ॐ
छंद शाला
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
पाठ २
कथ्य भाव लय छंद है
*
(इस लेख माला का उद्देश्य नवोदित कवियों को छंदों के तत्वों, प्रकारों, संरचना, विधानों तथा उदाहरणों से परिचित कराना है। लेखमाला के लेखक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ख्यात छन्दशास्त्री, नवगीतकार, लघुकथाकार, संपादक व् समालोचक हैं। सलिलजी ने ५०० से अधिक नए छंदों का अन्वेषण किया है। लेखमाला के भाग १ में छंद के तत्वों, दोहा सोरठा, रोला व् कुण्डलिया लेखन ने विधान व् उदाहरण बताए जा चुके हैं। - सं.)
*
काव्य शास्त्र है पुरातन :
काव्य शास्त्र चिर पुरातन, फिर भी नित्य नवीन।
झूमे-नाचे मुदित मन, ज्यों नागिन सुन बीन।।
लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार काव्य ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों१। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय२ चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ३, रसमय वाक्य४, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार५, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा६, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन७, ध्वनि को काव्य की आत्मा८, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय९, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।
उच्चार :
ध्वनि-तरंग आघात पर, आधारित उच्चार.
मन से मन तक पहुँचता, बनकर रस आगार.
मन से मन तक पहुँचता, बनकर रस आगार.
ध्वनि विज्ञान सम्मत् शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र पर आधारित व्याकरण नियमों ने संस्कृत और हिन्दी को शब्द-उच्चार से उपजी ध्वनि-तरंगों के आघात से मानस पर व्यापक प्रभाव करने में सक्षम बनाया है। मानव चेतना को जागृत करने के लिए रचे गए काव्य में शब्दाक्षरों का सम्यक् विधान तथा शुद्ध उच्चारण अपरिहार्य है। सामूहिक संवाद का सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्व सुलभ माध्यम भाषा में स्वर-व्यंजन के संयोग से अक्षर तथा अक्षरों के संयोजन से शब्द की रचना होती है। मुख में ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दंत तथा अधर) में से प्रत्येक से ५-५ व्यंजन उच्चारित किए जाते हैं।
सुप्त चेतना को करे, जागृत अक्षर नाद.
सही शब्द उच्चार से, वक्ता पाता दाद.
सही शब्द उच्चार से, वक्ता पाता दाद.
उच्चारण स्थान
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वर्ग
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कठोर(अघोष) व्यंजन
|
मृदु(घोष) व्यंजन
| |||
अनुनासिक
| ||||||
कंठ
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क वर्ग
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क्
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ख्
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ग्
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घ्
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ङ्
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तालू
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च वर्ग
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च्
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छ्
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ज्
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झ्
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ञ्
|
मूर्धा
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ट वर्ग
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ट्
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ठ्
|
ड्
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ढ्
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ण्
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दंत
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त वर्ग
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त्
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थ्
|
द्
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ध्
|
न्
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अधर
|
प वर्ग
|
प्
|
फ्
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ब्
|
भ्
|
म्
|
विशिष्ट व्यंजन
|
ष्, श्, स्,
|
ह्, य्, र्, ल्, व्
| ||||
कुल १४ स्वरों में से ५ शुद्ध स्वर अ, इ, उ, ऋ तथा ऌ हैं. शेष ९ स्वर हैं आ, ई, ऊ, ऋ, ॡ, ए, ऐ, ओ तथा औ। स्वर उसे कहते हैं जो एक ही आवाज में देर तक बोला जा सके। मुख के अन्दर ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दांत, होंठ) से जिन २५ वर्णों का उच्चारण किया जाता है उन्हें व्यंजन कहते हैं। किसी एक वर्ग में सीमित न रहने वाले ८ व्यंजन स्वरजन्य विशिष्ट व्यंजन हैं।
विशिष्ट (अन्तस्थ) स्वर व्यंजन :
य् तालव्य, र् मूर्धन्य, ल् दंतव्य तथा व् ओष्ठव्य हैं। ऊष्म व्यंजन- श् तालव्य, ष् मूर्धन्य, स् दंत्वय तथा ह् कंठव्य हैं।
स्वराश्रित व्यंजन: अनुस्वार ( ं ), अनुनासिक (चन्द्र बिंदी ँ) तथा विसर्ग (:) हैं।
संयुक्त वर्ण : विविध व्यंजनों के संयोग से बने संयुक्त वर्ण श्र, क्ष, त्र, ज्ञ, क्त आदि का स्वतंत्र अस्तित्व मान्य नहीं है।
मात्रा :
उच्चारण की न्यूनाधिकता अर्थात किस अक्षर पर कितना कम या अधिक भार ( जोर, वज्न) देना है अथवा किसका उच्चारण कितने कम या अधिक समय तक करना है ज्ञात हो तो लिखते समय सही शब्द का चयन कर दोहा या अन्य काव्य रचना के शिल्प को संवारा और भाव को निखारा जा सकता है। गीति रचना के वाचन या पठन के समय शब्द सही वजन का न हो तो वाचक या गायक को शब्द या तो जल्दी-जल्दी लपेटकर पढ़ना होता है या खींचकर लंबा करना होता है, किंतु जानकार के सामने रचनाकार की विपन्नता, उसके शब्द भंडार की कमी, शब्द ज्ञान की दीनता स्पष्ट हो जाती है. अतः, दोहा ही नहीं किसी भी गीति रचना के सृजन के पूर्व मात्राओं के प्रकार व गणना-विधि पर अधिकार कर लेना जरूरी है।
उच्चारण नियम :
उच्चारण हो शुद्ध तो, बढ़ता काव्य-प्रभाव.
अर्थ-अनर्थ न हो सके, सुनिए लेकर चाव.
शब्दाक्षर के बोलने, में लगता जो वक्त.
वह मात्रा जाने नहीं, रचनाकार अशक्त.
हृस्व, दीर्घ, प्लुत तीन हैं, मात्राएँ लो जान.
भार एक, दो, तीन लो, इनका क्रमशः मान.
अर्थ-अनर्थ न हो सके, सुनिए लेकर चाव.
शब्दाक्षर के बोलने, में लगता जो वक्त.
वह मात्रा जाने नहीं, रचनाकार अशक्त.
हृस्व, दीर्घ, प्लुत तीन हैं, मात्राएँ लो जान.
भार एक, दो, तीन लो, इनका क्रमशः मान.
१. हृस्व (लघु) स्वर : कम भार, मात्रा १ - अ, इ, उ, ऋ तथा चन्द्र बिन्दु वाले स्वर।
२. दीर्घ (गुरु) स्वर : अधिक भार, मात्रा २ - आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं।
३. बिन्दुयुक्त स्वर तथा अनुस्वारयुक्त या विसर्ग युक्त वर्ण भी गुरु होता है। यथा - नंदन, दु:ख आदि.
४. संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण दीर्घ तथा संयुक्त वर्ण लघु होता है।
५. प्लुत वर्ण : अति दीर्घ उच्चार, मात्रा ३ - ॐ, ग्वं आदि। वर्तमान हिन्दी में अप्रचलित।
६. पद्य रचनाओं में छंदों के पाद का अन्तिम हृस्व स्वर आवश्यकतानुसार गुरु माना जा सकता है।
७. शब्द के अंत में हलंतयुक्त अक्षर की एक मात्रा होगी।
पूर्ववत् = पूर् २ + व् १ + व १ + त १ = ५
ग्रीष्मः = ग्रीष् 3 + म: २ +५
कृष्ण: = कृष् २ + ण: २ = ४
हृदय = १ + १ +२ = ४
अनुनासिक एवं अनुस्वार उच्चार :
उक्त प्रत्येक वर्ग के अन्तिम वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का उच्चारण नासिका से होने का कारण ये 'अनुनासिक' कहलाते हैं।
१. अनुस्वार का उच्चारण उसके पश्चातवर्ती वर्ण (बाद वाले वर्ण) पर आधारित होता है। अनुस्वार के बाद का वर्ण जिस वर्ग का हो, अनुस्वार का उच्चारण उस वर्ग का अनुनासिक होगा। यथा-
१. अनुस्वार के बाद क वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार ङ् होगा।
क + ङ् + कड़ = कंकड़,
श + ङ् + ख = शंख,
ग + ङ् + गा = गंगा,
ल + ङ् + घ् + य = लंघ्य
२. अनुस्वार के बाद च वर्ग का व्यंजन हो तो, अनुस्वार का उच्चार ञ् होगा.
प + ञ् + च = पञ्च = पंच
वा + ञ् + छ + नी + य = वांछनीय
म + ञ् + जु = मंजु
सा + ञ् + झ = सांझ
३. अनुस्वार के बाद ट वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण ण् होता है.
घ + ण् + टा = घंटा
क + ण् + ठ = कंठ
ड + ण् + डा = डंडा
४. अनुस्वार के बाद 'त' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण 'न्' होता है.
शा + न् + त = शांत
प + न् + थ = पंथ
न + न् + द = नंद
स्क + न् + द = स्कंद
५ अनुस्वार के बाद 'प' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार 'म्' होगा.
च + म्+ पा = चंपा
गु + म् + फि + त = गुंफित
ल + म् + बा = लंबा
कु + म् + भ = कुंभ
छंद ५. अचल छंद
*
अपने नाम के अनुरूप इस छंद में निर्धारित से विचलन की सम्भावना नहीं है. यह मात्रिक सह वर्णिक छंद है. इस चतुष्पदिक छंद का हर पद २७ मात्राओं तथा १८ वर्णों का होता है. हर पद (पंक्ति) में ५-६-७ वर्णों पर यति इस प्रकार है कि यह यति क्रमशः ८-८-११ मात्राओं पर भी होती है. मात्रिक तथा वार्णिक विचलन न होने के कारण इसे अचल छंद कहा गया होगा। छंद प्रभाकर तथा छंद क्षीरधि में दिए गए उदाहरणों में मात्रा बाँट १२१२२/१२१११२/२११२२२१ रखी गयी है. तदनुसार
सुपात्र खोजे, तभी समय दे, मौन पताका हाथ.
कुपात्र पाये, कभी न पद- दे, शोक सभी को नाथ..
कभी नवायें, न शीश अपना, छूट रहा हो साथ.
करें विदा क्यों, सदा सजल हो, नैन- न छोड़ें हाथ..
*
वर्ण तथा मात्रा बंधन यथावत रखते हुए मात्रा बाँट में परिवर्तन करने से इस छंद में प्रयोग की विपुल सम्भावनाएँ हैं.
मौन पियेगा, ऊग सूर्य जब, आ अँधियारा नित्य.
तभी पुजेगा, शिवशंकर सा, युगों युगों आदित्य..
सुपात्र खोजे, तभी समय दे, मौन पताका हाथ.
कुपात्र पाये, कभी न पद- दे, शोक सभी को नाथ..
कभी नवायें, न शीश अपना, छूट रहा हो साथ.
करें विदा क्यों, सदा सजल हो, नैन- न छोड़ें हाथ..
*
वर्ण तथा मात्रा बंधन यथावत रखते हुए मात्रा बाँट में परिवर्तन करने से इस छंद में प्रयोग की विपुल सम्भावनाएँ हैं.
मौन पियेगा, ऊग सूर्य जब, आ अँधियारा नित्य.
तभी पुजेगा, शिवशंकर सा, युगों युगों आदित्य..
छंद ६. पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय अभियान छंद
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: ल ज, लघु + जगण, लघु जभान, १ १२१।
उदाहरण:
गीत-
अठ याम
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: ल ज, लघु + जगण, लघु जभान, १ १२१।
उदाहरण:
गीत-
अठ याम
कर काम।
मत हार
वर नाम।
.
सपना न
तज यार।
तजना न
मन प्यार।
दिल को न
झट वार।
गर वार
मत हार।
बिसरा न
परिणाम।
अठ याम
कर काम।
.
करना न
अभिमान।
तजना न
सम मान।
मँगना न
वरदान।
वरदान।
कर पूर्ण
अभियान।
बन ख़ास
मत आम।
मत आम।
अठ याम
कर काम। ७. अमरकंटक छंद
विधान-
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा
२. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा
२. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
नरक चौदस
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
अमर चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विजय चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
बहक बादल
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित
चरण नर्तित
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
८. अचल धृति छंद
संजीव
*
छंद विधान:
*
छंद विधान:
सूत्र: ५ न १ ल, ५ नगण १ लघु = ५ (१ + १ +१ )+१
हर पद में १६ लघु मात्रा, १६ वर्ण
उदाहरण:
१. कदम / कदम / पर ठ/हर ठ/हर क/र
ठिठक / ठिठक / कर सि/हर सि/हर क/र
हुलस / हुलस / कर म/चल म/चल क/र
मनसि/ज सम / खिल स/लिल ल/हर क/र
ठिठक / ठिठक / कर सि/हर सि/हर क/र
हुलस / हुलस / कर म/चल म/चल क/र
मनसि/ज सम / खिल स/लिल ल/हर क/र
२. सतत / अनव/रत प/थ पर / पग ध/र
अचल / फिसल / गर सँ/भल ठि/ठकक/र
रुक म/त झुक / मत चु/क मत / थक म/त
'सलिल' / विहँस/कर प्र/वह ह/हरक/र
अचल / फिसल / गर सँ/भल ठि/ठकक/र
रुक म/त झुक / मत चु/क मत / थक म/त
'सलिल' / विहँस/कर प्र/वह ह/हरक/र
९. आचमन छंद
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: भ ल = भगण + लघु, भानस + लघु, २११ १।
ग न = गुरु + नगण, गुरु + नसल, १ २११।
उदाहरण:
मुक्तिका-
.
प्यार कर
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदांत: जगण।
सूत्र: भ ल = भगण + लघु, भानस + लघु, २११ १।
ग न = गुरु + नगण, गुरु + नसल, १ २११।
उदाहरण:
मुक्तिका-
.
प्यार कर
वार कर।
.
.
जीत वर
हार कर।
.
मीत बन
प्रीत कर।
.
क्यों गलत
रीत कर?
.
हो अमर
हार कर।
.
मीत बन
प्रीत कर।
.
क्यों गलत
रीत कर?
.
हो अमर
बीत कर।
.
भोर जग
ईद कर।
ईद कर।
१०. इंद्र वज्रा छंद
इस द्विपदिक मात्रिक चतुःश्चरणी छंद के हर पद में २ तगण, १ जगण तथा २ गुरु मात्राएँ होती हैं. इस छंद का प्रयोग मुक्तक हेतु भी किया जा सकता है.
इन्द्रवज्रा एक पद = २२१ / २२१ / १२१ / २२ = ११ वर्ण तथा १८ मात्राएँ
उदाहरण:
१. तोड़ो न वादे जनता पुकारे
बेचो-खरीदो मत धर्म प्यारे
लूटो तिजोरी मत देश की रे!
चेतो न रूठे, जनता न मारे
२. नाचो-नचाओ मत भूलना रे!
आओ! न जाओ, कह चूमना रे!
माशूक अपनी जब साथ में हो-
झूमो, न भूले हँस झूलना रे!
३. पाया न / खोया न / रखा न / रोका
बोला न / डोला न / कहा न / टोंका
खेला न / झेला न / तजा न / हारा
तोडा न / फोड़ा न / पिटा न / मारा
४. आराम / ही राम / हराम / क्यों हो?
माशूक / के नाम / पयाम / क्यों हो?
विश्वास / प्रश्वास / नि:श्वास टूटा-
सायास / आभास / हुलास / झूठा
***
इन्द्रवज्रा एक पद = २२१ / २२१ / १२१ / २२ = ११ वर्ण तथा १८ मात्राएँ
उदाहरण:
१. तोड़ो न वादे जनता पुकारे
बेचो-खरीदो मत धर्म प्यारे
लूटो तिजोरी मत देश की रे!
चेतो न रूठे, जनता न मारे
२. नाचो-नचाओ मत भूलना रे!
आओ! न जाओ, कह चूमना रे!
माशूक अपनी जब साथ में हो-
झूमो, न भूले हँस झूलना रे!
३. पाया न / खोया न / रखा न / रोका
बोला न / डोला न / कहा न / टोंका
खेला न / झेला न / तजा न / हारा
तोडा न / फोड़ा न / पिटा न / मारा
४. आराम / ही राम / हराम / क्यों हो?
माशूक / के नाम / पयाम / क्यों हो?
विश्वास / प्रश्वास / नि:श्वास टूटा-
सायास / आभास / हुलास / झूठा
***
सन्दर्भ :
१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,
२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,
३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,
संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन , जबलपुर ४८२००१ चलभाष - ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन , जबलपुर ४८२००१ चलभाष - ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
चाय गिलास में पीलें, डालें तनिक शक्कर
जैम में है क्या रखा, खाओ बस गुलकंद
कपलेट को अब भूलें, गाओ अपने छंद.
मेरे कार्य में आपने अपनी ज्ञान-गंगा से पानी मिला कर उसे और शुद्ध कर दिया है. उसके लिए बहुत आभार. समय मिलते ही आपके आदेश का पालन करूंगी. तब तक के लिये.....
इच्छा पूरी मैं करुँ, अब बहुत अनिवार्य
हे ईश्वर, क्या करुँ, करें पूरन कार्य.
लज्जित न मुझे करें, करके मुझे नमन
मैं अपने श्रद्धा-सुमन, करती हूँ अर्पन.
अब मनु जी अलाप रहे, बहुत अनोखा राग
अंतरिक्ष पर जाऊंगा, मैं जल्दी ही भाग.
गुरु जी दया कीजिये, खींचें मनु के कान
मस्ती सारा दिन करें, बहुत बने शैतान.
पैर कुल्हाडी मारी, शन्नो इतनी त्रस्त
अजित की पताका कहाँ, खाली है अब हस्त.
portraiting the couplet,
Am working on doha
need to improve yet.
जानकारी के लिए आचार्यजी और शन्नो जी का आभार |
अवनीश तिवारी
पंथी को छ्या नहीं फल लागे अति दूर
मफाइलुन मुत्फ़ाइलुन फेलुन फाल फ़ऊल
फ़यिलातुन फेलुन फऊ फ़यिलातुन मफऊल
आचार्य प्रणाम,
पहले मैंने यूं कोशिश करके देखि,,,,
फिर कुछ और ध्यान देकर के एक और देखि जो के मुझे इस से सरल लगी,,,,
सही गलत आप बताएं,,,,,
फेलुन फेलुन फ़ाइलुन फेलुन फेलुन फाय,,,,,,,,,,,,,,,
इसी तरह के दोहा के लिए ये वाली बहर जो के मुझे पहले वाली से आसान औ सही लगी ,,सो ये लाया हूँ,,,,,,आप देख कर बताये,,,,,
शुरू में लगा के ये काम बेहद मुश्किल है,,,पर करने लगा तो आराम से हो गया,,,,
लेकिन एक अजीब बात भी हुई,,,,,
जाने क्यूं ये करते हुए भीतर से कई बार आवाज आई के मैं ये काम ना करुँ,,,,,,,
पर क्यूंकि इंटरेस्ट आ चुका था.... और आपने कहा था ,,,सो कर दिया,,,,,,
पर भीतर कुछ है जो यहाँ पर,,,इस बारे में सोचने से रोक रहा है,,,,,
हो सकता है के आपको ये मेरा होम वर्क ठीक लगे और आप इसे ओ,के, कर दें,,,,,
बेशक मेरा ज्ञान भी बढा और मुझे दोहे के अलावा बहर को भी जानने का मौका मिला ,,
पर जाने क्या है के मुझे ये सब करके खुशी नहीं महसूस हुई,,,,,
आशा है के आप इस बारे में भी मुझे बतायेंगे,,,,,
या शायद वो मेरे भीतर वाली बहर ,,,,,,इस बाहरी जानकारी से कुछ आहात हुई,,???
जाने क्या है,,,,,,पर कुछ है जरूर,,,,,,,,!!!!!!!!!!
आपने तो आज कमाल कर दिया और गुरु जी की आज्ञा का पालन करके कुछ होम वर्क कर लाये. वेरी गुड बॉय! आज जो मैंने आपकी शिकायत की है गुरु जी से उसके लिये आपसे माफ़ी चाहती हूँ अपने कान खुद ही खींचकर. आपने जो भी लिखा है अच्छा ही होगा लेकिन अपने पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा. यह सब क्या है, कौन सी भाषा है आदि सवाल दिमाग को खा रहे हैं. आप मुझपर हँसना चाहें तो free हैं हंसने के लिये. पर हेल्प! मुझे कोई समझाये कि इस सबका क्या मतलब है और मैं भी कैसे समझ सकती हूँ. आपकी बहादुरी की दाद देती हूँ मनु जी, आगे भी आप ऐसे ही गुड बॉय बने रहिये तो मैं भी जल्दी से छुट्टी पर हो आऊँ .
इसमें कमाल जैसी कोई बात नहीं है,,,और न ही ये कोई भाषा है,,,,न इसका कोई मतलब,,,,
जैसे दोहे में शब्द का वजन करने के सूत्र हैं,,,जगन मगन यमाता वगैरह होते हैं,,,ऐसे ही ग़ज़ल में शेर का वजन कने के सूत्र हैं,,,जैसे,,,
(खीरा) फेलुन (मुख से ) फेलुन
(काटिए) फ़ाइलुन
(मलिए) फेलुन (नोन) फेलुन
(लगाए) फाय,
इसमें,,,,,,,,,,,(नो --फे) (न लगाए--- लुनफाय )
ऐसे होगा.....
रहिमन ( फेलुन ) कड़वे ( फेलुन) मुखन को (फ़ाइलुन)
चाही (फेलुन)
(yahi सजाय ...फेलुन फाय...)----इसमें एक मात्रा आगे पीछे है पर कुल वजन बराबर है,,,,,या हो सकता है के ये दोहा ही मुझे एकदम सही याद ना आ रहा हो,,,,
है वही दोहे वाला,,,,
(फेलुन फेलुन फ़ाइलुन ---१३ ) (फेलुन फेलुन फाय------११ )
अब तक कभी ये सब जानना जरूरी नहीं समझा था ,,,इस होमवर्क के चलते जाना गया,,,,,
दिमाग की ज़रा सी कसरत हो गई इस बहाने,,,,,
अजित जी,
अंग्रेजो ने शायद हम से ही छंद लिए हो,,,,,क्यूंकि मुझे इस के बारे में एकदम से नहीं पता मेरे लिए तो कप प्लेट चाय पीने के सामान से अधिक और कुछ नहीं,,,:::::::::)))))))))))
और ये भी हो सकता है के गजल भी दोहे से प्रेरित होकर बनी हो,,,इसकी भी मुझे जानकारी नहीं है,,,,,
दोहे की जो धुन मन में बसी है बचपन से वो ये है जो ऊपर लिखी है,,,,, ये भी २३ तरह के होते हैं अब पता लगा है,,,,,,जितना भी जान सका अच्छा लगा,,,,,दोहे में कोई मात्र गिराई नहीं जाती,,,
हर शब्द जैसे लिखा है वैसे ही पूरे वजन सहित पढा जाता है,,,,,
गजल के शेर में ऐसा नहीं होता,,,,,इसमें शब्द की मात्रा को गिरा सकते हैं laai में लाने के लिए,,,
पर वही मात्राए जिन्हें गिराने की इजाजत आपकी जबान दे दे,,,,,
मैंने क्यूंकि बहर को जाना नहीं है या कहे के पढा नहीं है,,,,इसलिए ये बताना मेरे लिए मुश्किल है के कौन सी मात्राए कैसे और क्यूं गिराई जा सकती है ,,,,,ये तो मैं सामने बैठकर ही कह सकता हूँ,,,लिख कर नहीं,,,,पर कही कही देखा गया है के बहुत से लोग मात्रा को उस जगह गिराते हैं जहां पर हमारी जबान इजाजत नहीं देती,,,,ये बात गजल की खूबी को दोष बना देती है,,
चाहे किसी भी किताब का हवाला दिया जाए,,,पर मैं वही मानता हूँ जो मेरा दिल मान ले,,,
लगता है कुछ ज्यादाही हो गया,,,,
Saturday, May 16, 2009
दोहा गोष्ठी 16 दोहा है सबका सगा
दोहा है सबका सगा, करे कामना पूर्ण.
छंदराज में समाहित, काव्य-शास्त्र सम्पूर्ण..
किसने किससे क्या लिया, पढें-करें अनुमान.
शे'र और कप्लेट का, मिला हमें कुछ ज्ञान..
हुई कुण्डली से तनिक, जिसकी भी पहचान.
गले कुण्डली से मिला, बन रसनिधि-रसखान. .
शन्नो जी!
गुरु जी अब कप-प्लेट का, छोडें चक्कर आप.
पी गिलास में चाय लें, शक्कर डालें नाप..
रखा जैम में क्या कहें, खाएं बस गुलकंद
कपलेट को हम भूलकर, गाएन अपने छंद..
शुद्ध किया मम कार्य को, मिला ज्ञान का नीर.
आभारी हूँ मैं बहुत, चल दोहे के तीर..
इच्छा पूरी मैं करुँ, है सचमुच अनिवार्य
हे ईश्वर! मैं क्या करुँ, पूर्ण हो सके कार्य..
लज्जित मुझे न कीजिये, करके मुझे नमन
मैं अपने श्रद्धा-सुमन, करती रहूँ अर्पन..
मनु जी रहे अलाप अब, बहुत अनोखा राग
अंतरिक्ष पर जाऊंगा, मैं जल्दी ही भाग..
गुरु जी! करिये अब दया, खींचें मनु के कान
मस्ती सारा दिन करें, हुए बहुत शैतान.
पैर कुल्हाडी मार ली, शन्नो ने हो त्रस्त
कहाँ पताका अजित की, खाली है अब हस्त.
मनु जी! वंदन आपका, किया अनूठा काम.
बहर खोजकर ला रहे, दोहा की अभिराम.
मफाइलुन मुत्फ़ाइलुन फेलुन फाल फ़ऊल
कलम पटक कर भाग लीं, शन्नो जी फ़िलहाल.
झपट अजित जी ने कलम, फिर थामी तत्काल..
फ़यिलातुन फेलुन फऊ फ़यिलातुन मफऊल
झंडा ले मनु आ गए, करने फिर उत्पात.
कहते हैं यह काम ना, करें- उठे ज़ज्बात..
फेलुन फेलुन फ़ाइलुन फेलुन फेलुन फाय
काम न मुश्किल था मगर, मुश्किल था यह काम.
काम करा बिन काम के, दोहा-झंडा थाम..
जान बहर को यह लगा, हूँ खुशियों से दूर.
भीतरवाली बहर को, सौत नहीं मंजूर..
बाहर-भीतर के नहीं, पड़ें फेर में आप.
दोनों को गर जान लें, यश पाएंगे आप..
अंगरेजी मन भाया दोहा:
दोहा के चमत्कारिक प्रभाव से अंगरेजी बच नहीं सकी. 'हीरोइक' अर्थात वीर-काव्य में सामान्यतः इसी छंद का प्रयोग किये जाने से इसे 'हीरोइक'' की संज्ञा मिली. इसकी प्रत्येक पंक्ति 'आयम्बिक पञ्चपदी' होती है अर्थात अतुकांत छंद की भांति प्रत्येक पंक्ति में दस शब्दांश होते हैं जिनमें से ५ दीर्घ होते हैं. सामान्यतः हृस्व पद पहले तथा दीर्घ पद बाद में होता है.
यथा-
''to err / is hu' / man, to' / forgive' / divine.''
अर्थात- त्रुटि है मानव-सुलभ, क्षमा करना देवोपम.
(सन्दर्भ- विलियम हेनरी हडसन, अंगरेजी साहित्य का इतिहास, अनु. जगदीशबिहारी मिश्र, पृष्ठ १००, १०९, १३१, १३२, १३९, २१७)
सर्व प्रथम महापंडित-महाकवि मिल्टन (९ दिसम्बर १६०८- ८ नवम्बर १६७४) ने 'पैराडाइस लास्ट' के लिये 'तुकरहित हीरोइक छंद चुना. कालांतर में अतिरंजना व दुर्बोधता की शिकार 'मेटाफ़िजिकल' कवियों की रचनाओं से क्लांत अंगरेजी छंदशास्त्र का सुधार एडमंड बॉलर (१६०५-१६८७) तथा सर जॉन डेग्हम (१६१५-१६६९) ने किया. ड्राइडेन (१६३१-१७००) के अनुसार 'बॉलर से पूर्व तुकांत की श्रेष्ठता और भव्यता का ज्ञान किसी को नहीं था. उसी ने हमें इसका ज्ञान कराया...लेखन को कला बना दिया...बताया कि किस प्रकार प्रत्येक भावः कि समाप्ति दोहे कि दो पंक्तियों में ही की जा सकती है. उसने 'हीरोइक दोहे के 'क्लासिक' ( निमीलित ) रूप को प्रचलित किया जिसमें भाव एक दोहे से दूसरे दोहे में अबाध रूप से न चलकर दूसरी पंक्ति के साथ समाप्त हो जाए. पॉप (१६८८-१७४४) तथा डेनहम ने इसे पूर्णता के शिखर पर पहुँचाया. पॉप के 'एस्से ऑफ़ क्रिटीसिज्म' की प्रसिद्ध पंक्तियों में कवि काव्य-देवी के अश्व को एड लगाने की अपेक्षा उससे पथ- प्रदर्शन की अपेक्षा करता है-''T'is more to guide than spur the Muse's speed,
Restrain his fury, than provoke his speed,
The winged coarser, like a gen'rous horse,
Shows most true mettle when you check his course,
Those rules of old discovere'd not devise'd,
Are Nature still, but nature methodise'd,
By the same laws which tirst herself ordained.
Learn hence for ancient rules a just esteem,
To copy Nature is to copy them.
(लहरों पर नाव -डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ठाकुर)
अर्थात-
काव्य-कल्पना के घोडे को, एड लगा मत वेग बाधाएं.
आवेशों को करें नियंत्रित, मार्ग निदर्शन उससे पायें..
उड़न अश्व की सच्ची प्रतिभा होती केवल तब ही दर्शित.
चालक वल्गा थाम करों में करता हो जब चाल नियंत्रित..
अन्वेषित प्राचीन काल में, नियम नहीं थे केवल कल्पित.
प्रकृति सदृश वे नियम अभी भी, प्रकृति सदृश हैं पूर्ण व्यवस्थित..
स्वंत्रता के सदृश प्रकृति भी रहती है बंधन में.
उन नियमों के, जिन्हें बनाया स्वयं उसीने मन में.
अतः' पुरातन नियमों का सम्मान, उचित करना है.
नियम पालना ही प्रकृति के साथ-साथ चलना है.'
क्लासिकल दोहा छंद का पॉप-रचित निम्न उदाहरण उसके काव्य नैपुण्य का परिचायक है.
'A wits a feather and a chief a rod.
An honest man's the noblestwork of God.'
अर्थात-
वाक-चतुर है पंख और मुखिया है दंड समान.
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति-मानव- जिसमें ईमान..
वाग-विदग्धता के कुहासे से नैसर्गिक रोमांटिकता के उल्लासपूर्ण परिवेश में अंगरेजी दोहा लोकप्रियता के सोपानों पर अभिषिक्त हुआ. वर्ड्सवर्थ (१७७०-१८५०) की पंक्तियों का आनंद लें-
'Bliss was it in that dawn to be alive.
But to be young was very heaven.'
अर्थात-
उस ऊषा में जीवित रहना ही था परमानन्द.
किन्तु युवा होना तो सचमुच ही बस स्वर्गिक था.
कप्लेट-गाथा छोड़ चलें हम, दोहा की रंग-छवियों में-
बुन्देली दोहा-
मन्दिर-मन्दिर कूल्ह रै, चिल्ला रै सब गाँव.
फिर से जंगल खों उठे, रामचंद के पाँव..- प्रो. शरद मिश्र.
छत्तीसगढी दोहा-
चिखला मती सीट अऊ, घाम जौन डर्राय.
ऐसे कायर पूत पे, लछमी कभू न आय.. - स्व. हरि ठाकुर
बृज दोहा-
कदम कुञ्ज व्है हौं कबै, श्री वृन्दावन मांह.
'ललितकिसोरी' लाडलै, बिहरेंगे तिहि छाँह.. -ललितकिसोरी
उर्दू दोहा-
सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत.
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाये गीत.. - निदा फाज़ली
मराठी दोहा- (अभंग)
या भजनात या गाऊ, ज्ञानाचा अभंग.
गाव-गाव साक्षरतेत, नांदण्डयाचा चंग.. -- भारत सातपुते
हाड़ौती दोहा-
शादी-ब्याऊँ बारांता , तम्बू-कनाता देख.
'रामू' ब्याऊ के पाछै, करज चुकाता देख.. -रामेश्वर शर्मा 'रामू भैय्या'
भोजपुरी दोहा-
दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरत उदान.. -- सलिल
निमाड़ी दोहा-
जिनी वाट मं$ झाड़ नी, उनी वाट की छाँव.
नेह, मोह, ममता, लगन, को नारी छे छाँव.. -- सलिल
हरयाणवी दोहा-
सच्चाई कड़वी घणी, मिट्ठा लागे झूठ.
सच्चाई कै कारणे, रिश्ते जावें टूट.. --रामकुमार आत्रेय.
राजस्थानी दोहा-
करी तपस्या आकरी, सरगां मिस सगरोत.
भागीरथ भागीरथी, ल्याया धरा बहोत.. - भूपतिराम जी.
गोष्ठी के अंत में -
कथा विसर्जन होत है, सुनहुं वीर हनुमान.
जो जन जहाँ से आयें हैं, सो तंह करहु पयान..
18 कविताप्रेमियों का कहना है :
I liked these
चाहते नहीं थे ,फिर भी हम रमने लगे |
बहुत बहुत अच्छी जानकारी ,आभार आपका
आचार्य जी
दोहा कक्षा के माध्यम से हमने छंद के बारे में बहुत ज्ञान प्राप्त किया। यह सब आपकी मेहनत और धैर्य का ही परिणाम रहा। दोहे का छंद हमेशा आकर्षित करता था लेकिन इसका पूर्ण ज्ञान नहीं था। मात्राओं को गिनने में भी कहीं न कहीं चूक हो ही जाती थी। आपने हमें जो ज्ञान दिया उसके लिए हम सब आपके आभारी हैं। हिन्दयुग्म के माध्यम से कक्षाओं का संचालन सभी के लिए हितकारी है। इसी प्रकार की अन्य कक्षाएं भी संचालित की जाएंगी तो सभी का सैद्धान्ति पक्ष और सुदृढ होगा। पुन: आभार।
आप कक्षा में आये. अद्भुत! बहुत अच्छा लगा. हमें लग रहा था कि आप हमें छोड़कर कहीं चले गये हैं. और मनु जी रोने-रोने को हो आये थे.
कक्षा के साथिओं आपसे कुछ कहना है यहाँ.
और आचार्य जी, उर्फ़ Our Great Master of Doha-kaksha:
I have brought some of my own Hindi - Dohas
And turned them into couplets to your delight
Have no complaints now, hope they amuse you
Don't taunt me either, and take pity on my plight.
1.
क्यों इतना मचा रखा, सबने यहाँ द्वंद
अंग्रेजी में हो रहे, अब यह दोहा-छंद.
What's wrong, and this fuss all about
Now English couplets in, hindi - Dohas out.
2.
ना भागी मैदान से, और ना कन्फ़ूज़न
अब यहाँ पर हो रहा है, दोहों का फ्यूजन
I havn't run away nor am confused
Master now wants doha-couplet fused
3.
गुरु जी का व्यंग सुना, कान नहीं हैं बन्द
मुझे तो अब मुदित करें, अपने दोहा - छंद.
I heard Master's taunts but my ears are not shut
I still prefer Dohas instead of English Couplets.
4.
अपने गुरु जी हैं बने, अंग्रेजी के भक्त
कक्षा में पलट दिया, अब मेरा ही तख्त.
Now our Guru ji have become a devotee of English
Having turned tables on me is wallowing in it's bliss.
'Now our Guru ji have become a devotee of English.'
Instead of 'have' the right verb is 'has'.
कमाल किया है आपने,,,,,और शुक्र है के ट्रांसलेट भी कर दिया वरना दिक्कत हो जाती हमें तो,,,,
मजा आ गया ,,,,,, आपको बहुत बहुत बधाई,,,,,,,
3.
गुरु जी का व्यंग सुना, कान नहीं हैं बन्द
मुझे तो अब मुदित करें, अपने दोहा-छंद.
I heard Master's taunts as my ears are not shut
I still prefer Dohas instead of English Couplet.
Another unintentional mistake :
In the first line of couplet 'As' is right here because 'but' changes it's meaning.
समझाने की आपको, मेरी नहीं बिसात
प्रतिभावान हैं स्वयं, देते सबको मात.
For thinking of me so high you are too kind.
But talented as you are you leave us all behind.
और शन्नोजी की प्रतिक्रिया से ।
यथा - पढ़कर मन अति आनंदित हो गया
नमन है आपको मेरा !!
शन्नो जी तो मेरिट लिस्ट वाली छात्र हो गई हैं..बहुत खूब लिखतीं हैं
मनु जी ..दोहों में भी महारथ?? talented student :)
है प्रसन्न, आ गया है, सब पर नवल निखार..
नीलाभित नीलम करे, सेहर-मन को मुग्ध.
रश्मि प्रभा की कांति वर, गंगा लगतीं दुग्ध..
मनु बहरों को बताते, बहरों के गुण खूब.
अलंकार यह यमक है, इसे समझ लें डूब..
जनगण-मन होता अजित होती है सरकार.
द्वेष श्लेष से मत करें, बिखरें बारम्बार..
शन्नो जी सोनेट को, आप न जाएँ भूल.
हिंदी-अंग्रेजी हुईं, ठंडी-ठंडी-कूल..
हिंदी मैया धारती, भाँति-भाँति के रूप..
कुछ की रंगत दिखाता, दोहा दिव्य अनूप..
शेष रहे जो लाइए, खोज-खोज कर मीत.
मन जीतें मन हारकर, मन हारें मन जीत..
छिपा न भागा था 'सलिल', गया राम के धाम.
लखनऊ हो लौटा तुरत, करता विनत प्रणाम..
दोहा ना आउट हुआ, कप्लेट हुआ न इन.
शन्नो जी संग नाचता, ता-ता-ता-ता-धिन..
फ्यूजन कन्फ्यूजन नहीं, और न इंग्लिश-भक्त.
हम सबमें है एक ही, हिंदी माँ का रक्त..
गिरतीं मिस मिस्टेक से, झेंपें बिन मिस्टेक.
फिर उठतीं मिस टेक कर, नैना होते लेक..
आँसू औ' मुस्कान दे, पूरे हुए चुनाव.
भाव किसी का बढ़ गया, गर किसी का भाव..
होमवर्क यह लाइए, कुछ दोहे सरकार.
जो कह दें सरकार से, कैसी हो सरकार..
सोंनेट का वादा रहा, पूरा करुँ जरूर
समय की तंगी से कुछ, मैं बेहद मजबूर
मैं बेहद मजबूर, कहीं को अब है जाना
फिर हैं कार्य अन्य, यह ना कोई बहाना
शन्नो बेबस बहुत, काम ज़रा हैं ज्यादा
कभी पूरा होगा, सोंनेट का भी वादा.
तो अब गुरुवर दें मुझे, जाने की इजाज़त
आ ना जाये कहीं से , फिर कोई मुसीबत.
आपने भड़काया जो, यह है अब प्रतिक्रिया
दोहे सीखे आपसे, तर्क हमें आ गया.
दोहे-कप्लेट से अब, मैं हो गयी टुन्न
नाच-नाच कर हो गये, पैर मेरे सुन्न.
देख रहे हैं लोग सब, बहुत और नचैया
मनु, अजित अब नाचेंगें, यहाँ ता-ता थैया.
''सोनेट का वादा रहा'' में १४ मात्राएँ हो गयी हैं (क्यों, क्यों, क्यों हो जाती हैं यह गलतियाँ???)
इसलिये:
''सोनेट का वादा भी'' समझियेगा जैसा आखिर के चरण में है.
ये दोनो ही प्रथम हैं, हम तो होते ढेर।
आप ढेर तो बहुत हैं, पर न हुये हैं ढेर
मनु अगर शेर हैं यहाँ, तो आप सवा सेर.
अजित जी,
दिमाग जरा उलझन में है, इसलिए कन्फयूजन हो गया. गुरु जी को संबोधित कर गयी मैं. अब मैं क्या करुँ? वह मुझे धिक्कार रहे होंगे और शायद मन ही मन में कोस भी रहे होंगे. कोई बात नहीं आजकल जरा चिकना घड़ा बनने की कोशिश कर रही हूँ. तो चलिए फिर से लिखती हूँ आपके लिए:
आप ढेर तो बहुत हैं, पर न हुयी हैं ढेर
पकडे झंडा आप हो, मनु अगर सवा सेर.