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रविवार, 19 जनवरी 2020

ॐ छंद शाला पाठ २


छंद शाला

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

पाठ २

कथ्य भाव लय छंद है

*

(इस लेख माला का उद्देश्य नवोदित कवियों को छंदों के तत्वों, प्रकारों, संरचना, विधानों तथा उदाहरणों से परिचित कराना है। लेखमाला के लेखक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ख्यात छन्दशास्त्री, नवगीतकार, लघुकथाकार, संपादक व् समालोचक हैं। सलिलजी ने ५०० से अधिक नए छंदों का अन्वेषण किया है। लेखमाला के भाग १ में छंद के तत्वों, दोहा सोरठा, रोला व् कुण्डलिया लेखन ने विधान व् उदाहरण बताए जा चुके हैं। - सं.)
*
काव्य शास्त्र है पुरातन :


काव्य शास्त्र चिर पुरातन, फिर भी नित्य नवीन। 
झूमे-नाचे मुदित मन, ज्यों नागिन सुन बीन।। 


लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार काव्य ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ, रसमय वाक्य, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन, ध्वनि को काव्य की आत्मा, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।

उच्चार :

ध्वनि-तरंग आघात पर, आधारित उच्चार.
मन से मन तक पहुँचता, बनकर रस आगार.

ध्वनि विज्ञान सम्मत् शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र पर आधारित व्याकरण नियमों ने संस्कृत और हिन्दी को शब्द-उच्चार से उपजी ध्वनि-तरंगों के आघात से मानस पर व्यापक प्रभाव करने में सक्षम बनाया है। मानव चेतना को जागृत करने के लिए रचे गए काव्य में शब्दाक्षरों का सम्यक् विधान तथा शुद्ध उच्चारण अपरिहार्य है। सामूहिक संवाद का सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्व सुलभ माध्यम भाषा में स्वर-व्यंजन के संयोग से अक्षर तथा अक्षरों के संयोजन से शब्द की रचना होती है। मुख में ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दंत तथा अधर) में से प्रत्येक से ५-५ व्यंजन उच्चारित किए जाते हैं।

सुप्त चेतना को करे, जागृत अक्षर नाद.
सही शब्द उच्चार से, वक्ता पाता दाद.

उच्चारण स्थान
वर्ग
कठोर(अघोष) व्यंजन
मृदु(घोष) व्यंजन




अनुनासिक
कंठ
क वर्ग
क्
ख्
ग्
घ्
ङ्
तालू
च वर्ग
च्
छ्
ज्
झ्
ञ्
मूर्धा
ट वर्ग
ट्
ठ्
ड्
ढ्
ण्
दंत
त वर्ग
त्
थ्
द्
ध्
न्
अधर
प वर्ग
प्
फ्
ब्
भ्
म्
विशिष्ट व्यंजन

ष्, श्, स्,
ह्य्, र्ल्व्

कुल १४ स्वरों में से ५ शुद्ध स्वर अ, इ, उ, ऋ तथा ऌ हैं. शेष ९ स्वर हैं आ, ई, ऊ, ऋ, ॡ, ए, ऐ, ओ तथा औ। स्वर उसे कहते हैं जो एक ही आवाज में देर तक बोला जा सके। मुख के अन्दर ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दांत, होंठ) से जिन २५ वर्णों का उच्चारण किया जाता है उन्हें व्यंजन कहते हैं। किसी एक वर्ग में सीमित न रहने वाले ८ व्यंजन स्वरजन्य विशिष्ट व्यंजन हैं।

विशिष्ट (अन्तस्थ) स्वर व्यंजन :

य् तालव्य, र् मूर्धन्य, ल् दंतव्य तथा व् ओष्ठव्य हैं। ऊष्म व्यंजन- श् तालव्य, ष् मूर्धन्य, स् दंत्वय तथा ह् कंठव्य हैं।

स्वराश्रित व्यंजन: अनुस्वार ( ं ), अनुनासिक (चन्द्र बिंदी ँ) तथा विसर्ग (:) हैं।

संयुक्त वर्ण : विविध व्यंजनों के संयोग से बने संयुक्त वर्ण श्र, क्ष, त्र, ज्ञ, क्त आदि का स्वतंत्र अस्तित्व मान्य नहीं है।

मात्रा :
उच्चारण की न्यूनाधिकता अर्थात किस अक्षर पर कितना कम या अधिक भार ( जोर, वज्न) देना है अथवा किसका उच्चारण कितने कम या अधिक समय तक करना है ज्ञात हो तो लिखते समय सही शब्द का चयन कर दोहा या अन्य काव्य रचना के शिल्प को संवारा और भाव को निखारा जा सकता है। गीति रचना के वाचन या पठन के समय शब्द सही वजन का न हो तो वाचक या गायक को शब्द या तो जल्दी-जल्दी लपेटकर पढ़ना होता है या खींचकर लंबा करना होता है, किंतु जानकार के सामने रचनाकार की विपन्नता, उसके शब्द भंडार की कमी, शब्द ज्ञान की दीनता स्पष्ट हो जाती है. अतः, दोहा ही नहीं किसी भी गीति रचना के सृजन के पूर्व मात्राओं के प्रकार व गणना-विधि पर अधिकार कर लेना जरूरी है।

उच्चारण नियम :

उच्चारण हो शुद्ध तो, बढ़ता काव्य-प्रभाव.
अर्थ-अनर्थ न हो सके, सुनिए लेकर चाव.

शब्दाक्षर के बोलने, में लगता जो वक्त.
वह मात्रा जाने नहीं, रचनाकार अशक्त.

हृस्व, दीर्घ, प्लुत तीन हैं, मात्राएँ लो जान.
भार एक, दो, तीन लो, इनका क्रमशः मान.

१. हृस्व (लघु) स्वर : कम भार, मात्रा १ - अ, इ, उ, ऋ तथा चन्द्र बिन्दु वाले स्वर।

२. दीर्घ (गुरु) स्वर : अधिक भार, मात्रा २ - आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं।

३. बिन्दुयुक्त स्वर तथा अनुस्वारयुक्त या विसर्ग युक्त वर्ण भी गुरु होता है। यथा - नंदन, दु:ख आदि.

४. संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण दीर्घ तथा संयुक्त वर्ण लघु होता है।

५. प्लुत वर्ण : अति दीर्घ उच्चार, मात्रा ३ - ॐ, ग्वं आदि। वर्तमान हिन्दी में अप्रचलित।

६. पद्य रचनाओं में छंदों के पाद का अन्तिम हृस्व स्वर आवश्यकतानुसार गुरु माना जा सकता है।

७. शब्द के अंत में हलंतयुक्त अक्षर की एक मात्रा होगी।

पूर्ववत् = पूर् २ + व् १ + व १ + त १ = ५

ग्रीष्मः = ग्रीष् 3 + म: २ +५

कृष्ण: = कृष् २ + ण: २ = ४

हृदय = १ + १ +२ = ४

अनुनासिक एवं अनुस्वार उच्चार :

उक्त प्रत्येक वर्ग के अन्तिम वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का उच्चारण नासिका से होने का कारण ये 'अनुनासिक' कहलाते हैं।

१. अनुस्वार का उच्चारण उसके पश्चातवर्ती वर्ण (बाद वाले वर्ण) पर आधारित होता है। अनुस्वार के बाद का वर्ण जिस वर्ग का हो, अनुस्वार का उच्चारण उस वर्ग का अनुनासिक होगा। यथा-

१. अनुस्वार के बाद क वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार ङ् होगा।

क + ङ् + कड़ = कंकड़,

श + ङ् + ख = शंख,

ग + ङ् + गा = गंगा,

ल + ङ् + घ् + य = लंघ्य

२. अनुस्वार के बाद च वर्ग का व्यंजन हो तो, अनुस्वार का उच्चार ञ् होगा.

प + ञ् + च = पञ्च = पंच

वा + ञ् + छ + नी + य = वांछनीय

म + ञ् + जु = मंजु

सा + ञ् + झ = सांझ

३. अनुस्वार के बाद ट वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण ण् होता है.

घ + ण् + टा = घंटा

क + ण् + ठ = कंठ

ड + ण् + डा = डंडा

४. अनुस्वार के बाद 'त' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण 'न्' होता है.

शा + न् + त = शांत

प + न् + थ = पंथ

न + न् + द = नंद

स्क + न् + द = स्कंद

५ अनुस्वार के बाद 'प' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार 'म्' होगा.

च + म्+ पा = चंपा

गु + म् + फि + त = गुंफित

ल + म् + बा = लंबा


कु + म् + भ = कुंभ

छंद ५. अचल छंद
*
अपने नाम के अनुरूप इस छंद में निर्धारित से विचलन की सम्भावना नहीं है. यह मात्रिक सह वर्णिक छंद है. इस चतुष्पदिक छंद का हर पद २७ मात्राओं तथा १८ वर्णों का होता है. हर पद (पंक्ति) में ५-६-७ वर्णों पर यति इस प्रकार है कि यह यति क्रमशः ८-८-११ मात्राओं पर भी होती है. मात्रिक तथा वार्णिक विचलन न होने के कारण इसे अचल छंद कहा गया होगा। छंद प्रभाकर तथा छंद क्षीरधि में दिए गए उदाहरणों में मात्रा बाँट १२१२२/१२१११२/२११२२२१ रखी गयी है. तदनुसार
सुपात्र खोजे, तभी समय दे, मौन पताका हाथ.
कुपात्र पाये, कभी न पद- दे, शोक सभी को नाथ..
कभी नवायें, न शीश अपना, छूट रहा हो साथ.
करें विदा क्यों, सदा सजल हो, नैन- न छोड़ें हाथ..
*
वर्ण तथा मात्रा बंधन यथावत रखते हुए मात्रा बाँट में परिवर्तन करने से इस छंद में प्रयोग की विपुल सम्भावनाएँ हैं.
मौन पियेगा, ऊग सूर्य जब, आ अँधियारा नित्य.
तभी पुजेगा, शिवशंकर सा, युगों युगों आदित्य..

छंद ६. पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय अभियान छंद 
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: ल ज, लघु + जगण, लघु जभान, १ १२१।
उदाहरण:
गीत-
अठ याम  
कर काम।  
मत हार  
वर नाम।    
सपना न 
तज यार।  
तजना न 
मन प्यार।  
दिल को न    
झट वार। 
गर वार  
मत हार। 
बिसरा न  
परिणाम। 
अठ याम  
कर काम। 
करना न  
अभिमान। 
तजना न 
सम मान। 
मँगना न 
वरदान।  
कर पूर्ण  
अभियान।  
बन ख़ास  
मत आम।    
अठ याम  
कर काम। 

७. अमरकंटक छंद  
विधान-
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा
२. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय  
नरक चौदस
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस  
मनुज की जय
नरक चौदस
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो 
अमर चौदस 
मनुज की जय  
नरक चौदस
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित 
विजय चौदस  
मनुज की जय  
नरक चौदस
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय  
नरक चौदस
.
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित 
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस 
मनुज की जय  
नरक चौदस

८. अचल धृति छंद
संजीव
*
छंद विधान: 
सूत्र: ५ न १ ल, ५ नगण १ लघु = ५ (१ + १ +१ )+१ 
       हर पद में १६ लघु मात्रा, १६ वर्ण
उदाहरण:
१. कदम / कदम / पर ठ/हर ठ/हर क/र
ठिठक / ठिठक / कर सि/हर सि/हर क/र
हुलस / हुलस / कर म/चल म/चल क/र
मनसि/ज सम / खिल स/लिल ल/हर क/र
२. सतत / अनव/रत प/थ पर / पग ध/र
अचल / फिसल / गर सँ/भल ठि/ठकक/र
रुक म/त झुक / मत चु/क मत / थक म/त
'सलिल' / विहँस/कर प्र/वह ह/हरक/र
९. आचमन छंद
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: भ ल = भगण + लघु, भानस + लघु, २११ १।
       ग न = गुरु + नगण, गुरु + नसल, १ २११।
उदाहरण:
मुक्तिका-
 . 
प्यार कर 
वार कर।
.
जीत वर
हार कर।
.
मीत बन
प्रीत कर।
.
क्यों गलत
रीत कर?
.
हो अमर 
बीत कर।
भोर जग
ईद कर।

१०. इंद्र वज्रा छंद

इस द्विपदिक मात्रिक चतुःश्चरणी छंद के हर पद में २ तगण, १ जगण तथा २ गुरु मात्राएँ होती हैं. इस छंद का प्रयोग मुक्तक हेतु भी किया जा सकता है.
इन्द्रवज्रा एक पद = २२१ / २२१ / १२१ / २२ = ११ वर्ण तथा १८ मात्राएँ
उदाहरण:
१. तोड़ो न वादे जनता पुकारे
बेचो-खरीदो मत धर्म प्यारे
लूटो तिजोरी मत देश की रे!
चेतो न रूठे, जनता न मारे
२. नाचो-नचाओ मत भूलना रे!
आओ! न जाओ, कह चूमना रे!
माशूक अपनी जब साथ में हो-
झूमो, न भूले हँस झूलना रे!
३. पाया न / खोया न / रखा न / रोका
बोला न / डोला न / कहा न / टोंका
खेला न / झेला न / तजा न / हारा
तोडा न / फोड़ा न / पिटा न / मारा
४. आराम / ही राम / हराम / क्यों हो?
माशूक / के नाम / पयाम / क्यों हो?
विश्वास / प्रश्वास / नि:श्वास टूटा-
सायास / आभास / हुलास / झूठा
***
सन्दर्भ :

१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,

२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,

३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,

संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन , जबलपुर ४८२००१ चलभाष - ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 

दोहा गाथा सनातन: १६ ९ / १६ मई २००९

Saturday, May 09, 2009

दोहा गाथा सनातन: 16 दोहा जन गण मन बसा


दोहा जनगण-मन बसा, सुख-दुःख में दे साथ.
संकट में संबल बने, बढ़कर थामे हाथ.

हम अंग्रेजी द्विपदियों का आनंद शन्नो जी के सौजन्य से ले रहे हैं.

1. अंग्रेजी के couplets बहुत ही अकेलेपन का अहसास लिए होते हैं, मिनिमलिस्टिक (न्यूनतमवादी) अर्थात कम से शब्दों का प्रयोगकर बात कहना.

2. दोहों की तरह दो पंक्तिओं के होते हैं (single stanza) या दो से अधिक पंक्तिओं के भी (large stanza) वाले भी. मेरा मतलब है कि पंक्तियों के समूह. कम लम्बी तथा अधिक लम्बी द्विपदियाँ

3. दोहों की तरह उनमे भी अपने विचार, भावनाएँ या सारगर्भित बातें कम शब्दों में कही जाती हैं.

4. उनमें भी लय होती है लेकिन हमेशा लय होना जरूरी नहीं होता.

5. उनमें हिंदी के दोहों की तरह मात्राओं की झंझट नहीं होती. (अंगरेजी में जो-जैसा लिख जाता है वैसा ही पढ़ा नहीं जाता. कई ध्वनियों यथा ण,ढ, ढ़, ड़ आदि के लिए वर्ण नहीं हैं. इसलिए मात्रा की परंपरा विकसित नहीं हुई किन्तु पदांत में ध्वनि समय का प्रयास किया जाता है...यद्यपि हिंदी के ध्वनि समय की तुलना में यह कहीं नहीं ठहरता)

6. इनके भी लिखने के कई तरीके होते हैं कुछ उदाहरण हैं जैसे कि:
छोटा 'short couplet' नाम है 'iambic'
एक उदाहरण देखिये यहाँ:
In to my empty head there come
a cotton beach, a dock wherefrom
बँटा 'split couplet' इसकी पहली पंक्ति का नाम 'iambic pentameter' है व छोटी पंक्ति का नाम होता है 'iambic meter'.

एक उदाहरण देखिये यहाँ:
The weighty seas are rowled from the deeps
In mighty heaps,
And from the rocks' foundations do arise
To kiss the skies.
(पदांत: डीप्स-हीप्स, अराइज-स्काइज...)

'Heroic couplet' इसकी दोनों पंक्तियाँ 'iambic pentameter' में हैं.
एक उदाहरण देखिये यहाँ:
Wave after waves in hills each other crowds
As if the deep resolved to storm the clouds.
(पदांत: क्राउड्स-क्लाउड्स )

'Alexandrine heroic couplet' 'iambic hexameter' में है.
एक उदाहरण देखिये यहाँ:
And that black night, That blackness was sublime
I felt distributed through space and time
(पदांत: सबलाइम-टाइम)

One foot upon a mountain top. One hand
under the pebbles of panting strand
(पदांत: हैण्ड- स्ट्रैंड )

One ear in Italy, one eye in Spain
In caves my blood, and in the stars, my brain.
(पदांत: स्पेन-ब्रेन)

बहुत समय पहले 1999 में जब लन्दन में Millennium Dome बना था तब उस पर मैंने एक poem लिखी थी उसमें की कुछ पंक्तियाँ यहाँ दे रही हूँ:
Like a giant spiky hat
Or, a crown for a king to wear
Looking over the crystal water
With all the glory and splendour.
Under the blue sky, hot Sun
Rain or raging thunder
We wait to unfold your secrets
O, worlds greatest wonder.
एक poem और written long ago:
All those happy
moments of wait.
All my hopes
crushed by fate.
Let me drown
all my sorrows, fears
And painful memories
in the sea of tears.
There won't be anything
more peaceful than to
Sleep in the blissful
hands of death.
मेरा अपना कहना है यहाँ:
कपलेट की गिटपिट में, बना सब कुछ कीमा
न लय का कोई बंधन, न मात्रा की सीमा.
हिंदी के दोहे मधुर, कपलेट की न जीत
कुछ ही कपलेट अच्छे, हिंदी सबकी मीत.
अब मनु जी के लिए इतना सुंदर कार्टून बनाने की ख़ुशी में अंग्रेजी में दो chinese दोहे:
Once there was a dragon
who was alone carrying a lantern.
एक और:
Happiness peace and lots of good wishes
Eat plenty of prawns and tasty fishes.

अब देखें दोहे का वैविध्य:

संस्कृत दोहा:
वृक्ष-कर्तनं करिष्यति, भूत्वांधस्तु भवान्.
पदे स्वकीये कुठारं, रक्षकस्तु भगवान्..
-शास्त्री नित्य गोपाल कटारे

मैथली दोहा:
की हो रहल समाज में?, की करैत समुदाय?
किछु न करैत समाज अछि, अपनहिं सैं भरिपाय..
-
ब्रम्हदेव शास्त्री

अवधी दोहा:
राम रंग महँ जो रँगे, तिन्हहिं न औरु सुहात.
दुनिया महँ तिनकी रहनि, जिमी पुरइन के पात..
डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

बृज दोहा:
जु ज्यों उझकी झंपति वदन, झुकति विहँसि सतरात.
तुल्यो गुलाल झुठी-मुठी, झझकावत पिय जात..
-महाकवि बिहारी

भले-बुरे सब एक सौं, जौ लौं बोलत नांहिं.
जान पडत है काग-पिक, ऋतु वसंत के मांहि..
-कवि वृन्द

बुन्देली दोहा:
कीसें कै डारें विथा, को है अपनी मीत?
इतै सबइ हैं स्वारथी, स्वारथ करतइ प्रीत.
- रामेश्वर प्रसाद गुप्ता 'इंदु'

नौनी बुन्देली लगत, सुनकें मौं मिठियात.
बोलत में गुर सी लगत, फर-फर बोल्ट जात..
-पं. रामसेवक पाठक 'हरिकिंकर'

बघेली दोहे
मूडे माँ कलशा धरे, चुअत प्यार की बूँद.
अँगिया इमरत झर रओ, लीनिस दीदा मूँद..
-गंगा कुमार 'विकल'

पंजाबी दोहे
हर टीटली नूं सदा तो, उस रुत दी पहचाण.
जिस रुत महकां बाग़ विच, आके रंग बिछाण..
-निर्मल जी
पहलां बरगा ना रिहा, लोकां दा किरदार.
मतलब दी है दोस्ती, मतलब दे ने यार..
-डॉ. हरनेक सिंह 'कोमल'

दोहे के कुछ और रंग देखेंगे अगली गोष्ठी में. अन्य भाषाओँ / बोलिओं के दोहे आमंत्रित हैं.

11 कविताप्रेमियों का कहना है :

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -
हर भाषा के दोहों ने मुग्ध कर दिया......बहुत सुन्दर
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी कप-प्लेट का, छोडिये भी चक्कर
चाय गिलास में पीलें, डालें तनिक शक्कर
जैम में है क्या रखा, खाओ बस गुलकंद
कपलेट को अब भूलें, गाओ अपने छंद.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
मेरे कार्य में आपने अपनी ज्ञान-गंगा से पानी मिला कर उसे और शुद्ध कर दिया है. उसके लिए बहुत आभार. समय मिलते ही आपके आदेश का पालन करूंगी. तब तक के लिये.....

इच्छा पूरी मैं करुँ, अब बहुत अनिवार्य
हे ईश्वर, क्या करुँ, करें पूरन कार्य.

लज्जित न मुझे करें, करके मुझे नमन
मैं अपने श्रद्धा-सुमन, करती हूँ अर्पन.

अब मनु जी अलाप रहे, बहुत अनोखा राग
अंतरिक्ष पर जाऊंगा, मैं जल्दी ही भाग.

गुरु जी दया कीजिये, खींचें मनु के कान
मस्ती सारा दिन करें, बहुत बने शैतान.

पैर कुल्हाडी मारी, शन्नो इतनी त्रस्त
अजित की पताका कहाँ, खाली है अब हस्त.
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
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portraiting the couplet,
Am working on doha
need to improve yet.

जानकारी के लिए आचार्यजी और शन्नो जी का आभार |

अवनीश तिवारी
manu का कहना है कि -
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छ्या नहीं फल लागे अति दूर


मफाइलुन मुत्फ़ाइलुन फेलुन फाल फ़ऊल
फ़यिलातुन फेलुन फऊ फ़यिलातुन मफऊल

आचार्य प्रणाम,
पहले मैंने यूं कोशिश करके देखि,,,,
फिर कुछ और ध्यान देकर के एक और देखि जो के मुझे इस से सरल लगी,,,,
सही गलत आप बताएं,,,,,

फेलुन फेलुन फ़ाइलुन फेलुन फेलुन फाय,,,,,,,,,,,,,,,

इसी तरह के दोहा के लिए ये वाली बहर जो के मुझे पहले वाली से आसान औ सही लगी ,,सो ये लाया हूँ,,,,,,आप देख कर बताये,,,,,

शुरू में लगा के ये काम बेहद मुश्किल है,,,पर करने लगा तो आराम से हो गया,,,,

लेकिन एक अजीब बात भी हुई,,,,,
जाने क्यूं ये करते हुए भीतर से कई बार आवाज आई के मैं ये काम ना करुँ,,,,,,,
पर क्यूंकि इंटरेस्ट आ चुका था.... और आपने कहा था ,,,सो कर दिया,,,,,,

पर भीतर कुछ है जो यहाँ पर,,,इस बारे में सोचने से रोक रहा है,,,,,

हो सकता है के आपको ये मेरा होम वर्क ठीक लगे और आप इसे ओ,के, कर दें,,,,,
बेशक मेरा ज्ञान भी बढा और मुझे दोहे के अलावा बहर को भी जानने का मौका मिला ,,
पर जाने क्या है के मुझे ये सब करके खुशी नहीं महसूस हुई,,,,,

आशा है के आप इस बारे में भी मुझे बतायेंगे,,,,,
या शायद वो मेरे भीतर वाली बहर ,,,,,,इस बाहरी जानकारी से कुछ आहात हुई,,???
जाने क्या है,,,,,,पर कुछ है जरूर,,,,,,,,!!!!!!!!!!
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,
आपने तो आज कमाल कर दिया और गुरु जी की आज्ञा का पालन करके कुछ होम वर्क कर लाये. वेरी गुड बॉय! आज जो मैंने आपकी शिकायत की है गुरु जी से उसके लिये आपसे माफ़ी चाहती हूँ अपने कान खुद ही खींचकर. आपने जो भी लिखा है अच्छा ही होगा लेकिन अपने पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा. यह सब क्या है, कौन सी भाषा है आदि सवाल दिमाग को खा रहे हैं. आप मुझपर हँसना चाहें तो free हैं हंसने के लिये. पर हेल्प! मुझे कोई समझाये कि इस सबका क्या मतलब है और मैं भी कैसे समझ सकती हूँ. आपकी बहादुरी की दाद देती हूँ मनु जी, आगे भी आप ऐसे ही गुड बॉय बने रहिये तो मैं भी जल्दी से छुट्टी पर हो आऊँ .
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
शन्‍नोजी ने कड़ी मेहनत करके हमें अंग्रेजी दोहों के बारे में बताया। लगता है अंग्रेजों ने हमसे ज्ञान लेने की कोशिश की लेकिन वे छंद तो बना नहीं सके अत: मुक्‍त छंद में ही अपनी बात कह दी और हमारे आधुनिक विद्वानों ने भी इसे ही अपना लिया। अब मनुजी भी बहर के बारे में संक्षिप्‍त में बता दें तो एक तुलनात्‍मक अध्‍ययन हो जाएगा। यह तो समझ आ गया है कि जैसे हमारे दोहों के प्रकार होते हैं वैसे ही गजल में बहर होती है। ल‍ेकिन शिल्‍प की दृष्टि से दोनों में कितना अन्‍तर है यह तो मनुजी ही बताएंगे।
manu का कहना है कि -
शन्नो जी,
इसमें कमाल जैसी कोई बात नहीं है,,,और न ही ये कोई भाषा है,,,,न इसका कोई मतलब,,,,
जैसे दोहे में शब्द का वजन करने के सूत्र हैं,,,जगन मगन यमाता वगैरह होते हैं,,,ऐसे ही ग़ज़ल में शेर का वजन कने के सूत्र हैं,,,जैसे,,,

(खीरा) फेलुन (मुख से ) फेलुन
(काटिए) फ़ाइलुन
(मलिए) फेलुन (नोन) फेलुन
(लगाए) फाय,
इसमें,,,,,,,,,,,(नो --फे) (न लगाए--- लुनफाय )

ऐसे होगा.....

रहिमन ( फेलुन ) कड़वे ( फेलुन) मुखन को (फ़ाइलुन)
चाही (फेलुन)

(yahi सजाय ...फेलुन फाय...)----इसमें एक मात्रा आगे पीछे है पर कुल वजन बराबर है,,,,,या हो सकता है के ये दोहा ही मुझे एकदम सही याद ना आ रहा हो,,,,

है वही दोहे वाला,,,,
(फेलुन फेलुन फ़ाइलुन ---१३ ) (फेलुन फेलुन फाय------११ )
अब तक कभी ये सब जानना जरूरी नहीं समझा था ,,,इस होमवर्क के चलते जाना गया,,,,,
दिमाग की ज़रा सी कसरत हो गई इस बहाने,,,,,

अजित जी,
अंग्रेजो ने शायद हम से ही छंद लिए हो,,,,,क्यूंकि मुझे इस के बारे में एकदम से नहीं पता मेरे लिए तो कप प्लेट चाय पीने के सामान से अधिक और कुछ नहीं,,,:::::::::)))))))))))

और ये भी हो सकता है के गजल भी दोहे से प्रेरित होकर बनी हो,,,इसकी भी मुझे जानकारी नहीं है,,,,,
दोहे की जो धुन मन में बसी है बचपन से वो ये है जो ऊपर लिखी है,,,,, ये भी २३ तरह के होते हैं अब पता लगा है,,,,,,जितना भी जान सका अच्छा लगा,,,,,दोहे में कोई मात्र गिराई नहीं जाती,,,
हर शब्द जैसे लिखा है वैसे ही पूरे वजन सहित पढा जाता है,,,,,

गजल के शेर में ऐसा नहीं होता,,,,,इसमें शब्द की मात्रा को गिरा सकते हैं laai में लाने के लिए,,,
पर वही मात्राए जिन्हें गिराने की इजाजत आपकी जबान दे दे,,,,,
मैंने क्यूंकि बहर को जाना नहीं है या कहे के पढा नहीं है,,,,इसलिए ये बताना मेरे लिए मुश्किल है के कौन सी मात्राए कैसे और क्यूं गिराई जा सकती है ,,,,,ये तो मैं सामने बैठकर ही कह सकता हूँ,,,लिख कर नहीं,,,,पर कही कही देखा गया है के बहुत से लोग मात्रा को उस जगह गिराते हैं जहां पर हमारी जबान इजाजत नहीं देती,,,,ये बात गजल की खूबी को दोष बना देती है,,
चाहे किसी भी किताब का हवाला दिया जाए,,,पर मैं वही मानता हूँ जो मेरा दिल मान ले,,,
लगता है कुछ ज्यादाही हो गया,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
अच्छा,अच्छा....मनु जी, अब अपनी मोटी बुद्धि में आया कि आप क्या कह गये थे. आज तक हिन्दयुग्म को जानने के पहले कभी भी इस बहर नाम को नहीं सुना था. अपनी अल्प बुद्धि पर शर्म व तरस आ रहा है. कितना कुछ होता है इस दुनिया में जानने को और अंत दम तक कोई भी सब कुछ नहीं सीख पाता है. लेकिन फिर भी संतुष्ट रहना पड़ता है. आचार्य जी तो हैं ही आचार्य जी पर आप और अजित जी भी माशाअल्लाह. तो बहर का मतलब है Types या प्रकार और इनमें भी मात्राएं होती हैं. इस जानकारी को इतनी अच्छी तरह से समझाकर देने के लिए अति धन्यबाद.

Saturday, May 16, 2009

दोहा गोष्ठी 16 दोहा है सबका सगा


दोहा है सबका सगा, करे कामना पूर्ण.
छंदराज में समाहित, काव्य-शास्त्र सम्पूर्ण..

किसने किससे क्या लिया, पढें-करें अनुमान.
शे'र और कप्लेट का, मिला हमें कुछ ज्ञान..

हुई कुण्डली से तनिक, जिसकी भी पहचान.
गले कुण्डली से मिला, बन रसनिधि-रसखान. .

शन्नो जी!

गुरु जी अब कप-प्लेट का, छोडें चक्कर आप.
पी गिलास में चाय लें, शक्कर डालें नाप..

रखा जैम में क्या कहें, खाएं बस गुलकंद
कपलेट को हम भूलकर, गाएन अपने छंद..

शुद्ध किया मम कार्य को, मिला ज्ञान का नीर.
आभारी हूँ मैं बहुत, चल दोहे के तीर..

इच्छा पूरी मैं करुँ, है सचमुच अनिवार्य
हे ईश्वर! मैं क्या करुँ, पूर्ण हो सके कार्य..

लज्जित मुझे न कीजिये, करके मुझे नमन
मैं अपने श्रद्धा-सुमन, करती रहूँ अर्पन..

मनु जी रहे अलाप अब, बहुत अनोखा राग
अंतरिक्ष पर जाऊंगा, मैं जल्दी ही भाग..

गुरु जी! करिये अब दया, खींचें मनु के कान
मस्ती सारा दिन करें, हुए बहुत शैतान.
पैर कुल्हाडी मार ली, शन्नो ने हो त्रस्त
कहाँ पताका अजित की, खाली है अब हस्त.

मनु जी! वंदन आपका, किया अनूठा काम.
बहर खोजकर ला रहे, दोहा की अभिराम.


मफाइलुन मुत्फ़ाइलुन फेलुन फाल फ़ऊल

कलम पटक कर भाग लीं, शन्नो जी फ़िलहाल.
झपट अजित जी ने कलम, फिर थामी तत्काल..

फ़यिलातुन फेलुन फऊ फ़यिलातुन मफऊल

झंडा ले मनु आ गए, करने फिर उत्पात.
कहते हैं यह काम ना, करें- उठे ज़ज्बात..

फेलुन फेलुन फ़ाइलुन फेलुन फेलुन फाय

काम न मुश्किल था मगर, मुश्किल था यह काम.
काम करा बिन काम के, दोहा-झंडा थाम..
जान बहर को यह लगा, हूँ खुशियों से दूर.
भीतरवाली बहर को, सौत नहीं मंजूर..

बाहर-भीतर के नहीं, पड़ें फेर में आप.
दोनों को गर जान लें, यश पाएंगे आप..

अंगरेजी मन भाया दोहा:
दोहा के चमत्कारिक प्रभाव से अंगरेजी बच नहीं सकी. 'हीरोइक' अर्थात वीर-काव्य में सामान्यतः इसी छंद का प्रयोग किये जाने से इसे 'हीरोइक'' की संज्ञा मिली. इसकी प्रत्येक पंक्ति 'आयम्बिक पञ्चपदी' होती है अर्थात अतुकांत छंद की भांति प्रत्येक पंक्ति में दस शब्दांश होते हैं जिनमें से ५ दीर्घ होते हैं. सामान्यतः हृस्व पद पहले तथा दीर्घ पद बाद में होता है.

यथा-
''to err / is hu' / man, to' / forgive' / divine.''
अर्थात- त्रुटि है मानव-सुलभ, क्षमा करना देवोपम.
(सन्दर्भ- विलियम हेनरी हडसन, अंगरेजी साहित्य का इतिहास, अनु. जगदीशबिहारी मिश्र, पृष्ठ १००, १०९, १३१, १३२, १३९, २१७)
सर्व प्रथम महापंडित-महाकवि मिल्टन (९ दिसम्बर १६०८- ८ नवम्बर १६७४) ने 'पैराडाइस लास्ट' के लिये 'तुकरहित हीरोइक छंद चुना. कालांतर में अतिरंजना व दुर्बोधता की शिकार 'मेटाफ़िजिकल' कवियों की रचनाओं से क्लांत अंगरेजी छंदशास्त्र का सुधार एडमंड बॉलर (१६०५-१६८७) तथा सर जॉन डेग्हम (१६१५-१६६९) ने किया. ड्राइडेन (१६३१-१७००) के अनुसार 'बॉलर से पूर्व तुकांत की श्रेष्ठता और भव्यता का ज्ञान किसी को नहीं था. उसी ने हमें इसका ज्ञान कराया...लेखन को कला बना दिया...बताया कि किस प्रकार प्रत्येक भावः कि समाप्ति दोहे कि दो पंक्तियों में ही की जा सकती है. उसने 'हीरोइक दोहे के 'क्लासिक' ( निमीलित ) रूप को प्रचलित किया जिसमें भाव एक दोहे से दूसरे दोहे में अबाध रूप से न चलकर दूसरी पंक्ति के साथ समाप्त हो जाए. पॉप (१६८८-१७४४) तथा डेनहम ने इसे पूर्णता के शिखर पर पहुँचाया. पॉप के 'एस्से ऑफ़ क्रिटीसिज्म' की प्रसिद्ध पंक्तियों में कवि काव्य-देवी के अश्व को एड लगाने की अपेक्षा उससे पथ- प्रदर्शन की अपेक्षा करता है-''T'is more to guide than spur the Muse's speed,
Restrain his fury, than provoke his speed,
The winged coarser, like a gen'rous horse,
Shows most true mettle when you check his course,
Those rules of old discovere'd not devise'd,
Are Nature still, but nature methodise'd,
By the same laws which tirst herself ordained.
Learn hence for ancient rules a just esteem,
To copy Nature is to copy them.
(लहरों पर नाव -डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ठाकुर)
अर्थात-
काव्य-कल्पना के घोडे को, एड लगा मत वेग बाधाएं.
आवेशों को करें नियंत्रित, मार्ग निदर्शन उससे पायें..
उड़न अश्व की सच्ची प्रतिभा होती केवल तब ही दर्शित.
चालक वल्गा थाम करों में करता हो जब चाल नियंत्रित..
अन्वेषित प्राचीन काल में, नियम नहीं थे केवल कल्पित.
प्रकृति सदृश वे नियम अभी भी, प्रकृति सदृश हैं पूर्ण व्यवस्थित..
स्वंत्रता के सदृश प्रकृति भी रहती है बंधन में.
उन नियमों के, जिन्हें बनाया स्वयं उसीने मन में.
अतः' पुरातन नियमों का सम्मान, उचित करना है.
नियम पालना ही प्रकृति के साथ-साथ चलना है.'

क्लासिकल दोहा छंद का पॉप-रचित निम्न उदाहरण उसके काव्य नैपुण्य का परिचायक है.
'A wits a feather and a chief a rod.
An honest man's the noblestwork of God.'
अर्थात-
वाक-चतुर है पंख और मुखिया है दंड समान.
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति-मानव- जिसमें ईमान..
वाग-विदग्धता के कुहासे से नैसर्गिक रोमांटिकता के उल्लासपूर्ण परिवेश में अंगरेजी दोहा लोकप्रियता के सोपानों पर अभिषिक्त हुआ. वर्ड्सवर्थ (१७७०-१८५०) की पंक्तियों का आनंद लें-
'Bliss was it in that dawn to be alive.
But to be young was very heaven.'
अर्थात-
उस ऊषा में जीवित रहना ही था परमानन्द.
किन्तु युवा होना तो सचमुच ही बस स्वर्गिक था.
कप्लेट-गाथा छोड़ चलें हम, दोहा की रंग-छवियों में-

बुन्देली दोहा-
मन्दिर-मन्दिर कूल्ह रै, चिल्ला रै सब गाँव.
फिर से जंगल खों उठे, रामचंद के पाँव..- प्रो. शरद मिश्र.
छत्तीसगढी दोहा-
चिखला मती सीट अऊ, घाम जौन डर्राय.
ऐसे कायर पूत पे, लछमी कभू न आय.. - स्व. हरि ठाकुर
बृज दोहा-
कदम कुञ्ज व्है हौं कबै, श्री वृन्दावन मांह.
'ललितकिसोरी' लाडलै, बिहरेंगे तिहि छाँह.. -ललितकिसोरी
उर्दू दोहा-
सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत.
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाये गीत.. - निदा फाज़ली
मराठी दोहा- (अभंग)
या भजनात या गाऊ, ज्ञानाचा अभंग.
गाव-गाव साक्षरतेत, नांदण्डयाचा चंग.. -- भारत सातपुते
हाड़ौती दोहा-
शादी-ब्याऊँ बारांता , तम्बू-कनाता देख.
'रामू' ब्याऊ के पाछै, करज चुकाता देख.. -रामेश्वर शर्मा 'रामू भैय्या'
भोजपुरी दोहा-
दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरत उदान.. -- सलिल
निमाड़ी दोहा-
जिनी वाट मं$ झाड़ नी, उनी वाट की छाँव.
नेह, मोह, ममता, लगन, को नारी छे छाँव.. -- सलिल
हरयाणवी दोहा-
सच्चाई कड़वी घणी, मिट्ठा लागे झूठ.
सच्चाई कै कारणे, रिश्ते जावें टूट.. --रामकुमार आत्रेय.
राजस्थानी दोहा-
करी तपस्या आकरी, सरगां मिस सगरोत.
भागीरथ भागीरथी, ल्याया धरा बहोत.. - भूपतिराम जी.

गोष्ठी के अंत में -

कथा विसर्जन होत है, सुनहुं वीर हनुमान.
जो जन जहाँ से आयें हैं, सो तंह करहु पयान..

18 कविताप्रेमियों का कहना है :

Satish Gulati का कहना है कि -
Good Dohas
I liked these
neelam का कहना है कि -
न न करते ,हम भी दोहे पढने लगे ,
चाहते नहीं थे ,फिर भी हम रमने लगे |

बहुत बहुत अच्छी जानकारी ,आभार आपका
आचार्य जी
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी

दोहा कक्षा के माध्‍यम से हमने छंद के बारे में बहुत ज्ञान प्राप्‍त किया। यह सब आपकी मेहनत और धैर्य का ही परिणाम रहा। दोहे का छंद हमेशा आकर्षित करता था लेकिन इसका पूर्ण ज्ञान नहीं था। मात्राओं को गिनने में भी कहीं न कह‍ीं चूक हो ही जाती थी। आपने हमें जो ज्ञान दिया उसके लिए हम सब आपके आभारी हैं। हिन्‍दयुग्‍म के माध्‍यम से कक्षाओं का संचालन सभी के लिए हितकारी है। इसी प्रकार की अन्‍य कक्षाएं भी संचालित की जाएंगी तो सभी का सैद्धान्ति पक्ष और सुदृढ होगा। पुन: आभार।
रश्मि प्रभा... का कहना है कि -
प्रत्येक दोहे में एक सार्थकता है,और रोचकता....
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी प्रणाम,

आप कक्षा में आये. अद्भुत! बहुत अच्छा लगा. हमें लग रहा था कि आप हमें छोड़कर कहीं चले गये हैं. और मनु जी रोने-रोने को हो आये थे.

कक्षा के साथिओं आपसे कुछ कहना है यहाँ.

और आचार्य जी, उर्फ़ Our Great Master of Doha-kaksha:

I have brought some of my own Hindi - Dohas
And turned them into couplets to your delight
Have no complaints now, hope they amuse you
Don't taunt me either, and take pity on my plight.

1.
क्यों इतना मचा रखा, सबने यहाँ द्वंद
अंग्रेजी में हो रहे, अब यह दोहा-छंद.

What's wrong, and this fuss all about
Now English couplets in, hindi - Dohas out.

2.
ना भागी मैदान से, और ना कन्फ़ूज़न
अब यहाँ पर हो रहा है, दोहों का फ्यूजन

I havn't run away nor am confused
Master now wants doha-couplet fused

3.
गुरु जी का व्यंग सुना, कान नहीं हैं बन्द
मुझे तो अब मुदित करें, अपने दोहा - छंद.

I heard Master's taunts but my ears are not shut
I still prefer Dohas instead of English Couplets.

4.
अपने गुरु जी हैं बने, अंग्रेजी के भक्त
कक्षा में पलट दिया, अब मेरा ही तख्त.

Now our Guru ji have become a devotee of English
Having turned tables on me is wallowing in it's bliss.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
I have noticed I made a slight grammatical mistake by using the wrong verb in a sentence, unintentionally.

'Now our Guru ji have become a devotee of English.'
Instead of 'have' the right verb is 'has'.
manu का कहना है कि -
क्या बात है शन्नो जी,,,,,,,
कमाल किया है आपने,,,,,और शुक्र है के ट्रांसलेट भी कर दिया वरना दिक्कत हो जाती हमें तो,,,,
मजा आ गया ,,,,,, आपको बहुत बहुत बधाई,,,,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
एक और संशोधन:
3.
गुरु जी का व्यंग सुना, कान नहीं हैं बन्द
मुझे तो अब मुदित करें, अपने दोहा-छंद.

I heard Master's taunts as my ears are not shut
I still prefer Dohas instead of English Couplet.

Another unintentional mistake :

In the first line of couplet 'As' is right here because 'but' changes it's meaning.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,

समझाने की आपको, मेरी नहीं बिसात
प्रतिभावान हैं स्वयं, देते सबको मात.

For thinking of me so high you are too kind.
But talented as you are you leave us all behind.
Harihar का कहना है कि -
अभिभूत हूँ - आचार्यजी की व्याख्या से
और शन्नोजी की प्रतिक्रिया से ।
Ria Sharma का कहना है कि -
आचार्य जी ज्ञानवर्धन का बहुत आभार..
यथा - पढ़कर मन अति आनंदित हो गया
नमन है आपको मेरा !!

शन्नो जी तो मेरिट लिस्ट वाली छात्र हो गई हैं..बहुत खूब लिखतीं हैं

मनु जी ..दोहों में भी महारथ?? talented student :)
divya naramada का कहना है कि -
हरिहर और सतीश से, मिल दोहा परिवार.
है प्रसन्न, आ गया है, सब पर नवल निखार..

नीलाभित नीलम करे, सेहर-मन को मुग्ध.
रश्मि प्रभा की कांति वर, गंगा लगतीं दुग्ध..

मनु बहरों को बताते, बहरों के गुण खूब.
अलंकार यह यमक है, इसे समझ लें डूब..

जनगण-मन होता अजित होती है सरकार.
द्वेष श्लेष से मत करें, बिखरें बारम्बार..

शन्नो जी सोनेट को, आप न जाएँ भूल.
हिंदी-अंग्रेजी हुईं, ठंडी-ठंडी-कूल..

हिंदी मैया धारती, भाँति-भाँति के रूप..
कुछ की रंगत दिखाता, दोहा दिव्य अनूप..

शेष रहे जो लाइए, खोज-खोज कर मीत.
मन जीतें मन हारकर, मन हारें मन जीत..

छिपा न भागा था 'सलिल', गया राम के धाम.
लखनऊ हो लौटा तुरत, करता विनत प्रणाम..

दोहा ना आउट हुआ, कप्लेट हुआ न इन.
शन्नो जी संग नाचता, ता-ता-ता-ता-धिन..

फ्यूजन कन्फ्यूजन नहीं, और न इंग्लिश-भक्त.
हम सबमें है एक ही, हिंदी माँ का रक्त..

गिरतीं मिस मिस्टेक से, झेंपें बिन मिस्टेक.
फिर उठतीं मिस टेक कर, नैना होते लेक..

आँसू औ' मुस्कान दे, पूरे हुए चुनाव.
भाव किसी का बढ़ गया, गर किसी का भाव..

होमवर्क यह लाइए, कुछ दोहे सरकार.
जो कह दें सरकार से, कैसी हो सरकार..
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आदरणीय आचार्य जी,

सोंनेट का वादा रहा, पूरा करुँ जरूर
समय की तंगी से कुछ, मैं बेहद मजबूर
मैं बेहद मजबूर, कहीं को अब है जाना
फिर हैं कार्य अन्य, यह ना कोई बहाना
शन्नो बेबस बहुत, काम ज़रा हैं ज्यादा
कभी पूरा होगा, सोंनेट का भी वादा.


तो अब गुरुवर दें मुझे, जाने की इजाज़त
आ ना जाये कहीं से , फिर कोई मुसीबत.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी, गुड मोर्निंग

आपने भड़काया जो, यह है अब प्रतिक्रिया
दोहे सीखे आपसे, तर्क हमें आ गया.

दोहे-कप्लेट से अब, मैं हो गयी टुन्न
नाच-नाच कर हो गये, पैर मेरे सुन्न.

देख रहे हैं लोग सब, बहुत और नचैया
मनु, अजित अब नाचेंगें, यहाँ ता-ता थैया.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,

''सोनेट का वादा रहा'' में १४ मात्राएँ हो गयी हैं (क्यों, क्यों, क्यों हो जाती हैं यह गलतियाँ???)
इसलिये:
''सोनेट का वादा भी'' समझियेगा जैसा आखिर के चरण में है.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
शन्‍नो जी दोहा रचे, मनुजी बांचे शेर
ये दोनो ही प्रथम हैं, हम तो होते ढेर।
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,

आप ढेर तो बहुत हैं, पर न हुये हैं ढेर
मनु अगर शेर हैं यहाँ, तो आप सवा सेर.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
सॉरी, आचार्य जी वह आप नहीं थे अजित जी थीं. मैं अजित जी को आप समझ बैठी थी.

अजित जी,
दिमाग जरा उलझन में है, इसलिए कन्फयूजन हो गया. गुरु जी को संबोधित कर गयी मैं. अब मैं क्या करुँ? वह मुझे धिक्कार रहे होंगे और शायद मन ही मन में कोस भी रहे होंगे. कोई बात नहीं आजकल जरा चिकना घड़ा बनने की कोशिश कर रही हूँ. तो चलिए फिर से लिखती हूँ आपके लिए:

आप ढेर तो बहुत हैं, पर न हुयी हैं ढेर
पकडे झंडा आप हो, मनु अगर सवा सेर.

दोहा गाथा सनातन: १५ २ / ६ मई २००९

Saturday, May 02, 2009

दोहा गाथा सनातन: 15- रम जा दोहे में तनिक


रम जा दोहे में तनिक, मत कर चित्त उचाट.
ध्यान अधूरा यदि रहा, भटक जायेगा बाट..
दोहा की गति-लय पकड़, कर किंचित अभ्यास.
या मात्रा गिनकर 'सलिल', कर लेखन-अभ्यास..
भ्रमर सुभ्रामर से मिले, शरभ-श्येन को जान.
आज मिलें मंडूक से, मरकत को पहचान..
अट्ठारह-बारह रहें, गुरु-लघु हो मंडूक.
सत्रह-चौदह से बने, मरकत करें न चूक..


१८/१२ - मंडूक

जाको राखे साइयाँ, मार सके ना कोय.
बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय..
राम निकाई रावरी, है सभी कौ नीक.
जो यह साँची है सदा, तौ नीकौ तुलसीक..
 संत तुलसीदास

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच.
काम जु आवै कामरी, का लै करै कमाँच..
 संत तुलसीदास

पिय को जिय जासो रमै, सोई ज्येष्ठा होइ.
आनि कनिष्ठा जानिए, कहै सयाने लोइ..
 तोष कवि

बानी तो पानी भरै, चारू बेद मजूर.
करनी तो गारा करै, साहब का घर दूर..
 -कबीर

दोहा में होता सदा, युग का सच ही व्यक्त.
देखे दोहाकार हर, सच्चे स्वप्न सशक्त..
 - सलिल

कोई नहीं विकल्प हो, फिर भी एक विकल्प.
पूरी श्रृद्धा से करुँ, मैं प्रार्थना अनल्प..
 - चंद्रसेन 'विराट'

१७/१४ - मरकत

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय.
मीठी बानी बोल के, जग बस में कर लेय..
रूप नहीं रेखा नहीं, नाहीं है कुल-गोत.
बिन देही का साहिबा, झिलमिल देखूं जोत..
 - संत सिंगाजी

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय.
माली सींचै सौ घडा, ऋतु आये फल होय..
 -स्वामी प्राणनाथ

कानों में अब शूल सी, चुभती मंद बयार.
खेतों में दिखने लगा, श्वेत कपासी प्यार.. 
अशोक गीते

मोह एक आसक्ति है, और प्रेम है मुक्ति.
जहाँ मुक्ति होती नहीं, वहां सिर्फ पुनरुक्ति..
 -सुरेश उपाध्याय

द्वार खुले ही रह गए, तूने दिया न ध्यान.
क्यों तेरे घर में नहीं, घुस आएगा श्वान?.
 - डॉ. अनंत राम मिश्र 'अनंत'

चहरों की होती नहीं, अपने से पहचान.
दर्पण भी अंधा हुआ, है खुद से नादान..
 डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी

दोहा दरबार के २३ रत्नों में से ६ से आपका परिचय हो चुका है. इनके जितना निकट आयेंगे उतना ही अधिक आनंद आएगा.

गृह कार्य:

१. उक्त ६ प्रकार के दोहों को बार-बार पढें यह देखें कि इनकी लय में क्या अंतर है? लय को पकड़ सकें तो बिना मात्रा गिने भी इन्हें लिख सकेंगे.

२. खुसरो को दोहों की विशेषता बताइये. ये दोहे आपको क्यों पसंद हैं अथवा क्यों पसंद नहीं हैं? गोष्टी में इस बिंदु पर चर्चा करना उपयोगी होगा.

३. आप में से हर एक कबीर का कम से कम एक-एक दोहा लाये और कबीर तथा खुसरो के दोहों की भाषा तथा कथ्य पर ध्यान देकर अपनी बात टिप्पणी में दे.

४. ऊपर विविध समयों के दोहकारों के दोहे दिए गए हैं. समकालिक दोहकारों को आप भाषा और कथ्य से जान लेंगे. उनकी कहन और कथन पर ध्यान दें. इससे आज के दोहों का शिल्प और भाव समझने में मदद मिलेगी.

दोहों का पत्राचार और टिप्पणी में प्रयोग कीजिये. सोरठा, रोला और कुण्डली का अभ्यास करते रहिये.
अब एक सलाह दीजिये कि इस दोहा गाथा को इसी तरह चलने दिया जाए, संक्षिप्त कर समाप्त किया जाए या आगे और गहराई में उतरा जाये? यह आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा है. आपमें से बहुमत जैसा चाहेगा वैसा ही रूपाकार रखा जायेगा. यह उबाऊ हो रहा हो तो भी निस्संकोच संकेत करें.

अब कक्षा समाप्त करने के पूर्व दोहा छुपल में सुनिए एक और सच्चा किस्सा:

रज्जब तू गज्जब किया...निर्गुण पंथ से सादृश्यता रखते दादूपंथ के संस्थापक संत दादू दयाल (संवत १६०१, अहमदाबाद- संवत १६६०, नारना, जयपुर) साबरमती नदी में शिशु के रूप में बहते हुए लादी राम नामक ब्राम्हण को मिले थे. दादू के दोहों में हिंदी, गुजराती, राजस्थानी तथा पंजाबी का प्रयोग हुआ है. इनकी विषय वास्तु अलौकिक प्रेम तत्व की सरस व्यंजनासतगुरु महिमा, ईश्वर की व्यापकता, भौतिक जग की क्षण भंगुरता तथा आत्म बोध है. दादू के कुछ दोहो का आनंद लीजिये-

घीव दूध में रमि रहा, व्यापक सब ही ठौर.
'दादू' बकता बहुत है, माथि काढे ते और..
साध मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास.
'दादू' संगत साधू की, अविगत पावै आस..
'दादू' देख दयाल को, सकल रहा भरपूर.
रोम-रोम में रमि रह्या, तू जनि जाने दूर..
केते पारिख पच मुए, कीमती कही न जाइ.
'दादू' सब हैरान हैं, गूंगे का गुड खाइ.
जब मन लागे राम सौं, अनत काय को जाइ.
'दादू' पाणी-लूण ज्यों, ऐसे रही समाइ..


दादू के प्रमुख ५२ शिष्यों में से एक आमेर शहर के निवासी रज़्ज़ब भी थे. दादू बहर यात्रा पर गए तो घरवालों ने अपनी मुहब्बत का वास्ता देकर रज़्ज़ब को विवाह के लिए मजबूर कर दिया. बेमन से रज़्ज़ब को जमा पहनकर, सर पर सेहरा बांधकर मौर सजाये घोडे पर बैठना पड़ा. उन्होंने बहुत कोशिश की कि बच सकें पर उनकी एक न चली. तब उन्होंने अपने गुरु दादू को याद किया. गुरु शिष्य की पुकार कैसे अनसुनी करते? रज़्ज़ब बारात के साथ गाजे-बजे के साथ जा रहे थे कि अचानक गुरु दादू दिखाई पड़े. रज़्ज़ब ने गोदे पर बैठे-बैठे ही गुरु को प्रणाम किया. दादू ने आशीष देते हुए उच्चस्वर में एक दोहा कहा जिसे सुनते ही रज़्ज़ब सेहरा फेंककर घोडे से कूदकर आँखों में आँसू भरे हुए गुरु के श्री चरणों में लोटने लगा. गुरु ने उसे उठाकर ह्रदय से लगाया और दीक्षा दी, कोई रोक नहीं पाया. रज़्ज़ब को सांसारिक मोह-जाल से बचाकर भक्ति-मार्ग पर ले जानेवाला दोहा सुनिए-

रज़्ज़ब तू गज्ज़ब किया, सर पर बांधा मौर.
आया था हरि-भजन को, जाता है किस ओर..


कालांतर में रज़्ज़ब खुद भी सिद्ध संत हुए. उनका भी एक दोहा पढिए-

रज़्ज़ब जाकी चाल सों, दिल न दुखाया जाय.
जहाँ खलक खिदमत करे, उत है खुसी खुदाय..
निराकार-निर्गुण भजै, दोहा खोजे राम.
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम..

31 कविताप्रेमियों का कहना है :

Arun Mittal "Adbhut" का कहना है कि -
!!!! "अद्भुत" !! ये ज्ञान तो विलक्षण हैं, सलिल जी मेरा प्रणाम स्वीकार करें मैं तो सामान्य लय में आने वाले तथा मात्राओं का पालन करने वाले मिसरों को जोड़कर देहे लिखता था, पर दोहे के भी प्रकार होते हैं मालूम न था इस पर तो कडा अभ्यास करना पड़ेगा, मैं तो प्रिंट आउट निकाल कर रख रहा हूँ पढता रहूँगा धीरे धीरे.
सच कह रहा हूँ
"दोहा छोटा हैं नहीं, फैला ज्ञान अपार
दोहे की महिमा अजब, अद्भुत है संसार

मुझे नहीं पता उपरोक्त में दोहे का कौन सा प्रकार है

सादर
अरुण अद्भुत
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
शुभ प्रभात

आपकी सेवा में यह दोहे लायी हूँ. कुछ और भी आज दोबारा आकर प्रस्तुत करूंगी.

जबसे करने मैं लगी, हिन्दयुग्म पे सैर
हर दिन नयी आस मिले, अपने लगते गैर.

घर बैठे करने चली, पूरे चारों धाम
यात्रा तो चलती रहे, पैर करें आराम.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्यजी
आपके आदेश का पालन किया है परन्‍तु सही है या नहीं इसका निर्णय तो आप ही करेंगे। इस कक्षा में आपने खुसरो के बारे में चर्चा प्रारम्‍भ की है। वैसे तो हम हिन्‍दी साहित्‍य के विद्यार्थी नहीं हैं लेकिन फिर भी मैंने यह जाना है कि खुसरो दरबारी कवि थे और उन्‍होंने सात बादशाहों के लिए सृजन किया था। उनके दोहों में प्रेम प्रसंग अधिक है।
कबीर संत थे अत: उनके दोहों में दर्शन है।
दो-दो दोहे दोनों के ही प्रस्‍तुत हैं -
गोरी सोवत सेज पे मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस

खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग
तन मेरो मन पीउ को दोऊ भये एक रंग

चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय
दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय
जो मन खोजा आपणा मुझसे बुरा न कोय।

आपने कक्षा के बारे में जानकारी चाही है। हमें शेष छंदों का भी ज्ञान करना है। यदि संक्षिप्‍त में भी बताएंगे तो चलेगा।
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी,
मैंने आज सुबह दो दोहे भेजे थे और अब उनके प्रकार जानने की कोशिश की. किन्तु जितने प्रकार अब तक बताये हैं आपने उनमे से वह मैच नहीं किये. दिमाग चकरा रहा है.

जबसे करने मैं लगी, हिन्दयुग्म पे सैर =१६+८ =२४
हर दिन नयी आस मिले, अपने लगते गैर = १२+१२ =२४

२८+२० इसे क्या बोलूँ? क्या प्रकार है? समझायिए.

घर बैठे करने चली, पूरे चारों धाम =१८+६
यात्रा तो चलती रहे, पैर करें आराम. =१८+६

३६+१२ और यह किस प्रकार का है? कृपया इसके बारे में भी बतायिए. बिना अच्छी तरह समझे रूचि लेने में बाधा हो रही है. धन्यबाद.
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
दोहा कक्षा को आगे बढाए | हो सके तो कुछ दिनों तक दोहराने की कक्षा रख , अभ्यास करवा लीजिये |

आपके इस सराहनीय कोशिश के लिए धन्यवाद |

अवनीश तिवारी
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
शान्‍नो जी
आप गुरू की मात्रा को भी एक ही गिने, हमें कुल गुरू मात्रा कितनी हैं यह देखना है। तब यह संख्‍या होगी 14 + 20 = हंस
18+12 = मंडूक
manu का कहना है कि -
शुक्र है ये टेंशन भरा काम हमें नहीं मिला,,,,
अजित जी को मिला है,,,,
:::::::::::)))))))
पर आचार्य कितने दिन की छुटी पर जा रहे है आप,,,,,,,,,?????
अंग्रेज (शन्नो जी) के दोहे अच्छे लगे...जी हाँ मेरे वाली पोस्ट पर पूरा का पूरा आखिरी कमेंट शुद्ध अंग्रेजी में चिपका रखा है.....कहीं कहीं से तो पल्ले बी नहीं पडा,,,,हिंद युग्म पर ये हाल..?

और हाँ ,अजित जी को भी बधाई ,,,अपना काम पूरे ध्यान से देखने के liye,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
अजित जी,
मेरी उलझन सुलझाने का बहुत धन्यबाद. लेकिन जो उदाहरण देखे सबके दोहों के तो वहां गुरु, लघु की मात्राओं को दुगना करके दिखाया गया है. एक दोहे के दोनों पंक्तिओं के लघु की मात्राओं को जोड़कर करके और फिर सारी गुरु मात्राओं को आपस में जोड़कर और फिर दुगना करके तब दोहे के नाम को बताया गया है. हर दोहे में यही देखा. जितनी मात्राएँ अपने दोहों में मैंने देखीं उतनी किसी भी दोहे में नहीं दिखीं मुझे. इसीलिए confusion हो गया.
आपके चियाँ पर लिखे दोहों का खूब आनंद उठा रही हूँ. अच्छा लगता है पढ़कर कि चियाँ आपको खूब प्रेरणा दे रही है. उसे मेरा ढेर सारा आशीर्वाद. और आप अपनी पताका आराम से फहराती रहें. लगता है गुरु जी किसी महफ़िल में बैठे झूम रहे होंगें. बतायिएगा नहीं उन्हें कि मैंने क्या बोला है. ssshhh...
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी, किस अंग्रेजी की बात हो रही है यहाँ? एक्स्कूज़ मी! अब हम हिंदी में स्पीकिंग. ओ.के? आपकी टेंशन इतनी जल्दी नहीं जाने वाली. गुरु जी किसी भी समय इस लेथन में आपको डालने वाले हैं. तब तक गिनती गिनिये और शुक्र मनाइये. एक-आध भजन गा कर मन को शांत करिये.

मन रक्खें अपना दुरुस्त, बनें काम में चुस्त =१३+11
चाय-शाय पीते रहें , कक्षा में न हों सुस्त. =१३+11

यह दोहा मेरी तरफ से आपके लिए होमवर्क (दोहा की पहेली) है. कृपा करके आन्सर ढूंढ कर लाइए और बताइये कि यह किस प्रकार का दोहा है. ओ.के.??
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी, प्रणाम

आपके दिये गये गृह-कार्य के बारे में:

१. लय देख ली और बिचार किया.
२. खुसरो साहिब का एक दोहा है:

सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग है रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत.

इनके दोहों में भक्ति- भाव झलकता है. इस विशेषता से इनके दोहे अच्छे लगते हैं.

३. अब कबीर जी का एक दोहा है:

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय
अपना मन शीतल करें, औरन को सुख होय.

इनके दोहों में सीखें हैं. इस दोहे में सीख है कि मधुर शब्द बोलो ताकि इससे सदभाव व एकता बढे. ऐसा करके अपने को भी अच्छा लगता है और दूसरे को भी. लेकिन कड़वे व कठोर वचन बोल कर नफरत पैदा होती है और सुनने वाले के मन को तकलीफ पहुँचती है. पूरे मन से कोशिश करिये कि दूसरों का मन न दुखने पाये.

४. दोहाकारों के कथन पर ध्यान दूंगी (कोशिश करूंगी) .
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
मनुजी, ज्‍यादा खुश मत होइए। यह तो शिक्षक-प्रशिक्षण वाली कक्षाएं हैं। अगली कक्षा आपको ही लेनी है। मेरे सर की टोपी शीघ्र की आपके सर पर आने वाली है। तैयार रहिए। गए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास वाली बात हो गयी है। आचार्य जी ने एक और गृह-कार्य दे दिया है, वैसे ही गर्मी बहुत है, पसीने छूट रहे हैं। आप सभी की शुभकामनाएं चाहिए।
वैसे शन्‍नोजी जैसे छात्र कक्षा में हों तब आनन्‍द तो पूरा मिलता है। मैं तो उन्‍हीं के प्रश्‍नों की प्रतीक्षा करती हूँ। बड़े ही मजेदार होते हैं। शन्‍नों जी अब शायद आपको भी दोहे के 23 प्रकार समझ आने लगे होंगे। मात्राओं की संख्‍या गिननी है उनका वजन नहीं।
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
अजित जी,
आपकी टिप्पणी पढ़कर मुझे बड़ा मजा आया. हंसी आई जानकर कि आपका गृह-कार्य 'दुगना' हो गया है गुरु जी की तरफ से.....तो आप अपना भी गृह-कार्य करिए और हमारे भी गृह-कार्य का मुआयना करती रहें.....(आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास..क्या बात!) गर्मी में पसीना तो छूटेगा ही...खासतौर पर एक और एक्स्ट्रा टोपी पहनकर. मेरी सहानुभूति और शुभकामनाएं दोनों ही आपके साथ हैं. मनु जी घबरा रहे होंगे यह बातें सुनकर. आप दोनों गर्मी में एक दूसरे के सर पर अपनी-अपनी टोपी फिट करने के चक्कर में हैं. तो आपस में विचार-विमर्श करिए. (ही..ही..) फिर मैं प्रस्थान करती हूँ...
'मैं चली, मैं चली, मैं चली यह ना पूछो कहाँ.......
लौट के फिर से मुझे आना होगा यहाँ.....'
manu का कहना है कि -
मन रक्खें अपना दुरुस्त, बनें काम में चुस्त =१३+11
चाय-शाय पीते रहें , कक्षा में न हों सुस्त. =१३+11

कक्षा में हो सुस्त तो बोलो क्या कर लोगी...?
टीप टाप टिपण्णी ही टोपी पर डालोगी.......?
कहे मनु जो कुछ भी हिंद युग्म पर लिक्खें .
अंगरेजी के बदले हिंदी मन में रक्खें

आचार्य जी,
अभी तो कुंडली तक भी नहीं पहुंचा था और आप ने सीधे रेल सी चला दी...
सब तो अजित जी जैसे मेहनती नहीं हो सकते ना,,,?
aur mere sir pe to pahle hi ek adad topi hai.....
manu का कहना है कि -
हे राम,
हम कुंडली लिखते रह गए और हमसे पहले कमेंट १२ वाँ कमेंट चिपका दिया,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
देखिये, अजित जी, टोपी वाले ने चुपचाप हमारी बातें सुन ली हैं और अब मुझे धमकी मिल रही है कि.. 'क्या कर लोगी'. लगता है कि गर्मी में दिमाग का पारा भी चढ़ गया है. और कक्षा में पंगा तक की नौबत आ गयी है.. बोलिए अब क्या करूं?...आप तो इंचार्ज हैं कक्षा की. जानती हूँ कि आप को और पसीने आने लगे होंगे यह सब देखकर, लेकिन आपकी पोजीशन जो है उसमे आपको कुछ और पॉवर भी तो मिली होंगीं.?????

और ओ टोपी वाले, अब दे यह भी बता
भाग जाये कर गिटपिट, यह ना मेरी खता.

(खुद तो अंग्रेजी में हिंदी बोल के लोग चले जाते हैं.. और मुझे धमकी देते है फिर. अपने को तो ध्यान नहीं रहता..और चले हैं हमें बताने.....हून्ह्ह....) क्या धांधलेबाजी है? घोर अंधेर!
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
बच्‍चे बहुत शरारती, करते धी्गामस्‍त
गुरुजी छुट्टी पर गए, मॉनीटर है पस्‍त
मॉनीटर है पस्‍त, सम्‍भाले कक्षा कैसे
टोपी-टोपी खेल, लड़त हैं इच्‍छा जैसे
वितनी सुन अजित की, यहाँ सब मन के सच्‍चे
गुरुजी कुछ न कहना, यहाँ है सारे बच्‍चे।
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी के आदेशानुसार दोहे की समस्‍त कक्षाओं का सार यहाँ प्रस्‍तुत है।
दोहा - कक्षा - सार
दोहे की कक्षाओं में हमने अभी तक जो भी ज्ञान प्राप्‍त किया है उसका सार-संक्षिप्‍त यह है -
1- दोहे की दो पंक्तियों में चार चरण होते हैं।
2- प्रथम एवं तृतीय चरणों में 13-13 मात्राएं होती हैं ये विषम चरण हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 11-11 मात्राएं होती हैं और ये सम चरण हैं। 3- द्वितीय और चतुर्थ चरण का अन्तिम शब्‍द गुरु-लघु होता है। जैसे – और, खूब, जाय आदि। साथ ही अन्तिम अक्षर समान होता है। जैसे द्वितीय चरण में अन्तिम अक्षर म है तो चतुर्थ चरण में भी म ही होना चाहिए। जैसे – काम-राम-धाम आदि।
4- गुरु या दीर्घ मात्रा के लिए 2 का प्रयोग करते हैं जबकि लघु मात्रा के लिए 1 का प्रयोग होता है। 5- दोहे में 8 गण होते हैं जिनका सूत्र है – यमाताराजभानसलगा। ये गण हैं-
य गण – यमाता – 122
म गण – मातारा – 222 त गण – ताराज – 221 र गण – राजभा – 212 ज गण – जभान – 121 भ गण – भानस – 211 न गण – नसल – 111 स गण – सलगा – 112 6- दोहे के सम चरणों के प्रथम शब्‍द में जगण अर्थात 121 मात्राओं का प्रयोग वर्जित है।
7- मात्राओं की गणना – अक्षर के उच्‍चारण में लगने वाले समय की द्योतक हैं मात्राएं। जैसे अ अक्षर में समय कम लगता है जबकि आ अक्षर में समय अधिक लगता है अत: अ अक्षर की मात्रा हुई एक अर्थात लघु और आ अक्षर की हो गयी दो अर्थात गुरु। जिन अक्षरों पर चन्‍द्र बिन्‍दु है वे भी लघु ही होंगे। तथा जिन अक्षरों के साथ र की मात्रा मिश्रित है वे भी लघु ही होंगे जैसे प्र, क्र, श्र आदि। आधे अक्षर प्रथम अक्षर के साथ संयुक्‍त होकर दीर्घ मात्रा बनेंगी। जैसे – प्रकल्‍प में प्र की 1 और क और ल्‍ की मिलकर दो मात्रा होंगी।
8- जैसे गजल में बहर होती है वैसे ही दोहों के भी 23 प्रकार हैं। एक दोहे में कितनी गुरु और कितनी लघु मात्राएं हैं उन्‍हीं की गणना को विभिन्‍न प्रकारों में बाँटा गया है। जो निम्‍न प्रकार है -
१. भ्रामर २२ ४ २६ ४८
२. सुभ्रामर २१ ६ २७ ४८
३. शरभ २० ८ २८ ४८
४. श्येन १९ १० २९ ४८
५. मंडूक १८ १२ ३० ४८
६. मर्कट १७ १४ ३१ ४८
७. करभ १६ १६ ३२ ४८
८. नर १५ १८ ३३ ४८
९. हंस १४ २० ३४ ४८
१०. गयंद १३ २२ ३५ ४८
११. पयोधर १२ २४ ३६ ४८
१२. बल ११ २६ ३८ ४८
१३. पान १० २८ ३८ ४८
१४. त्रिकल ९ ३० ३९ ४८
१५. कच्छप ८ ३२ ४० ४८
१६. मच्छ ७ ३४ ४२ ४८
१७. शार्दूल ६ ३६ ४४ ४८
१८. अहिवर ५ ३८ ४३ ४८
१९. व्याल ४ ४० ४४ ४८
२०. विडाल ३ ४२ ४५ ४८
२१. श्वान २ ४४ ४६ ४८
२२. उदर १ ४६ ४७ ४८
२३. सर्प ० ४८ ४८ ४८
दोहा छंद के अतिरिक्‍त रोला, सोरठा और कुण्‍डली के बारे में भी हमने जानकारी प्राप्‍त की है। इनका सार भी निम्‍न प्रकार से है - रोला – यह भी दोहे की तरह ही 24-24 मात्राओं का छंद होता है। इसमें दोहे के विपरीत 11/13 की यति होती है। अर्थात प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं। दोहे में अन्‍त में गुरु लघु मात्रा होती है जबकि रोला में दो गुरु होते हैं। लेकिन कभी-कभी दो लघु भी होते हैं। (आचार्य जी मैंने एक पुस्‍तक में पढ़ा है कि रोला के अन्‍त में दो लघु होते हैं, इसको स्‍पष्‍ट करें।)
कुण्‍डली – कुण्‍डली में छ पद/चरण होते हैं अर्थात तीन छंद। जिनमें एक दोहा और दो रोला के छंद होते हैं। प्रथम छंद में दोहा होता है और दूसरे व तीसरे छंद में रोला होता है। लेकिन दोहे और रोले को जोड़ने के लिए दोहे के चतुर्थ पद को पुन: रोने के प्रथम पद में लिखते हैं। कुण्‍डली के पांचवे पद में कवि का नाम लिखने की प्रथा है, लेकिन यह आवश्‍यक नहीं है तथा अन्तिम पद का शब्‍द और दोहे का प्रथम या द्वितीय भी शब्‍द समान होना चाहिए। जैसे साँप जब कुण्‍डली मारे बैठा होता है तब उसकी पूँछ और मुँह एक समान दिखायी देते हैं।
उदाहरण –
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज वोट बिके हैं रोज, देश की चिन्‍ता किसको भाषण पढ़ते आज, बोलते नेता इनको हाथ हिलाते देख, यह मनसा राजतन्‍त्र की लोक कहाँ हैं सोच, हार है लोकतन्‍त्र की।

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान.
चंचल जल दिन चारि को, ठाऊँ न रहत निदान.
ठाऊँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै.
मीठे बचन सुने, बिनय सब ही की कीजै.
कह गिरिधर कविराय, अरे! यह सब घट तौलत.
पाहून निशि-दिन चारि, रहत सब ही के दौलत.

सोरठा – सोरठा में भी 11/13 पर यति। लेकिन पदांत बंधन विषम चरण अर्थात प्रथम और तृतीय चरण में होता है। दोहे को उल्‍टा करने पर सोरठा बनता है। जैसे -
दोहा: काल ग्रन्थ का पृष्ठ नव, दे सुख-यश-उत्कर्ष.
करनी के हस्ताक्षर, अंकित करें सहर्ष.

सोरठा- दे सुख-यश-उत्कर्ष, काल-ग्रन्थ का पृष्ठ नव.
अंकित करे सहर्ष, करनी के हस्ताक्षर.

सोरठा- जो काबिल फनकार, जो अच्छे इन्सान.
है उनकी दरकार, ऊपरवाले तुझे क्यों?

दोहा- जो अच्छे इन्सान है, जो काबिल फनकार.
ऊपरवाले तुझे क्यों, है उनकी दरकार?
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
अजित जी, (उर्फ़ मानीटर जी)
गुरु जी की अनुपस्थिति में आप उनकी आज्ञा अनुसार अपने कन्धों पर डाले हुए बोझ को आसानी से संभाल रही हैं इसकी प्रशंशा के लिए जितना कहूं उतना कम होगा. आप सारी कक्षा को संभाल रही हैं, सबकी नादानियों को बर्दाश्त कर रही हैं और फटाफट पसीने को पोंछते हुए सारे दोहो का सार भी निचोड़ कर रख दिया हैं हमारे सामने. वाह! वाह! मानीटर हो तो ऐसा. आपने तो कमाल कर दिया. आपने इतने पुन्य का काम करके हम जैसे कितने ही निखट्टू लोगों का भला किया है कि आप इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकती हैं. अगर मैंने टोपी पहनी हुई होती तो मैं जरूर आपके सम्मान में उसे उतार कर प्रणाम करती (मेरा मतलब टोपी को नहीं आपको प्रणाम करती). (इशारा, इशारा, इशारा.....) लेकिन वैसा न होने पर मैं नतमस्तक होती हूँ. इस एक्स्ट्रा कार्य-भार को इस खूबी से निभाना अपने आप में एक बहुत बड़ी कला है. सबकी शैतानियों से आप बहुत त्रस्त लग रही हैं, फिर भी आप किसी को भी दंड नहीं दे रही हैं, कितना विशाल है आपका ह्रदय. मैं भी बताना चाहती हूँ कि:

टोपी वाला हो गया, बहुत अधिक उद्दंड
गुरु जी आयेंगें जभी, देंगें उसको दंड.
देंगें उसको दंड, छेड़ दिया यहाँ प्रसंग
आता है देर से, है करता सबको तंग
डर से शन्नो कहे, लगे जो भोला-भाला
उत्तर न दे पूरे, नाम है टोपी वाला.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
शन्‍नो जी
आपकी चुहलबाजी से कॉलेज जीवन याद आ गया। हम सब एक ही कक्षा के विद्यार्थी हैं और आपने इस कक्षा को जीवन्‍त कर दिया है। आप से एक शिकायत है, आपका ब्‍लाग पर फोटो तक उपलब्‍ध नहीं है, आप अपनी जन्‍मकुण्‍डली तो उपलब्‍ध कराएं। आचार्य जी ने सचमुच में गुरुतर गृहकार्य दे दिया था, उसे पूरा करने का उत्‍साह आप सभी से मिला। अभी एक और कार्य है, वो थोड़ा अधिक कठिन है लेकिन गुरु की आज्ञा शिरोधार्य। चलिए अपना पूरा परिचय दें, जिससे मित्रता पक्‍की हो सके।
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
अजित जी,

सारे नियमों को एक साथ रखने के लिए धन्यवाद|
यह मैंने शुरू किया था , लेकिन जब आपने कर दिया है तो मैं रुक रहा हूँ |

यह सब बहुत योयोगी है |
धन्यवाद |
अवनीश तिवारी
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
उपयोगी *
नियंत्रक । Admin का कहना है कि -
डॉ॰ अजित जी,

शन्नो जी का परिचय पढ़ने व चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
अजित जी,
आपकी टिप्पणी पढ़ी, बड़ा अच्छा लगा. मैंने फिर आपके ब्लॉग पर आपका ईमेल पता ढूंढ कर ईमेल भी भेजी पर दोनों बार delivery failure का notification आ गया. आपके पते में कुछ गड़बड़ है. मुझे अपना सही पता उपलब्ध कराइये. धन्यबाद.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
शन्‍नो जी
ajit_09@yahoo.com
ajit.09@gmail.com
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
nivedan yah hai ki aap dohe ki kaksha ko dheere dheere aage badhaate rahein...
par aap humein aur bhi gyaan de sakte hain... hindi kavitaaon ke baare mein chhand-chhand mukt kavitaayein... hindi vyaakaran... ya kuch bhi rochak aur gyaan vardhak jaankaari jo hindi aur hindi saahitya se judi ho....
aasha hai aap mera matlab samajh gaye honge.. aapse aur bhi alag alag jaankaari mile yahi ichha rakhte hain
yogesh pandey का कहना है कि -
द्वार खुला भी रह गया तो क्या तेरा जाय
जाके जो तकदीर मा वो तो वो ही पाय
जीवन है इक आइना देख सके तो देख
तेरे सब अच्छे बुरे करमन का है लेख
सत्य अहिंसा दे गये बापू तुम उपहार
मानव इतना स्वार्थी कैसे हो व्यवहार

योगेश
yogesh pandey का कहना है कि -
द्वार खुला भी रह गया तो क्या तेरा जाय
जाके जो तकदीर मा वो तो वो ही पाय
जीवन है इक आइना देख सके तो देख
तेरे सब अच्छे बुरे करमन का है लेख
सत्य अहिंसा दे गये बापू तुम उपहार
मानव इतना स्वार्थी कैसे हो व्यवहार

योगेश

Wednesday, May 06, 2009

दोहा गोष्ठी 15- दोहानंद अमूल्य 


समयजयी दोहा रचे, सत्-शिव-सुन्दर मूल्य.
सत्-चित-आनंद दे 'सलिल', दोहानंद अमूल्य.

आपकी पंक्तियाँ आपको ही समर्पित हैं:

अद्‍भुत जी! आपका स्वागत...दोहा को जितना अधिक जानेंगे उतना अधिक जानने की इच्छा होगी. दोहा तथा अन्य छंद ध्वनि-विज्ञान के नियमों पर आधारित हैं. अक्षरों के उच्चारण के स्थान तथा उनके प्रभाव को छंद-दृष्टा ऋषियों ने आत्मसात करने के बाद ही छंद की रचना की. एक विशेषता यह है जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा तथा पढ़ा जाता है. इस कारण अन्तरिक्ष में अन्य ग्रहों पर संभावित सभ्यताओं से संकेत-संप्रेषण के लिए विश्व के वैज्ञानिकों सर्वाधिक उपयुक्त दो भाषाएँ संस्कृत और हिन्दी मानी हैं. अस्तु...

शन्नो जी! आपमें बहुत प्रतिभा है. सहज हास्य आपकी विशेषता है...हास्य लिखना सर्वाधिक कठिन है...आप शब्द-चयन तथा गति-यति के प्रति कुछ अधिक सजग हो सकें तो हम सबको आपसे बहुत मधुर और मनोरंजक रचनाएँ मिलेंगी.

जबसे करने मैं लगी, हिन्दयुग्म पे सैर
हर दिन नयी आस मिले, अपने लगते गैर.

'पे' के स्थान पर 'पर' तथा 'नयी आस' के स्थान पर 'नव आशा' करना चाहेंगी क्या?

घर बैठे करने चली, पूरे चारों धाम
यात्रा तो चलती रहे, पैर करें आराम.

तीसरे चरण को 'मन यात्रा करता रहे' करने से अर्थ या प्रभाव में आये परिवर्तन पर ध्यान दें. शिल्प सध रहा है...अ़ब भावों की विविधता आपकी दृष्टि में आ सकें तो शब्द को औजार की तरह काम में ला सकेंगी.

मन रक्खें अपना दुरुस्त, बनें काम में चुस्त
११ २ २ १ १ २ १ २ १, १२ २ १ २ २ १ = १४, ११
चाय-शाय पीते रहें , कक्षा में न हों सुस्त.
२ १ २ १ २ २ १ २, २ २ २ १ २ २ १ = १३, १२

मन दुरुस्त अपना रखें, बनें काम में चुस्त
चाय-शाय पीते रहें, हों न वर्ग में सुस्त.

आप सहमत होंगी कि कोई भी बदलाव ऐसा नहीं जो आप न कर सकें...आवश्यकता केवल थोडा सजग होने की है. दो व्यक्तियों के पास एक जैसे कपडे हों, उनमें से एक कपडे धोकर, प्रेस कर पहने और दूसरा बिना धोये पहन ले तो किसे अधिक अच्छा कहेंगी?

कक्षा में हूँ सुस्त तो, क्या कर लेंगी आप...?
टोपी पर कर टिप्पणी, छोडेंगी निज छाप....?

जो भी लिखिए युग्म पर, सुनिए 'मनु' की बात.
अंगरेजी तज मनस में, हिंदी रखिये तात.

टोपीवाला सुन रहा, गुपचुप सारी बात.
'क्या कर लोगी?, चुनौती, बढा शीश का ताप.

टोपीवाले बता दे, गिटपिट कर मत भाग.
धमकी क्यों दी है मुझे, क्या तेरा खटराग?

अंगरेजी में बोलते हैं हिंदी के बोल.
हाय! घोर अंधेर है, बोल रहे बिन तोल

बच्चे बहुत शरारती, सब हैं धींगामस्त.
गुरु जी छुट्टी पर गए, ध्वजवाहक है पस्त.

ध्वजवाहक है पस्त, सम्हाले कक्षा कैसे?
टोपी-टोपी खेल रहे, है इच्छा जैसे.

'अजित' कहे विनती सुनिए, सब मन के सच्चे.
गुरूजी दंड न देना, अच्छे हैं सब बच्चे.

कन्धों पर डाला हुआ, सारा बोझ सम्हाल.
पोंछ पसीना- सार भी, लाईं किया कमाल.

हम निखट्टूओं का भला, किया नहीं अंदाज़.
होती तो देती हटा, मैं टोपी का ताज.

भार लिया सबसे अधिक, सचमुच किया कमाल.
नमन आपको कर रही, कितना ह्रदय विशाल?

शैतानी से त्रस्त पर, नहीं दे रहीं दंड.
नतमस्तक मैं हो रही, कर सम्मान अखंड.

टोपी वाला हो गया, बहुत अधिक उद्दंड
गुरु जी जब आयें तभी, देंगें उसको दंड.

देंगें उसको दंड, रंग में भंग कर दिया
आया बहुत देर से सबको तंग कर दिया.

डरकर 'शन्नो' कहे, लगे जो भोला-भाला
उत्तर पूरे नहीं बताता टोपीवाला.

शन्नो जी की चुहल से, है कक्षा जीवंत.
याद आई कॉलेज की, कर अंतर का अंत

जन्मकुंडली-चित्र दें, लगता यह अनिवार्य
शिरोधार्य गुरु-आज्ञा, करुँ- कठिन कुछ कार्य.

धीरे-धीरे बढायें, दोहा कक्षा आप.
अन्य ज्ञान भी दीजिये, सके सभी में व्याप.


यह दोहा कक्षा आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा संचालित है. आप अपनी रूचि की बात करें, बीच-बीच में सीखे हुए छंद प्रयोग करते रहें और गृह कार्य यथा समय करें. आपके चाहे अनुसार हम आगे बढ़ने की गति मंद कर रहे हैं.

अवनीश जी की कुछ द्विपदियों को दोहा ध्वजवाहिका अजित जी दोहा में ढाल रही हैं.

खुसरो और कबीर के दोहे आपने खोजे, सराहे और समझे...खुसरो और कबीर दोनों सूफी मत से हैं. सूफी मत में भक्त अपनी आत्मा को प्रेमिका तथा परमात्मा को प्रेमी मानकर भक्ति करता है. इस नाते दोनों संत कवियों में श्रृंगार के दोनों पक्षों मिलन-विरह को केंद्र में रखकर की गयी रचनाएँ हैं. यह श्रृंगार द्विअर्थी है...सामान्य जन इसे लौकिक मान सकते हैं, भक्त या विद्वान् अलौकिक...दोनों के साहित्य में एक और समानता है कि वे आम आदमी की भी समझ में आजाते हैं और बड़े-बड़े ज्ञानी भी उन्हें नहीं समझ पाते. दोनों में अंतर भी बहुत हैं. कबीर फक्कड़ मेहनतकश जुलाहे थे. खुसरो के नाम के पूर्व लगा विशेषण 'अमीर' ही उनके सामाजिक स्थान और आर्थिक हैसियत का पता देता है. खुसरो शिक्षित, बहुभाषी और दरबारी थे जबकि कबीर शिक्षा से वंचित होने पर भी भाषा के अद्भुत जानकार थे. डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा है, आशय यह कि कबीर ने अनेक शब्दों को उनके प्रचलित अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रयोग किया. खुसरो कि मुर्कियाँ और पहेलियाँ जन-जन का कंठ हार हैं तो कबीर की सखियाँ और बीजक जनगण के हृदय की धड़कन हैं. सामान्य बिम्बों और शब्दों को गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ में प्रयोग करने में दोनों का सानी नहीं. दोनों की रचनाओं को आमजन, सामान्य गायक तथा शास्त्रीय गायक अनेक रागों में गाते रहे हैं...यही दोहा सिद्ध होने का लक्षण है. जिस दोहे को कई तरीकों से गया जा सके, कोई शब्द अटकता-खटकता न लगे, वह शुद्ध दोहा है.

दोहा ध्वजवाहिका अजित जी के श्रम और लगन,.दोहा कक्षा नायिका शन्नो जी की जीवन्तता और मनु जी के दोहा-प्रेम को नमन.

अब बारी मनु जी की... मनु जी! यह पता लगायें कि क्या दोहा बहर में लिखा जा सकता है? यदि हाँ तो किस बहर में? एक ही बहर में या एक से
अधिक बहरों में? बहर के आधार पर रचे गए दोहे भी लाइए ताकि उनको समझा जा सके...

शन्नो जी! आप को यह जानकारी जुटानी है कि अंगरेजी की द्विपदियाँ (कप्लेट्स) दोहा से क्या साम्य या भिन्नता रखते हैं? कुछ उदहारण हों तो सोने में सुहागा...

इस बीच विलंब से सम्मिलित छात्र तेजी से पिछले पाठ पूरे करें ताकि साथ-साथ चल सकें. शेष फिर...

16 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -
इस कारण अन्तरिक्ष में अन्य ग्रहों पर संभावित सभ्यताओं से संकेत-संप्रेषण के लिए विश्व के वैज्ञानिकों सर्वाधिक उपयुक्त दो भाषाएँ संस्कृत और हिन्दी मानी हैं. अस्तु...

आचार्य ,,,,
इस जानकारी के लिए धन्यवाद ,,,,
पढ़कर न केवल आनद आया अपितु गर्व से सर ऊंचा हो गया,,,,,
सच में आज की सुबह इस जानकारी के साथ और भी suhani कर दी आपने,,,,,
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
झण्‍डा दोहा कक्षा का, अब है मनु के हाथ
शन्‍नो भी पीछे नहीं, देती पूरा साथ
देती पूरा साथ, मनाऊँ मैं तो छुट्टी
मनु गिनते अब बहर, द्विपद की शन्‍नो घुट्टी
बोले इनसे अजित, चलाओ अब तुम डण्‍डा
टोपी है अब शान, उठाओ तुम ही झण्‍डा।
manu का कहना है कि -
एक पुराना चुटकुला याद आया,,,,,(संक्षिप्त में कहता हूँ)

आचार्य के प्रश्न .....
शन्नो जी......(!) cat की स्पेलिंग बताएं....?
(२)प्रथम विश्व युध्ध कब हुआ ...?

अजित जी....(१) एप्पल की स्पेलिंग बताएं....?
(२) और बताएं के उस प्रथम विश्वयुद्ध में कितने लोग मारे गए.....?

अब मनु की बारी है....(१) चेकोस्लोवाकिया की स्पेलिंग बताएं......?
(२) प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए लोगों के नाम बताएं..? (संभव हो तो पते
भी बताएं...?)

हा,,,हा,,,,,,,हा,,,,,हा,,,,,,,
अब आचार्य पहले मैं बहर को पढ़ सीख कर आऊँ,,,,,
फिर अलग अलग मात्र गणना नियमों को ध्यान में रख कर पोस्ट मार्टम करून,,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी,
जो भी कुछ आपने कहा उससे मैं सोलहों आना सहमत हूँ. दोहों की नदिया में जरा किनारे के पानी में ही तैरना सीखा है. अब आपका कहा मानकर और उस पर अमल करते हुए मैं अपने दोहों पर अधिक ध्यान देने की कोशिश करूँगीं. आप मुझे बस यूँ ही हमेशा सही मार्ग दिखाते रहें. और अपना आशीर्वाद बनाये रखें. मैं हमेशा ही आपकी बहुत आभारी हूँ और रहूंगी. दोबारा फिर कुछ और लेकर (जैसा आपने पूछा है couplets के बारे में) किसी समय फिर आती हूँ तब तक के लिए एक यह प्रयोग:

हिच्च, हिच्च करता फिरे, कर में बोतल भींच
आते होंगें गुरु जी, अब कानों को खींच
अब कानों को खींच, सजा में अब बहर लिखे
चहक रहीं अजित जी, झंडा लहराती दिखे
फरक पड़े न मनु को, अब बहर लिखेंगें कुच्छ
बेडा अपना गरक, अंग्रेजी में ही हिच्च.
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
दफ्तर के कामों का भार मुझे दोहा कक्षाओं से दूर कर देता है |
कोशिश है हर कक्षा में रहूँ ...
अपने लिखे दोहों को मैं खुद भी सुधार रहा हूँ |

अवनीश तिवारी
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
आज मनु जी के कार्टून को देखा तो अचानक लगा कि अंधे के हाथ बटेर लग गयी....मतलब दोहे लिखने का मेरे लिये नया मसाला. तो जो दोहा आज भेजा था उसी का मसाला इस्तेमाल करके उसकी मात्रा को इधर-उधर करके अलग-अलग तरीके से और भी दोहो को रचा है. जायका लेकर बताइये कि कैसे हैं.

दोहा: १.

बोतल पकड़े हाथ में, रहा युग्म पर घूम
पैर न पड़ें जमीन पर, मचा रखी है धूम.

इसी से सोरठा:

रहा युग्म पर घूम, बोतल पकड़े हाथ में
मचा रखी है धूम, पैर न पड़ें जमीन पर.

दोहा २.

अरे ओ टोपी वाले, रख टोपी की लाज
बोतल पकड़े हाथ में, ना कर इतना नाज़.

इसी से सोरठा:

रख टोपी की लाज, अरे ओ टोपी वाले
ना कर इतना नाज़, बोतल पकड़े हाथ में.

इन सबके मिश्रण से कुंडलिनी:

अरे ओ टोपी वाले, रख टोपी की लाज
बोतल पकड़े हाथ में, ना कर इतना नाज़
ना कर इतना नाज़, सब रहे देख तमाशा
करे हैं तुमसे तो,'सलिल' जी कितनी आशा
शन्नो, अजित हंसें, कहें 'अरे मनु हट परे'
मनु घूर कर बोले, यह क्या है अरे-अरे.

सुबह वाली कुंडलिनी का नया प्रयोग:

हिच, हिच कक्षा में करे, कर में बोतल भींच
आते होंगें गुरु जी, अब कानों को खींच
अब कानों को खींच, सजा में अब बहर लिखें
फुदक रहीं अजित जी, पकड़े झंडा मनु दिखें
फिकर न है किसी को, शन्नो अब गयी भिंच
बेडा अपना गरक, अंग्रेजी करेगी हिच.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी प्रणाम,
आज मैंने दोहा से सम्बंधित काफी कार्य किया है. और आपको भेजा है उसे जांचने के लिये. और अब आपकी आज्ञानुसार कुछ अंग्रेजी के couplets के बारे में बताने आई हूँ. अपनी शिक्षाकाल के दौरान मैंने कभी भी अंग्रेजी में couplets नहीं लिखे थे ना ही कोई अंग्रेजी की poems. बस कुछ हिंदी की poems लिखी थीं फिर तमाम सारी बेकार समझ कर फेंक दी थीं और कुछ रख ली थीं. फिर यहाँ आने के बाद बस ऐसे ही कुछ अंग्रेजी में poems लिखीं. कभी भी उनकी गहराई में नहीं गयी. फिर भी आपकी इच्छानुसार आज कुछ जानकारी देती हूँ couplets के बारे में.

१. अंग्रेजी के couplets बहुत ही अकेलेपन का अहसास लिए होते हैं, minimalistic.
२. दोहों की तरह दो पंक्तिओं के होते हैं (single stanza) या दो से अधिक पंक्तिओं के भी (large stanza) वाले भी. मेरा मतलब है कि पंक्तिओं के समूह.
३. दोहों की तरह उनमे भी अपने बिचार, भावनाएं या सारगर्भित बातें कम शब्दों में कही जाती हैं.
४. उनमें भी लय होती है लेकिन हमेशा लय होना जरूरी नहीं होता.
५. लेकिन उनमें हिंदी के दोहों की तरह मात्राओं की झंझट नहीं होती.
५. इनके भी लिखने के कई तरीके होते हैं कुछ उदाहरण हैं जैसे कि:

छोटा 'short couplet' नाम है 'iambic'
एक उदाहरण देखिये यहाँ:

In to my empty head there come
a cotton beach, a dock wherefrom

बँटा 'split couplet' इसकी पहली पंक्ति का नाम 'iambic pentameter' है व छोटी पंक्ति का नाम होता है 'iambic meter'.
एक उदाहरण देखिये यहाँ:

The weighty seas are rowled from the deeps
In mighty heaps,
And from the rocks' foundations do arise
To kiss the skies.

'Heroic couplet' इसकी दोनों पंक्तियाँ 'iambic pentameter' में हैं.
एक उदाहरण देखिये यहाँ:

Wave after waves in hills each other crowds
As if the deep resolved to storm the clouds.

'Alexandrine heroic couplet' 'iambic hexameter' में है.
एक उदाहरण देखिये यहाँ:

And that black night, That blackness was sublime
I felt distributed through space and time
One foot upon a mountain top. One hand
under the pebbles of panting strand
One ear in Italy, one eye in Spain
In caves my blood, and in the stars, my brain.

बहुत समय पहले 1999 में जब लन्दन में Millennium Dome बना था तब उस पर मैंने एक poem लिखी थी उसमें की कुछ पंक्तियाँ यहाँ दे रही हूँ:

Like a giant spiky hat
Or, a crown for a king to wear
Looking over the crystal water
With all the glory and splendour.

Under the blue sky, hot Sun
Rain or raging thunder
We wait to unfold your secrets
O, worlds greatest wonder.

एक poem और written long ago:

All those happy
moments of wait.
All my hopes
crushed by fate.
Let me drown
all my sorrows, fears
And painful memories
in the sea of tears.
There won't be anything
more peaceful than to
Sleep in the blissful
hands of death.

मेरा अपना कहना है यहाँ:

कपलेट की गिटपिट में, बना सब कुछ कीमा
न लय का कोई बंधन, न मात्रा की सीमा.

हिंदी के दोहे मधुर, कपलेट की न जीत
कुछ ही कपलेट अच्छे, हिंदी सबकी मीत.

अब मनु जी के लिए इतना सुंदर कार्टून बनाने की ख़ुशी में अंग्रेजी में दो chinese दोहे:

Once there was a dragon
who was alone carrying a lantern.

एक और:

Happiness peace and lots of good wishes
Eat plenty of prawns and tasty fishes.
manu का कहना है कि -
आज दोहा कक्षा की तरफ झाँकने की भी हिम्मत नहीं हो रही अपनी तो,,,,,
एक तो उस तामसिक कार्टून पे दोहे हो रहे हैं इस सात्विक कक्षा में,,,और मुझे शर्म आ रही है,,

दुसरे ये जो शन्नो जी ने इतना सारा काम किया है ,,,उसको अनुवाद करके कौन बताएगा,,,,?

और एक प्रार्थना आपसे है आचार्य,,,,,यदि संभव हो सके तो,,,
जो आपने अंतरीक्ष पर अन्य सभुताओं से संपर्क करने के लिए विश्व के वैज्ञानिकों द्वारा हिंदी को ही चुना है,,,इस पर अधिक से अधिक प्रकाश डाले ,,,और ज्यादा जानकारियाँ दें,,,ये जानकार कैसा लग रहा है बता नहीं सकता,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,
अब बोलती हूँ तो सब बोलेंगे कि बोलती है.......पर बोलना तो कुछ पड़ेगा ही....
तो ऐसा कुछ नहीं किया है मैंने कि आप को अन्तरिक्ष पर हम सबसे जान बचाकर जाने की जरूरत पड़ जाये. गुरु जी ने जो मुझसे कहा था वो मैंने किया. बस उनकी आज्ञा का पालन किया. अब वह पछता रहे हैं तो उनकी गलती. अब मैं क्या बोलूँ? अच्छा अब समझी कि आप बहर लिखने के होम वर्क से बचना चाहते हैं. तभी इतनी लम्बी उड़ान भरने की सोच रहे हैं. कदापि नहीं. अब झंडा आप के हाथ में है ओ.के. या फिर गुरु जी के डंडे की ताकत को देखिये. अपनी तो battery down हो रही है.
अन्तरिक्ष पर दोहा और पहेलियों की कक्षाएं नहीं होंगीं और न गानों की महफिलें ही. और उधर महफ़िल में तन्हा जी तनहा रह गये तो फिर? उनका दिल कौन बहलायेगा आपके जाने के बाद? अब कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी. पताका लीजिये हाथ में और फिर बस ऐसे ही अजित जी के साथ एक्सचेंज करते रहिये. अन्तरिक्ष पर जाने की कोई जरूरत नहीं है. आप बस अपना मन दोहा व पहेलियों की कक्षा में नित लगायें. राघव जी की मोटर साइकिल का फायदा मत उठाने की कोशिश करिये. वह तो इसी चक्कर में हैं कि कोई पीछे वाली सीट पर बैठने वाला यात्री मिल जाये.
divya naramada का कहना है कि -
शन्नो जी! शत-शत नमन, खूब बटाया हाथ.
ले आयीं कपलेट्स को, कर गर्वोन्नत माथ..

आंग्ल द्विपदि का ले सकें, सब मिलकर आनंद.
जान सकें, क्या खासियत?, कैसे हिन्दी छंद?

त्याग छंद को- रच रहे, कविता छंदविहीन.
हिन्दी से सम्पन्नता छीन, बनाते दीन..

भाषा हो यदि शुद्ध तो, कहते यह है क्लिष्ट.
शब्द न समुचित सीखते, भाव न होते इष्ट..

दोहा ने इतिहास को रचा, सुधारा-मोड़.
दूजा कोई न कर सका, कैसे लेगा होड़?

गति, यति, लय, रस, क्षिप्रता, बेधकता है खूब.
दोहा ने हर काल में, मोहा- देखो डूब..

हम सब चाहें, कीजिये, कपलेट्स का अनुवाद.
कृपया अब सुन लीजिये, रचनात्मक fariyad..

'सोनेट' भी ले आइये, कपलेटों के बाद.
कुंडलि से तुलना करें, पायें सबसे दाद..

नहीं 'जाल' पर आज तक, हो पाया यह काम.
'युग्म-मंच' पर जुड़ सके, एक नया आयाम..

आशा है कर सकेंगी, मुझ पर यह उपकार.
धन्यवाद का समर्पित, है अग्रिम उपहार..
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
प्रणाम गुरुदेव,
नतमस्तक हूँ मैं यहाँ, भाया मेरा काम
इतनी मैं पुलकित हुई, सुनकर अपना नाम
सुनकर अपना नाम, यह अब क्या है ठानी
खुद मार कुल्हाड़ी, करी कितनी नादानी
कहा आपका मान, अब सीखे शन्नो सबक
करती है सम्मान, रहे शिष्या नतमस्तक.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी,
पहले और दूसरे चरण में कुछ सुधार किया है.

कपलेट की गिटपिट से, हो गया सब कीमा
न लय का कोई बंधन, न मात्रा की सीमा
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
आपने सही लिखा है कि हमारी सम्‍पन्‍नता उन्‍हें समझ नहीं आती। वे छंद शास्‍त्र को समझ नहीं सकते इसीलिए अपनी बातों को कप-प्‍लेट ( जैसा कि शन्‍नो जी ने बताया) में परोसकर देते हैं। ज्ञान में भारत जितना समृद्ध है उतने ही वे विपन्‍न हैं। लेकिन उन्‍होंने ऐसा माया जाल फैलाया है कि लोगों को लगता है कि भारत में तो कुछ भी नहीं है। इसी सम्‍पन्‍नता को दिखाने के लिए हम छंद सीखना चाहते हैं। आपने नवगीत की लिंक भेजा, अच्‍छी साइट है। शन्‍नो जी बहुत मेहनत कर रही हैं, उन्‍हें बधाई।