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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

दिसंबर ३१, नया साल, सॉनेट, भर्तृहरि, लघुकथा, गीत, व्यंग्य, दोहा, भवन, चित्रगुप्त, हाइकु गीत,

सलिल सृजन दिसंबर ३१
*
गीत आता रवि ले आए हँसियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . अपने अपनापन दे पाएँ सपने सारे सच हो जाएँ कच्चा-पक्का जो जब खाएँ बिना देर झट विहँस पचाएँ मिलें दोस्तों की गलबहियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . साथ रह सकें फूल-शूल मिल रहे निरापद कली सके खिल तितली-भँवरे नाचें-गाएँ रहे न कोई होंठों को सिल श्रम तरु पर झूलें सुख फलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . पथ पर बढ़े कदम की जय हो आखर-काव्य-कलम निर्भय हो आँसू पोंछ सकें मुस्कानें जीवट का जयकारा तय हो मन-मंदिर महकें सुख-कलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ ३१.१२.२०२५ ०००
गीत
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
अगर नहीं तो केक काटकर
जला पटाखे, सुरा पानकर
इससे पिटकर, उससे पीटकर
क्या पाएगा?
.
नौ दिन पूज; शेष दिन शोषण
उसका जो जाये; दे पोषण।
अँगुली पकड़ काँध पर जिसके
बैठा; सेवा करी नहीं क्षण।
ऋण पुरखों का नहीं उतारा
कैसे अमन-चैन पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिसकी राखी सजी कलाई
उसको कहता हुई पराई।
गृह लक्ष्मी कह जिसको लाया
सेवा करे न; सिर्फ कराई।
भुला भाई को भाईचारा
किससे कैसे कब पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिनके सुत से ब्याह रचाया
उनके सपनों को बिखराया।
कुल मर्यादा नहीं निभाई
रिश्ता रिसता घाव बनाया।
कपड़ों जैसे बदले नाते
कोई किस तरह अपनाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
धरा-नदी को कहता मैया
छीन रहा उनसे ही छैया।
भुला देश-हित स्वार्थ साधता
कैसे खुश हो राम रमैया?
जोड़-जोड़ कर मरा जा रहा
काम न कुछ तेरे आएगा
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
३१-१२-२०२४
०००
सॉनेट
कल-आज-कल
*
जाने वाला राह बनाता आने वाला चलता है,
पलता है सपना आँखों में तब ही जब हम सोए हों,
फसल काटता केवल वह ही जिसने बीजे बोए हों,
उगता सूरज तब ही जब वह नित संझा में ढलता है।
वह न पनपता जिसको सुख-सौभाग्य अन्य का खलता है,
मुस्कानों की कीमत जानें केवल वे जो रोए हों,
अपनापन पाते हैं वे जो अपनेपन में खोए हों,
लोहा हो फौलाद आग में तप जब कभी पिघलता है।
कल कल करता निर्झर बहता कल पाता मन बैठ निकट,
किलकिल करता जो हो बेकल उसमें सचमुच नहीं अकल,
दास न होना कल का मानव कल-पुर्जों का स्वामी बन।
ठोकर मार न कंकर को तू शंकर उससे हुए प्रगट,
काट न जंगल खोद न पर्वत मिटा न नदी बचा ले जल,
कल से कल को जोड़ आज तू होकर नम्र न नाहक तन।।
३१.१२.२०२३
***
भर्तृहरि का कथन है --
'को लाभो गुणिसंगमः' अर्थात् ( लाभ क्या है? गुणियों का साथ) ।
अंतर्जाल ने मुझे इस लाभ से परिचित करवाया है।
आशा करता हूँ नये साल में मैं इससे और भी ज्यादा लाभान्वित हो सकूँगा।
नये साल में हम सभी एक दूसरे के विचारों लाभ प्राप्त कर सके इसी आशा के साथ इस पुराने साल को हार्दिक विदाई । डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार- 'सब से अधिक आनंद इस भावना में है कि हमने मानवता की प्रगति में कुछ योगदान दिया है। भले ही वह कितना कम, यहाँ तक कि बिल्कुल ही तुच्छ क्यों न हो?'
अपने रचे को इस कसौटी पर परखें और लिखें, लिखते रहें।
नव वर्ष मंगलमय हो ।
***
सॉनेट
राग दरबारी
*
मेघ आच्छादित गगन है, रवि न दिखता खोज लाएँ।
लॉकडाउन कर चुनावी भीड़ बन हम गर्व करते।
खोद कब्रें, हड्डियों को अस्थियाँ कह मार मरते।।
राग दरबारी निरंतर सुनाकर नव वर्ष लाएँ।।
आम्रपाली के पुजारी, आपका बंटी सिरजते।
एक था चंदर सुधा को विवाहे, फिर छोड़ जाए।
थाम सत्ता सुंदरी की बाँह, जाने किसे ध्याए?
अब न दिव्या रही भव्या, चित्रलेखा सँग थिरकते।।
लक्ष्य मुर्दे उखाड़ें परिधान पहना नाम बदलें।
दुश्मनों के हाथ खाकर मात, नव उपलब्धि कह लें।।
असहमत को खोज कुचलें, देख दिल अपनों के दहलें।।
प्रदूषित कर हर नदी, बन अंधश्रद्धा सुमन बह लें।।
जड़ें खोदें रात-दिन, जड़मति न बोलें, अनय सह लें।।
अधर क्या कहते न सुनकर, लाठियाँ को हाथ धर लें।।
१-१-२०२२
***
गीत
काल चक्र का
महाकाल के भक्त
करो अगवानी
.
तपूँ , जड़ाऊँ या बरसूँ
नाखुश होंगे बहुतेरे
शोर-शांति
चाहो ना चाहो
तुम्हें रहेंगे घेरे
तुम लड़कर जय वरना
चाहे सूखा हो या पानी
बहा पसीना
मेहनत कर
करना मेरी अगवानी
.
चलो, गिरो उठ बढ़ो
शूल कितने ही आँख तरेरे
बाधा दें या
रहें सहायक
दिन-निशि, साँझ-सवेरे
कदम-हाथ गर रहे साथ
कर लेंगे धरती धानी
कलम उठाकर
करें शब्द के भक्त
मेरी अगवानी
.
शिकवे गिले शिकायत
कर हल होती नहीं समस्या
सतत साधना
से ही होती
हरदम पूर्ण तपस्या
स्वार्थ तजो, सर्वार्थ साधने
बोलो मीठी बानी
फिर जेपी-अन्ना
बनकर तुम करो
मेरी अगवानी
...
गीत
सूरज उगाएँ
*
चलो! हम सूरज उगाएँ...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगाएँ....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आएँ...
लाए क्या?, ले जाएँगे क्या?,
किसी के मन भाएँगे क्या?
सोच यह जीवन जिएँ हम।
हाथ-हाथों से मिलाएँ...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवाएँ...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनाएँ...
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गई हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पाएगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजाएगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
***
नव वर्ष हाइकु
*
हो नया हर्ष
हर नए दिन में
नया उत्कर्ष
.
प्राची के गाल
रवि करता लाल
है नया साल
.
हाइकु लिखो
हर दिवस एक
इरादा नेक
३१-१२-२०१७
***
नवगीत
*
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
चलो बैठ पल दो पल कर लें
मीत! प्रीत की बात।
*
गौरैयों ने खोल लिए पर
नापें गगन विशाल।
बिजली गिरी बाज पर
उसका जीना हुआ मुहाल।
हमलावर हो लगा रहा है
लुक-छिपकर नित घात
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
आ बुहार लें मन की बाखर
कहें न ऊँचे मोल।
तनिक झाँक लें अंतर्मन में
निज करनी लें तोल।
दोष दूसरों के मत देखें
खुद उजले हों तात!
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
स्वेद-'सलिल' में करें स्नान नित
पूजें श्रम का दैव।
निर्माणों से ध्वंसों को दें
मिलकर मात सदैव।
भूखे को दें पहले, फिर हम
खाएँ रोटी-भात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
साक्षी समय न हमने मानी
आतंकों से हार।
जैसे को तैसा लौटाएँ
सरहद पर इस बार।
नहीं बात कर बात मानता
जो खाए वह लात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
लोकतंत्र में लोभतंत्र क्यों
खुद से करें सवाल?
कोशिश कर उत्तर भी खोजें
दें न हँसी में टाल।
रात रहे कितनी भी काली
उसके बाद प्रभात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*****
२४-९-२०१६
गीत
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
नियम व्यवस्था का
पालन हम नहीं करें,
दोष गैर पर-
निज, दोषों का नहीं धरें।
खुद क्या बेहतर
कर सकते हैं, वही करें।
सोचें त्रुटियाँ कितनी
कहाँ सुधारी हैं?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
भाँग कुएँ में
घोल, हुए मदहोश सभी,
किसके मन में
किसके प्रति आक्रोश नहीं?
खोज-थके, हारे
पाया सन्तोष नहीं।
फ़र्ज़ भुला, हक़ चाहें
मति गई मारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
एक अँगुली जब
तुम को मैंने दिखलाई।
तीन अंगुलियाँ उठीं
आप पर, शरमाईं
मति न दोष खुद के देखे
थी भरमाई।
सोचें क्या-कब
हमने दशा सुधारी है?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
जैसा भी है
तन्त्र, हमारा अपना है।
यह भी सच है
बेमानी हर नपना है।
अँधा न्याय-प्रशासन,
सत्य न तकना है।
कद्र न उसकी
जिसमें कुछ खुद्दारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
कौन सुधारे किसको?
आप सुधर जाएँ।
देखें अपनी कमी,
न केवल दिखलायें।
स्वार्थ भुला,
सर्वार्थों की जय-जय गायें।
अपनी माटी
सारे जग से न्यारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभायी
हमने जिम्मेदारी है?
*
११-८-२०१६
***
गीत
कौन?
*
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
खुशियों की खेती अनसिंचित,
सिंचित खरपतवार व्यथाएँ।
*
खेत
कारखाने-कॉलोनी
बनकर, बिना मौत मरते हैं।
असुर हुए इंसान,
न दाना-पानी खा,
दौलत चरते हैं।
वन भेजी जाती सीताएँ,
मन्दिर पुजतीं शूर्पणखाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
गौरैयों की देखभाल कर
मिली बाज को जिम्मेदारी।
अय्यारी का पाठ रटाती,
पैठ मदरसों में बटमारी।
एसिड की शिकार राधाएँ
कंस जाँच आयोग बिठाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
रिद्धि-सिद्धि, हरि करें न शिक़वा,
लछमी पूजती है गणेश सँग।
'ऑनर किलिंग' कर रहे दद्दू
मूँछ ऐंठकर, जमा रहे रंग।
ठगते मोह-मान-मायाएँ
घर-घर कुरुक्षेत्र-गाथाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
हर कर्तव्य तुझे करना है,
हर अधिकार मुझे वरना है।
माँग भरो, हर माँग पूर्ण कर
वरना रपट मुझे करना है।
देह मात्र होतीं वनिताएँ
घर को होटल मात्र बनाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
दोष न देखें दल के अंदर,
और न गुण दिखते दल-बाहर।
तोड़ रहे कानून बना, सांसद,
संसद मंडी-जलसा घर।
बस में हो तो साँसों पर भी
सरकारें अब टैक्स लगाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
९-८-२०१६
गोरखपुर दंत चिकित्सालय जबलपुर
***
गीत
कौन हैं हम?
**
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
स्नेह सलिला नर्मदा हैं।
सत्य-रक्षक वर्मदा हैं।
कोई माने या न माने
श्वास सारी धर्मदा हैं।
जान या
मत जान लेकिन
मित्र है साहस-प्रभंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
सभ्यता के सिंधु हैं हम,
भले लघुतम बिंदु हैं हम।
गरल धारे कण्ठ में पर
शीश अमृत-बिंदु हैं हम।
अमरकंटक-
सतपुड़ा हम,
विंध्य हैं सह हर विखण्डन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
ब्रम्हपुत्रा की लहर हैं,
गंग-यमुना की भँवर हैं।
गोमती-सरयू-सरस्वति
अवध-ब्रज की रज-डगर हैं।
बेतवा, शिव-
नाथ, ताप्ती,
हमीं क्षिप्रा, शिव निरंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
तुंगभद्रा पतित पावन,
कृष्णा-कावेरी सुहावन।
सुनो साबरमती हैं हम,
सोन-कोसी-हिरन भावन।
व्यास-झेलम,
लूनी-सतलज
हमीं हैं गण्डक सुपावन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
मेघ बरसे भरी गागर,
करी खाली पहुँच सागर।
शारदा, चितवन किनारे-
नागरी लिखते सुनागर।
हमीं पेनर
चारु चंबल
घाटियाँ हम, शिखर- गिरिवन
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
१०-९-२०१६
***
नवगीत
*
सिया हरण को देख रहे हैं
आँखें फाड़ लोग अनगिन।
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
'गिरि गोपाद्रि' न नाम रहा क्यों?
'सुलेमान टापू' क्यों है?
'हरि पर्वत' का 'कोह महाजन'
नाम किया किसने क्यों है?
नाम 'अनंतनाग' को क्यों हम
अब 'इस्लामाबाद' कहें?
घर में घुस परदेसी मारें
हम ज़िल्लत सह आप दहें?
बजा रहे हैं बीन सपेरे
राजनीति नाचे तिक-धिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
हम सबका 'श्रीनगर' दुलारा
क्यों हो शहरे-ख़ास कहो?
'मुख्य चौक' को 'चौक मदीना'
कहने से सब दूर रहो
नाम 'उमा नगरी' है जिसका
क्यों हो 'शेखपुरा' वह अब?
'नदी किशन गंगा' को 'दरिया-
नीलम' कह मत करो जिबह
प्यार न जिनको है भारत से
पकड़ो-मारो अब गईं-गईं
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
पण्डित वापिस जाएँ बसाए
स्वर्ग बनें फिर से कश्मीर
दहशतगर्द नहीं बच पाएं
कायम कर दो नई नज़ीर
सेना को आज़ादी दे दो
आज नया इतिहास बने
बंगला देश जाए दोहराया
रावलपिंडी समर ठने
हँस बलूच-पख्तून संग
सिंधी आज़ाद रहें हर दिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
(कश्मीर में हिन्दू नामों को बदलकर योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम नाम रखे जानेके विरोध में)
***
गीत
*
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
देश दिनों से खड़ा हुआ है,
जो जैसा है अड़ा हुआ है,
किसे फ़िक्र जनहित का पेड़ा-
बसा रहा है, सड़ा हुआ है।
चचा-भतीजा ताल ठोंकते,
पिता-पुत्र ज्यों श्वान भौंकते,
कोई काट न ले तुझको भी-
इसीलिए
कहता हूँ-
रुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
वादे जुमले बन जाते हैं,
घपले सारे धुल जाते हैं,
लोकतंत्र के मूल्य स्वार्थ की-
दीमक खाती, घुन जाते हैं।
मौनी बाबा बोल रहे हैं
पप्पू जहँ-तहँ डोल रहे हैं
गाल बजाते जब-तब लालू
मत टकराना
बच जा झुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
एक आदमी एक न पाता,
दूजा लाख-करोड़ जुटाता,
मार रही मरते को दुनिया-
पिटता रोये, नहीं सुहाता।
हुई देर, अंधेर यहाँ है,
रही अनसुनी टेर यहाँ है,
शुद्ध दलाली, न्याय कहाँ है?
जलने से
पहले मत
बुझ जा।
नए साल!
आजा कतार में
***
नवगीत
समय वृक्ष है
*
समय वृक्ष है
सूखा पत्ता एक झरेगा
आँखें मूँदे.
नव पल्लव तब
एक उगेगा
आँखे खोले.
*
कहो अशुभ या
शुभ बोलो
कुछ फर्क नहीं है.
चिरजीवी होने का
कोई अर्क नहीं है.
कितने हुए?
होएँगे कितने?
कौन बताये?
किसका कितना वजन?
तराजू कोई न तोले.
ठोस दिख रहे
लेकिन हैं
भीतर से पोले.
नव पल्लव
किस तरह उगेगा
आँखें खोले?
*
वाम-अवाम
न एक साथ
मिल रह सकते हैं.
काम-अकाम
न एक साथ
खिल-दह सकते हैं.
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
ऊपर-नीचे
कर परिक्रमा
नव संकल्प
अमिय नित घोले.
श्रेष्ठ वही जो
श्रम-सीकर की
जय-जय बोले.
बिन प्रयास
किस तरह कर्मफल
आँखें खोले?
*
जाग,
छेड़ दे, राग नया
चुप से क्या हासिल?
आग
न बुझने देना
तू मत होना गाफिल.
आते-जाते रहें
साल-दर-साल
नए कुछ.
कौन जानता
समय-चक्र
दे हिम या शोले ?
नोट बंद हों या जारी
नव आशा बो ले.
उसे दिखेगी उषा
जाग जो
आँखें खोले
३१-१२-२०१६
***
गीत
साल निराला हो
*
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
सुख पीड़ा के आँसू पोंछे
हर्ष दर्द से गले मिले
जिनसे शिकवे रहे उम्र भर
उन्हें न तिल भर रहें गिले
मुखर हो सकें वही वैखरी
जिसके लब थे रहे सिले
जिनके पद तल
सत्ता उनके
उर में कंठी माला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
पग-ठोकर में रहे मित्रता
काँटा साझा साखी हो
शाख-गगन के बीच सेतु बन
भोर-साँझ नव पाखी हो
शासक और विपक्षी के कर
संसद में अब राखी हो
अबला सबला बने
अनय जब मिले
आँख में ज्वाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
मानक तोड़ पुराने नव रच
जो कह चुके, न वह कह कवि बच
बाँध न रचना को नियमों में
दिल की, मन की बातें कह सच
नचा समय को हँस छिन्गुली पर
रे सत्ता! जनमत सुन कर नच
समता-सुरा
पिलानेवाली
बाला हो, मधुशाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
***
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
***
लघु कथा -
आदमी जिंदा है
*
साहित्यिक आयोजन में वक्ता गण साहित्य की प्रासंगिकता पर चिंतन कम और चिंता अधिक व्यक्त कर रहे थे। अधिकांश चाहते थे कि सरकार साहित्यकारों को आर्थिक सहयोग दे क्योंकि साहित्य बिकता नहीं, उसका असर नहीं होता।
भोजन काल में मैं एक वरिष्ठ साहित्यकार से भेंट करने उनके निवास पर जा ही रहा था कि हरयाणा से पधारे अन्य साहित्यकार भी साथ हो लिये। राह में उन्हें आप बीती बताई- 'कई वर्ष पहले व्यापार में लगातार घाटे से परेशं होकर मैंने आत्महत्या का निर्णय लिया और रेल स्टेशन पहुँच गया, रेलगाड़ी एक घंटे विलंब से थी। मरता क्या न करता प्लेटफ़ॉर्म पर टहलने लगा। वहां गीताप्रेस गोरखपुर का पुस्तक विक्रय केंद्र खुला देख तो समय बिताने के लिये एक किताब खरीद कर पढ़ने लगा। किताब में एक दृष्टान्त को पढ़कर न जाने क्या हुआ, वापिस घर आ गया। फिर कोशिश की और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़कर आज सुखी हूँ। व्यापार बेटों को सौंप कर साहित्य रचता हूँ। शायद इसे पढ़कर कल कोई और मौत के दरवाजे से लौट सके। भोजन छोड़कर आपको आते देख रुक न सका, आप जिनसे मिलाने जा रहे हैं, उन्हीं की पुस्तक ने मुझे नवजीवन दिया।
साहित्यिक सत्र की चर्चा से हो रही खिन्नता यह सुनते ही दूर हो गयी। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? सत्य सामने था कि साहित्य का असर आज भी बरकरार है, इसीलिये आदमी जिंदा है।
***
नवगीत
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
३१-१२-२०१५
***
गीत
चलो हम सूरज उगायें
आचार्य संजीव 'सलिल'
चलो! हम सूरज उगायें...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगायें....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आयें...
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?,
किसी के मन भाएंगे क्या?
सोच यह जीवन जियें हम।
हाथ-हाथों से मिलायें...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवायें...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनायें...
***
नवगीत:
.
कुण्डी खटकी
उठ खोल द्वार
है नया साल
कर द्वारचार
.
छोडो खटिया
कोशिश बिटिया
थोड़ा तो खुद को
लो सँवार
.
श्रम साला
करता अगवानी
मुस्का चहरे पर
ला निखार
.
पग द्वय बाबुल
मंज़िल मैया
देते आशिष
पल-पल हजार
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पायेगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटायी
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पायेगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजायेगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
*
***
दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।
***
चित्रगुप्त वंदना:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हे चित्रगुप्त भगवान आपकी जय-जय
हे परमेश्वर मतिमान आपकी जय-जय
हे अक्षर अजर अमर अविनाशी अक्षय
हे अजित अमित गुणवान आपकी जय-जय
हे तमहर शुभकर विधि-हरि-हर के स्वामी
हे आत्मा-प्राण निधान आपकी जय-जय
हे चारु ललित शालीन सौम्य शुचि सुंदर
हे अविकारी संप्राण आपकी जय-जय
हे चिंतन मनन सृजन रचना वरदानी
हे सृजनधर्मिता-खान आपकी जय-जय
बेटे को कहती बाप बाप का दुनिया
विधि-पिता ब्रम्ह संतान आपकी जय-जय
विधि-हरि-हर को प्रगटाकर, विधि से प्रगटे
दिन संध्या निशा विहान आपकी जय-जय
सत-शिव-सुंदर सत-चित-आनंद हो देवा
श्री क्ली ह्री कीर्तिवितान आपकी जय-जय
तुम कारण-कार्य तुम्हीं परिणाम अनामी
हे शून्य सनातन गान आपकी जय-जय
सब कुछ तुमसे सब कुछ तुममें अविनाशी
हे कण-कण के भगवान आपकी जय-जय
हे काया-माया-छाया-पति परमेश्वर
हे सृष्टि-सृजन अभियान आपकी जय-जय
३१-१२-२०१४
***
नवगीत:
.
बहुत-बहुत आभार तुम्हारा
ओ जाते मेहमान!
.
पल-पल तुमने
साथ निभाया
कभी रुलाया
कभी हँसाया
फिसल गिरे, आ तुरत उठाया
पीठ ठोंक
उत्साह बढ़ाया
दूर किया हँस कष्ट हमारा
मुरझाते मेहमान
.
भूल न तुमको
पायेंगे हम
गीत तुम्हारे
गायेंगे हम
सच्ची बोलो कभी तुम्हें भी
याद तनिक क्या
आयेंगे हम?
याद मधुर बन, बनो सहारा
मुस्काते मेहमान
.
तुम समिधा हो
काल यज्ञ की
तुम ही थाती
हो भविष्य की
तुमसे लेकर सतत प्रेरणा
मन:स्थिति गढ़
हम हविष्य की
'सलिल' करेंगे नहीं किनारा
मनभाते मेहमान
३१-१२-२०१४
***
हाइकु गीत:
रूप अपना
*
रूप अपना / सराहती रही है / रूपसी आप
किसे बताये / प्रिय के नयनों में / गयी है व्याप...
*
है विधु लता / सी चंचल-चपल / अल्हड कौन
बोले अबोले / दे निशा निमंत्रण / प्रिय को मौन
नेह नर्मदा / ले रही हिलोरें ज्यों / मन्त्र का जाप...
*
कुसुम कली / किरण की कोर सी / है मुस्कुराई
आशा-आकांक्षा / मन में बसी पर / हाथ न आई
धर अधर / अधर में, अधर / अंकित छाप...
*
जीभ चिढ़ाये / नवोढ़ा सी लजाये / ठेंगा दिखाये
हरेक पल / समुद से सलिला / दूरी मिटाये
अरूणाभित / सिन्दूरी कपोलों को / छिपाये काँप...
*
अमराई में / कूकती कोकिला सी / देती आनंद
मठा-महेरी / पुरवैया-पछुआ / साँसों के छंद
समय देव ! / मनौती, नहीं देना / विरह शाप...
*
राग-रागिनी / सुर-सरगम सा / अटूट नाता
कभी न टूटे / हे सत्य नारायण! / भाग्य विधाता!!
हे नये वर्ष! / मिले अनंत हर्ष / रहें निष्पाप...
३१-१२-२०१३
***
व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
*
गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा रही थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आँच इज्जत पर न आएगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'
कहा कुतिया ने:'करें हड़ताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो बहिन तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
माँग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसां बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुँह लगाएँगे.
आदमी लुच्चा कमीना 'बचो' सब को बताएँगे..
***
नए वर्ष का गीत:
झाँक रही है...
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.
आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.
टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
***
नया वर्ष
हम नया वर्ष जरूर मनाएंगे
दामिनी के आंसुओं, चीखों और कराहों को
याद करने के लिए
और यह संकल्प करने के लिए
कि हम अपनी ज़िंदगी में
किसी नारी का अपमान नहीं करेंगे
अपने बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे
कि वह नारी को सिर्फ भोग्या न माने।
हम अपने शहर के हर थाने में
नारी का सम्मान करने और
तत्काल ऍफ़. आई. आर.दर्ज करने
सम्ब्नाधी पोस्टर चिपकाएँ।
सरकार से मांग करें कि
पुलिस विभाग को
अपराध-संख्या बढ़ने पर
दण्डित न किया जाए क्योंकि
संख्या घटने के लिए ही
अपराध दर्ज नहीं किये जाते।
हम एक दिन ही नहीं हर दिन
दामिनी वर्ष मनाएं।
नारी सम्मान की अलख जलाएं
३१-१२-२०१२
***
नव वर्ष पर नवगीत:
महाकाल के महाग्रंथ का
महाकाल के महाग्रंथ का
नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....
*
वह काटोगे,
जो बोया है.
वह पाओगे,
जो खोया है.
सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर
कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना
मूल्यांकन कर लो.
निज मन का
छायांकन कर लो.
तम-उजास को जोड़ सके जो
कहीं बनाया कोई पुल रहा?...
*
तुमने कितने
बाग़ लगाये?
श्रम-सीकर
कब-कहाँ बहाए?
स्नेह-सलिल कब सींचा?
बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...
*
स्नेह-साधना करी
'सलिल' कब.
दीन-हीन में
दिखे कभी रब?
चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर
खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...
*
खाली हाथ?
न रो-पछताओ.
कंकर से
शंकर बन जाओ.
ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.
देखोगे मन मलिन धुल रहा...
***
नये साल का गीत
*
कुछ ऐसा हो साल नया,
जैसा अब तक नहीं हुआ.
अमराई में मैना संग
झूमे-गाये फाग सुआ...
*
बम्बुलिया की छेड़े तान.
रात-रातभर जाग किसान.
कोई खेत न उजड़ा हो-
सूना मिले न कोई मचान.
प्यासा खुसरो रहे नहीं
गैल-गैल में मिले कुआ...
*
पनघट पर पैंजनी बजे,
बीर दिखे, भौजाई लजे.
चौपालों पर झाँझ बजा-
दास कबीरा राम भजे.
तजें सियासत राम-रहीम
देख न देखें कोई खुआ...
स्वर्ग करे भू का गुणगान.
मनुज देव से अधिक महान.
रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'
हो अपना यह हिंदुस्तान.
हर दिल हो रसखान रहे
हरेक हाथ में मालपुआ...
***
दोहा सलिला
सुबह बिना नागा उगे, सूर्य ढले हर शाम।
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम।।
*
अंतिम पल तक तिमिर से, दिया न माने हार।
'सलिल' न कोशिश तज कभी, करो हार जयहार।।
*
संयम तज मत बजाएँ, मीत कभी भी गाल।
बन संतोषी हो सुखी, उन्नत रखकर भाल।।
*
ढाई आखर सीखकर, वर अद्वैत तज द्वैत।
मैं-तुम मिल हम हो सकें, जब जब खेलें बैत।।
*
गए हार कर जीत हम, ऐसा हुआ कमाल।
गए जीत कर हार भी, अद्भुत है नव साल।।
३१-१२-२०१०

*** 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

दिसंबर ३०, नया साल, सॉनेट, रक्त समूह, पौधारोपण, ठंड, छंद, सोरठा, आल्हा, लघुकथा, गीत, अल्ज़ाइमर्स,

 सलिल सृजन दिसंबर ३०

*
पूर्णिका
बच्चे लाना फर्स्ट है, इसीलिए क्यों टेन्स।
बिन सिग्नल क्यों जा रहे, क्या तुम एंबुलेंस।।
नचा अँगुलियों पर रहे, नाच अकारण फेन्स।
कब तक बीबी की सुनें, पस्त हुआ पेशेन्स।।
पढ़े-लिखे मिलते बहुत, जिन्हें नहीं है ज्ञान।
देश चलाते वे नहीं, जिनमें कॉमन सेंस।।
जाना है जितना तुम्हें, उतनी हो अनजान।
कैसे जानूँ बढ़ रहा, लगातार सस्पेंस।।
इश्क वकीलन-जज करें, वादीगण हैरान।
यह करती है बहस वह, माँगे एवीडेंस।।
कारण कहा तलाक का, बीबी ने बिंदास।
झाड़ू-बेलन फेंकती, तब रहती एबसेन्स।।
बहुत डेवलप हम हुए, पानी पिएँ खरीद।
अब न नदी तालाब में, वाटर की प्रेजेंस।।
मुझको रहना मायके, यह रह ले ससुराल।
पति-पत्नी की माँग में, 'सलिल' नहीं डिफरेंस।।
३०.१२.२०१२४
०००
सोरठा
सूरज बादल ओट, नैन मटक्का कर रहा।
भाँप नियत में खोट, धूप धरा माँ-घर गई।।
.
लिया मेघ ने घेर, देख दामिनी अकेली।
क्रोधित छाती चीर, रणचंडी सम गरजती।।
.
गौरैया मन मार, कैद घोंसले में हुई।
करती अत्याचार, बेमौसम बरसात क्यों?
.
समरथ को नहिं दोष, जो जी चाहे वह करे।
जनगण-मन में रोष, देखे राह चुनाव की।।
.
रजनीगंधा शांत, अकड़ डहलिया ठठाता।
हो लज्जित उद्भ्रांत, वह गंधित; निर्गंध यह।।
.
निखर रहा है रूप, कली श्वेत-रतनार का।
गले मिले जब धूप, गप्प-पुराण न खत्म हो॥
.
करे शाख में छेद, ठक-ठक करती टिटहरी।
व्यर्थ बहाती स्वेद, खेद कर रही गिलहरी।।
३०.१२.२०२४
000
सॉनेट
समय
समय गीत गुनगुना रहा है,
सुनो समझ गा सुना खुश रहो,
स्नेह सलिल के सतत संग बहो,
झूम बजा झुनझुना रहा है।
समय खीझ अनमना रहा है,
क्या कहता सुन, तुम न कुछ कहो,
अनगिन सुधियाँ सुमिर कर तहो,
नहीं मित्रता भुना रहा है।
समय गजल अश'आर रुक पढ़ो,
मतलब समझो; मत लब सिलो,
समय सदय हो भला रहा है।
सपना समय नया कुछ गढ़ो,
भुज भर भेंटो; हँसकर मिलो,
सुनो कहाँ क्या कभी कहा है।
३०.१२.२०२३
•••
ग़ज़ल
गमे-दौरां जो सताए तो ग़ज़ल होती है।
इश्क आँसू में नहाए तो ग़ज़ल होती है।।
गुले-गुलशन को जुदा शाख से करके माली
बेच बाजार में आए तो ग़ज़ल होती है।।
दिखा के भोग बुतों को ये पुजारी खाएँ।
भक्त भूखों को भगाएँ तो ग़ज़ल होती है।।
करें वादे, मिले सत्ता तो कहें है जुमला।
ठेंगा जनता को दिखाएँ तो ग़ज़ल होती है।।
बिठा काँधे पे पिता सुत को दिखाए दुनिया।
जलाने पूत दे कंधा तो ग़ज़ल होती है
३०.१२.२०२३
•••
सॉनेट
अलविदा
*
अलविदा उसको जो जाना चाहता है, तुरत जाए।
काम दुनिया का किसी के बिन कभी रुकता नहीं है?
साथ देना चाहता जो वो कभी थकता नहीं है।।
रुके बेमन से नहीं, अहसान मत नाहक जताए।।
कौन किसका साथ देगा?, कौन कब मुँह मोड़ लेगा?
बिना जाने भी निरंतर कर्म करते जो न हारें।
काम कर निष्काम,खुद को लक्ष्य पर वे सदा वारें।।
काम अपना कर चुका, आगे नहीं वह काम देगा।।
व्यर्थ माया, मोह मत कर, राह अपनी तू चला चल।
कोशिशों के नयन में सपने सदृश गुप-चुप पला चल।
ऊगना यदि भोर में तो साँझ में हँसकर ढला चल।
आज से कर बात, था क्या कल?, रहेगा क्या कहो कल?
कर्म जैसा जो करेगा, मिले वैसा ही उसे फल।।
मुश्किलों की छातियों पर मूँग तू बिन रुक सतत दल।।
३०-१२-२०२१
***
सॉनेट
ठंड
*
ठंड ठिठुरती गर्म सियासत।
स्वार्थ-सिद्धि ही बनी रवायत।
ईश्वर की है बहुत इनायत।।
दंड न देता सुने शिकायत।।
पाँच साल को सत्ता पाकर।
ऐंठ रहे नफरत फैलाकर।
आपन मूँ अपना गुण गाकर।।
साधु असाधु कर्म अपनाकर।।
जला झोपड़ी आग तापते।
मुश्किल से डर दूर भागते।
सच सूली पर नित्य टाँगते।।
झूठ बोलकर वोट माँगते।।
मत मतदान कभी करना बिक।
सदा योग्य पर ही रहना टिक।।
३०-१२-२०२१
***
लघुकथा:
ठण्ड
*
बाप रे! ठण्ड तो हाड़ गलाए दे रही है। सूर्य देवता दिए की तरह दिख रहे हैं। कोहरा, बूँदाबाँदी, और बरछी की तरह चुभती ठंडी हवा, उस पर कोढ़ में खाज यह कि कार्यालय जाना भी जरूरी और काम निबटाकर लौटते-लौटते अब साँझ ढल कर रात हो चली है। सोचते हुए उसने मेट्रो से निकलकर घर की ओर कदम बढ़ाए। हवा का एक झोंका गरम कपड़ों को चीरकर झुरझुरी की अनुभूति करा गया।
तभी चलभाष की घंटी बजी, भुनभुनाते हुए उसने देखा, किसी अजनबी का क्रमांक दिखा। 'कम्बख्त न दिन देखते हैं न रात, फोन लगा लेते हैं' मन ही मन में सोचते हुए उसने अनिच्छा से सुनना आरंभ किया- "आप फलाने बोल रहे हैं?" उधर से पूछा गया।
'मेरा नंबर लगाया है तो मैं ही बोलूँगा न, आप कौन हैं?, क्या काम है?' बिना कुछ सोचे बोल गया। फिर आवाज पर ध्यान गया यह तो किसी महिला का स्वर है। अब कडुवा बोल जाना ख़राब लग रहा था पर तोप का गोला और मुँह का बोला वापिस तो लिया नहीं जा सकता।
"अभी मुखपोथी में आपकी लघुकथा पढ़ी, बहुत अच्छी लगी, उसमें आपका संपर्क मिला तो मन नहीं माना, आपको बधाई देना थी। आम तौर पर लघुकथाओं में नकली व्यथा-कथाएँ होती हैं पर आपकी लघुकथा विसंगति इंगित करने के साथ समन्वय और समाधान का संकेत भी करती है। यही उसे सार्थक बनाता है। शायद आपको असुविधा में डाल दिया... मुझे खेद है।"
'अरे नहीं नहीं, आपका स्वागत है.... ' दाएँ-बाएँ देखते हुए उसने सड़क पार कर गली की ओर कदम बढ़ाए। अब उसे नहीं चुभ रही थी ठण्ड।
***
एक कुण्डलिया : दो कवि
तन को सहलाने लगी, मदमाती सी धूप
सरदी हंटर मारती, हवा फटकती सूप -शशि पुरवार
हवा फटकती सूप, टपकती नाक सर्द हो
हँसती ऊषा कहे, मर्द को नहीं दर्द हो
छोड़ रजाई बँधा, रहा है हिम्मत मन को
लगे चंद्र सा, सूर्य निहारे जब निज तन को - संजीव
***
बैठे-ठाले
रक्तसमूह और आप
ए + = अच्छे नायक, नेता
ए - = परिश्रमी
बी + = त्याग
बी - = स्वार्थी, स्वकेन्द्रित, अड़ियल
ओ + = परोपकारी, मददगार
ओ - = संकीर्ण दृष्टि
एबी + = जटिल, कठिन
एबी - = मेधावी
३०-१२-२०२१
***
छंद क्या है?
*
छंद क्या है?
छंद रस है,
रस बिना नीरस न होना
निराशा में पथ न खोना
चीरकर तम, कर उजाला
जागरण का गान होना
*
छंद क्या है?
छंद लय है
प्राणप्रद गंधित मलय है
सत्य में शिव का विलय है
सत्य सुंदर तभी शिव है
असुंदर के हित प्रलय है
*
छंद क्या है?
छंद ध्वनि है
नाद अनहद सृष्टि रचता
वीतरागी सतत भजता
डूब रागी गा-बजाता
शब्द सार्थक हो हुलसता
*
छंद क्या है?
छंद जग है
कथ्य कहता हुआ पग है
खुशी वरता हुआ डग है
कभी कलकल; कभी कलरव
दर्द पर विजयी सुमग है
*
छंद क्या है?
छंद जय है
सर्वहित की बात बोले
स्वार्थ विष किंचित् न घोले
अमिय औरों को पिलाए
नीलकंठी अभय डोले
*
छंद रस है
छंद लय है
छंद ध्वनि है
छंद जग है
छंद जय है
२९-१२-२०१९
***
सामयिक आल्हा
*
मचा महाभारत भारत में, जन-गण देखें ताली पीट
दहशत में हैं सारे नेता, कैसे बचे पुरानी सीट?
हुई नोटबंदी, पैरों के नीचे, रही न हाय जमीन
कौन बचाए इस मोदी से?, नींद निठुर ने ली है छीन
पल भर चैन न लेता है खुद, दुनिया भर में करता धूम
कहे 'भाइयों-बहनों' जब भी, तभी सफलता लेता चूम
कहाँ गए वे मौनी बाबा?, घपलों-घोटालों का राज
मनमानी कर जोड़ी दौलत, घूस बटोरी तजकर लाज
हाय-हाय हैं कैसे दुर्दिन?, छापा पड़ता सुबहो-शाम
चाल न कोई काम आ रही, जब्त हुआ सब धन बेदाम
जन-धन खातों में डाला था, रूपया- पीट रहे अब माथ
स्वर्ण ख़रीदा जाँच हो रही, बैठ रहा दिल खाली हाथ
पत्थर फेंक करेगा दंगा, कौन बिना धन? पिट रइ गोट
नकली नोट न रहे काम के, रोज पड़े चोटों पर चोट
ताले तोड़ आयकरवाले, खाते-बही कर रहे जब्त
कर चोरी की पोल खोलते, रिश्वत लेंय न कैसी खब्त?
बेनामी संपत्ति बची थी, उस पर ली है नजर जमाय
हाय! राम जी-भोले बाबा, हनुमत कहूँ न राह दिखाय
छोटे नोट दबाये हमीं ने, जनता को है बेहद कष्ट
चूं न कर रहा फिर भी कोई, समय हो रहा चाहे नष्ट
लगे कतारों में हैं फिर भी, कहते नीति यही है ठीक
शायर सिंह सपूत वही जो, तजे पुरानी गढ़ नव लीक
पटा लिया कुछ अख़बारों को, चैनल भरमाते हैं खूब
दोष न माने फिर भी जनता, लुटिया रही पाप की डूब
चचा-भतीजे आपस में भिड़, मोदी को करते मजबूत
बंद बोलती माया की भी, ममता को है कष्ट अकूत
पाला बदल नितिश ने मारा, दाँव न लालू जाने काट
बोल थके है राहुल भैया, खड़ी हुई मैया की खाट
जो मैनेजर ललचाये थे, उन पर भी गिरती है गाज
फारुख अब्दुल्ला बौराया, कमुनिस्टों का बिगड़ा काज
भूमि-भवन के भाव गिर रहे, धरे हाथ पर हाथ सुनार
सेठ अफसरों नेताओं के ठाठ, न बाकी- फँसे दलाल
रो-रो सूख रहे हैं आँसू, पिचक गए हैं फूले गाल
जनता जय-जयकार कर रही, मोदी लिखे नाता इतिहास
मन मसोस दिन-रात रो रहे, घूसखोर सब पाकर त्रास
३०-१२-२०१६
***
नव वर्ष गीत :
*
सोलह साला
सदी हुई यह
*
सपनीली आँखों में आँसू
छेड़ें-रेपें हरदिन धाँसू
बहू कोशिशी झुलस-जल रही
बाधा दियासलाई सासू
कैरोसीन ननदिया की जय
माँग-दाँव पर
लगी हुई सह
सोलह साला
सदी हुई यह
*
मालिक फटेहाल बेचारा
नौकर का है वारा-न्यारा
जीना ही दुश्वार हुआ है
विधि ने अपनों को ही मारा
नैतिकता का पल-पल है क्षय
भाँग चाशनी
पगी हुई कह
सोलह साला
सदी हुई यह
*
रीत पुरातन ज्यों की त्यों है
मत पूछो कैसी है?, क्यों है?
कहीं बोलता है सन्नाटा
कहीं चुप्प बैठी चिल्ल-पों है
अंधियारे की दिवाली में
ज्योति-कालिमा
सगी हुई ढह
सोलह साला
सदी हुई यह
***
नवगीत
*
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
वही रफ़्तार बेढंगी
जो पहले थी, सो अब भी है
दिशा बदले न गति बदले
निकट हो लक्ष्य फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हरेक चेहरा है दोरंगी
न मेहनत है, न निष्ठा है
कहें कुछ और कर कुछ और
अमिय हो फिर गरल कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हुई सद्भाव की तंगी
छुरी बाजू में मुख में राम
धुआँ-हल्ला दसों दिश है
कहीं हो अमन फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
३०-१२-२०१५
***
संस्मरण
।। पुरस्कार यदि काट न खाय तो ।।
‘'सम्भवतः पहली कहानी लिखकर दुलारेलाल भार्गव को लखनऊ भेजी। ‘सुधा’ उन्होंने तब निकाली ही थी, एक दिन मुझे उनका पोस्टकार्ड मिला। लिखा था - आपको यदि नागवार न गुजरे तो हम कहानी का पुरस्कार आपको देना चाहते हैं। पाठक मेरी खुशी का अनुमान न लगा सकेंगे। यह एक ऐसी आमदनी का सीधा रास्ता खुल रहा था, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अब तक तो मैं इसी में खुश था कि मेरी रचनाएं छप रही हैं। तब तक मैं ‘प्रताप’ कानपुर में ही लेख भेजता था, पर उसने कभी एक धेला भी पारिश्रमिक नहीं दिया था।
अतः मैंने कार्ड का तुरन्त उत्तर दिया कि- ‘पुरस्कार यदि काट न खाय तो मुझे किसी हालत में उसका भेजा जाना नागवार न गुजरेगा।’ कुछ दिन बाद ही ५ रूपये का मनीआर्डर मिला। उस दिन मैंने सपत्नीक जश्न मनाया और कई दिन तक उन पांच रूपयों का हम लोगों को नशा-सा रहा।’'
- आचार्य चतुरसेन शास्त्री
***
अल्ज़ाइमर्स की दवा का अमरीकी पेटेंट बीएचयू को
मनीष कुमार मिश्रा
बीएचयू अल्ज़ाइमर्स पेटेंट
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को अल्ज़ाइमर की दवा बनाने का अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है.
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद विभाग को यह अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है.
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टॉपिकभारत
अल्ज़ाइमर्स बुढ़ापे में होने वाली बीमारी. इसमें यादाश्त चली जाती है. उम्र बढ़ने के साथ ही इसका दुष्प्रभाव भी बढ़ता जाता है.
आयुर्वेद विभाग के प्रमुख डॉ गोविंद प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से औषधीय गुणों वाले पौधौं से दवा बनाने का काम किया जाता रहा है.
इन्हीं परंपरागत औषधियों को आधार बनाकर विभाग ने ब्राह्मी कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक नाम से अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे को कम करने वाली दवाएं विकसित की गई हैं.
डॉ गोविंद के अनुसार इन तीनों दवाओं का अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की स्टैंडर्ड लैबोरेट्री में परीक्षण कर इन्हें प्रमाणित किया गया है.
ब्राम्ही कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक आयुर्वेदिक दवाओं का अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी (एफ़डीए) द्वारा मान्य प्रयोगशाला में परीक्षण भी किया गया.
बिज़नेस प्लानबीएचयू अल्ज़ाइमर्स पेटेंट
बीएचयू की दवाइयों का जापान और ऑस्ट्रेलिया की लैब में भी परीक्षण किया गया.
डॉ गोविंद ने बताया कि इन दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए चार संस्थानों को अधिकृत किया गया है. ये हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), एसआरएम यूनिवर्सिटी, आदेश यूनिवर्सिटी- भटिंडा और जिनोम फ़ाउंडेशन- हैदराबाद.
इन चार संस्थानों ने चेन्नई के अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड के साथ इन तीनों दवाओं की ग्लोबल मार्केटिंग के लिए समझौता किया है.
अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी से अनुमति, प्रमाणन और प्रायोजन के साथ सभी ख़र्च वहन करने के लिए सहमत हो गई है.
अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड बीएचयू और अन्य सहयोगी संगठनों में दवा के निर्माण के लिए धन उपलब्ध करवाएगी.
इसके संबंध में फ़ैसला बीएचयू के वाइस चांसलर पद्मश्री लालजी सिंह की अध्यक्षता में हुई बिज़नेस सेल की मीटिंग में लिया गया.
डॉ गोविंद कहते हैं कि ये दवाएं अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे के असर को कम करने के अलावा अवसाद, अनिद्रा और स्मरण शक्ति के कमज़ोर होने पर प्रयोग में लाई जा सकती है.
वो दावा करते हैं कि इन दवाओं के प्रयोग का शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा.
डॉ गोविंद कहते हैं कि इन दवाओं के बाज़ार में आ जाने से इन बीमारियों के मरीज़ों और उनके परिजनों को काफ़ी राहत मिलेगी.
आभार शीला मदान (गुड्डो दादी)
२९-१२-२०१३
***
दोहा सलिला:
पौधारोपण कीजिए
*
पौधारोपण कीजिए, शुद्ध हो सके वायु
जीवन जियें निरोग सब, मानव हो दीर्घायु
*
एक-एक ग्यारह हुए, विहँसे बारह मास
तेरह पग चलकर हरें, 'सलिल' सभी संत्रास
*
मैं-तुम मिल जब हम हुए, मंज़िल मिली समीप
हों अनेक जब एक तो, तम हरते बन दीप
*
चेतन जब चैतन्य हो, तब होता संजीव
अंतर्मन शतदल सदृश, खिल होता राजीव
*
विजय-पराजय से रहे, जब अंतर्मन दूर
प्रभु-कीर्तन पल-पल करे, श्वासों का संतूर
*
जब तक रीतेगा नहीं, आकांक्षा का कोष
जब तक पायेगा नहीं, अंतर्मन संतोष
*
नित लाती है रवि-किरण, दिनकर का पैगाम
लाली आती उषा के, गालों पर सुन नाम
*
आशीषों की रोटरी, कोशिश की हो राह
वाह परिश्रम की करें, मन में पले न डाह
*
अंकुर पल्लव पौध ही, बढ़ बनते उद्यान
संरक्षण पा ओषजन, से दें जीवन दान
३०-१२-२०१३
***
लेख - चित्रगुप्त रहस्य
चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं
परात्पर परमब्रम्ह श्री चित्रगुप्त जी सकल सृष्टि के कर्मदेवता हैं, केवल कायस्थों के नहीं। उनके अतिरिक्त किसी अन्य कर्ण देवता का उल्लेख किसी भी धर्म में नहीं है, न ही कोई धर्म उनके कर्म देव होने पर आपत्ति करता है। अतः, निस्संदेह उनकी सत्ता सकल सृष्टि के समस्त जड़-चेतनों तक है। पुराणकार कहता है:
''चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानाम सर्व देहिनाम.''
अर्थात श्री चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं जो आत्मा के रूप में सर्व देहधारियों में स्थित हैं. आत्मा क्या है? सभी जानते और मानते हैं कि 'आत्मा सो परमात्मा' अर्थात परमात्मा का अंश ही आत्मा है। स्पष्ट है कि श्री चित्रगुप्त जी ही आत्मा के रूप में समस्त सृष्टि के कण-कण में विराजमान हैं। इसलिए वे सबके लिए पूज्य हैं सिर्फ कायस्थों के लिए नहीं।
चित्रगुप्त निर्गुण परमात्मा हैं
सभी जानते हैं कि आत्मा निराकार है। आकार के बिना चित्र नहीं बनाया जा सकता। चित्र न होने को चित्र गुप्त होना कहा जाना पूरी तरह सही है। आत्मा ही नहीं आत्मा का मूल परमात्मा भी मूलतः निराकार है इसलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा जाना स्वाभाविक है। निराकार परमात्मा अनादि (आरंभहीन) तथा (अंतहीन) तथा निर्गुण (राग, द्वेष आदि से परे) हैं।
चित्रगुप्त पूर्ण हैं
अनादि-अनंत वही हो सकता है जो पूर्ण हो। अपूर्णता का लक्षण आराम तथा अंत से युक्त होना है। पूर्ण वह है जिसका क्षय (ह्रास या घटाव) नहीं होता। पूर्ण में से पूर्ण को निकल देने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है, पूर्ण में पूर्ण मिला देने पर भी पूर्ण ही रहता है। इसे 'ॐ' से व्यक्त किया जाता है। इसी का पूजन कायस्थ जन करते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
*
पूर्ण है यह, पूर्ण है वह, पूर्ण कण-कण सृष्टि सब
पूर्ण में पूर्ण को यदि दें निकाल, पूर्ण तब भी शेष रहता है सदा।
चित्रगुप्त निर्गुण तथा सगुण हैं
चित्रगुप्त निराकार ही नहीं निर्गुण भी है। वे अजर, अमर, अक्षय, अनादि तथा अनंत हैं। परमेश्वर के इस स्वरूप की अनुभूति सिद्ध ही कर सकते हैं इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिए वे साकार-सगुण रूप में प्रगट होते हैं। आरम्भ में वैदिक काल में ईश्वर को निराकार और निर्गुण मानकर उनकी उपस्थिति हवा, अग्नि (सूर्य), धरती, आकाश तथा पानी में अनुभूत की गयी क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं है। इन पञ्च तत्वों को जीवन का उद्गम और अंत कहा गया। काया की उत्पत्ति पञ्चतत्वों से होना और मृत्यु पश्चात् आत्मा का परमात्मा में तथा काया का पञ्च तत्वों में विलीन होने का सत्य सभी मानते हैं।
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय देह।
परमात्मा का अंश है, आत्मा निस्संदेह।।
*
परमब्रम्ह के अंश कर, कर्म भोग परिणाम
जा मिलते परमात्म से, अगर कर्म निष्काम।।
कर्म ही वर्ण का आधार
श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं: 'चातुर्वर्ण्यमयासृष्टं गुणकर्म विभागशः' अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा ही बनाये गये हैं। स्पष्ट है कि वर्ण जन्म पर आधारित नहीं हो था। वह कर्म पर आधारित था। कर्म जन्म के बाद ही किया जा सकता है, पहले नहीं। अतः, किसी जातक या व्यक्ति में बुद्धि, शक्ति, व्यवसाय या सेवा वृत्ति की प्रधानता तथा योग्यता के आधार पर ही उसे क्रमशः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग में रखा जा सकता था। एक पिता की चार संतानें चार वर्णों में हो सकती थीं। मूलतः कोई वर्ण किसी अन्य वर्ण से हीन या अछूत नहीं था। सभी वर्ण समान सम्मान, अवसरों तथा रोटी-बेटी सम्बन्ध के लिए मान्य थे। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक अथवा शैक्षणिक स्तर पर कोई भेदभाव मान्य नहीं था। कालांतर में यह स्थिति पूरी तरह बदल कर वर्ण को जन्म पर आधारित मान लिया गया।
चित्रगुप्त पूजन क्यों और कैसे?
श्री चित्रगुप्त का पूजन कायस्थों में प्रतिदिन विशेषकर यम द्वितीया को किया जाता है। कायस्थ उदार प्रवृत्ति के सनातन धर्मी हैं। उनकी विशेषता सत्य की खोज करना है इसलिए सत्य की तलाश में वे हर धर्म और पंथ में मिल जाते हैं। कायस्थ यह जानता और मानता है कि परमात्मा निराकार-निर्गुण है इसलिए उसका कोई चित्र या मूर्ति नहीं है, उसका चित्र गुप्त है। वन हर चित्त में गुप्त है अर्थात हर देहधारी में उसका अंश होने पर भी वह अदृश्य है। जिस तरह कहने की थाली में पानी न होने पर भी हर खाद्यान्न में पानी होता है उसी तरह समस्त देहधारियों में चित्रगुप्त अपने अंश आत्मा रूप में विराजमान होते हैं। चित्रगुप्त ही सकल सृष्टि के मूल तथा निर्माणकर्ता हैं। सृष्टि में ब्रम्हांड के निर्माण, पालन तथा विनाश हेतु उनके अंश ब्रम्हा-महासरस्वती, विष्णु-महालक्ष्मी तथा शिव-महाशक्ति के रूप में सक्रिय होते हैं। सर्वाधिक चेतन जीव मनुष्य की आत्मा परमात्मा का ही अंश है।मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य परमात्मा की प्राप्ति कर उसमें विलीन हो जाना है। अपनी इस चितन धारा के अनुरूप ही कायस्थजन यम द्वितीय पर चित्रगुप्त पूजन करते हैं।
सृष्टि निर्माण और विकास का रहस्य:
आध्यात्म के अनुसार सृष्टिकर्ता की उपस्थिति अनहद नाद से जानी जाती है। यह अनहद नाद सिद्ध योगियों के कानों में परतो पल भँवरे की गुनगुन की तरह गूँजता हुआ कहा जाता है। इसे 'ॐ' से अभिव्यक्त किया जाता है। विज्ञान सम्मत बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड का निर्माण एक विशाल विस्फोट से हुआ जिसका मूल यही अनहद नाद है। इससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें संघनित होकर कण तथा क्रमश: शेष ब्रम्हांड बना। यम द्वितीय पर कायस्थ एक कोरा सफ़ेद कागज़ लेकर उस पर चन्दन, हल्दी, रोली, केसर के तरल 'ॐ' अंकित करते हैं। यह अंतरिक्ष में परमात्मा चित्रगुप्त की उपस्थिति दर्शाता है। 'ॐ' परमात्मा का निराकार रूप है। निराकार के साकार होने की क्रिया को इंगित करने के लिए 'ॐ' को श्रृष्टि की सर्वश्रेष्ठ काया मानव का रूप देने के लिए उसमें हाथ, पैर, नेत्र आदि बनाये जाते हैं। तत्पश्चात ज्ञान की प्रतीक शिखा मस्तक से जोड़ी जाती है। शिखा का मुक्त छोर ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की ओर उठा) रखा जाता है जिसका आशय यह है कि हमें ज्ञान प्राप्त कर परमात्मा में विलीन (मुक्त) होना है।
बहुदेव वाद की परंपरा
इसके नीचे कुछ श्री के साथ देवी-देवताओं के नाम लिखे जाते हैं, फिर दो पंक्तियों में 9 अंक इस प्रकार लिखे जाते हैं कि उनका योग 9 बार 9 आये। परिवार के सभी सदस्य अपने हस्ताक्षर करते हैं और इस कागज़ के साथ कलम रखकर उसका पूजन कर दण्डवत प्रणाम करते हैं। पूजन के पश्चात् उस दिन कलम नहीं उठाई जाती। इस पूजन विधि का अर्थ समझें। प्रथम चरण में निराकार निर्गुण परमब्रम्ह चित्रगुप्त के साकार होकर सृष्टि निर्माण करने के सत्य को अभिव्यक्त करने के पश्चात् दूसरे चरण में निराकार प्रभु के साकार होकर सृष्टि के कल्याण के लिए विविध देवी-देवताओं का रूप धारण कर जीव मात्र का ज्ञान के माध्यम से कल्याण करने के प्रति आभार विविध देवी-देवताओं के नाम लिखकर व्यक्त किया जाता है। ज्ञान का शुद्धतम रूप गणित है। सृष्टि में जन्म-मरण के आवागमन का परिणाम मुक्ति के रूप में मिले तो और क्या चाहिए? यह भाव दो पंक्तियों में आठ-आठ अंक इस प्रकार लिखकर अभिव्यक्त किया जाता है कि योगफल नौ बार नौ आये।
पूर्णता प्राप्ति का उद्देश्य
निर्गुण निराकार प्रभु चित्रगुप्त द्वारा अनहद नाद से साकार सृष्टि के निर्माण, पालन तथा नाश हेतु देव-देवी त्रयी तथा ज्ञान प्रदाय हेतु अन्य देवियों-देवताओं की उत्पत्ति, ज्ञान प्राप्त कर पूर्णता पाने की कामना तथा मुक्त होकर पुनः परमात्मा में विलीन होने का समुच गूढ़ जीवन दर्शन यम द्वितीया को परम्परगत रूप से किये जाते चित्रगुप्त पूजन में
अन्तर्निहित है। इससे बड़ा सत्य कलम व्यक्त नहीं कर सकती तथा इस सत्य की अभिव्यक्ति कर कलम भी पूज्य हो जाती है इसलिए कलम की पूजा की जाती है। इस गूढ़ धार्मिक तथा वैज्ञानिक रहस्य को जानने तथा मानने के प्रमाण स्वरूप परिवार के सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियां अपने हस्ताक्षर करते हैं, जो बच्चे लिख नहीं पाते उनके अंगूठे का निशान लगाया जाता है। उस दिन व्यवसायिक कार्य न कर आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहने की परम्परा है।
'ॐ' की ही अभिव्यक्ति अल्लाह और ईसा में भी होती है। सिख पंथ इसी 'ॐ' की रक्षा हेतु स्थापित किया गया। 'ॐ' की अग्नि आर्य समाज और पारसियों द्वारा पूजित है। सूर्य पूजन का विधान 'ॐ' की ऊर्जा से ही प्रचलित हुआ है।
उदारता तथा समरसता की विरासत
यम द्वितीया पर चित्रगुप्त पूजन की आध्यात्मिक-वैज्ञानिक पूजन विधि ने कायस्थों को एक अभिनव संस्कृति से संपन्न किया है। सभी देवताओं की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से होने का सत्य ज्ञात होने के कारण कायस्थ किसी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय से द्वेष नहीं करते। वे सभी देवताओं, महापुरुषों के प्रति आदर भाव रखते हैं। वे धार्मिक कर्म कांड पर ज्ञान प्राप्ति को वरीयता देते हैं। चित्रगुप्त जी के कर्म विधान के प्रति विश्वास के कारण कायस्थ अपने देश, समाज और कर्त्तव्य के प्रति समर्पित होते हैं। मानव सभ्यता में कायस्थों का योगदान अप्रतिम है। कायस्थ ब्रम्ह के निर्गुण-सगुण दोनों रूपों की उपासना करते हैं। कायस्थ परिवारों में शैव, वैष्णव, गाणपत्य, शाक्त, राम, कृष्ण, सरस्वतीसभी का पूजन किया जाता है। आर्य समाज, साईं बाबा, युग निर्माण योजना आदि हर रचनात्मक मंच पर कायस्थ योगदान करते मिलते हैं।
***
बिदाई गीत:
अलविदा दो हजार दस...
*
अलविदा दो हजार दस
स्थितियों पर
कभी चला बस
कभी हुए बेबस.
अलविदा दो हजार दस...
तंत्र ने लोक को कुचल
लोभ को आराधा.
गण पर गन का
आतंक रहा अबाधा.
सियासत ने सिर्फ
स्वार्थ को साधा.
होकर भी आउट न हुआ
भ्रष्टाचार पगबाधा.
बहुत कस लिया
अब और न कस.
अलविदा दो हजार दस...
लगता ही नहीं, यही है
वीर शहीदों और
सत्याग्रहियों की नसल.
आम्र के बीज से
बबूल की फसल.
मंहगाई-चीटी ने दिया
आवश्यकता-हाथी को मसल.
आतंकी-तिनका रहा है
सुरक्षा-पर्वत को कुचल.
कितना धँसेगा?
अब और न धँस.
अलविदा दो हजार दस...
३०-१२-२०१०
***

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

२७ दिसंबर, सॉनेट, उपनिषद, समीक्षा, नवगीत, ब्रह्मजीत गौतम, श्रुति कुशवाहा, छंद-बह्र


सलिल सृजन २७ दिसंबर
कार्यशाला-
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुं फ़ायलात मुफ़तइलुं फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१ ११११२ २१२१) हैं।
अ. यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
आ. यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय स्मृति छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है। हमने इसका नाम स्मृति (चौबीस स्मृतियाँ- मनु, विष्णु, अत्रि, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, आंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ, नारद, गौतम, जमदग्नि, विश्वामित्र,  गार्गेय) छंद रखा है। 
उदाहरण-
१. 
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२. 
 जब गवाह सच बोला, तब ही झूठा बयान 
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
खुद से खुद शर्मिंदा, तुला थाम नेत्रहीन- 
बोल उठा  भला हुआ, मैं न हुआ नेत्रवान 

उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१ २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ: ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
=============
सॉनेट
परीक्षा
मान परीक्षा हर अवसर को,
करें प्रयास आप जीवन भर,
बने भगीरथ जो जाता तर,
नहीं बैठिए थामे सर को।
रखिए दूर हमेशा डर को,
सुमिरें नित नटवर नटनागर,
भरी रहे भावों की गागर,
सदा भुनाएँ हर अवसर को।
डरकर जो न परीक्षा देता,
वह अवसर खोता सच मानो,
सोता उसका भाग्य मौन हो।
बनना है यदि तुम्हें विजेता,
हर बाधा जय करना ठानो,
भोजन में बन रहो नौन हो।
तक्षशिला महाविद्यालय
२७.१२.२०२३
•••
सॉनेट
उपनिषद
*
आत्मानंद नर्मदा देती, नाद अनाहद कलकल में।
धूप-छाँव सह अविचल रहती, ऊँच-नीच से रुके न बहती।
जान गई सच्चिदानंद है, जीवन की गति निश्छल में।।
जो बीता सो रीता, होनी हो, न आज चिंता तहती।।
आओ! बैठ समीप ध्यान कर गुरु से जान-पूछ लो सत्य।
जिज्ञासा कर, शंका मत कर, फलदायक विश्वास सदा।
श्रद्धा-पथिक ज्ञान पाता है, हटता जाता दूर असत्य।।
काम करो निष्काम भाव से, होनी हो, जो लिखा-बदा ।।
आत्म और परमात्म एक हैं, पूर्ण-अंश का नाता है।
उसको जानो, उस सम हो लो, सबमें झलक दिखे उसकी।
जिसको उसका द्वैत मिटे, अद्वैत एक्य बन जाता है।।
काम करो निष्काम भाव से, होगा वह जो गति जिसकी।।
करो उपनिषद चर्चा सब मिल, चित्त शांत हो, भ्रांति मिटे।
क्रांति तभी जब स्वार्थ छोड़, सर्वार्थ राह चल, शांति मिले।।
२७-१२-२०२१
***
दोहा सलिला
पानी का वादा किया, पूर दिए तालाब.
फ़ूल बनाया शूल दे, कहते दिए गुलाब.
*
कर देकर जनता मरे, शासन है बेफ़िक्र.
सेठों का हित सध सके, बस इतनी है फ़िक्र.
*
मेघा बरसे शिव विहँस, लें केशों में धार.
बहा नर्मदा नेह की, करें जगत उद्धार.
*
मोदी राहुल जप रहे, राहुल मोदी नाम
नूरा कुश्ती कर रहे, जाता ठगा अवाम
***
कृति चर्चा:
'कशमकश' मन में झाँकती कविताएँ
[कृति विवरण: कशमकश, कविता संग्रह, ISBN ९७८-९३-८५०१३-६५-२, श्रुति कुशवाहा, वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २५०/-, अंतिका प्रकाशन, सी ५६ / यूजीएफ़ ४, शालीमार बाग़, विस्तार २, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० २६४८२१२, ९८७१८५६०५३, antika56@gmailcom, कवयत्री संपर्क बी १०१ महानंदा ब्लोक, विराशा हाईटस, दानिश कुञ्ज पुल के समीप, कोलर मार्ग, भोपाल ४६२०४२, shrutyindia@gmail.com]
*
मूल्यों के संक्रमण और आधुनिक कविता के पराभव काल में जब अच्छे-अच्छे पुरोधा कविता का अखाड़ा और ग़ज़ल का मजमा छोड़कर दिनानुदिन अधिकाधिक लोकप्रिय होते नवगीत की पिचकारी थामे कबीरा गाने की होड़ कर रहे हैं, तब अपनी वैचारिक प्रबद्धता, आनुभूतिक मार्मिकता और अभिव्यक्तात्मक बाँकपन की तिपाई पर सामाजिक परिदृश्य का जायजा लेते हुए अपने भीतर झाँककर, बाहर घटते घटनाक्रम के प्रति आत्मीयता रखते हुए भी पूरी शक्ति से झकझोरने का उपक्रम करती कविता को जस- का तस हो जाने देने के दुस्साहस का नाम है 'श्रुति'। 'श्रुति' की यह नियति तब भी थी जब लिपि, लेखनी और कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था और अब भी है जब नित नए गैजेट्स सामने आकर कागज़ और पुस्तक के अस्तित्व के लिए संकट की घोषणा कर रहे हैं। 'श्रुति' जन-मन की अभिव्यक्ति है जो बिना किसी नकाब के जन के मन को जन के मन के सामने अनावृत्त करती है, निर्वसन नहीं। कायदों और परंपराओं के पक्षधर कितनी भी परदेदारी कर लें 'श्रुति' को साँसों का सच और आसों की पीड़ा जानने और कहने से रोक नहीं पाते। जब 'श्रुति' अबाध हो तो 'स्मृति' को अगाध होने से कौन रोक सकता है? जब कविता स्मृति में सुरक्षित हो तो वह समय का दस्तावेज हो जाती है।
'कशमकश' चेतनता, जीवंतता और स्वतंत्रता का लक्षण है। जड़ या मृत में 'कशमकश' कैसे हो सकती है? किसी पिछलग्गू में केवल अनुकरण भाव होता है। 'कशमकश' वैचारिक आन्दोलन का दूसरा नाम है। आंदोलित होती 'श्रुति' जन-गण के मन में घट रहे या जन-मन को घटा रहे घटनाक्रम के प्रति आक्रोशित हो, यह स्वाभाविक है। एक जन की पीड़ा दूसरा न सुने तो उस पर प्रतिक्रया और कुछ करने या न करने की कशमकश कैसे हो? इस रूप में 'श्रुति' ही 'कशमकश' को जन्म देती है। संयोगवश विवेच्य काव्य संग्रह 'कशमकश' की जननी का नाम भी 'श्रुति' है। यह 'श्रुति' सामान्य नहीं 'कुशवाहा' अर्थात कुश धारण करनेवाली है। कुश धारण किया जाता है 'संकल्प' के समय। जब किसी कृत्य को निष्पादित करने का निश्चय कर लिया, संसाधन जुटा लिए, कृत्य संपादित करने के लिए पुरोहित अर्थात मार्गदर्शक भी आ गया तो हाथ में कुश लेकर भूमि पर जल छोड़ते हुए संकल्प में सहायक होता है 'कुश'। जन-मन की 'कशमकश' को कविता रूपी 'कुश' के माध्यम से उद्घाटित ही नहीं यथासंभव उपचारित करने का संकल्प करती 'श्रुति' की यह कृति सिर्फ पठनीय नहीं चिंतनीय भी है।
'श्रुति' की सत्तर कविताओं का यह संकलन 'कशमकश' असाधारण है। असाधारण इस अर्थ में कि यह अपने समय की 'प्रवृत्तियों' का निषेध करते हुए भी 'निवृत्ति' का पथ प्रशस्त नहीं करता। समय की परख कर पाना हर रचनाकार के लिए आवश्यक है। श्रुति कहती है-
'जब बिकने लगता है धर्म
और घायल हो जाती है आस्था
चेहरे हो जाते हैं पत्थर
दिखने में आदमी जैसा
जब नहीं रह जाता आदमी
जब चरों ओर मंडराता है संकट
वही होता है
कविता लिखने का सबसे सही वक़्त'
श्रुति की कविताएँ इस बात की साक्षी हैं कि उसे समय की पहचान है। वह लिजलिजी भावनाओं में नहीं बहती। ज़िन्दगी शीर्षक कविता में कवयित्री का आत्म विश्वास पंक्ति-पंक्ति में झलकता है-
नहीं,
मेरी ज़िन्दगी
तुमसे शुरू होकर
तुमपर ख़त्म नहीं होती....
... हाँ
मेरी ज़िंदगी
मुझसे शरू होती है
और ख़त्म वहीं होगी
जहाँ मैं चाहूँगी ...
स्त्री विमर्श के नाम पर अपने पारिवारिक दायित्वों से पलायन कर कृत्रिम हाय-तोबा और नकली आंसुओं से लबालब कविता करने के स्थान पर कवयित्री संक्षेप में अपने अस्तित्व और अस्मिता को सर्वोच्च मानते हुए कहती है-
अब बस
आज मैं घोषित करती हूँ
तुम्हें
एक आम आदमी
गलतियों का पुतला
और खुद को
पत्नी परमेश्वर
ये कविताएँ हवाई कल्पना जगत से नहीं आईं है। इन्हें यथार्थ के ठोस धरातल पर रचा गया है। स्वयं कवयित्री के शब्दों में-
मेरी कविता का
कचरा बीनता बच्चा
बूट पोलिश करता लड़का
संघर्ष करती लड़की
हाशिए पर खड़े लोग
कोइ काल्पनिक पात्र नहीं
दरअसल
मेरे भीतर का आसमान है
आशावाद श्रुति की कविताओं में खून की तरह दौड़ता है-
सूरज उगेगा एक दिन
आदत की तरह नहीं
दस्तूर की तरह नहीं....
.... एक क्रांति की तरह
.... जिस दिन
वो सूरज उगेगा
तो फिर नहीं होगी कभी कोई रात
'वक्त कितना कठिन है साथी' शीर्षक कविता में स्त्रियों पर हो रहे दैहिक हमलों की पड़ताल करती कवयित्री लीक से हटकर सीधे मूल कारण तलाशती है। वह सीधे सीधे सवाल उठाती है- मैं कैसे प्रेम गीत गाऊँ?, मैं कैसे घर का सपना संजोऊँ?, मैं कैसे विश्वास की नव चढ़ूँ? उसकी नज़र सीधे मर्म पर पहुँचती है कि जो पुरुष अपने घर की महिलाओं की आबरू का रखवाला है, वही घर के बाहर की महिलाओं के लिए खतरा क्यों है? कैसी विडम्बना है?
मर्द जो भाई पति प्रेमी है
वो दूसरी लड़कियों के लिए
भेदिया साबित हो सकता है कभी भी....
'क्या तुम जानते हो' में दुनिया के चर्चित स्त्री-दुराचार प्रकरणों का उल्लेख कर घरवाले से प्रश्न करती है कि वह घरवाली को कितना जानता है?
बताओ क्या तुम जानते हो
सालों से घर के भीतर रहनेवाली
अपनी पत्नी के बारे में
जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद
हर सुबह उठती है तुमसे पहले
क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?
जो हर वक्त पकाती है तुम्हरी पसंद का खाना
क्या उसे भी वही पसंद है हमेशा से
जो बिस्तर बन जाती है तुम्हारी कामना पर
क्या वो हर बार तैयार होती है देह के खेल के लिए
श्रुति की कविताओं का वैशिष्ट्य तिलमिला देनेवाले सवाल शालीन-शिष्ट भाषा में किंतु दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पूछना है। वह न तो निरर्थक लाग-लपेट करते आवरण चढ़ाती है, न कुत्सित और अश्लील शब्दावली का प्रयोग करती है। राम-सीता प्रसंग में गागर में सागर की तरह चंद पंक्तियाँ 'कम शब्दों में अधिक कहने' की कला का अनुपम उअदाह्र्ण है-
सीता के लिए ही था ण
युद्ध
हे राम
फिर जीवित सीता को
क्यों कराया अग्नि-स्नान
श्रुति का आत्मविश्वास, अपने फैसले खुद करने का निश्चय और उनका भला या बुरा जो भी हो परिणाम स्वीकारने की तत्परता काबिले -तारीफ़ है। वह अन्धकार, से प्रेम करना, रावण को समझना तथा कुरूपता को पूजना चाहती है क्योंकि उन्होंने क्रमश: प्रकाश की महत्ता , सीता की दृढ़ता तथा सुन्दरता को उद्घाटित किया किंतु इन सबको भुला भी देना चाहती है कि प्रकाश, दृढ़ता और सुनदरता अधिक महत्वपूर्ण है। यह वैचारिक स्पष्टता और साफगोई इन कविताओं को पठनीय के साथ-साथ चिन्तनीय भी बनाती हैं।
'आशंका' इस संकलन की एक महत्वपूर्ण कविता है। यहाँ कवयित्री अपने पिटा के जन्मस्थान से जुड़ना चाहती है क्योंकि उसे यह आशंका है कि ऐसा ण करने पर कहीं उसके बच्चे भी उसके जन्म स्थान से जुड़ने से इंकार न कर दें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने और पालने वाले जीवन-मूल्यों और परंपराओं की जमीन पर रची गयी इस रचना का स्वर अन्य से भिन्न किंतु यथार्थपूर्ण है।
एक और मार्मिक कविता है 'पापा का गुस्सा'। पापा के गुस्से से डरनेवाली बच्ची का सोचना स्वाभाविक है कि पापा को गुस्सा क्यों आता है? बड़े होने पर उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है-
आज समझ पाई हूँ
उनके गुस्से का रहस्य
पापा दरअसल गुस्सा नहीं होते
दुखी होते हैं
जब वे डांटते
तो हमारे लिए ही नहीं
उनके लिए भी सजा होती
आत्मावलोकन और आत्मालोचन इन कविताओं में जहाँ-तहाँ अन्तर्निहित है। कवयित्री गुलाब को तोड़ कर गुल्दासे में सजती है पर खुद को चोट पहुँचाने वाले को क्षमा नहीं कर पाती, भूखे भिखारी को अनदेखा कर देती है, अशक्त वृद्ध को अपनी सीट नहीं देती, अभाव में मुस्कुरा नहीं पाती, सहज ही भूल नहीं स्वीकारती यह तो हम सब करते हैं पर हमसे भिन्न कवयित्री इसे कवि होने की अपात्रता मानती है-
नहीं, मैं कवि नहीं
मैं तो मात्र
रचयिता हूँ
कवि तो वह है
जो मेरी कविता को जीता है।
जिस कविता के शीर्षक से पुस्तक के नामकरण हुआ है, वह है 'कशमकश'। अजब विडम्बना है कि आदमी की पहचान उसके अस्तित्व, कार्यों या सुयश से नहीं दस्तावेजों से होती है-
मैंने
पेनकार्ड रखा
पासपोर्ट, आधार कार्ड
मतदाता प्रमाण पत्र
खुद से जुड़े तमाम दस्तावेज सहेजे
और निकल पडी
लेकिन यह क्या
खुद को रखना तो भूल होगी
मुड़कर देखा तो
दूर तक नज़र नहीं आई मैं
अजीब कशमकश है
खुद को तलाशने पीछे लौटूं
या खुद के बगैर आगे बढ़ जाऊँ...
ये कवितायेँ बाहर की विसंगतियों का आकलन कर भीतर झाँकती हैं। बाहर से उठे सवालों के हल भीतर तलाशती कविताओं की भाषा अकृत्रिम और जमीनी होना सोने में सुहागा है। ये कविताएं आपको पता नहीं रहने देती, आपके कथ्य का भोक्ता बना देती हैं, यही कवयित्री और उसकी कारयित्री प्रतिभा की सफलता है।
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सामयिक हास्य कविता:
राहुल जी का डब्बा गोल
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लम्बी_चौड़ी डींग हाँकतीं, मगर खुल गयी पल में पोल
मोदी जी का दाँव चल गया, राहुल जी का डब्बा गोल
मातम मना रहीं शीला जी, हुईं सोनिया जी बेचैन
मौका चूके केजरीवाल जी, लेकिन सिद्ध हुए ही मैन
हंग असेम्बली फिर चुनाव का, डंका जनता बजा रही
नेताओं को चैन न आये, अच्छी उनकी सजा रही
लोक तंत्र को लोभ तंत्र जो, बना रहे उनको मारो
अपराधी को टिकिट दे रहे, जो उनको भी फटकारो
गहलावत को वसुंधरा ने, दिन में तारे दिखा दिये
जय-जयकार रमन की होती, जोगी जी पिनपिना गये
खिला कमल शिवराज हँस रहे, पंजा चेहरा छिपा रहा
दिग्गी को रूमाल शीघ्र दो, छिपकर आँसू बहा रहा
मतदाता जागो अपराधी नेता, बनें तो मत मत दो
नोटा बटन दबाओ भैया, एक साथ मिल करवट लो
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पुस्तक चर्चा-
एक बहर पर एक ग़ज़ल - अभिनव सार्थक प्रयास
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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पुस्तक परिचय- एक बहर पर एक ग़ज़ल, ब्रम्हजीत गौतम, ISBN ९७८-८१-९२५६१३-७-०, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ १४४/-, मूल्य २००/-, शलभ प्रकाशन १९९ गंगा लेन, सेक्टर ५, वैशाली, गाजियाबाद २०१०१०, रचनाकार संपर्क- युक्कौ २०६ पैरामाउंट सिम्फनी, क्रोसिंग रिपब्लिक, गाज़ियाबाद २०१०१६, चलभाष- ९७६०००७८३८।
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'नाद' ही सृष्टि का मूल है। नाद की निरंतरता उसका वैशिष्ट्य है। नाद के आरोह और अवरोह लघु-गुरु के पर्याय हैं। नाद के साथ विविध ध्वनियाँ मिलकर अक्षर को और विविध अक्षर मिलकर शब्द को जन्म देते हैं। लघु-गुरु अक्षरों के विविध संयोग ही गण या रुक्न हैं जिनके अनेक संयोग लयों के रूप में सामने आते हैं। सरस लयों को काव्य शास्त्र छंद या बहर के रूप में वर्णित करता है। हिंदी पिंगल में छंद के मुख्य २ प्रकार मात्रिक (९२,२७,७६३) तथा वार्णिक (१३,४२,१७,६२६) हैं।१ यह संख्या गणितीय आधार पर गिनी गयी है। सामान्यत: २०-२५ प्रकार के छंद ही अधिक प्रयोग किये जाते हैं। उर्दू में बहरों के मुख्य २ प्रकार मुफरद या शुद्ध (७) तथा मुरक्कब या मिश्रित (१२) हैं।२ गजल छंद चेतना में ६० औज़ानों का ज़िक्र है।३ गजल ज्ञान में ६७ बहरों के उदाहरण हैं।४ ग़ज़ल सृजन के अनुसार डॉ. कुंदन अरावली द्वारा सं १९९१ में प्रकाशित उनकी पुस्तक इहितिसाबुल-अरूज़ में १३२ नई बहरें संकलित हैं।५ अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी में सालिम (पूर्णाक्षरी) बहरें १५ तथा ज़िहाफ (अपूर्णाक्षरी रुक्न) ६२ बताये गए हैं।६ गज़ल और गज़ल की तकनीक में ७ सालिम, २४ मुरक्कब बहरों के नमूने दिए गए हैं। ७. विवेच्य कृति में ६५ बहरों पर एक-एक ग़ज़ल कहीं गयी है तथा उससे सादृश्य रखने वाले हिंदी छंदों का उल्लेख किया गया है।
गौतम जी की यह पुस्तक अन्यों से भिन्न तथा अधिक उपयोगी इसलिए है कि यह नवोदित गजलकारों को ग़ज़ल के इतिहास और भूगोल में न उलझाकर सीधे-सीधे ग़ज़ल से मिलवाती है। बहरों का क्रम सरल से कठिन या रखा गया है। डॉ. गौतम हिंदी प्राध्यापक होने के नाते सीखनेवालों के मनोविज्ञान और सिखानेवालों कि मनोवृत्ति से बखूबी परिचित हैं। उन्होंने अपने पांडित्य प्रदर्शन के लिए विषय को जटिल नहीं बनाया अपितु सीखनेवालों के स्तर का ध्यान रखते हुए सरलता को अपनाया है। छंदशास्त्र के पंडित डॉ. गौतम ने हर बहर के साथ उसकी मात्राएँ तथा मूल हिंदी छंद का संकेत किया है। सामान्यत: गजलकार अपनी मनपसंद या सुविधाजनक बहर में ग़ज़ल कहते हैं किंतु गौतम जी ने सर्व बहर समभाव का नया पंथ अपनाकर अपनी सिद्ध हस्तता का प्रमाण दिया है।
प्रस्तुत गजलों की ख़ासियत छंद विधान, लयात्मकता, सामयिकता, सारगर्भितता, मर्मस्पर्शिता, सहजता तथा सरलता के सप्त मानकों पर खरा होना है। इन गजलों में बिम्ब, प्रतीक, रूपक और अलंकारों का सम्यक तालमेल दृष्टव्य है। ग़ज़ल का कथ्य प्रेयसी से वार्तालाप होने की पुरातन मान्यता के कारण ग़ालिब ने उसे तंग गली और कोल्हू का बैल जैसे विशेषण दिए थे। हिंदी ग़ज़ल ने ग़ज़ल को सामायिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए नए तेवर दिए हैं जिन्हें आरंभिक हिचक के बाद उर्दू ग़ज़ल ने भी अंगीकार किया है। डॉ. गौतम ने इन ६५ ग़ज़लों में विविध भावों, रसों और विषयों का सम्यक समन्वय किया है।
नीतिपरकता दोहों में सहज किन्तु ग़ज़ल में कम ही देखने मिलती है। गौतम जी 'सदा सत्य बोलो सखे / द्विधा मुक्त हो लो सखे', 'यों न चल आदमी / कुछ संभल आदमी' आदि ग़ज़लों में नीति की बात इस खुबसूरती से करते हैं कि वह नीरस उपदेश न प्रतीत हो। 'हर तरफ सवाल है / हर तरफ उबाल है', 'हवा क्यों एटमी है / फिज़ा क्यों मातमी है', 'आइये गजल कहें आज के समाज की / प्रश्न कुछ भविष्य के, कुछ व्यथाएँ आज की' जैसी गज़लें सम-सामयिक प्रश्नों से आँखें चार करती हैं। ईश्वर को पुकारने का भक्तिकालीन स्वर 'मेरी नैया भंवर में घिरी है / आस तेरी ही अब आखिरी है' में दृष्टव्य है। पर्यावरण पर अपने बात कहते हुए गौतम जी मनुष्य को पेड़ से सीख लेने की सीख देते हैं- 'दूसरों के काम आना पेड़ से सीखें / उम्र-भर खुशियाँ लुटाना पेड़ से सीखें'। गौतम जी कि ग़ज़ल मुश्किलों से घबराती नहीं वह दर्द से घबराती नहीं उसका स्वागत करती है- 'दर्द ने जब कभी रुलाया है / हौसला और भी बढ़ाया है / क्या करेंगी सियाह रातें ये / नूर हमने खुदा से पाया है'।
प्यार जीवन की सुन्दरतम भावना है। गौतम जी ने कई ग़ज़लों में प्रकारांतर से प्यार की बात की है। 'गुस्सा तुम्हारा / है हमको प्यारा / आँखें न फेरो / हमसे खुदारा', 'तेरे-मेरे दिल की बातें, तू जाने मैं जानूँ / कैसे कटते दिन और रातें, तू जानें मैं जानूँ', 'उनको देखा जबसे / गाफिल हैं हम तबसे / यह आँखों की चितवन / करती है करतब से, 'इशारों पर इशारे हो रहे हैं / अदा पैगाम सारे हो रहे हैं' आदि में प्यार के विविध रंग छाये हैं। 'कितनी पावन धरती है यह अपने देश महान की / जननी है जो ऋषि-मुनियों की और स्वयं भगवान की', 'आओ सब मिलकर करें कुछ ऐसी तदबीर / जिससे हिंदी बन सके जन-जन की तकदीर' जैसी रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर हुआ है।
सारत: यह पुस्तक एक बड़े अभाव को मिटाकर एक बड़ी आवश्यकता कि पूर्ति करती है। नवगजलकार खुश नसीब हैं कि उन्हें मार्गदर्शन हेतु 'गागर में सागर' सदृश यह पुस्तक उपलब्ध है। गौतम जी इस सार्थक सृजन हेतु साधुवाद के पात्र हैं। उनकी अगली कृति कि बेकरारी से प्रतीक्षा करेंगे गजल प्रेमी।
*** सन्दर्भ- १. छंद प्रभाकर- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', २. गजल रदीफ़ काफिया और व्याकरण- डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', ३. गजल छंद चेतना- महावीर प्रसाद 'मुकेश', ४. ग़ज़ल ज्ञान- रामदेव लाल 'विभोर', ५. गजल सृजन- आर. पी. शर्मा 'महर्षि', ६. अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी- ज़ाकिर उस्मानी रावेरी, ७. गज़ल और गज़ल की तकनीक- राम प्रसाद शर्मा 'महर्षि'.
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पुस्तक चर्चा-
'गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण' अपनी मिसाल आप
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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पुस्तक विवरण- गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', विधा- छंद शास्त्र, प्रथम संस्करण २०१५, आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १९५/-, निरुपमा प्रकाशन ५०६/१३ शास्त्री नगर, मेरठ, ०१२१ २७०९५११, ९८३७२९२१४८, रचनाकार संपर्क- डी ११५ सूर्या पैलेस, दिल्ली मार्ग, मेरठ, ९४१००९३९४३।
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हिंदी-उर्दू जगत के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल' हरदिल अज़ीज़ शायर हैं। वे उस्ताद शायर होने के साथ-साथ, अरूज़ के माहिर भी हैं। आज के वक्त में ज़िन्दगी जिस कशमकश में गुज़र रही है, वैसा पहले कभी नहीं था। कल से कल को जोड़े रखने कि जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गयी और अब तक ढोई जा रही शिक्षा प्रणाली कि बदौलत ऐसी नस्ल तैयार हो गयी है जिसे अपनी सभ्यता और संस्कृति पिछड़ापन तथा विदेशी विचारधारा प्रगतिशीलता प्रतीत होती है। इस परिदृश्य को बदलने और अपनी जड़ों के प्रति आस्था और विश्वास पैदा करने में साहित्य की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। ऐसे रचनाकार जो सृजन को शौक नहीं धर्म मानकर सार्थक और स्वस्थ्य रचनाकर्म को पूजा की तरह निभाते हैं उनमें डॉ. बेदिल का भी शुमार है।
असरदार लेखन के लिए उत्तम विचारों के साथ-साथ कहने कि कला भी जरूरी है। साहित्य की विविध विधाओं के मानक नियमों की जानकारी हो तो तदनुसार कही गयी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। गजल काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय वि धाओं में से एक है। बेदिल जी, ने यह सर्वोपयोगी किताब बरसों के अनुभव और महारत हासिल करने के बाद लिखी है। यह एक शोधग्रंथ से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। शोधग्रंथ विषय के जानकारों के लिए होता है जबकि यह किताब ग़ज़ल को जाननेवालों और न जाननेवालों दोनों के लिए सामान रूप से उपयोगी है। उर्दू की काव्य विधाएँ, ग़ज़ल का सफर, रदीफ़-काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़(बहरें), बहरों की किस्में, मुफरद बहरें, मुरक़्क़ब बहरें तथा ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम शीर्षक अष्टाध्यायी कृति नवोदित ग़ज़लकारों को कदम-दर-कदम आगे बढ़ने में सहायक है।
एक बात साफ़ तौर पर समझी जानी चाहिए कि हिंदी और उर्दू हिंदुस्तानी जबान के दो रूप हैं जिनका व्याकरण और छंदशास्त्र कही-कही समान और कहीं-कहीं असमान है। कुछ काव्य विधाएँ दोनों भाषा रूपों में प्रचलित हैं जिनमें ग़ज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण है। उर्दू ग़ज़ल रुक्न और बहारों पर आधारित होती हैं जबकि हिंदी ग़ज़ल गणों के पदभार तथा वर्णों की संख्या पर। हिंदी के कुछ वर्ण उर्दू में नहीं हैं तो उर्दू के कुछ वर्ण हिंदी में नहीं है। हिंदी का 'ण' उर्दू में नहीं है तो उर्दू के 'हे' और 'हम्ज़ा' के स्थान पर हिंदी में केवल 'ह' है। इस कारण हिंदी में निर्दोष दिखने वाला तुकांत-पदांत उर्दूभाषी को गलत तथा उर्दू में मुकम्मल दिखनेवाला पदांत-तुकांत हिन्दीभाषी को दोषपूर्ण प्रतीत हो सकता है। यही स्थिति पदभार या वज़न के सिलसिले में भी हो सकती है। मेरा आशय यह नहीं है कि हमेशा ही ऐसा होता है किन्तु ऐसा हो सकता है इसलिए एक भाषारूप के नियमों का आधार लेकर अन्य भाषारूप में लिखी गयी रचना को खारिज करना ठीक नहीं है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि विधा के मूल नियमों की अनदेखी हो। यह कृति गज़ल के आधारभूत तत्वों की जानकारी देने के साथ-साथ बहरों कि किस्मों, उनके उदाहरणों और नामकरण के सम्बन्ध में सकल जानकारी देती है। हिंदी-उर्दू में मात्रा न गिराने और गिराने को लेकर भी भिन्न स्थिति है। इस किताब का वैशिष्ट्य मात्रा गिराने के नियमों की सटीक जानकारी देना है। हिंदी-उर्दू की साझा शब्दावली बहुत समृद्ध और संपन्न है।
उर्दू ग़ज़ल लिखनेवालों के लिए तो यह किताब जरूरी है ही, हिंदी ग़ज़ल के रचनाकारों को इसे अवश्य पढ़ना, समझना और बरतना चाहिए इससे वे ऐसी गज़लें लिख सकेंगे जो दोनों भाषाओँ के व्याकरण-पिंगाल की कसौटी पर खरी उतरें। लब्बोलुबाब यह कि बिदिक जी ने यह किताब पूरी फराखदिली से लिखी है जिसमें नौसिखियों के लिए ही नहीं उस्तादों के लिए भी बहुत कुछ है। इया किताब का अगला संस्करण अगर अंग्रेजी ग़ज़ल, बांला ग़ज़ल, जर्मन ग़ज़ल, जापानी ग़ज़ल आदि में अपने जाने वालों नियमों की भी जानकारी जोड़ ले तो इसकी उपादेयता और स्वीकृति तो बढ़ेगी ही, गजलकारों को उन भाषाओँ को सिखने और उनकी ग़ज़लों को समझने की प्रेरणा भी मिलेगी।
डॉ. बेदिल इस पाकीज़ा काम के लिए हिंदी-उर्दू प्रेमियों की ओर से बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं। गुज़ारिश यह कि रुबाई के २४ औज़ानों को लेकर एक और किताब देकर कठिन कही जानेवाली इस विधा को सरल रूप से समझाकर रुबाई-लेखन को प्रोत्साहित करेंगे।
२७-१२-२०१६
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लघुकथा -
कब्रस्तान
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महाविद्यालय के प्राचार्य मुख्य अतिथि को अपनी संस्था की गुणवत्ता और विशेषताओं की जानकारी दे रहे थे. पुस्तकालय दिखलाते हुए जानकारी दी की हमारे यहाँ विषयों की पाठ्य पुस्तकें तथा सन्दर्भ ग्रंथों के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी है. हम हर वर्ष अच्छी मात्र में साहित्यिक पुस्तकें भी क्रय करते हैं.
आतिथि ने उनकी जानकारी पर संतोष व्यक्त करते हुए पुस्तकालय प्रभारी से जानना चाहा कि गत २ वर्षों में कितनी पुस्तकें क्रय की गयीं, विद्यार्थियों ने कितनी पुस्तकें पढ़ने हेतु लीं तथा किन पुस्तकों की माँग अधिक थी? उत्तर मिला इस वर्ष क्रय की गयी पुस्तकों की आदित जांच नहीं हुई है, गत वर्ष खरीदी गयी पुस्तकें दी नहीं जा रहीं क्योंकि विद्यार्थी या तो विलम्ब से वापिस करते हैं या पन्ने फाड़ लेते हैं.
नदी में बहते पानी की तरह पुस्तकालय से प्रतिदिन पुस्तकों का आदान-प्रदान न हो तो उसका औचित्य और सार्थकता ही क्या है? तब तो वह किताबों का कब्रस्तान ही हो जायेगा, अतिथि बोले और आगे चल दिए.
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ॐकारेश्वर का विष्णु मंदिर – अल्पचर्चित किंतु भव्य
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ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग होने के कारण यहाँ की पहचान मुख्य मंदिर तथा ॐ आकार का वह पर्वत है जिसकी परिक्रमा श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। यहाँ धार्मिक दृष्टि से आने वाले सैलानियों के लिये भी एक अन्य आकर्षण जुड गया, वह है ॐकारेश्वर में एनएचडीसी द्वारा निर्मित बाँध। इसके अतिरिक्त ममलेश्वर मंदिर नर्मदा नदी के दूसरे तट पर अवस्थित है जिसे कतिपय विद्वान ज्योतिर्लिंग परिभाषित करते हैं। यहाँ मंदिर की दीवारों पर उकेरी गयी प्रस्तराकृतियाँ व लिखे गये स्त्रोत वर्ष 1063 के बताये जाते हैं।
ॐकारेश्वर के इन मुख्य आकर्षणों पर पर्यटकों की अच्छी खासी संख्या दैनिक रूप से उपस्थित रहती है। नौकायन करते हुए जब मैं नदी के उत्तरी तट पर ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिये जा रहा था, मध्य से चारों ओर का दृश्य निहारते हुए इस प्राचीन स्थान के महात्म्य और ऐतिहासिकता ने मन-मोह लिया। पर्वत के शीर्ष पर प्राचीन राजमहल बहुत ही दयनीय अवस्था में भी शान से कुछ कहता प्रतीत होता है। यत्र तत्र अनेक ऐतिहासिक महत्व के भग्नावशेष हैं जिनतक पहुँचना भी संभव नहीं चूंकि उनकी पीठ पर कई धर्मशालायें हैं। यह केवल ओंकारेश्वर की ही बात नहीं अपितु कमोबेश पूरे देश में ही इतिहास हमारी सोच में भी केन्द्रित नहीं और हम खण्डहर कह सब कुछ अनदेखा कर देते हैं।
ओंकारेश्वर मुख्य मंदिर और ममलेश्वर मंदिर के अतिरिक्त यहाँ अनेक मंदिरों व आश्रमों की श्रंखला है जो अपनी प्राचीनता के कारण महत्व के स्थान हैं। ओमकार पर्वत और आसपास गोविन्देश्वर गुफा, ऋणमुक्तेश्वर मंडिर, गौरी-सोमनाथ मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, आशापुरी मंदिर, ब्रम्हेश्वर मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, इन्द्रेश्वर मंदिर, काशी-विश्वनाथ मंदिर, वृहदेश्वर मंदिर, कपिलेश्वर मंदिर, हनुमान मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, मार्कण्डेय आश्रम, गया शिला तीर्थ आदि अवस्थित हैं। केवल मंदिर ही नहीं अपितु इस परिधि में गुरुद्वारा तथा सिद्धवरकूट जैनतीर्थ भी नर्मदा एवं कावेरी नदियों के संगम पर है। नर्मदा नदी पर इन तीर्थों को देख कर यह स्वत: ही मनोभावना उठती है कि “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवि नर्मदे”।
नदी के दक्षिणी तट पर स्थित एक मंदिर ने अपनी कलात्मकता के कारण मेरा ध्यान खींचा था। मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि यह एक विष्णु मंदिर है। मंदिर की पूरी संरचना को सफेद रंग के पोत दिया गया है यहाँ तक कि प्रतिमायें भी लिपि-पुती हैं जो संभव है इतिहास के किसी विद्यार्थी को मायूस कर सकती हैं। बहुत पर्यटक नहीं आते अंत: शांत और एकांतप्रिय लोगों के लिये यहाँ खडे हो कर नर्मदा नदी के प्रवाह को देखना अद्भुत आनंद का सिद्ध हो सकता है। मंदिर का मुख नर्मदा नदी की ओर है तथा यह गर्भगृह, अंतराल एवं मण्डप तीन भागों में विभक्त है।
विष्णु मंदिर के मण्डप वाले हिस्से में सोलह अलंकृत स्तम्भ है जो मंदिर की भव्यता बढाते हैं। मंदिर का प्रत्येक स्तम्भ नृत्य मुद्रा में किसी अपसरा से ले कर किसी पौराणिक आख्यान तक स्वयं में समाविष्ट किये हुए हैं। पृष्ठ भाग छोड कर तीन ओर से सीढियाँ है जिनसे हो कर चबूतरे पर चढा जा सकता है एवं चतुर्भुजी भगवान विष्णु के दर्शन किये जा सकते हैं। अंतराल वाले भाग में दीवारों पर भगवान विष्णु, उमा-महेश्वर तथा भगवान कृष्ण की लीलाओं सम्बन्धी प्रतिमायें देखी जा सकती हैं। मंदिर का गर्भगृह आयताकार है किंतु बहुत विशाल नहीं है। मंदिर का शिखर यद्यपि तुलनात्मक रूप से विशाल व दर्शनीय है। शिखर पर निश्चित अंतराल में दो द्वार बने हुए हैं। मंदिर के चारो को दो हाथी, कमल, भगवान विष्णु आदि सहित कतिपय मिथुन प्रतिमायें भी हैं।
मंदिर के अहाते में ही भगवान विष्णु की एक प्रतिमा खण्डित अवस्था में रखी हुई है। प्रतिमा अलंकृत है तथा दर्शनीय है। इस स्थान से आगे बढ कर नर्मदानदी के विस्तार का आनंद लिया जा सकता है। यहाँ से ओमकारेश्वर का पुराना पुल, अनेकों मंदिर व प्राकृतिक दृष्य दृष्टिगोचर होते हैं। ओमकारेश्वर में अवस्थित यह भव्य विष्णु मंदिर पर्यटकों की उपेक्षा क्यों झेल रहा है इसका कारण संभवत: इस स्थान के समुचित प्रचार – प्रसार का न होना है। मुझे लगता है कि किसी स्थान की महत्ता को यदि वास्तव में जानना-समझना है तो ऐसे ही अल्प-चर्चित स्थलों के लिये थोड़ा समय निकालना भी आवश्यक है।
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नवगीत
गुरु विपरीत
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गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
गाँधी कहते सत्य बोलना
गाँधीवादी झूठ बोलते
बुद्ध कहें मत प्रतिमा गढ़ना
बौद्ध मूर्तियाँ लिये डोलते
जिन मुनि कहते करो अपरिग्रह
जैन संपदा नहीं छोड़ते
चित्र गुप्त हैं निराकार
कायस्थ मूर्तियाँ लिये दौड़ते
इष्ट बिदा हो जाता पहले
कैसे यह
विडंबना झेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
त्यागी मठ-आश्रम में बैठे
अपने ही भक्तों को लूटें
क्षमा करो कहते ईसा पर
ईसाई दुश्मन को कूटें
यवन पूजते बुत मक्का में
लेकिन कहते बुत हैं झूठे
अभियंता दृढ़ रचना करते
किन्तु समय से पहले टूटें
माया कहते हैं जो जग को
रमते हैं
लगवाकर मेले
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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विद्यार्थी विद्या की अर्थी
रोज निकालें नकल कर-कर
जन प्रतिनिधि जनगण को ठगते
निज वेतन-भत्ते बढ़वाकर
अर्धनग्न घूमे अभिनेत्री
नित्य न अभिनय बदन दिखाकर
हम कहते गृह-स्वामी खुद को
गृहस्वामिनी की आज्ञा लेकर
गिनें कहाँ तक
बहुत झमेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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नवगीत -
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सल्ललाहो अलैहि वसल्लम
*
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
क्षमा करें सबको
हम हरदम
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सब समान हैं, ऊँच न नीचा
मिले ह्रदय बाँहों में भींचा
अनुशासित रह करें इबादत
ईश्वर सबसे बड़ी नियामत
भुला अदावत, क्षमा दान कर
द्वेष-दुश्मनी का
मेटें तम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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तू-मैं एक न दूजा कोई
भेदभाव कर दुनिया रोई
करुणा, दया, भलाई, पढ़ाई
कर जकात सुख पा ले भाई
औरत-मर्द उसी के बंदे
मिल पायें सुख
भुला सकें गम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
*
ज्ञान सभ्यता, सत्य-हक़ीक़त
जगत न मिथ्या-झूठ-फजीहत
ममता, समता, क्षमता पाकर
राह मिलेगी, राह दिखाकर
रंग- रूप, कद, दौलत, ताकत
भुला प्रेम का
थामें परचम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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कब्ज़ा, सूद, इजारादारी
नस्लभेद घातक बीमारी
कंकर-कंकर में है शंकर
हर इंसां में है पैगंबर
स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई
ईशदूत बन
संग चलें हम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
२७-१२-२०१५
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