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सोमवार, 12 जनवरी 2026

जनवरी १२, पूर्णिका, सॉनेट, चिड़िया, विवेकानंद, सरस्वती, अनाहिता, बेनज़ाइटन, नवगीत, सूरज

सलिल सृजन जनवरी १२
पूर्णिका
सुखद मिलन, मिलते रहें
सतत सृजन करते रहें
.
आत्म शुद्धि का हवन कर
प्रगति पंथ चलते रहें
.
मतभेदों की खाइयाँ
पाट हृदय हरते रहें
.
सद्भावी रचना सुमन
मकरंदी खिलते रहें
.
चटखारे अरु चुस्कियाँ
गप्पों सँग पलते रहें
.
शब्द सेतु रस-भाव के
कूल जोड़ हँसते रहें
.
हिंदी में हस्ताक्षर
कार्य नित्य करते रहें
.
सत्-शिव-सुंदर सृष्टि में
सुंदरता भरते रहें
.
नेह नर्मदा नहाकर
'सलिल' तार-तरते रहें
१२.१.२०२६
०००
पूर्णिका
.
मैं जिजीविषा जयी पलाश।
धरा बिछौना, छत आकाश।।
.
तीनों देव विराजे मुझमें
विपदाओं का करता नाश।।
.
क्रांति-दूत जलता अंगारा
नव युग को नित रहा तराश।।
.
जंगल में मंगल करता हूँ।
बाधाओं के तोड़ूँ पाश।।
.
फगुनौटी को रंग कुसुंबी
दे खुशियों की करूँ तलाश।।
.
रास रचाएँ कान्ह-राधिका
गोप-गोपियाँ आकर काश।।
१२.१.२०२५
०००
दोहा सलिला
सूरज मजदूरी करे, लगातार दिन-रात।
मिले मजूरी कुछ नहीं, तपे आप बेबात।।
हिंदी-संतति कर रही, अंग्रेजी में बात।
परदेसन के पग कमल, घरवाली की लात।।
करें अंजना को नमन, नित्य सुमिर हनुमान।
दें आशीष करें कृपा, पल पल सिय-भगवान।।
१२.१.२०२४
•••
मुक्तिका
*
इस-उस में उलझा रही
आस व्यर्थ भटका रही
मस्ती में हैं लीन मन
मौन जिह्वा बतला रही
कलकल-कलरव सुन विहँस
किलकिल चुप बिसरा रही
शब्द संपदा बचा रख
सबक सीख; सिखला रही
नयन मूँद कर देख हरि
नियति तुझे मिलवा रही
१२-१-२०२३
***
बाल सॉनेट
चिड़िया
*
चूँ चूँ चिड़िया फुर्र उड़े।
चुग्गा चुग चुपचाप।
चूजे चें-चें कर थके।।
लपक चुगाती आप।।
पंखों में लेती लुका।
कोई करे न तंग।
प्रभु का करती शुक्रिया।।
विपदा से कर जंग।।
पंख उगें तब नीड़ से
देखी आप निकाल।
उड़ गिर उठ नभ नाप ले
व्यर्थ बजा मत गाल।।
खोज संगिनी घर बसा।
लूट जिंदगी का मजा।।
***
सॉनेट
विवेकानंद
*
मिल विवेक आनंद जब दिखलाते हैं राह।
रामकृष्ण सह सारदा मिल करते उद्धार।
नर नरेंद्र-गुरु भक्ति जब होती समुद अथाह।।
बनें विवेकानंद तब कर शत बाधा पार।।
गुरु-प्रति निष्ठा-समर्पण बन जीवन-पाथेय।
संकट में संबल बने, करता आत्म प्रकाश।
विधि-हरि-हर हों सहायक, भाव-समाधि विधेय।।
धरती को कर बिछौने, ओढ़े हँस आकाश।।
लगन-परिश्रम-त्याग-तप, दीन-हीन सेवार्थ।
रहा समर्पित अहर्निश मानव-मानस श्रेष्ठ।
सर्व धर्म समभाव को जिया सदा सर्वार्थ।।
कभी न छू पाया तुम्हें, काम-क्रोध-मद नेष्ठ।।
जाकर भी जाते नहीं, करते जग-कल्याण।
स्वामि विवेकानंद पथ, अपना तब हो त्राण।।
१२-१-२०२२
***
विमर्श
क्या सरस्वती वास्तव में एक फारसी देवी अनाहिता हैं ?
*
या कुन्देंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणा वर दण्ड मंडित करा, या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभितभिर्सदा वंदिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निश्शेष जाड्यापहा।
“देवी सरस्वती चमेली के रंग के चंद्रमा की तरह श्वेत हैं, जिनकी शुद्ध सफेद ठंडी ओस की बूंदों की माला की तरह है, जो दीप्तिमान सफेद पोशाक में सुशोभित हैं, जिनकी सुंदर भुजा वीणा पर टिकी हुई है, और जिसका सिंहासन एक सफेद कमल है। जो ब्रह्मा को अच्युत रखतीं और शिवादि देवों द्वारा वन्दित हैं, मेरी रक्षा करें । आप मेरी सुस्ती, और अज्ञानता को दूर करिये। "
ऋग्वेद में सरस्वती को "सरम वरति इति सरस्वती" के रूप में समझाया गया है - "वह जो पूर्ण की ओर बहती है वह सरस्वती है" - ३ री - ४ थी
सहस्राब्दी, ई.पू. में नदी स्वरास्वती एक प्रमुख जलधारा थी। यह खुरबत की खाड़ी से सुरकोटदा और कोटड़ा तक और नारा-हकरा-घग्गर-सरस्वती चैनलों के माध्यम से, मथुरा के माध्यम से ऊपर की ओर फैल गयी। यह दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तानों में से एक, मरुस्थली रेगिस्तान से सीधे बहती थी। इस नदी को वेदों में "सभी नदियों की माँ" के रूप में वर्णित किया गया है, जिसे सबसे शुद्ध और शुभ माना जाता है। प्रचलित मानसूनी हवाओं के कारण जब यह नदी सूख गई, तो इसके किनारे रहने वाली सभ्यता कुभा नदी में चली गई, और उस नदी का नाम बदलकर अवेस्तां सरस्वती (हराहवती) कर दिया। उपनिषदों में यह माना जाता है कि जब देवताओं को अग्नि / अग्नि को समुद्र में ले जाने की आवश्यकता थी, तो इसके जल की शुद्धता के लिए सरस्वती को जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि यह कार्य पूरा हुआ, लेकिन कुछ का मानना ​​है कि इस प्रक्रिया में नदी सूख गई।
फारसी कनेक्शन
अरदेवी सुरा अनाहिता ( Arədvī Sārā Anāhitā)); एक इंडो-ईरानी कॉस्मोलॉजिकल फिगर की एवेस्टन भाषा का नाम 'वाटर्स' (अबान) की दिव्यता के रूप में माना जाता है और इसलिए प्रजनन क्षमता, चिकित्सा और ज्ञान से जुड़ा है। अर्देवी सुरा अनाहिता मध्य में अर्दवीसुर अनाहिद या नाहिद है और आधुनिक फारसी, अर्मेनियाई में अनाहित। सरस्वती की तरह, अनाहिता को उसके पिता अहुरा मज़्दा (ब्रह्मा) से शादी करने के लिए जाना जाता है। दोनों तीन कार्यों के तत्वों के अनुरूप हैं। जॉर्ज डूमज़िल ने प्रोटो-इंडो-यूरोपीय धर्म में शक्ति संरचना पर काम करने वाले एक दार्शनिक ने कहा कि अनाहिता वी 85-87 में योद्धाओं द्वारा 'आर्द्र, मजबूत और बेदाग' के रूप में विकसित किया गया है, तत्वों को तीसरे, दूसरे और दूसरे को प्रभावित करता है। पहला समारोह। और उन्होंने वैदिक देवी वाक्, परिभाषित भाषण के मामले में एक समान संरचना पर ध्यान दिया, जो पुरुष देवता मित्रा-वरुण (पहला कार्य), इंद्र-अग्नि (दूसरा कार्य) और दो अश्व (तीसरा कार्य) को बनाए रखने के रूप में प्रतिनिधित्व करता है। सरस्वती के बारे में कहा जाता है कि वह मां के गर्भ में भ्रूण का रोपण करती है।
आर्टेमिस, कुंवारी शिकारी
मिथरिक पंथ में, अनहिता को मिथरा की कुंवारी माँ माना जाता था। क्या यह सही है? यह देखना दिलचस्प है कि २५ दिसंबर को एक प्रसिद्ध फ़ारसी शीतकालीन त्योहार मैथैरिक परंपराओं से ईसाई धर्म में आया और क्रिसमस मनाया। रोमन साम्राज्य में मिथ्रावाद इतना लोकप्रिय था और ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण पहलुओं के समान था कि कई चर्च पिता निश्चित रूप से, इसे संबोधित करने के लिए मजबूर थे। इन पिताओं में जस्टिन मार्टियर, टर्टुलियन, जूलियस फर्मिकस मेटरनस और ऑगस्टाइन शामिल थे, जिनमें से सभी ने इन हड़ताली पत्राचारों को प्रस्तोता शैतान के लिए जिम्मेदार ठहराया। दूसरे शब्दों में, मसीह की आशा करते हुए, शैतान ने आने वाले मसीहा की नकल करके पैगनों को मूर्ख बनाने के बारे में निर्धारित किया। हकीकत में, इन चर्च पिताओं की गवाही इस बात की पुष्टि करती है कि ये विभिन्न रूपांकनों, विशेषताओं, परंपराओं और मिथकों को ईसाई धर्म से प्रभावित करते हैं।
जापान में सरस्वती
बेनज़ाइटन हिंदू देवी सरस्वती का जापानी नाम है। बेन्ज़िटेन की पूजा 8 वीं शताब्दी के माध्यम से 6 वीं शताब्दी के दौरान जापान में पहुंची, मुख्य रूप से गोल्डन लाइट के सूत्र के चीनी अनुवादों के माध्यम से , जो उसके लिए समर्पित एक खंड है। लोटस सूत्र में उसका उल्लेख भी किया गया है और अक्सर एक पूर्वाग्रह , सरस्वती के विपरीत एक पारंपरिक जापानी लुटे का चित्रण किया जाता है , जो एक कड़े वाद्य यंत्र के रूप में जाना जाता है, जिसे वीणा कहा जाता है।
हड़प्पा की मुहरों में सरस्वती और उषा
One of the frequently occurring signs in the seal is the compound symbol which occurs on 236 seals. Many scholars have held that the Indus symbols are often conjugated. Thus the symbol can be seen as a compound between and the symbol which may represent the sceptre which designated royal authority and may thus be read as ‘Ras’. The symbol-pair occurs in 131 texts and in many copper plate inscriptions which shows its great religious significance. The ending ‘Tri’ or ’Ti’ is significant and cannot but remind one of the great Tri-names like Saraswati and Gayatri. As Uksha was often shortened to ‘Sa’ the sign-pair becomes Sarasa-tri or Sarasvati.
१२-१-२०२०
***
नवगीत
कौन नहीं?
*
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
इसके पग में
जात-पाँत की
बेड़ी पड़ी हुई।
कर को कसकर
ऊँच-नीच जकड़े
हथकड़ी मुई।
छूत-अछूत
न मन से बिसरा
रहा अड़ाता टाँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
तिलक-तराजू
की माया ने
बाँध दई ठठरी।
लोकतंत्र के
काँध लदी
परिवारवाद गठरी।
मित्रो! कह छलते
जनगण को जब-तब
रचकर स्वांग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
वैताली ममता
काँधे पर लदा
स्वार्थ वैताल।
चचा-भतीजा
आप ठोंकते
खोद अखाड़ा ताल।
सैनिक भूखा
करे सियासत
आरक्षण की माँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
१२.१.२०१७
***
नवगीत:
.
दर्पण का दिल देखता
कहिए, जग में कौन?
.
आप न कहता हाल
भले रहे दिल सिसकता
करता नहीं खयाल
नयन कौन सा फड़कता?
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन
.
पूछे नहीं सवाल
नहीं किसी से हिचकता
कभी न देता टाल
और न किंचित ललकता
रूप-अरूप निहारता
लेकिन रहता मौन
.
रहता है निष्पक्ष
विश्व हँसे या सिसकता
सब इसके समकक्ष
जड़ चलता या फिसलता
माने सबको एक सा
हो आधा या पौन
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)
***
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
१२-१-२०१५
***
मुक्तिका:
है यही वाजिब...
*
है यही वाज़िब ज़माने में बशर ऐसे जिए।
जिस तरह जीते दिवाली रात में नन्हे दिए।।
रुख्सती में हाथ रीते ही रहेंगे जानते
फिर भी सब घपले-घुटाले कर रहे हैं किसलिए?
घर में भी बेघर रहोगे, चैन पाओगे नहीं,
आज यह, कल और कोई बाँह में गर चाहिए।।
चाक हो दिल या गरेबां, मौन ही रहना 'सलिल'
मेहरबां से हो गुजारिश- 'और कुछ फरमाइए'।।
आबे-जमजम की सभी ने चाह की लेकिन 'सलिल'
कोई तो हो जो ज़हर के घूँट कुछ हँसकर पिए।।
१२.१.२०१३
***

चन्द्र शेखर आज़ाद, क्रांतिकारी, स्वतंत्रता

एक अंग्रेज अफसर ने चन्द्र शेखर आज़ाद के बारे में लिखा हैं कि मैं रेलवे क्रोसिंग पर चेकिंग कर रहा था। सूचना मिली कि आजाद शहर मे हैं। दो थानों की फोर्स भी साथ थी। आजाद बुलेट से रुकते हैं, मैं उनको जाने देता हूँ। तभी साथी मातहत सिपाही टोकता हैं, साहब ये पण्डित जी हैं। कांधे पे जनेऊ, तगड़ी कद-काठी, रौबदार मूँछें बस आजाद की ही हो सकती हैं। अंग्रेज अफसर ने भारतीय सिपाही से मुखातिब होते हुए कहा था कि मुझे अपने जान की परवाह नही हैं। हाँ, पर ऐसे अकेले बागी को रोकने के लिये ये फोर्स काफी नही हैं।

कानपुर मे अपने भूमिगत रहने के दौरान आजाद एक जगह किराये का रूम लेकर स्टूडेंट बनकर रहते थे। आसपास कई परिवार और कुछेक स्टूडेंट भी किराये पर रहते थे। परिवार लेकर रहने वाले लोग ज्यादेतर कानपुर मे जॉब ही करते थे। उन दिनों कानपुर और कोलकाता हब भी था। आजाद अकेले रहने के कारण कई बार एक टाइम खाना बनाते और एक टाइम नही बनाते थे। जब उनके रूम से स्टोव जलने की आवाज नही आती तो बगल मे रहनेवाली एक महिला उनको खाना देने आती थी। आजाद शिष्टाचार के साथ दोनों हाथ जोड़ मना कर देते थे।
आजाद गम्भीर व्यक्तित्व के धनी थे। मोहल्ले के लोग उस महिला के पति के शराब पीकर अपने पत्नी से झगड़ा करने, मारपीट करने और उनके बच्चों के रोने के कारणों से त्रस्त भी थे। उस महानगरीय वातावरण मे उनका निजी मामला होने के कारण उनको कोई कुछ बोलता नहीं था। एक रोज उस महिला का पति शराब पीकर अपनी पत्नी से लड़ रहा था तो आजाद वहाँ धमक पड़े थे। किसी से कभी न बोलने वाले आजाद को देख उस महिला के पति की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। जैसे ही बोला तुम कौन होते हो, हमारे बीच दखल देने वाले, आजाद बोले कि ये मेरी बहन हैं, कभी गलती से भी हाथ उठाया तो हाथ तोड़ दूसरे हाथ मे पकड़ा दूँगा। पहली बार मोहल्ले के लोगो ने आजाद की आवाज सुनी थी। फिर ये ड्रामा भी बंद हो गया। जब कभी उनके कमरे से स्टोव जलने की आवाज नहीं आती तो उस महिला का पति अपने बच्चों से या पत्नी से उनको खाना भिजवा दिया करता, आलसी पर स्वाभिमानी आजाद हर बार की तरह शिष्टाचार के साथ मना कर देते थे।

फरारी के दिनों मे एक बार पूरे शहर मे नाकाबंदी थी। रात छिपने के लिये आजाद एक बुढ़िया के घर मे आसरा लेते हैं। घर में बस माँ-बेटी ही थीं। बुढ़िया आसरा तो दे देती है पर उसकी रात की नींद उचट जाती है। घर मे जवान लड़की हैं, आजाद बात समझ बुढ़िया के पास आआकर बोले कि माताजी! आप भी मुझे अंग्रेजी सरकार की तरह समझती हैं तो अभी पुलिस बुलाकर गिरफ्तार करा दीजिये। ईनाम के पैसे से मेरी बहन की शादी कर दीजियेगा। बुढ़िया रोने हुए बोली कि मैं देशद्रोही नहीं हूँ, बस एक माँ हूँ, तुम नहीं समझोगे। खैर मैं भूल गयी थी मेरा पाला एक पण्डित से पड़ा है। सवेरे जब बुढ़िया की नींद खुली तो आजाद जा चुके थे। उनके बिस्तर पर तकिये के नीचे एक चिट्ठी मिली। बुढ़िया अपनी लड़की से चिट्ठी पढ़ने के लिए बोली। आजाद रात भर में उस घर की कहानी समझ चुके थे। चिट्टी मे लिखा था कि माताजी! दस हजार की छोटी सी रकम बहना की शादी के लिये, सादर चरण स्पर्श सहित आपका आजाद।

भगत सिंह से जेल मे लोग पूछते थे कि आजाद दिखते कैसे हैं ? आजाद की कोई फोटू अंग्रेजी खुफिया ब्यूरो फोब्स 32 के पास भी नहीं थी। एक मूँछ पर ताव देते हुए उनके साथी द्वारा खींचा गया चित्र ही पब्लिक डोमेन में थी। भगत सिंह बोले कि जो हमेशा गम्भीरता ओढ़े हो, कभी गलती से हँसता भी न हो, इरादे फौलादी पर अंदर से मोम हो, समझ लेना आजाद हैं।

००० 

जबलपुर, इतिहास, नाटक, बंगाली समाज, दिव्येन्दु गांगुली, श्याम खत्री, कचनार, मिलन,

जबलपुर में नाटक 
डार्केस्ट आवर में चर्चिल के हिन्दी संवाद को विश्वसनीय बनाने वाले
दिव्येन्दु गांगुली की उतार चढ़ाव वाली यात्रा इतनी आसान नहीं रही
नेटफ्लिक्स में इन दिनों एक फ‍िल्म डार्केस्ट आवर (Darkest Hour) देखने वालों की संख्या में अचानक इज़ाफा हो गया है। इसका कारण यह फ‍िल्म अब हिन्दी में डब हो गई। Darkest Hour में गैरी ओल्डमैन ने विंस्टन चर्चिल का किरदार निभाया है, जिसमें मई 1940 में यूके के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके शुरुआती अहम दिनों पर फोकस किया गया है, जब उन्हें यह तय करना था कि हिटलर के साथ शांति के लिए बातचीत करें या लड़ें। और आखिर में उन्होंने प्रेरणादायक भाषणों से देश को एकजुट किया, जिसमें मशहूर "हम समुद्र तटों पर लड़ेंगे" वाली लाइन भी शामिल है, जो ब्रिटेन के "सबसे मुश्किल समय" के दौरान उनके पक्के इरादे को दिखाती है। इस रोल के लिए ओल्डमैन को बेस्ट एक्टर का एकेडमी अवॉर्ड मिला, और फिल्म में भारी दबाव के बावजूद उनके साहसी नेतृत्व को दिखाया गया है।
Darkest Hour में चर्चिल की भूमिका के मुख्य पहलू के तौर पर संकट में नेतृत्व, संसद में दिए गए भाषण और फिल्म के अंत में संसद में दिया गया साहसी भाषण महत्वपूर्ण है। गैरी ओल्डमैन ने शानदार परफॉर्मेंस, जिसमें मेकअप और प्रोस्थेटिक्स शामिल हैं, ने उन्हें काफी तारीफ और ऑस्कर दिलाया। हिन्दी में इसका डब संस्करण लोकप्रिय हो रहा है। चर्चिल के हिन्दी संवाद इतने विश्वसनीय लगते हैं जैसे वे स्वयं या गैरी ओल्डमैन बोल रहे हों। गैरी ओल्डमैन को हिन्दी में डब जबलपुर के दिव्येन्दु गांगुली (दिनपाल गांगुली) ने किया है। दिव्येन्दु गांगुली की लिप-सिंकिंग (lip-syncing) इतनी शानदार है कि महसूस व अनुभव होता है कि हम मूल भाषा में डार्केस्ट आवर को को देख रहे हैं।
दिव्येन्दु गांगुली की जबलपुर से मुंबई तक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। उनका जीवन औपन्यासिक है।
जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद से आठवें दशक तक रंगकर्म की दो दुनिया थी। शहर में मुख्य धारा में मराठी व हिन्दी का रंगकर्म उफान भरता था तो शहर के पूर्वी हिस्से में घमापुर से रक्षा संस्थानों तक बंगला रंगकर्म का दबदबा था। यह भी सत्य है कि हिन्दी रंगकर्म पर बंगला रंगकर्म का ज्यादा असर था। हिन्दी नाटकों के निर्देशक श्याम खत्री मराठी व बंगला के मूल नाटकों से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने कल्पनाशीलता दिखाते हुए हिन्दी नाटकों को स्थापित कर रहे थे। शहर के पूर्वी हिस्से में रामलीला के साथ जात्रा का मंचन समान रूप से होता था। रामलीला के कलाकार जात्रा से रंगकर्म की बारीकियां सीख रहे थे। रामलीला के कलाकार धीरे धीरे जात्रा में भी भाग लेने लगे। दरअसल उस समय बंगाल से कई परिवार जबलपुर आजीविका की तलाश में यहां आए। यहां उन्होंने सुरक्षा संस्थानों के साथ रेलवे और बर्न कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दी। इन बंगला परिवार के साथ वहां की संस्कृति जबलपुर पहुंची। बंगाल से आए अध‍िकांश परिवार ने नौकरी करने वाले संस्थानों के निकट ही अपना बसेरा बनाया। जबलपुर में घमापुर से डिफेंस संस्थानों के बीच के क्षेत्र बाई का बगीचा, शीतलामाई, कांचघर, सतपुला, व्हीकल फेक्टरी, गन केरिज फेक्टरी, रांझी, आर्डनेंस फेक्टरी व खमरिया में बंगला के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के परिवार रहवासी बने। उत्तर प्रदेश व बिहार के परिवार पर बंगला संस्कृति का प्रभाव था।
कुछ इसी तरह व्योमकेश गांगुली ने ढाका से देशांतर गमन करते हुए जबलपुर पहुंचे। वे बी. एससी (टेक) पास थे और ढाका की ढाकेश्वरी कपड़ा मिल में काम किया करते थे। उनकी डि‍ग्री इंजीनियरिंग के समकक्ष थी। बंगला समाज में इस ड‍िग्री को बड़े सम्मान से देखा जाता था। व्योमकेश गांगुली एक अच्छे अभि‍नेता होने के साथ उत्कृष्ट गायक भी थे। ढाका में नौकरी के साथ शौकिया रूप से नाटकों में काम करने लगे। लोगों के कहने पर वे कलकत्ता की फिल्म इंडस्ट्री पहुंच कर अभ‍िनय के मौके तलाश करने लगे। उनके पिता उस समय जबलपुर की सेंट्रल जेल में ड‍िप्टी जेलर थे। अंग्रेजों के समय जेलर थे और परिवार व कुल की चिंता उनके लिए सर्वोच्च थी। जब उन्हें बेटे व्योमकेश की फिल्म लाइन में जाने की बात की जानकारी हुई तो वे खफ़ा हुए। पिता ने पुत्र को फटकार हुए कहा कि वे पिता व कुल का नाम डुबा रहे हैं। पुत्र को जबर्दस्ती जबलपुर बुलवा कर विवाह के बंधन में बांध दिया। जबलपुर आ कर व्योमकेश इंजीनियर से क्लर्क बन गए। जबलपुर की बिजली वितरण कंपनी मार्टिन एन्ड बर्न कंपनी में बाबू बन कर उनकी उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक ऑफ‍िस में ही सिमट गई।
जबलपुर के कांचघर क्षेत्र में रहने वाले व्योमकेश गांगुली के दिल में नाटक हिलोरे भरता रहता था। समय मिलने पर वे घर में नाटक करते थे। मोहल्ले में साथ‍ियों के साथ बंगला नाटकों को मंचित करते थे। दुर्गोत्सव में उनका नाटकों का मंचन करने का उत्साह देखते ही बनता था। उस समय तक उनके बड़े पुत्र दिव्येन्दु की प्राथमिक श‍िक्षा रेलवे सराय स्कूल में शुरू हो चुकी थी। घर में प्यार से दिव्येन्दु को टूटु पुकारा जाता था। टूटु को अपने पिता को नाटक करते देखना अच्छा लगता था। पुत्र पिता के चरणों में चलने लगा। पिता के दोस्त आईटीसी में कार्यरत रवीन्द्र भट्टाचार्य थे। लोग उन्हें प्यार से काकू कहा करते थे। पिता के साथ दिव्येन्दु को रवीन्द्र भट्टाचार्य के रूप में एक गुरू भी मिल गया। दिव्येन्दु को जब भी मौका मिलता वे अपने गुरू से अभ‍िनय से ले कर संवाद अदायगी तक सब कुछ जानने के लिए उत्कंठित रहते। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए दिव्येन्दु का दाख‍िला सेंट थामस में करा दिया गया। उस समय तक दिव्येन्दु फैंसी ड्रेस में भाग लेने लगे, लेकिन उनकी इच्छा तो नाटक में अभ‍िनय करने की थी। उसी समय दुर्गोत्सव में उनहोंने मोहल्ले में एक बाल नाटक में अभ‍िनय करने का मौका मिल ही गया। पिता ने जब उनको नाटक में अभ‍िनय करते देखा तो वे बहुत खुश हुए। छोटे बच्चों के एक समूह ने उस समय ‘स्वप्न खुड़ो’ नाम के एक नाटक को मंचित किया। दिव्येन्दु ने नाटक की रिहर्सल से ले कर मंचन तक हर क्षण का आनंद उठाया। जब उनका मेकअप किया जा रहा था तब तो वे इतने आनंदित थे और उस समय उनको देखने वाले हर व्यक्त‍ि को महसूस हो रहा था कि जैसे दिव्येन्दु को पूरी जिंदगी की खुशी ही मिल गई हो। दुर्गोत्सव में बंगला नाटक के साथ हिन्दी नाटकों के मंचन की परम्परा शुरू हुई। नवमी के दिन हिन्दी नाटकों का मंचन किया जाने लगा। ये हिन्दी नाटक मूल बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण हुआ करते थे।
दिव्येन्दु गांगुली ने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राबर्टसन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उसी समय उनकी मित्रता गौरीशंकर यादव से हुई। गौरीशंकर उनके मोहल्ले में ही रहा करते थे। दोनों नाटकों से जुड़ा रहना चाहते थे। उनको दुर्गोत्सव में होने वाले और साल में एक बार होने वाले नाटकों के मंचन से संतुष्ट‍ि नहीं मिलती थी। दिव्येन्दु ने दुर्गोत्सव में बंगला नाटकों को हिन्दी में अनुवाद कर उनको मंचित करना शुरू कर दिया था। वे चाहते थे कि हिन्दी में भी बंगला नाटकों की तरह नाटक मंचित होने चाहिए। उस समय हिन्दी स्क्र‍िप्ट मिलने की समस्या थी। दिव्येन्दु ने सोचा कि बेहतर है कि बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाए और उन्हें ही मंचित किया जाए। दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव नाटकों में ही आगे बढ़ना चाहते थे। कई बार गौरीशंकर यादव दिव्येन्दु से कहते थे कि डगर कठिन है लेकिन हम लोग हौंसला नहीं खोएंगे। दोनों को आगे की राह दिखाने वाले के रूप में धर्मराज जायसवाल मिल गए। धर्मराज जायसवाल का प्रतिभा कला मंदिर परिवार नियोजन और अन्य सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश के गांव गांव में घूम घूम कर नाटकों का मंचन करता था। धर्मराज जायसवाल के साथ मनोहर महाजन जैसे कई नवयुवक व कॉलेज विद्यार्थी जुड़े हुए थे। नाटकों को मंचित करते हुए घूमना और खाने पीने की चिंता से मुक्त हो जाने की मुहिम में दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव भी जुड़ गए। दोनों का विचार यह भी था कि इस तरह वे नाटकों की मुख्य धारा में भी जुड़ जाएंगे।
दिव्येन्दु गांगुली की इसी दौरान जबलपुर की प्लाजा टॉकीज के निकट रहने वाले सुशील बंदोपाध्याय के साथ जुड़ाव की शुरूआत हुई। सुशील बंदोपाध्याय की ख्याति एक अच्छे ज्योतिष के रूप में थी, लेकिन नाटकों का मंचन करने में वे सबसे आगे रहते थे। जबलपुर के करमचंद चौक पर स्थि‍त सिटी बंगाली क्लब में बंगला नाटकों का मंचन सक्र‍ियता से होता था। यहां दिव्येन्दु को गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य व सुशील बंदोपाध्याय ने पूरा सहयोग दिया। सुशील बंदोपाध्याय ने बंगला से बाहर जा कर हिन्दी में भी नाटक किए। उस समय श्याम खत्री हिन्दी रंगमंच के सबसे सक्र‍िय निर्देशक के रूप में खूब नाटकों का मंचन कर रहे थे। दिव्येन्दु गांगुली की ख्वाहिश थी कि वे भी श्याम खत्री निर्देश‍ित किसी नाटक में अभ‍िनय करें। दिव्येन्दु को श्याम खत्री के नाटकों की डिजाइनिंग, सेट, स्वाभाविक संवाद और निर्देशन आकर्ष‍ित करता था। आख‍िरकार श्याम खत्री ने दिव्येन्दु को अपने ‘विषपायी’ में एक भूमिका सौंप दी। यह नाटक उस समय जबलपुर का सबसे हिट नाटक रहा। विषपायी के कई शो हाउसफुल गए। दिव्येन्दु का तब तक एक सुदर्शन व्यक्त‍ित्व निखर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वे जबलपुर रंगमंच के सर्वकालिक सुदर्शन अभ‍िनेता रहे। दिव्येन्दु की एक खास‍ियत उनकी गहराई ली हुई दमदार आवाज़ भी थी।
श्याम खत्री के नौकरी के सिलसिले में जबलपुर से बाहर जाने पर उनके कलाकारों ने सत्तर के दशक में कचनार संस्था गठित कर नाटकों का मंचन शुरू किया। कचनार का गठन इस वायदे के साथ किया गया था कि प्रत्येक माह एक नए नाटक का मंचन किया जाएगा। उस दौरान कचनार संस्था ने अपनी सक्र‍ियता से जबलपुर में हलचल मचा दी। यही वह समय था जब दिव्येन्दु गांगुली नाटकों के अनुवाद के प्रति आकर्ष‍ित हुए। उन्होंने बंगला के नाटकों का हिन्दी अनुवाद शुरू किया। उस समय उनकी उम्र महज 21 या 22 वर्ष थी। बंगला नाटक इराव मानुष का हिन्दी में 'ये भी इंसान है' और उत्ताल तरंग का हिन्दी में 'ज्वार भाटा' नाम से रूपांतरण किया। इन दोनों नाटकों में दिव्येन्दु गांगुली ने अभ‍िनय भी किया। नाटकों में उनके साथ उस समय के मशहूर अभ‍िनेता कुमार किशोर भी अभ‍िनय करते थे। कुमार किशोर की विशेषता यह थी कि वे किसी भी बंगला नाटक को देख कर पूरी रात भर में उसकी हिन्दी स्क्र‍िप्ट तैयार कर लेते थे। कुमार क‍िशोर ने रमेन दत्ता निर्देश‍ित बंगला नाटक रक्ते सआ धान को देख कर हिन्दी में ‘खून में बोई धान’ की स्क्र‍िप्ट एक रात भर में लिखी थी। दिव्येन्दु बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण को मिल रही सफलता से उत्साहित हुए। उन्होंने शैलेश गुहा नियोगी के शताब्दी गान का हिन्दी रूपांतरण किया। इसके बाद वे अजितेश बंदोपाध्याय के बंगला नाटकों के प्रति आकर्ष‍ित हुए। अजितेश बंदोपाध्याय ने चेखव के Swan Song का बंगला में अनुवाद किया था। इस बंगला अनुवाद को दिव्येन्दु गांगुली ने हिन्दी में 'वो दिन रंग बिरंगे' नाम से रूपांतरित किया। यह हिन्दी रूपांतरण इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी स्क्र‍िप्ट अभी तक नाट्य समूह के बीच मंचन के लिए घूमती रहती है। इसे रेड‍ियो नाटक के रूप में भी खूब प्रस्तुत किया गया। जबलपुर में लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा इसको प्रोड्यूस करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने अजितेश बंदोपाध्याय के एक बंगला नाटक का 'तम्बाकू के दुष्परिणाम' नाम से रूपांतरण किया था, जो कि रेड‍ियो नाटक के रूप में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बंगला नाटक ‘तृतीय कंठ’ का हिन्दी अनुवाद किया। इस नाटक को जबलपुर के रंगमंच में सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में मुख्य भूमिका कुमार क‍िशोर ने निभाई थी और कंठ के रूप में कामता मिश्रा व दिव्येन्दु गांगुली की आवाज़ें थीं। यह एक प्रायोगिक नाटक था।
दिव्येन्दु गांगुली का बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण के साथ मंच पर अभ‍िनय की सक्र‍ियता भी बनी रही। उन्होंने अपने नाट्य गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य से नाटकों को एडिट करना सीखा। डा. शंकर शेष के नाटक फंदी को दिव्येन्दु ने एडिट कर के प्रस्तुत किया। वर्ष 1974 में दिव्येन्दु गांगुली और प्रभात मित्रा ने मिलकर जबलपुर में एक नाट्य संस्था 'अनुराग' बनाई। उसी समय दिव्येन्दु गांगुली, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, कुमार किशोर, प्रभात मित्रा, आर. खान व सुरेश बाथरे के विचार में जबलपुर नाट्य संघ के गठन की बात आई। जबलपुर में नाट्य गतिव‍िध‍ि जोरों पर थीं। मिलन संस्था त्रिभाषीय लघु नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करता था, जिसमें हिन्दी, बंगला व मराठी भाषा के नाटकों का मंचन होता था। इस प्रतियोगिता की अवधारणा इलाहाबाद नाट्य प्रतियोगिता की ही तरह की थी। 8 व 9 फरवरी 1975 को जबलपुर जिला नाट्य संघ द्वारा प्रथम नाट्य महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र हाई स्कूल के मनोहर प्रेक्षागृह के हर्षें रंगमंच पर किया गया। दिव्येन्दु गांगुली ने 'अनुराग' संस्था की ओर से इस नाट्य महोत्सव में 'वो दिन रंग बिरंगे' की प्रस्तुति दी।
दिव्येन्दु गांगुली ‘वो दिन रंग बिरंगे’ की प्रस्तुति को ले कर काफ़ी उत्तेजित थे। वे स्वयं रजनी चटर्जी और प्रभात मित्रा कालीनाथ की भूमिका में थे। रवीन्द्र भट्टाचार्य ने निर्देशन में पूरी जान लगा दी थी। नाटक का पूरा ऑड‍ियो आधुनिकतम माने जाने वाले कैरव्ज स्टूडियो में तैयार किया गया। मन्नूलाल पुजारी जैसे जबलपुर के निर्देशक मेकअप करने को तैयार हो गए थे। बैक स्टेज में संगीतज्ञ बसंत त‍िमोथी, सोहन पांडे राजेश तिवारी, आकाशवाणी में उद्घोषक रहे जितेन्द्र महाजन, सुभाष पात्रो जैसे गुणी लोग थे। अलखनंदन जैसे निर्देशक बैक स्टेज में थे। ‘अनुराग’ की पूरी टीम नाटक के मंचन को ले कर उतावली थी। उसी समय जबलपुर रंगमंच के दो बड़े कलाकार राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग का असामयिक निधन हो गया। जबलपुर की रंग संस्थाएं व रंगकर्मी ऐसे समय में नाट्य महोत्सव का आयोजन करने से हिचक रहे थे। आम राय बन रही थी कि नाट्य महोत्सव को स्थगित कर दिया जाए। नाट्य महोत्सव के स्थगित होने की जानकारी से दिव्येन्दु गांगुली लगभग निराश हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि नाट्य मंचन को ले कर जो रफ़्तार बनी थी वह भविष्य में रह पाएगी कि नहीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में सब ने यह समाधान निकाला कि नाट्य महोत्सव को राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग को समर्पित कर नाटकों का मंचन किया जाए।
वो दिन रंग बिरंगे का मंचन हुआ। दर्शकों को रजनी चटर्जी की भूमिका में दिव्येन्दु गांगुली का अभ‍िनय और नाटक का कथ्य दोनों बहुत पसंद आया। सत्तर के दशक के हिसाब से नाटक की विषयवस्तु बिल्कुल नई थी। एक कलाकार जीवन संध्या में अपने अतीत को याद करता है। नाटक के माध्यम से कलाकार ने समाज से कई सवाल उठाए थे। इस नाट्य महोत्सव में दिव्येन्दु गांगुली ने विश्वभावन देवलिया निर्देश‍ित ‘हयवदन’ में भागवत की भूमिका निभाई थी। नाटक में उस समय जबलपुर रंगमंच के बड़े कलाकार गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, प्रभात मित्रा, सिंधु गडकरी, पुष्पा श्रीवास्तव ने अभि‍नय किया था। बाल कलाकारों में मधुसूदन नागराज, अरूणा काले, न‍िध‍ि द्वि‍वेदी थीं। हयवदन की व‍िश‍िष्टता सतीश तिवारी का संगीत था। नाटक में आभा तिवारी ने सितार, तेजराज मावजी ने सेक्साफोन क्लारीनेट, रत्नाकर कुंडले ने वायलिन और अल्हाद पंड‍ित ने तबले पर ऐसा संगीत रचा था जिसकी नाट्य प्रस्तुतियों में कल्पना नहीं की जा सकती। श्याम श्रीवास्तव ने बन आई सोन चिरैया, उजले से घोड़े पे होके सवार, चंदन डुलिया बैठी रे दुल्हनियां व तन मन को बांधे क्यों सिर्फ एक देह के साथ जैसे गीत नाटक के लिख दिए। हयवदन में दिव्येन्दु गांगुली ने आंगिक, वाचिक, सात्व‍िक और आहार्य अभ‍िनय के सिद्धांतों को मंच पर प्रस्तुत किया। जबलपुर का रंगकर्म कितना आगे था यह इससे पता चलता है कि 1973 में 20 व 21 अक्टूबर को कचनार संस्था ने मध्यप्रदेश में पहली बार ‘हयवदन’ का मंचन किया था। नाटक का ब्रोशर चौबीस पृष्ठ का था।
उस समय जबलपुर में साहित्य, कला, सांस्कृतिक वातावरण जबर्दस्त था। कलाकारों में अभ‍िनय की होड़ थी तो नाटकों को अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में रूपांतरित करने की प्रतिस्पर्धा भी। ज्ञानरंजन के संपादन में पहल का प्रकाशन शुरू हो चुका था। रंगकर्मी रात में एक स्थान पर एकत्र‍ित हो कर पहल में छपी कहानियों या विचारोत्तेजक लेखों का पाठ करते थे और उसे रंगकर्मी शांति से बैठ कर सुन कर उन पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे। ऐसी कई बैठकों का दिव्येन्दु अभ‍िन्न हिस्सा हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने रेड‍ियो नाटक में काम किया। उस समय जबलपुर के सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में एक रेड‍ियो नाटक को लाउड स्पीकर के जरिए लोगों को सुनाया गया। उस समय जबलपुर आकाशवाणी से रेड‍ियो नाटकों का खूब प्रसारण हुआ।
दिव्येन्दु गांगुली को कॉलेज की पढ़ाई के बाद ड‍िफेंस अकाउंट में नौकरी मिल गई। उस समय ड‍िफेंस अकाउंट में जबलपुर के रंगकर्मी मनोहर कुंभोजकर, अलखनंदन, तपन बैनर्जी, रूद्रदत्त दुबे, हिमांशु राय भी नौकरी किया करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने नौकरी के बाद मिले समय का उपयोग हिन्दी अनुवाद व रूपांतरण में करने लगे। उन्होंने इन कामों में शोध के जरिए विषयवस्तु तो वही रखी लेकिन भाषा को सहज बनाया। इस दौरान दिव्येन्दु ने अलखनंदन ल‍िखि‍त शीर्षकहीन नाटक में भूमिका निभाते हुए उसे निर्देश‍ित भी किया। जबलपुर में आधुनिक नाटकों के मंचन की शुरूआत हो चुकी थी ऐसे समय उन्होंने 1982 में अपना तबादला बंबई करवा लिया। वे पेशेवर तरीके से थ‍िएटर करना चाहते थे। बंबई में वे इप्टा से जुड़ गए। फ‍िल्मों में कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। टीवी सीरियल राग दरबारी में उन्होंने भूमिका निभाई। बंबई में उनकी मुलाकात जबलपुर के ही मनोहर महाजन से हुई। मनोहर महाजन रेड‍ियो सिलोन से जुड़ कर लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। दिव्येन्दु की वॉयसिंग में रूचि थी। मनोहर महाजन ने इस क्षेत्र में उनकी मदद व मार्गदर्शन किया। दिव्येन्दु फ‍िल्म डि‍वीजन में कमेन्ट्री करने लगे। बंबई में भी उन्होंने बंगला से हिन्दी व अंग्रेजी में रचनात्मक अनुवाद व रूपांतरण किया। विज्ञापन की दुनिया में वॉयसिंग में काम किया। कई फ‍िल्मों में डबिंग की। सुदर्शन व्यक्त‍ित्व के कारण उन्होंने मॉडलिंग भी की। एक डॉक्यूमेंट्री में दिव्येन्दु ने विंस्टल चर्चिल का वॉयस ओवर किया। ब्रुक बांड चाय का कुंभ मेले के दौरान बनाए गए एक विज्ञापन में दादा जी के चरित्र में उनकी आवाज़ के उतार चढ़ाव को विज्ञापन जगत के साथ उस विज्ञापन को देखने वालों ने भी बहुत सराहा।
दिव्येन्दु का अब नाम दिनपाल गांगुली हो चुका है। मुंबई की दुनिया में वे इसी नाम से विख्यात हैं। नाम बदलने की एक कहानी है। बंबई में दिव्येन्दु का नाम हर समय गलत ढंग से लिखा जाता था। नाम गलत लिखने या बोलने से वे परेशान हो गए। दिव्येन्दु का अर्थ चंद्रमा होता है। उन्होंने सोचा कि दिव्येन्दु से वे अपना नाम सूरज के पर्यायवाची दिनपाल में परिवर्तित कर लेते हैं। तब से वे दिव्येन्दु से दिनपाल गांगुली बन गए।
दिव्येन्दु गांगुली ने श्याम बेनेगल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्देश‍ित संविधान फ‍िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ साल पहले केड्बरि के बंगला संस्करण के विज्ञापन में दिव्येन्दु की आवाज़ का उपयोग एक वृद्ध चरित्र दामोदर के लिए किया गया। वे अभी भी विज्ञापनों की दुनिया, डबिंग, वॉयस ओवर, अभ‍िनय में सक्र‍िय हैं। इस दुनिया में उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। दिव्येन्दु की बेटी सुमिता भी पिता की तरह मनोरंजन इंडस्ट्री में हैं। वे डिस्नेस्टार और कई इस तरह के प्लेटफार्म के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व ट्रांसस्क्र‍िप्ट का काम लगातार कर रही हैं। दामाद फिल्म एडीटर हैं।
व्योमकेश गांगुली की तीसरी पीढ़ी उनके बताए रास्ते पर चल रही है। व्योमकेश गांगुली जब कलकत्ता में एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती थे, तब एक उनके एक दर्शक ने देख कर कहा था-‘’अरे यह तो एक्टर व्योमकेश बाबू हैं।‘’ शायद उस समय यह क्षण उनके पिता के लिए कष्ट वाला रहा होगा लेकिन उस वक्त उनके चेहरे पर यह संतुष्ट‍ि का भाव था कि मृत्यु के समय उन्हें एक अभ‍िनेता के रूप में पहचाना गया।
आज भी टूटु या दिव्येन्दु या दिनपाल के दिल में जबलपुर धड़कता है। उन्हें याद आता है कि वे कैसे झुंड में घंटों खड़े हो कर दोस्तों व रंगकर्मियों के साथ मालवीय चौक, श्याम टॉकीज, शहीद स्मारक में अपना समण् बिताते थे। वे लोग देर रात कैसे नाटकों और पात्रों को ले कर बहस किया करते थे। जबलपुर उनको अपनी ओर खींचता रहता है। वे गुरू पूर्ण‍िमा के दिन अपने गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य और जबलपुर को याद करते हैं। जब मौका मिलता है दिव्येन्दु मुंबई से जबलपुर दौड़ कर चले आते हैं। वे कोई मौका चूकना नहीं चाहते।

रविवार, 11 जनवरी 2026

पाइल्स, बवासीर, अर्श, स्वास्थ्य, चिकित्सा

बवासीर
बवासीर (पाइल्स) में मल त्याग के दौरान या बाद में दर्द, खुजली, जलन, सूजन, और गुदा के आसपास मस्से महसूस होते हैं।  मल के साथ लाल-कत्थई खून दिखना, मल त्यागने के बाद भी पेट साफ न होना, मल त्याग के बाद गुदा से बलगम (म्यूकस) निकलना, मस्से बाहर निकलना आदि  बवासीर के प्रमुख लक्षण हैं।  

बवासीर होने के कारण

१. कम रेशेवाला भोजन-कब्ज (लो फाइबर डाइट-कॉन्सटिपेशन)- बिना रेशेवाले खाद्य पदार्थ मैदा, बेसन, फास्ट फूड आदि पाचन के समय और बाद में आंतों की दीवारों से चिपक जाता है। फलत: मल कड़ा होता है, सरकते संयत आंतों में रगड़ के कारण सूजन और छीलने से रक्त स्राव होता है। रेशे मल को सरकने में सहायक होते हैं। भाजियाँ रेशों के कारण लाभदायक होती हैं।

२. अधिकांश समय बैठे रहना (सिडेंटरी लाइफ स्टाइल)- अधिकांश समय बैठे रहने से पेट में आँतें एक ही स्थिति में रहती हैं जिससे भोजन और मल सरकने में कठिनाई होती है, पेट में वायु भर जाती है। चलते-फिरते रहने से रक्त संचार होता है, आंतों की गतिशीलता के कारण वायु निकलती है, भोजन और मल सरकता है। बवासीर बढ़ जाता है।

३. गर्भावस्था-प्रसव पश्चात दबाव (प्रेगनेंसी / पोस्ट-डिलीवरी प्रेशर)- कमर के क्षेत्र (पेलविक फ्लोर) पर भार बढ़ने के कारण नसें कमजोर हो जाती है जिससे बवासीर में वृद्धि होती है। इस समय हल्का और पाचक भोजन करना चाहिए।

४. तनाव (स्ट्रेस)- तनाव होने पर वातदोष होता है, कब्ज बढ़ने से बवासीर के कष्ट में वृद्धि होती है। व्यर्थ का तनाव छोड़कर प्रसन्नता से रहना लाभप्रद होगा। 

उपचार (रेमेडीज)

१. रात के समय एक त्रिफला चूर्ण एवं एक चम्मच देशी घी का सेवन करने से वात दोष संतुलित होता है, बवासीर शांत होता है। 

२. 
सोते समय गुनगुने पानी में २ चम्मच इसबगोल की भूसी लें, यह मल को नरम करता है, आंतों से चिपककर मल को सरकने में सहायक होता है, साथ में  दिन में ८-१० गिलास पानी का सेवन अवश्य करें। 

३. छाछ (बटर मिल्क)- दूध से मक्खन निकालने के बाद बचा ताजा छाछ बवासीर रोगी के लिए अमृत के समान है। दोपहर भोजन के बाद एक गिलास छाछ चुटकी भार जीरा-सेंध नमक का सेवन करने से गर्मी, सूजन और कब्ज में लाभ होता है। 

४. गुनगुने पानी में कटि-स्नान (सिट्ज़ बाथ)- टब में गुनगुना पानी भरकर रोज १५ मिनिट बैठें, त्रिफला,नीम या डिटॉल पानी में घोल सकते हैं। इससे सूजन तथा दर्द में तुरंत राहत मिलती है। यह रामबाण औषधि है। 

५. पैदल चलना (वाक)- रोज सुबह, दोपहर शाम १५-२० मिनिट टहलना बवासीर की पीड़ा कम कर बार-बार होना रोकता है। 

६. प्राणायाम- सुबह-शाम १०-१० मिनिट अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें, एलोविरा जूस व मुलेठी चूर्ण का सेवन करना लाभदायक है। 

७. मलहम (क्रीम)- बवासीर के कष्ट को हडेंसा आदि मलहम भी काम करते हैं किन्तु यह तात्कालिक और अस्थायी राहत के लिए है। 

आयुर्विज्ञान परीक्षण 
  1. शारीरिक परीक्षण- बाहरी बवासीर या गुदा के आस-पास मस्सों का डॉक्टर द्वारा देखकर इलाज किया जा सकता है। यह प्रारंभिक जांच बाहरी बवासीर और उससे जुड़ी किसी भी सूजन या घनास्त्रता की पहचानने में मदद करती है।
  2. डिजिटल रेक्टल परीक्षण- डॉक्टर असामान्यता या आंतरिक बवासीर जाँचने के लिए मलाशय में दस्ताने पहने हुए अँगुली डालकर सूजी हुई नसों और सूजन के किसी लक्षण जानते हैं।
    एनोस्कोपी या प्रॉक्टोस्कोपी- इं प्रक्रियाओं में प्रकाश के साथ एक छोटी ट्यूब (एनोस्कोप या प्रॉक्टोस्कोप) से गुदा नलिका और निचले मलाशय को देखकर आंतरिक बवासीर और उनके आकार, स्थान और प्रोलैप्स की डिग्री का आकलन करते हैं।
    कोलोनोस्कोपी- ५० वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों या कोलोरेक्टल कैंसर के पारिवारिक इतिहासवाले लोगों में यह बृहदान्त्र और मलाशय की अधिक व्यापक जाँच में सहायक होता है।

शल्य क्रिया 
 
hemorrhoidectomy- इसमें बवासीर को हटाया जाता है, आमतौर पर बड़े या लगातार बवासीर के लिए इसकी सिफारिश की जाती है।

स्टेपल्ड हेमोराइडोपेक्सीप्रोलैप्स्ड- बवासीर के लिए प्रयुक्त एक शल्य चिकित्सा विकल्प, जिसमें बवासीर को वापस उसके स्थान पर स्टेपल कर दिया जाता है तथा अतिरिक्त ऊतक को निकाल दिया जाता है।

लेजर उपचार- एक न्यूनतम आक्रामक विकल्प जो बवासीर को सिकोड़कर तेजी से रोग से मुक्त करता है।
***

जनवरी ११, हिंदी, बुंदेली सॉनेट, लघुकथा, पूर्णिका, नवगीत, कौन हूँ मैं?, लावणी,

सलिल सृजन जनवरी ११
पूर्णिका
गाजर और टमाटर का है सूप वैलकम ड्रिंक
मक्खन टिकिया, पनीर-ब्रेड का तड़का जोड़े लिंक
.
तिल-गुड़ लड्डू, अलसी-लहसुन वापरना मत भूल
चूके तो गाढ़ा होगा ब्लड, हार्ट न होवे सिंक
.
गजक, कचौड़ी, चटनी तीखी नैन बान सँग भेज
गजब ढा रही हैं नजरें ज्यों लाइट होती ब्लिंक
.
चटखारों पर चटखारे, ले ले चतुरा ललचाए
नैन उठाए मिला झुकाए, गाल हो रहे पिंक
.
अपनी ढपली राग अबूझा, छेड़ सुनाए बरबस
कटलेटों पर सॉस मिर्च की, 'सलिल' छिड़क दी इंक
०००
पूर्णिका
अपनी ढपली अपना राग
झूम माघ में गाए फाग
.
दुनिया को मरघट करतीं
महाशक्तियाँ बारें आग
.
जहर उगलते नेतागण
हारा शर्मिंदा हो नाग
.
यह भौंके, वह रेंक रहा
संसद-सदर बना है काग
.
जंगल में जनतंत्र हुआ
इसके सिर धर उसका पाग
.
छेद छिपाने कथली के
जनता देती थिगड़े ताग
.
कपड़े पहनो उजले आप
मिटें नहीं घर धब्बे दाग
.
देश-धर्म के दुश्मन को
सब मिल दम दो, जाए भाग
.
सीकर-सलिल जहाँ बहता
हरियाते तहँ जंगल-बाग
११.१.२०२६
...
हिंदी
.
हिंदी की पूजा मत करिए
हिंदी को नित वापरिए।
हिंदी में ही पूजा करिए
हिंदी में प्रभु को भजिए।
हिंदी हो जिह्वा पर हर पल
हिंदी आस पले मन में।
हिंदी ही हो श्वास-श्वास में
हिंदी व्यापे जीवन में ।
हिंदी अपनी आस-आस में
हिंदी दिल की धड़कन में।
हिंदी सुमन सुमन में महके
हिंदी हो हर क्यारी में।
हिंदी मन मंदिर में पूजें
हिंदी हो अग्यारी में।
हिंदी उत्सव-पर्व-धर्म हो
हिंदी की दस दिश हो धूम।
हिंदीभाषी हों सब जग में
हिंदी सुन पाएँ जग घूम।
हिंदी में लोरी गा मैया
हिंदी में शिशु गीत सुने।
हिंदी में ही खेले बचपन
हिंदी सपने युवा बुने।
हिंदी पर्चा लिखे डॉक्टर
हिंदी में सामान मिले।
हिंदी बोले हर अभियंता
हिंदी में निर्माण करे।
हिंदी में सुनवाई-न्याय हो
हिंदी में फैसले मिलें।
हिंदी में ही द्वन्द-मिलन हो
हिंदी में शहनाई बजे।
हिंदी में ही गीत-गजल हो
हिंदी में ही हो शिक्षा।
हिंदी ले जाएँ नव ग्रह पर
हिंदी में पाएँ दीक्षा।
११.१.२०२५
०००
बुंदेली सॉनेट
*
आकें देखो कभऊँ गाँव में,
पता परैगी तब सच्चाई,
अब नें मताई नार पराई,
घाम तपत है इतै छाँव में।
नरदा बह रओ सूख नाँव में,
जीत रई हर रोज बुराई,
हार गई सच में सच्चाई,
लगो सनिश्चर जवां पाँव में।
एक बहन जी पाँच किलासें,
होते पास पढ़े बिन बच्चे,
देस कर रओ खूब तरक्की।
पंच-खसम श्रमिकों को ठाँसे,
तंग कर रए शह पा लुच्चे,
भई लाड़ली हक्की-बक्की।
११.१.२०२४
***
सॉनेट
विरोधाभास
*
वे बाल काव्य लिख रहे हैं बाल श्याम कर।
दाँत मुँह में हैं नहीं लोहे के हैं चने।
जला रहे फसलें, हैं दाम आसमान पर।।
है नाम नम्रता मगर तेवर रहें तने।।
भाषा न भाव है मगर साहित्य रच रहे।
क्यों नाम बदल छंद का भरमा रहे कहें।
पढ़ते न और को कभी, सुनने से बच रहे।।
जैसी बयार हो कलम क्यों उस तरफ बहें।।
कुछ लोग देख डर गए, वक्तव्य वीर जी।
है चोर की दाढ़ी में, तिनका रहा सदा।
जनता कुचल रहे हैं, मंत्री के पूत जी।।
हैं वायदे जुमले हुए, क्या भाग्य में बदा।।
कुम्हला रहे कमल कहा दुष्यंत ने सही।
तालाब का पानी बदल, सुपंथ चुन सही।।
११.१.२०२२
***
गीत
भीड़ का हिस्सा नहीं
छाँव हूँ मैं, धूप भी हूँ
खेत हूँ मैं, कूप भी हूँ
महल का ठस्सा नहीं
लोक हूँ मैं स्वाभिमानी
देशप्रेमी आत्मदानी
वायवी किस्सा नहीं
खींच कर तृष्णा बुझाओ
गले बाँधो, मुक्ति पाओ
कसूरी रस्सा नहीं
भाग्य लिखता कर परिश्रम
बाँध मुट्ठी, आँख रख नम
बेतुका घिस्सा नहीं
११.१.२०२०
***
लघुकथा:
निपूती भली थी
*
बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.
अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आँखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुँह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आई.
उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे. दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीडाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुँह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुँह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.
अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- 'ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.
* * *
मेरा परिचय:
कौन हूँ मैं?...
*
क्या बताऊँ, कौन हूँ मैं?
नाद अनहद मौन हूँ मैं.
दूरियों को नापता हूँ.
दिशाओं में व्यापता हूँ.
काल हूँ कलकल निनादित
कँपाता हूँ, काँपता हूँ.
जलधि हूँ, नभ हूँ, धरा हूँ.
पवन, पावक, अक्षरा हूँ.
निर्जरा हूँ, निर्भरा हूँ.
तार हर पातक, तरा हूँ..
आदि अर्णव सूर्य हूँ मैं.
शौर्य हूँ मैं, तूर्य हूँ मैं.
अगम पर्वत कदम चूमे.
साथ मेरे सृष्टि झूमे.
ॐ हूँ मैं, व्योम हूँ मैं.
इडा-पिंगला, सोम हूँ मैं.
किरण-सोनल साधना हूँ.
मेघना आराधना हूँ.
कामना हूँ, भावना हूँ.
सकल देना-पावना हूँ.
'गुप्त' मेरा 'चित्र' जानो.
'चित्त' में मैं 'गुप्त' मानो.
अर्चना हूँ, अर्पिता हूँ.
लोक वंदित चर्चिता हूँ.
प्रार्थना हूँ, वंदना हूँ.
नेह-निष्ठा चंदना हूँ.
ज्ञात हूँ, अज्ञात हूँ मैं.
उषा, रजनी, प्रात हूँ मैं.
शुद्ध हूँ मैं, बुद्ध हूँ मैं.
रुद्ध हूँ, अनिरुद्ध हूँ मैं.
शांति-सुषमा नवल आशा.
परिश्रम-कोशिश तराशा.
स्वार्थमय सर्वार्थ हूँ मैं.
पुरुषार्थी परमार्थ हूँ मैं.
केंद्र, त्रिज्या हूँ, परिधि हूँ.
सुमन पुष्पा हूँ, सुरभि हूँ.
जलद हूँ, जल हूँ, जलज हूँ.
ग्रीष्म, पावस हूँ, शरद हूँ.
साज, सुर, सरगम सरस हूँ.
लौह को पारस परस हूँ.
भाव जैसा तुम रखोगे
चित्र वैसा ही लखोगे.
स्वप्न हूँ, साकार हूँ मैं.
शून्य हूँ, आकार हूँ मैं.
संकुचन-विस्तार हूँ मैं.
सृष्टि काव्यापार हूँ मैं.
हिंस्र खातिर काल हूँ मैं
हलाहल की ज्वाल हूँ मैं
कभी दुर्गा, कभी काली
दनुज-सर की माल हूँ मैं
चाहते हो स्नेह पाओ.
सृष्ट में हो लीन जाओ.
द्वेष, हिंसा भूल जाओ.
रागिनी जग में गुँजाओ.
जलधि जल की धार हूँ मैं
हिंद-हिंदी सार हूँ मैं.
कायरों की मौत हूँ मैं
सज्जनों हित ज्योत हूँ मैं
नर्मदा हूँ, वर्मदा हूँ.
धर्मदा हूँ, कर्मदा हूँ.
कभी कंकर, कभी शंकर.
कभी सैनिक कभी बंकर.
दहशतगर्दों! मौत हूँ मैं.
ज़िंदगी की सौत हूँ मैं.
सुधर आओ शरण हूँ मैं.
सिर रखो शिव-चरण हूँ मैं.
क्या बताऊँ, कौन हूँ मैं?
नाद अनहद मौन हूँ मैं.
***
लावणी
*
छंद विधान: यति १६-१४, समपदांती द्विपदिक मात्रिक छंद, पदांत नियम मुक्त।
पुस्तक मेले में पुस्तक पर, पाठक-क्रेता गायब हैं।
थानेदार प्रकाशक कड़ियल, विक्रेतागण नायब हैं।।
जहाँ भीड़ है वहाँ विमोचन, फोटो ताली माला है।
इंची भर मुस्कान अधर पर, भाषण घंटों वाला है।।
इधर-उधर ताके श्रोता, मीठा-नमकीन कहाँ कितना?
जितना मिलना माल मुफ्त का, उतना ही हमको सुनना।।
फोटो-सेल्फी सुंदरियों के, साथ खिंचा लो चिपक-चिपक।
गुस्सा हो तो सॉरी कह दो, खोज अन्य को बिना हिचक।।
मुफ्त किताबें लो झोला भर, मगर खरीदो एक नहीं।
जो पढ़ने को कहे समझ लो, कतई इरादे नेक नहीं।।
हुई देश में व्याप्त आजकल, लिख-छपने की बीमारी।
बने मियाँ मिट्ठू आपन मुँह, कविगण करते झखमारी।।
खुद अभिनंदन पत्र लिखा लो, ले मोमेंटो श्रीफल शाल।
स्वल्पाहार हरिद्रा रोली, भूल न जाना मल थाल।।
करतल ध्वनि कर चित्र खींच ले, छपवा दे अख़बारों में।
वह फोटोग्राफर खरीद लो, सज सोलह सिंगारों में।।
जिम्मेदारी झोंक भाड़ में, भूलो घर की चिंता फ़िक्र।
धन्य हुए दो ताली पाकर, तरे खबर में पाकर ज़िक्र।।
११.१.२०१९
शान्तिराज पुस्तकालय
जिन शिक्षा संस्थाओं में अर्थाभाव के कारण विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय सुविधा उपलब्ध नहीं है, उनके प्राचार्य द्वारा आवेदन करने और शिक्षकों द्वारा पुस्तकालय संचालन का दायित्व ग्रहण करने की सहमति होने पर प्रतिवर्ष १०० पुस्तकें तथा साहित्यिक पत्रिकाएँ निशुल्क प्रदान की जाती हैं।
संस्था के केंद्रीय कार्यालय ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर में सदस्यों हेतु निशुल्क पुस्तकालय है जिसमें लगभग १५००० पुस्तकें व पत्रिकाएँ उपलब्ध हैं। सहयोगी संस्था आईसेक्ट द्वारा निशुल्क उपलब्ध कराई गई पुस्तकें / पत्रिकाएँ आदि यहाँ सदस्यों को उपलब्ध रहती हैं। संस्था के संस्थापक सभापति आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', अध्यक्ष श्री बसंत शर्मा, सचिव इंजी. अरुण भटनागर हैं। संस्था द्वारा विविध साहित्यक विधाओं की कृतियों तथा विशिष्ट अवदान पर वार्षिक सम्मेलन के अवसर पर पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। वर्ष २०२१ में तरुण स्मृति गीत-नवगीत सम्मान (५०००/- नगद) से श्री विनोद निगम को सम्मानित किया गया।
महीयसी पुस्तक प्रसार योजना
संस्था द्वारा वाट्सऐप समूह अभियान जबलपुर पर हर मंगलवार को शाम ५ बजे से आयोजित बाल जगत कार्यक्रम में सहभागिता कर रहे बच्चों की प्रतिभा विकास कर उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए न्यायमूर्ति शिवदयाल जी की पुण्य स्मृति में सबसे अच्छी प्रस्तुति पर एक पुस्तक पुरस्कार में दी जाएगी। ये पुस्तकें भोपाल से डॉ. ज्योत्स्ना निगम जी के माध्यम से दी जाएँगी। पुरस्कार के निर्णायक विशववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के सभापति होंगे। पुरस्कार घोषणा के पश्चात् विजयी बच्चा अपना डाक का पता, चलभाष क्रमांक आदि पटल पर सूचित करेगा।
बच्चे अपना खुद का पुस्तकालय बना सकें तो उनमें पुस्तक पढ़ने की आदत का विकास होगा। पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने से बाल पाठक शब्द भण्डार, शब्दों के अर्थ की समझ बढ़ेगी, वाक्य अथवा छंद की संरचना के प्रति लगाव होगा और वे अपनी परीक्षा पुस्तिका या साक्षात्कार में अपने उत्तर देते समय या भाषण आदि देते समय सटीक शब्दों व भाषा का प्रयोग कर सफल होंगे।
प्रथम पुरस्कार सुरभि मुले को
पटल पर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों की सुंदर प्रस्तुति करने के लिए सुरभि मुले को प्रथम 'न्यायमूर्ति शिवदयाल स्मृति पुरस्कार' प्रदान करने के निर्णय लिया गया है। सुरभि को पूरी गीता कंठस्थ है। ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा सुरभि गीता के श्लोकों का सस्वर वाचन तथा व्याख्या करने में निपुण है। सुरभि का पता- प्लाट क्रमांक ४६ बी, मकान क्रमांक ७८२ बदनपुर, साई पैलेस के सामने, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१।
पाठक पंचायत
संस्था के सदस्यों तथा अन्य रचनाकारों से प्राप्त पुस्तकों की समीक्षा नियमित गोष्ठियों में निरंतर की जाती है। संस्थान की ११ ईकाइयाँ विविध नगरों में कार्यरत हैं। सभी ईकाइयों में समीक्षा हेतु प्रति इकाई २ पुस्तकें आना आवश्यक है। कम प्रतियाँ मिलने पर केवल केंद्रीय ईकाई में चर्चा की जाती है।
वॉट्सऐप जीवंत गोष्ठियाँ
वॉट्सऐप पर जीवंत (लाइव) गोष्ठियाँ प्रतिदिन ५ बजे से आयोजित की जा रही हैं जिनके विषय सोमवार उपनिषद वार्ता, मंगलवार बाल जगत, बुधवार भाषा विविधा, गुरूवार लोक साहित्य, शुक्रवार रस-छंद-अलंकार तथा समीक्षा, शनिवार काव्य गोष्ठी, रविवार संत समागम (११ बजे से) हैं।
दिव्य नर्मदा
संस्थान की पत्रिका दिव्य नर्मदा.इन पर प्रतिदिन नई रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इसका गणक अब तक आ चुके पाठकों की संख्या ३८,१४,४५५ दिखा रहा है। इस पर १२६६१ रचनाएँ प्रस्तुत की जा चुकी हैं।
अन्य गतिविधियाँ
संस्था अपने सदस्यों को लेखन विधाओं, हिंदी व्याकरण, हिंदी छंद आदि की जानकारी तथा लेखन हेतु मार्गदर्शन देने के साथ पांडुलिपियों के संशोधन, मुद्रण, भूमिका लेखन, समीक्षा लेखन, विमोचन आदि में सहायक होती है।
***
पर्यावरण - वानिकी
*
साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा के आमंत्रण पर बाल साहित्य सम्मेलन में सहभागिता हेतु राजस्थान के कुछ भू भाग का भ्रमण करने का लोभ संवरण न कर सका। अत्यधिक शीत और कोहराजनित असुविधा की आशंका पर श्रीनाथ जी के दर्शन मिलने के सौभाग्यजनित भक्ति भाव ने विजय पाई।
मैं और उदयभानु तिवारी 'मधुकर' दयोदय एक्सप्रेस में पूर्वारक्षित बी ३, ९-१२ शायिकाओं से ४ जनवरी को रात्रि ८ बजे प्रस्थित हुए, सिहोरा से भाई विजय बागरी जुड़ गए। शयन से पूर्व जीवित काव्य गोष्ठी हो गई, सहयात्री भी रसानंद लेते रहे। बिरला इंस्टीयूट ऑफ़ टैक्नॉलॉजी पिलानी का एक युवा विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा में गिरावट और अंग्रेजी के वर्चस्व के प्रति चिंतित मिला। मैं और मधुकर जी अभियंता भी हैं, जानकर प्रसन्न हुआ। मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग की शिक्षा हिंदी में होती यह जानकर वह विस्मित और प्रसन्न हुआ। स्नेह सम्मेलन या परिसंवाद में हिंदी में तकनीकी शिक्षा पर मार्ग दर्शन हेतु उसने सहमति माँगी। उसे विषय को विविध पहलुओं से अवगत कराकर रात्रि ११.३० बजे सपनों की दुनिया की सैर करने चला गया।
प्रात: लगभग ६ बजे आँख खुली, खिड़की से झाँकते ही घने कोहरे ने सिहरा दिया। पटरियों को किनारे लगे वृक्ष तक दिखाई नहीं दे रहे थे। अधुनातन दृष्टिवर्धक उपकरणों से सज्जित होने पर भी रेलगाड़ी मंथर गति से बढ़ पा रही थी। लगभग सवा घंटे विलंब से हम कोटा पहुँचे।
कोटा से बस द्वारा भीलवाड़ा जाते समय राजस्थानी जन-जीवन की झलकियाँ, विशेषकर निरंतर बढ़ती हरियाली देखकर प्रसन्नता हुई। लगभग १० वर्ष पूर्व की तुलना में राजस्थान में पर्वतों का विनाश बड़े पैमाने पर हुआ है किन्तु हरियाली बढ़ी है। प्रकृति मनुष्य के मुनाफे का माध्यम बना दी गई है।
***
मुक्तिका
*
ज़िंदगी है बंदगी, मनुहार है.
बंदगी ही ज़िंदगी है, प्यार है.
सुबह-संझा देख अरुणिम आसमां
गीत गाए, प्रीत की झंकार है.
अचानक आँखें, उठीं, मिल, झुक गईं
अनकहे ही कह गयीं 'स्वीकार है'.
सांस सांसों में घुलीं, हमदम हुईं
महकता मन हुआ हरसिंगार है.
मौन तजकर मौन बरबस बोलता
नासमझ! इनकार ही इकरार है.
११.१.२०१७
***
नवगीत:
समझदारी
*
साक्षरता ही
समझदारी नहीं है
*
बीज, पानी, खाद की
मात्रा प्रचुर है
भूमि है पर्याप्त
उर्वरता मुखर है
सुरक्षा कर नहीं पाता
निबल माली
उपकरण थामे
मगर क्यारी नहीं है
साक्षरता ही
समझदारी नहीं है
*
औपचारिकता
हुए कानून सारे
स्वार्थ-सुविधा ही
हुए हैं हमें प्यारे
नगद सौदे की
नहीं है चाह बाकी
उधारी की प्रथा
हितकारी नहीं है
साक्षरता ही
समझदारी नहीं है
*
त्याग का कर त्याग
भोगें भोग सारे
अस्पतालों में
पले हैं रोग न्यारे
संक्रमण से ग्रस्त
ऑपरेशन थियेटर
मरीजों से कहाँ
बटमारी नहीं है?
साक्षरता ही
समझदारी नहीं है
***
नवगीत-
गुनो
*
जो पढ़ो
उसकी समझकर
गुनो भी
*
सिर्फ रट लेना विषय
काफी नहीं है
जानकार ना जानना?
माफ़ी नहीं है
किताबों को
खोलकर, सर
धुनों भी
जो पढ़ो
उसकी समझकर
गुनो भी
*
बात अपनी बोलना
बेहद जरूरी
जानकारी लें न दें
आधी-अधूरी
कोशिशों की
ऊन ले, चादर
बुनो भी
जो पढ़ो
उसकी समझकर
गुनो भी
*
जीभ पायी एक
लेकिन कान दो हैं
गीत अपने नहीं
किसको कहो मोहें?
अन्य क्या कहते
कभी उसको
सुनो भी
जो पढ़ो
उसकी समझकर
गुनो भी
***
नवगीत
*
भीड़ का हिस्सा नहीं
छाँव हूँ मैं, धूप भी हूँ
खेत हूँ मैं, कूप भी हूँ
महल का ठस्सा नहीं
लोक हूँ मैं स्वाभिमानी
देशप्रेमी आत्मदानी
वायवी किस्सा नहीं
खींच कर तृष्णा बुझाओ
गले बाँधो, मुक्ति पाओ
कसूरी रस्सा नहीं
भाग्य लिखता कर परिश्रम
बाँध मुट्ठी, आँख रख नम
बेतुका घिस्सा नहीं
११-१-२०२०
***
नवगीत-
बहती नदी
*
नवगीत तो
बहती नदी है
*
चेतना ने
कैद नियमों की
न मानी
वेदना ने
विभाजन रेखा
न जानी
स्नेह का
क्षण मात्र भी
जीवित सदी है
नवगीत तो
बहती नदी है
*
विषमता को
कौन-कैसे
साध्य माने?
विड़ंबनामय
नियति क्यों
आराध्य ठानें?
प्रीति भी तो
मनुज!
किस्मत में बदी है
नवगीत तो
बहती नदी है
*
हास का
अरविन्द खिलता
तो न रोको
आस का
मकरंद प्रसरित हो
न टोको
बदलाव ही
हर विधा की
प्रकृति रही है
नवगीत तो
बहती नदी है
११.१.२०१६
***
नवगीत:
.
ग्रंथि श्रेष्ठता की
पाले हैं
.
कुटें-पिटें पर बुद्धिमान हैं
लुटे सदा फिर भी महान हैं
खाली हाथ नहीं संसाधन
मतभेदों का सर वितान है
दो-दो हाथ करें आपस में
जाने क्या गड़बड़
झाले हैं?
.
बातें बड़ी-बड़ी करते हैं
मनमानी का पथ वरते हैं
बना तोड़ते संविधान खुद
दोष दूसरों पर धरते हैं
बंद विचारों की खिड़की
मजबूत दिशाओं पर
ताले हैं
.
सच कह असच नित्य सब लेखें
शीर्षासन कर उल्टा देखें
आँख मूँद 'तूफ़ान नहीं' कह
शतुरमुर्ग निज पर अवरेखें
परिवर्तित हो सके न तिल भर
कर्म सकल देखे
भाले हैं.
१४.३०, २९.१२.२०१४
पंचायती धर्मशाला, जयपुर
नवगीत:
.
दिशा न दर्शन
दीन प्रदर्शन
.
क्यों आये हैं?
क्या करना है??
ज्ञात न पर
चर्चा करना है
गिले-शिकायत
शिकवे हावी
यह अतीत था
यह ही भावी
मर्यादाओं का
उल्लंघन
.
अहंकार के
मारे सारे
हुए इकट्ठे
बिना बिचारे
कम हैं लोग
अधिक हैं बातें
कम विश्वास
अधिक हैं घातें
क्षुद्र स्वार्थों
हेतु निबंधन
.
चित्र गुप्त
सू रत गढ़ डाली
मनमानी
मूरत बनवा ली
आत्महीनता
आत्ममोह की
खुश होकर
पीते विष-प्याली
पल में गाली
पल में ताली
मंथनहीन
हुआ मन-मंथन
२९.१२. २०१४ जयपुर
मुक्तिका:
क्या कहूँ...
*
क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाता.
बिन कहे भी रहा नहीं जाता..
काट गर्दन कभी सियासत की
मौन हो अब दहा नहीं जाता..
ऐ ख़ुदा! अश्क ये पत्थर कर दे,
ऐसे बेबस बहा नहीं जाता.
सब्र की चादरें जला दो सब.
ज़ुल्म को अब तहा नहीं जाता..
हाय! मुँह में जुबान रखता हूँ.
सत्य फिर भी कहा नहीं जाता..
देख नापाक हरकतें जड़ हूँ.
कैसे कह दूं ढहा नहीं जाता??
सर न हद से अधिक उठाना तुम
मुझसे हद में रहा नहीं जाता..
***
मुक्तिका :
नया आज इतिहास लिखें हम
*
नया आज इतिहास लिखें हम.
गम में लब पर हास लिखें हम..
दुराचार के कारक हैं जो
उनकी किस्मत त्रास लिखें हम..
अनुशासन को मालिक मानें
मनमानी को दास लिखें हम..
ना देवी, ना भोग्या मानें
नर-नारी सम, लास लिखें हम..
कल की कल को आज धरोहर
कल न बनें, कल आस लिखें हम..
(कल = गत / आगत / यंत्र / शांति)
नेता-अफसर सेवक हों अब
जनगण खासमखास लिखें हम..
स्वार्थ भावना दूर करें
सर्वार्थ भावना पास लिखें हम..
हाथ मिला जीतें हर बाधा
मरुथल में मधुमास लिखें हम..
श्रम हो कृष्ण, लगन हो राधा
'सलिल' सफलता रास लिखें हम..
११.१.२०१३

***

शनिवार, 10 जनवरी 2026

जनवरी १०, पूर्णिका, आजाद, सोरठा, सॉनेट, हिंदी, हिंदी आरती, छंद, गंग, गीत, लघुकथा, सोरठा, दोहा

सलिल सृजन जनवरी १०
पूर्णिका
कोई माने या न माने
हम खुदी‌ को खुदा माने
.
छंद जाने बिना कवि जी
जोड़कर तुक लिखें गाने
.
नोट ले, पी सुरा, झूमे
लतीफे कहते पुराने
.
नित नई तितली तलाशे
भ्रमर लगता गीत गाने
.
जड़ जमीं को नहीं भूले
थिर-अचल नाते पुराने
.
काम करना जब न आए
तब बनाओ सौ बहाने
.
नहीं मन की तनिक चिंता
लगे हैं तन को सजाने
.
बिना बाना बने बाना
सोच ताने लगे ताने
.
हाथ थामे अँधेरे का
चला युग सूरज उगाने
.
'सलिल' पाने सुखी जीवन
चल पड़ो सीकर बहाने
१०.१.२०२६
०००
पुण्य स्मरण- चंद्रशेखर आजाद जी
महान क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद को चित्र खिंचवाना नापसंद था। काकोरी कांड के बाद अंग्रेज संबंधित क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए। आजाद के साथियों की गिरफ्तारी होने लगी। चारों तरफ जासूसों का जाल बिछा हुआ था। आजाद ने जासूसों से बचते-बचते किसी तरह झाँसी पहुँचकार रूद्रनारायण सिंह "मास्टर जी" के आवास में शरण ली । मास्टर जी का आवास कला-संस्कृति और व्यायाम का केंद्र था। सरकारी जासूसों और नौकरशाहों का भी आना-जाना लगा रहता था। आजाद ने अधिक समय तक वहाँ रूकना सुरक्षित नहीं समझा। वे पास के जंगल में एक छोटे से हनुमान मंदिर के पुजारी बनकर रहने लगे ।
एक दिन आजाद को मास्टर जी अपने आवास पर ले आये । कला-प्रेमी होने के साथ-साथ मास्टरजी फोटोग्राफी भी कर लिया करते थे। मास्टरजी आजाद को बिना बताए उनकी तस्वीर कैमरे में कैद करने की कोशिश बहुत देर तक करते रहे लेकिन आजाद थे कि सही पॉजिशन ले ही नहीं रहे थे। बाद में तंग होकर मास्टरजी ने आजाद से एक फोटो खिंचवाने का निवेदन ही कर दिया । पहले तो आजाद तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन बाद में फोटो खिंचवाने के लिए खड़े हो गए।
फिर मास्टरजी ने जैसे ही अपना कैमरा संभाला और बोला- " आज तुम मुझे ऐसे ही तुम्हारा एक फोटो खींच लेने दो।
आजाद ने कहा- " अच्छा! तो ज़रा मेरी मूँछे एँठ लेने दो" और उन्होंने अपनी मूँछें घुमानी शुरू कर दी। इसी बीच मास्टर जी ने उस ऐतिहासिक तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर लिया जो आज राष्ट्र की महान नीधि बन गया। यह आजाद का एकमात्र प्रामाणिक चित्र है।
***
सोरठा सलिला
कालिंदी के तीर, लिखा गया इतिहास था।
मन में धरकर धीर, जन-हित साधा कृष्ण ने।।
*
प्रकृति मैया पोस, मारा शोषक कालिया।
सहा इंद्र का रोष, गोवर्धन छिप कान्ह ने।।
*
मिला पूत नहिं एक, बंजर भू सम पूतना।
खोकर चली विवेक, कृष्ण मारने खुद मरी।।
*
जोशीमठ में आज, कान्हा हो जाओ प्रगट।
जन-जीवन की लाज, मात्र तुम्हारे हाथ में।।
*
दोषी शासन-नीति, रही प्रकृति को छेड़ती।
है पाखंडी रीति, घड़ियाली आँसू बहे।।
*
जनता जागे आज, कहें कृष्ण विप्लव करो।
बदल इंद्र का राज, करो प्रकृति से मित्रता।।
१०-१-२०२३
***
सॉनेट
हिंदी
*
जगवाणी हिंदी का वंदन, इसका वैभव अनुपम अक्षय।
हिंदी है कृषकों की भाषा, श्रमिकों को हिंदी प्यारी है।
मध्यम वर्ग कॉंवेंटी है, रंग बदलता व्यापारी है।।
जनवाणी, हैं तंत्र विरोधी, न्यायपालिका अंग्रेजीमय।।
बच्चों से जब भी बतियाएँ, केवल हिंदी में बतियाएँ।
अन्य बोलिओं-भाषाओँ को, सिखा-पढ़ाएँ साथ-साथ ही।
ह्रदय-दिमाग न हिंदी भूले, हिंदी पुस्तक लिए हाथ भी।।
हिंदी में प्रार्थना कराएँ, भजन-कीर्तन नित करवाएँ।।
शिक्षा का माध्यम हिंदी हो, हिंदी में हो काम-काज भी।
क्यों अंग्रेजी के चारण हैं, तनिक न आती हया-लाज भी।
हिंदी है सहमी गौरैया, अंग्रेजी है निठुर बाज सी।
शिवा कह रहे हैं शिव जी को, कैसे आए राम राज जी?
हो जब निज भाषा में शिक्षा, तभी सधेंगे, सभी काज जी।।
देवनागरी में लिखिए हर भाषा, होगा तब सुराज जी।।
***
सॉनेट
जात को अपनी कभी मरने न दीजिए।
बात से फिरिए नहीं, तभी तो बात है।
ऐब को यह जिस्म-जां चरने न दीजिए।।
करें फरेब जीत मिले तो भी मात है।।
फायदा हो कायदे से तभी लीजिए।
छीनिए मत और से, न छीनने ही दें।
वायदा टूटे नहीं हर जतन कीजिए।।
पंछियों को अन्न कभी बीनने भी दें।।
दुर्दशा लोगों की देखकर पसीजिए।
तंत्र रौंद लोक को गर्रा रहा हुज़ूर।
आईने में देख शकल नहीं रीझिए।।
लोग मरे जा रहे हैं; देखिए जरूर।।
सचाई से आखें कभी चार कीजिए।
औरों की सुन; तनिक ख़ुशी कभी दीजिए।।
१०-१-२०२२
***
हिंदी आरती
*
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
'लोक' की भाषा है हिंदी
'तंत्र' की आशा है हिंदी
करोड़ों जिह्वाओं आसीन
न कोई सकता इसको छीन
ब्रह्म क , विष्णु - पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार
पाँच वर्गों बाँटे उच्चार
बोलते वह जो लिखते आप
वर्तनी - स्वर - व्यंजन अनुसार
नगरी लिपि सुविचारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
एकता पर हिंदी बलिहार,
वचन दो लिंग क्रिया व्यापार
संधियाँ काल शक्ति हैं तीन
विशेषण हैं हिंदी में चार
पांच अव्यय व्यवहारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
*
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव - मन को मोहें
काव्य रचना सुडौल सुंदर
वाक्य लेते सबका मन हर
छंद सुमनों की क्यारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
समेटे ज्ञान निति विज्ञान
सीख पढ़ लिख हों हम विद्वान
विषय जो कठिन जटिल नीरस
बना देती हिंदी रसवान
विश्ववाणी गुणकारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
१०.१.२०१९
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लघुकथा-
गूँगे का गुड़
*
अपने लेखन की प्रशंसा सुन मित्र ने कहा आप सब से प्रशंसा पाकर मन प्रसन्न होता है किंतु मेरे पति प्राय: कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। मेरा ख़याल था कि उन्हें मेरा लिखना पसंद नहीं है परन्तु आप कहते हैं कि ऐसा नहीं है। यदि उन्हें मेरा लिखना और मेरा लिखा अच्छा लगता है तो यह जानकर मुझे ख़ुशी और गौरव ही अनुभव होगा। मुझे उनकी जो बात अच्छी लगती है, मैं कह देती हूँ, वे क्यों नहीं कहते?
मैंने कहा- 'गूँगे का गुड़' न होता तो कहावत कैसे बनती।
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मुक्तक
मन जी भर करता रहा, था जिसकी तारीफ
उसने पल भर भी नहीं, कभी करी तारीफ
जान-बूझ जिस दिन नहीं, मन ने की तारीफ
उस दिन वह उन्मन हुई, कर बैठी तारीफ
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सोरठा
मन बैठा था मौन, लिखवाती संगत रही।
किसका साथी कौन?, संग खाती पंगत रही।।
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दोहा सलिला
*
मन मीरां तन राधिका,तरें जपें घनश्याम।
पूछ रहे घनश्याम मैं जपूँ कौन सा नाम?
*
जिसको प्रिय तम हो गया, उसे बचाए राम।
लक्ष्मी-वाहन से सखे!, बने न कोई काम।।
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प्रिय तम हो तो अमावस में मत बालो दीप।
काला कम्बल ओढ़कर, काजल नैना लीप।।
*
प्रियतम बिन कैसे रहे, मन में कहें हुलास?
विवश अधर मुस्का रहे, नैना मगर उदास।।
*
चाह दे रही आह का, अनचाहा उपहार।
वाह न कहते बन रहा, दाह रहा आभार।।
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बिछुड़े आनंदकंद तो, छंद आ रहा याद।
बेचारा कब से करे, मत भूलो फरियाद।।
*
निठुर द्रोण-मूरत बने, क्यों स्नेहिल संजीव।
सलिल सलिल सा तरल हो, मत करिए निर्जीव।।
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आलेख-
मत करें उपयोग इनका
हम जाने-अनजाने ऐसी सामग्री का उपयोग करते रहते हैं जो हमारे स्वस्थ्य, पर्यावरण और परिवेश के लिए घातक होती है. निम्न वस्तुएँ ऐसी ही हैं, इनका प्रयोग बंद कर हम आप तथा समाज और पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं.
१. प्लास्टिक निर्मित सामान- मनुष्य द्वारा किसी सामान का उपयोग किये जाने के बाद बचा निरुपयोगी कचरा कूड़े के ढेर, नाली, नाला, नदी से होते हुए अंतत: समुद्र में पहुँचकर 'रत्नाकर' को 'कचराघर' बना देता है. समुद्र को प्रदूषित करते कचरे में ८०% प्लास्टिक होता है. प्लास्टिक सड़ता, गलता नहीं, इसलिए वह मिट्टी में नहीं बदलता. भूमि में दबाये जाने पर बरसों बाद भी ज्यों का त्यों रहता है. प्लास्टिक जलने पर ओषजन वजू नष्ट होती है और प्रदूषण फैलानेवाली हानिप्रद वायु निकलती है. प्लास्टिक की डब्बियाँ, चम्मचें, प्लेटें, बर्तन, थैलियाँ, कुर्सियाँ आदि का कम से कम प्रयोग कर हम प्रदूषण कम कर सकते हैं.
प्लास्टिक के सामान मरम्मत योग्य नहीं होते. इनके स्थान पर धातु या लकड़ी का सामान प्रयोग किया जाए तो उसमें टूट-फूट होने पर मरम्मत तथा रंग-रोगन करना संभव होता है. इससे स्थानीय बेरोजगारों को आजीविका मिलती है जबकि प्लास्टिक सामग्री पूंजीपतियों का धन बढ़ाती है.
२. दन्तमंजन- हमने बचपन में कंडों या लकड़ी की राख में नमक-हल्दी मिले मंजन या दातौन का प्रयोग वर्षों तक किया है जिससे दांत मुक्त रहे. आजकल रसायनों से बने टूथपेस्ट का प्रयोग कर शैशव और बचपन दंत-रोगों से ग्रस्त हो रहा है. टूथपेस्ट कंपनियाँ ऐसे तत्वों (माइक्रोबीड्स) का प्रयोग करती हैं जिन्हें सड़ाया नहीं जा सकता. कोयले को घिसकर अथवा कोयले की राख से दन्तमंजन का काम लिया का सकता है. वनस्पतियों से बनाये गए दंत मंजन का प्रयोग बेहतर विकल्प है.
स्टीरोफोम
३. स्टिरोफोम से बने समान- आजकल तश्तरी, कटोरी, गिलास और चम्मच न सड़नेवाले (नॉन बायोडिग्रेडेबल) तत्वों से बनाये जाते हैं. हल्का और सस्ता होने पर भी यह गंभीर रोगों को जन्म दे सकता है. इसके स्थान पर बाँस, पेड़ के पत्तों, लकड़ी या छाल से बने समान का प्रयोग करें तो वह सड़कर मिटटी बन जाता है तह स्थानीय रोजगार का सर्जन करता है. इनकी उपलब्धता के लिए पौधारोपण बड़ी संख्या में करना होगा जिससे वन बढ़ेंगे और वायु प्रदूषण घटेगा.
१०.१.२०१७
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नवगीत:
क्यों?
*
इसे क्यों
हिर्स लगती है
जिठानी से?
उसे क्यों
होड़ लेना
देवरानी से?
*
अँगुलियाँ कब हुई हैं
एक सी बोलो?
किसी को बेहतर-कमतर
न तुम तोलो
बँधी रख अँगुलियाँ
बन जाओ रे! मुट्ठी
कभी मत
हारना, दुनिया
दीवानी से
*
लड़े यदि नींव तो
दीवार रोयेगी
दिखाकर आँख छत
निज नाश बोयेगी
न पूछो हाल कलशों का
कि क्या होगा?
मिटाओ
विषमता मिल
ज़िंदगानी से
*
न हीरे-मोतियों से
प्यास मिटती है
न ताकत से अधर पर
हँसी खलती है
नयन में आस ही
बन प्रीत पलती है
न छीने
स्वप्न युग
नादां जवानी से
१०-१-२०१६
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लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोती हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पड़ोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागनेवाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
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लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
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लघुकथा:
विधान
*
नवोढ़ा पुत्रवधू के हर काम में दोष निकलकर उन्हें संतोष होता, सोचतीं यह किसी तरह मायके चली जाए तो पुत्र पर फिर एकाधिकार हो जाए. बेटी भी उनका साथ देती। न जाने किस मिट्टी की बनी थी पुत्रवधु कि हर बात मुस्कुरा कर टाल देती।
कुछ दिनों बाद बेटी का विवाह बहुत अरमानों से किया उन्होंने। कुछ दिनों बाद बेटी को अकेला देहरी पर खड़ा देखकर उनका माथा ठनका, पूछा तो पता चला कि वह अपनी सास से परेशान होकर लौट आयी फिर कभी न जाने के लिये। इससे पहले कि वे बेटी से कुछ कहें बहू अपनी ननद को अन्दर ले गयी और वे सोचती रह गयीं कि यह विधि का विधान है या शिक्षा-विधान?
१०.१.२०१६
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विचित्र भारत
सोनिया गांधी मंदिर महबूबनगर, आंध्र
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पूर्व मंत्री पी शंकर राव ने वर्ष १९१४ में सत्ताधारी दल की मुखिया सोनिया गांधी की ९ फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित कर मंदिर तैयार करवाया है। इतालवी मूल की ७१ वर्षीय श्रीमती सोनिया गांधी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिज्ञों में से एक हैं। वे उस नेहरू-गाँधी परिवार की सदस्य हैं जिसने देश को ३ तीन प्रधानमंत्री (जवाहर लाल जी, इंदिरा गाँधी जी और राजीव गाँधी जी) दिए हैं जिनमें से बाद के दोनों शहीद हुए। राव ने जुलाई १९९३ में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए महबूबनगर में यह मंदिर बनवाया है। ३.५ करोड़ आबादी वाले तेलंगाना इलाके में हैदराबाद समेत आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राव ने कहा, ''अलग तेलंगाना राज्य बनाने की दशकों पुरानी माँग को पूरा करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए सोनिया गाँधीको धन्यवाद देने का यह हमारा तरीक़ा है।''
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती जी ने राजधानी लखनऊ में खुद अपनी प्रतिमा युक्त मंदिर का उद्घाटन किया है। दक्षिण भारत में साहित्यकारों, राजनेताओं और अभिनेताओं के मंदिर बनाने की लंबी परंपरा रही है।
***
नवगीत:
.
छोड़ो हाहाकार मियाँ!
.
दुनिया अपनी राह चलेगी
खुदको खुद ही रोज छ्लेगी
साया बनकर साथ चलेगी
छुरा पीठ में मार हँसेगी
आँख करो दो-चार मियाँ!
.
आगे आकर प्यार करेगी
फिर पीछे तकरार करेगी
कहे मिलन बिन झुलस मरेगी
जीत भरोसा हँसे-ठगेगी
करो न फिर भी रार मियाँ!
.
मंदिर में मस्जिद रच देगी
गिरजे को पल में तज देगी
लज्जा हया शरम बेचेगी
इंसां को बेघर कर देगी
पोंछो आँसू-धार मियाँ!
नवगीत:
.
रब की मर्ज़ी
डुबा नाखुदा
गीत गा रहा
.
किया करिश्मा कोशिश ने कब?
काम न आयी किस्मत, ना रब
दुनिया रिश्ते भूल गयी सब
है खुदगर्ज़ी
बुला, ना बुला
मीत भा रहा
.
तदबीरों ने पाया धोखा
तकरीरों में मिला न चोखा
तस्वीरों का खाली खोखा
नाता फ़र्ज़ी
रहा, ना रहा
जीत जा रहा
.
बादल गरजा दिया न पानी
बिगड़ी लड़की राह भुलानी
बिजली तड़की गिरी हिरानी
अर्श फर्श को
मिला, ना मिला
रीत आ रहा
***
नवगीत:
.
उम्मीदों की फसल
ऊगना बाकी है
.
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं?
मत मुगालता रखें जरूरी खाकी है
सत्ता साध्य नहीं है
केवल साकी है
.
जिसको नेता चुना उसीसे आशा है
लेकिन उसकी संगत तोला-माशा है
जनप्रतिनिधि की मर्यादा नापाकी है
किससे आशा करें
मलिन हर झाँकी है?
.
केंद्रीकरण न करें विकेन्द्रित हो सत्ता
सके फूल-फल धरती पर लत्ता-पत्ता
नदी-गाय-भू-भाषा माँ, आशा काकी है
आँख मिलाकर
तजना ताका-ताकी है
***
नवगीत:
.
लोकतंत्र का
पंछी बेबस
.
नेता पहले डालें दाना
फिर लेते पर नोच
अफसर रिश्वत गोली मारें
करें न किंचित सोच
व्यापारी दे
नशा रहा डँस
.
आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
न्यायपालिका अंधी-लूली
पैरों में है मोच
ठेकेदार-
दलालों को जस
.
राजनीति नफरत की मारी
लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूँगा खो दी
निज निर्णय की लोच
एकलव्य का
कहीं न वारिस
१०-१-२०१५
छंद सलिला:
नौ मात्रिक छंद गंग
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि)
*
९ वसुओं के आधार पर नौ मात्राओं के छंदों को वासव छंद कहा गया है. नवधा भक्ति, नौ रस, नौ अंक, अनु गृह, नौ निधियाँ भी नौ मात्राओं से जोड़ी जा सकती हैं. नौ मात्राओं के ५५ छंदों को ५ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
१. ९ लघु मात्राओं के छंद १
२. ७ लघु + १ गुरु मात्राओं के छंद ७
३. ५ लघु + २ गुरु मात्राओं के छंद २१
४. ३ लघु + ३ गुरु मात्राओं के छंद २०
५. १ लघु + ४ गुरु मात्राओं के छंद ५
नौ मात्रिक छंद गंग
नौ मात्रिक गंग छंद के अंत में २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१. हो गंग माता / भव-मुक्ति-दाता
हर दुःख हमारे / जीवन सँवारो
संसार चाहे / खुशियाँ हजारों
उतर आसमां से / आओ सितारों
जन्नत जमीं पे, नभ से उतारो
शिव-भक्ति दो माँ / भाव-कष्ट-त्राता
२. दिन-रात जागो / सीमा बचाओ
अरि घात में है / मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ / बम भी गिराओ
सेना लड़ेगी / सब साथ आओ
३. बचपन हमेशा / चाहे कहानी
है साथ लेकिन / दादी न नानी
हो ज़िंदगानी / कैसे सुहानी
सुने न किस्से, न / बातें बनानी
१०.१.२०१४

***