनी के महाविद्यालय अपेक्षाकृत छोटे और कम विद्यार्थियों की कक्षाओं वाले थे। शासकीय महाकौशल महाविद्यालय में प्रथम प्रवेश करते समय यही सोच रही थी कि मैं यहाँ शिक्षण विभाग में पदस्थ वरिष्ठ और विद्वान प्राध्यापकों के मध्य तालमेल बैठा सकूँगी या नहीं?
सौभाग्य से महाविद्यालय में प्रवेश करते ही कुछ सहज-सरल और आत्मीय व्यक्तित्वों से साक्षात हुआ। डॉ. इला घोष, डॉ. गीता श्रीवास्तव, डॉ. सुभद्रा पांडे, डॉ. चित्रा चतुर्वेदी आदि ने बहुत आत्मीयता के साथ मुझ नवागंतुक का स्वागत किया। कुछ ही समय में अपरिचय की खाई पट गई और हम अदृश्य मैत्री सूत्र में बँधकर एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन गए। महाविद्यालय में विविध दायित्वों का निर्वहन करते समय एक-दूसरे के परामर्श और सहयोग की आवश्यकता होती ही है। इला जी अपने आकर्षक व्यक्तित्व, मंद मुस्कान, मधुर वाणी, सात्विक खान-पान, सादगीपूर्ण रहन-सहन तथा अपनत्व से पूरे वातावरण को सुवासित बनाए रखती थी। संस्कृत भाषा व साहित्य की गंभीर अध्येता, विदुषी व वरिष्ठ प्राध्यापक तथा नवोन्मेषी शोधकर्त्री होते हुए भी उनके व्यवहार में कहीं भी घमंड नहीं झलकता था। वे अपने से कनिष्ठों के साथ बहुत सहज, सरल, मधुर एवं आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करती रही हैं।
कुशल प्रशासक, अनुशासित प्राध्यापक एवं दक्ष विभागाध्यक्ष के रूप से कार्य करने में उनका सानी नहीं है। महाविद्यालय में विद्यार्थियों को प्रवेश देते समय, छात्रसंघ के चुनावों के समय, स्नेह सम्मेलन अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मासिक, षडमात्रिक व वार्षिक परीक्षाओं के कार्य संपादित कराते समय कनिष्ठ प्राध्यापक कभी-कभी असहजता या उलझन अनुभव करते थे किंतु इला जी ऐसे अवसरों पर हर एक के साथ तालमेल बैठते हुए, सबको शांत रखते हुए व्यवस्थित तरीके से काम करने में सहायक होती थीं। मैंने उनका यह गुण आत्मसात करने की कोशिश की और क्रमश: वरिष्ठ होने पर अपने कनिष्ठों के साथ सहयोग करने का प्रयास करती रही हूँ।
महाविद्यालयों में समाज के विभिन्न वर्गों से विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। संपन्न या प्रभावशाली परिवारों के छात्र वैभव प्रदर्शन कर गर्वित होते, राजनैतिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी नियमों की अवहेलना कर अन्य छात्रों को प्रभवित करने की कुचेष्टा करते जबकि ग्रामीण तथा कमजोर आर्थिक परिवेश से आये छात्र अपने में सिमटे-सँकुचे रहते। प्राध्यापक सबके साथ समानता का व्यवहार करें, बाह्य तत्वों का अवांछित हस्तक्षेप रोकें तो कठिनाइयों और जटिलताओं से सामना करना होता है। ऐसी दुरूह परिस्थितियों में इलाजी मातृत्व भाव से पूरी तरह शांत रहकर, सभी को शांत रहने की प्रेरणा देती। उनका सुरुचिपूर्ण पहनावा, गरिमामय व्यवहार, संतुलित-संयमित वार्तालाप उच्छृंखल तत्वों को बिना कुछ कहे हतोत्साहित करता। अन्य प्राध्यापक भी तदनुसार स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करते और महाविद्यालय का वातावरण सौहार्द्रपूर्ण बना रहता।
अपनी कुशलता और निपुणता के बल पर यथासमय पदोन्नत होकर इलाजी ने शासकीय महाविद्यालय कटनी, स्लीमनाबाद, दमोह, जुन्नारदेव आदि में प्राचार्य के पद पर कुशलतापूर्वक कार्य करते हुए मापदंड इतने ऊपर उठा दिए जिनका पालन करना उनके पश्चातवर्तियों के लिए कठिन हो गया। आज भी उन सब महाविद्यालयों में इला जी को सादर स्मरण किया जाता है। उनके कार्यकाल में महाविद्यालयों में निरन्तर नई परियोजनाएँ बनीं, भवनों का निर्माण हुआ, नए विभाग खुले और परीक्षा परिणामों में सुधार हुआ। संयोगवश मेरे पति इंजी. संजीव वर्मा, संभागीय परियोजना अभियंता के पद पर छिंदवाड़ा में पदस्थ हुए। उनके कार्यक्षेत्र में जुन्नारदेव महाविद्यालय भी था जहाँ छात्रावास भवन निर्माण का कार्य आरंभ कराया गया था। कार्य संपादन के समय उनके संपर्क में आये तत्कालीन प्राध्यापकों और प्राचार्य ने इलाजी को सम्मान सहित स्मरण करते हुए उनके कार्य की प्रशंसा की जबकि इलाजी तब सेवा निवृत्त हो चुकी थीं। यही अनुभव मुझे जुन्नारदेव में बाह्य परीक्षक के रूप में कार्य करते समय हुआ।
किसी कार्यक्रम की पूर्व तैयारी करने में इला जी जिस कुशलता, गहन चिंतन के साथ सहभागिता करती हैं, वह अपनी मसाल आप है। हरि अनंत हरि कथा अनंता.... इला जी के समस्त गुणों और प्रसंगों की चर्चा करने में स्थानाभाव के आशंका है। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा, इतना ज्ञान, इतनी विनम्रता, संस्कृत हिंदी बांग्ला और अंग्रेजी की जानकारी, प्राचीन साहित्य का गहन अध्ययन और उसे वर्तमान परिवेश व परिस्थितियों के अनुकूल ढालकर नवीन रचनाओं की रचना करना सहज कार्य नहीं है। इला जी एक साथ बहुत सी दिशाओं में जितनी सहजता, सरलता और कर्मठता के साथ गतिशील रहती हैं वह आज के समय में दुर्लभ है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् जहाँ अधिकांश जन अपन में सिमटकर शिकायत पुस्तिका बन जाते हैं वहाँ इला जी समाजोपयोगी गतिविधियों में निरंतर संलग्न हैं। उनकी कृतियाँ उनके परिश्रम और प्रतिभा की साक्षी है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि इलाजी शतायु हों और हिंदी साहित्य को अपनी अनमोल रत्नों से समृद्ध और संपन्न करती रहें।
***

समीक्षा जिजीविषा सुमनलता श्रीवास्तव

कृति चर्चा: 
जिजीविषा : पठनीय कहानी संग्रह 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*

[कृति विवरण: जिजीविषा, कहानी संग्रह, डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव, द्वितीय संस्करण वर्ष २०१५, पृष्ठ ८०, १५०/-, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक जेकट्युक्त, बहुरंगी, प्रकाशक त्रिवेणी परिषद् जबलपुर, कृतिकार संपर्क- १०७ इन्द्रपुरी, ग्वारीघाट मार्ग जबलपुर।]
*
हिंदी भाषा और साहित्य से आम जन की बढ़ती दूरी के इस काल में किसी कृति के २ संस्करण २ वर्ष में प्रकाशित हो तो उसकी अंतर्वस्तु की पठनीयता और उपादेयता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है। यह तथ्य अधिक सुखकर अनुभूति देता है जब यह विदित हो कि यह कृतिकार ने प्रथम प्रयास में ही यह लोकप्रियता अर्जित की है। जिजीविषा कहानी संग्रह में १२ कहानियाँ सम्मिलित हैं।
सुमन जी की ये कहानियाँ अतीत के संस्मरणों से उपजी हैं। अधिकांश कहानियों के पात्र और घटनाक्रम उनके अपने जीवन में कहीं न कहीं उपस्थित या घटित हुए हैं। हिंदी कहानी विधा के विकास क्रम में आधुनिक कहानी जहाँ खड़ी है ये कहानियाँ उससे कुछ भिन्न हैं। ये कहानियाँ वास्तविक पात्रों और घटनाओं के ताने-बाने से निर्मित होने के कारण जीवन के रंगों और सुगन्धों से सराबोर हैं। इनका कथाकार कहीं दूर से घटनाओं को देख-परख-निरख कर उनपर प्रकाश नहीं डालता अपितु स्वयं इनका अभिन्न अंग होकर पाठक को इनका साक्षी होने का अवसर देता है। भले ही समस्त और हर एक घटनाएँ उसके अपने जीवन में न घटी हुई हो किन्तु उसके अपने परिवेश में कहीं न कहीं, किसी न किसी के साथ घटी हैं उन पर पठनीयता, रोचकता, कल्पनाशक्ति और शैली का मुलम्मा चढ़ जाने के बाद भी उनकी यथार्थता या प्रामाणिकता भंग नहीं होती । 
जिजीविषा शीर्षक को सार्थक करती इन कहानियों में जीवन के विविध रंग, पात्रों - घटनाओं के माध्यम से सामने आना स्वाभविक है, विशेष यह है कि कहीं भी आस्था पर अनास्था की जय नहीं होती, पूरी तरह जमीनी होने के बाद भी ये कहानियाँ अशुभ पर चुभ के वर्चस्व को स्थापित करती हैं। डॉ. नीलांजना पाठक ने ठीक ही कहा है- 'इन कहानियों में स्थितियों के जो नाटकीय विन्यास और मोड़ हैं वे पढ़नेवालों को इन जीवंत अनुभावोब में भागीदार बनाने की क्षमता लिये हैं। ये कथाएँ दिलो-दिमाग में एक हलचल पैदा करती हैं, नसीहत देती हैं, तमीज सिखाती हैं, सोई चेतना को जाग्रत करती हैं तथा विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।' 
जिजीविषा की लगभग सभी कहानियाँ नारी चरित्रों तथा नारी समस्याओं पर केन्द्रित हैं तथापि इनमें कहीं भी दिशाहीन नारी विमर्ष, नारी-पुरुष पार्थक्य, पुरुषों पर अतिरेकी दोषारोपण अथवा परिवारों को क्षति पहुँचाती नारी स्वातंत्र्य की झलक नहीं है। कहानीकार की रचनात्मक सोच स्त्री चरित्रों के माध्यम से उनकी समस्याओं, बाधाओं, संकोचों, कमियों, खूबियों, जीवत तथा सहनशीलता से युक्त ऐसे चरित्रों को गढ़ती है जो पाठकों के लिए पथ प्रदर्शक हो सकते हैं। असहिष्णुता का ढोल पीटते इस समय में सहिष्णुता की सुगन्धित अगरु बत्तियाँ जलाता यह संग्रह नारी को बला और अबला की छवि से मुक्त कर सबल और सुबला के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
'पुनर्नवा' की कादम्बिनी और नव्या, 'स्वयंसिद्धा' की निरमला, 'ऊष्मा अपनत्व की' की अदिति और कल्याणी ऐसे चरित्र है जो बाधाओं को जय करने के साथ स्वमूल्यांकन और स्वसुधार के सोपानों से स्वसिद्धि के लक्ष्य को वरे बिना रुकते नहीं। 'कक्का जू' का मानस उदात्त जीवन-मूल्यों को ध्वस्त कर उन पर स्वस्वार्थों का ताश-महल खड़ी करती आत्मकेंद्रित नयी पीढ़ी की बानगी पेश करता है। अधम चाकरी भीख निदान की कहावत को सत्य सिद्ध करती 'खामियाज़ा' कहानी में स्त्रियों में नवचेतना जगाती संगीता के प्रयासों का दुष्परिणाम उसके पति के अकारण स्थानान्तारण के रूप में सामने आता है। 'बीरबहूटी' जीव-जंतुओं को ग्रास बनाती मानव की अमानवीयता पर केन्द्रित कहानी है। 'या अल्लाह' पुत्र की चाह में नारियों पर होते जुल्मो-सितम का ऐसा बयान है जिसमें नायिका नुजहत की पीड़ा पाठक का अपना दर्द बन जाता है। 'प्रीती पुरातन लखइ न कोई' के वृद्ध दम्पत्ति का देहातीत अनुराग दैहिक संबंधों को कपड़ों की तरह ओढ़ते-बिछाते युवाओं के लिए भले ही कपोल कल्पना हो किन्तु भारतीय संस्कृति के सनातन जवान मूल्यों से यत्किंचित परिचित पाठक इसमें अपने लिये एक लक्ष्य पा सकता है। 
संग्रह की शीर्षक कथा 'जिजीविषा' कैंसरग्रस्त सुधाजी की निराशा के आशा में बदलने की कहानी है। कहूँ क्या आस निरास भई के सर्वथा विपरीत यह कहानी मौत के मुंह में जिंदगी के गीत गाने का आव्हान करती है। अतीत की विरासत किस तरह संबल देती है, यह इस कहानी के माध्यम से जाना जा सकता है, आवश्यकता द्रितिकों बदलने की है। भूमिका लेख में डॉ. इला घोष ने कथाकार की सबसे बड़ी सफलता उस परिवेश की सृष्टि करने को मन है जहाँ से ये कथाएँ ली गयी हैं। मेरा नम्र मत है कि परिवेश निस्संदेह कथाओं की पृष्ठभूमि को निस्संदेह जीवंत करता है किन्तु परिवेश की जीवन्तता कथाकार का साध्य नहीं साधन मात्र होती है। कथाकार का लक्ष्य तो परिवेश, घटनाओं और पात्रों के समन्वय से विसंगतियों को इंगित कर सुसंगतियों के स्रुअज का सन्देश देना होता है और जिजीविषा की कहानियाँ इसमें समर्थ हैं। 
सांस्कृतिक-शैक्षणिक वैभव संपन्न कायस्थ परिवार की पृष्ठभूमि ने सुमन जी को रस्मो-रिवाज में अन्तर्निहित जीवन मूल्यों की समझ, विशद शब्द भण्डार, परिमार्जित भाषा तथा अन्यत्र प्रचलित रीति-नीतियों को ग्रहण करने का औदार्य प्रदान किया है। इसलिए इन कथाओं में विविध भाषा-भाषियों,विविध धार्मिक आस्थाओं, विविध मान्यताओं तथा विविध जीवन शैलियों का समन्वय हो सका है। सुमन जी की कहन पद्यात्मक गद्य की तरह पाठक को बाँधे रख सकने में समर्थ है। किसी रचनाकार को प्रथम प्रयास में ही ऐसी परिपक्व कृति दे पाने के लिये साधुवाद न देना कृपणता होगी। 
*
समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ / ९४२५१८३२४४ / salil.sanjiv@gmail.com 
*********

गीत तुम्हें प्रणाम

गीत
तुम्हें प्रणाम
*
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
सूक्ष्म काय थे,
भार गहा फिर,
अणु-परमाणु , विष्णु-विषाणु धारे तुमने।
कोष-वृद्धि कर
'श्री' पाई है।
जल-थल--नभ पर
कीर्ति-पताका
फहराई है।
पंचतत्व तुम
नाम अनाम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
भू-नभ
दिग्दिगंत यश गाते।
भूत-अभूत तुम्हीं ने नाते, बना निभाए।
द्वैत दिखा,
अद्वैत-पथ वरा।
कहा प्रकृति ने
मनुज है खरा।
लड़, मर-मिटे
सुरासुर लेकिन
मिलकर जिए
रहे तुम आम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
धरा-पुत्र हे!
प्रकृति-मित्र हे!
गही विरासत हाय! न हमने, चूक यही।
रौंद प्रकृति को
'ख़ास' हो रहे।
नाश बीज का
आप बो रहे।
खाली हाथों
जाना फिर भी
जोड़ मर रहे
विधि है वाम।
***
संजीव
२५.९.२०१८

चौपदे माँ

 माँ को अर्पित चौपदे

बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ
मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ
खेल-कूद शाला नटखटपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ
खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ
गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ
कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ
१५-१२-२०१४

नवगीत

नवगीत:
पत्थरों की फाड़कर छाती
उगे अंकुर
.
चीथड़े तन पर लपेटे
खोजते बाँहें
कोई आकर समेटे।
खड़े हो गिर-उठ सम्हलते
सिसकते चुप हो विहँसते।
अंधड़ों की चुनौती स्वीकार
पल्लव लिये अनगिन
जकड़कर जड़ में तनिक माटी
बढ़े अंकुर।
.
आँख से आँखें मिलाते
बनाते राहें
नये सपने सजाते।
जवाबों से प्रश्न करते
व्यवस्था से नहीं डरते।
बादलों की गर्जना-ललकार
बूँदें पियें गिन-गिन
तने से ले अकड़ खांटी
उड़े अंकुर।
.
घोंसले तज हौसले ले
चल पड़े आगे
प्रथा तज फैसले ले।
द्रोण को ठेंगा दिखाते
भीष्म को प्रण भी भुलाते।
मेघदूतों का करें सत्कार
ढाई आखर पढ़ हुए लाचार
फूलकर खिल फूल होते
हँसे अंकुर।
.
१५-१२-२०१४ 

नवगीत : कैंसर

नवगीत :
कैंसर!
मत प्रीत पालो
.
अभी तो हमने बिताया
साल भर था साथ
सच कहूँ पूरी तरह
छूटा ही नहीं है हाथ
कर रहा सत्कार
अब भी यथोचित मैं
और तुम बैताल से फिर
आ लदे हो काँध
अरे भाई! पिंड तो छोड़ो
चदरिया निज सम्हालो
.
मत बनो आतंक के
पर्याय प्यारे!
बनो तो
आतंकियों के जाओ द्वारे
कांत श्री की
छीन पाओगे नहीं तुम
जयी औषधि-हौसला
ले पुनः हों हम
रखे धन काला जो
जा उनको सम्हालो
.
शारदासुत
पराजित होता नहीं है
कलमधारी
धैर्य निज खोता नहीं है
करो दो-दो हाथ तो यह
जान लो तुम
पराजय निश्चित तुम्हारी
मान लो तुम
भाग जाओ लाज अब भी
निज बचालो
.

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

'अभिलाषा' पर काव्य गोष्ठी

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर : दिल्ली ईकाई
व्यवस्थापक -  अंजू खरबंदा  
११-१२--२०२०, अपराह्न १४.२०  
काव्य रचना संगोष्ठी : विषय - अभिलाषा
संचालक - सदानंद कवीश्वर 
*
त्वरित प्रतिक्रिया :
१. निशि शर्मा 'जिज्ञासु'
अभिलाषा जिज्ञासु रहे, निशि-दिन हो साधक
पूछ रही 'को विद?', कोविद भी \सलिल' न बाधक
शर्मा चुप होती बतियाती, निर्भय रब से- 
जी भर कविता सुने-सुना, शारद आराधक 
*
२. पदम गोधा 
सुधियों की पावस अभिलाषा, पद्म-पुष्प सम खिल पाए 
पनघट फिर आबाद हो सके, दिल से मिल दिल खिल पाए 
गोधा जोधा शब्द-शस्त्र संधान करे, मन छू जाए-
संजीवित संजीवनी कविता, ह्रदय ह्रदय में बस जाए 
*
 ३. गीता चौबे 'गूँज'
'गूँज' गुँजा गीता की अविचल 
अभिलाषा जीवन-पथ पर चल 
मधुर मिलन हर द्वैत मिटा दे -
सुख-दुःख सह चलते रह अविचल 
*
 ४.  पूनम झा 
 अभिलाषा पूनम चंदा सी जगमग-जगमग 
निर्झर सी झरझर झरती धरती पर धर डग
दिल में बसती सुगम बनाती है जीवन को -
खट्टे-मीठे की सहभागी दिवस-रात जग 
५. मनोरमा जैन 'पाखी', भिंड 
अभिलाषा बच्चे की जिद सी हो मनोरमा मन भाती है
पाखी बनकर नीलगगन में झटपट फुरफुर उड़ जाती है 
मजबूरी की बेड़ी तोड़े, सपनों की पायल खनकाती 
झाँक 'सलिल' में दर्पण देखे  दिल बस जाती है
६. शेख शहजाद हुसैन 
दिल में हँस दें जगह कोशिश-अभिलाषा को 
लोकतंत्र में गंगो-जमुनी परिभाषा को 
एक पक्षीय न हो चिंतन, सब सबके हित 
साधें; अंकुरित करें सपनों-नव आशा को   
७. पूनम कतरियार 
मैं भारत, भास्कर सम हरता हूँ अँधियारा 
अभिलाषा पूनम बन काटूँ तम की कारा 
कजरी चैता आल्हा होरी बंबुलिया गा 
नाप रहा ब्रह्माण्ड; भा रहा मंगल द्वारा 
८. सपना सक्सेना दत्ता 
अपना सपना माटी-चंदन, शारद-वंदन
अभिलाषा संजीवित हो भारत नंदन वन 
नीर-क्षीर परिवेश; मृदुल हो बोली-भाषा
हिन्द और हिंदी का हो युग-युग अभिनन्दन 
९. रमेश सेठी 
अभिलाषा नभ-चंदा-तारा; मन वसुधा हो करे नमन 
रमा रमा में जग रमेश को बिसरा; सुख का करे जतन 
सृजन सलिल संजीवित नदिया; कविता कालपात्र जैसी
प्रेम सुधा रंग रँगी हुई है; बिंदिया-निंदिया छंद शास्त्र सी   
१०. भारती नरेश पाराशर 
जो पर्दे के पीछे उसको करे अनावृत्त हँस अभिलाषा 
सागर के पानी से कह दे 'आ तुझमें दूँ घोल बताशा'
नर नरेश मिल करें आरती, कहें भारती जगवाणी हो 
सरल तरल हो सलिल सरीखी; कविता मधुरा कल्याणी हो 
११.  संध्या गोयल 'सुगम्या' 
सतरंगी संध्या अभिलाषा 
पल में तोला पल में माशा
कभी सुरम्या, कभी सुगम्या-
जीवन की सार्थक परिभाषा 
१२. विभा तिवारी 
आभा विभा प्रभामय अभिलाषा की जय हो
सरसी हरषी विकसी शुभ आशा निर्भय हो 
भाग्य विधाता सदय; तमन्ना हर पूरी हो 
चुटकी बजा मिटाती दिल में यदि दूरी हो 
१३. सरला वर्मा, भोपाल 
सरला तरला अभिलाषा तुलसी बिरवे सी 
स्वामिन आप भाग्य की; मधुमय शुभ रिश्ते सी 
हृदयासन आसीन कह रही लगन न हारे-
मगन जतन सौ करे; आप तकदीर सँवारे 
१४. सदानंद कवीश्वर 
सदानंद दे-पा, दिल-देहरी दीप जलाती अभिलाषा 
सलिल-धार में अंजु सुस्मिता, रंग रँगीली अभिलाषा 
बिंदिया-निंदिया; गीत-प्रीत बन, अधर पटल पर सज्जित हो-
साँसों की सरगम संजीवित; कवित-कवीश्वर अभिलाषा
***     
 


 
    
 
 









                   
     

रविवार, 13 दिसंबर 2020

मुक्तिका


मुक्तिका 
*
भय की नाम-पट्टिका पर, लिख दें साहस का नाम
कोशिश कभी न हारेगी, बाधा को दें पैगाम
*
राम-राम कह बिदराएँ, जप राम-राम भव पार 
लूटें-झपटें पा प्रसाद, हँस भक्त करें आराम 
*
लेख समय का अजब गजब, है इंसानों की जात 
जाम खा रहे; पीते भी, करते सड़कों को जाम 
*
फ़िक्र वतन की नहीं तनिक, जुमलेबाजी का शौक 
नेता को सत्ता प्यारी, जनहित से उन्हें न काम 
*
कुर्सी पाकर रंग बदल, दें गिरगिट को भी मात 
काम तमाम तमाम काम का, करते सुबहो-शाम
***
    

सामयिक गीत

सामयिक गीत
खाट खड़ी है
*
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
हल्ला-गुल्ला,शोर-शराबा
है बिन पेंदी के लोटों का.
*
नकली नोट छपे थे जितने
पल भर में बेकार हो गए.
आम आदमी को डँसने से
पहले विषधर क्षार हो गए.
ऐसी हवा चली है यारो!
उतर गया है मुँह खोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
नाग कालिया काले धन का
बिन मरे बेमौत मर गया.
जल, बहा, फेंका घबराकर
जान-धन खाता कहीं भर गया.
करचोरो! हर दिन होना है
वार धर-पकड़ के सोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
बिना परिश्रम जोड़ लिया धन
रिश्वत और कमीशन खाकर
सेठों के हित साधे मिलकर
निज चुनाव हित चंदे पाकर
अब हर राज उजागर होगा
नेता-अफसर की ओटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
१३-१२-२०१६

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
लेटा हूँ
मखमल गादी पर
लेकिन
नींद नहीं आती है
.
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बर्तनवाली बाई
देह साँवरी नयन कटीले
अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन
खनके चूड़ी
जाने क्या गाती है
मुझ जैसे
लक्ष्मी पुत्र को
बना भिखारी वह जाती है
.
उस करवट ने साफ़-सफाई
करनेवाली छवि दिखलाई
आहा! उलझी लट नागिन सी
नर्तित कटि ने नींद उड़ाई
कर ने झाड़ू जरा उठाई
धक-धक धड़कन
बढ़ जाती है
मुझ अफसर को
भुला अफसरी
अपना दास बना जाती है
.
चित सोया क्यों नींद उड़ाई?
ओ पाकीज़ा! तू क्यों आई?
राधे-राधे रास रचाने
प्रवचन में लीला करवाई
करदे अर्पित
सब कुछ
गुरु को
जो
वह शिष्या
मन भाती है
.
हुआ परेशां नींद गँवाई
जहँ बैठूँ तहँ थी मुस्काई
मलिन भिखारिन, युवा, किशोरी
कवयित्री, नेत्री तरुणाई
संसद में
चलभाष देखकर
आत्मा तृप्त न हो पाती है
मुझ नेता को
भुला सियासत
गले लगाना सिखलाती है
.
१३-१२-२०१४

मुक्तक

[12/12, 06:45] आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": मुक्तक 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कुंज में पाखी कलरव करते हैं
गीत-गगन में नित उड़ान नव भरते हैं
स्नेह सलिल में अवगाहन कर हाथ मिला-
भाव-नर्मदा नहा तारते तरते हैं
*
मनोरमा है हिंदी भावी जगवाणी
सुशोभिता मम उर में शारद कल्याणी
लिपि-उच्चार अभिन्न, अनहद अक्षर है
शब्द ब्रह्म है, रस-गंगा संप्राणी है
*
जैन वही जो अमन-चैन जी-जीने दे
पिए आप संतोष सलिल नित, पीने दे
परिग्रह से हो मुक्त निरंतर बाँट सके-
तपकर सुमन सु-मन जग को रसभीने दे
*
उजाले देख नयना मूँदकर परमात्म दिख जाए नमन कर 
तिमिर से प्रगट हो रवि-छवि निरख मन झूमकर गाए नमन कर
मुदित ऊषा, पुलक धरती, हुलस नभ हो रहा हर्षित चमन लख
'सलिल' छवि ले बसा उर में करे भव पार मिट जाए अमन कर
१२-१२-२०२०

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

लेख : द्वापरकालीन सामाजिक व्यवस्था और कृष्ण

krishnotsavmagzine20@gmail.com 
आलेख :
द्वापरकालीन सामाजिक व्यवस्था और कृष्ण 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
उत्तर वैदिक काल के अंत से लेकर बुध्द काल को द्वापर या महाभारत काल कहा जाता है। इस काल में समाज का आधार संयुक्त परिवार था। परिवारों के समूह ग्राम थे। कुल या परिवार के सब सदस्य एक साथ रहते थे। कुल का प्रमुख कुलपति पिता या सबसे बड़ा भाई होता था जिसका अनुशासन सभी को मान्य होता था। प्रायः परिवार में प्रेम होता था। आयु में छोटे सदस्य बड़े परिवारजनों को मान देते थे और कुलपति सबका पालन करते हुए उनके विकास में सहायक होते थे। नि:संतान दंपति लड़का या लड़की गोद लेकर उसे उत्तराधिकारी बनाते थे। आयु में बड़े भाई-बहन से पहले छोटे भाई-बहनों की शादी  करना बुरा माना जाता था। पिता के मृत्यु की बाद सबसे बड़ा भाई अपने छोटे भाई-बहनों का पालक होता था।

आश्रम 
महाभारतकालीन आश्रम व्यवस्था के कारण लोगों का नैतिक उत्थान हुआ। आश्रम व्यवस्था के चार भाग ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास थे। ब्रह्मचर्य काल में गुरु के आश्रम में रहकर स्वयं अपने सारे काम करते हुए विद्याध्ययन करना होता था। आश्रम में कुलपति और गुरुमाता सब विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार कर, योग्यतानुसार विषयों की शिक्षा देते थे। शिक्षा पूर्ण कर, व्यक्ति (गृहस्थ) वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते थे। गार्हस्थ जीवन के समस्त उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर चुकने के बाद वानप्रस्थ में व्यक्ति त्याग का जीवन बिताकर  गृहस्थी के बंधनों से मुक्त होता था। अंतत: सब पारिवारिक-सामाजिक बंधनों को त्याग कर, ईश्वर प्राप्ति हेतु आत्मसंयम के साथ तपस्वी का जीवन जीता था। यह आश्रम व्यवस्था शिक्षाहीन निम्न वर्ग पर लागू नहीं थी चूँकि उन्हें धर्म ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं था। कृष्ण आश्रम व्यवस्थानुसार संदीपनी ऋषि से शिक्षा प्राप्त करने अवंतिकापुरी (उज्जयिनी) गए। उन्होंने गोप प्रमुख नंद बाबा के पुत्र होते हुए भी विशेष सुविधा प्राप्त नहीं की और निर्धन ब्राह्मण पुत्र सुदामा के साथ गुरु द्वारा सौंपे गए सब कार्य संपादित किए। संदीपनी के पुत्र 'पुनर्दत्त' का समुद्र में स्नान करते समय 'तिमि' नमक जंतु ने अपहरण कर लिया था। चिर काल से लापता गुरु पुत्र  को मृत मान लिया गया था किन्तु गुरु को उसके जीवित होने का विश्वास था। शिक्षा पूर्ण होने पर परंपरानुसार गुरु दक्षिणा  के रूप में संदीपनी ने कृष्ण को अपने पुत्र को खोज लाने का आदेश किया।  कृष्ण ने शंखासुर के कब्जे से गुरुपुत्र को मुक्त कराया तथा समुद्र मंथन के समय प्राप्त ६ वे रत्न पांचजन्य शंख को छीन लिया। यह कथा महाभारत सभा पर्व के 'अर्घाभिहरण पर्व' के अंतर्गत अध्याय ३८ में वर्णित है

जाति प्रथा 
द्वापरकालीन जाति प्रथा व्यवसाय आधारित थी। इसने समाज को स्थायित्व प्रदान किया। सामान्यत: पिता का व्यवसाय उसका पुत्र अपनाता था, इसलिए पूरा परिवार उस व्यवसाय से जाना जाता था। जातियों की संख्या बहुत अधिक थी और उनमें संघर्ष भी होते थे। कुशल धनुर्धर होते हुए भी कर्ण को 'सूतपुत्र' केवल इसलिए कहा जाता रहा कि वह सारथी अधिरथ का पाल्य पुत्र था। जातियों में ऊँच-नीच थी। सामान्यत: समान जाति में विवाह संबंध होते थे। उच्च वर्ण के लिए निम्न वर्ण की कन्या से विवाह मान्य था जबकि निम्न वर्ण के लिए उच्च वर्ण की कन्या से विवाह वर्जित था। समर्थ व्यक्ति बहु विवाह करते थे। स्वयं कृष्ण और उनके स्नेही पांडवों ने भी अनेक विवाह किये थे। इस काल में दास प्रथा का प्रचलन था जिन पर स्वामी का पूरी अधिकार होता था। चीरहरण प्रसंग में दुर्योधन द्रौपदी को दासी मानते हुए भरी सभा में निर्वस्त्र करने का आदेश देता है।  'काह न राजा न करि सकै', 'समरथ को नहिं दोष गुसाईं', 'राजा करै सो न्याय' आदि लोकोक्तियों का जन्म इसीलिए हुआ कि समर्थ जन मनमानी करने लगे थे। कृष्ण ने आजीवन श्रेष्ठि जनों के दुराचारों से संघर्ष किया और उन्हें दंडित किया।   

वर्ण व्यवस्था 
शांति-व्यवस्था के लिए मनुष्य समाज कर्तव्यों के आधार पर चार वर्ण (भाग) में विभाजित था। मानव जीवन के मुख्य कर्तव्य - शिक्षा, रक्षा, व्यापार और सेवा के आधार पर चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र थे। जन्म से ही अपने पिता के व्यवसाय को अपनाते हुए, उसी वर्ण में होने के कारण जाति और वर्ण एक दूसरे का पर्याय बनता गया। कृष्ण गोपालन व्यवसाय पर आश्रित गोप, यादव या या ग्वाले थे जो क्षत्रिय वर्ण में था। उन्होंने  उच्च गोत्र की किसी ब्राह्मण से विवाह न कर परंपरा का पालन किया। कृष्ण की ८ पत्नियाँ रुक्मिणी (राजा भीष्मक की पुत्री), जांबवती (जांबवान की पुत्री), सत्यभामा (सत्राजित यादव की पुत्री), कालिंदी (सूर्य पुत्री), मित्रवृन्दा (उज्जयिनी की राजकुमारी), सत्या (राजा नग्नजित की पुत्री), भद्रा (कैकेय राजकुमारी) तथा लक्ष्मणा (भद्र देश की राजकुमारी) क्षत्रिय वर्ण की ही थीं। 

स्त्रियों की स्थिति 
इस काल में स्त्रियों को कोई विशेष अधिकार नही थे। स्त्रियों को पैतृक या श्वसुरालय की सम्पति में स्वामित्व का अधिकार नहीं था। अविवाहित स्त्री पिता तथा विवाहित स्त्री पति की संपत्ति का उपभोग कर सकती थी पर स्वामी नहीं थी। स्त्री स्वयंवर में अपना वर चुन सकती थी। विधवाओं का पुनर्विवाह हो सकता था। पति के न रहने पर उसके छोटे भाई को द्विवर अर्थात दूसरा वर मानकर विवाह किया जा सकता था। कालांतर में पुत्रियों के अपेक्षा पुत्रों का अधिक मान होने लगा। द्रौपदी राजकुमारी तथा राजरानी थीं तथापि उनके पास कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं थी। पति ने उन्हें जुए में  हार दिया। कुंती। द्रौपदी, कुब्जा आदि शोषत-पीड़ित स्त्रियों के साथ कृष्ण की हमेशा सहानिभूति रही और उन्होंने ऐसी स्त्रियों को सम्मान और रक्षा देते हुए उनके अपराधियों को दंडित किया। 

विवाह प्रणाली  
महाभारत काल में शादी की मुख्य प्रचलित प्रणालियाँ ब्रह्म विवाह, दैव विवाहगंधर्व विवाह, प्रजापत्य विवाह, आर्श विवाह, असर विवाह, राक्षस विवाह तथा पिशाच विवाह थे। कृष्ण ने इनमें से प्रथम चार के माध्यम से ८ पत्नियाँ प्राप्त कीं। अंतिम ४ पद्धतियों का प्रयोग उन्होंने नहीं किया चूँकि इनमें कन्या सहमति नहीं होती। स्पष्ट है कि कृष्ण विवाह के लिए कन्या की सहमति आवश्यक मानते थे। वे अपनी बहिन सुभद्रा की सहमति जानकर, परिवारजनों की सहमति  के बिना भी अर्जुन को उसके अपहरण के लिए प्रेरित कर पूर्ण योजना बनाते हैं।   

शिक्षा
द्वापर काल में सोलह संस्कार के अंतर्गत उपनयन संस्कार पश्चात् गुरु के आश्रम में बच्चे विद्या प्राप्त करते थे। वे गुरु की आज्ञानुसार हवन के लिए लकडियाँ लाने, भिक्षा माँगने आदि कार्य करते हुए विद्यार्जन करते थे। आचार्य  बिना किसी शुल्क के भाषा, व्याकरण, सामान्य गणित, नैतिक शिक्षा आदि देते थे। राज परिवार के सदस्यों को सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाती थी। उच्च वर्ग की कन्याएँ भी शिक्षा पा सकती थीं। एक गुरु के शिष्य गुरु भाई, गुरु बहिन मान्य थे, उनमें विवाह वर्जित था। कृष्ण ने इन मर्यादाओं का सदा पालन किया।  

सामंती व्यवस्था और कृष्ण 
सामंत शब्द समता के अंत का सूचक है। जनसामान्य को समान तथा उन पर नियंत्रण करने वाले शासक को विशेष अधिकार संपन्न मानते हुए सामंत कहा गया। द्वापर में 'सामंत' शब्द प्रचलित नहीं था। इसका प्रयोग मौर्य काल में कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा अशोक के शिलालेख में है। कृष्ण ने जन सामान्य अत्याचार करनेवाले राजाओं और सामंतों का विनाश किया। कृष्ण ने सामंती व्यवस्था के पोषक कालिया नाग, इंद्र, शंखासुर, शिशुपाल आदि का समापन अथवा मान-मर्दन खुद किया तथा जरासंध, करवों आदि का विनाश  करने में सहायक बने। वैश्या गमन, जुआ खेलना, गाना बजाना और शराब पीना सामंतों के लिए आम बात थी। कृष्ण ने इन दुष्प्रवृत्तियों से न केवल खुद को दूर रखा अपितु इन दुष्प्रवृत्तियों को अपनानेवालों का सफाया कर दिया। विधि की विडंबना यह कि कृष्ण के अग्रज बलराम और  यादव कुल ही मद्यपान से बच नहीं सके और यादवों का विनाश आपस में लड़कर हुआ। 

कृष्ण ने कंस वध पश्चात् मथुरा का सिंहासन न खुद ग्रहण किया, न अपने स्वजनों को ग्रहण करने दिया। जरासंध का भीम के हाथों वध कराकर या शिशुपाल को खुद मारने के बाद भी कृष्ण ने सामंती चरित्रानुसार सत्ता का लोभ किया। कौरवों और पांडवों से समान संबंध होते हुए भी कृष्ण  कौरवों के विनाश लीला उनके सामंती चरित्र तथा दुराचार  ही कराई। कृष्ण को उनके उनके मानवेतर कार्यों और नव समाज संरचना के अलौकिक प्रयासों ने उनके जीवनकाल में ही भगवान की मान्यता और अगणित भक्त उपलब्ध कराए। 
***
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान , ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन  जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४  ईमेल salil.sanjiv@gmail.com       

कुछ वर्णिक छंद 
अठ अक्षरी छंद 
विद्युन्माला छंद  
*
गणसूत्र - म म ग ग , कलबाँट - २२२ २२२ २२ 
उदाहरण -
१. राणा को घेरे में देखा 
    झाला ने होनी को लेखा  
    आगे आ पागा ले धारा 
    राणा पे प्राणों को वारा 
    *
लक्ष्मी छंद  
*
गणसूत्र - र र ग ल , कलबाँट - २१२ २१२ २१  
उदाहरण -
१. चाँद ने चाँदनी संग 
    रंग खेला; पिला भंग 
    हाय रे! भंग में रंग   
    हो गया रंग में भंग 
    *
मल्लिका छंद  
*
गणसूत्र - र ज ग ल , कलबाँट - २१२ १२१ २१  
उदाहरण -
१. कृष्ण का विराट रूप  
    दिव्य भव्यता अनूप 
    पार्थ देख मोह त्याग    
    क्रोध से हुआ विरूप 
    *
नराचिका छंद  
*
गणसूत्र - त र ल ग , कलबाँट - २२१ २१२ १२   
उदाहरण -
१. काँपा नहीं जरा हिया  
    नामो-निशां मिटा दिया  
    ज़िंदा न शत्रु एक था-
    किस्सा लिखा गया नया 
    *
प्रमाणिका छंद  
*
गणसूत्र - ज र ल ग, कलबाँट - १२१ २१२ १२   
उदाहरण -
१. दिखी न प्रेयसी यहाँ   
    छिपी गई कहो कहाँ? 
    न रास-रंग में मजा-  
    चलो चलें गई जहाँ  
    *
चित्रपदा छंद  
*
गणसूत्र - भ भ ग ग, कलबाँट - २११ २११ २२  
उदाहरण -
१. घूँघट आप उठाएँ 
    तो प्रिय-दर्शन पाएँ 
    और नहीं तरसाएँ    
    पास जरा झट आएँ 
    * 
माणवक  छंद  
*
गणसूत्र - भ त ल ग  , कलबाँट - २११ २२१ १२   
उदाहरण -
१. विप्र न था कर्ण; कहा  
    शाप मिला; झूठ कहा  
    मंत्र नहीं याद रहे- 
    द्वेष किया; आप दहा
    *
तुंग छंद  
*
गणसूत्र - न न ग ग, कलबाँट - १११ १११ २२  
उदाहरण -
१. शुभ समय हँसाता 
    अशुभ पल रुलाता  
    मनुज नच रहा है -    
    समय चुप नचाता 
    *
पद्म छंद  
*
गणसूत्र - न स ल ग, कलबाँट - १११ ११२ १२  
उदाहरण -
१. कलकल नदी कहे 
    तृषित न कहीं रहे    
    मलिन न नदी करो-    
    मुकुलित सदी रहे  
    *
नौ अक्षरी छंद 
रलका छंद  
*
गणसूत्र - म स स, कलबाँट - २२२ ११२ ११२ 
उदाहरण -
१. चीनी सैन्य महाकपटी 
    मौका पाकर थी झपटी   
    जूझी भारत-सैन्य; लड़ी-  
    तोड़ी गर्दन; जीत डटी  
    *
वर्ष छंद  
*
गणसूत्र - म त ज , कलबाँट - २२२ २२१ १२१  
उदाहरण -
१. नेताजी आश्वासन भूल  
    आँखों में झोंके हँस धूल   
    धोखे से नाराज किसान-  
    बागी हो जूझे बन शूल  
    *
पाईता छंद  
*
गणसूत्र - म भ स, कलबाँट - २२२ २११ ११२ 
उदाहरण -
१. गंगा कूदी हिमगिरि से 
    मौका पाकर थी झपटी   
    जूझी भारत-सैन्य; लड़ी-  
    तोड़ी गर्दन; जीत डटी  
    *





 ध्वनि और भाषा :
सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से, सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का, 
व्याकरण और पिंगल का विकास
 गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा
छंदमुक्तता और छंद हीनता 
उर्दू काव्य विधाओं में छंद
उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ-साथ मात्र गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है जो अरबी लोगों द्वारा शब्द उच्चारण के समय पर आधारित हैं। पंक्ति भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त गण के समान, उर्दू बहर में रुक्न का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुन = यगण यमाता तथा फ़ाइलुन = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गानों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।
वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार परजो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।
अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल 
*
हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। इसी तरह अन्य बहरें भी मूलत: छंद पर ही आधारित हैं।
रुबाई के २४ औज़ान जिन ४ मूल औज़ानों (१. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़अल, २. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़अल, ३. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़ऊल तथा ४. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़ऊल) से बने हैं उनमें ५ लय खण्डों (मफ़ऊलु, मफ़ाईलु, मफ़ाइलुन् , फ़अल तथा फ़ऊल) के विविध समायोजन हैं जो क्रमश: सगण लघु, यगण लघु, जगण २ लघु / जगण गुरु, नगण तथा जगण ही हैं। रुक्न और औज़ान का मूल आधार गण हैं जिनसे मात्रिक छंद बने हैं तो इनमें यत्किंचित परिवर्तन कर बनाये गये (रुक्नों) अरकान से निर्मित बहर और औज़ान छंदहीन कैसे हो सकती हैं?
औज़ान- मफ़ऊलु मफ़ाईलुन् मफ़ऊलु फ़अल
सगण लघु जगण २ लघु सगण लघु नगण
सलगा ल जभान ल ल सलगा ल नसल
इंसान बने मनुज भगवान नहीं
भगवान बने मनुज शैवान नहीं 
धरती न करे मना, पाले सबको-
दूषित न करो बनो हैवान नहीं -सलिल

छंद के तत्व :

छंद शब्द 'चद्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना'। यह आह्लाद वर्ण या मात्रा की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न होता है। 'वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं'। निश्चित चरण, वर्ण, मात्रा, यति, गति, तुक, गण, आदि के द्वारा नियोजित पद्य रचना को छंद कहते है।
छंद के अंग
मात्रा
वर्ण-मात्रा
पद-चरण  
यति- गति
पदांत-तुकांत 
गण
मात्रा : किसी ध्वनि के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते है। मात्राएँ स्वरों की होती है, व्यंजनों की नही। वर्ण का अर्थ अक्षर से है, इसके दो भेद होते है। ह्रस्व स्वर जैसे ‘अ’ की एक मात्रा और दीर्घस्वर की दो मात्राएँ मानी जाती है । यदि ह्रस्व स्वर के बाद संयुक्त वर्ण, अनुस्वार अथवा विसर्ग हो तब ह्रस्व स्वर की दो मात्राएँ मानी जाती है । पाद का अन्तिम ह्रस्व स्वर आवश्यकता पडने पर गुरु मान लिया जाता है ।
वर्ण 
(१) ह्रस्व या लघु वर्ण-
जिन वर्णो के उच्चारण में कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व वर्ण कहते है। इनकी एक मात्रा होती है। इनका चिह्न '।' है। अ, इ, उ तथा ऋ लघु वर्ण है। 
(२ )दीर्घ या गुरु वर्ण-
जिन वर्णो के उच्चारण में अधिक समय लगता है, उन्हें दीर्घ वर्ण कहते है। इनकी दो मात्राएँ होती है तथा चिह्न 'ऽ' है। आ, ई, ऊ, औ आदि दीर्घ वर्ण है।
पद : छंद में प्रयुक्त पंक्तियों को पद कहते हैं। दोहा को द्विपदी कहा जाता है चूंकि दोहा दो पंक्तियों से बनता है। 
चरण : प्रत्येक पद के मध्य में जहाँ विराम निर्धारित होता है उसके पहले या बाद के भाग को चरण कहते हैं। 
पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या निश्चित होती हैं। चरण दो प्रकार के होते हैं। साधारणतः छंद के चार चरण होते है- पहले, तीसरे, पांचवे आदि चरण 'विषम' चरण तथा दूसरे, चौथे छठवें आदि  चरण को 'सम' चरण कहते हैं।
यति- छंद पढ़ते समय उच्चारण की सुविधा के लिए तथा लय को ठीक रखने के लिए कहीं-कहीं विराम लेना पड़ता है इसी विराम या ठहराव को यति कहते है।
गति- छंद की लय को गति कहते है।
तुक- छंद के चरणों के अंत मे समान वर्णो की आवृत्ति को तुक कहते है
गण- 
संख्या, क्रम तथा गण- छंद में मात्राओं और वर्णो की गिनती को संख्या कहते है तथा छंद में लघु वर्ण और दीर्घ वर्ण की व्यवस्था को क्रम कहते है
तीन वर्णो के समूह को गण कहते है। इनकी संख्या आठ निश्चित की गई है। इनके लक्षण और तालिका निम्न है।

गणचिह्नउदाहरणप्रभाव
यगण (य) ।ऽऽ नहाना, सवेरा शुभ
मगण (मा) ऽऽऽ आजादी, नानाजी शुभ
तगण (ता) ऽऽ। चालाक, आकार अशुभ
रगण (रा) ऽ।ऽ पालना, केतकी अशुभ
जगण (ज) ।ऽ। करील, नरेश अशुभ
भगण (भा) ऽ।। बादल, गायक शुभ
नगण (न) ।।। कमल शुभ
सगण (स) ।।ऽ कमला, रचना अशुभ

(1)मात्रिक छंद- यह छंद मात्रा की गणना पर आधारित होता है, इसलिए इसे मात्रिक छंद कहा जाता है। दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई, हरिगीतिका, छप्पय आदि प्रमुख मात्रिक छंद है।

(2) वर्णिक छंद- जिन छन्दों में केवल वर्णो की संख्या और नियमो का पालन किया जाता है, वे वर्णिक छंद कहलाते है। घनाक्षरी, रूपघनक्षरी, देवघनाक्षरी, मुक्तक, दण्डक आदि वर्णिक छंद है

(3) उभय छंद- जिन छन्दों में मात्र और वर्ण दोनी की समानता एक साथ पाई जाती है, उन्हें उभय छंद कहते है।

(4) मुक्तक छंद- इन छन्दों को स्वच्छंद छंद भी कहा जाता है, इनमे मात्रा और वर्ण की संख्या निश्चित नही होती है। 

शिवमय दोहे

शिवमय दोहे
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डिम-डिम डमरू-नाद है, शिव-तात्विक उद्घोष.
अशुभ भूल, शुभ ध्वनि सुनें, नाद अनाहद कोष.
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डमरू के दो शंकु हैं, सत्-तम का संयोग.
डोर-छोर श्वासास है, नाद वियोगित योग.
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डमरू अधर टँगा रहे, नभ-भू मध्य विचार.
निराधार-आधार हैं, शिव जी परम उदार.
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डमरू नाग त्रिशूल शशि, बाघ-चर्म रुद्राक्ष.
वृषभ गंग गणपति उमा कार्तिक भस्म शिवाक्ष.
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तेरह तत्व त्रयोदशी, कभी न भूलें भक्त.
कर प्रदोष व्रत, दोष से मुक्त, रहें अनुरक्त.
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शिव विराग-अनुराग हैं, क्रोधी परम प्रशांत.
कांता कांति अजर शिवा, नमन अमर शिव कांत.
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गौरी-काली एक हैं, गौरा-काला एक.
जो बतलाए सत्य यह्, वही राह है नेक.
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