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शनिवार, 25 जनवरी 2020

अभियान

अभियान एवं प्रसंग के संयुक्त तत्वावधान में
‘‘बुधिया लेता टोह’’  गीत-नवगीत संग्रह गीतकार बसंत कुमार शर्मा
कृति लोकार्पण समारोह एवं काव्य संगोष्ठी
दिनांक : २६-१-२०२०     

प्रथम सत्र - लोकार्पण समारोह  
संचालन - विनोद नयन            

३.००  - अतिथिगणों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती पूजन    
३.०५ - सरस्वती वंदना -  अर्चना गोस्वामी/श्रीमती मिथलेश बड़गैंया/डॉ0 रानू रूही/विनीता श्रीवास्तव  

३.१०  - अतिथि स्वागत/सम्मान/परिचय - श्री विनोद नयन 
प्रो. कपिलदेव मिश्र कुलपति जी   - श्रीमती मंजरी शर्मा / जनाब मकबूल अली 
आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी - श्रीमती छाया सक्सेना / डॉ अनिल कोरी 
आचार्य भगवत दुबे जी - श्रीमती मिथलेश बड़गैंया / श्री आलोक पाठक
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा जी - श्रीमती विनीता विधि जी / श्री अविनाश ब्यौहार
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी - श्रीमती विनीता श्रीवास्तव / श्री राजेंद्र मिश्रा  
डॉ. रामगरीब पांडे ‘विकल’ जी - श्रीमती कृष्णा राजपूत / श्री इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
          श्री बसंत कुमार शर्मा जी           - श्रीमती मधु जैन / प्रो. शोभित वर्मा    

संस्था परिचय अभियान - श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव / श्री अखिलेश खरे 
संस्था परिचय प्रसंग - डॉ रानू राहू / श्री डॉ अनिल कोरी

३.२०  - पुस्तक लोकार्पण 
३.२५  - पुस्तक परिचय/कृति चर्चा - बसंत कुमार शर्मा 
३.३०  - समालोचना -
३.३०  - डॉ. राम गरीब पांडेय  ‘विकल’
३.४० - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  
३.५० - आचार्य भगवत दुबे

विशिष्ट वक्ता - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा  
- मुख्य अतिथि का उद्बोधन प्रो. कपिल देव मिश्र    
- अध्यक्षीय उदबोधन डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी 
आभार - श्री अखिलेश खरे   

स्वल्पाहार  ४. ३५ से ५.००  बजे तक 

द्वितीय सत्र - काव्य संगोष्ठी 
५ बजे से - ७ बजे तक

अध्यक्षता - श्री मोहन शशि - स्वागत श्री विनोद नयन / श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’
विशिष्ट अतिथि - श्री नवीन चतुर्वेदी - स्वागत डॉ. रानू रूही / श्री हरिसहाय पांडेय
आभार -  प्रो. शोभित वर्मा
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अतिथि परिचय

आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी 

संस्कारधनी जबलपुर में १९ दिसंबर १९३७ को जन्मे, भारतीय मनीषा के श्रेष्ठ प्रतिनिधि, विद्वता के पर्याय, सरलता के सागर, वाग्विदग्धता के शिखर आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की निम्न पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं- 

जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला  
गौरव गंध उसे उतना ही यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला।।

कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में संस्कृत, पाली, प्रकृत विभाग के अध्यक्ष व् आचार्य पदों की गौरव वृद्धि कर चुके, भारत सरकार द्वारा शास्त्र-चूड़ामणि मनोनीत किये जा चुके, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद् के सर्वाध्यक्ष निर्वाचित किये जा चुके, महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा प्राच्य विद्या के विशिष्ट विद्वान के रूप में सम्मानित, राजशेखर अकादमी के निदेशक आदि पदों की शोभा वृद्धि कर चुके आचार्य जी के मार्गदर्शन में ४० छात्रों को पीएच. डी. तथा २ छात्रों ने डी.लिट्. करने का सौभाग्य मिला है। राधा भाव सूत्र, आगत का स्वागत, अनुवाक, अथातो ब्रम्ह जिज्ञासा, वेदांत तत्व समीक्षा, बृज गंधा, पिबत भागवतम आदि अबहुमूल्य कृतियों की रचनाकर आचार्य जी ने भारती के वांग्मय कोष की वृद्धि की है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य सम्मान, पद्मश्री श्रीधर वाकणकर सम्मान, अखिल भारतीय कला सम्मान, ज्योतिष रत्न सम्मान, विद्वत मार्तण्ड, विद्वत रत्न, सम्मान, स्वामी अखंडानंद सम्मान, युगतुलसी रामकिंकर सम्मान, ललित कला सम्मान अदि से सम्मानित किये जा चुके आचार्य श्री संस्कारधानी ही नहीं देश के गौरव पुत्र हैं। आप अफ्रीका, केन्या, आदि देशों में भारतीय वांग्मय व् संस्कृति की पताका फहरा चुके हैं। आपकी उपस्थिति व आशीष हमारा सौभाग्य है। =

प्रो. कपिलदेव मिश्र - कुलपति रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय 

प्रो. मिश्र सहज सरल सौम्य व्यक्तित्व के धनी एवं प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक के रूप में जाने जाते है। आपको हिंदी की विशिष्ट सेवा के लिए विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय भागलपुर ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। शिक्षा रत्न, बेस्ट सिटीजंस आफ इंडिया, इंदिरा गांधी शिरोमणि, भारत शिक्षा रत्न व राष्ट्रीय विद्या गौरव गोल्ड एवार्ड से प्रो. मिश्र सम्मानित किये गए हैं। आप विश्वविद्यालयों में अन्य प्रशासनिक दायित्वों को भी निभा चुके हैं। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय को कुलपति रूप में अपनी कर्मठता, दूरदृष्टि तथा नवाचार से आपने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।  

कपिलदेव जी मिश्र हैं, शिक्षा गुरु निष्णात
श्रेष्ठ प्रशासन दक्षता, दूर दूर विख्यात 
करें समस्याएँ सभी दूर, जगा नव आस
नव उन्नति हर दिन मिले, निश-दिन करें प्रयास  
  


प्रो. मिश्र की गौरवमय उपस्थिति से यह नगर, मंच और हम सब धन्यता अनुभव कर रहे हैं। 

डॉ. सुरेश कुमार वर्मा 

श्रद्धेय डॉ. सुरेश कुमार वर्मा नर्मदांचल की साधनास्थली संस्कारधानी जबलपुर के गौरव हैं। "सादा जीवन उच्च विचार" के सूत्र को जीवन में मूर्त करनेवाले डॉ. वर्मा अपनी विद्वता के सूर्य को सरलता व् विनम्रता के श्वेत-श्याम मेघों से आवृत्त किये रहते हैं। २० दिसंबर १९३८ को जन्मे डॉ. वर्मा ने प्राध्यापक हिंदी, विभागाध्यक्ष हिंदी, प्राचार्य तथा अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा के पदों की शोभा वृद्धि कर शुचिता और समर्पण का इतिहास रचकर ऋषि परंपरा को जीवंत रखा है। 

सरल सहज शब्दर्षि, ज्ञान के सागर, समय-धरोहर हैं 
अनुपम है पांडित्य आपका, रचनाएँ युग का स्वर हैं    

आपने समालोचना कृति ‘डॉ. राम कुमार वर्मा की नाट्यकला’ तथा भाषा विज्ञान का अनुपम ग्रंथ ‘हिंदी अर्थान्तर न्यास’ रचकर ख्याति अर्जित की। नाट्य कृति ‘निम्न मार्गी’ व ‘दिशाहीन’ तथा उपन्यास  ‘मुमताज महल’, ‘रेशमां’, ‘सबका मालिक एक’ तथा ‘महाराज छत्रसाल’ कहानी संग्रह ‘जंग के दरवाजे पर’ तथा ‘मंदिर एवं अन्य कहानियाँ’ निबंध संग्रह ‘करमन की गति न्यारी’, ‘मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ’ आपके अनमोल ग्रन्थ है। इन ग्रंथों से आपने बहुआयामी रचनाधर्मिता व् सृजन सामर्थ्य की पताका फहराई है। आपकी उपस्थिति हमारा सौभाग्य है।  

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  
सनातन सलिला नर्मदा तीर पर मंडला नगर में २० अगस्त १९५२ को जन्मे आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का नाम अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य जगत में पारंपरिक एवं नवीन छंदोंके सृजन व शोध-समालोचना, पत्रिकाओं व् समरिकाओं के संपादन हेतु अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। गूगल पर उनके लिखे दो लाख से अधिक पृष्ठ उपलब्ध हैं। अपनी बुआ महीयसी महादेवी वर्मा तथा माँ स्व. शांति देवी से विरासत में प्राप्त संस्कारों तथा सृजन प्रतिभा संपन्न सलिल जी अंतर्जाल पर ३०० से अधिक रचनाकारों को हिंदी भाषा व्याकरण तथा पिंगल का शिक्षण दे चुके हैं। आपने ५०० से अधिक नए छंदों का अन्वेषण कर हिंदी को समृद्ध किया है। आपकी अंतरजाल पत्रिका दिव्य नर्मदा की पाठक संख्या २४ लाख से अधिक है।  'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह, 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविता संग्रह, काल है संक्रांति का व सड़क पर नवगीत संग्रह तथा भूकंप के साथ जीना सीखें लोकोपयोगी तकनीकी पुस्तक आपकी बहु चर्चित कृतियाँ हैं। ‘’काल है संक्रांति का’’ को हरिशंकर सम्मान तथा ‘’सड़क पर’’ को अभिव्यक्ति विश्वम सम्मान से सम्मानित किया गया है। आपके तकनीकी लेख “वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ” को इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स द्वारा अखिल भारतीय द्वितीय श्रेष्ठता पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। प्रो. शरद नारायण खरे के शब्दों में- 
जिसने रौशन कर दिया, पूरा मध्य प्रदेश  
वह वर्मा संजीव हैं, जाने सारा देश 
करते अक्षर साधना, विनत भाव से नित्य 
इसीलिए साहित्य के, सलिल हुए आदित्य  
     

आचार्य भगवत दुबे 

संस्कारधानी जबलपुर में १८ अगस्त १९४३ को जन्मे आचार्य भगवत दुबे गद्य-पद्य की विभिन्न विधाओं में दक्ष हैं। वे आम आदमी की संवेदना को कागज पर उतारने में माहिर हैं।  आपने महाकाव्य दधीचि,दोहा संग्रह शब्दों के संवाद, बुंदेली दोहे व साँसों के संतूर, कहानी संग्रह दूल्हादेव, गीत संग्रह स्मृति गंधा, अक्षर मंत्र, हरीतिमा, रक्षाकवच, संकल्परथी, बजे नगाड़े काल के, वनपाँखी, जियो और जीने दो, विष कन्या, शंखनाद, प्रणय ऋचाएं, कांटे हुए किरीट, करुणा यज्ञ, शब्द विहग, हिंदी तुझे प्रणाम, हिरन सुगंधों के, हम जंगल के अमलतास, अक्कास-बक्कड़, अटकन चटकन, छुपन छुपाई, नन्हें नटखट, चुभन, शिकन, घुटन, साईं की लीला अपार, माँ ममता की मूर्ति, गीत स्वाभिमान के, फागों में लोक रंग, जनक छंद की छवि छटा, हाइकु रत्न, पारसमणि, ताँका बांका छंद है, गौरव पुत्र, चिंतन के चौपाल, कर्म वीर, हिंदी के अप्रतिम सर्जक, लोकमंजरी आदि ४४ पुस्तकों का सृजन किया है । आपने अनेक पत्रिकाओं, स्मारिकाओं व् संकलनों के संपादन किया है। । आपके साहित्य पर छात्र छात्रायें एम.फिल और पी-एच.डी. कर रहे हैं।

भगवत कृपा प्रसाद हैं, भगवत दुबे मनीष 
शोभा हिंदी जगत की, सचमुच शब्द-महीश  

डा. रामगरीब पाण्डेय ‘विकल’

२ दिसम्बर १९६० को , चुरहट (जिला सीधी) मध्यप्रदेश में जन्में डॉ. रामगरीब पण्डे ‘विकल’ दूरसंचार विभाग में लेखाधिकारी होते हुए भी हिंदी साहित्य को समृद्ध करने की दिशा में निरंतर सक्रिय व् सफल हैं। हिंदी साहित्य में शोधोपाधि प्राप्त विकल जी ने हिन्दी कविता, गीत, ग़ज़ल के अलावा विविध विषयों पर निबन्ध लेखन किया है।   रीवांचल की लोकभाषा ‘बघेली’ में विकल जी का साहित्य सृजन उल्लेखनीय है। ‘बदलते मौसम के इन्तजार में’ तथा ‘सूरज की मुक्ति के लिए’ आपके काव्य संग्रह हैं। आपको ‘बदलते मौसम के इन्तजार में’ के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी से प्रादेशिक ‘श्रीकृष्ण सरल’ कृति पुरस्कार २०१० प्राप्त हुआ है। नवोदितों को साहित्य साधना के प्रति प्रेरित करने व मार्गदर्शन करने में प्रवृत्त विकल जी  इसी माह ३१ जनवरी सेवानिवृत हो रहे हैं। 

अविकल धीरज के धनी, रामगरीब अमीर 
सतत सर्जन कर हर रहे, हिंदी माँ की पीर 


श्री बसंत शर्मा 

वीर भूमि राजस्थान के जोधपुर जिले में स्मृति शेष श्रीमती कमलादेवी शर्मा तथा स्मृतिशेष दौलतराम शर्मा के आत्मज श्री बसंत शर्मा भारतीय रेल यातायात सेवा में ......  पर पर सेवारत हैं। गुरु गंभीर शासकीय दायित्व निर्वहन के साथ निरंतर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि करने हेतु समर्पित शर्मा जी के दोहे विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा शांति-राज पुस्तक माला के अंतर्गत प्रकाशित दोहा शतक मंजूषा के प्रथम भाग दोहा-दोहा नर्मदा में संकलित किये जाकर प्रशंसित हुए हुए हैं। बुधिया बैठा टोह में आपका प्रथम नवगीत संग्रह है। अभियान संस्था के अध्यक्ष श्री बसंत शर्मा हिंदी के विविध छंदों, मुक्तिका, हाइकु आदि का लेखन कर प्रशंसित हो रहे हैं। हिंदी में अधिकतम संभव विभागीय कार्य व् गतिविधियां संचालित कर रहे शर्मा जी से हिंदी साहित्य जगत को बहुत आशा है। 

हिंदी के प्रति समर्पित, वीरभूमि के पूत 
आम्र मंजरी सम खिले, लेकर महक अकूत 
छवि बसंत की बिखेरें, रच दोहे नवगीत 
सलिल पान सम तृप्ति दें, भर ग़ज़लों में प्रीत  


श्री मोहन शशि 

संस्कारधानी जबलपुर के पत्रकार जगत में अपनी कर्मठता, समर्पण तथा दक्षता के लिए जाने जाते मोहन शशि जी का जन्म १ अप्रैल १९३७ को हुआ। १९५६ से २०१८ तक प्रदेश के श्रेष्ठ समाचार पत्रों नवभारत तथा दैनिक भास्कर को शीर्ष पर पहुँचाने में शशि जी का योगदान असाधारण है। शशिजी १९६२ में वर्ल्ड यूथ कैम्प युगोस्लाविया में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के  सचिव के रूप में सहभागिता तथा हिंदी काव्य पथ हेतु 'उदारनिक पदक' से सम्मानित किये जा चुके हैं।  सरोज, तलाश एक दाहिने हाथ की, राखी नाहने आई, हत्यारी रात, शक्ति साधना, दुर्गा महिमा, अमिय, बेटे से बेटी भली तथा जाग बुंदेला जाग बुंदेली आपकी बहुचर्चित साहित्यिक कृतियाँ हैं।

पत्रकारिता क्षेत्र के, प्रतिभाशाली रत्न 
मोहन शशि हैं शिखर पर, किये अहर्निश यत्न
हर बाधा संकट गया, हार- न मानी हार
कीर्तिमान रच ‘मिलन’ से, देकर पाया प्यार         

***

ख़बरदार दोहा

ख़बरदार दोहा 
संध्या सिंह को फड्स बुक ने ऑथर माना 
*
संध्या को ऑथर माना मुखपोथी जी
या सिंह से डर यश गाया मुखपोथी जी


फेस न बुक हो जाए लखनऊ थाने में
गुपचुप फेस बचाया है मुखपोथी जी

लाजवाब नवगीत, ग़ज़ल उम्दा लिखतीं
ख्याल न अब तक क्यों आया मुखपोथी जी

जुड़ संध्या के साथ बढ़ाया निज गौरव
क्यों न सैल्फी खिंचवाया मुखपोथी जी

है "मुखपोथी रत्न" ठीक से पहचानो
कद्र न करना आया है मुखपोथी जी

देख 'सलिल' में फेस कभी 'संजीव' बनो
समझ न तुमको क्यों आया मुखपोथी जी

तुम से हम हैं, यह मुगालता मत पालो
हम से तुम हो, सच भाया मुखपोथी जी?
*
संजीव
१९-१-२०
७९९९५५९६१८

दोहा-प्रतिदोहा संध्या सिंह -सलिल

दोहा-प्रतिदोहा
नर्म गिलहरी सी लगी , रेशम रेशम रूप l
कूदी छत पर पेड़ से , जब सर्दी की धूप ll - संध्या सिंह
*
सिंह सूरज दुबका दिखा, संध्या में हो मौन
रहा थरथरा काँपता, धैर्य धराए कौन
*

बसंत पंचमी

 बसंत पंचमी
संजीव
.
महत्व
भारत में जीवन के हर पहलू को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है | और इसी आधार पर पूजा - उपासना की व्यवस्था की गयी है | अगर धन के लिए दीपावली पर माता लक्ष्मी की उपासना की जाती है तो नेघा और बुद्धि के लिए माघ शुक्ल पंचमी को माता सरस्वती की भी उपासना की जाती है | धार्मिक और प्राकृतिक पक्ष को देखे तो इस समय व्यक्ति का मन अत्यधिक चंचल होता है | और भटकाव बड़ता है | इसीलिए इस समय विद्याऔर बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना से हम अपने मन को नियंत्रित और बुद्धि को कुशाग्र करते है | वर्तमान संदर्भो की बात करे तो आजकल विधार्थी भटकाव से परेशान है | पढाई में एकाग्रता की समस्या है | और चीजो को लम्बे समय तक याद नहीं रख सकते है , इस दशा में बसंत पंचमी को की गयी माँ सरस्वती की पूजा से न केवल एकाग्रता में सुधार होगा बल्कि बेहतर यादाश्त और बुद्धि की बदोलत विधार्थी परीक्षा में बेहतरीन सफलता भी पायेंगे | विधार्थियों के आलावा बुद्धि का कार्य करने वाले तमाम लोग जैसे पत्रकार , वकील , शिक्षक आदि भी इस दिन का विशेष लाभ ले सकते है |
राशी अनुसार पूजन विधान :-
मेष :- स्वभावत: चंचल राशी होती है | इसीलिए अक्सर इस राशी के लोगो को एकाग्रता की समस्या परेशान करती है | बसंत पंचमी को सरस्वती को लाल गुलाब का पुष्प और सफ़ेद तिल चढ़ा दे | इससे चंचलता और भटकाव से मुक्ति मिलेगी |
वृष:- गंभीर और लक्ष के प्रति एकाग्र होते है परन्तु कभी कभी जिद और कठोरता उनकी शिक्षा और करियर में बाधा उत्पन्न कर देती है | चूँकि इनका कार्य ही आम तौर पर बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाला होता है , अत : इनको नीली स्याही वाली कलम और अक्षत सरस्वती को समर्पित करना चाहिए | ताकि बुद्धि सदेव नियंत्रित रहती है |
मिथुन : - बहुत बुद्धिमान होने के बावजूद भ्रम की समस्या परेशान करती है | इसीलिए ये अक्सर समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते | बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को सफ़ेद पुष्प और पुस्तक अर्पित करने से भ्रम समाप्त हो जाता है एवं बुद्धि प्रखर होती है |
कर्क : - इन पर ज्यादातर भावनाए हावी हो जाती है | यही समस्या इनको मुश्किल में डाले रखती है | अगर बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पीले फूल और सफ़ेद चन्दन अर्पित करे तो भावनाए नियंत्रित कर सफलता पाई जा सकती है |
सिंह : - अक्सर शिक्षा में बदलाव व् बाधाओ का सामना करना पड़ता है | ये योग्यता के अनुसार सही जगह नहीं पहुच पाते है शिक्षा और विधा की बाधाओ से निपटने के लिए सरस्वती को पीले फूल विशेष कर कनेर और धान का लावा अर्पित करना चाहिए |
कन्या : - अक्सर धन कमाने व् स्वार्थ पूर्ति के चक्कर में पड़ जाते है | कभी कभी बुद्धि सही दिशा में नहीं चलती है | बुद्धि सही दिशा में रहे इसके लिए सरस्वती को कलम और दावत के साथ सफ़ेद फूल अर्पित करना चाहिए |
तुला :- जीवन में भटकाव के मौको पर सबसे जल्दी भटकने वाले होते है | चकाचोंध और शीघ्र धन कमाने की चाहत इसकी शिक्षा और करियर में अक्सर बाधा ड़ाल देती है | भटकाव और आकर्षण से निकल कर सही दिशा पर चले इसके लिए नीली कमल और शहद सरस्वती को अर्पित करे |
वृश्चिक : - ये बुद्धिमान होते है | लेकिन कभी कभार अहंकार इनको मुश्किल में ड़ाल देता है | अहंकार और अति आत्म विश्वास के कारण ये परीक्षा और प्रतियोगिता में अक्सर कुछ ही अंको से सफलता पाने से चुक जाते है | इस स्थिति को बेहतर करने के लिए सरस्वती को हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए |
धनु : - इस राशी के लोग भी बुद्धिमान होते है | कभी कभी परिस्थितिया इनकी शिक्षा में बाधा पहुचाती है | और शिक्षा बीच में रुक जाती है | जिस कारण इन्हें जीवन में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है | इस संघर्ष को कम करने के लिए इनको सरस्वती को रोली और नारियल अर्पित करना चाहिए |
मकर : - अत्यधिक मेहनती होते है | पर कभी कभी शिक्षा में बाधाओ का सामना करना पड़ता है | और उच्च शिक्षा पाना कठिन होता है | शिक्षा की बाधाओ को दूर करके उच्च शिक्षा प्राप्ति और सफलता प्राप्त करने के लिए इनको सरस्वती को चावल की खीर अर्पित करनी चाहिए |
कुम्भ :- अत्यधिक बुद्धिमान होते है | पर लक्ष के निर्धारण की समस्या इनको असफलता तक पंहुचा देती है | इस समस्या से बचने के लिए और लक्ष पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए इसको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को मिश्री का भोग चडाना चाहिए |
मीन : - इस राशी के लोग सामान्यत : ज्ञानी और बुद्धिमान होते है | पर इनको अपने ज्ञान का बड़ा अहंकार होता है | और यही अहंकार इनकी प्रगति में बाधक बनता है | अहंकार दूर करके जीवन में विनम्रता से सफलता प्राप्त करने के लिए इनको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पंचामृत समर्पित करना चाहिए |
बसंत पंचमी के दिन अगर हर राशी के जातक इन सरल उपायों को अपनाये तो उनको बागिस्वरी , सरस्वती से नि: संदेह विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा |
कैसे करे सरस्वती आराधना : -
बसंत पंचमी के दिन प्रात: कल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करे | सरस्वती का चित्र स्थापित करे यदि उनका चित्र सफ़ेद वस्त्रो में हो तो सर्वोत्तम होगा | माँ के चित्र के सामने घी का दीपक जलाए और उनको विशेष रूप से सफ़ेद फूल अर्पित करे | सरस्वती के सामने बैठ " ऍ सरस्वतये नम : " का कम से कम १०८ बार जप करे | एसा करने से विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा तथा मन की चंचलता दूर होगी |
पूजा अर्चना और उसके लाभ : -
लाल गुलाब , सफ़ेद तिल अर्पित करे तथा अक्षत चढाए |
सफ़ेद पुष्प , पुस्तक अर्पित करे |
पीले फूल , सफ़ेद चन्दन अर्पित करे |
पीले पुष्प , धान का लावा चढाए |
कलम - दवात , सफ़ेद फूल अर्पित करे |
नीली कलम , शहद अर्पित करे |
हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित कर रोली , नारियल अर्पित करे |
चावल की खीर और मिश्री का भोग अर्पित करे |
लाभ : -
मन की स्थिरता और ताजगी महसूस होगी तथा बुद्धि विवेक नियंत्रित होंगे |
मन की कशमकश ख़त्म होगी बुद्धि प्रखर होगी |
भावनाए काबू में रहेगी , सफलता मिलेगी |
शिक्षा में सफलता , बुद्धि में वृद्धि होगी |
बुद्धि तेज , सोच सकारात्मक होगी |
सही दिशा मिलेगी |
अहंकार से मुक्ति मिलेगी |
संघर्ष और बाधाऍ कम होगी |
एकाग्रचित्तता में बढ़ोतरी होगी |

नवगीत

नवगीत:
भारत आ रै
संजीव
.
भारत आ रै ओबामा प्यारे,
माथे तिलक लगा रे!
संग मिशेल साँवरी आ रईं,
उन खों हार पिन्हा रे!!
.
अपने मोदी जी नर इन्दर
बाँकी झलक दिखा रए
नाम देस को ऊँचो करने
कैसे हमें सिखा रए
'झंडा ऊँचा रहे हमारा'
संगे गान सुना रे!
.
देश साफ़ हो, हरा-भरा हो
पनपे भाई-चारा
'वन्दे मातरम' बोलो सब मिल
लिये तिरंगा प्यारा
प्रगति करी जो मूंड उठा खें
दुनिया को दिखला रए
.

नवगीत

एक रचना
संजीव
.
छोडो हाहाकार मियाँ!
. दुनिया अपनी राह चलेगी खुदको खुद ही रोज छ्लेगी साया बनकर साथ चलेगी छुरा पीठ में मार हँसेगी आँख करो दो-चार मियाँ! . आगे आकर प्यार करेगी फिर पीछे तकरार करेगी कहे मिलन बिन झुलस मरेगी जीत भरोसा हँसे-ठगेगी करो न फिर भी रार मियाँ! . मंदिर मस्जिद कह लड़ लेगी
गिरजे को पल में तज देगी लज्जा हया शरम बेचेगी इंसां को बेघर कर देगी पोंछो आँसू-धार मियाँ!

आंदोलन-धरने की मारी
भूखा पेट बहुत लाचारी
राजनीति धोखा-अय्यारी
पत्रकारिता है बटमारी
कहीं नहीं है प्यार मियाँ

इसे चाहिए खूब दहेज़
उसे फैमिली से परहेज
जेल रहे अपनों को भेज
तीन तलाक़ सजाये सेज
दुनिया है बेज़ार मियाँ
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
.
लोकतंत्र का
पंछी बेबस
.
नेता पहले डालें दाना
फिर लेते पर नोच
अफसर रिश्वत गोली मारें
करें न किंचित सोच
व्यापारी दे
नशा रहा डँस
.
आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
न्यायपालिका अंधी-लूली
पैरों में है मोच
ठेकेदार-
दलालों को जस
.
राजनीति नफरत की मारी
लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूँगा खो दी
निज निर्णय की लोच
एकलव्य का
कहीं न वारिस

मुक्तक

मुक्तक सलिला :
बेटियाँ
संजीव
*
आस हैं, अरमान हैं, वरदान हैं ये बेटियाँ
सच कहूँ माता-पिता की शान हैं ये बेटियाँ
पैर पूजो या कलेजे से लगाकर धन्य हो-
एक क्या दो-दो कुलों की आन हैं ये बेटियाँ
*
शोरगुल में कोकिला का गान हैं ये बेटियाँ
नदी की कलकल सुरीली तान हैं ये बेटियाँ
माँ, सुता, भगिनी, सखी, अर्धांगिनी बन साथ दें-
फूँक देतीं जान देकर जान भी ये बेटियाँ
*
मत कहो घर में महज मेहमान हैं ये बेटियाँ
यह न सोचो सत्य से अनजान हैं ये बेटियाँ
लेते हक लड़ के हैं लड़के, फूँक भी देते 'सलिल'-
नर्मदा जल सी, गुणों की खान हैं ये बेटियाँ
*
ज़िन्दगी की बन्दगी, पहचान हैं ये बेटियाँ
लाज की चादर, हया का थान हैं ये बेटियाँ
चाहते तुमको मिले वरदान तो वर-दान दो
अब न कहना 'सलिल कन्या-दान हैं ये बेटियाँ
*
सभ्यता की फसल उर्वर, धान हैं ये बेटियाँ
महत्ता का, श्रेष्ठता का भान हैं ये बेटियाँ
धरा हैं पगतल की बेटे, बेटियाँ छत शीश की-
भेद मत करना, नहीं असमान हैं ये बेटियाँ
============================

दोहा सलिला

सामयिक दोहा सलिला
*
गाँधी जी के नाम पर, नकली गाँधी-भक्त
चित्र छाप पल-पल रहे, सत्ता में अनुरक्त
*
लालू के लल्ला रहें, भले मैट्रिक फेल
मंत्री बन डालें 'सलिल', शासन-नाक नकेल
*
ममता की समता करे, किसमें है सामर्थ?
कौन कर सकेगा 'सलिल', पल-पल अर्थ-अनर्थ??
*
बाप बाप पर पुत्र है, चतुर बाप का बाप
धूल चटाकर चचा को, मुस्काता है आप
*
साइकिल-पंजा मिल हुआ, केर-बेर का संग
संग कमल-हाथी मिलें, तभी जमेगा रंग
*

हर दल ने दलदल मचा, साधा केवल स्वार्थ
हत्या कर जनतंत्र की, कहते- 'है परमार्थ'
*
निर्मल मन देखे सदा, निर्मलता चहुँ ओर
घोर तिमिर से ज्यों उषा, लाये उजली भोर
*

नवगीत

नवगीत:
कागतन्त्र है
*
कागतन्त्र है
काँव-काँव
करना ही होगा
नहीं किया तो मरना होगा
.
गिद्ध दिखाते आँख
छीछड़े खा फ़ैलाते हैं.
गर्दभ पंचम सुर में,
राग भैरवी गाते हैं.
जय क्षत्रिय की कह-कह,
दंगा आप कराते हैं.
हुए नहीं सहमत जो
उनको व्यर्थ डराते हैं
नाग तंत्र के
दाँव-पेंच,
बचना ही होगा,
नहीं बचे तो मरना होगा.
.
इस सीमा से आतंकी
जब मन घुस आते हैं.
उस सरहद पर डटे
पड़ोसी सड़क बनाते हैं.
ब्रम्ह्पुत्र के निर्मल जल में
गंद मिलाते हैं.
ये हारें तो भी अपनी
सरकार बनाते हैं.
स्वार्थ तंत्र है
जन-गण को
जगना ही होगा
नहीं जगे तो मरना होगा.
.
नए साल में नए तरीके
हम अपनाएँगे.
बाँटें-तोड़ें, बेच-खरीदें
सत्ता पाएँगे.
हुआ असहमत जो उसका
जीना मुश्किल कर दें
सौ बंदर मिल, घेर शेर को,
हम घुड़काएँगे.
फ़ूट मंत्र है
एक साथ
मिलना ही होगा
नहीं मिले तो मरना होगा.
.
३१.१२. २०१७

मुक्तिका

मुक्तिका
मिल गया
*
घर में आग लगानेवाला, आज मिल गया है बिन खोजे.
खुद को खुदी मिटानेवाला, हाय! मिल गया है बिन खोजे.
*
जयचंदों की गही विरासत, क्षत्रिय शकुनी दुर्योधन भी
बच्चों को धमकानेवाला, हाथ मिल गया है बिन खोजे.
*
'गोली' बना नारियाँ लूटीं, किसने यह भी तनिक बताओ?
निज मुँह कालिख मलनेवाला, वीर मिल गया है बिन खोजे.
*
सूर्य किरण से दूर रखा था, किसने शत-शत ललनाओं को?
पूछ रहे हैं किले पुराने, वक्त मिल गया है बिन खोजे.
*
मार मरों को वीर बन रहे, किंतु सत्य को पचा न पाते
अपने मुँह जो बनता मिट्ठू, मियाँ मिल गया है बिन खोजे.
*
सत्ता बाँट रही जन-जन को, जातिवाद का प्रेत पालकर
छद्म श्रेष्ठता प्रगट मूढ़ता, आज मिल गया है बिन खोजे.
*
अब तक दिखता जहाँ ढोल था, वहीं पोल सब देख हँस रहे
कायर से भी ज्यादा कायर, वीर मिल गया है बिन खोजे.
***
२५.१.२०१८

मुक्तिका

मुक्तिका:
रात
संजीव
( तैथिक जातीय पुनीत छंद ४-४-४-३, चरणान्त sssl)
.
चुपके-चुपके आयी रात
सुबह-शाम को भायी रात
झरना नदिया लहरें धार
घाट किनारे काई रात
शरतचंद्र की पूनो है
'मावस की परछाईं रात
आसमान की कंठ लंगोट
चाहे कह लो टाई रात
पर्वत जंगल धरती तंग
कोहरा-पाला लाई रात
वर चंदा तारे बारात
हँस करती कुडमाई रात
दिन है हल्ला-गुल्ला-शोर
गुमसुम चुप तनहाई रात

गणतंत्र

गणतंत्र
आज बने गणतंत्र हम,
जनता हुई प्रसन्न।
भेद-भाव सब दूर हो,
जन-जन हो संपन्न।
*
प्रजातंत्र में प्रजा का,
सेवक होता तंत्र।
जनसेवी नेता बनें,
यही सफलता-मंत्र।।
*
लोकतंत्र में लोकमत,
होता है अनमोल।
हानि न करिए देश की,
कलम उठाएं तोल।।
*
तंत्र न जन की पीर हर,
खुद भोगे अधिकार।
तो जनतंत्र न सफल है,
शासन करे विचार।।
*
ध्वजा तिरंगी देश की,
आन, बान, सम्मान।
झुकने कभी न दे 'सलिल',
विहंस लुटा दें जान।।
*
संविधान को जानकर,
पालन करिए नित्य।
अधिकारों की नींव हैं,
फ़र्ज़ मानिए सत्य।।
*
जाति-धर्म को भुलाकर
भारतीय हैं एक।
भाईचारा पालकर,
चलो बनें हम नेक।।
***
२६.१.२०१८

संध्या

संध्या हो संजीव तो, दे रजनी को चंद
सिंह पराक्रम देखकर, तारे हँसते मंद
तारे हँसते मंद, सलिल में निज छवि देखें
शशि का निर्मल बिंब, सराह पूर्णिमा लेखें
पंकज परिमल बिखर,कहे भू हुई न वंध्या
सतरंगा नभ नमन करे, जब आए संध्या

रवींद्रनाथ ठाकुर

काव्यानुवाद :
जागो रे!
रवींद्रनाथ ठाकुर
*
मूल रचना - भाषा बांग्ला
हे मोर चित्त, पुण्य तीर्थे जागो रे धीरे.
एइ भारतेर महामानवेर सागर तीरे.
जागो रे धीरे.
हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य, हेथाय द्राविड़-छीन.
शक-हूण डीके पठान-मोगल एक देहे होलो लीन.
पश्चिमे आजी खुल आये द्वार
सेथाहते सबे आने उपहार
दिबे आर निबे, मिलाबे-मिलिबे.
जाबो ना फिरे.
एइ भारतेर महामानवेर सागर तीरे.
*
हिंदी काव्यानुवाद: संजीव 'सलिल'
*
हे मेरे मन! पुण्य तीर्थ में जागो धीरे रे.
इस भारत के महामनुज सागर के तीरे रे..
जागो धीरे रे...
*
आर्य-अनार्य यहीं थे, आए यहीं थे द्राविड़-चीन.
हूण पठन मुग़ल शक, सब हैं एक देह में लीन..
खुले आज पश्चिम के द्वार,
सभी ग्रहण कर लें उपहार.
दे दो-ले लो, मिलो-मिलाओ
जाओ ना फिर रे...
*
इस भारत के महामनुज सागर के तीरे रे..
जागो धीरे रे...
*
यह रचना शांत रस, राष्ट्रीय गौरव तथा 'विश्वैक नीडं' की सनातन भावधारा से ओतप्रोत है. राष्ट्र-गौरव, सब को समाहित करने की सामर्थ्य आदि तत्व इस रचना को अमरता देते हैं. हिंदी पद्यानुवाद में रचना की मूल भावना को यथासंभव बनाये रखने तथा हिंदी की प्रकृति के साथ न्याय करने का प्रयास है. रचना की समस्त खूबियाँ रचनाकार की, कमियाँ अनुवादक की अल्प सामर्थ्य की हैं.
*

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता


आलेख:
गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता
आचार्य ​संजीव​ वर्मा​ 'सलिल'
*
भूमिका: ध्वनि और भाषा
​आध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व ​सामान्य को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ हुए समाप्त करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनी​ ​अनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।

कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्र​ ​गुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।

निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से ​स्थायित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता ​का ​सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का ले​खा रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी​, सहचरों ​आदि ​से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त ​होता रहा जबकि ब्राम्हण वर्ग शिक्षा प्रदाय हेतु जिम्मेदार था। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का ​शास्त्र विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।

रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं। बर्फ, ठंड और नमी वाले अंचलों में विपरीत पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण हाथों की अंगुलिया कड़ी हो गईं, वहाँ के निवासी वृत्ताकार बनाने में असुविधा अनुभव करते थे। वहाँ सीधी-छोटी रेखाओं और बिंदुओं का समायोजन कर रोमन लिपि का विकास हुआ। रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं।  चित्र अंकन करने की रुचि ने चित्रात्मक लिपि​यों​ के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह ​ वातावरण तथा ​खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला, बृज, अव​धी भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।

सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से ​व्याध द्वारा ​​नर का ​वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है​​। ​हो इस प्रसंग से प्रेरित होकर​​ ​हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति ​जैसी मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति​-पर्यावरण का योगदान इंगित करते हैं​।

व्याकरण और पिंगल का विकास-

भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका​​।​​ इसलिये भारत में हर मनुष्य हेतु आवश्यक सोलह संस्कारों में अक्षरारम्भ को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। भारत में विश्व की पहली कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही ​ छंद शास्त्र के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर ​मात्रा ​के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।

गीति काव्य में छंद-

गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है। इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गया। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पच्चीस-तीस छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।

वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।

अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।

छंदमुक्तता और छंद हीनता-

लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला ने पारम्परिक छंदों के साथ अप्रचलित छंदों का मिश्रण कर अपनी काव्य रचनाओं को अन्यों के लिए गूढ़ बना दिया। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।

दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी की किताबी शोधोपाधियाँ  प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा व् समझ से हीन  प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह में अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में न केवल जीवित रहा अपितु सामयिक देश-काल-परिस्थितियों से ताल-मेल बैठाते हुए जनानुभूतियों का प्रवक्ता बन गया। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर का नाम देकर करते हैं।

उर्दू काव्य विधाओं में छंद-

भारत के विविध भागों में विविध भाषाएँ तथा हिंदी के विविध रूप (शैलियाँ) प्रचलित हैं। उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी के साथ भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में प्रचलित भाषाओँ के शब्दों का सम्मिश्रण है, जिसमें शब्दों के भार (वज़्न) गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है, जो अरबी भाषा के शब्द उच्चारण व् व्याकरण नियमों पर आधारित है। शब्द भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी वर्णमाला के पंचम वर्णों (ङ, ञ, ण,) तथा संयुक्त अक्षरों को फ़ारसी में नहीं लिखा जा सकता। फ़ारसी में 'ह' के लिए 'हे' तथा 'हम्ज़ा' दो ध्वनियाँ हैं जो हिंदी में नहीं हैं। इसलिए हिंदी में फ़ारसी भाषा की काव्य विधाओं में लेखन किये जाने पर फ़ारसी (उर्दू) के जानकार उन्हें खारिज करते हैं, जबकि हिंदी के जानकार हिंदी व्याकरण-पिंगक के अनुसार दोषपूर्ण होने पर भी फ़ारसी व्याकरण-पिंगल पर आधारित उर्दू की काव्य रचनाओं को न केवल खारिज नाहने करते अपितु उनका आनंद भी लेते हैं। 
   
हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त ''गण'' के समान, उर्दू में ''रुक्न'' का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें (छंद) मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुं = यगण यमाता तथा फ़ाइलुं = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गणों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।

वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार पर जो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।

अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल
*
हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
    
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। हिंदी के 'हरिगीतिका' छंद और फ़ारसी की रुक्न 'मुतफ़ाइलुं' दोनों का मात्रा भार ११२१२ ही है। इसी तरह अन्य फ़ारसी की अन्य बहरें भी मूलत: संस्कृत या हिंदी छंदों पर ही आधारित हैं।

छंदों की व्यापकता 

संस्कृत से विरासत में हिंदी को मिले वार्णिक छंद एक वर्ण से तथा मात्रिक छंद एक मात्रा से आरंभ होते हैं। लम्बे छंदों को सवैया और दण्डक छंद कहा गया है। हिंदी छंद शास्त्र के सर्वमान्य ग्रंथ 'छंद प्रभाकर' में जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' ने लगभग ७०० छंद सोदाहरण दिए हैं। तत्पश्चात लगभग एक सौ पचास वर्षों तक  नए छंद नहीं बनाये जा सके। गत ३ दशकों में निरंतर कार्य हुए मैंने इतने ही नए छंद और बनाये हैं। अभी जी छंद कोष मैं तैयार कर रह हूँ उसमें १५०० छंद होंगे। संभवत: विश्व की किसी अन्य भाषा में इतने अधिक प्रकार से कविता नहीं की जा सकती जितने प्रकार से हिंदी में की जा सकती है। यह स्थिति तब है जबकि भारत सरकार की और से हिंदी भाषा और पिंगल के क्षेत्र में काम करने के लिए कोई प्रोत्साहन या सहायता नहीं दी जाती है। संस्कृत पिंगल के ग्रंथ सामान्यत: उपलब्ध नहीं हैं। 

हिंदी छंदों का एक अन्य प्रकार वाचिक छंदों का है जो लोक गीतों में व्यापकता के साथ प्रयुक्त हुए हैं। हिंदी प्राध्यापकों में अछूते  विषयों पर शोध कार्य करने या कराने की प्रवृत्ति का अभाव है तथापि छंदों की रचना तथा प्रयोग की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य निरंतर किया जा रहा है। 
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बुधवार, 22 जनवरी 2020

नीर क्षीर दोहा यमक

नीर क्षीर दोहा यमक


कल की चिंता किये बिन, जो करते दुष्कर्म
ले कलकी अवतार प्रभु, मार निभायें धर्म
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छलकी गोरस गगरिया, भीगी राधा मौन
छल की कथा न कह सकी, फोड़ गया छिप कौन?
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हल की विधि जाने बिना, हलकी कोशिश व्यर्थ
हल की खेती हल बिना, करना रखे न अर्थ
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नल की नलकी बंद पा, गगरी हुई उदास
पानी पानी हो रही, बिन पानी खो आस
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फल की फ़िक्र किये बिना, चाहा फल लें तोड़
पत्थर साथी को लगा, रहे हाथ अब जोड़
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मखमल को मल मल किया, मलमल सदृश महीन
घरवाली को क्रुद्ध पा, घरवाला है दीन
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मंगलवार, 21 जनवरी 2020

यमक दोहा

यमक दोहा
यमक का रंग दोहा के संग-
.....नहीं द्वार का काम
संजीव 'सलिल'
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मन मथुरा तन द्वारका, नहीं द्वार का काम.
प्राणों पर छा गये है, मेरे प्रिय घनश्याम..
*
बजे राज-वंशी कहे, जन-वंशी हैं कौन?
मिटे राजवंशी- अमिट, जनवंशी हैं मौन..
*
'सज ना' सजना ने कहा, कहे: 'सजाना' प्रीत.
दे सकता वह सजा ना, यही प्रीत की रीत..
*
'साजन! साज न लाये हो, कैसे दोगे संग?'
'संग-दिल है संगदिल नहीं, खूब जमेगा रंग'..
*
रास खिंची घोड़ी उमग, लगी दिखने रास.
दर्शक ताली पीटते, खेल आ रहा रास..
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'किसना! किस ना लौकियाँ, सकूँ दही में डाल.
जीरा हींग बघार से, आता स्वाद कमाल'..
*
भोला भोला ही 'सलिल', करते बम-बम नाद.
फोड़ रहे जो बम उन्हें, कर भी दें बर्बाद..
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अर्ज़ किया 'आदाब' पर, वे समझे आ दाब.
वे लपके मैं भागकर, बचता फिर जनाब..
*
शब्द निशब्द अशब्द हो, हो जाते जब मौन.
मन से मन तक 'सबद' तब, कह जाता है कौन??
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रात अलार्म लगा गयी, सपनों की बारात
खुली आँख गायब, दिखी बंद आँख सौगात
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मञ्जूषा खुश हो रही, पा यादें गुलकंद
मञ्जूषा महका रही, बगिया दे मकरंद
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सुमन सुमन उपहार पा, प्रभु को नमन हजार
सुरभि बिखेरें हम 'सलिल ', दस दिश रहे बहार
*
जिससे मिलकर हर्ष हो, उससे मिलना नित्य
सुख न मिले तो सुमिरिए, प्रभु को वही अनित्य
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