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बुधवार, 12 जून 2024

१२ जून, दोहा, गीत, शिरीष, हास्य, ठेंगा, विधाता छंद, शुद्धगा छंद, सॉनेट

सलिल सृजन १२ जून
*
सॉनेट
अहंकार
*
अहंकार सिर पर चढ़ा,
खुद को कहते श्रेष्ठ खुद,
दिन-दिन अधिकाधिक बढ़ा,
सबसे ज्यादा नेष्ठ खुद।
औरों को उपदेश दें,
चाल-चलन विपरीत कर,
श्रेय न पर को लेश दें,
चाटुकार से प्रीत कर।
देख मलिन मुख तोड़ दें,
दर्पण मुख धोते नहीं,
ऐसों को झट छोड़ दें,
जो पछता-रोते नहीं।
अहंकार ही हार है,
शीघ्र पतन का द्वार है।
बेंगलुरू, १२.६.२०२४
***
दोहा दुनिया
मैं भारत हूँ कह करें, मनमानी दिन-रात।
भारत का दुख दिख रहा, किंचित तुम्हें न तात।।
*
मैं भारत हूँ मानकर, सत्ता मूँदे नैन।
जन-मन को पीड़ित करे, आप गँवाए चैन।।
*
मैं भारत हूँ कह सहे, जनगण चुप हो पीर।
मन ही मन में घुट रही, जनता हुई अधीर।।
*
मैं भारत हूँ कह रहीं, घुटती साँसें रोज।
अस्पताल धन लूटते, गिद्ध पा रहे भोज।।
*
मैं भारत हूँ बोलतीं, दबीं रेत में लाश।
सिसक रही है हर नदी, हर घर मौन-हताश।।
१२-६-२०२१
***
एक गीत
शिरीष के फूल
*
फूल-फूल कर बजा रहे हैं
बीहड़ में रमतूल,
धूप-रूप पर मुग्ध, पेंग भर
छेड़ें झूला झूल
न सुधरेंगे
शिरीष के फूल।
*
तापमान का पान कर रहे
किन्तु न बहता स्वेद,
असरहीन करते सूरज को
तनिक नहीं है खेद।
थर्मामीटर नाप न पाये
ताप, गर्व निर्मूल
कर रहे हँस
शिरीष के फूल।।
*
भारत की जनसँख्या जैसे
खिल-झरते हैं खूब,
अनगिन दुःख, हँस सहे न लेकिन
है किंचित भी ऊब।
माथे लग चन्दन सी सोहे
तप्त जेठ की धूल
तार देंगे
शिरीष के फूल।।
*
हो हताश एकाकी रहकर
वन में कभी पलाश,
मार पालथी, तुरत फेंट-गिन
बाँटे-खेले ताश।
भंग-ठंडाई छान फली संग
पीकर रहते कूल,
हमेशा ही
शिरीष के फूल।।
*
जंगल में मंगल करते हैं
दंगल नहीं पसंद,
फाग, बटोही, राई भाते
छन्नपकैया छंद।
ताल-थाप, गति-यति-लय साधें
करें न किंचित भूल,
नाचते सँग
शिरीष के फूल।।
*
संसद में भेजो हल कर दें
पल में सभी सवाल,
भ्रमर-तितलियाँ गीत रचें नव
मेटें सभी बबाल।
चीन-पाक को रोज चुभायें
पैने शूल-बबूल
बदल रँग-ढँग
शिरीष के फूल।।
***
हास्य रचना
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया जया सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
१२-६-२०१६
***
मुक्तक
नेह नर्मदा में अवगाहो, तन-मन निर्मल हो जाएगा।
रोम-रोम पुलकित होगा प्रिय!, अपनेपन की जय गाएगा।।
हर अभिलाषा क्षिप्रा होगी, कुंभ लगेगा संकल्पों का,
कोशिश का जनगण तट आकर, फल पा-देकर तर जाएगा।।
७-६-२०१६
***
छंद सलिला:
विधाता/शुद्धगा छंद
*
छंद लक्षण: जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा,
यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है.
लक्षण छंद:
विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले
रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले
सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर
न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले
संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७
सिद्धि = ८, तिथि = १५
उदाहरण:
१. न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?
न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?
न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?
न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में?
जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात
२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक
गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?
न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम
३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी
बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?
कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी
४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम
जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम
कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम
यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम
*********
१२-६-२०१४

मंगलवार, 11 जून 2024

मधु प्रधान

लेख
मधु प्रधान के नवगीत : आगत का स्वागत करता अतीत 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
छायावादी भावधारा के जिन साहित्यकारों ने नववगीत के लिए उर्वर सृजन भूमि तैयार करने में प्राण-प्राण से प्रयास किए उनका साहचर्य और उनसे प्रेरणा पाने का सौभाग्य मधु प्रधान जी को मिला है। विरासत को सहेज कर, वर्तमान से जूझने और भविष्य का आशीष-अक्षत से तिलक करने का भाव मधु जी की गीति रचनाओं की प्राणशक्ति रहा है। गीत और छंद की आधारभूत समझकर  नवगीतों के कलेवर को शिल्प सौष्ठव से सुसज्जित कर जीवन में प्राप्त दर्द और पीड़ा को पचाकर मिठास लुटाने के जीवट और पुरुषार्थ का पर्याय मधु जी हैं। पद्मभूषण नीरज जी ने ठीक ही कहा है- "उनके (मधु जी के) भीतर काव्य-सृजन की सहज क्षमता है इसीलिए अनायास-अप्रयास उनके गीतों में बड़े ही मार्मिक बिंब स्वयं ही उतरकर सज जाते हैं।"

छायावादी गीत परंपरा में पली-बढ़ी मधु जी ने सौंदर्यानुभूति को जीवन-चेतना के रूप में अपने गीतों में ढाला है। मधु जी के नवगीत साँस के सितार पर राग और विराग के सुर एक साथ जितनी सहजता से छेड़ पाते हैं वह अनुभूतियों को आत्मसात किये बिना संभव नहीं होता। उनका मानस जगत कामना और कल्पना को इतनी एकाग्रता से एकरूप करता है कि अनुभूति और अभिव्यक्ति में अंतर नहीं रह जाता। स्मृतियों के वातायन से झाँकते हुए वर्तमान के साथ चलने में असंगति और स्मृति-भ्रम का खतरा होता है किंतु मधु जी ने स्मृति-मोह (नास्टेलजिया) से बचते हुए पूरी निस्संगता के साथ गतागत के बीच  संपर्क-सेतु बनाते हुए कथ्य के साथ न्याय किया है-

"मेरे मादक / मधु गीतों में / तुमने कैसी तृषा जगा दी। / मैं अपने में ही खोई थी / अनजानी थी जगत रीति से / कोई चाह नहीं थी मन में / ज्ञात नहीं थे गीत प्रीत के / रोम-रोम अब / महक रहा है / तुमने सुधि की सुधा पिला दी।"

सुधियों की सुधा पीकर पीड़ा से बेसुध होता कवि-मन सुध-बुध के साथ सहज-स्वाभाविक समन्वय स्थापित कर पाता है। मधु जी के गीतों में छायावाद (''वे सृजन के / प्रणेता, मैं / प्रकृति की / अभिव्यंजना हूँ , कौन बुलाता / चुपके से / यह मौन निमंत्रण / किसका है, तुम रहे / पाषाण ही / मैं आरती गाती रही, शून्य पथ है मैं अकेली / हो रहा आभास लेकिन / साथ मेरे चल रहे तुम'' आदि) के साथ कर्म योग (''मोह का परिपथ नहीं मेरे लिए / क्यूं (क्यों) करूँ मुक्ति का अभिनन्दन / मैं गीत जन्म के गाऊँगी, धूप ढल गयी, बीत गया दिन / लौट चलो घर रात हो गई'' आदि) का दुर्लभ सम्मिश्रण दृष्टव्य है। वे अभाव से भाव-संसार की सृष्टि में प्रवेश कर समय की आँखों में आँखें डालकर विषमताओं को ललकारती हैं। नारी का सर्वाधिक असरकारक हथियार होता है। मधू जी आँसू बहाती नहीं आँसू का अर्चन करती हैं  - ''दिखी किसी की सजल आँख तो / मेरे भी आँसू भर आये / पीड़ा की थपकी / पाकर ही / मन के बोल अधर पर आये / फिर भी पत्थर / नही पसीजे / आँसू का अर्चन जारी है''। 

मधु जी के लिए नवगीत केवल विसंगति-वर्णन नहीं है। वे नवगीत के माध्यम से समन्वय और सामंजस्य के सोपानों का चरणाभिषेक करती हैं- 
''आस्था के इस सफर में / शूल भी हैं, फूल भी हैं / हैं बहुत / तूफान लेकिन / शान्त सरिता कूल भी हैं / सीख लें सुख-दुख निभाना।''

'सीख लें सुख-दुःख निभाना' जैसे जीवनोपयोगी संदेशों ने मधु जी की गीति रचनाओं को समाजोपयोगिता से समृद्ध किया है। हिंदी साहित्य विशेषकर नवगीत, कहानी, व्यंग्यलेख और लघुकथाओं जैसी विधाओं को वामपंथी विचारधारा के कैदी रचनाकारों ने सामाजिक विसंगतियों, विडंबनाओं, अतिरेकी वर्ग संघर्षों हुए शोषण आदि तक सीमित रखने का दुष्प्रयास किया। सम विचारधारा के अनुनायी समीक्षकों ने इन विधाओं के विधान को भी अपनी वैचारिक मान्यताओं के अनुरूप ढालकर कृतियों का मूल्याङ्कन और कृतिकारों को श्रेष्ठ बताने के निरंतर प्रयास किए। इस आँधी में सनातन मूल्यपरक सर्वकल्याणकारी साहित्य रचनेवाले रचनाधर्मी उपेक्षित किए जाने से आहत हुए। कई ने अपनी वैचारिक राह बदल ली, कुछ ने सृजन से न्यास ले लिए किन्तु मधु जी तूफान में जलती निष्कंप दीपशिखा की भाँति मौन संघर्ष करती हुई सृजनरत रहीं। पारिवारिक संकट भी उनके सृजन-पथ को अवरुद्ध नहीं कर सके। मधु जी ने सृजन को अपनी जिजीविषा की संजीवनी बन लिया। नमन तुम्हें मेरे भारत (राष्ट्रीय भावधारा परक गीत संग्रह), आजादी है सबको प्यारी (बाल गीत संग्रह) तथा माटी की गंध (कविता संग्रह) जैसी नवगीतेतर कृतियों में भी मधु जी जमीन से जुड़ाव की यथार्थपरकता को, जो नवगीतों की मूलशक्ति है, दूर नहीं होने दिया। वे साहित्यिक पत्रों को प्रतीकों के रूप में उपयोग करते हुए कहती हैं- 'होरी के आँगन में फागुन / रूपा के माथे पर रोली / चौक अँचरती झुनिया का सुख / नन्हें की तुतली सी बोली / बिना महाजन का मुँह जोहे / काज सभी सरते देखे हैं'। नमन तुम्हें मेरे भारत गीत संग्रह से उद्धृत ये काव्य पंक्तियाँ शोषण मुक्त होते समाज का शब्द-चित्र प्रस्तुत करता है। इसी संकलन में 'अनछुई राहें बुलातीं / टेरता है इक नया पल', 'जीवन है अमलतास तरु सा / जो कड़ी धूप में है खिलता', 'खेत जोतते हीरा-मोती / घर में दही बिलोती मैया', 'कितनी विषम परिस्थितियाँ हों / पर हम हार नहीं मानेंगे।', 'उठ सके न कोई आँख इधर / प्राणों में ऐसी शक्ति भरो' आदि गीत पंक्तियाँ संकेतित करती हैं कि मधु जी नवगीत को बदलते देश-समाज के साथ कदम से कदम मिलकर उड़ने वाला गीत-पाखी मानती हैं। नवगीत को परिभाषित करते हुई मधु जी लिखती हैं- 'वेदना की कोख से जन्मे हुए नवगीत को / पाँव के छाले छुपाकर मुस्कुराती प्रीत को / स्नेह का प्रतिदान दे सुधि में बसाना चाहते हैं / चेतना के गीत गाना चाहते हैं'। स्पष्ट है कि मधु जी नवगीत को वेदना से जन्मा, दर्द छिपाकर प्रीत बिखेरता, चेतना संपन्न गीति रचना मानती हैं।

सामान्यत: बालगीत और नवगीत दो भिन्न विधाएँ मानी जाती हैं। मधु जी ने बाल गीतों में नवगीतीय तत्वों का सम्मिश्रण किया है। तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक जिस आजादी का महत्त्व बताने के लिए नवगीतों में जमीन-आसमान एक कर देते है उसे ही मधु जी गागर में सागर की तरह संक्षिप्तता, सहजता तथा सरलता अहित इस प्रकार गीतित करती हैं कि बाल मानस बिना किसी कठिनाई के आजादी का महत्त्व ग्रहण कर सके- 'पिजरे का तुम द्वार हटाओ / मुझको आजादी दिलवाओ / रोज सवेरे मैं आऊँगी / तुमको गीत सुना जाऊँगी / सबसे सुंदर सबसे न्यारी / आजादी है सबको प्यारी' -(आजादी है सबको प्यारी पृष्ठ १०)

नवगीत में जमीन से जुड़ाव और यथार्थ को अनिवार्य माननेवाले 'यद्यपि मेरी देह खड़ी है / ईटों के जंगल में / पर मेरे रोम रोम में / अंतर में बसी है / उस माटी की गंध / जहाँ मेरा बचपन गुजरा है' जैसी काव्य पंक्तियों में मधु जी नवगीत के तत्वों को कविताओं में ढालती हैं। घर की ओर लौटते हुए पंछियों का समूह, धरती कभी बंजर नहीं होती, गांधारी कभी मत बनना, सपने तो टूटते ही हैं जैसी अभिव्यक्तियाँ मधु जी की कविताओं में नवगीततीय तत्वों की उपस्थिति संकेतित करती है। नकारात्मक ऊर्जा को नवगीतों की पहचान माननेवालों से मधु जी शालीनतापूर्वक कहती हैं- 'तुम देख रहे बस काँटों को / मैं गीत फूलों को दुलराऊँगी' तथा 'नीरव मरघट में शांति कहाँ / मंदिर में दीप जलाऊँगी'।     
        
मधु जी रचित 'मुखर अब मौन है' प्रथम कृति है जिसमें गीत की नवगीतीय भंगिमा पूरी जीवसंतता के साथ उपस्थित है। विश्ववाणी हिंदी के गीति काव्य की छायावादी विरासत को सहेजने-सम्हालने ही नहीं जीनेवाली वरिष्ठ गीतकार डॉ. मधु प्रधान की बहु प्रतीक्षित कृति है मुखर अब मौन है । छायावादी भावधारा को साहित्यकारों की जिस पीढ़ी ने प्राण-प्राण से पुष्पित करने में अपने आपको अर्पित कर दिया उनका साहचर्य और उनसे प्रेरणा पाने का सौभाग्य मधु जी को मिला है। मधु जी के इन गीतों में यत्र-तत्र मधु की मिठास व्याप्त है। जीवन में प्राप्त दर्द और पीड़ा को पचाकर मिठास के गीत गाने के लिए जिस जीवट और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है वह मधु जी में है। पद्मभूषण नीरज जी ने ठीक ही कहा है- "उनके भीतर काव्य-सृजन की सहज क्षमता है इसीलिए अनायास-अप्रयास उनके गीतों में बड़े ही मार्मिक बिंब स्वयं ही उतरकर सज जाते हैं।"

छायावादी गीत परंपरा में पली-बढ़ी मधु जी ने सौंदर्यानुभूति को जीवन-चेतना के रूप में अपने गीतों में ढाला है। उनका मानस जगत कामना और कल्पना को इतनी एकाग्रता से एकरूप करता है कि अनुभूति और अभिव्यक्ति में अंतर नहीं रह जाता। स्मृतियों के वातायन से झाँकते हुए वर्तमान के साथ चलने में असंगति और स्मृति-भ्रम का खतरा होता है किंतु मधु जी ने पूरी निस्संगता के साथ कथ्य के साथ न्याय किया है-



"मेरे मादक / मधु गीतों में / तुमने कैसी तृषा जगा दी। / मैं अपने में ही खोई थी / अनजानी थी जगत रीति से / कोई चाह नहीं थी मन में / ज्ञात नहीं थे गीत प्रीत के / रोम-रोम अब / महक रहा है / तुमने सुधि की सुधा पिला दी।" सुधियों की सुधा पीकर बेसुध होना सहज-स्वाभाविक है।

मधु जी के ये गीत साँस के सितार पर राग और विराग के सुर एक साथ जितनी सहजता से छेड़ पाते हैं वह अनुभूतियों को आत्मसात किये बिना संभव नहीं होता।


"प्राणी मात्र / खिलौना उसका / जिसमें सारी सृष्टि समाई ... आगत उषा-निशा का स्वागत / ओस धुले पथ पर आमंत्रण पर मन की उन्मादी लहरें
खोज रहीं कुछ मधु-भीगे क्षण / किंतु पता / किसको है किस पल / ले ले समय / विषम अंगड़ाई।"

उनके गीतों में छायावाद (वे सृजन के / प्रणेता, मैं / प्रकृति की / अभिव्यंजना हूँ , कौन बुलाता / चुपके से / यह मौन निमंत्रण / किसका है, तुम रहे / पाषाण ही / मैं आरती गाती रही, शून्य पथ है मैं अकेली / हो रहा आभास लेकिन / साथ मेरे चल रहे तुम आदि) के साथ कर्म योग (मोह का परिपथ नहीं मेरे लिए / क्यूं (क्यों) करूँ मुक्ति का अभिनन्दन / मैं गीत जन्म के गाऊँगी, धूप ढल गयी, बीत गया दिन / लौट चलो घर रात हो गई आदि) का दुर्लभ सम्मिश्रण दृष्टव्य है।

काव्य प्राणी की अन्तश्चेतना में व्याप्त कोमलतम अनुभूति की ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें जीवन के हर उतार-चढ़ाव, धूप-छाँव, फूल-शूल, सुख-दुःख की अभिव्यक्ति इस तरह होती है कि व्यक्ति का नाम न हो और प्रवृत्ति का उल्लेख हो जाए। कलकल और कलरव, नाद और ताल, रुदन और हास काव्य में बिंबित होकर 'स्व' की प्रतीति 'सर्व' के लिए ग्रहणीय बनाते हैं। मधु जी ने जीवन में जो पाया और जो खोया उसे न तो अपने तक सीमित रखा, न सबके साथ साझा किया। उन्होंने आत्मानुभव को शब्दों में ढालकर समय का दस्तावेज बना दिया। उनके गीत उनकी अनुभूतियों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि वे स्वयं अनुपस्थित होती हैं लेकिन उनकी प्रतीति पाठक / श्रोता को अपनी प्रतीत होती है। इसीलिये वे अपनी बात में कहती हैं- "रचनाओं से भी ज्यादा महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो सृजन को जमीन देते हैं और उनका पोषण करते हैं। वे बीज रूप में अंतस में बैठ जाते हैं और समय पाकर अंकुरित हो उठते हैं।"

रचनाकार की भावाकुलता कभी-कभी अतिरेकी हो जाती है तो कभी-कभी अस्पष्ट, ऐसा उसकी ईमानदारी के कारण होता है। अनुभूत को अभिव्यक्त करने की अकृत्रिमता या स्वाभाविकता ही इसका करक होती है। सजग और सतर्क रचनाकार इससे बचने की कोशिश में कथ्य को बनावटी और असहज कर बैठता है। 'काग उड़ाये / सगुन विचारे' के सन्दर्भ में विचारणीय है कि काग मुंडेर पर बैठे तो अतिथि आगमन का संकेत माना जाता है (मेरी अटरिया पे कागा बैठे, मोरा जियरा डोले, कोई आ रहा है)।

"कहीं नीम के चंचल झोंके / बिखरा जाते फूल नशीले" के संदर्भ में तथ्य यह कि महुआ, धतूरा आदि के फूल नशीले होते हैं किंतु नीम का फूल नशीला नहीं होता। इसी प्रकार तथ्य यह है कि झोंका हवा का होता है पेड़-पौधों का नहीं, पुरवैया का झोंका या पछुआ का झोंका कहा जाता है, आम या इमली का झोंका कहना तथ्य दोष है।

'मेरे बिखरे बालों में तुम / हरसिंगार ज्यों लगा रहे हो' के सन्दर्भ में पारंपरिक मान्यता है कि हरसिंगार, जासौन, कमल आदि पुष्प केवल भगवान को चढ़ाए जाते है। इन पुष्पों का हार मनुष्य को नहीं पहनाया जाता। बालों को मोगरे की वेणी, गुलाब के फूल आदि से सजाया जाता है।

मधु जी का छंद तथा लय पर अधिकार है, इसलिए गीत मधुर तथा गेय बन पड़े हैं तथापि 'टु एरर इज ह्युमन' अर्थात 'त्रुटि मनुष्य का स्वभाव है' लोकोक्ति के अनुसार 'फूलों से स्पर्धा करते (१४) / नए-नए ये पात लजीले (१६) / कहीं नीम के चंचल झोंके (१६) / बिखरा जाते फूल नशीले (१६) के प्रथम चरण में २ मात्राएँ कम हो गयी हैं। यह संस्कारी जातीय पज्झटिका छंद है जिसमें ८+ गुरु ४ + गुरु का विधान होता है।

केन्द्रीय हिंदी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निर्धारित वर्तनी मानकीकरण के प्रावधानों का पालन न किए जाने से अनुस्वार (बिंदी) के प्रयोग में कहीं-कहीं विसंगति है। देखें 'सम्बन्ध', 'अम्बर' तथा 'अकंपित'। इसी तरह अनुनासिक (चंद्र बिंदी) के प्रयोग में चूक 'करूँगी' तथा 'करूंगी' शब्द रूपों के प्रयोग में हो गयी है। इसी तरह उनके तथा किस की में परसर्ग शब्द के प्रयोग में भिन्नता है। उद्धिग्न (उद्विग्न), बंधकर (बँधकर), अंगड़ाई (अँगड़ाई), साँध्य गगन (सांध्य गगन), हुये (हुए), किसी और नाम कर चुके (किसी और के नाम कर चुके), भंवरे (भँवरे), संवारे (सँवारे), क्यूं (क्यों) आदि में हुई पाठ्य शुद्धि में चूक खटकती है।

डॉ, सूर्यप्रसाद शुक्ल जी ने ठीक ही लिखा है "जीवन सौंदर्य की भावमयी व्यंजन ही कल्पना से समृद्ध होकर गीत-प्रतिभा का अवदान बनती है.... मानस की अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द-सामर्थ्य की एक सीमा तो होती है, जहाँ वाणी का विस्तार भाव-समाधि में समाहित हो जाता है... इस स्थति को ही 'गूँगे का गुड़' कह सकते हैं। 'मुखर अब मौन है' में जिस सीमा तक शब्द पहुँचा है, वह प्रिय स्मृति में लीन भाव समाधी के सूक्ष्म जगत का आनंदमय सृजन-समाहार ही है जिसमें चेतना का शब्दमय आलोक है और है कवयित्री के सौंदर्य-भाव से प्रस्फुटित सौंदर्य बोध के लालित्य का छायावादी गीत प्रसंस्करण।"

संकलन के सभी गीत मधु जी के उदात्त चिंतन की बानगी देते हैं। इन गीतों को पढ़ते हुए महीयसी महादेवी जी तथा पंत जी का स्मरण बार-बार हो आता  है - 'कोई मुझको बुला रहा है / बहुत दूर से / आमंत्रण देती सी लहरें / उद्वेलित करतीं / तन-मन को / शायद सागर / का न्योता है / मेरे चिर प्यासे / जीवन को / सोये सपने जगा रहा है / बहुत दूर से' अथवा 'भूल गए हो तुम मुझको पर / मैं यादों को पाल रही हूँ या 'कहीं अँधेरा देख द्वार पर / मेरा प्रियतम लौट न जाए / देहरी पर ही खड़ी रही मैं / रात-रात भर दिया जलाये / झंझाओं से घिरे दीप को / मैं यत्नों से संभाल रही  हूँ' आदि में प्रेम की उदात्तता देखते ही बनती है। मधु जी का यह गीत संग्रह नयी पीढ़ी के गीतकारों को अवश्य पढ़ना चाहिए. भाषिक प्रांजलता, सटीक शब्द चयन, इंगितों में बात कहना, 'स्वानुभूति' को 'सर्वानुभूति' में ढालना, 'परानुभूति' को 'स्वानुभूति' बना सकना सीखने के लिए यह कृति उपयोगी है। श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार मधु जी की रचनाएँ नई पीढ़ी के लिए मानक की तरह देखी जाएँगी, इसलिए उनका शुद्ध होना अपरिहार्य है।

यह निर्विवाद है कि 'नवगीत' में 'गीत' होना ज़रूरी है। जन सामान्य किसी भी गुनगुनाई जा सकनेवाली शब्द रचना को गीत कह लेता है। संगीत में किसी एक ढाँचे में रची गई समान उच्चार कालवाली कविता जिसे ताल में लयबद्ध करके गाया जा सके, वह गीत की श्रेणी में आती है, किन्तु साहित्य के मर्मज्ञों ने गीत और कविता में अन्तर करने वाले कुछ सर्वमान्य मानक तय किये हैं। छन्दबद्ध कोई भी कविता गाई जा सकती है पर उसे गीत नहीं कहा जाता। गीत एक प्राचीन विधा है जिसका हिंदी में व्यापक विकास छायावादी युग में हुआ। गीत में स्थाई और अंतरे होते हैं। स्थाई और अन्तरों में स्पष्ट भिन्नता होनी चाहिये। प्राथमिक पंक्तियाँ जिन्हें स्थाई कहते हैं, प्रमुख होती है, और हर अन्तरे से उनका स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई देना चाहिये। गीत में लय, गति और ताल होती है। इस तरह के गीत में गीतकार कुछ मौलिक नवीनता ले आये तो वह नवगीत कहलाने लगता है।

राजेन्द्र प्रसाद सिंह (१९३०-२००७) ने बतौर संपादक लिखा था : "नयी कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है,जो मानव जीवन के ऊंचे और गहरे, किन्तु सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छित्ति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज संवार कर नयी ‘टेकनीक’ से, हार्दिक परिवेश की नयी विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं । प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नयी कविता की प्रगति का पूरक बनकर ‘नवगीत’ का निकाय जन्म ले रहा है । नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा ।”

‘गीतांगिनी’ के सम्पादकीय में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के पाँच विकासशील तत्व जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय बताए हैं। ‘नवगीत’ के पूर्व गीतों में दर्शन की प्रचुरता थी- जीवन दर्शन की नहीं; धर्म, नैतिकता और रहस्य की निष्ठा का स्रोत था- व्यावहारिक आत्मनिष्ठा का नहीं; व्यक्तिवादिता थी- व्यक्तित्व-बोध नहीं, प्रणय-शृंगार था,-जीवनानुभव से अविभाज्य प्रीति-तत्व नहीं, तथा सौंदर्य एवं मार्मिकता के प्रदत्त प्रतिमान थे,- प्रेरणा की विविध विषय-वस्तुओं के परिसंचय का सिलसिला नहीं। निराला ने अपनी एक रचना में इस ओर संकेत करते हुए कहा है- नव गति, नव लय, ताल, छंद नव। यही आगे चलकर नवगीत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ मानी गईं। नवगीत में कथ्य, भंगिमा, बिंब, उपमान, प्रतीक और शब्द को नवता की कसौटी मानते हुए रचनाओं को परखा जाना चाहिए। आवश्यक नहीं कि एक नवगीत में इन सभी तत्वों की नवता लेकिन कुछ नवता ज़रूरी है। नवगीत में पारंपरिक पर नव छंद को वरीयता दी जान चाहिए पर पारंपरिक छंद को वर्जित नहीं मन जा सकता। छंद में बहाव हो लय का सौंदर्य हो, ताकि गीत में माधुर्य बना रहे। इस निकष पर मधु जी के द्वितीय नवगीत संकलन 'गीत विहग उतरे' पर दृष्टि डालना रोचक है।

मधु जी के शब्दों में 'लय तो जीवन के साथ जुड़ी है, श्वास-प्रश्वास के आरोह-अवरोह  में लय समाहित है। ..... काव्य सृजन में सब कुछ समाहित हो जाता है प्रेम, वत्सल्य, वियोग, वितृष्णा और घायल मन का दर्द, अभाव में घटते लोगों की उसाँसें भी।' स्वाभाविक है कि मधु जी के नवगीत यही सब समाहित किए हों। इस संग्रह के गीतों में हृदय की सघन संवेदना, आनुभूतिक तरलता, भाषी सरलता और बैंबिक स्पष्टता सहज दृष्टव्य है। इन गीतों का रसपान करते समय अभिव्यक्ति की सीपियों में अनुभूति के मोती आभा बिखेरते मिलते हैं। इन नवगीतों को वैचारिक प्रतिबद्धता की तुला पर तोलना निरथक व्यायाम होगा। इनमें जीवन का मांगल्य भाव प्रतिष्ठित है। ये नवगीत वातायन से दिखते खंडित आकाश को नहीं, गिरी शिखर से दिखते अनंत नीलकाश को पंक्ति-भुजाओं में समेटे हैं। वैयक्तिक-पारिवारिक और सामाजिक जीवन फलक पर घटित होती ऊँच-नीच को शब्दित करते मधु जी के नवगीत प्रकृति के आँचल मरण प्रेम और पीड़ा की अठखेलियाँ समेटे हैं। नातों की सच्चाई, सत्ता की निरंकुशता, राजनैतिक-सामाजिक जियावाँ में मूल्य-ह्रास, कृषकों-श्रमिकों का शोषण, साक्षारों में व्याप्त असंतोष, कर्तव्य भाव की न्यूनता आदि विविध दृश्य इस संग्रह को सम-सामयिक परिदृश्य का आईना बनाते हैं। 

कवयित्री पाखंडियों से सचेत करते हुए कहती है- 'रेत-रेत हो / रही जिंदगी / देख रहे सब एक तमाशा / छुरी छिपाये / वधिक हाथ में / बोल रहे संतों की भाषा / सावधान हो / स्वर के साधक / सर्पों ने बदला है बाना'। 

समाज और परिवार में हो रहा विघटन मधु जी की चिंता का केंद्र है- 'रिश्तों में अब / शेष नहीं हैं मर्यादाएँ / शेष मात्र हैं ताने-बाने ॥। धूप ढाल गई / दोपहरी में / कुदरत जाने क्या है ठाने? ॥। कैसे सिलें / फटी कथरी को / बिखर गए हैं ताने-बाने? ... हुआ भीड़ में गुम अपनापन / खोज रहा अपनी पहचानें'।

पर्यावरणीय प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा गीतकार को व्यथित करती हैं। वह अमिधा में अपनी अनुभूतियाँ व्यक्त करती है- 'रूठकर मत जा रे / बदरा रूठकर / दरकता है हिय धरा का / अधूरी है चिर पिपासा / म्लान मुख अवसाद घेरे / आज तो ठहरो जरा सा / सब्र का न बाँध टूटे / बिखर जाए ना रे कजरा'। 

गाँवों से लगातार शहरों की ओर होता पलायन आर्थिक ताना भले ही जोड़ दे पर पारिवारिक बाना तो अस्त-व्यस्त हो ही जाता है। श्वास-प्रश्वास की तरह ग्राम्य और नागर दोनों परिवेशों की आनुभूतिक समृद्धता संपन्न मधु जी पीपल के वृक्ष के माध्यम से मन की व्यथा-कथा कहती है- 'ठहर जो / ओ! प्रवासी / तनिक पीपल छाँव में / कौन जाने कल यहाँ / हम हों न हों / हो रहे हैं खंडहर घर / रेत सी झरने लगी है / नोना लगी दीवार भी /  आह सी भरने लगी है / अब दिया जलता नहीं / वीरानियाँ हैं गाँव में / आह सी भरने लगी है / खेत हरियाले बिके सब / ईंट-पत्थर उग रहे / आ गए हैं बाज, दाना / पंछियों का चुग रहे / जल रही संवेदना / कंकड़ चुभे हैं पाँव में / कौन जाने कल / यहाँ हम हों न हों।' 

पारिस्थितिक विषमता जीवन को रसहीन करती जाती है। समय-चक्र ठिठककर देखता रहता है और कोयल की कूक हर्ष के स्थान पर दर्द को गाती है- 'मौसम सब / रसहीन हो गए / ऐसा चला वक्त का पहिया / सभी ठौर पर ठिठक गए हैं / हवा चली कुछ ऐसी / सब के सब अपने में ठिठक गये हैं / जो मंसूबे बाँध चले थे / पात ढाक के तीन हो गये / कोयल कूक रही पर लगता / दर्द किसी का है दुहराती / टूट-टूट कर बिखर रही है / बहुत दिनों से मिली न पाती / खोया मीठापन / कूपों का / खारे कुछ नमकीन हो गए'।

लोकतंत्र में लोक पर तंत्र हावी हो, आश्वासन की मदिरा युवा को बेबस कर बेसहारा कर दे तो आग लगने की संभावना होती है। नवगीतकार का ऐसी स्थिति में चिंतित होना स्वभावैक है- 'बदल गया है / मौसम का रुख / सूखे खेत चटकती धरती / नगर-नगर में, गली गली में / प्यास-प्यास का शोर मचा है / पर बादल से / जल के बदले / आश्वासन की मदिरा झरती / सपने थे आँखों में पर अब / मात्र बेबसी छलक रही है / गिरवी खुशियाँ / कुंठाओं में / सांसें अपराधों सी चलतीं / आक्रोशों की पौध बढ़ रही / मुरझाई आस्था की बालें / कहीं व्यवस्था / सुलग न जाए / युवा मानों में / आग मचलती'।

नवगीतकार मधु प्रधान का वैशिष्ट्य तमाम विसंतुयों, कमियों, अभावों आदि को स्वीकारते हुए भी आशा के आकाश को कम न होने देना है। उनके नवगीत निराश पर आशा की जय बोलते हैं, जीवन में रस घोलते हैं- 'कब तक रोयेंगे बीते को / चलो नये प्रतिमान गढ़ें हम' कहते हुए मानवीय जिजीविषा को नव राह और नव लक्ष्य दिखाते हैं ये नवगीत- 'माना कठिन समय है लेकिन, फिर भी कुछ तो सुविधाएँ हैं / लेकिन कदम बढ़ाते डरते / मन में कैसी द्विविधाएँ हैं / ठिठकें नहीं पैर अब बढ़कर / नए नए उपमान गढ़ें हम'।
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[संपर्क आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्व वाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, वाट्सऐप ९४२५१८३२४४, एमेल salil.sanjiv@gmail.com ] 
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मधु प्रधान के गीत
आओ बैठें नदी किनारे - आओ बैठें नदी किनारे, गीत पुराने फिर दोहराएँ। कैसे किरनों ने पर खोले, कैसे सूरज तपा गगन में, कैसे बादल ने छाया दी, कैसे सपने जगे नयन में, सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की, मन के सोये तार जगाएँ। जल में झुके सूर्य की आभा, और सलोने चाँद का खिलना, सिन्दूरी बादल के रथ का, लहरों पर इठला कर चलना, बिम्ब पकड़ने दौड़ें लहरें, खुद में उलझ उलझ रह जाएँ । श्वेत पांखियों की कतार ने, नभ में वन्दनवार सजाये, प्रकृति नटी के इन्द्रजाल में, ये मन ठगा-ठगा रह जाये, धीरे-धीरे संध्या उतरी, लेकर अनगिन परी कथाएँ। आओ बैठे नदी किनारे

१. प्रीति की पाँखुरी


प्रीति की
पाँखुरी छू गयी बाँसुरी
गीत झरने लगे स्वप्न तिरने लगे


साँस में
बस गया गाँव इक, गन्ध का
दे के सौरभ गया पत्र अनुबन्ध का
प्राण झंकृत हुये तार कुछ अनछुये
राग अनुराग मय
पल ठहरने लगे


चन्द्रमा को
मिली रुप की पूर्णिमा
नेह के मंत्र रचने लगी उर्मियाँ
थरथराते अधर गुनगुनाते प्रहर
शून्यता को प्रणव
शब्द भरने लगे


लो विभासित
हुयी कोई पावन व्यथा
योग संयोग की नव चिरन्तन कथा
मौलश्री छाँव में शिंजनी पाँव में
शुभ सृजन के नये
स्वर सँवरने लगे


***


२. मेरी है यह भूल अगर


मेरी है
यह भूल अगर
तो मुझको भूल प्यारी है
लिखना मेरी लाचारी है

दिखी किसी की सजल आँख तो
मेरे भी आँसू भर आये
पीड़ा की थपकी
पाकर ही
मन के बोल अधर पर आये
फिर भी पत्थर
नही पसीजे
आँसू का अर्चन जारी है।

सच पूछूँ तो बुरा लगेगा
बीज द्वेष के किसने बोये
पौधा बढ़कर वृक्ष
बन गया
फिर भी सब अपने में खोये
नागफनी उग रही
बाग में
कहते फूलों की क्यारी है।

इतने खंडहर उगे शहर में
वीराने भी मात हो गये
उगे प्रश्न गूँगे
होठों पर
शब्दों पर आघात हो गये
बहुत देर तक चुप
रहना भी
कुछ कहने की तैयारी है
***


३. रूठकर मत दूर जाना

रूठ कर
मत दूर जाना।

माँग भर कर प्राण! तुमने
प्राण वश में कर लिये हैं
था अँधेरी
रात सा मन
जले फिर सौ-सौ दिये हैं
आ गया फिर गुनगुनाना

आस्था के इस सफर में
शूल भी हैं, फूल भी हैं
हैं बहुत
तूफान लेकिन
शान्त सरिता कूल भी हैं
सीख लें सुख-दुख निभाना

पतझरों के बीच भी
मधुमास का आभास होना।
हो रहा
अनुभव, तुम्हारा
बहुत मन के पास होना।
पर कठिन तुमको बताना
***


४. सुलग रही फूलों की घाटी


सुलग रही
फूलों की घाटी
प्यासी हिरनी
सम्मुख मृग जल
कंपित पग पथराया मन है
बहुत उदास आज दर्पण है।


नीलकंठ
के पंख नोच कर
मस्त बाज कर रहे किलोलें
सहमी सहमी-सी गौरैया
छुपी छुपी
शाखों पर डोलें
कोटर पर
नागों का पहरा
नींद दूर है, दूर सपन है।


पके खेत
खलिहान जोहते
बाट कहाँ वंशी की तानें
कहाँ खो गई अल्हड़ कल-कल
झरने सी
झरती मुस्काने
उभर रहे
कुंठा के अंकुश
ठहरा ठहरा सा जीवन है।


बरस रही
है आग रात दिन
सुलग रही फूलों की घाटी
उडे पखेरु नीड़ छोड़ कर
स्वप्न हुई
देहरी की माटी
बिछ़़ड गई
कोपल डाली से,
सूना सूना घर आँगन है।


***


५. आओ बैठें नदी किनारे


आओ बैठें नदी किनारे
गीत पुराने फिर दोहराएँ


कैसे किरनों ने पर खोले
कैसे सूरज तपा गगन में
कैसे बादल ने छाया दी
कैसे सपने जगे नयन में
सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की
मन के सोये तार जगाएँ


जल में झुके सूर्य की आभा
और सलोने चाँद का खिलना
सिन्दूरी बादल के रथ का
लहरों पर इठला कर चलना
बिम्ब पकड़ने दौड़ें लहरें
खुद में उलझ उलझ रह जाएँ


श्वेत पांखियों की कतार ने
नभ में वन्दनवार सजाये
प्रकृति नटी के इन्द्रजाल में
ये मन ठगा-ठगा रह जाये
धीरे-धीरे संध्या उतरी
लेकर अनगिन परी कथाएँ


***


६. तुम क्या जानो


तुम क्या जानो क्या होता है


जब स्वप्निल अनुबन्ध टूटते
मिले मिलाये तार रुठते
धवल चाँदनी के छौनों को
अंधकार के दूत लूटते
सूनी चौखट पर जब कोई
खुद पर ही हँसता रोता है।


रिमझिम के मृदु गीत सुनाकर
बेसुध सोई पीर जगा कर
दस्तक देती है पुरवाई
हरियाली चुनर लहरा कर
पर सुधियाँ पग रखते डरतीं
इतना मन भीगा होता है


कहने को सब कहते रहते
अनजाने ही दे जाते हैं
कुछ कड़वी, कुछ मीठी बातें
कोमल मन को गहरी घातें
किन्तु मौन अधरों की भाषा
समझे जो, विरला होता है।


***


७. पीपल की छाँह में


सोचा था बैठेंगे जी भर
हम पीपल की छाँव में
किन्तु सुलगना
पड़ा हमें नित
साजिश भरे अलाव में


चूर हुये सिन्दूरी सपने
बिछुड़ गये सब जो थे अपने
नयनों की निंदिया से अनबन
सहमी है पायल
की रुनझुन
रहजन बैठे घात लगाये
गली-गली हर ठाँव में


जिसको समझा सुख का सागर
वो तो था पीड़ा का निर्झर
आस खुशी की हुई जहाँ से
मिले दर्द के
गीत वहाँ से
मन का मोती बिका अजाने
कौड़ी वाले भाव भाव में


मौन हुये अकुला अकुला कर
मधु गीतों के भावुक अक्षर
शापित है साँसों की राधा
मुरली ने भी
व्रत है साधा
पासे उलटे पड़े न जाने
क्यों अपने हर दाँव में


***


८. प्यासी हिरनी


प्यासी हिरनी सम्मुख मृग जल
कम्पित पग पथराया मन है


बहुत उदास आज दर्पण है।
नीलकंठ के पंख नोच कर
मस्त बाज कर रहे किलोलें
सहमी-सहमी सी गौरैयाँ,
छुपी-छुपी शाखों पर डोलें
कोटर पर नागों का पहरा
नींद दूर है,दूर सपन है।


पके खेत खलिहान जोहते
बाट, कहाँ वंशी की तानें
कहाँ खो गई अल्हड़ कल कल
झरने सी झरती मुस्कानें।
उभर रहे कुंठा के अंकुश
ठहरा-ठहरा सा जीवन है।


बरस रही है आग रात दिन
सुलग रही फूलों की घाटी
उड़े पखेरु नीड़ छोड़ कर
स्वप्न हुई देहरी की माटी
बिछ़ड़ गई कोपल डाली से,
सूना-सूना घर आँगन है


***


९. सुमन जो मन में बसाए


सुमन जो मन में बसाये
भाव भीनी गंध हूँ मैं।


वर्जनायें थीं डगर की
किन्तु कुछ मधुपल चुराये
कल्पनाओंके क्षितिज पर
र्स्वण शतदल से सजाये
अंजली अनुराग की
झरता हुआ मकरंद हूँ मै


मधुर अंकुर कामना का
बीज बन अन्तरनिहित है
काव्य के अनहद स्वरों में
गन्ध मृग सा जो भ्रमित है
गीत की अर्न्तकथा का
वह प्रथम अनुबन्ध हूँ मैं।


मोहिनी की मदिर छवि में
उमड़ते मृदु भाव भर कर
चितेरे की तूलिका से
झरे रस के बिन्दु झर झर
छलछलाते नयन से
छलका हुआ आनन्द हूँ मैं


***


१०. लो हम भी संत हो गए


गंगा केवल नदी नहीं है


गंगा केवल नदी नहीं है,
मां की ममता है,


सदा सींचती आई संस्कृति
नव सोपान दिए
कल कल छल छल बहती जाती
जग का भार लिए
इसकी पावनता की जग में
कोई समता है?


जटा जूट से शिव की उतरी
थी, निर्मलता लेकर
किन्तु मिला क्या इसको
जग को, जीवन का फल देकर
अन्नपूर्णा कल्प वृक्ष सी
इसमें क्षमता है,


आज कह रही सुरसरि हमसे
मन में पीर लिए
कौन बनेगा भागीरथ जो कलि का कलुष हरे
मिले ज्योति से ज्योति, दीप से
तम भी डरता है,
***


११. गीतों में एक अधूरापन




गीतों में एक अधूरापन
पर क्या खोया मन न जाने।


जो कोलाहल से जन्मी है
अनुभूति उसी नीरवता कि
रंगों के झुरमुट में बिखरी
हिम-सी गुमसुम एकरसता कि


अहसास ढूंढ़ती आखों में
जो मिले कहीं पर पहचाने॥


है व्यथा-कथा उन परियों की
जो पंख खोजती भटक रहीं
पीड़ा अधचटकी कलियों की
जो कहीं धूल में सिसक रहीं


तड़पन बिसरे मधुगीतों की
जिनके गायक थे अनजाने॥


उल्लास मिला तो कुछ ऐसे
पानी में चन्दा कि छाया
अन्तस् की सूनी घाटी को
दिव-स्वप्नों से बहलाया


मरुथल में जल की छलना
प्यासी हिरनी को भरमाने॥


***
१२. मौन भटकते गीतों को


मौन भटकते गीतों को
यदि तुम वंशी का स्वर दे दो॥


मैं व्यथा कहूँ कैसे अपनी
उन्मन मन की क्या अभिलाषा
भावों के भटके हुये शलभ
जलना यौवन की परिभाषा


बन बिन्दु रीतते जीवन को
मधु सुधियों की गागर दे दो॥


भीगी पलकों की छाया में
सोये सुख सपने मचल-मचल
गन्ध भरी अमराई में
मत्त भ्रमर जैसे आकुल


सुरभि बाँध लूं आँचल में
यदि कलियों का कोहबर दे दो॥


बौराई कोकिल की कुहुकन
ने छेड़ा मन के तारों को
आशा के कच्चे धागों से
बाँधा है दिन बंजारों को


मद भरी फागुनी रातों को
सपनों का सोन शिखर दे दो


***
१३. दूर है गंतव्य तेरा


चुभ रहे कांटे पगों में
इन्हें यादों में सँजो ले ,
उपेक्षायें मिलीं तो क्या
इन्हें मोती सा पिरो ले,


सीपियों से ढाल दे जो
दर्द दुनियाँ ने बिखेरा ।
दूर है गन्तव्य तेरा ।।
थक रहे क्यों पाँव तेरे
घिर रहे मन में अँधेरे ,


बाती सजा विश्वास की
हैं साधना के दीप कोरे ,


मत्त झंझा के झकोरों ने
प्रभाती राग छेड़ा ।
दूर है गन्तव्य तेरा ।।


निर्झरों से हास लेकर
थकन राहों की भुलादे ,
भोर का तारा बने और
राह औरों को दिखा दे


इन अँधेरी घाटियों में
शेष कुछ पल का बसेरा ।
दूर है गन्तव्य तेरा ।।
***


१४.
मेरा प्यारा भारत देश
सबसे न्यारा मेरा भारत देश
कल- कल करके नदिया बहती
झर-झर करके झरने बहते
आँखों में बसते दृश्य मनोहर।
नित्य नये त्योहार मनाते
आलाप मधुर संगीत सुनाते
बच्चो के मन चहक -चहक है जाते
रसमयी गागर सब छलकाते।
सूर्य चन्द्र नक्षत्र और पशु-पक्षी भी यहाँ पूजे जाते हैं।
खुश तुष्ट हो अतिथि जाते
गुणगान यहां का वे सुनाते।
पर्वत घाटो की कमी नहीं सबको यह बतलाते हैं।
गेंहू चना धान मक्का के
खेत खूब लहराते
फल फूलो के बाग बगीचे
इस धरती की हैं शान ।
भरी हुई है प्रकृति संपदा।
भारत में आपस में मेल बढ़ाती सभ्यता, संस्कृति है।
अनेक भाषाएँ वेशभूषा
शान हमारी खूब बढ़ाती
यह बात औरों को
पच नहीं पाती किन्तु
यही है इस देश की थाती।
बारी-बारी मौसम है आते
रोज नये रंग हैं बरसाते
परिवारों का बंधन है मजबूत
यहाँ चट्टानों सा है जीवन सबका।
वीर शिवाजी औ लक्ष्मीबाई की
गाथाएँ सबको याद जवानी है
शहीद भगत और आजाद की
सरफरोशी की तमन्ना सबने ही समानी है।
वेद व्यास औ कृपाचार्य का
बुद्धि बल व्याप्त हुआ जगत में
गौतम बुद्ध महावीर से ऋषियो ने
अपने उपदेशों से लोगों में फूँका ऐसा मन्त्र मनोहर
उमड़ी त्याग तप की भावना
भरत नाम से बना यह भारत देश
ऐसे महान देश को करते सभी
शत-शत प्रणाम।।
***
१५. निर्दयी कोरोना


*


बडा ही निर्दयी है कोरोना तू


लाखों की जान लेने वाला


जायेगी कब तेरी ये जान


लगेगा कब यह संसार
चलायमान है


सबकी खुशियां गटक गया


जैसे चूरन का सेवन कर गया


बिन बुलाए मेहमान सा


आकर अटक गया है


नहीं चाहिए नहीं किसी को


दुष्ट तेरा यह सानिध्य


आज सारा संसार कर


रहा हा हा कार है


बस जा यहां से तू


उपकार इतना कर हम सब पर


बुजुर्गो के पीछे पड़ा तू भी है


क्यों सबकी बदुआ लेने पर है तुला


सारी गलियां शांत हो गई


सिनेमा घर पकड़ कर


बैठे है‌ अपना‌ सर


‌‌‌
 दुकाने सब खाली हो गयी



कंगाली के बादल घिरने को है


क्यों कड़ी परीक्षा ले रहा है


दांव अपना खेल रहा


मानव से पंगा ले रहा है


जहां क्षण में मात खायेगा


अपने अस्तित्व का समूचा


नाश तू करवायेगा पछतायेगा।।

***

प्रकाशन--**नमन तुम्हें मेरे भारत** देशगीत पुस्तक, *मुखर अब मौन है*,गीत संग्रह , शताधिक पत्र पत्रिकाओं एवं सम्मलित संग्रहों में गीत ग़ज़ल दोहे आदि प्रकाशित। सम्मान--- उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'नज़ीर अकबराबादी ' सर्जना सम्मान। मानद " विद्यावाचस्पति" सम्मान। उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा राजभाषा सम्मान। विभिन्न साहित्यिक संस्थानों द्वारा शताधिक सम्मान।। सम्प्रति--पूर्व शिक्षिका वर्तमान में स्वतंत्र लेखन।। संपर्क--149 D, ख्योरा ,नवाबगंज, कानपुर पिन 208002 उत्तर प्रदेश मोबाइल 8562984895 ,,// 9236017666

शनिवार, 25 मई 2024

मई २५, बिटिया, दुर्गा भाभी, अनुलोम विलोम, मुक्तिक, दोहा, नवगीत, जाति, शकुन्तला खरे

सलिल सृजन मई २५
*
एक रचना
बिटिया!
कोशिश करी बधाई।
*
पहला पैर रखा धरती पर
खड़े न रहकर
गिरे धम्म से।
कदम बढ़ाया चल न सके थे
बार बार
कोशिश की हमने।
'इकनी एक' न एक बार में
लिख पाए हम
तो न करें गम।
'अ अनार का' बार बार
लिख गलत
सही सीखा था हमने।
नहीं विफलता से घबराया
जो उसने ही
मंजिल पाई।
बिटिया!
कोशिश करी बधाई।
*
उड़ा न पाता जो पतंग वह
कर अभ्यास
उड़ाने लगता।
गोल न रोटी बनती गर तो
आंटा बेलन
तवा न थकता।
बार बार गिरती मकड़ी पर
जाल बनाए बिना
न रुकती।
अगिन बार तिनके गिरते पर
नीड़ बिना
पाखी कब रुकता।
दुखी न हो, संकल्प न छोड़ो
अश्रु न मीत
न सखी रुलाई।
बिटिया!
कोशिश करी बधाई।
*
कुंडी बार बार खटकाओ
तब दरवाजा
खुल पाता है।
अगणित गीत निरंतर गाओ
तभी कंठ-स्वर
सध पाता है।
श्वास ट्रेन पर आस मुसाफिर
थके-चुके बिन
चलते रहता।
प्रभु सुन ले या करें अनसुनी
भक्त सतत
भजता जाता है।
रुके न थक जो
वह तरुणाई।
बिटिया!
कोशिश करी बधाई।
२५-५-२०२३
***
दुर्गा भाभी और हम
*
विधि की विडंबना किअंग्रेजो से माफी माँगनेवाले स्वातंत्र्य वीर और प्रधान मंत्री हो गए किन्तु जान हथेली पर रखकर अंग्रेजों की नाक में दम करनेवाले किसी को याद तक नहीं आते।
एक वो भी थे जो देश हित कुर्बान हो गए।
एक हम हैं जो उनको याद तक नहीं करते।।
दुर्गा भाभी साण्डर्स वध के बाद राजगुरू और भगतसिंह को लाहौर से अंग्रेजो की नाक के नीचे से निकालकर कोलकत्ता ले गई थीं। इनके पति क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा थे। ये भी कहा जाता है किचंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी वक्त में दुर्गा भाभी द्वारा दी गई माउजर पिस्तौल थी।
१४ अक्टूबर १९९९ में वो इस दुनिया से चुपचाप ही विदा हो गईं।
आज तक उस वीरांगना को इतिहास के पन्नों में वो जगह मिली जिसकी वो हकदार थीं और न ही वो किसी को याद रही चाहे वो सरकार हो या जनता।
एक स्मारक तक उनके नाम पर नहीं है, कहीं कोई मूर्ति नहीं है उनकी। सरकार, पत्रकार और जनता किसी को नहीं आती उनकी याद। कितने कृतघ्न हैं हम?
***
दोहा दुनिया
कर उपासना सिंह की, वन में हो तव धाक
सिर नीचा पर समझ ले, तेरी ऊँची नाक
*
दोहा प्रगटे आप ही, मेरा नहीं प्रयास
मातु शारदा की कृपा, अनायास सायास
*
शब्द निशब्द अशब्द हो, तभी प्रगट हो सत्य
बाकी मायाजाल है, है असत्य भी सत्य
*चाह चाहकर हो चली, जर्जर देह विदेह

वाह वाह कर ले तनिक, हो संजीव अगेह
***
मुक्तिका
*
परिंदे मिल कह रहे हैं ईद मुबारक
सेठ दौलत तह रहे हैं ईद मुबारक
कामगर बेकाम भूखे पेट मर रहा
दे रहे हैं कर्ज बैंक ईद मुबारक
खेत की छाती पे राजमार्ग बन गया
है नहीं दरख्त-कुआँ ईद मुबारक
इंजीनियर मजदूर की है कद्र कुछ नहीं
नेता पुलिस की बोलिए जय ईद मुबारक
जा आइने के सामने मिलिए गले खुद से
आँखों नें आँख डाल कहें ईद मुबारक
***
हिंदी के सोरठे
*
हिंदी मोतीचूर, मुँह में लड्डू सी घुले
जो पहले था दूर, मन से मन खुश हो मिले
हिंदी कोयल कूक, कानों को लगती भली
जी में उठती हूक, शब्द-शब्द मिसरी डली
हिंदी बाँधे सेतु, मन से मन के बीच में
साधे सबका हेतु, स्नेह पौध को सींच के
मात्रिक-वर्णिक छंद, हिंदी की हैं खासियत
ज्योतित सूरज-चंद, बिसरा कर खो मान मत
अलंकार है शान, कविता की यह भूल मत
छंद हीन अज्ञान, चुभा पेअर में शूल मत
हिंदी रोटी-दाल, कभी न कोई ऊबता
ऐसा सूरज जान, जो न कभी भी डूबता
हिंदी निश-दिन बोल, खुश होगी भारत मही
नहीं स्वार्थ से तोल, कर केवल वह जो सही
२२-५-२०२०
***
अनुलोम-विलोम
गिरेन्द्रसिंह भदौरिया प्राण
*
अनुलोम अर्थात रचना की किसी पँक्ति को सीधा पढ़ने पर भी अर्थ निकले और विलोम अर्थात् उल्टा (पीछे से ) पढ़ने पर भी अर्थ दे ।
संस्कृत के कई कवियों तथा रीतिकालीन हिन्दी के आचार्य कवि केशव दास ने भी ऐसी रचनाएँ की हैं ।
नीचे लिखी रचना में अनुलोम लावणी में और विलोम ताटंक छन्द में बन पड़ा है।
अनुलोम
=======
क्यों दी रोक सार कह नारी गोधारा नीलिमा नदी ।
क्यों दी मोको तालि लय जया माता मम कालिमा पदी ।।
विलोम
=====
दीन मालिनी राधा गोरी नाहक रसा करोदी क्यों ?
दीप मालिका ममता माया जयललिता को मोदी क्यों ?
अनुलोम का अर्थ
===
हे नारी तूने नीलिमा ( यमुना ) नदी की बहती हुई गो धारा क्यों रोक दी ।ऐसा ही करना था तो उस काले पैरों वाली ( कालिमापदी) मेरी जया माता ने मुझे लय और ताल क्यों दी ? यह बता ।
विलोम का अर्थ
====
दीन गरीब मालिनी ने राधा गोरी से पूछा कि तू नाहक धरती क्यों कुरेद रही है पता लगा कि तेरे होते हुए आजकल ये दीप मालिका सी ममता माया व जयललिता को मोदी क्यों चाहिए ?
***
चिंतन:
जाति, विवाह और कर्मकांड
*
जात कर्म = जन्म देने की क्रिया, जातक = नज्म हुआ बच्चा, जातक कथा = विविध योनियों में अवतार लिए बुद्ध की कथाएं.
विविध योनियों में बुद्ध कौन थे यह पहचान उनकी जाति से हुई. जाति = गुण-धर्म.
'जन्मना जायते शूद्रो' के अनुसार हर जातक जन्मा शूद्र होता है.
कर्म के अनुसार वर्ण होता है. 'चातुर्वण्य मया सृष्टम गुण कर्म विभागश:' कृष्ण गीता में.
सनातन धर्म में एक गोत्र, एक कुल, पिता की सात पीढ़ी और माँ की सात पीढ़ी में, एक गुरु के शिष्यों में, एक स्थान के निवासियों में विवाह वर्जित है. यह 'जेनेटिक मिक्सिंग' का भारतीय रूप ही है.
इनमें से हर आधार के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है.
जो अव्यक्त है, वह निराकार है. जो निराकार है उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता अर्थात चित्र गुप्त है. यह चित्रगुप्त कौन है?
चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानं सर्वदेहिनाम' चित्रगुप्त सर्व प्रथम प्रणाम के योग्य हैं जो सर्व देहधारियों में आत्मा के रूप में विराजमान हैं'
'कायास्थिते स: कायस्थ:' वह (चित्रगुप्त या परमात्मा) जब किसी काया का निर्माण कर उसमें स्थित (आत्मा रूप में) होता है तो कायस्थ कहलाता है.
जैसे कुँए में जल, बाल्टी में निकाला तो जल, लोटे में भरा तो जल, चुल्लू से पिया तो जल, उसी प्रकार परमात्मा का अंश हर आत्मा भी काया धारण कर कायस्थ है.इसीलिये कायस्थ किसी एक वर्ण में नहीं है.
तात्पर्य यह कि सनातन चिंतन में वह है ही नहीं जो समाज में प्रचलन में है. आवश्यकता चिंतन को छोड़ने की नहीं सामाजिक आचार को बदलने की है. जो परिवर्तन की दिशा में सबसे आगे चले वह अग्रवाल, जिसके पास वास्तव में श्री हो वह श्रीवास्तव. जब दोनों का मेल हो तो सत्य और श्रेष्ठ ही बढ़ेगा.
विवाह दो जातकों का होता है, उनके रिश्तेदारों, परिवारों, प्रतिष्ठा या व्यवसाय का नहीं होता. पारस्परिक ताल-मेल, समायोजन, सहिष्णुता और संवेदनशीलता हो तो विवाह करना चाहिए अन्यथा विग्रह होना ही है.
पंडा, पुजारी, मुल्ला, मौलवी, ग्रंथी, पादरी होना धंधा है. जब कोई दूकानदार, कोई मिल मालिक हमें नियंत्रित नहीं करता करे तो हम स्वीकारेंगे नहीं तो कर्मकांड का व्यवसाय करनेवालों की दखलंदाजी हम क्यों मानते हैं? कमजोरी हमारी है, दूर भी हमें ही करना है.
२५-५-२०१७
***
स्वरबद्ध दोहे :
*
अक्षर अजर अमर असित, अजित अतुल अमिताभ
अकत अकल अकलक अकथ, अकृत अगम अजिताभ
*
आप आब आनंदमय, आकाशी आल्हाद
आक़ा आक़िल अजगबी, आज्ञापक आबाद
*
इश्वाकु इच्छुक इरा, इर्दब इलय इमाम
इड़ा इदंतन इदंता, इन इब्दिता इल्हाम
*
ईक्षा ईक्षित ईक्षिता, ई ईड़ा ईजान
ईशा ईशी ईश्वरी, ईश ईष्म ईशान
*
उत्तम उत्तर उँजेरा, उँजियारी उँजियार
उच्छ्वासित उज्जवल उतरु, उजला उत्थ उकार
*
ऊजन ऊँचा ऊजरा, ऊ ऊतर ऊदाभ
ऊष्मा ऊर्जा ऊर्मिदा, ऊर्जस्वी ऊ-आभ
*
एकाकी एकाकिनी, एकादश एतबार
एषा एषी एषणा, एषित एकाकार
*
ऐश्वर्यी ऐरावती, ऐकार्थ्यी ऐकात्म्य
ऐतरेय ऐतिह्यदा, ऐणिक ऐंद्राध्यात्म
*
ओजस्वी ओजुतरहित, ओंकारित ओंकार
ओल ओलदा ओबरी, ओर ओट ओसार
*
औगत औघड़ औजसिक, औत्सर्गिक औचिंत्य
औंगा औंगी औघड़ी, औषधीश औचित्य
*
अंक अंकिकी आंकिकी, अंबरीश अंबंश
अंहि अंशु अंगाधिपी, अंशुल अंशी अंश
*
हवा आग धरती गगन, रोटी वस्त्र किताब
'सलिल' कलम जिसको मिले, वह हो मनुज जनाब
२५-५-२०१६
***

एक दोहा
हवा आग धरती गगन, रोटी वस्त्र किताब
'सलिल' कलम जिसको मिले, वह हो मनुज जनाब
***

मुक्तिका:
*
सुरभि फ़ैली, आ गयीं
कमल-दल सम, भा गयीं
*
ज़िन्दगी के मंच पर
बन्दगी बन छा गयीं
*
विरह-गीतों में विहँस
मिलन-रस बिखरा गयीं
*
सियासत में सत्य सम
सिकुड़कर संकुचा गयीं
*
हर कहानी अनकही
बिन कहे फरमा गयीं
***

मुक्तिका:
*
हुआ जन दाना अधिक या अब अधिक नादान है
अब न करता अन्य का, खुद का करे गुणगान है
*
जब तलक आदम रहा दम आदमी में खूब था
आदमी जब से हुआ मच्छर से भी हैरान है.
*
जान की थी जान मुझमें अमन जीवन में रहा
जान मेरी जान में जबसे बसी, वीरान है.
*
भूलते ही नहीं वो दिन जब हमारा देश था
देश से ज्यादा हुआ प्रिय स्वार्थ सत्ता मान है
*
भेद लाखों, एकता का एक मुद्दा शेष है
मिले कैसे भी मगर मिल जाए कुछ अनुदान है
***
नवगीत:
*
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
*
जिंदगी नवगीत बनकर
सर उठाने जब लगी
भाव रंगित कथ्य की
मुद्रा लुभाने तब लगी
गुनगुनाकर छंद ने लय
कहा: 'बन जा संत रे!'
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
*
बिम्ब ने प्रतिबिम्ब को
हँसकर लगाया जब गले
अलंकारों ने कहा:
रस सँग ललित सपने पले
खिलखिलाकर लहर ने उठ
कहा: 'जग में तंत रे!'
*
बन्दगी इंसान की
भगवान ने जब-जब करी
स्वेद-सलिला में नहाकर
सृष्टि खुद तब-तब तरी
झिलमिलाकर रौशनी ने
अंधेरों को कस कहा:
भास्कर है कंत रे!
श्वास मुखड़े
संग गूथें
आस के कुछ अंतरे
२५-५-२०१५
***


हाइकु चर्चा : १.
*
हाइकु (Haiku 俳句 high-koo) ऐसी लघु कवितायेँ हैं जो एक अनुभूति या छवि को व्यक्त करने के लिए संवेदी भाषा प्रयोग करती है. हाइकु बहुधा प्रकृति के तत्व, सौंदर्य के पल या मार्मिक अनुभव से प्रेरित होते हैं. मूलतः जापानी कवियों द्वारा विकसित हाइकु काव्यविधा अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ द्वारा ग्रहण की गयी.
पाश्चात्य काव्य से भिन्न हाइकु में सामान्यतः तुकसाम्य, छंद बद्धता या काफ़िया नहीं होता।
हाइकु को असमाप्त काव्य चूँकि हर हाइकु में पाठक / श्रोता के मनोभावों के अनुसार पूर्ण किये जाने की अपेक्षा होती है.
हाइकु का उद्भव 'रेंगा नहीं हाइकाइ haikai no renga सहयोगी काव्य समूह' जिसमें शताधिक छंद होते हैं से हुआ है. 'रेंगा' समूह का प्रारंभिक छंद 'होक्कु' मौसम तथा अंतिम शब्द का संकेत करता है. हाइकु अपने काव्य-शिल्प से परंपरा के नैरन्तर्य बनाये रखता है.
समकालिक हाइकुकार कम शब्दों से लघु काव्य रचनाएँ करते हैं. ३-५-३ सिलेबल के लघु हाइकु भी रचे जाते हैं.
हाइकु का वैशिष्ट्य
१. ध्वन्यात्मक संरचना:
Write a Haiku Poem Step 2.jpgपारम्परिक जापानी हाइकु १७ ध्वनियों का समुच्चय है जो ५-७-५ ध्वनियों की ३ पदावलियों में विभक्त होते हैं. अंग्रेजी के कवि इन्हें सिलेबल (लघुतम उच्चरित ध्वनि) कहते हैं. समय के साथ विकसित हाइकु काव्य के अधिकांश हाइकुकार अब इस संरचना का अनुसरण नहीं करते। जापानी या अंग्रेजी के आधुनिक हाइकु न्यूनतम एक से लेकर सत्रह से अधिक ध्वनियों तक के होते हैं. अंग्रेजी सिलेबल लम्बाई में बहुत परिवर्तनशील होते है जबकि जापानी सिलेबल एकरूपेण लघु होते हैं. इसलिए 'हाइकु चंद ध्वनियों का उपयोग कर एक छवि निखारना है' की पारम्परिक धारणा से हटकर १७ सिलेबल का अंग्रेजी हाइकु १७ सिलेबल के जापानी हाइकु की तुलना में बहुत लंबा होता है. ५-७-५ सिलेबल का बंधन बच्चों को विद्यालयों में पढाये जाने के बावजूद अंग्रेजी हाइकू लेखन में प्रभावशील नहीं है. हाइकु लेखन में सिलेबल निर्धारण के लिये जापानी अवधारणा "हाइकु एक श्वास में अभिव्यक्त कर सके" उपयुक्त है. अंग्रेजी में सामान्यतः इसका आशय १० से १४ सिलेबल लंबी पद्य रचना से है. अमेरिकन उपन्यासकार जैक कैरोक का एक हाइकू देखें:
Snow in my shoe मेरे जूते में बर्फ
Abandoned परित्यक्त
२५-५-२०१४
Sparrow's nest गौरैया-नीड़
***
कृति चर्चा:
सर्वमंगल: संग्रहणीय सचित्र पर्व-कथा संग्रह
आचार्य संजीव
*
[कृति विवरण: सर्वमंगल, सचित्र पर्व-कथा संग्रह, श्रीमती शकुन्तला खरे, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ संख्या १८६, मूल्य १५० रु., लेखिका संपर्क: योजना क्रमांक ११४/१, माकन क्रमांक ८७३ विजय नगर, इंदौर. म. प्र. भारत]
*
विश्व की प्राचीनतम भारतीय संस्कृति का विकास सदियों की समयावधि में असंख्य ग्राम्यांचलों में हुआ है. लोकजीवन में शुभाशुभ की आवृत्ति, ऋतु परिवर्तन, कृषि संबंधी क्रिया-कलापों (बुआई, कटाई आदि), महापुरुषों की जन्म-निधन तिथियों आदि को स्मरणीय बनाकर उनसे प्रेरणा लेने हेतु लोक पर्वों का प्रावधान किया गया है. इन लोक-पर्वों की जन-मन में व्यापक स्वीकृति के कारण इन्हें सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता प्राप्त है. वास्तव में इन पर्वों के माध्यम से वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में सामंजस्य-संतुलन स्थापित कर, सार्वजनिक अनुशासन, सहिष्णुता, स्नेह-सौख्य वर्धन, आर्थिक संतुलन, नैतिक मूल्य पालन, पर्यावरण सुधार आदि को मूर्त रूप देकर समग्र जीवन को सुखी बनाने का उपाय किया गया है. उत्सवधर्मी भारतीय समाज ने इन लोक-पर्वों के माध्यम से दुर्दिनों में अभूतपूर्व संघर्ष क्षमता और सामर्थ्य भी अर्जित की है.
आधुनिक जीवन में आर्थिक गतिविधियों को प्रमुखता मिलने के फलस्वरूप पैतृक स्थान व् व्यवसाय छोड़कर अन्यत्र जाने की विवशता, अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के कारण तर्क-बुद्धि का परम्पराओं के प्रति अविश्वासी होने की मनोवृत्ति, नगरों में स्थान, धन, साधन तथा सामग्री की अनुपलब्धता ने इन लोक पर्वों के आयोजन पर परोक्षत: कुठाराघात किया है. फलत:, नयी पीढ़ी अपनी सहस्त्रों वर्षों की परंपरा, जीवन शैली, सनातन जीवन-मूल्यों से अपरिचित हो दिग्भ्रमित हो रही है. संयुक्त परिवारों के विघटन ने दादी-नानी के कध्यम से कही-सुनी जाती कहानियों के माध्यम से समझ बढ़ाती, जीवन मूल्यों और जानकारियों से परिपूर्ण कहानियों का क्रम समाप्त प्राय कर दिया है. फलत: नयी पीढ़ी में पारिवारिक स्नेह-सद्भाव का अभाव, अनुशासनहीनता, उच्छंखलता, संयमहीनता, नैतिक मूल्य ह्रास, भटकाव और कुंठा लक्षित हो रही है.
मूलतः बुंदेलखंड में जन्मी और अब मालवा निवासी विदुषी श्रीमती शाकुंताका खरे ने इस सामाजिक वैषम्य की खाई पर संस्कार सेतु का निर्माण कर नव पीढ़ी का पथ-प्रदर्शन करने की दृष्टि से ४ कृतियों मधुरला, नमामि, मिठास तथा सुहानो लागो अँगना के पश्चात विवेच्य कृति ' सर्वमंगल' का प्रकाशन कर पंच कलशों की स्थापना की है. शकुंतला जी इस हेतु साधुवाद की पात्र हैं. सर्वमंगल में चैत्र माह से प्रारंभ कर फागुन तह सकल वर्ष में मनाये जानेवाले लोक-पर्वों तथा त्योहारों से सम्बन्धी जानकारी (कथा, पूजन सामग्री सूचि, चित्र, आरती, भजन, चौक, अल्पना, रंगोली आदि ) सरस-सरल प्रसाद गुण संपन्न भाषा में प्रकाशित कर लोकोपकारी कार्य किया है.
संभ्रांत-सुशिक्षित कायस्थ परिवार की बेटी, बहु, गृहणी, माँ, और दादी-नानी होने के कारण शकुन्तला जी शैशव से ही इन लोक प्रवों के आयोजन की साक्षी रही हैं, उनके संवेदनशील मन ने प्रस्तुत कृति में समस्त सामग्री को बहुरंगी चित्रों के साथ सुबोध भाषा में प्रकाशित कर स्तुत्य प्रयास किया है. यह कृति भारत के हर घर-परिवार में न केवल रखे जाने अपितु पढ़ कर अनुकरण किये जाने योग्य है. यहाँ प्रस्तुत कथाएं तथा गीत आदि पारंपरिक हैं जिन्हें आम जन के ग्रहण करने की दृष्टि से रचा गया है अत: इनमें साहित्यिकता पर समाजीकर और पारम्परिकता का प्राधान्य होना स्वाभाविक है. संलग्न चित्र शकुंतला जी ने स्वयं बनाये हैं. चित्रों का चटख रंग आकर्षक, आकृतियाँ सुगढ़, जीवंत तथा अगढ़ता के समीप हैं. इस कारण इन्हें बनाना किसी गैर कलाकार के लिए भी सहज-संभव है.
भारत अनेकता में एकता का देश है. यहाँ अगणित बोलियाँ, लोक भाषाएँ, धर्म-संप्रदाय तथा रीति-रिवाज़ प्रचलित हैं. स्वाभाविक है कि पुस्तक में सहेजी गयी सामग्री उन परिवारों के कुलाचारों से जुडी हैं जहाँ लेखिका पली-बढ़ी-रही है. अन्य परिवारों में यत्किंचित परिवर्तन के साथ ये पर्व मनाये जाना अथवा इनके अतिरिक्त कुछ अन्य पर्व मनाये जाना स्वाभाविक है. ऐसे पाठक अपने से जुडी सामग्री मुझे या लेखिका को भेजें तो वह अगले संस्करण में जोड़ी जा सकेगी. सारत: यह पुस्तक हर घर, विद्यालय और पुस्तकालय में होना चाहिए ताकि इसके मध्याम से समाज में सामाजिक मूल्य स्थापन और सद्भावना सेतु निर्माण का कार्य होता रह सके.
२३-५-२०१५
***

नवगीत:
लौटना मत मन...
*
लौटना मत मन,
अमरकंटक पुनः
बहना नर्मदा बन...
*
पढ़ा, सुना जो वही गुना
हर काम करो निष्काम.
सधे एक सब सधता वरना
माया मिले न राम.
फल न चाह,
बस कर्म किये जा
लगा आत्मवंचन...
*
कर्म योग कहता:
'जो बोया निश्चय काटेगा'.
सगा न कोई आपद-
विपदा तेरी बाँटेगा.
आँख मूँद फिर भी
जग सारा
जोड़ रहा कंचन...
*
क्यों सोचूँ 'क्या पाया-खोया'?
होना है सो हो.
अंतर क्या हों एक या कि
माया-विरंची हों दो?
सहज पके सो मीठा
मान 'सलिल'
पावस-सावन...
२५.५.२०१४
***
अंगिका दोहा मुक्तिका
*
काल बुलैले केकर, होतै कौन हलाल?
मौन अराधें दैव कै, एतै प्रातःकाल..
*
मौज मनैतै रात-दिन, हो लै की कंगाल.
संग न आवै छाँह भी, आगे कौन हवाल?
*
एक-एक कै खींचतै, बाल- पकड़ लै खाल.
नींन नै आवै रात भर, पलकें करैं सवाल..
*
कौन हमर रच्छा करै, मन में 'सलिल' मलाल.
केकरा से बिनती करभ, सब्भै हवै दलाल..
*
धूल झौंक दैं आँख में, कज्जर लेंय निकाल.
जनहित कै नाक रचैं, नेता निगलैं माल..
*
मत शंका कै नजर सें, देख न मचा बवाल.
गुप-चुप हींसा बाँट लै, 'सलिल' बजा नैं गाल..
*
ओकर कोय जवाब नै, जेकर सही सवाल.
लै-दै कै मूँ बंद कर, ठंडा होय उबाल..
२१-५-२०१३
===
गीत:
संजीव 'सलिल'
*
साजों की कश्ती से
सुर का संगीत बहा
लहर-लहर चप्पू ले
ताल देते भँवर रे....
*
थापों की मछलियाँ,
नर्तित हो झूमतीं
नादों-आलापों को
सुन मचलतीं-लूमतीं.
दादुर टरटरा रहे
कच्छप की रास देख-
चक्रवाक चहक रहे
स्तुति सुन सिहर रे....
*
टन-टन-टन घंटे का
स्वर दिशाएँ नापता.
'नर्मदे हर' घोष गूँज
दस दिश में व्यापता. .
बहते-जलते चिराग
हार नहीं मानते.
ताकत भर तम को पी
डूब हुए अमर रे...
२५-५-२०१०
***

शुक्रवार, 24 मई 2024

हिंदी छंद मंजूषा, आचार्य अनमोल, पुरोवाक्

पुरोवाक्
उज्ज्वल पिंगल प्रत्यूषा : हिंदी छंद मंजूषा
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*

            छंद सृष्टि का मूल है। आध्यात्म के अनुसार सृष्टि का मूल अनाहद नाद (ॐ) है। विज्ञान का महाविस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) इसकी पुष्टि करता है। तदनुसार ध्वनि तरंगों के लगातार खरबों वर्ष टकराने से भारहीन कण, भारयुक्त कण तथा कण में चेतना संचार से जीवों का जन्म हुआ। आचार्य जगदीश चंद्र बोस ने यह सिद्ध किया कि वनस्पति तथा शिला, मृदा आदि भी चेतना और अनुभूति शून्य नहीं हैं। 'छंद वह जो सर्वत्र छा जाए' का आशय भी यही है कि छंद रहित कोई स्थान नहीं है। 'छंद' को 'वेदों का चरण कहा गया है। चरण के बिना किसी लक्ष्य तक पहुँचा नहीं जा सकता अर्थात छंद के बिना वेदों को जाना नहीं जा सकता। किसी को प्रसन्न करना हो तो चरण स्पर्श कर आशीष लिया जाता है आशय यह कि वेद और विधाता को प्रसन्न करना हो अथवा सृष्टि का मूल जानना हो तो वेद (ईश-वाणी) के चरण अर्थात छंद को पाना, ह्रदय में बसाना होगा। कात्यायन के अनुसार छंद के बिना मंत्रों का अध्ययन-अध्यापन और देवताओं को प्रसन्न करना असंभव है। छंद को अक्षर का परिमाण (नियामक) कहा गया है। मेदिनी कोश में छंद का अर्थ पद्य (काव्य) है।  आचार्य भरत (ई.पू. चौथी सदी) अपने कालजयी ग्रंथ नाट्यशास्त्र के १८ वें अध्याय में छंद के दो प्रकार नियताक्षर बंध तथा अनियताक्षर बंध बताते हैं। अक्षर वह जो अविनाशी है, ध्वनि या नाद ही अविनाशी है। 

            हिंदी ने अपभ्रंश और संस्कृत से छंद की विरासत ग्रहण की है। सनातन काल से अनमोल रहा छंद-ज्ञान आजकल अंतर्जाल पर बिना मोल लुटाया और लूटा जा रहा है किंतु अधिकांश पटल और समूह अधकचरा छंद ज्ञान परोस कर नवोदितों को भ्रमित कर रहे हैं। गुरुओं और शिष्यों दोनों का ध्यान लघु पथ (शॉर्ट कट) से छंद रचना करने तक सीमित है। इस कारण काव्य रचनाओं में आनुभूतिक सघनता और हृदस्पर्शी मारकता का अभाव उन्हें प्रभावहीन बना देता है। आचार्य अनमोल कृत 'हिंदी छंद मंजूषा' इस संक्रांति काल में बालारुण की तरह अज्ञान तिमिर का अंत कर उज्जवल पिंगल प्रत्यूषा बिखर कर नए कवियों के पथ प्रदर्शन हेतु रची गई है। इस कृति का वैशिष्ट्य गूढ़तम ज्ञान सरल-सहज बनाकर इस तरह उपलब्ध कराना है कि हर जिज्ञासु मन छंद को जान-पढ़-समझ कर रच सके। छंद-महत्व, काव्य-दोष, शब्द-शक्ति, भाव, अंग, प्रकार आदि की आधारभूत प्रामाणिक जानकारी के साथ वर्ण वृत्त, अर्धसम वर्ण वृत्त, कवित्त, मुक्तक छंद, मुक्त छंद, नवगीत तथा कतिपय नव छंदों के रचना विधान और उदाहरणों से सुसज्जित यह कृति हर छंदविद् और छंद विद्यार्थी के लिए उपयोगी है।  

            आचार्य अनमोल जी ने अपनी विद्वता की कुनैन सरलता की चाशनी में लपेटकर छंद को कठिन मानकर उससे दूर भागनेवालों के लिए शुगर कोटेड गोली की तरह उपलब्ध कराकर सर्व हितकारी कार्य किया है। पारंपरिक छंदों के साथ जापानी हाइकु छंद, पंजाबी माहिया छंद, वर्ण पिरामिड आदि ने कृति की उपादेयता में वृद्धि की है। कृति का वैशिष्ट्य काव्य दोषों (सपाट बयानी, अतिशयोक्ति, अधिकथन, अवकथन, असंगत सर्वनाम दोष, अपशब्द दोष, असंगत उपमा दोष, शब्द-विसंगति दोष, पुनरावृत्ति दोष, निरर्थक शब्द प्रयोग दोष, शब्द-विरोधाभास दोष आदि) की सोदाहरण प्रस्तुति है। अन्य ग्रंथों में काव्य दोष लगभग अंत में दिए जाते हैं ताकि छंद ज्ञान पाने के बाद दोष देखे सुधारे जा सकें। संभवत:, अनमोल जी का ध्येय कृति के आरंभ में ही छंद दोष देकर जिज्ञासुओं को सजग करना है कि वे छंदाध्ययन करते समय ही दोषों को देखकर लिखते समय उनसे बच सकें। यह उचित भी है, बाद में दोष दूर करने की अपेक्षा आरंभ से ही दोषों का परिमार्जन करने क अभ्यास होना बेहतर है। 

            पिंगल ग्रंथों में कुछ वर्णों को दग्धाक्षर कहा गया है। कवयादी इनका प्रयोग सामान्यत: वर्जित है किंतु शुभ प्रसंगों में अनुमेय है। इस मान्यता का वैज्ञानिक या तार्किक आधार स्पष्ट नहीं है। बहुधा जो एक के लिए शुभ होता है वह विरोधी के लिए अशुभ होता है। ऐसी मान्यताओं की जानकारी होना चाहिए किंतु इन्हें बंधक न मन जाए। 

            भाषा की तीनों शब्द शक्तियों अमिधा, व्यंजना तथा लक्षणा का सम्यक-संक्षिप्त विश्लेषण अनमोल जी ने किया है। छंद के षडांगों (चरण, वर्ण, मात्रा, गण,  गति, यति तथा तुक), स्वर भेद, मात्रा-गणना नियम, छंद-भेद आदि सभी के लिए उपयोगी हो इस तरह सरल कर प्रस्तुत किया गया है। पिंगल में 'पद' शब्द का बहुअर्थी प्रयोग नवोदितों को भ्रमित करता है। शब्दकोश में चरण, पद, पाद समानार्थी हैं किंतु छंद शास्त्र में 'दोहा को दोपदी' भी कहा जाता है' किंतु 'सूरदास के कृष्ण भक्ति पद अप्रतिम हैं', 'चौपाई के चारों चरण सोलह मात्रिक होते हैं' में 'पद' का अर्थ क्रमश: पंक्ति, संपूर्ण काव्य रचना तथा पंक्ति का एक भाग है। यहाँ यह समझना होगा की साहित्य में विज्ञान की तरह शब्द का अर्थ 'रूढ़' नहीं 'लचीला' होता है। साहित्य में 'ह्रदय' प्रेम का धाम है जबकि विज्ञान में शरीर को रक्त देने वाला पंप मात्र। साहित्य में शब्द का अर्थ प्रसंगानुसार लिया जाता है। अनमोल जी ने नाव अध्येताओं के लिए ऐसे प्रसंगों को पर्याप्त स्पष्ट किया है। 

            छंद शास्त्र के अधिकांश लक्षण ग्रंथ अत्यधिक विस्तार या अतिरेकी संकुचन से ग्रस्त हैं जबकि अनमोल जी ने यथावश्यक जानकारी देते हुए भी अनावश्यक विस्तार से दूरी बनाए रखी है। वे छंद के शिल्प (छंद प्रकार, पद-चरण, तुक नियम, गति-यति, अन्य विधान आदि) की जानकारी के साथ स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। छंद और रस का अंतरसंबंध तथा छंद में अलंकार का महत्व इन दो महत्वपूर्ण पक्षों का किंचित समावेश हो सकता तो ग्रंथ का कुछ विस्तार होने के साथ उपादेयता में वृद्धि होगी। उदाहरणों की सटीकता के प्रति अनमोल जी की सजगता सराहनीय है। 

            समकालिक लोकप्रिय ग्रंथों छंद प्रभाकर - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु',  छंद विधान- छंदोदय - बाबा दौलत राम, हिंदी छंदोलक्षण - नारायण दास, रस-छंद-अलंकार और काव्य विधाएँ- राजेंद्र वर्मा रामदेव लाल 'विभोर' आदि का अनुसरण न कर स्वतंत्रचेता अनमोल जी ने अपनी राह आप बनाकर हिंदी छंद मंजूषा का सृजन नवोदितों में छन्दानुराग उत्पन्न करने की दृष्टि से किया है. यह सनातन सत्य है कि कठिन होना बहुत सरल तथा सरल होना बहुत कठिन होता है। अनमोल जी ने कथन कार्य को सरलतापूर्वक संपादित करते हुए छंदाध्ययन को सहज बनकर महत कार्य किया है। मुझे विश्वास है कि यह कृति न केवल नवोदितों में अपितु सामान्य पाठकों और विद्वज्जनों में भी समादृत होगी। 
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