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मंगलवार, 27 जनवरी 2026

जनवरी २७, हरियाणवी हाइकु, सोरठा, उल्लाला, चित्रगुप्त, सरस्वती, दोस्त, ग्वारीघाट जबलपुर, सप्त मात्रिक छंद, गीत

सलिल सृजन जनवरी २७
पूर्णिका
.
मन! कहो क्या करूँ रीत का
लेश जिसमें नहीं प्रीत का
.
जिंदगी जिंदगी ही नहीं
ज्ञान जिसको नहीं नीत का
.
हार से हारता जब नहीं
पंथ तब ही मिले जीत का
.
धड़कनों को धड़कना सिखा
आप आशिक हुआ गीत का
.
दुरदुराता रहा जग, न जग
मोल जाना नहीं क्रीत का
.
भ्रम वहम है अहं का 'सलिल'
मान रखना सदा मीत का
०००
चंद अश'आर
.
दस्तक दरे-दिल पर न देता दोस्त हो 
दिन न मुझको जिंदगी में देखना है।
.
दोस्त दरिया दिल दयानतदार दे
जिंदगी ने जिंदगी कर दी अता।
.
दिल! दुखाना मत कभी दिल दोस्त का
मुआफी मौला नहीं देगा तुझे।
.
तीरगी में दोस्त ही बनकर दिया
साथ मेरे उम्र भर चलता रहा।
.
बाँह थामी दोस्त की बर्बाद ने
दोस्ती ने कर दिया आबाद झट।
.
दोस्त को साया कभी मत बोलना
वह नहीं यह अँधेरे में साथ दे।
.
दोस्त के लगकर गले ऐसा लगा
चाँद-सूरज जमीं पर मिलते गले।
.
कयामत कुदरत ने ढाई दोस्त पर
दोस्त बोला- 'छोड़ उसको, मुझपे ढा।
.
दोस्ती ने तर्क सारे फर्क कर
दो दिलों को एक कर ही दम लिया।
२७.१.२०२६
०००
हरियाणवी हाइकु
*
लिक्खण बैठ्या
हरियाणवी कविता
कग्गज कोरा।१।
*
अकड़ कोन्या
बैरी बुढ़ापा आग्या
छाती तान के।२।
*
भला हकीम
आक करेला नीम
कड़वा घणा।३।
*
रै बेइमान!
छुआछूत कर्‌या
सब हैं एक।४।
*
सबतै ऊँच्चा
जीवन मैं अपने
दर्जा गुरु का।५।
*
हँसी गौरैया
किलकारी मारकै
मनी बैसाखी।६।
*
चैन की बंसी
दुनिया को चुभती
चाट्टी चिन्ता नै।७।
*
सुपणा पूरा
जीत ल्याई मैडल
गाम की लाड़ो।८।
*
देश नै नेता
खसोटन लाग्या हे
रब बचाए।९।
*
जीत कै जंग
सबनै चुनरिया
करती दंग।१०।
*
घर म्हं घर
खतरा चिड़िया नै
तोड़ पिंजरा।११।
*
भुक्खा किसान
मरणा हे लड़कै
नहीं झुककै।१२।
***
हिंदी हाइकु
*
याद ही याद
पोर-पोर समाई
स्वाद ही स्वाद।१।
*
सरिता बहे
अनकहनी कहे
कोई न सुने।२।
*
रीता है कोष
कम नहीं है जोश
यही संतोष।३।
*
जग नादान
नाहक भटकता
बने जिज्ञासु।४।
*
नहीं गैर से
खतराही खतरा
अपनों ही से।५।
*
नहीं हराना
मुझे किसी को कभी
यही जीत है।६।
*
करती जंग
बुराईयों से बिंदी
दुनिया दंग।७।
*
धूप का रूप
अनुपम अनूप
मिस इण्डिया।८।
***
सोरठा सलिला
*
लख वसुधा सिंगार, महुआ मुग्ध महक रहा।
किंशुक हो अंगार, दग्ध हृदय कर झट दहा।।
वेणी लाया साथ, मस्त मोगरा पान भी।
थाम चमेली हाथ, झूम कर रहा ठिठोली।।
रंग कुसुंबी डाल, राधा जू ने भिगाया।
मलकर लाल गुलाल, बनवारी ने खिझाया।।
रीझ नैन पर नैन, मिले झुके उठ मिल लड़े।
चारों हो बेचैन, दोनों में दोनों धँसे।।
दिल ने दिल का हाल, बिना कहे ही कह दिया।
दिलवर हुआ निहाल, कहा दिलरुबा ने पिया।।
२७-१-२०२३
चित्रगुप्त जी का न्याय
एक घोर पापी चोर,जुआरी, शराबी, व्यसनी मनुष्य ने जीवन में एक भी पुण्य न कर र पाप ही पाप किए।
एक दिन उसने महारानी की सवारी बाजार से निकलते देखी और महारानी के सिर पर सजी हुई मोगरे के फूलों की वेणी (माला) देखते ही उसे चुराकर अपनी प्रेयसी को उपहार स्वरूप देने का विचार किया। सैनिकों को छकाते हुए बहुत चतुराई से उसने महारानी के सिर से वह वेणी निकाली और लेकर सरपट अपनी प्रेयसी के पास भागा।
उसे वेणी चुराकर भागता देख महारानी के रक्षक सैनिक उसे पकड़ने के लिए दौड़े। चोर व्यसनी था, उसका शरीर भागते-भागते शीघ्र ही थक-चुक गया और वह एक पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ा। संयोग से वह एक चबूतरे पर स्थापित शिवलिंग के निकट गिरा। चाहकर भी वह उठ नहीं पा रहा था, भागता कैसे? उसे पकड़ने के लिए पल-पल समीप आ रहे राजा के सैनिक उसे यमदूतों की तरह लग रहे थे। चोर के मुँह से निकला- "अब तो मरना है ही! ले तू ही पहन ले इसे!" उसने वेणी शिवलिंग को पहना दी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
मरते ही उसे चित्रगुप्त जी के दरबार में लाया गया। यमराज बोले- "प्रभु! इस जीव ने जीवन में एक भी पुण्य नहीं किया। इसका पूरा जीवन पापमय आचरण करते हुए व्यतीत हुआ है, इसे सौ कल्प तक नरक-वास करने का दंड दीजिए।
चित्रगुप्त जी ने उसके कर्मों का सूक्ष्म विचारण कर कहा- 'इसने मृत्यु से ठीक पहले अंत समय में शंकर भगवान को निस्वार्थ भाव से वेणी अर्पित की और उन्हीं को स्मरण कर प्राण तजे इसलिए यह एक मुहूर्त के लिए इंद्रपद का अधिकारी है। "
यह सुनते ही यमराज ने चोर से पूछा कि वह नरक भोगकर एक मुहूर्त स्वर्ग का शासन करेगा या पहले स्वर्ग का राजा बनकर नरक में यातना झेलेगा?
चोर ने सोचा कि पहले स्वर्ग के आनंद ले लेना चाहिए बाद में तो नरक की अग्नि में जलना ही है। इंद्रदेव को यह सुचना मिली तो उन्होंने उस चोर को अपशब्द कहते हुए उसे इन्द्रासन के अयोग्य बताया पर देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त के न्यायादेश का पालन करनी ही पड़ा। उस चोर को इंद्र के स्थान पर एक मुहूर्त के लिए स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा दिया गया।
इंद्रदेव दवरा किए गए अपमान से क्षुब्ध चोर ने इंद्रासन पर बैठते ही सोचा कि स्वर्ग का खजाना खाली कर इंद्र से अपमान का बदला लेना है।उसने विनम्रतापूर्वक देवगुरु बृहस्पति से पूछा- "गुरुदेव! मैंने मरने से पहले जिसको माला पहनाई थी… क्या नाम था उसका… शिव! मैं स्वर्ग की समस्त संपदा शिव को दान देना है। आप साक्षी के रूप में ऋषि-महर्षियों को बुलवाइए।"
इंद्रासन पर आसीन देवराज के आदेश का पालन अनिवार्य था। चोर एक मुहूर्त के लिए ही सही पर था तो इंद्र ही। सप्तऋषि, नारद जी तथा अन्य ऋषिगण आ गए तो इस चोर ने जो अभी इंद्र था उसने दान आरंभ किया। गुरु बृहस्पति ने उसके हाथ में जल दिया और उसने स्वर्ग की सब संपदा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत हाथी, वज्र आदि शिव को दान दे दी।
एक मुहूर्त पूरा होते ही यमदूत उसे नरक ले जाने आ गए। तभी शिव जी के पार्षदों ने यमदूतों को उसे नरक ले जाने से रोक दिया कि निष्काम भाव से स्वर्ग-संपदा शिव जी को दान देने के कारण उसके करोड़ों पाप वैसे ही भस्म हो गए है जैसे अग्नि में काष्ठ।
शिवदूतों और यमदूतों में संघर्ष की स्थिति बनने के पहले ही स्वयं श्रीमन्नारायण भगवान प्रगट हुए और बोले: "बेटा तुमने शिव जी को दान दिया पर मुझ शिवभक्त को भूल गए? अब अगले जन्म में मैं स्वयं तुमसे दान लेने आऊँगा।
अगले जान में चोर महाराज बलि हुआ और उससे उसकी स्वर्ग सदृश्य संपदा तीन पग में विष्णु जी ने दान में ले ली। कर्मेश्वर चित्रगुप्त जी के न्याय विधान को यम ही नहीं विष्णु जी और शिव जी ने भी मान्यता दी।
***
शारदे माँ!
तार दे माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ।।
*
करो छाया, हरो माया,
साधना कर सके काया।।
वंदना कर, प्रार्थना कर,
अर्चना कर सिर नवाया।।
भाव सुमन बटोर लाया
हँस इन्हें स्वीकार ले माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ
शारदे माँ!
तार दे माँ!
*
मति पुनीता, हो विनीता,
साम गाए, बाँच गीता।।
कथ्य रस लय भाव अर्पित
अर्चना कर सिर नवाया।।
शब्द-सुमन बटोर लाया
हँस इन्हें स्वीकार ले माँ!
मन विकल है
प्यार दे माँ
शारदे माँ!
तार दे माँ!
*
रच ऋचाएँ साम गाऊँ,
तुझे मन में बसा पाऊँ।
बहुत भूला, बहुत भटका
अब तुम्हीं में मैं समाऊँ।।
सत्य-शिव-सुंदर रचा माँ
भव तरूँ, पतवार दे माँ!
शारदे माँ!
तार दे माँ!
२७-१-२०२१
***
ग्वारीघाट जबलपुर की एक शाम
*
लल्ला-लल्ली रोए मचले हमें घूमना मेला
लालू-लाली ने यह झंझट बहुत देर तक झेला
डाँटा-डपटा बस न चला तो दोनों करें विचार
होटल या बाजार गए तो चपत लगेगी भारी
खाली जेब मुसीबत होगी मँहगी चीजें सारी
खर्चा कम, मन बहले ज्यादा, ऐसा करो उपाय
चलो नर्मदा तीर नहाएँ-घूमें, है सदुपाय
शिव पूजें पाएँ प्रसाद सूर्योदय देखें सुंदर
बच्चों का मन बहलेगा जब दिख जाएँगे बंदर
स्कूटर पर चारों बैठे मानो हो वह कार
ग्वारीघाट पहुँचकर ऊषा करे सिंगार
नभ पर बैठी माथे पर सूरज का बेंदा चमके
बिंब मनोहर बना नदी में, हीरे जैसा दमके
चहल-पहल थी खूब घाट पर घूम रहे नारी-नर
नहा रहे जो वे गुंजाएँ बम भोले नर्मद हर
पंडे करा रहे थे पूजा, माँग दक्षिणा भारी
पाप-पुण्य का भय दिखलाकर चला चढ़ोत्री आरी
जाने क्या-क्या मंत्र पढ़ें फिर मस्तक मलते चंदन
नरियल चना चिरौंजीदाने पंडित देता गिन गिन
घूम थके भूखे हो बच्चे पैर पटककर बोले
अब तो चला नहीं जाता, कैसे बोलें बम भोले
लालू लाया सेव जलेबी सबने भोग लगाया
नौकायन कर मौज मनाई नर्मदाष्टक गाया
२७-१-२०२०
***
कार्यशाला
*
ऐसे सच्चे मित्र हैं, जीवन निधि अनमोल
घावों पर मरहम सरिस, होके उनके बोल - अनिल अनवर
होते उनके बोल, अमिय सम नवजीवन दें
मृदुला विमला नेह नर्मदा बन मधुवन दें
मिले गुलाबों से हमें जैसे परिमल इत्र
वैसे सही विमर्श दें, ऐसे सच्चे मित्र - संजीव
***
मुक्तिका:
रात
( तैथिक जातीय पुनीत छंद ४-४-४-३, चरणान्त sssl)
.
चुपके-चुपके आयी रात
सुबह-शाम को भायी रात
झरना नदिया लहरें धार
घाट किनारे काई रात
शरतचंद्र की पूनो है
'मावस की परछाईं रात
आसमान की कंठ लंगोट
चाहे कह लो टाई रात
पर्वत जंगल धरती तंग
कोहरा-पाला लाई रात
वर चंदा तारे बारात
हँस करती कुडमाई रात
दिन है हल्ला-गुल्ला-शोर
गुमसुम चुप तनहाई रात
२७-१-२०२०
छंद सलिला
दोहा
जैसे ही अनुभूति हो, कर अभिव्यक्ति तुरंत
दोहा-दर्पण में लखें, आत्म-चित्र कवि-संत
*
कुछ प्रवास, कुछ व्यस्तता, कुछ आलस की मार
चाह न हो पाता 'सलिल', सहभागी हर बार
*
सोरठा
बन जाते हैं काम, कोशिश करने से 'सलिल'
भला करेंगे राम, अनथक करो प्रयास नित
*
रोला
सब स्वार्थों के मीत, किसका कौन सगा यहाँ?
धोखा देते नित्य, मिलता है अवसर जहाँ
राजनीति विष बेल, बोकर-काटे ज़हर ही
कब देखे निज टेंट, कुर्सी ढाती कहर ही
*
काव्य छंद
सबसे प्यारा पूत, भाई जाए भाड़ में
छुरा दिया है भोंक, मजबूरी की आड़ में
नाम मुलायम किंतु सेंध लगाकर बाड़ में
खेत चराते आप, अपना बेसुध लाड़ में
*
द्विपदी
पत्थर से हर शहर में, मिलते मकां हजारों
मैं ढूँढ-ढूँढ हारा, घर एक नहीं मिलता
***
लौकिक जातीय सप्त मात्रिक छंद
१. पदांत यगण
तज बहाना
मन लगाना
सफल होना
लक्ष्य पाना
जो मिला है
हँस लुटाना
मुस्कुराना
खिलखिलाना
२. पदांत मगण
न भागेंगे
न दौड़ेंगे
करेंगे जो
न छोड़ेंगे
*
३. पदांत तगण
आओ मीत
गाओ गीत
नाता जोड़
पाओ प्रीत
*
४. पदांत रगण
पाया यहाँ
खोया यहाँ
बोया सदा
काटा यहाँ
*
कर आरती
खुश भारती
सन्तान को
हँस तारती
*
५. पदांत जगण
भारत देश
हँसे हमेश
लेकर जन्म
तरे सुरेश
*
६. पदांत भगण
चपल चंचल
हिरन-बादल
दौड़ते सुन
ढोल-मादल
*
७. पदांत नगण
मीठे वचन
बोलो सजन
मूँदो न तुम
खोलो नयन
*
८. पदांत सगण
सुगती छंद
सच-सच कहो
मत चुप रहो
जो सच दिखे
निर्भय कहो
२७-१-२०१७
***
नवगीत
तुम कहीं भी हो
.
तुम कहीं भी हो
तुम्हारे नाम का सजदा करूँगा
.
मिले मंदिर में लगाते भोग मुझको जब कभी तुम
पा प्रसादी यूँ लगा बतियाओगे मुझसे अभी तुम
पर पुजारी ने दिया तुमको सुला पट बंद करके
सोचते तुम रह गये
अब भक्त की विपदा हरूँगा
.
गया गुरुद्वारा मिला आदेश सर को ढांक ले रे!
सर झुका कर मूँद आँखें आत्म अपना आँक ले रे!
सबद ग्रंथी ने सुनाया पूर्णता को खंड करके
मिला हलुआ सोचता मैं
रह गया अमृत चखूँगा
.
सुन अजानें मस्जिदों के माइकों में जा तलाशा
छवि कहीं पाई न तेरी भरी दिल में तब हताशा
सुना फतवा 'कुफ्र है, यूँ खोजना काफिर न आ तू'
जा रहा हूँ सोचते यह
राह अपनी क्यों तजूँगा?
.
बजा घंटा बुलाया गिरजा ने पहुंचा मैं लपक कर
माँग माफ़ी लूँ कहाँ गलती करी? सोचा अटककर
शमा बुझती देख तम को साथ ले आया निकलकर
चाँदनी को साथ ले,
बन चाँद, जग रौशन करूँगा
.
कोई उपवासी, प्रवासी कोई जप-तप कर रहा था
मारता था कोई खुद को बिना मारे मर रहा था
उठा गिरते को सम्हाला, पोंछ आँसू बढ़ चला जब
तब लगा है सार जग में
गीत गाकर मैं तरूँगा
***
उल्लाला सलिला:
*
(छंद विधान १३-१३, १३-१३, चरणान्त में यति, सम चरण सम तुकांत, पदांत एक गुरु या दो लघु)
*
अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता।
भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता।।
*
मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना।
जगत देखता है नहीं अभियंता की भावना।।
*
सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत।
अभियंता योगी सदृश, कर्म करें निज अनवरत।।
*
भोगवाद हो गया है, सब जनगण को साध्य जब।
यंत्री कैसे हरिश्चंद्र, हो जी सकता कहें अब??
*
भृत्यों पर छापा पड़े, मिलें करोड़ों रुपये तो।
कुछ हजार वेतन मिले, अभियंता को क्यों कहें?
*
नेता अफसर प्रेस भी, सदा भयादोहन करें।
गुंडे ठेकेदार तो, अभियंता क्यों ना डरें??
*
समझौता जो ना करे, उसे तंग कर मारते।
यह कड़वी सच्चाई है, सरे आम दुत्कारते।।
*
हर अभियंता विवश हो, समझौते कर रहा है।
बुरे काम का दाम दे, बिन मारे मर रहा है।।
*
मिले निलम्बन-ट्रान्सफर, सख्ती से ले काम तो।
कोई न यंत्री का सगा, दोषारोपण सब करें।।
२७-१-२०१५
***
कृति चर्चा:
मरुभूमि के लोकजीवन की जीवंत गाथा "खम्मा"
*
[कृति विवरण: खम्मा, उपन्यास, अशोक जमनानी, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, पृष्ठ १३७, मूल्य ३०० रु., श्री रंग प्रकाशन होशंगाबाद]
*
राजस्थान की मरुभूमि से सन्नाटे को चीरकर दिगंत तक लोकजीवन की अनुभूतियों को अपने हृदवेधी स्वरों से पहुँचाते माँगणियारों के संघर्ष, लुप्त होती विरासत को बचाये रखने की जिजीविषा, छले जाने के बाद भी न छलने का जीवट जैसे जीवनमूल्यों पर केंद्रित "खम्मा" युवा तथा चर्चित उपन्यासकार अशोक जमनानी की पाँचवी कृति है. को अहम्, बूढ़ी डायरी, व्यासगादी तथा छपाक से हिंदी साहत्य जगत में परिचित ही नहीं प्रतिष्ठित भी हो चुके अशोक जमनानी खम्मा में माँगणियार बींझा के आत्म सम्मान, कलाप्रेम, अनगढ़ प्रतिभा, भटकाव, कलाकारों के पारस्परिक लगाव-सहयोग, तथाकथित सभ्य पर्यटकों द्वारा शोषण, पारिवारिक ताने-बाने और जमीन के प्रति समर्पण की सनातनता को शब्दांकित कर सके हैं.
"जो कलाकार की बनी लुगाई, उसने पूरी उम्र अकेले बिताई" जैसे संवाद के माध्यम से कथा-प्रवाह को संकेतित करता उपन्यासकार ढोला-मारू की धरती में अन्तर्व्याप्त कमायचे और खड़ताल के मंद्र सप्तकी स्वरों के साथ 'घणी खम्मा हुकुम' की परंपरा के आगे सर झुकाने से इंकार कर सर उठाकर जीने की ललक पालनेवाले कथानायक बींझा की तड़प का साक्षी बनता-बनाता है.
अकथ कहानी प्रेम की, किणसूं कही न जाय
गूंगा को सुपना भया, सुमर-सुमर पछताय
मोहब्बत की अकथ कहानी को शब्दों में पिरोते अशोक, राहुल सांकृत्यायन और विजय दान देथा के पाठकों गाम्भीर्य और गहनता की दुनिया से गति और विस्तार के आयाम में ले जाते हैं. उपन्यास के कथासूत्र में काव्य पंक्तियाँ गेंदे के हार में गुलाब पुष्पों की तरह गूँथी गयी हैं.
बेकलू (विकल रेत) की तरह अपने वज़ूद की वज़ह तलाशता बींझा अपने मित्र सूरज और अपनी संघर्षरत सुरंगी का सहारा पाकर अपने मधुर गायन से पर्यटकों को रिझाकर आजीविका कमाने की राह पर चल पड़ता है. पर्यटकों के साथ धन के सामानांतर उन्मुक्त अमर्यादित जीवनमूल्यों के तूफ़ान (क्रिस्टीना के मोहपाश में) बींझा का फँसना, क्रिस्टीना का अपने पति-बच्चों के पास लौटना, भींजा की पत्नी सोरठ द्वारा कुछ न कहेजाने पर भी बींझा की भटकन को जान जाना और उसे अनदेखा करते हुए भी क्षमा न कर कहना " आपने इन दिनों मुझे मारा नहीं पर घाव देते रहे… अब मेरी रूह सूख गयी है… आप कुछ भी कहो लेकिन मैं आपको माफ़ नहीं कर पा रही हूँ… क्यों माफ़ करूँ आपको?' यह स्वर नगरीय स्त्री विमर्श की मरीचिका से दूर ग्रामीण भारत के उस नारी का है जो अपने परिवार की धुरी है. इस सचेत नारी को पति द्वारा पीटेजाने पर भी उसके प्यार की अनुभूति होती है, उसे शिकायत तब होती है जब पति उसकी अनदेखी कर अन्य स्त्री के बाहुपाश में जाता है. तब भी वह अपने कर्तव्य की अनदेखी नहीं करती और गृहस्वामिनी बनी रहकर अंततः पति को अपने निकट आने के लिये विवश कर पाती है.
उपन्यास के घटनाक्रम में परिवेशानुसार राजस्थानी शब्दों, मुहावरों, उद्धरणों और काव्यांशों का बखूबी प्रयोग कथावस्तु को रोचकता ही नहीं पूर्णता भी प्रदान करता है किन्तु बींझा-सोरठ संवादों की शैली, लहजा और शब्द देशज न होकर शहरी होना खटकता है. सम्भवतः ऐसा पाठकों की सुविधा हेतु किया गया हो किन्तु इससे प्रसंगों की जीवंतता और स्वाभाविकता प्रभावित हुई है.
कथांत में सुखांती चलचित्र की तरह हुकुम का अपनी साली से विवाह, उनके बेटे सुरह का प्रेमिका प्राची की मृत्यु को भुलाकर प्रतीची से जुड़ना और बींझा को विदेश यात्रा का सुयोग पा जाना 'शो मस्त गो ऑन' या 'जीवन चलने का नाम' की उक्ति अनुसार तो ठीक है किन्तु पारम्परिक भारतीय जीवन मूल्यों के विपरीत है. विवाहयोग्य पुत्र के विवाह के पूर्व हुकुम द्वारा साली से विवाह अस्वाभाविक प्रतीत होता है.
सारतः, कथावस्तु, शिल्प, भाषा, शैली, कहन और चरित्र-चित्रण के निकष पर अशोक जमनानी की यह कृति पाठक को बाँधती है. राजस्थानी परिवेश और संस्कृति से अनभिज्ञ पाठक के लिये यह कृति औत्सुक्य का द्वार खोलती है तो जानकार के लिये स्मृतियों का दरीचा.... यह उपन्यास पाठक में अशोक के अगले उपन्यास की प्रतीक्षा करने का भाव भी जगाता है.
********
कुण्डलिया
मंगलमय हो हर दिवस, प्रभु जी दे आशीष.
'सलिल'-धार निर्मल रखें, हों प्रसन्न जगदीश..
हों प्रसन्न जगदीश, न पानी बहे आँख से.
अधरों की मुस्कान न घटती अगर बाँट दें..
दंगल कर दें बंद, धरा से कटे न जंगल
मंगल क्यों जाएँ, भू का हम कर दें मंगल..
२७-१-२०१३
***

सोमवार, 26 जनवरी 2026

जनवरी २६, मुक्तिका, सोरठे, गणतंत्र, नवगीत, लघुकथा, प्रजातन्त्र, जनतंत्र, लोकतंत्र

सलिल रचना जनवरी २६
मुक्तिका
*
जनगण सेवी तंत्र बने राधे माधव
लोक जागृति मंत्र बने राधे माधव
पेज पर्व गणतंत्र दिवस यह अमर रहे
देश जन यंत्र बने राधे माधव
होन वैल्यू न पर मनभेद कभी हममें
कोटि-कोटि जन बने एक राधे माधव
पक्ष-विपक्ष और सहिष्णु विवेकी हों
दाऊ-कन्हैया सदृश सदा राधे माधव
होन नर-नारी फुलाए हुए शंकर-उमा भंडार
संतति सीता-राम रहे राधे माधव
हो संजीवित जग जीवन की जय बोलें
हो न महाभारत भारत राधे माधव
आर्यावर्त बने भारत सुख-शान्तिप्रदा
रिद्धि-सिद्धि-विघ्नेश दास राधे माधव
देव कलम के! शब्द-शक्ति की जय जय हो
शरद सुत हों सदा सुखी राधे माधव
जगवाणी हिंदी की दस दिश जय गूंजे
स्नेह सलिल अभिषेक करे राधे माधव
गणतंत्र दिवस 2020
***
सोरठे गणतंत्र के
जनता हुई पार्टी, आज बने गणतंत्र हम।
जन-जन हो सारथी, भेद-भाव सब दूर हो।
*
सेवक होता है तंत्र, प्रजातन्त्र में प्रजा का।
यही सफलता-मंत्र, जनसेवी नेता।
*
होता है अनमोल, लोकतंत्र में लोकमत।
कलम उठाये तोल, नुकसान न करिये देश की।।
*
खुद भोगे अधिकार, तंत्र न जन की पीर हर।
शासन करे विचार, तो जनतंत्र सफल नहीं है।।
*
आन, बान, सम्मान, ध्वजा तिरंगी देश की।
विहंस लता दे जान, झकने कभी न दे 'सलिल'।
*
पालन ​​करिए नित्य, संविधान को जानना।
फ़र्ज़ मानिये सत्य, प्राधिकार की संस्थाएँ हैं।।
*
भारतीय एक हैं, जाति-धर्म को भुलाकर।
चलो हम नेक, भाईचारा पालकर
2016-11-2011
***
नवगीत
*
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
संविधान कर प्रोविजन
जो देता है, बताता है
सर्वशक्ति रचनाकार
केवल बेब्स-दीन
नाग-साँप-बिच्छू चुनावी लड़की
बाँट-फूट डालो
विजयी हूँ, मिल जन-धन लूटें
जन-गण हो निर्धन
लोकतंत्र का पोस्टर करता है
राजनीति बदरंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
उपयोगकर्ता खोजें, जीतें चुनाव, कह
जुमला जाता भूल
कहते हैं गरीबी पर गरीब को
मत, निर्मूल
खुद की मूरत लगा ताला,
वस्त्रते खुद हार
लूट-खसोट करें व्यापारी
अधिकारी बटमार
भीख, पा पुरस्कार
वापस करो हुड़दंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
*
गौरक्षा का नाम, गौरक्षा का नाम
बहुत दुख रहे हैं
कब्ज़ा शिक्षा-संस्थान पर
कर शराब में डूब गया
दुश्मनों के झंडे लहराते
सेना को दोष दें
बिन मेहनत पा सजीव न रोटी
तब आएगा होश
जंग जागे, गलती जो
करे उसी से जंग
प्रजातंत्र का अर्थ हो गया
केर-बेर का संग
22-8-2011
***
गीत:
ये कैसा जनतंत्र...
*
यह कैसा जनतंत्र की सहमति होनी चाहिए, हुआ गुनाह?
आह फिल वे जो न और क्यू सह सकते हैं व...
*
सत्ता और फैक्ट्री दल में नेता बंट गए
एक जय तो कहे दूसरा, मैं हार गया
नूरा कुश्ती खेल-कर जंग-मन को ठगते-
स्वार्थ और सत्य हित पल में हाथ मिलाये मिलते हैं
मेरी भी जय, तेरी भी जय, करो देश की रक्षा...
*
हुजूर के सिद्धार्थ में बैठे गगन में उड़ते
जड़ो को नहीं पता, चेतन जड़ावत के बल जमीन से जुड़ते हैं
खुद को सही, गलत औरों को कहा- पाला शौक़ीन
आक्रामक ज्यों दौड़े सारमे मिल-भौंक
दूर पंक से निर्मल चन्द्रमा रखें सही सलाह...
*
दुर्योधन पर विदुर कर नियंत्रण कैसे पाया जाएगा?
शकुनि बिन सुविधाये जी सलाह कैसे??
धर्मराज की अनदेखी लाख, पार्थ-भीम भी मौन
कृष्ण नहीं तो पीर सखा की नई इच्छा कौन?
तल मिले विनाश, सज्जन ही सदा करो...
*
वे भक्त का वैज्ञानिक कुदृष्टि उमा पर रेखा दर्शनन
दबे अँगूठे के नीचे तब स्तोत्र रचे मनभावन
सच जानें महेश लेकिन वे नहीं अन्य लीला
रामते राम, रहे फिर भी सिया-आँचल
सात को वनवास क्यों? असत वाग्मी क्यों गहे पनाह?...
*
कुसुम न काँटों से उछले, तब देव-शीष पर चढ़ता
सलिल न पत्थर से लड़ता तब उदय पूजता
धाँक हँसे घन श्याम, बोरा राकेश न ध्यान देता है
घट-बढ़कर भी बाँट चन्द्रिका, जग को दे शोभा
जो गहरा वे शांत, मिले कब किसके मन की थाह...
*
22-4-22-44
***
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
201-2015
***
लघु कथा
शब्द और अर्थ
*
शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त कर लिया...कमर सीधा कर लूँ, झुका हुआ लेता था कि काम के महीने में कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के ग्रुप में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गये थे। चश्मा लगाए पढ़ें, वे शब्द थे 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र'।
शब्द कोशकार चौका - 'अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने सोचा कि यथास्थान रखा गया था, हथियार ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ कह गए हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। पेज तंत्र में तंत्र के लिए पेज की कोई चीज़ नहीं है। गन विकसन गन तंत्र की अवधारणा ही संभव नहीं है। जन गण मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश के सारे साधन को तंत्र के सुख के लिए तैयार कर रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक बाजार होता हुआ कहा।
0-7-
***
विवाद सलिला:
शिव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तूमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हँसी)
*
एकादश रुद्रों के आधार पर बारह मात्राओं के छंदों को 'रुद्र' परिवार का छंद कहा गया है। शिव खण्ड भी रूद्र परिवार का खण्ड है जिसमें 11 मात्राएँ हैं। तृतीय, छठवीं तथा नवमी मात्रा का लघु होना आवश्यक है। शिव छंद की मात्रा 3-3-3-3-2 होती है।
छोटे-छोटे चरण और दो चरणों के समान तुक शिव चंद को गति और लालित्य से समृद्ध करता है। सुमिनी की सलिल धर की तरंगों के सतत प्रवाह और नरंतर प्रभाव की सी विशेषता युक्त शिव छंद की विशेषता है।
शिव छंद में अनिवार्य रूप से तीसरी, छठवीं और नवमी लघु मात्रा के पहले या बाद में 2-2 मात्राएँ होती हैं। ये एक गुरु या दो लघु हो सकते हैं। नवमी मात्रा के साथ चारणों में दो लघु जुड़ते हैं नगण, एक गुरु जुड़ते हैं आठवीं मात्रा पर सगण और गुरु होते हैं पर रागन होता है।
सामान्यतया दो चरणों में दो चरणों का होना आवश्यक नहीं है। मूलतः छंद के चार चरणों में लघु, गुरु, लघु-गुरु या गुरु-लघु के आधार पर 4 उपभेद हो सकते हैं।
उदाहरण:
1. चरणांत लघु:
हम कहीं भी रहें सनम, हो कभी न आँख नम
दूरियाँ न कर दूरियां, दूर-होंगे हम
2. चरणान्त गुरु:
आप साथ हो सदा, मोहती रहे अदा
एक मैं नहीं रहूँ, भाग्य भी रहा फ़िदा
3. चरणान्त लघु-गुरु:
शिव-शिव सदाय रहें, जगंन्त रहे अभय
पूत भक्ति भावना, पूर्ण शक्ति कामना
4. चरणान्त गुरु लघु:
हाथ-हाथ में लिए, बाएं मुश्ती लब सिये
उन्नत सर-मथ राख, चाह-रह निज परख
------
गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
*
लोकतंत्र की छुट्टी वर्ष पर
भारत माता की वन्दना...
हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज ध्वजारोहण.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुंजायमान।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा',
'वंदे मातरम' गाएंगे.
वीर बिश्नोई के प्यारे पर
शोभित हो अक्षत-चंदन...
नेता नहीं, नागरिक बनकर
देश का नव निर्माण करें.
लग्न-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी चार प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हो संप्राण।
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दे हम नंदन वन...
दूर जायेंगे भेद-भाव मिल,
सरकारी नौकरी मिलें समान।
जल्द और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी भारत का दुश्मन है
उसे मसान भेजो।
सारी दुनिया लोहा माने
विश्व-शांति का मंचन...
२६.१.२०१३ ***

रविवार, 25 जनवरी 2026

२५ जनवरी, कुण्डलिया, गणतंत्र, लोकतंत्र, देश, तिरंगा, पुनीत, तोमर, छंद, गीत, दोहा, सॉनेट, समीक्षा, मुक्तक, नवगीत, बेटियाँ

सलिल रचना 25 जनवरी
*
दो कवि एक कुंडलिया
बाय-बाइयाँ करें, टाटा भैया काग।
यामा को विदा करता है, सहायक मित्र जाग। -राजकुमार महोबिया, उमरिया
माँ जाग, जगाए रात भर।
ठंड से ठिठुरनय, कथरिया के लिए प्रात कर।।
राम राम को भूलो, हलो-हाय तोते रहो।
सीता भैया काग, बाय-बायो।। सलिल
•••
विश्विद्यालय
कुंडलिया
रचना विधान
- पहली दो पंक्ति दोहा।
-बाद की चार कतारें रोला।
- दोहा 13-11, दो पंक्ति।
- रोला 11-13, चार पंक्ति।
- दोहे का चौथा चरण जैसे का तैसा रोला का पहला चरण होना अनिवार्य है।
- रोला के अंत में दोहा के प्रारंभिक वर्ण, शब्द, पंक्त्यांश या पंक्ति आवश्यक।
•••
कुंडलिया
राम काव्य
मन मंदिर सिया-राम हैं, मूंड नयन ले देख।
राम लला विग्रह कहे, लंघ न लछमन-रेखा।।
लंघ न लछमन रेखा, दरश कर शांति-चाव से।
अनुशासित रह लेख, इष्ट-छवि भक्ति-भाव से।।
दास राम की सृष्टि, सब से स्नेह सदा कर।
सम्यक राख निज दृष्टि, निर्मल राख निज मन मंदिर।।
1-1-20
•••
गीत
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
जनगण गाए मंगलगान
*
दसों दिशाओं के लिए आरती
नज़रअंदाज़ते मातु भारती
धरणि पल्लवित-पुष्पित करती है
नेह नामकरण पुलक तारती
नीलगगन विस्तीर्ण वितान
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
*
झंडा तिरंगी बारात फरफर
जनगण की जय फिर बोले
रवि बन जग को डेप लाइट मिल
तम गंभीर विकल न हो मन्वन्तर
सत्-शिव-सुन्दर मूल्य महान्
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
*
संस्थागत श्रमिक-किसान
रक्षक हैं सैनिक बलवान
नव
कीमत सनातन बन इंसान
श्वास-श्वास हो रस की खान
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
*
केसरिया बलिदान-क्रांति है
श्वेत स्नेह मैत्री शांति है
हरी जनाकांक्षा नव सपना-
नील चक्र निर्मूल भ्रांति है
रज्जु बंध, निर्बंध उड़ान
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
*
कंकर हैं शंकर बन गये
इंसान की जय जय गाएं
एडिग काफी निष्काम काम कर
बिंदु सिंधु तरंगें
करे समय अपना जायेगा
अगिन नामांकित गणतंत्र महान
***
गीत
देश हमारा है
*
देश हमारा है, सरकार हमारी है,
क्यों नहीं, जिम्मेदारी हमारी है?
*
नियमों का पालन हम नहीं करते,
दोष गैर पर निज, दोषों का नहीं धरें।
आप क्या बेहतर कर सकते हैं, क्या करें।
सटीक त्रुटियाँ क्यों सुधारें हैं?...
*
भांग कुँवें में नासा, हुए मदहोश सभी
पूर्वज मन में पुरातन प्रतिबिम्ब नहीं?
खोज-थके, हारे-पाया संतोष नहीं।
फ़ारेज़ बौरा, हक़ीक़त मती गई मारी है...
*
एक अँगुली जब तुम्हें मैंने बताई।
तीन अंगुलियाँ बताईं आप पर, शर्माईं
मति न दोष खुद के देखे थी भरमाई।
क्या-कब हमें दशा सुधारनी है?...
*
जैसे भी है तन्त्र, हमारा अपना है।
ये भी सच है बेमानी हर नपाना है।
अँधा न्याय - प्रशासन, सत्य न तकना है।
क़द्र न उसका जिसमें कुछ ख़ुदारी है...
*
कौन सुधारे किसको? आप सुप्रभात।
देखो अपनी कमी, न केवल दिखावे।
सर्वार्थ, सर्वार्थों की जय-जय गाएँ।
अपनी माटी सारे जग से न्यारी है...
***
सॉनि
उम्र नदी की नापी थाह
समल सलिल की धार अपार
साके घाट से विहंस निहार
लहरों ने की क्रोधित वाह
मछली पकड़ने की कोशिश करो ना
देखो मिले न भाटा-ज्वार
तैरो अनंतक उतरो पार
जलकुम्भी से बच अवगाह
डॉक्यूमेंट्री न जाना हार
श्वास-आस प्रभु का उपहार
हर दिन मना तीज-त्यौहार
सुधियों का अमृत कर पान
भुगतान का कर दिया जायेगा
हरा न पाया दर्द थान
2010101201203
•••
मुक्तिका
जान
*
चिंता दुनिया की मत करिए
केवल अपने मन से डरिए
.
नेह नामकरण-श्रम-सीकर में
नाहा-नाहा भवसागर तारिए
.
जो बाँहों में; जो चाहत में
रहे; ग़ैर पर कभी नहीं
.
खाली हाथ आना-जाना
वैकल्पिक अर्थशास्त्र ही मत भरें
.
हर से शुरू करना शुरू करें
फूलें फलिए तब हंसिए
*
सह पाइपलाइन भूकंप निर्माण
अगर पड़े हो तो शामिल हो सरिए
*
दूर से देखो न भारी
मंजिल को बाँहों में भरिए
24-1- 24-1- 24-14 ...
***
बुधिया मिलते तोह- बसंत शर्मा
कृति परिचय :
बुधिया लेटे तोह: चीख लागे विद्रोह
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य छाया रुमानियत (पंत, प्रसाद, महादेवी, बच्चन), राष्ट्रवादी शौर्य (मैथिली शरण गुप्त, माखन लाल चौधरी, दिनकर, सोहनलाल द्यौगा) और प्रगतिशील विचारधारा (निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध) के संगुफन का परिणाम है। गीत के सन्दर्भ में परम्परा और नवता के खेमों में बँटे जादूगर अपनी सुविधा और दंभ के बारे में कुछ भी कहते हैं और करते हैं, यह सौभाग्य है कि हिंदी का बहुसांख्यिक नवकार उन पर ध्यान नहीं देता, सलाह देना तो दूर की बात है। अपने आत्म साहित्य को साहित्य रचना का मूलाधार चाहने वाले, बुजुर्गों के विचार-विमर्श को अपनी बौद्धिक संपदा परख कर स्वीकार या स्वीकार करने वाले बसंत शर्मा ऐसे ही नव-गीतकार हैं जो नव-गीत और नवगीत को भारत पाकिस्तान नहीं मानता और वह रचते हैं जो कथ्य की आवश्यकता है। नामांकन तीर पर चिरकाल से स्वतंत्र विचारधारा-मनन-सृजन की परंपरा रही है। रीवा नरेश रघुराज सिंह से लेकर गुजराती कवि नर्मद तक की यह परंपरा वर्तमान में भी निरंतर गतिमान है। बसंत शर्मा राजस्थान की मरुभूमि से ग्यान इस सनातन प्रवाह की लघुतम नदी बनकर यात्रारंभ कर रहे हैं।
गीत-प्रसंग में कथित प्रगतिवादी समीक्षकों द्वारा गीत पर आलोचना करने से ही नहीं, गीत-तत्वों के पुनर्रालोकन और पुनर्मूल्यांकन के स्थान पर निजी आलोचनाओं द्वारा नव रचनाकारों के सिद्धांतों की पुष्टि करने की घोषणा की गई है। 'मैं यहाँ जाऊँ कि उधर जाऊँ?' की मन:स्थिति से मुक्त बसंत ने शीत-ग्रीष्मकाल में वैभव महलने का निर्णय लिया तो यह सर्वथा ही है। पारंपरिक गीत-तनय के रूप में नवगीत के सतत विविधतापूर्ण रूप को स्वीकार करते हुए भी उसे सर्वथा भिन्न न की संगतिवादी विचारधारा धारा को स्वीकार किया गया। बसंत ने अपनी गीति प्रस्तुति को प्रस्तुत किया है। नवगीत के संबंध में महेंद्र भटनागर के नवगीत: दर्शन और सृजन की भूमिका में श्रद्धेय लीजेंड शर्मा ने ठीक ही लिखा है "वह रचना जो बहिरंग कलाकारों के स्तर पर भले ही गीत न हो, वस्तुगत भूमि पर नवोन्मेषमयी हो उसे नवगीत ही कहता होगा....गीत के लिए विचारधारा छंद आवश्यक है, केवल लय। लय यदि आत्मा है तो छंद धारण करने वाला कलेवर है। गीतों के लिए लय यदि आत्मा है तो छंद धारण करने वाला कलेवर है। कलेवर है रोया ही जा सकता है...'नवगीत' नई 'कविता' का 'सहधारणा' तो है, 'अनुगामी' पहचान नहीं है।"
कवि बसंत ने परंपरानुपालन करते हुए शरद-स्तवनोपार्ंत को समर्पित इन संप्रदाय में 'लय' के साथ न्याय करते हुए 'निजता', 'तथ्यपरकता', 'सोद्देश्यता' तथा 'संप्रेषणीयता' के पंच पुष्पों से सारस्वत की पूजा की। इनमें से 'गीत' और 'नवगीत' गलबहियाँ कर 'कथ्य' को अभिव्यक्त करते हैं। नैचल में गीत-नवगीत को भारत-पाकिस्तान की तरह भिन्न और विरोधी नहीं, नीर-क्षीर की तरह का सिद्धांत और कट्टर कट्टरवाद की परंपरा है। जवाहर लाल अविश्वास किशोर, यतींद्र नाथ राही, संजीव वर्मा 'सलिल', राजा स्टाइक, विजय बागरी की श्रृंखला में बसंत शर्मा और अज्ञानी ब्योहार अपनी नियति और वैश्य के साथ जुड़े हुए हैं। बसंत के नाश्ते में लोकगीत की सुद्धता, जनगीत का अंतिम संस्कार, पारंपरिक गीत का लावण्य और नागा गीत की विविधता की चाहत वैयक्तिक अभिव्यक्ति के साथ संश्लिष्ट है। वे अंतर्मन की उदात्त भावना को कल्पनीय बिम्ब-प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते हुए देते हैं। वास्तविकता और कल्पना का सम्यक सम्मिश्रण इन चित्रों-नवगीतों को सहज ग्रह्य बनाते हैं।
धौलपुर राजस्थान में जन्में बसंत जी रेल सेवा में पुस्तिका भारतीय प्रबंधन के उद्यम में देश के विभिन्न कारों से जुड़े हुए हैं। उनके अवशेषों में ग्रामीण उत्सवधर्मिता और नागा आश्रम, प्रकृति चित्रण और प्रयोगशालाएं, विशिष्ट और आम लोगों का मत-विभिन्न रसमयता के साथ अभिव्यक्त होता है। गौतम बुद्ध कहते हैं 'दुःख ही सत्य है।' अंग्रेजी उपन्यासकार थॉमस हार्डी के अनुसार 'हैप्पीनेस इज ओनली एन इंट्राल्यूड इन द जनरल ड्रामा ऑफ पेन।' अर्थात् दुःखपूर्ण जीवन नाटक में सुख केवल क्षणिक पैट परिवर्तन है। इसीलिये शैलेन्द्र फर्म ने 'दुनिया बनाने वाले काहे को बनाया?' बसंत जीन पूरी तरह से सहमत नहीं हैं। उनके नायक 'बुधिया' दीपावली की तोह लेते हुए साहब को विद्रोह की तरह चिल्लाते-पुकारते हैं क्योंकि वह अपने परमार्थ पर विश्वास करते हैं-
आए बादल, फिर कहाँ,
बुधिया लाते तोह ...
... आढ़तियों ने मिल व्यवसाय की
सारी कीमत
सूजी बनी तुलसी आँगन की
झुलसा हुआ अमराई
चिल्ला चिल्ला चिल्ला चिल्ला चिल्ला चिल्ला कर चिल्लाया
साहब को बगावत
परंपरा से कृषि प्रधान देश भारत को बदल कर चंद उद्योग ने उद्यमियों के हित साधन के लिए किसानों को घाटे का व्यवसाय बनाने की नीति ने किसानों को कर्जे के पाश में बंधक बनाकर पलायन के लिए मजबूर कर दिया है-
बाला खेत बागान गिर
खाली पॉकेट
ओल्ड गाँव आज बुधिया ने
पुराना लिया हुआ रैप....
...अमेरिकन अनामिक को होटल
उजड़ रहे हैं जंगल
सूखा पानी झरनों का
मंगल कैसा होगा?
एडम ने नालों में डाला करारा-
नदियों का आखेट
प्रकृति और पर्यावरण की चिंता 'बुधिया' को नहीं मिलती। खाट को प्रतीक कवि सशक्त गीत नायक की विपन्नता 'कम कहे से ज्यादा मात्रा' की फिल्म पर उद्घाटित होता है-
जैसे-तैसे ढाँक रही तन,
घर में तोड़-फोड़
उकूडू तर बारिश में
बुधिया जोहे बात
गाँव से पलायन कर सुख की आस शहर में आने वाले से यह कहानी पता चलती है कि शहर की आत्मा पर भी गाँव की तरह अनागिन घाव हैं। अपनी जड़ो को खोलने वाले पूर्व की जड़ पश्चिम के शेयरों को अपनाकर भी जाम नहीं-
दूर शहर से हवा पश्चिमी
गाँवों तक आई
देखो सड़क को पगडंडी ने
ली है अँगड़ाई
बाघी घोड़ी कार ठीक
मटक रहा भाग
नई बहुरिया भागे होटल
गैस-चूल्हा छोड़ो
बिज़नेस नाच रही हैं
बड़की भौजाई
थौर-ठिकाना ढूंढते गॉन क्लीन्ज़र-पेड़-परिंदों के बिना निष्प्राण हैं। संबंधों में खाज है- "संबंधों के मुख्य द्वार पर / शक कठोर प्रहरी।" सरकारी लालफीताशाही की असलियत कवि से छिपकली नहीं-
“बजाता लेकिन कौन उठाये
सच का टेलिफोन?"
बिना किसी पैसे के भी
हिलता में कब स्टेशन
बिना दक्षिणा के पटवारी
किसान सेवा कब
वकीलों के चक्कर लगे तो
उतर गया पटलून
जीवन केवल कष्ट-दुःख का दस्तावेज नहीं है, सुख के शब्द भी इन पर अंकित-टंकित हैं। इन अवशेषों का वैशिष्ट्य दुःख के साथ सुख को भी जोड़ना है। इनमें से फागुन मोहब्बतों की फागुन ओलाने आज भी आती है-
गीत-प्रीत के हमें सुनाने
आया है फागुन
मुहब्बतों की फ़सल ओबने
आया है फागुन
सरसों के साँगे बर्तन,
बथुआ मस्त उगे
गौरैया के साथ खेत में
दान कागचुनें
हिल-मिलकर दिखाना सिखाना
आया है फागुन
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' की विरासत वाले देश को श्रम की महत्ता बतानी पड़े इससे बड़ी भूमि और क्या हो सकता है-
रिद्धि-सिद्धि तो कहीं दौड़ें,
श्रम हो जहां अकूत
बसंत जी समय के साथ स्टेपटल करते हुए तकनीक का प्रयोग ही नहीं करते, उसे अपने नवगीत का विषय भी तोड़ देते हैं-
वाट्स ऐप हो या मुखपोथी
प्रत्येक अपने-अपने मठ हैं
रहते हैं छत्तीस अधिककतर
पड़े तो तिरसठ हैं
रंग निराले, मूलतः विशिष्ट
ओ रुके हुए मुखौटे अनगिन
लाइक और कमेंट खटाकट
निश्-दिन ही रहते हैं
चंद बने स्वच्छंद युवा से
गीत-गज़ल के भी नव हाथ हैं
कृति नायक 'बुधिया' एक ही तरह बार-बार के विविध बिंबों-प्रतिकों के साथ अलग-अलग भावनाओं को शब्दित करता है जैसे मेरे नवगीत संग्रह "काल है संक्रांति का" में 'सूर्य' और "सड़क पर" में 'सड़क' में दिया गया है। हो सकता है शब्द-युग्म प्रयोगों की तरह यह चलन भी नए नवगीतकारों में प्रतिरूप हो। आईये, बुधिया की शिकायत पर गौर करें-
चुनौती बुधिया के लिए खड़ी है
दरवाजे पर खाली पेट
राजाजी कुर्सी पर बैठे
कुकुर रह रहे हैं पेपरवेट
देखो तो 'लोकतंत्र' है,
मगर 'लोक' कहां है?
मंत्र सारे पास 'तंत्र' के
लोक भटकता यहाँ-वहाँ
रोज दक्षिणा के बढ़ रहे हैं
सुरसा के मुख जैसी रात
राजाजी पेज अगड़ी-पिछड़ी में बाँट कर ही नहीं होते, एक-एक कर सब शिकार करना अपना अधिकार मानते हैं। प्यासी गौरैया और नालों पर लगी लंबी लाइन उन्हें देखने में तो नहीं लगती लेकिन बुढ़िया मिट्टी के घड़े को चित्र पर तपते और आर ओ पानी को फिर से देखने का नजरिया दिखता है-
घाट बिन सूनी पाद घरौंची
बुधिया भारत रोज़ उसासी
इन सामान्य में देश-काल समाज की पहचान कर विभिन्न प्रवृत्तियों को सम्प्रेषित किया गया है। कुछ उदाहरण देखें-
लालफीताशाही-
देवताओं में साज़ रही हैं / अर्जियां हर दीन की, चिल्ला-पुकारकर क्रांति की /साहब को विद्रोह।
ज़रुर-
बहुत मुश्किल है टिप देना/ऑफिस में पैसा देना, बिना पैसे दिए कोई भी/कब स्टेशन में हिलता, बिना दक्षिण के पटवारी/कब किसान सेवा।
न्यायालय-
वकीलों के चक्कर लगे तो/उतर गया पटलून।
कुन्था- सामान की चाहत तांग खूँटी पर / कील एक ठोंके।
-
जैसे-तैसे ढाँक रही तन / घर में टूटी खाट / अकड़ उकड़ूँ तर बरसात में / बुधिया जोहे बाट, बाला खेत की लकड़ी गिरवी / पर खाली जेब, बिना फीस के, स्कूल में / मिला न उसका प्रवेश।
राजनीतिक-
जुमले लेकर वोट मांगे / आए समाजवादी पार्टी के नेता।
जन असन्तुलन- कहीं सड़क पर, कहीं रेल पर/चल रोकें।
पर्यावरण-
कूप तड़ाग बावली नदियाँ / सूखें, सुने घाट, खड़े गाँव से दूर सुखाता / बेबस नीम अकेली, चक नहीं अब गौरैया की / क्रन्दन पड़े।
किसान- समस्या
पानी संग सिर पर सवार था/बीज खाद का चक्कर, रचित किराए के मकानों को सड़क/उजड़ रहे हैं जंगल, आढ़तियों ने मिला बीजिया की/सारी कीमत।
सामाजिक- फूले हुए हैं त्योहारों से / अपनेपन के रंग, हुई कमी परछी-आँगन की / रिश्ते का दीवाला, सूख गई तुलसी आँगन की / झुलस गई अमराई अमराई, मान्यता के मुख्य द्वार पर / बड़की भौजाई, माँग के मुख्य द्वार पर / शक कठोर प्रहरी।
जनगण की व्यथा-कथा किन्ही खास शब्दों की मोहताज नहीं होती। नीरज ठीक है 'मौन ही तो भावना की भाषा है' पर आज जब गीतकार भी अनुसुना किया जा रहा है, नवगीत को पूरी शिक्षा के साथ वह सब कहेंगे वही होगा जो वह कहना चाहते हैं। बसंत जी नवगीतों में शब्द को वैसे ही पिरोते हैं जैसे मंगल में मोती पिरोये जाते हैं। इन नवगीतों में नोन, रास्ता, बाला, तोह, चित्र, बहुरिया, अंगनाई, पंखुरियां, फिकर, उजियारे, पसरी, बिजूका, भभूका, परजा, लुकुटी, पकड़ौंची, से, बतिया रतियां, निहारत जैसे गीतों के साथ वृषभ, आरोह, अवरोह, तृषित, स्वप्न, अट्टालिका, विपदा, तिमिर, तृष्णा, संगृहीत, हृदय, गगन, साम्यनाएँ, सारिएँ, वर्जनाएँ, उषा, ग्रास जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्दों को पूर्णतः स्वाभाविकता के साथ प्रयोग किया जाता है। इन असलियत में स्वाभाविकता के साथ साहब, वैश्व, ऑफिस, पॉकेट, लैपटॉप, डिजाइन, डिजाइन, बार्बी डॉल, मोबाइल, रेस, चैटिंग, सैटिंग, चेन, गैजेट्स पूल, डांसबिन, बुलडोजर, गफुगल, रेटिंग, जैकेट, वेट, वाट्स ऐप, लाइक, कमेंट, रिजेक्ट, आर ओ वॉटर, बोतल, इंजीनियरिंग, होमवर्क आदि अंग्रेजी शब्द प्रयोग में चले गए हैं, पुरानी गुड़िया, मोबाइल, रेस, चैटिंग, सैटिंग, चेन, गैजेट्स पूल, डांसबिन, बुलडोजर, लैब्स, बिजनेसमैन, हर्जाने, कर्जा, मूरत, कश्मकश, जिंदगी, यतायात, प्रयास, लिथुआनिया, मंजिल, साजिश, सरहद, इमदाद, क्लासिक समंदर, अहसान अरबी-फारसी-तुर्की और अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्द भी बेहिचक-बखूबी प्रयोग किए गए हैं।
नवगीतों में पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ते शब्द-युग्मों का प्रयोग करने की प्रवृत्ति बसंत जी के नवगीतों में भी है। नव युग्मों के विभिन्न प्रकार इन चित्रों में देखे जा सकते हैं यथा- दो सार्थक शब्दों का युग्म, सार दूसरा निरर्थक शब्द, पहला निरर्थक दूसरा सार्थक शब्द, दोनों निरर्थक शब्द, पारिस्थितिक शब्द युग्म, संबंध आधारित शब्द युग्म, मूल शब्द युग्म, एक दूसरे से पूर्ण, एक दूसरे से असंबद्ध, तीन शब्दों का युग्म आदि। रोटी-नोन, जैसे-तैसे, चीख-पुकार, हरा-भरा, ठौर-ठिकाना, मुलायम-मुन्नी, भाभी-भैया, काका-काकी, चाचा-ताऊ, जीजा-साले, दादी-दादा, चट-नेता, पशु-पक्षी, गुड़िया-नाला, मंदिर-मस्जिद, सज-धज, गम-शुम, झूठ-मूठ, चाल-ढाल, खाता-पीता, नींद-चूत, रोक-थम, रात-दिन, पीले-पोज़, आँधी-तूफ़ान, आरोह-अवरोह, गिल्ली-डंडा, सर-फिरी, घर-बाहर, तन-मन, जाति-धर्म, हाल-चाल, सांझ-सकरे, भीड़-भड़क्का, कौरव-पांडव, आस-पास, रंग-बिरंगे, नाचे-झूमे, टैग-तपस्या, बाघी-घोड़ा, खेत-मढैया, निश-दिन, नाचो-गाओ, पोखर-कूप-बावड़ी, इसकी-उसकी-सबकी, ढोल-मंजीरा, रिद्धि-सिद्धि, तहस-नहस, फूल-शूल, आदि।
बसंत जी शब्दावृत्तियों के प्रयोग में भी पीछे नहीं हैं। हर-हर, हंसते-हंसते, मचा-मचा, दाना-दाना, खो-खो, साथ-साथ, संग-संग, प्लास्टिक-बिछा, टुकुर-टुकुर, कट-कटे, हंस-हंस, गली-गली, मारा-मारा, बारी-बारी आदि अनेक शब्द वृत्तांतों में विविध प्रसंगों का प्रयोग कर भाषा को यादगार बनाने का प्रयास किया गया है।
अलंकार
अन्त्यानुप्रास सर्वत्र दृष्टव्य है। यमक, उपमा व श्लेष का भी प्रयोग है। विरोधाभास-राहत बड़ा फ़्लैट-कारें / मन मठ मुख्य छोटा। व्यंजना- बहुत अधिक विकास हो रहा है।
मुहावरे
कहीं-कहीं मुहावरों के प्रयोग से रसात्मकता की वृद्धि होती है- दिल ये जल जाए, मेरी मुर्गी तीन टांगों की आदि।
आव्हान
इस कृति का वैश्यालयों के गहन अंधकार में आशा का दीप जलाए रखना है। आस्था के पक्षधर भले ही इस आधार पर नवता में संदेह करें पर पिछले कुछ दशकों से नवगीत का पर्याय अधेरा और पीड़ा बना हुआ है, लेकिन जाने के काल में नवता उजाले हुए हर्ष का आह्वान करना ही है। ''आइए, सामूहिक बनाएं/एक भारत, श्रेष्ठ भारत'' के आह्वान के साथ-साथ कलाकारों-नवगीतों की इस कृति का समापन आपके यहां एक नवगीत है। छंद और लय पर बसंत जी पकड़ते हैं। व्यंजनात्मकता और लाक्षणिकता का प्रभाव आगामी कृतियों में और भी बहुत कुछ होगा। बसंत जी की प्रथम कृति उनके उज्जवल भविष्य का संकेत देती है। पाठक कहते हैं कि इन कहानियों में आपके मन की बात पाउते हुए सिद्धांत- ''अल्लाह करे जोरे-कलम और जियादा।''
2010.2020
***
दोहा सलिला
आज गणतंत्र बने हम,जनता हुई आकर्षक।
भेद-भाव सब दूर हो, जन-जन हो।
*
प्रजातंत्र में प्रजा का, सेवक होता तंत्र।
नेता जनसेवी कंपनी, यही सफलता-मंत्र।।
*
लोकतंत्र में लोकमत, होता है अनमोल।
नुकसान न करिए देश की, कलम उठाओ तोल।।
*
तंत्र न जन की पीर हर, खुद भोगे अधिकार।
तो लोकतंत्र सफल नहीं है, शासन करे विचार।
*
ध्वजा तिरंगी देश की, आन, बान, सम्मान।
झुकने कभी न दे 'सलिल', विहंस लुटा दे जान।।
*
संविधान को जानना, पालन करना नित्य।
संविधान की शिक्षाएँ हैं, फ़ेराज़ मनिए सत्य।।
*
जाति-धर्म को भुलाकर, भारतीय एक हैं।
भाईचारा पालकर, चलो हम नेक।।
2012. 2018
***
सोरथे गणतंत्र के
जनता हुई पार्टी, आज बने गणतंत्र हम।
जन-जन हो सारथी, भेद-भाव सब दूर हो।
*
सेवक होता है तंत्र, प्रजातन्त्र में प्रजा का।
यही सफलता-मंत्र, जनसेवी नेता।
*
होता है अनमोल, लोकतंत्र में लोकमत।
कलम उठाये तोल, नुकसान न करिये देश की।।
*
खुद भोगे अधिकार, तंत्र न जन की पीर हर।
शासन करे विचार, तो जनतंत्र सफल नहीं है।।
*
आन, बान, सम्मान, ध्वजा तिरंगी देश की।
विहंस लता दे जान, झकने कभी न दे 'सलिल'।
*
पालन ​​करिए नित्य, संविधान को जानना।
फ़र्ज़ मानिये सत्य, प्राधिकार की संस्थाएँ हैं।।
*
भारतीय एक हैं, जाति-धर्म को भुलाकर।
स्टॉक एक्सचेंज हम नेक, भाईचारा पालकर।।
***
मुक्तिका
मिला गया
*
घर में आग लगाने वाला, आज मिल गया बिन खोजे।
खुद को खुदी विध्वंसक, हाय! मिल गया है बिन सर्च.
*
जयचंदों की गही विरासत, क्षत्रिय शकुनि दुर्योधन भी
बच्चों को धमाकाने वाला, हाथ मिल गया है बिन सर्चे।
*
'गोली' बनी नारियों की लूटी, ये भी बताई तनिक?
निज मुख कालिख मिलनेवाला, वीर मिल गया है बिन खोजे।
*
सूर्य किरण से दूर रखा गया था, शत-शत ललनाओं को?
खोज रहे हैं किले पुराने, समय मिला मिल है बिन खोजे।
*
मारो मरों को वीर बन रहे, साक्षात सत्य को पचा न सीम
अपने मुँह से जो माटी मिट्ठू, मियाँ मिल गयी है बिन खोजे।
*
सत्य बाँट रही जन-जन को, जातिवाद का प्रेत पालकर
मैकेनिकल श्रेष्ठता प्रगट मूढ़ता, आज मिल गया है बिन खोजे।
*
अब तक देखो जहां ढोल था, वहीं पोल ​​सब देख रहे हैं
कायर से भी ज्यादा कायर, वीर मिल गया है बिन खोजे।
2010.2011
***
क्षेत्रीय दोहा सलिला
*
गुटनिरपेक्ष जी के नाम पर, गुटनिरपेक्ष-भक्त
चित्र छाप पल-पल रहे, सत्य में अनुरक्त
*
बवे के लल्ला रहो, बैचलर फेल
मंत्री बने 'सलिल', शासन-नाक निकले
*
ममता की समता करे, कौन है समर्थ?
कौन कर सकता है 'सलिल', पल-पल अर्थ-अर्थ??
*
बाप बाप पर बेटा है, चार बाप का बाप
धूल चटाकर चाचा को, मुस्कुराता है आप
*
साइकल-पंजा मिल गया, केर-बेर का संग
संग कमल-हाथी मिलें, जमे हुए रंग
*
एक दोहा
हर दल ने बोमामा, सार केवल स्वामी
हत्या कर जनतंत्र की, कहते हैं- परमार्थ है
*
एक दोहा मुक्तिका
निर्मल मन देखे सदा, निर्मलता चाहूँ ओर
घोर तिमिर से ज्यों उषा, लाये उजली ​​भोर
*
नीरस-सरस न रस अनुपयोगी, है रसिक अँजोर
दोहा-रस का संबंध है, नद-जल, गागर-डोर
*
मृगनयनी पर सोहती, गढ़ी कज्जल-कोर
कृष्णा एकाक्षी लगा, लागे अमावस घोर
*
चित्त चोरी कर कह रहे, जो आखे चितचोर
उनकी चित का मिल सका, कहिये किसको चोर
*
आँख मिलाये मन मोहते, झकझोरती आँख हिलोर
आँख फिर लेना जान ही, आँख झकझोर
***
मुक्तक सलिला :
बेटियाँ
*
आस हैं, अरमान हैं, शोभायमान हैं ये बेटियाँ
सच कहूँ माता-पिता की शान हैं ये बेटियां
पैर पूजा या कलेजे से रखें धन्य हो-
एक क्या दो-दो कुलों की आन हैं ये बेटियाँ
*
शोरगुल में कोकिला का गण हैं ये बेटियां
नदी की कलकल सुरीली तान हैं ये बेटियां
माँ, सुता, भगिनी, सखी, अर्धांगिनी बन साथ दें-
फ़ूँक एजेंसीज़ जान भी ये बेटियाँ
*
मत कहो घर में छुपे मेहमान हैं ये बेटियाँ
ये न सोचो सत्य सेनये हैं ये बेटियाँ
हक लड़कियों के हैं लड़के, फूँक भी देते हैं 'सलिल'-
नमदा जल सी, गुणवत्ता की खान हैं ये बेटियाँ
*
रौशनी की बंदगी, पहचानती हैं ये बेटियाँ
लाज की चाँदनी, हया का थान ये बेटियाँ हैं
चाहते हैं तुम्हें मिले आभूषण तो वर-दान दो
अब न कहें 'सलिल कन्या-दान हैं ये बेटियाँ।'
*
सभ्यता की फ़सल उर्वर, धान ये बेटियाँ हैं
महत्ता का, श्रेष्ठता का भान ये बेटियां हैं
धरा हैं पगतल के बेटे, बेटियां हैं छत के शीशे की-
भेद मत करना, नहीं बल्कि ये बेटियां हैं
2012.2017
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नवगीत:
कागतंत्र है
*
कागतंत्र है
काँव-काँव
करना ही होगा
नहीं किया तो मरना होगा
.
गिद्ध दर्शन आँख
छिछड़े खाफ़लाते हैं.
गर्दभ पंचम सुर में,
राग भैरवी मनाते हैं.
जय क्षत्रिय की कह-कह,
दंगा आप बना रहे हैं.
मैं सहमत नहीं हूँ जो
अन्य वैकल्पिक औषधियां हैं
नाग तंत्र के
दाँव-पेंच,
बचना ही होगा,
नहीं बचेगा तो मरना होगा.
.
इस सीमा से मॉडल
जब मन घुसेड़ आते हैं.
वह सरहद पर दिनांक
पड़ोसी सड़क तोड़ रहे हैं.
ब्रम्हपुत्र के निर्मल जल में
गांड मिलाते हैं.
ये हारें तो भी अपनी
सरकार तोड़ रहे हैं.
सार तंत्र है
जन-गण को
जगना ही होगा
नहीं जगे तो मरना होगा.
.
नए साल में नए तरीके
हम अपनाएंगे.
बाँटें- झूटें, बीच-खरीदें
सत्य पाएँगे.
हुआ अशामत जो उसका
जीना मुश्किल कर दें
बंदर सौ मिल, घेरा शेर को,
हम झुकेंगे.
फ़ुट मंत्र है
एक साथ
लाभ ही होगा
नहीं मिलेंगे तो मरना होगा.
.
. 12.
***
दोहा सलिला-
*
एक हाथ से दे रहा है, दूजे से ले छीन
संविधान ही चल-कथा, रचता नित्य नवीन
*
रोडा कहीं से भी लाया गया, कहीं से भी इकट्ठा किया गया
संविधान ने अड़ा दिया, लोकतंत्र में तांग
*
नाग सांप बिच्छूते, नचुए आप
विष उगलेगा निश्चित वही, देश सहेगा वरदान
*
तीसरा संशोधन हुआ, फिर भी हुआ ठीक नहीं
संविधान ने कभी भी, सही नहीं की तरह
*
अँधेरे के हाथी हुए, संविधान जी आप
दुर्योधन-धृतराष्ट्र मिल, करे आपका जाप
*
जो हो जाएं, बैठें मुंडे नैन
संविधान जी मूक हैं, कभी न बोलें बैन
25-11-251
***
लघु कथा:
शब्द और अर्थ
*
शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त कर लिया...कमर सीधा कर लूँ, चुप रहकर लेता था कि काम के महीने में कुछ खटपट ने कहा था... मन मसोसते हुए उठा लिया और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के समूह में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गए थे। चश्मा लगाए 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र' पढ़ें
शब्द कोशकार चौका - 'अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने सोचा कि यथास्थान रखा गया था, हथियार ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ कह गए हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। पेज तंत्र में तंत्र के लिए पेज की कोई चीज़ नहीं है। गण विकसन गण तंत्र का अनुभव ही संभव नहीं है। जन गण मन गाकर लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है देश के सारे साधन को तंत्र के सुख के लिए और जन गण मन को दुखा रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक बाजार होता हुआ कहा।
***
नवगीत:
भारत आ रै
.
भारत आ राय ओबामा मित्र,
चौथा तिलक लगा रे!
संग मिशेल साँवरी आ राय,
उन खों हार पिन्हा रे!!
.
अपने मोदी जी नर इंदर
बाँकी झलक दिखाये
नाम देस को ऊँचा करो
कैसे हमें सिखाएं
'झंडा ऊंचा रहे हमारा'
संगे गान सुना रे!
.
देश स्पष्ट हो, हरा-भरा हो
पथे भाई-चारा
'वन्दे मातरम्' बोलो सब मिल
लीलना प्यार
प्रगति करि जो मूंड उठायें
दुनिया को दहला रए
.
66-11-225
***
नवगीत:
.
लोकतंत्र का
पंछी बेबस
.
नेता पहले दाना
फिर से शुरू करें
चतुर्थ ग्रैन्डल गोलियाँ
न किंचित सोच
व्यवसाय दे
नशा रहा डँस
.
आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
मुर्दाघर अँधी-लूली
आदिवासियों में है मोच
-
इकाइयों को जस
.
राजनीति नफरत की मारी
पोच में अध्यापन के लिए
जनमत बहरा-गंगाल खो दी
निज़ाम की लोच
एकलव्य का
कहीं न हे हेरिटेज
नवगीत:
.
छोड़ो हाहाकार मियाँ!
.
दुनिया अपनी राह नौकरानी
खुद को खुद ही रोज चलेगी
साया नौकरानी के साथ
शूरा पीठ में मारो हँसेगी
आँख करो दो-चार मियाँ!
.
आगे बढो प्यार
फिर पीछे तक
कहे मिलन बिन झुलसी मरेगी
जीत विश्वास हँसे-ठगेगी
करो न फिर भी रार मियाँ!
.
मंदिर में मस्जिद मस्जिद मस्जिद
गिरजे को पल में ताज देवी
लज्जा हया शर्म आक्षेपगी
इंसान को नामांकित कर देवी
पादरियों की आँखें-धार मियाँ!
10.11.251
मुक्तिका:
रात
(ताइथिक जातीय पुनित छंद 4-4-4-3, चरणान्त एसएसएसएल)
.
चुपके-चुपके आई रात
सुबह-शाम को भाई रात
झरना नदिया लहरें धार
घाट किनारे की रात
शरतचंद्र की पूनो है
'मावस की परछाईं रात
आकाश की कंठ लंगोट
फिर कह लो टाई रात
पर्वत जंगल पृथ्वी तंग
कोहरा-पाला लाई रात
वर चंदा तारे बारात
लड़की रात को कुदामी करती है
दिन है हाल-गुल्ला-शोर
गुमसुम चुप तन्हाई रात
गीत
ध्वजा तिरंगी...
*
ध्वजा तिरंगी ध्वज
जन गण का अभिमान है.
कभी ना किंचित झकझोर देंगे,
बस इतना अरमान है...
*
वीर बिश्नोई के वारिस हम,
जान हथेली पर लेकर
बलिदानों का पंथ गहेंगे,
राष्ट्र-शत्रु की बलि दीये।
सारे जग को दिखा देंगे
भारत देश महान है...
*
रिश्वत-दुराचार दानव को,
निर्देश से मारेंगे.
पौधारोपण, जल-संरक्षण,
नया जीवन निखारेंगे।
श्रम-कौशल को मिले प्रतिष्ठा,
कण-कण में भगवान हैं...
*
हिंदी ही होगी जग-वाणी,
यह अपना संकल्प है.
'सलिल' योग्यता अवसर मिला,
दूजा विकल्प नहीं है.
सारी दुनिया कहे हर्ष से,
भारत स्वर्ग समान है...
***
विवाद सलिला:
बारहमातृत्व छंद
जान
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इन्द्र वज्र, उपेन्द्र वज्र, कीर्ति, घनाक्षरी,
छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हँसी)
*
बारह भौतिक छंदों के 33 भेद या प्रकार हैं जिनमें से तोमर, तांडव, लीला तथा नित अधिक प्रचलित हैं।
*
तोमर छंद:
बारह मात्रा, अंत में गुरु लघु
बारह सुमात्रिक छंद, तोमर सृजे आनंद
गुरु-लघु राखे पद-अंत, सुर-नर पूजित ज्यों संत
आदित्य बारह मास, हरकर तिमिर सेंट्रास
भू को बना दे स्वर्ग, तृष्णा करे सुर वर्ग
कलकल बहे जल धार, हर शांति-क्लांति अपार
कलरव करें खगवृन्द, रवि-रश्मि ताप अमंद
सहयोग सुख सहयोगी, का हो न तनिक अभाव
हो लोक सेवक तंत्र, जनतंत्र का यह मंत्र
***
दोहा
लोभ तंत्र के साथ हो, कोक तंत्र का नाश।
लोकतंत्र तब आये, होन मत तनिक विनाश।।
71.20. 50.50
***
अतिरिक्त गीत:
पंच फैसला...
*
पंच निर्णय सर-आँखों,
पर नज़र गड़ाएगा लट्ठा...
*
नाना-नानी, पिता और मां दादी ठकुराई थीं।
मिली बपौती में कुर्सी, क्यों होता है पेट में जलन?
रोजगार है पुश्ताओं का, नेता बन भाषण देना-
फर्ज़ डिलीवर हाथ जोड़, सर फ्लेक्स करो पहुनै।
भारतीय अवसर? सब समान??
सुन-कह लो, करो न ठट्ठा...
*
लोकतंत्र है लोभतंत्र, दल दम ले जाने,
थोकतंत्र अरु भोंकतंत्र ने काम किया मनमाने।
भोंक पीठ में शूरा, चिकित्सक! शोक तंत्र मस्का-
मृतकों के घर जा पैसे दे, शहीद स्मारक शोके..
संसद गर्दभ ढोएगी
सारे पापों का गट्ठा...
*
उठाओ पनौती करि मौज, हो गए कहीं जो बच्चा।
हम देते हैं पवित्र बंधन को, हैं निर्मोही भक्त.
देश है राम लला का, है देश राम लला का-
पांडा झंडा कोई हो, हम खेल न कच्चे कच्चे..
कहीं नहीं चाणक्य परंपरा में
दाल सके जो मट्ठा...
*
नेता जी-शास्त्री जी कैसे मरे? न पता..
अन्ना हूं या बाबा, दिन में तारे दिखाओ।
घपले-घोटालों से फुर्सत, कभी तनिक पाया तो-
बंदर घुड़की दे-सुन कर फ़ौजी का सर कटवाया।
नैतिक जिम्मेदारी ले वह
जो उल्लू का पट्ठा...
*
नागनाथ गर हटाये गये, गणनाथ भगवान ही नेता हैं।
फैलाया दूजा टैब हम, पहला जाल समागम।
केर-बेर का संग बना मोर्चा झपटेंगे सत्ता-
मौनी बाबा कोई ना कोई मिल जाएगा बेटा।
जोकर के लिए हाथ में हम
जन को दे सत्ता-अट्ठा...
26-11-221
***