सलिल सृजन जनवरी २१
०
पूर्णिका
.
ठंड बज्जरबंड है
डरा रही प्रचंड है
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अनादि है, अनंत है
कँपा गई अखंड है
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जोड़-जोड़ दर्द दे
शरीर खंड-खंड है
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जो ना टुन्न हो सका
ठिठुरा रुंड-मुंड है
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ठंडी हवा यों लगे
तीक्ष्ण शूल झुंड है
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राह क्या बचाव की
काट क्या उद्दंड की
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हाथ ताप ले 'सलिल'
काष्ठ कर घमंड की
२१.१.२०२६
०००
सोरठा सलिला
•
दृष्टि देखती द्वैत, श्याम-गौर दो हैं नहीं।
आत्म अमिट अद्वैत, दोनों में दोनों कहे।।
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कान्ह कन्हैया लाल, कान्हा लला गुपाल जू।
श्याम कृष्ण गोपाल, गिरिधर मुरलीधर भजो।।
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नटखट नटवर नैन, नटनागर के जब मिलें।
छीने मन का चैन, मिलन बिना बेचैन कर।।
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वेणु हाथ आ; अधर चढ़, रही गर्व से ऐंठ।
रेणु चरण छू कह रही, यहाँ न तेरी पैठ।।
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होता भव से पार, कृष्ण कांत जिसके वही।
वह सकता भव-तार, इष्ट जिसे हो राधिका।।
२१-१-२०२३
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सॉनेट
संकल्प
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जैसी भी है यह दुनिया
हमको है रहकर जीना
शीश उठा तानें सीना
काँपे कभी न कहीं जिया
संकट जब जो भी आएँ
टकराकर हम जीतेंगे
विष भी हँसकर पी लेंगे
गीत सफलता के गाएँ
छोटा कद हौसला बड़ा
वार करेंगे हम तगड़ा र
ह न सकेगा शत्रु खड़ा
हिम्मत कभी न हारेंगे
खुद को सच पर वारेंगे
सारे जग को तारेंगे
२१-१-२०२३
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सॉनेट
छीछालेदर
*
है चुनाव हो छीछालेदर।
नूराकुश्ती खेले नेता।
सत्ता पाता वादे देकर।।
अनचाहे वोटर मत देता।।
नाग साँप बिच्छू सम्मुख हैं।
भोले भंडारी है जनता।
जिसे चुनो डँसता यह दुख है।।
खुद को खुद मतदाता ठगता।।
टोपी दाढ़ी जैकेट झंडा।
डंडा थामे है हर बंदा।
जोश न होता ठगकर ठंडा।।
खेल सियासत बेहद गंदा।।
राम न बाकी; नहीं सिया-सत।
लत न न्याय की; अदा अदालत।।
***
सॉनेट
हेरा-फेरी
*
इसकी टोपी उसके सर पर।
उसकी झोली इसके काँधे।
डमरू बजा नजर जो बाँधे।।
वही बैठता है कुर्सी पर।।
नेता बाज; लोक है तीतर।
पूँजीपति हँस डाले दाना।
चुग्गा चुगता सदा सयाना।।
बिन बाजी जो जीते अफसर।।
है गणतंत्र; तंत्र गन-धारी।
संसद-सांसद वाक्-बिहारी।
न्यायपालिका है तकरारी।
हक्का बक्का हैं त्रिपुरारी।।
पंडिताई धंधा बाजारी।।
पैसा फेंक देख छवि प्यारी।।
२१-१-२०२१
***
एक दोहा
लपक आपने ले लिया, हमसे हिंदी-फूल.
हाय! क्या कहें दे रहीं, हैं अंगरेजी-फूल
मुक्तक
बोलती हैं अबोले भी बोल कुछ आँखें.
भर सकें परवाज़ पंछी, खोलते पाँखें.
जड़ हुए तो क्या सलिल, चेतन हमीं होंगे-
तन तने सम, फूल-फलना चाहती शाखें।।
०००
लघु व्यंग्य
विकास
*
हे गुमशुदा! तुम जहाँ कहीं हो चुपचाप लौट आओ. तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा. तुम्हारे दुःख में युवा बेरोजगार, दलित शोषण के शिकार, पिछड़े परवरदिगार और अगड़े धारदार हथियार हो रहे हैं. तुम्हारे बिना आयकर का बढ़ना, मँहगाई का चढ़ना और पड़ोसी का लड़ना बदस्तूर जारी है.
तुम्हारे नाम पर बनते शौचालय, महामार्ग और स्मार्ट शहर तुम्हारे वियोग में उद्घाटन होते ही चटकने लगते हैं. तुम्हारे आने का दावा कर रहे नेता जुमलों का हिमालय खड़ा कर चुनाव जीत रहे हैं. हम अपने घर को न सम्हाल पाने पर भी खुद को विश्व का मसीहा मानकर बूँद-बूँद रीत रहे हैं.
हम तुम्हारे वियोग में सद्भावों का कर रहे हैं विनाश, चौराहे पर रखे बैठे हैं सत्य की लाश, इससे पहले कि आशा हो जाए हताश अपने घर लौट आओ नहीं आना है तो भाड़ में जाओ हे विकास.
२१ . १ . २०१८
***
नवगीत:
*
मिली दिहाड़ी
चल बाजार
चावल-दाल किलो भर ले-ले
दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी
तेल पाव भर फ़ल्ली का
सिंदूर एक पुडिया दे
दे अमरूद पांच का, बेटी की
न सहूं नाराजी
खाली जेब पसीना चूता
अब मत रुक रे!
मन बेजार
निमक-प्याज भी ले लऊँ तन्नक
पत्ती चैयावाली
खाली पाकिट हफ्ते भर को
फिर छाई कंगाली
चूड़ी-बिंदी दिल न पाया
रूठ न मो सें प्यारी
अगली बेर पहलऊँ लेऊँ
अब तो दे मुस्का री!
चमरौधे की बात भूल जा
सहले चुभते
कंकर-खार
***
अभिनव प्रयोग:
नवगीत :
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मिलती काय न ऊँचीवारी
कुरसी हमखों गुइयाँ
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हमखों बिसरत नहीं बिसारे
अपनी मन्नत प्यारी
जुलुस, विशाल भीड़ जयकारा
सुविधा-संसद न्यारी
मिल जाती, मन की कै लेते
रिश्वत ले-दे भैया
.
पैलां लेऊँ कमीशन भारी
बेंच खदानें सारी
पाछूं घपले-घोटाले सौ
रकम बिदेस भिजा री
होटल फैक्ट्री टाउनशिप
कब्जा लौं कुआ तलैया
.
कौनौ सैगो हमरो नैयाँ
का काऊ सेन काने?
अपनी दस पीढ़ी खें लाने
हमें जोड़ रख जानें
बना लई सोने की लंका
ठेंगे पे राम-रमैया
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(बुंदेली लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फागों की लय पर आधारित, प्रति पद १६-१२ x ४ पंक्तियाँ, महाभागवत छंद )
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एक छक्का:
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पार एक से पा नहीं, पाते हैं हम-आप
घिरे चार के बीच में, रहे केजरी काँप
रहे केजरी काँप, आप है हक्का-बक्का
अमित जोर से लगा कमल का ऊँचा छ्क्का
कहे 'सलिल' कविराय, लडो! मत मानो हार
जनगण-मन लो जीत तभी हो नैया पार
२१-१-२९१५
***
मुक्तक:
*
चिंता न करें हाथ-पैर अगर सर्द हैं
कुछ फ़िक्र न हो चहरे भी अगर ज़र्द हैं
होशो-हवास शेष है, दिल में जोश है
गिर-गिरकर उठ खड़े हुए, हम ऐसे मर्द हैं.
*
जीत लेंगे लड़ के हम कैसा भी मर्ज़ हो
चैन लें उतार कर कैसा भी क़र्ज़ हो
हौसला इतना हमेशा देना ऐ खुदा!
मिटकर भी मिटा सकूँ मैं कैसा भी फ़र्ज़ हो
२१-१-२०१५
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छंद सलिला:
दस मात्रिक दैशिक छंद:
संजीव
*
दस दिशाओं के आधार पर दस मात्रिक छंदों को दैशिक छंद कहा जाता है. विविध मात्रा बाँट से ८९ प्रकार के दैशिक छंद रचे जा सकते हैं।
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, सार, सुगति/शुभगति, सुजान, हंसी)
दस मात्रिक दीप छंद
*
दस मात्रक दीप छंद के चरणान्त में ३ लघु १ गुरु १ लघु अर्थात एक नगण गुरु-लघु या लघु सगण लघु या २ लघु १ जगण की मात्रा बाँट होती है.
उदाहरण:
१. दीप दस नित बाल, दे कुचल तम-व्याल
स्वप्न नित नव पाल, ले 'सलिल' करताल
हो न तनिक मलाल, विनत रख निज भाल
दे विकल पल टाल, ले पहन कर-माल
२. हो सड़क-पग-धूल, नाव-नद-नभ कूल
साथ रख हर बार, जीत- पर मत हार
अनवरत बढ़ यार, आस कर पतवार
रख सुदृढ़ निज मूल, फहर नभ पर झूल
३. जहाँ खरपतवार, करो जड़ पर वार
खड़ी फसल निहार, लुटा जग पर प्यार
धरा-गगन बहार, सलामत सरकार
हुआ सजन निसार, भुलाकर सब रार
०००
षट्पदी :
*
सु मन कु मन से दूर रह, रचता मनहर काव्य
झाड़ू मन हर कर कहे, निर्मलता संभाव्य
निर्मलता संभाव्य, सुमन से बगिया शोभित
पा सुगंध सब जग, होता है बरबस मोहित
कहे 'सलिल' श्रम सीकर से जो करे आचमन
उसकी जीवन बगिया में हों सुमन ही सुमन
२१ . १ . २०१४
===
मुक्तक
रूप की आरती
*
रूप की आरती उतारा कर.
हुस्न को इश्क से पुकारा कर.
चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-
तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..
*
रूप होता अरूप मानो भी..
झील में गगन देख जानो भी.
देख पाओगे झलक ईश्वर की-
मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..
*
नैन ने रूप जब निहारा है,
सारी दुनिया को तब बिसारा है.
जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-
मैंने परमात्म को गुहारा है..
*
झील में कमल खिल रहा कैसे.
रूप को रूप मिल रहा जैसे.
ब्रम्ह की अर्चना करे अक्षर-
प्रीत से मीत मिल रहा ऐसे..
*
दीप माटी से जो बनाता है,
स्वेद-कण भी 'सलिल' मिलाता है.
श्रेय श्रम को मिले दिवाली का-
गौड़ धन जो दिया जलाता है.
*
भाव में डूब गया है अक्षर,
रूप है सामने भले नश्वर.
चाव से डूबकर समझ पाया-
रूप ही है अरूप अविनश्वर..
*
हुस्न को क्यों कहा कहो माया?
ब्रम्ह को क्या नहीं यही भाया?
इश्क है अर्चना न सच भूलो-
छिपा माशूक में वही पाया..
२१-१-२०१३
***
अभिनव प्रयोग:
यमकमयी मुक्तिका:
*
नहीं समस्या कोई हल की.
कोशिश लेकिन रही न हलकी..
विकसित हुई सोच जब कल की.
तब हरि प्रगटें बनकर कलकी..
सुना रही है सारे बृज को
छल की कथा गगरिया छलकी..
बिन पानी सब सून हो रहा
बंद हुई जब नलकी नल की..
फल की ओर निशाना साधा
कौन करेगा फ़िक्र न फल की?
नभ लाया चादर मखमल की.
चंदा बिछा रहा मलमल की..
खल की बात न बट्टा सुनता.
जब से संगत पायी खल की..
श्रम पर निष्ठां रही सलिल की
दुनिया सोचे लकी-अनलकी..
कर-तल की ध्वनि जग सुनता है.
'सलिल' अनसुनी ध्वनि पग-तल की..
२३-२-२०११
***
छंद - बहर दोउ एक हैं
मुक्तिका
*
तुझे भी क्या कभी गुजरे ज़माने याद आएँगे
मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
गणसूत्र - य र त म य ग
मात्रभार - २८, यौगिक जातीय, विधाता मात्रिक छंद
वर्णभार - १६, अष्टादि: जातीय छंद
रुक्न - मुफाईलुं x ४
टीप : 'गुजरे' को 'बीते' करने पर १२२२ के स्थान पर १२११२ करने से बचा जा सकता है। गुरु को दो लघु करने की छूट लेने पर काव्य रचना आसान हो जाती है पर पिंगल शास्त्र के अनुसार ऐसा करने पर उन पंक्तियों में छंद भिन्न हो जाता है।
*
तुझे भी क्या कभी गुजरे ज़माने याद आएँगे
मिलें तन्हाईयाँ सपने सुहाने याद आएँगे
करोगे गुफ्तगू खुद से कभी तो जान लो जानां
लिखोगे मुक्तिका दोहे तराने याद आएँगे
बहाओगे पसीना, बादलों में देखना हमको
हँसेंगी खेत में फ़स्लें बहाने याद आएँगे
इसे देखो दिखा उसको न वो दिन अब रहे बाकी
नए साधो न तुम बीते निशाने याद आएँगे
न तुमसे दूर हैं, तुम भी न हमसे दूर हो यारां
हमें तुम याद आओगे, तुम्हें हम याद आएँगे
***
तुझे भी क्या कभी बीते ज़माने याद आएँगे
नहीं जो साथ वो भूले ज़माने याद आएँगे
हमेशा प्यार ही पाओ नहीं होता कभी ऐसा
न चाहो तो नहीं झूठे ज़माने याद आएँगे
नदी ने प्यास से पूछा कहाँ क्या दाम वो देगी?
लुटा दी तृप्ति पाने आ जमाने याद आएँगे
मिलेगा साथ साथी का न सच्चा आप खोजोगे
न चाहोगे जिसे वो ही जमाने याद आएँगे
न भूली हो, न भूलोगी, कहो या ना कहो प्यारी
रहे संजीव जो वो ही जमाने याद आएँगे
२१.१.२०१०
०००
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