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सोमवार, 25 मार्च 2024

मार्च २५, सॉनेट नदी, यीट्स, हवन, व्यंग्य दोहा, छप्पय, चित्रगुप्त, भोजपुरी, मुक्तक

सलिल सृजन २५ मार्च
*
स्मरण युगतुलसी
बोलिए राम पिआरा
राम नाम पिचकारी में भर, सिय माता का रंग
मलें गुलाल पवनसुत का तब, हो होली हुड़दंग
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
कोसल्या कैकेई सुमित्रा, मेवा गुझिया बांँट
खुश हों, भोग लगांय पवनसुत, गरम गरम लें छाँट
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
ठंडाई में भांग घोल पी, हैं लछमन जी मस्त
कहाँ उर्मिला खोजें हँस, हँस भरत माण्डवी पस्त 
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
रंग बाल्टी भर लें ताकें, श्रुतिकीरति कित नाथ?
दिखे शत्रुघ्न दौड़ी फिसले, दोनों थामे हाथ
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
जांबवान पर रंग डालकर, सभी हुए हैरान
रंग न कोई चढ़ पाता है,आफत में है जान
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
थकें न लिख लिख राम कथाएँ, वाल्मीकि वन बैठ
जनभाषा में गाएँ तुलसी, जन गण मन में पैठ
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
करें रामकिंकर मीमांसा, रंग भक्ति का घोल
उड़िया बाबा ने दी दीक्षा, राम नाम अनमोल
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
नित्य नहाना नाम नर्मदा, गुरु से पा आशीष
रामकथामृत बाँटें दीदी, मंदाकिनी मनीष
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
राम-भक्ति रस पान करें जो, हों भव सागर पार
चढ़े राम का रंग न छूटे, हो प्रभु पर बलिहार
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
२५.३.३०२४
•••
हुरहुरे 
सूरज के मुँह पर मले, ऊषा लाल गुलाल
हो न लाल पीला कहे, मुँह पर मचा धमाल
कहे घर ताको हियां
मुझे भाया महोबिया
सूर्य कलपे बेचारा
जोगी जी सा रा रा रा
सर ला रंग-अबीर दें, खेलूँ सरला संग
कहें सुशील दवाई कह, गटक बहुत सी भंग
कर रहे नैन मटक्का
डॉक्टर हक्का बक्का
हुआ झट नौ दो ग्यारा
जोगी सी सा रा रा
लट्ठ मार होली कहें, तनिक न करिए रोष
खुद गुझिया खाकर कहें, सलिल करो संतोष
अजब है जग की माया
धूप में बैठी छाया
मूंँदकर नैन निहारा
जोगी जी सा रा रा रा
कर विनोद जिज्ञासु ने, कहा न पीसो दंत
हुए लापता युगों से, अरुण बसंत न तंत
न वसु धा वसुधा बोली
तनूजा करे ठिठोली
सो रहे ने हुंकारा
जोगी जी सा रा रा रा
चौबे जी पर चढ़ गया, है चौबिन का रंग
गारंटी दे रहे हैं, महामहिम कर जंग
तुरत रेखा घर जा रे!
भाँग पी, ले चटखारे
केजरी है बेचारा
जोगी जी सा रा रा रा
•••
सॉनेट
नदी
नदी नीर निर्मल रखो रे!
नदी जीव की जिंदगी है।
नदी श्वास की बंदगी है।
नदी पीर मिल कम करो रे!
नदी तीर जीवन जिया रे!
नदी सभ्यता की नियंता।
नदी संस्कृति की विधाता।
नदी आस का नव दिया रे!
नदी ने न कुछ भी लिया रे!
नदी ने न निज जल पिया रे!
नदी ने दिया ही दिया रे!
नदी सूखती, सब मरें रे!
नदी बाढ़ हो तो मिटें रे!
नदी साफ रखकर तरें रे!
२५-३-२०२२
•••
Poems : William Butler Yeats
काव्यानुवाद : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
* 1. The Falling of the Leaves
Autumn is over the long leaves that love us,
And over the mice in the barley sheaves;
Yellow the leaves of the rowan above us,
And yellow the wet wild-strawberry leaves.
The hour of the waning of love has beset us,
And weary and worn are our sad souls now;
Let us part, ere the season of passion forget us,
With a kiss and a tear on thy drooping brow.
*
१. पतझर
*
हमें रहे प्रिय लंबे पत्तों पर है पतझर, २४
जौ की ढेरी में जा छिपे हुए चूहों पर;
पीले पत्ते रोवन तरु के; सर के ऊपर,
पीले-गीले पर्ण जंगली रसबेरी के।
प्रणय भंग की बेला में हैं खिन्न मना हम,
ओढ़े हुए उदासी अपनी आत्माएँ अब;
सहभागी हों, भुला न दे उमंग का मौसम,
अश्रु भरी नत तेरी भौंहों का चुम्बन कर।
२५-३-२०२२
***
2. A Cradle Song
THE angels are stooping
Above your bed;
They weary of trooping
With the whimpering dead.
God's laughing in Heaven
To see you so good;
The Sailing Seven
Are gay with His mood.
I sigh that kiss you,
For I must own
That I shall miss you
When you have grown.
*
२. लोरी
झुकी हुई हैं परियाँ २२
तेरी शैया पर;
क्लांत भटकने से हैं वे
मुरदों जैसी।
देव स्वर्ग में हँसें
देख तुमको अच्छा।
नाविक सात
मस्त हैं मस्ती में अपनी।
तुम्हें चूम कर आह भरूँ,
मैं अपने आप
सोच खलेगी कमी
बड़े होंगे जब तुम।
२५-३-२०२२
***
विमर्श
घर पर हवन कैसे करें?
हवन कुंड, हवन सामग्री (आम की लकड़ी, चावल, जौ, कलावा, शक्कर, गाय का घी, पान का पत्ता, काला तिल, सूखा नारियल, लौंग, इलायची, कपूर, बताशा आदि)
लाकर सबसे पहले स्नान तथा भूमि, कलश तथा देव पूजन कर लें।
हवन सामग्री को आपस में ठीक से मिला लें।
हवन कुंड को जल से शुद्ध कर लें। आटे से रंगोली बनाकर इसके ऊपर हवन कुंड रख दें। हवन कुंड के चारों तरफ कलावा बाँध दें। हवन कुंड में लकड़ी रखें और थोड़ा सा कपूर या घी डालकर अग्नि प्रज्वलित करें। आसन पर बैठकर निम्न मंत्र एक-एक कर पढ़ें। हर मंत्र के पाठ के बाद अग्नि में आहुति डाल दें।
हवन करते समय इन मंत्रों के साथ दें आहुति:
ॐ गणेशाय नम: स्वाहा
ॐ सरस्वत्यै नम: स्वाहा
ॐ आग्नेय नम: स्वाहा
ॐ पृथ्व्यै नाम: स्वाहा
ॐ नवग्रहाय नम: स्वाहा
ॐ कर्मदेवताय चित्रगुप्ताय नम: स्वाहा
ॐ शिव-पार्वत्यै नम: स्वाहा
ॐ विष्णु-लक्ष्म्यै नम: स्वाहा
ॐ हनुमते नम: स्वाहा
ॐ कुल देवताय नम: स्वाहा
ॐ स्थान देवताय नम: स्वाहा
ॐ भारत देशाय नम: स्वाहा
ॐ हिंदीभाषाय नम: स्वाहा
ॐ पञ्चतत्वाय नम: स्वाहा
ॐ जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते स्वाहा।
ॐ ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहा।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा।
ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।
ॐ पितृ देवताय नम: स्वाहा
ॐ सर्वदेवताय नम: स्वाहा
इसके बाद हवन में खीर का भोग डालें। फिर एक सूखा नारियल लें। इसके चारों ओर रक्षा सूत्र लपेट कर घी मल लें। इस नारियल को हवन कुंड के बीच में रख दें। अंत में बची हुआ हवन धूप को ऊपर से डालकर इस मंत्र को बोले- ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते.
***
महाशोक
आज प्रातःकाल हिंदी माँ के वरद पुत्र, महाकाव्यों उत्तर रामायण व उत्तर भागवत सहित अनेक कृतियों के यशस्वी रचयिता डॉक्टर किशोर काबरा धराधाम से विदा लेकर माँ सरस्वती के चरणों में पहुँच गए।
यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है। अपनी गुजरात यात्राओं में हमेशा मुझ पर काबरा जी ने अग्रजवत असीम स्नेह बरसाया। प्रो भगवत प्रसाद मिश्र 'नियाज', डॉक्टर अंबाशंकर नागर डॉक्टर विष्णु विराट, डॉक्टर शांति सेठ, डॉक्टर काबरा जी आदि से अहमदाबाद और गुजरात हिंदी का तीर्थ था। डॉक्टर किशोर काबरा के प्रति हृदय से श्रद्धांजलि।
*
हे क्षणभंगुर भव राम राम।
वे चिर किशोर, शत शत प्रणाम।।
हिंदी ने खोया सुहृद पूत
पा नाम अमित, अब है अनाम।।
थे तपःपूत, थे अग्रदूत
थे कर्मव्रती सचमुच अकाम।।
अंतिम दम तक थे सृजनलीन
चाहा न कभी किंचित विराम।।
'उत्तर रामायण' कीर्तिकलश
'उत्तर भागवत' है पूर्णकाम।।
तुमको खोकर हम दीन हुए
थे अतिसमृद्ध कर कमल थाम।।
हे महाभाग! शत वंदन लो
वर दो हिंदी हित मिटे चाम।।
२५-३-२०२२
***
हिंदी काव्यानुवाद-
तंत्रोक्त रात्रिसूक्त
*
II यह तंत्रोक्त रात्रिसूक्त है II
I ॐ ईश्वरी! धारक-पालक-नाशक जग की, मातु! नमन I
II हरि की अनुपम तेज स्वरूपा, शक्ति भगवती नींद नमन I१I
*
I ब्रम्हा बोले: 'स्वाहा-स्वधा, वषट्कार-स्वर भी हो तुम I
II तुम्हीं स्वधा-अक्षर-नित्या हो, त्रिधा अर्ध मात्रा हो तुम I२I
*
I तुम ही संध्या-सावित्री हो, देवी! परा जननि हो तुम I
II तुम्हीं विश्व को धारण करतीं, विश्व-सृष्टिकर्त्री हो तुम I३I
*
I तुम ही पालनकर्ता मैया!, जब कल्पांत बनातीं ग्रास I
I सृष्टि-स्थिति-संहार रूप रच-पाल-मिटातीं जग दे त्रास I४I
*
I तुम्हीं महा विद्या-माया हो, तुम्हीं महा मेधास्मृति हो I
II कल्प-अंत में रूप मिटा सब, जगन्मयी जगती तुम हो I५I
*
I महा मोह हो, महान देवी, महा ईश्वरी तुम ही हो I
II सबकी प्रकृति, तीन गुणों की रचनाकर्त्री भी तुम हो I६I
*
I काल रात्रि तुम, महा रात्रि तुम, दारुण मोह रात्रि तुम हो I
II तुम ही श्री हो, तुम ही ह्री हो, बोधस्वरूप बुद्धि तुम हो I७I
*
I तुम्हीं लाज हो, पुष्टि-तुष्टि हो, तुम ही शांति-क्षमा तुम हो I
II खड्ग-शूलधारी भयकारी, गदा-चक्रधारी तुम हो I८I
*
I तुम ही शंख, धनुष-शर धारी, परिघ-भुशुण्ड लिए तुम हो I
II सौम्य, सौम्यतर तुम्हीं सौम्यतम, परम सुंदरी तुम ही हो I९I
*
I अपरा-परा, परे सब से तुम, परम ईश्वरी तुम ही हो I
II किंचित कहीं वस्तु कोई, सत-असत अखिल आत्मा तुम होI१०I
*
I सर्जक-शक्ति सभी की हो तुम, कैसे तेरा वंदन हो ?
II रच-पालें, दे मिटा सृष्टि जो, सुला उन्हें देती तुम हो I११I
*
I हरि-हर,-मुझ को ग्रहण कराया, तन तुमने ही हे माता! I
II कर पाए वन्दना तुम्हारी, किसमें शक्ति बची माता!! I१२I
*
I अपने सत्कर्मों से पूजित, सर्व प्रशंसित हो माता!I
II मधु-कैटभ आसुर प्रवृत्ति को, मोहग्रस्त कर दो माता!!I१३II'
*
I जगदीश्वर हरि को जाग्रत कर, लघुता से अच्युत कर दो I
II बुद्धि सहित बल दे दो मैया!, मार सकें दुष्ट असुरों को I१४I
*
IIइति रात्रिसूक्त पूर्ण हुआII
१२-४-२०१७
***
व्यंग्य दोहावली:
*
व्यंग्य उठाता प्रश्न जो, उत्तर दें हम-आप.
लक्ष्य नहीं आघात है, लक्ष्य सके सच व्याप.
*
भोग लगाखें कर रए, पंडज्जी आराम.
भूले से भी ना कहें, बे मूँ से "आ राम".
*
लिए आरती कह रहे, ठाकुर जी "जय राम".
ठाकुर जी मुसका रहे, आज पड़ा फिर काम.
*
रावण ज्यादा राम कम, हैं बनिए के इष्ट.
कपड़े सस्ते राम के, न्यून मुनाफा कष्ट.
*
वनवासी को याद कब, करें अवध जा राम.
सीता को वन भेजकर, मूरत रखते वाम.
*
शीश कटा शम्बूक का, पढ़ा ज्ञान का ग्रंथ.
आरक्षित सांसद कहाँ कहो, कहाँ खोजते पंथ?
*
जाति नहीं आधार हो, आरक्षण का मीत
यही सबक हम सीख लें, करें सत्य से प्रीत.
*
हुए असहमत शिवा से, शिव न भेजते दूर.
बिन सम्मति जातीं शिवा, पातीं कष्ट अपूर.
*
राम न सहमत थे मगर, सिय को दे वनवास.
रोक न पाए समय-गति, पाया देकर त्रास.
*
'सलिल' उपनिषद उठाते, रहे सवाल अनेक.
बूझ मनीषा तब सकी, उत्तर सहित विवेक.
*
'दर्शन' आँखें खोलकर, खोले सच की राह.
आँख मूँद विश्वास कर, मिले न सच की थाह.
*
मोह यतीश न पालता, चाहें सत्य सतीश.
शक-गिरि पर चढ़ तर्क को, मिलते सत्य-गिरीश.
*
राम न केवल अवध-नृप, राम सनातन लीक.
राम-चरित ही प्रश्न बन, शंका हरे सटीक.
*
नंगा ही दंगा करें, बुद्धि-ज्ञान से हीन.
नेता निज-हित साधता, दोनों वृत्ति मलीन.
*
'सलिल' राम का भक्त है, पूछे भक्त सवाल.
राम सुझा उत्तर उसे, मेटें सभी बवाल.
*
सिया न निर्बल थी कभी, मत कहिए असहाय.
लीला कर सच दिखाया, आरक्षण-अन्याय.
*
सबक न हम क्यों सीखते, आरक्षण दें त्याग.
मानव-हित से ही रखें, हम सच्चा अनुराग.
*
कल्प पूर्व कायस्थ थे, भगे न पाकर साथ.
तब बोया अब काटते, विप्र गँवा निज हाथ.
*
नंगों से डरकर नहीं, ले पाए कश्मीर.
दंगों से डर मौन हो, ब्राम्हण भगे अधीर.
*
हम सब 'मानव जाति' हैं, 'भारतीयता वंश'.
परमब्रम्ह सच इष्ट है, हम सब उसके अंश.
*
'पंथ अध्ययन-रीति' है, उसे न कहिए 'धर्म'.
जैन, बौद्ध, सिख, सनातन, एक सभी का मर्म.
*
आवश्यकता-हित कमाकर, मानव भरता पेट.
असुर लूट संचय करे, अंत बने आखेट.
*
दुर्बल-भोगी सुर लुटे, रक्षा करती शक्ति.
शक्ति तभी हो फलवती, जब निर्मल हो भक्ति.
*
'जाति' आत्म-गुण-योग्यता, का होती पर्याय.
जातक कर्म-कथा 'सलिल', कहे सत्य-अध्याय.
*
'जाति दिखा दी' लोक तब, कहे जब दिखे सत्य.
दुर्जन सज्जन बन करे, 'सलिल' अगर अपकृत्य.
*
धंधा या आजीविका, है केवल व्यवसाय.
'जाति' वर्ण है, आत्म का, संस्कार-पर्याय.
*
धंधे से रैदास को, कहिए भले चमार.
किंतु आत्म से विप्र थे, यह भी हो स्वीकार.
*
गति-यति लय का विलय कर, सच कह दे आनंद.
कलकल नाद करे 'सलिल', नेह नर्मदा छंद.*
श्रीराम नवमी, २५.३.२०१८
***
दोहा दुनिया
*
रश्मि अभय रह कर करे, घोर तिमिर पर वार
खुद को करले अलग तो, कैसे हो भाव-पार?
*
बाती जग उजयारती , दीपक पाता नाम
रुके नहीं पर मदद से, सधता जल्दी काम
*
बाती सँग दीपक मिला, दिया पुलिस ने ठोंक
टीवी पर दो टाँग के, श्वान रहे हैं भौंक
*
यह बाती उस दीप को, देख जल उठी आप
किसका कितना दोष है?, कौन सकेगा नाप??
*
बाती-दीपक को रहा, भरमाता जो तेल
उसे न कोइ टोंकता, और न भेजे जेल
*
दोष न 'का'-'की' का कहें, यही समय की माँग
बिना पिए भी हो नशा,घुली कुएँ में भाँग
२५-३-२०१७
***
सानंद दे छंद नर्मदा २२ :
छप्पय छन्द
रोला-उल्लाला मिले, बनता छप्पय छंद
*
छप्पय षट्पदिक (६ पंक्तियों का), संयुक्त (दो छन्दों के मेल से निर्मित), मात्रिक (मात्रा गणना के आधार पर रचित), विषम (विशन चरण ११ मात्रा, सम चरण१३ मात्रा ) छन्द हैं। इसमें पहली चार पंक्तियाँ चौबीस मात्रिक रोला छंद (११ + १३ =२४ मात्राओं) की तथा बाद में दो पंक्तियाँ उल्लाला छंद (१३+ १३ = २६ मात्राओं या १४ + १४ = २८मात्राओं) की होती हैं। उल्लाला में सामान्यत:: २६ तथा अपवाद स्वरूप २८ मात्राएँ होती हैं। छप्पय १४८ या १५२ मात्राओं का छंद है। संत नाभादास सिद्धहस्त छप्पयकार हुए हैं। 'प्राकृतपैंगलम्'[1] में इसका लक्षण और इसके भेद दिये गये हैं।
छप्पय के भेद- छंद प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद भानु के अनुसार छप्पय के ७१ प्रकार हैं। छप्पय अपभ्रंश और हिन्दी में समान रूप से प्रिय रहा है। चन्द[2], तुलसी[3], केशव[4], नाभादास [5], भूषण [6], मतिराम [7], सूदन [8], पद्माकर [9] तथा जोधराज हम्मीर रासो कुशल छप्पयकार हुए हैं। इस छन्द का प्रयोग मुख्यत:वीर रस में चन्द से लेकर पद्माकर तक ने किया है। इस छन्द के प्रारम्भ में प्रयुक्त रोला में 'गीता' का चढ़ाव है और अन्त में उल्लाला में उतार है। इसी कारण युद्ध आदि के वर्णन में भावों के उतार-चढ़ाव का इसमें अच्छा वर्णन किया जाता है। नाभादास, तुलसीदास तथा हरिश्चन्द्र ने भक्ति-भावना के लिये छप्पय छन्द का प्रयोग किया है।
उदाहरण - "डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बे समुद्रसर। ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर। दिग्गयन्द लरखरत, परत दसकण्ठ मुक्खभर। सुर बिमान हिम भानु, भानु संघटित परस्पर। चौंकि बिरंचि शंकर सहित, कोल कमठ अहि कलमल्यौ। ब्रह्मण्ड खण्ड कियो चण्ड धुनि, जबहिं राम शिव धनु दल्यौ॥"[10] पन्ने की प्रगति अवस्था आधार प्रारम्भिक माध्यमिक पूर्णता शोध टीका टिप्पणी और संदर्भ ऊपर जायें ↑ प्राकृतपैंगलम् - 1|105 ऊपर जायें ↑ पृथ्वीराजरासो ऊपर जायें ↑ कवितावली ऊपर जायें ↑ रामचन्द्रिका ऊपर जायें ↑ भक्तमाल ऊपर जायें ↑ शिवराजभूषण ऊपर जायें ↑ ललितललाम ऊपर जायें ↑ सुजानचरित ऊपर जायें ↑ प्रतापसिंह विरुदावली ऊपर जायें ↑ कवितावली : बाल. 11 धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 1 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 250।
लक्षण छन्द-
रोला के पद चार, मत्त चौबीस धारिये।
उल्लाला पद दोय, अंत माहीं सुधारिये।।
कहूँ अट्ठाइस होंय, मत्त छब्बिस कहुँ देखौ।
छप्पय के सब भेद मीत, इकहत्तर लेखौ।।
लघु-गुरु के क्रम तें भये,बानी कवि मंगल करन।
प्रगट कवित की रीती भल, 'भानु' भये पिंगल सरन।। -जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
*
उल्लाला से योग, तभी छप्पय हो रोला।
छाया जग में प्यार, समर्पित सुर में बोला।। .
मुखरित हो साहित्य, घुमड़ती छंद घटायें।
बरसे रस की धार, सृजन की चलें हवायें।।
है चार चरण का अर्धसम, पन्द्रह तेरह प्रति चरण।
सुन्दर उल्लाला सुशोभित, भाये रोला से वरण।। -अम्बरीश श्रीवास्तव
*
उदाहरण-
०१. कौन करै बस वस्तु कौन यहि लोक बड़ो अति।
को साहस को सिन्धु कौन रज लाज धरे मति।।
को चकवा को सुखद बसै को सकल सुमन महि।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि।।
जग बूझत उत्तर देत इमि, कवि भूषण कवि कुल सचिव।
दच्छिन नरेस सरजा सुभट साहिनंद मकरंद सिव।। -महाकवि भूषण, शिवा बावनी
(सिन्धु = समुद्र; ocean or sea । रज = मिट्टी; mud, earth । सुमन = फूल; flower । इमि = इस प्रकार; this way । सचिव = मन्त्री; minister, secretary । सुभट = बहुत बड़ा योद्धा या वीर; great warrior.)
भावार्थ- संसार जानना चाहता है, कि वह कौन व्यक्ति है जो किसी वस्तु को अपने वश में कर सकता है, और वह कौन है जो इस पृथ्वी-लोक में सबसे महान है? साहस का समुद्र कौन है और वह कौन है जो अपनी जन्मभूमि की माटी की लाज की रक्षा करने का विचार सदैव अपने मन में रखेता है? चक्रवाक पक्षी को सुख प्रदान करने वाला१ कौन है? धरती के समस्त सात्विक-मनों में कौन बसा हुआ है? मांगते ही जो आठों प्रकार की सिद्धियों २ और नवों प्रकार की निधियों३ से परिपूर्ण बना देने का सामर्थ्य रखता है, वह कौन है? इन सभी प्रश्नों को जानने की उत्कट आकांक्षा संसार के मन में उत्पन्न हो गयी है। इसलिये कवियों के कुल के सचिव भूषण कवि, सभी प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार देते है − वे है दक्षिण के राजा, मनुष्यों में सर्वोत्कृष्ट एवं साहजी के कुल में जो उसी तरह उत्पन्न हुए हैं, जैसे फूलों में सुगंध फैलाने वाला पराग उत्पन्न होता है, अर्थात शिवाजी महाराज। शिवाजी के दादा, मालोजी को मालमकरन्द भी कहा जाता था। Who has the power to conquer all; who is the greatest of them all? Who is the ocean of courage; who is consumed by the thought of protecting the motherland? Who offers bliss to the Chakrawaak; who resides in every flower-like innocent souls? Who, in this world grants Ashtasiddhi and Navnidhi? The world seeks answers, and I, the minister of the poets’ clan, answer thus, He is the ruler of the Deccan, the great warrior, son of Shahaji, grandson of Maloji, i.e. Shivaji.
संकेतार्थ- १. शिवाजी का शौर्य सूर्य समान दमकता है। चकवा नर-मादा सूर्य-प्रकाश में ही मिलन करते है। शिवाजी का शौर्य-सूर्य रात-दिन चमकता रहता है, अत: चकवा पक्षी को अब रात होने का डर नहीं है। अतः वह सुख के सागर में डूबा हुआ है। २. अष्टसिद्धियाँ : अणिमा- अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता, महिमा: अपने को बड़ा बना लेने की क्षमता, गरिमा: अपने को भारी बना लेने की क्षमता, लघिमा: अपने को हल्का बना लेने की क्षमता, प्राप्ति: कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता, प्रकाम्य: कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता, ईशित्व: हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना, वैशित्व: जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता ३. नवनिधियाँ: महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्ब।
काव्य-सुषमा और वैशिष्ट्य- 'साहस को सिंधु' तथा 'मकरंद सिव' रूपक अलंकार है। शिवाजी को साहस का समुद्र तथा शिवाजी महाराज मकरंद कहा गया है उपमेय, (जिसका वर्णन किया जा रहा हो, शिवाजी), को उपमान (जिससे तुलना की जाए समुद्र, मकरंद) बना दिया जाये तो रूपक अलंकार होता है। “सुमन”- श्लेष अलंकार है। एक बार प्रयुक्त किसी शब्द से दो अर्थ निकलें तो श्लेष अलंकार होता है। यहाँ सुमन = पुष्प तथा अच्छा मन। “सरजा सुभट साहिनंद”– अनुप्रास अलंकार है। एक वर्ण की आवृत्ति एकाधिक बार हो तो अनुप्रास अलंकार होता है। यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार हुई है। “अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि?” अतिशयोक्ति अलंकार है। वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कहने पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। यह राज्याश्रित कवियों की परंपरा रही है। प्रश्नोत्तर या पहेली-शैली का प्रयोग किया गया है। ०२. बूढ़े या कि ज़वान, सभी के मन को भाये। गीत-ग़ज़ल के रंग, अलग हट कर दिखलाये।। सात समंदर पार, अमन के दीप जलाये। जग जीता, जगजीत, ग़ज़ल सम्राट कहाये।। तुमने तो सहसा कहा था, मुझको अब तक याद है। गीत-ग़ज़ल से ही जगत ये, शाद और आबाद है।। -नवीन चतुर्वेदी, (जगजीत सिंह ग़ज़ल गायक के प्रति)
०३. लेकर पूजन-थाल प्रात ही बहिना आई।
उपजे नेह प्रभाव, बहुत हर्षित हो भाई।।
पूजे वह सब देव, तिलक माथे पर सोहे।
बँधे दायें हाथ, शुभद राखी मन मोहे।।
हों धागे कच्चे ही भले, बंधन दिल के शेष हैं।
पुनि सौम्य उतारे आरती, राखी पर्व विशेष है।। -अम्बरीश श्रीवास्तव (राखी पर)
२५-३-२०१६
***
चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२५-३-२०१४
***
दोहे भोजपुरी में:
*
पनघट के रंग अलग बा, आपनपन के ठौर.
निंबुआ अमुआ से मिले, फगुआ अमुआ बौर..
*
खेत हुई रहा खेत क्यों, 'सलिल' सून खलिहान?
सुन सिसकी चौपाल के, पनघट के पहचान..
*
आपन गलती के मढ़े, दूसर पर इल्जाम.
मतलब के दरकार बा, भारी-भरकम नाम..
*
परसउती के दरद के, मर्म न बूझै बाँझ.
दुपहरिया के जलन के, कइसे समझे साँझ?.
*
कौनऊ के न चिन्हाइल, मति में परि गै भाँग.
बिना बात के बात खुद, खिचहैं आपन टाँग..
***
दोहा 
जितना पाया खो दिया, जो खोया है साथ।
झुका उठ गया, उठाया झुकता पाया माथ।।
***
मुक्तक
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
चित्र न जिसका गुप्त है, है नश्वर संसार
चित्र गुप्त जिसका वही, सृष्टि रचे साकार
काया रच निज अंश को, रख करता जीवंत-
कायस्थ होता ब्रह्म ही, ले नाना आकार
२५-३-२०१०
*

कटु संयुक्त अक्षर,

शोध लेख 
हिन्दी/संस्कृत  के कटु संयुक्त अक्षर

*
मगध के राजा शिशुनाग ने ये राजाज्ञा जारी की थी कि ''उसके अन्त:पुर में कोई भी ट, ठ, ड, ढ, ऋ, ष, स, ह इन आठ वर्णों का उच्चारण नहीं करेगा'' और शूरसेन के राजा कुविन्द ने कटुसंयुक्त अक्षर के उच्चारण पर प्रतिबन्ध था। कुन्तलदेश में सातवाहन राजा ने आज्ञा दे रखी थी कि राजमहल में केवल प्राकृत बोली जाए। उधर उज्जयिनी में राजा साहसांक ने अपने अंत:पुर में केवल संस्कृत के प्रयोग का राजनियम लागू किया हुआ था। तो सबसे पहले हिन्दी की यात्रा को समझें---
''भाखा बहता नीर'' की उक्ति को चरितार्थ करते हुए कैसे आप हिन्दी तक पहुंचे हैं. देववाणी--वैदिक संस्कृत--लैकिक संस्कृत----पालि---प्राकृत (पैशाची, मागधी, अर्द्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री))---अपभ्रंश---अवहट्ट----पुरानी हिन्दी---(डिंगल, पिंगल, अवधी, बृजभाषा, खड़ी बोली)----हिन्दी.
तथाकथित विद्वानों में इस यात्रा को लेकर भी मतभेद है लेकिन जो दूसरे के मत से भेद न करे वो विद्वान भी कैसा? लेकिन केवल इतना नहीं---इसके अलावा अरबी फारसी, उर्दू, पुर्तगाली, अंग्रेजी, बांग्ला जाने कितनी भाषाओँ के शब्दों को हिन्दी पीकर पचा चुकी है। पर अभी बात करेंगे 'वर्ण-कौतुक' और 'अलंकार कौतुक' की अर्थात काव्य में ऐसा वर्ण-प्रयोग, अलंकार-प्रयोग कि मन कौतुक, आश्चर्य, विस्मय से भर जाए. इसका प्रारंभ तो संस्कृत आचार्यों ने ही शुरू कर दिया था मगर बाद के कवियों ने भी इस परम्परा को खूब आगे बढ़ाया. जैसे संस्कृत का एक श्लोक देखिये, जिसमें सभी तैंतीस व्यंजन हैं--
क: खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषाम्।।
''अर्थात् वो कौन है जो पक्षियों के प्रति प्रेम रखने वाला, शुद्ध बुद्धि वाला, दूसरे का बल को हरने में निपुण, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल, निडर और महासागर का सर्जक है? जिसे शत्रुओं से भी आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं।''
यहाँ समझने वाली बात ये है कि ये केवल जोड़-तोड़ नहीं बल्कि अर्थपूर्ण काव्य है. हिन्दी में काशिराज की एक कुण्डली देखिये--
''केकी खग घन लखिनचे छाजे झिल्ली बैन
तट ठठि डिढ चढ़ि गण नदी तत्थ उदधि रही ऐन
तत्थ उदधि रही ऐन ढपे फबि भू मग सगरे
जाय रले वर तियनि पथिक नर परिहरि दगरे
आशिष सहित हुलास लहि विरहिन हियरे की
औरे ओप अमंद भई जब कूके केकी
इस कुण्डलिया में हिन्दी के सभी 'स्वर' और 'व्यंजन; का प्रयोग हुआ है. हिन्दी में संभवतः अन्य किसी कवि ने ऐसी रचना नहीं की। संस्कृत में महाकवि भारवि का एक श्लोक देखिये, सम्पूर्ण श्लोक की रचना केवल एक व्यंजन "न" से की गई है--
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।
अर्थात्-अरे अनेक प्रकार के मुख वालो! निकृष्ट व्यक्ति द्वारा बिद्ध (घायल) किया गया पुरुष, पुरुष नहीं है और निकृष्ट व्यक्ति को जो बिद्ध करता है वह भी पुरुष नहीं है, स्वामी के अबिद्ध होने पर बिद्ध पुरुष भी अबिद्ध ही है और अतिशय पीड़ित व्यक्ति को पीड़ा पहुँचाने वाला व्यक्ति निर्दोष नहीं होता''
हिन्दी में इसी प्रकार का एक प्रयोग देखिये जिसकी रचना केवल एक व्यंजन "न" से की गई है--
नोने नैनी नैन ने नोने नुने ननून
नानानन ने नानू ने नाना नैना नून
नोने नैनी अर्थात, सलोने लावण्ययुक्त नयन वाली अर्थात 'सुनयना'' पूरे पद का अर्थ, शब्द-विस्तार की वजह से नहीं लिख रहा ताकि अधिक से अधिक सारगर्भित रह सकूँ फिर भी किसी की आगे आने वाले किसी भी श्लोक, छंद या दोहे के अर्थ के प्रति औत्सुक्य हो तो इन्बॉक्स में मांग लें। ऐसा ही केशवदास का एक अन्य पद देखें जिसकी दोनों पंक्तियाँ बस एक-एक व्यंजन से रचित है ---
केकी केका की कका कोक कीकका कोक
लोल लाली लोले लली लाला लीला लोल
अर्थात-''मोर की ध्वनि क्या है, चक्रवाक और मेंढकों की ध्वनि भी क्या है उस नायिका के समक्ष जो पुत्र प्रेम से भरी घूमती रहती है और उसी की चंचल लीलाओं पर मुग्ध रहती है''
केशवदास तो छंदशास्त्र की पराकाष्ठा हैं। उनका एकाक्षर का एक ऐसा प्रयोग किया है जिसने अर्थवत्ता को इतने वैचित्र्य से सम्हाला है कि विस्मय भी विस्मय से दांतों में ऊँगली दबा ले---
गो गो गं गी अ आ श्री ध्री ह्री भी भा न
भू वि ष स्व ज्ञा द्यौ हि हा नौ ना सं भं मा न
अर्थात--''सूर्य चन्द्र गाय श्रीगणेश सरस्वती श्रीविष्णुश्री ब्रह्मा श्री लक्ष्मी जी को धारण कर लज्जा और भय न कर, इससे पृथ्वी और आकाश तुझे अपने लगेंगे, तेरा हृदय प्रकाशित होगा, तुझे नया कष्ट न मिलेगा और तू तेरी मृत्यु न होगी.''
महाकवि माघ ने एक ऐसे ही पद की रचना की है जो बस दो व्यंजन से मिलकर बना है--
भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।
अर्थात् ''भूमि को भी भार लगे ऐसे भारी, वाद्य यन्त्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले भयहीन हाथी ने अपने शत्रु हाथी पर आक्रमण किया।''
हिन्दी में ऐसा ही एक अद्भुत प्रयोग देखिये -
हरि हर हर हरि हेरि ही ररि ररि रूरैं रोहि
हारि हारि रही राहहीं हरै हार हरि होहि
या
तूँती तातत त तातैं तोते ताते तत
लालो लीला ल लली ललो लाल ले लल्ल
इसी तरह के कई प्रयोग संस्कृत में मिलते हैं जहाँ प्रत्येक पंक्ति केवल एक व्यंजन से निर्मित है--
जजौजोजाजिजिज्जजी तं ततोSततितताततुत
भाभोSभीभाभिभूभाभू रारारिररिरीरर:
अर्थात ''बलराम जोकि एक महान योद्धा और महायुद्धों के विजेता हैं, शुक्र और बृहस्पति की तरह देदीप्यमान हैं, घुमते हुए योद्धाओं के कालरुपी, अपनी चतुरंगिनी सेना के साथ, शत्रुओं का सामना करने युद्धभूमि में शेर की तरह जाते हैं''
संगीत के सात स्वरों के प्रयोग का एक विलक्षण पद्य-प्रयोग भारतेंदु जी ने किया है--
धनि धनि री सारिस गमनी
गरिमध पसरी सैम मनी सारी रेसम सनि सरिस सनि
निस मनि सम निसि धरि धरि मग मधि परि परि पग मगन गनी
निसरी साम साध सानी गनी 'हरिचंद' सरिगम पधनी
संस्कृत के एक आचार्य का ऐसा ही एक अनुपम प्रयोग देखिये--
सा ममारिधमनी निधानिनी सामधाम धनिधाम साधिनी
मानिनी सगरिमापपापपा सापगा समसमागमासमा
द्वयाक्षर अर्थात दो अक्षर से बना, त्रयाक्षर और चतुराक्षर की एक झलकी---यानि हर शब्द दो अक्षरों से या तीन से या चार से बना होगा---इस तरह के काव्य में मात्राओं के त्याग के अपने नियम हैं, वहां नहीं जाऊंगा, अभी-एक दृष्टि---
(१) रमा उमा बानी सदा हरि हर विधि संग वाम (द्वयाक्षर)
क्षमा दया सीता सती कीनी रामा राम
(२) श्रीधर भूधर केसिहा केशव जगत प्रमाण (त्रयाक्षर)
माधव राघव कंसहा पूरण पुरुष पुराण
(३) सीतानाथ सेतुनाथ सत्यनाथ रघुनाथ जगनाथ व्रजनाथ दीनानाथ देवगति (चतुराक्षर)
देवदेव यज्ञदेव विश्वदेव व्यासदेव वासुदेव वसुदेव दिव्यदेव हीनरति
उच्चारण स्थान के आधार पर हिन्दी मे व्यंजनों के निम्नलिखित भेद हैं :
1. कण्ठ्य – क , ख , ग , घ , ङ , ह ।
2. तालव्य – च , छ , ज , झ , ञ , य , श ।
3. मूर्द्धन्य ( तालु का ऊपरी भाग ) – ट , ठ , ड , ढ , ण , र , ष ।
4. दन्त्य – त , थ , द , ध , न , ल , स ।
5. ओष्ठ्य – प , फ , ब , भ , म ।
6. अनुनासिक – ङ , ञ , ण , न , म ।
7. दन्तोष्ठ्य – व
काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए हिन्दी और संस्कृत कवियों के बहुत सारे प्रयोग किये गए हैं 'निरोष्ठ' का 'काव्यादर्श' में वर्णित एक संस्कृत प्रयोग देखें----
अगागांगांगकाकाकगाहकाघककाकहा
अहाहांक खगंकागकंकाखगकाकक
सम्पूर्ण श्लोक को पढने के बाद भी कहीं आपके दोनों होंठ आपस में नहीं टकरा सकते, क्योंकि कहीं भी ओष्ठ्य वर्ण का प्रयोग नहीं है. इसी तरह हिन्दी में आचार्य भिखारीदास का एक प्रयोग देखने योग्य है---
कन हैं सिंगार रस के करन जस ये
सघन घन आनंद की झर छे संचारते
दास सरि देत जिन्हें सारस के रस रसे
अलिन के गन खन खन तन झारते
राधादिक नारिन के हिय की हकीकति
लखैं ते अचरज रीति इनकी निहारते
कारे कान्ह कारे कारे तारे ये तिहारे जित
जाते तित राते राते रग करि डारते
''पादुकासहस्रम्'' में वर्णित एक 'स्वर' और एक 'व्यंजन' से निर्मित एक और हैरान करने वाला संस्कृत श्लोक ---
यायायायायायायायायायायायायायायाया
यायायायायायायायायायायायायायायाया
ऐसे देखेंगे तो कुछ समझ ही न आयेगा----मगर जब इसका अन्वय करेंगे तो पद इस तरह निकल कर सामने आता है-
''यायाया आय आयाय अयाय अयाय अयाय अयाय अयाया यायाय आयायाय आयाया या या या या या या या या''
अर्थात-''वो पादुकाएँ जो ईश्वर को सुशोभित करती हैं और वो सब प्राप्त करने में सहायता करती हैं जो सत्य और शुभ है। जो ज्ञानदात्री हैं, जो ईश्वर को प्राप्त करने की कामना जगाती हैं, जो सब अशुभ को नष्ट करती हैं, जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त किया है और उनके एक स्थान से दुसरे स्थान तक आने जाने का साधन बनी हैं , जिनके द्वारा जगत के हर स्थान तक जाया जा सकता है, ऐसी भगवन विष्णु की वो चरणपादुकाएँ हैं''
----इसी क्रम में कई हिन्दी के साथ अन्य कई अद्भुत ग्रंथों का ध्यान आता है, लगभग साढ़े तीन सौ साल पुराना 'उड़िया' भाषा का एक विलक्षण काव्य है ''बैदेहीशविलास'' विस्मित कर देने वाली ये कृति महाकवि ''उपेन्द्र भंज'' ने मात्र बीस वर्ष की उम्र में रची. सम्पूर्ण महाकाव्य की हर पंक्ति ''ब'' अक्षर से शुरू होती है, बावन सर्ग हैं, हर सर्ग में बाईस या बयालीस पद हैं और बावन सप्ताह अर्थात एक वर्ष में ये कृति पूर्ण हुई. निरंतर ''ब'' अक्षर से प्रारंभ होने वाली पंक्तियों की अर्द्धाली की एक झलक देखिये--
बृद्धि यतन दिनकू दिनु
बिशाल महाकाल कि कर
बुलिले पुरे पुरे स्वच्छरे
बहुत जनजीवन नेई
बप्ताश्वसुर स्थाने स्थाने दशास्य गत
बज्रघातकु मणि इतर
या सत्रहवीं सदी में रचित कांचीपुरम के कवि ''वेंकटाध्वरि'' द्वारा रचित एक अद्भुत ग्रन्थ ''राघवयाद्वीयम'' संस्कृत में रचा यह काव्य अपने-आप में अनूठा है. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह 'राघव' अर्थात 'श्रीराम' और 'यादव' अर्थात यदुवंशी 'श्रीकृष्ण' की गाथा है. इस कृति के किसी भी श्लोक को यदि सीधा पढ़ा जायेगा तो ''रामकथा'' है और उसी श्लोक को उलटा पढ़ा जायेगा तो ''कृष्णकथा'' है---
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः।
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सह्याद्रि की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी मारामोराः।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
मैं भगवान श्रीकृष्ण - तपस्वी व त्यागी, रूक्मिणी तथा गोपियों संग क्रीड़ारत, गोपियों के पूज्य - के चरणों में प्रणाम करता हूं जिनके ह्रदय में मां लक्ष्मी विराजमान हैं तथा जो शुभ्र आभूषणों से मंडित हैं।
साकेताख्या ज्यायामासीत् या विप्रादीप्ता आर्याधारा।
पूः आजीत अदेवाद्याविश्वासा अग्र्या सावाशारावा ॥ २॥
पृथ्वी पर साकेत, यानि अयोध्या, नामक एक शहर था जो वेदों में निपुण ब्राह्मणों तथा वणिको के लिए प्रसिद्द था एवं अजा के पुत्र दशरथ का धाम था जहाँ होने वाले यज्ञों में अर्पण को स्वीकार करने के लिए देवता भी सदा आतुर रहते थे और यह विश्व के सर्वोत्तम शहरों में एक था।
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरा पूः।
राधार्यप्ता दीप्रा विद्यासीमा या ज्याख्याता के सा ॥ २॥
समुद्र के मध्य में अवस्थित, विश्व के स्मरणीय शहरों में एक, द्वारका शहर था जहाँ अनगिनत हाथी-घोड़े थे, जो अनेकों विद्वानों के वाद-विवाद की प्रतियोगिता स्थली थी, जहाँ राधास्वामी श्रीकृष्ण का निवास था, एवं आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसिद्द केंद्र था।
आचार्य दंडी ने सबसे पहले इस विधा का उल्लेख ''प्रतिलोममति स्मृतं'' कहकर किया है जिसे आज अनुलोम-विलोम काव्य के नाम से जाना जाता है. बाद में रुद्रट, भोजराज और हेमचन्द्र जैसे आचार्यों ने भी इसका उल्लेख किया. अब हिन्दी की बात करें तो आचार्य भिखारीदास ने इसे ''गतप्रत्यागत' कहा.--नीचे लिखी सवैय्या की चारों पंक्तियाँ अपने आप में एक उदाहरण हैं--उन्हें उल्टा पढो या सीधा हर पंक्ति अपना ही प्रतिबिम्ब है----
सारस नैनन वै बस मार रमा सब बैनन नै सरसा
सारम सोहय मेन तियासी सिया तिन में यह सो मरसा
सारद सो मन त्यों न बहार रहा बन त्यों नम सो दरसा
सारत लोचन मावर ताल लता रव मान चलो तरसा
या एक दूसरा उदाहरण जिसमें नीचे वाली पंक्ति ऊपर वालो का प्रतिलोम है और ऊपर वाली पंक्ति नीचे वाली का--
रही अरी कब तै हिये बसी सि निरखनी तीर
रती निखर निसि सी गये हितै ब करी अहीर
इसी तरह हिन्दी में 'वर्णलोप' छंद का एक विचित्र उदाहरण देखिये---अर्थात किसी छंद में एक 'वर्ण' का लोप कर देने से काव्य की उक्ति और अर्थ दोनों का परिवर्तित हो जाना. उदाहरण देखिये--
तमोल मँगाई धरौ इहि बारी
मिलिबे की जिय में रूचि भारी
कन्हाई फिरै कबधौं सखी प्यारी
बिहार की आजु करौं अधिकारी
इस छंद का प्रथम वर्ण लोप कर देने पर यह इस तरह बनेगा---
मोल मँगाई धरौ इहि बारी
लीबे की जिय में रूचि भारी
न्हाई फिरै कबधौं सखी प्यारी
हार की आजु करौं अधिकारी
प्रथम छंद में जहाँ नायिका ने पान मंगा रक्खा है और नायक से मिलन की बात जोह रही है वहीँ दूसरे छंद में नायक ने एक 'हार' खरीद रखा है पर उसकी प्रिया स्नान के लिए गयी हुई है. इसी तरह गोकुलकवि ने अपने ग्रन्थ' 'चित्रकलाधर'' में ''वर्णलोप' के अलावा 'वर्णपरिवर्तन' छंद की अनेक रचनाये की हैं जहाँ एक वर्ण परिवर्तित करने से पूरे छंद का अर्थ ही भिन्न हो जाता है. दीनदयाल गिरि के ''वैराग्य-दिनेश'' और राजा महिरामण की ''प्रवीनसागर'' जैसी कृतियों में ''गूढ़काव्य'' या ''गुप्तकाव्य'' के बहुत से उदाहरण मिलते हैं...जिनमें मूल सन्देश, गुप्त रूप से कविता में ही छिपा होता है.
आचार्य रुद्र्ट ने 'बहिर्लिपिका'' और 'अंतर्लिपिका' का उल्लेख किया है, हिन्दी में आकर ये ''प्रश्नोत्तर काव्य'' हो जाता है, जिसमें दिए गए पद में तीन से लेकर अनेक प्रश्नों के उत्तर छिपे होते हैं. रसिक बिहारी के ''काव्य-सुधाकर'' और लछिराम के ''रावणेश्वर कल्पतरु'' में इसके बहुत से उदाहरण मिलते हैं. हिन्दी का एक उदाहरण देखिये----
कौन जाति सीता सती दयो कौन को तात
कौन ग्रन्थ बरन्यों हरी, रामायण अवदात
इस दोहे में तीन प्रश्न हैं (१) सती सीता किस जाति की स्त्री थीं (२) पिता ने उनका विवाह किस से किया (३) उनका हरण किस ग्रन्थ में वर्णित है. दोहे के चौथे चरण में आया शब्द 'रामायण' क्रमश: तीनो प्रश्नों का उत्तर है अर्थात रामा----रामाय---रामायण. इसी तरह दासजी ने 'सर्वतोभद्र बहिर्लिपिका' में एक 'कवित्त' की रचना की है जिसमे एक साथ 'पंद्रह' प्रश्नों के उत्तर हैं' जमाल कवि की एक विलक्षण कृति 'जमालमाला' में ऐसी अनेक रचना है जिसमे ''शब्दों'' के स्थान पर 'अंकों' का प्रयोग किया गया है--
तिन तिन सत दुई तीन चर पांच छवो सत पांच
विघ्न हरहु कल्यान करू, भज जमाल करि जांच
या
तिन तिन सत, सत दुई इक, छौ पांचो करि ध्यान
नासहू दुःख दारिद सबै कहत जमाल सुजान
ऊपर वाली पंक्ति को देखकर कुछ समझ नहीं आता मगर ये ''गणेश स्तुति'' है. जमालमाला में ''छैल'' कवि की टिप्पणी है कि-''इन दोहों का अर्थ वो कर सकेंगे जो 'अंकावली अक्षरों' के ज्ञाता होंगे. बहुत लोगों ने 'जय शिव ओमकारा' आरती ज़रूर सुनी होगी. कुछ ऐसा ही संकेत-काव्य उसमे भी है---जैसे '' एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे''
अर्थात-'' विष्णु के एक मुख (एकानन), ब्रह्मा के चार मुख (चतुरानन) और रुद्र के पाँच मुख (पंचानन) शोभित हैं ब्रह्मा की दो भुजाएँ, विष्णु की चार भुजाएँ और महेश की दश भुजाएँ अत्यंत सुंदर लगती हैं।''
इसी क्रम में हिन्दी में आचार्य जनराज, जगतसिंह और गोकुल कवि ने ''प्रश्नोत्तर काव्य' प्रस्तुत किये हैं. हालांकि संस्कृत में इसका सबसे पहले प्रयोग आचार्य धर्मदास ने अपने ग्रन्थ 'विदग्धमुखमंडन' में किया है. ''प्रश्नोत्तर काव्य' में प्रश्न भी उत्तर में ही छिपा होता है. उदाहरण के लिए केशवदास का एक दोहा देखिये---
को दण्डग्राही सुभट? को कुमार रतिवंत?
को कहिये ससि ते दुखी? कोमल मन को संत ?
प्रश्न--कौन योद्धा दण्डग्राही होता है? अर्थात धनुर्धारी अब अगर ऊपर की पंक्ति देखें ''को दण्ड'' इसे मिलाये तो बनता है ''कोदण्ड' अर्थात धनुष और सुभट माने योद्धा.
प्रश्न--कौन कुमार प्रेमी होता है ? अगर को कुमार का ''कोकुमार'' करें अर्थात कोकशास्त्र या कामशास्त्र का ज्ञाता.
इसी तरह काशिराज के एक ''भाषाचित्र' का उदाहरण देखिये, जिसमे आठ भाषाओँ क्रमश: हिन्दी, प्राकृत, गुजराती, संस्कृत, महाराष्ट्री, पंजाबी, मारवाड़ी और फारसी का प्रयोग है----
चंद ते मुख चारु सोहे णअण तो हरिणी जिया
कैड जे बूँ नव जलाधूँ कलश जितस्वकुचश्रिया
चंप काहुनि फाररंगीआखि तुसि असि चुक्किया
वार कांई हरि करौ छौ रौ बुबीं हज्ज कुल्लिया
''भाषाचित्र' की ही तरह श्रीधर पाठक और भारतेंदु के द्वारा अनेक ''लिपिचित्र'' भी रचे गए पर विषय-विस्तार के भय से उन्हें त्याग रहा हूँ. ''भुवनेशभूषण'' ग्रन्थ में ''कल्पवृक्षबंध'' नाम से एक रचना मिलती है जिसमे एक ही रचना में ''नौ छंद'' का प्रयोग हुआ है. काशिराज ने ''कल्पवृक्षबंध'' को ''चौबीस छंद'' तक रचा है.
पूर्व में ''राघवयाद्वीयम'' की चर्चा अनुलोम-विलोम काव्य के रूप में हुई है इसी विधा में ''दैवत सूर्य कवि'' की लगभग छह सौ वर्ष पुरानी एक और चौंकाने वाली रचना ''रामकृष्णविलोमकाव्य'' स्मरण आती है. श्लोक देखिये---
तं भूसुतामुक्तिमुदारहासं वन्दे यतो भव्यभवं दयाश्रीः ।
श्रीयादवं भव्यभतोयदेवं संहारदामुक्तिमुतासुभूतम् ॥ १॥
चिरं विरंचिर्न चिरं विरंचिः साकारता सत्यसतारका सा ।
साकारता सत्यसतारका सा चिरं विरंचिर्न चिरं विरंचिः ॥ २॥
इसे सीधा पढ़ें तो रामकथा और उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा है. इसी कर्म में 'हरिदत्त सुरि'' का एक ग्रन्थ ''राघवनैषधीय'' भी है जिसे सीधा पढ़ें तो रामकथा और उल्टा पढ़ें तो राजा ''नल'' की कथा है. महाकवि 'चिदम्बर' की एक और कृति ''राघवपाण्डवीय-यादवीय'' में एक ही श्लोक में एक साथ तीन कथाएं राम, कृष्ण और पांडवों की चलती है. अयोध्या में सोलहवीं शताब्दी में लक्ष्मण भट्ट के पुत्र रामचंद्र की एक कृति ''रसिकरंजन' स्मरण आती है जिसमे उसी पद को एक तरफ से पढने पर परम श्रृंगार है तो दूसरी तरफ से पढने पर परम वैराग्य'
हिन्दी में नन्ददास की ''मानमंजरी'' जिसमें एक तरफ से पढने पर ये ''शब्दकोष'' है जिसमें शब्दों के अर्थ दोहों में दिए गए हैं दूसरी तरफ से पढने पर राधा के नाराज़ होने और सखी द्वारा उसे मनाये जाने की कथा है.
भाषा अनेक अद्भुत विचित्रताओं से भरी परिघटना है. विचित्रताओं के इस लोक में ''चर्लभास्करकर शास्त्री'' की ''कंकणबंधरामायण'' केवल एक श्लोक की पुस्तक है. इस श्लोक को देखें----
कामामामायासारामे हामामारा दारागासा
लापासेनापायासामा यानीष्ठोभादाया डरा
या
रामानाथा भारासाराचारावारा गोपाधारा
धाराधाराभीमाकारा पारावारा सीतारामा
इस श्लोक की विचित्रता ये है कि इसे कहीं से भी पढने पर क्रमशः ६४ और १२८ छंद प्राप्त होते हैं. जिनमे सम्पूर्ण रामकथा है. एक और चेतना-हिलाऊ ग्रन्थ 'वेंकटेश्वर' कवि का 'रामायण-संग्रह' है. इस कृति को यदि चार तरह से पढ़ा जाए तो चार ग्रन्थ... गौरी-विवाह, भगवादावतारचरित, द्रौपदी-कल्याण और श्रीरंगादिक्षेत्रमहात्म्य'' इसमें से निकल आते हैं
.***

होली, खुसरो, मीरा, नजीर, भारतेन्दु, प्रसाद, निराला, नज़रुल, बच्चन, शकील , 'रेणु,

महाकवियों की होली कविताएँ
*
अमीर खुसरो (१२५३-१३२५)
*
खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूं पी के संग
रैनी चढ़ी रसूल की सो रंग मौला के हाथ।

जिसके कपरे रंग दिए सो धन-धन वाके भाग
खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूं पी के संग
जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।

मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब-ए-इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया
वो तो दोनों बसंती रंग दे।

जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरवी रख ले
आन पारी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब रख ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे।
***

मीराबाई (१४९८-१५४७)
सील सन्तोख की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल बलिहार रे॥
***

नजीर अकबराबादी (१७३५-१८३०)
*
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुल-रू रंग-भरे
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग-भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग-भरे कुछ ऐश के दम मुँह-चंग भरे
कुछ घुंघरू ताल छनकते हों तब देख बहारें होली की

सामान जहाँ तक होता है उस इशरत के मतलूबों का
वो सब सामान मुहय्या हो और बाग़ खिला हो ख़्वाबों का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
इस ऐश मज़े के आलम में एक ग़ोल खड़ा महबूबों का
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिले हों परियों के और मज्लिस की तय्यारी हो
कपड़ों पर रंग के छींटों से ख़ुश-रंग अजब गुल-कारी हो
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग-भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की

उस रंग-रंगीली मज्लिस में वो रंडी नाचने वाली हो
मुँह जिस का चाँद का टुकड़ा हो और आँख भी मय के प्याली हो
बद-मसत बड़ी मतवाली हो हर आन बजाती ताली हो
मय-नोशी हो बेहोशी हो ''भड़वे'' की मुँह में गाली हो
भड़वे भी, भड़वा बकते हों तब देख बहारें होली की

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवय्यों के लड़के
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट घट के कुछ बढ़ बढ़ के
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के कुछ होली गावें अड़ अड़ के
कुछ लचके शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन भड़के
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की

ये धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा-खींच घसीटी पर भड़वे रंडी का फक्कड़ हो
माजून, शराबें, नाच, मज़ा, और टिकिया सुल्फ़ा कक्कड़ हो
लड़-भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों तब देख बहारें होली की
*
जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।

गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।
***

भारतेन्दु हरिश्चंद्र (९ सितंबर १८५०-६ जनवरी १८८५)
*
गले मुझको लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में।

नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में।

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में।

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुमी कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ मिरे दिलदार होली में।

रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीली आंख दिखाकर करो सरशार होली में।
*
कैसी होरी खिलाई।
आग तन-मन में लगाई॥
पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई।
पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई॥
तबौ नहिं हबस बुझाई।
भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई।
टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई॥
तुम्हें कैसर दोहाई।
कर जोरत हौं बिनती करत हूँ छाँड़ो टिकस कन्हाई।
आन लगी ऐसे फाग के ऊपर भूखन जान गँवाई॥

तुन्हें कछु लाज न आई।
***

जयशंकर प्रसाद (३० जनवरी १८८९-१५ नवंबर १९३७)

बरसते हो तारों के फूल छिपे तुम नील पटी में कौन?
उड़ रही है सौरभ की धूल कोकिला कैसे रहती मीन।

चांदनी धुली हुई है आज बिछलते है तितली के पंख
सम्हलकर, मिलकर बजते साज मधुर उठती हैं तान असंख्य।

तरल हीरक लहराता शान्त सरल आशा-सा पूरित ताल।
सिताबी छिड़क रहा विधु कान्त बिछा है सेज कमलिनी जाल।

पिये, गाते मनमाने गीत टोलियों मधुपों की अविराम।
चली आती, कर रहीं अभीत कुमुद पर बरजोरी विश्राम।

उड़ा दो मत गुलाल-सी हाय अरे अभिलाषाओं की धूल
और ही रंग नही लग लाय मधुर मंजरियां जावें झूल।

विश्व में ऐसा शीतल खेल हृदय में जलन रहे, क्या हात
स्नेह से जलती ज्वाला झेल, बना ली हां, होली की रात॥

***

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (२१ फ़रवरी १८९९-१५अक्तूबर १९६१)
*
नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरे, खेली होली!
जागी रात सेज प्रिय पति-संग रति सनेह-रंग घोली,
दीपित दीप-प्रकाश, कंज-छवि मंजु-मंजु हँस खोली—
मली मुख-चुंबन-रोली।

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस, कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मंद हँस, अधर-दशन, अनबोली—
कली-सी काँटे की तोली।

मधु-ऋतु-रात, मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खो ली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल; श्रम-सुख की हद हो ली—
बनी रति की छबि भोली।

बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल; मुख-लट, पट, दीप बुझा, हँस बोली—
रही यह एक ठठोली।
***

काज़ी नज़रुल इस्लाम (२४ मई १८९९-२९ अगस्त १९७६)
*
यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
***

डॉ. हरिवंश राय बच्चन (२७ नवंबर १९०७-१८ जनवरी२००३)
*
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
*
यह मिट्टी की चतुराई है, रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं, ढाल अलग है ढंग अलग,
आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के शासन से मत घबराओ,
आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का, वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में सदा सफलता जीवन की,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाँहों में भर लो!
***

शकील बदायूँनी (३ अगस्त १९१६-२० अप्रैल १९७०)

होली आई रे कन्हाई
रंग छलके
सुना दे ज़रा बांसरी
बरसे गुलाल, रंग मोरे अंगनवा

अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा।

हो देखो नाचे मोरा मनवा
तोरे कारन घर से, आई हूं निकल के
सुना दे ज़रा बांसरी
होली आयी रे!

होली घर आई, तू भी आजा मुरारी
मन ही मन राधा रोये, बिरहा की मारी
हो नहीं मारो पिचकारी
काहे! छोड़ी रे कलाई संग चल के
सुना दे ज़रा बांसरी
होली आई रे!

***


फणीश्वर नाथ 'रेणु' (४ मार्च १९२१-११ अप्रैल१९७७)
*
यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा
ले आई... ई... ई... ई
मेरे दर्द की दवा!

आँगनऽऽ बोले कागा
पिछवाड़े कूकती कोयलिया
मुझे दिल से दुआ देती आई
कारी कोयलिया-या
मेरे दर्द की दवा
ले के आई-ई-दर्द की दवा!

वन-वन गुन-गुन बोले भौंरा
मेरे अंग-अंग झनन
बोले मृदंग मन मीठी मुरलियाँ!
यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा लेके आई

कारी कोयलिया!
अग-जग अँगड़ाई लेकर जागा
भागा भय-भरम का भूत
दूत नूतन युग का आया
गाता गीत नित्य नया
यह फागुनी हवा...!
***

रविवार, 24 मार्च 2024

महादेवी, होली, यश मालवीय, निराला, बच्चन,

महीयसी महादेवी की अद्भुत होली
*
हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाली बुआ श्री (महीयसी महादेवी वर्मा) से जुड़े संस्मरण की शृंखला में इस बार होली चर्चा। बुआ श्री ने बताया कि रंग पर्व पर भंग की तरंग में मस्ती करने में साहित्यकार भी पीछे नहीं रहते थे किंतु मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाता था। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली बुआ श्री का जन्म दिवस भी है। प्रयाग राज (तब इलाहाबाद) में अशोक नगर स्थित बंगले में साहित्यकारों का जमघट दो उद्देश्यों की पूर्ति हेतु होता था। पहला महादेवी जी को जन्म दिवस की बधाई देना और दूसरा उनके स्नेह पूर्ण आतिथ्य के साथ साहित्यकारों की फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कर धन्य होना। बुआ श्री होली की रात्रि अपने आँगन में होलिका दहन करती थीं। उसके कुछ दिन पूर्व से बुआश्री के साथ उनके मानस पुत्र डॉ. रामजी पांडेय का पूरा परिवार होली के लिए गुझिया, पपड़िया, सेव, मठरी आदि तैयार करा लेता था। एक एक पकवान इतनी मात्रा में बनता कि पीपों (कनस्तरों) और टोकनों में रखा जाता। होली का विशेष पकवान गुझिया (कसार की, खोवे की, मेवा की, नारियल चूर्ण की, चाशनी में पगी), सेव (नमकीन, तीखे, मोठे गुण की चाशनी में पगे), पपड़ी (बेसन की, माइडे की, मोयन वाली), खुरमे व मठरी, दही बड़ा, ठंडाई आदि आदि बड़ी मात्रा में तैयार करे जाते कि कम न हों।         

होली खेलत रघुबीरा

सवेरा होते ही शहर के ही नहीं, अन्य शहरों से भी साहित्यकार आते जाते, राई-नोन से उनकी नजर उतरी जाती, बुआ श्री स्वयं उन्हें गुलाल  का टीका लगाकार आशीष देतीं। आगंतुक साहित्यिक महारथियों में आकर्षण का केंद्र होते महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, उमाकांत मालवीय, रघुवंश,अमृत राय, सुधा चौहान, कैलाश गौतम, एहतराम इस्लाम आदि आदि। साहित्यकारों पर किंशुक कुसुम (टेसू के फूल) उबालकर बनाया गया कुसुंबी रंग डाला जाता था। यह रंग भी बुआ श्री की देख-रेख में घर पर हो तैयार किया जाता था। क्लाइव रोड से बच्चन जी की अगुआई में एक टोली 'होली खेलत रघुबीरा, बिरज में होली खेलत रघुबीरा आदि होली के लोक गीत गाते, झूमते मस्ताते हुए पहुँचती। बच्चन जी स्वयं बढ़िया ढोलक बजाते थे।   

 'बस करो भइया...'

महाप्राण निराला बुआ श्री को अपनी छोटी बहिन मानते थे, फिर होली पर बहिन से न मिलें यह तो हो ही नहीं सकता था। उनके व्यक्तित्व की दबंगई के कारण अनकहा अनुशासन बना रहता था। निराला विजय भवानी (भाँग) का सेवन भी करते थे। एक वर्ष अरगंज स्थित निराला जी के घर कुछ साहित्यकार भाँग लेकर पहुच गए, निराला जी को ठंडाई में मिलाकर जमकर भाँग पिला दी गई। भाँग के नशे में व्यक्ति जो करता है करता ही चला जाता है। यह टोली जब पहुंची तो गुजिया बाँटी-खाई जा रही थीं। निराला जी ने गुझिया खाना आरभ किया तो बंद ही न करें, किसका साहस की उन्हें टोंककर अपनी मुसीबत बुलाए। बुआ जी अन्य अतिथियों का स्वागत कर रही थी, किसी ने यह स्थिति बताई तो वे निराला जी के निकट पहुँचकर बोलीं- ''भैया! अब बस भी करो।और लोग भी हैं, उन्हें भी देना है, गुझिया कम पड़ जाएंगी।'' निराला जी ने झूमते हुआ कहा- 'तो क्या हुआ? भले ही कम हो जाए मैं तो जी भर खाऊँगा, तुम और बनवा लो।'' उपस्थित जनों के ठहाकों के बीच फिर गुझिया खत्म होने के पहले ही फिर से बनाने का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया।     

राम की शक्ति पूजा

एक वर्ष होली पर्व पर बुआ श्री के निवास पर पधारे साहित्यकारों ने निराला जी से उनकी प्रसिद्ध रचना ''राम की शक्ति पूजा'' सुनाने का आग्रह किया। निराला जी ने मना कर दिया। आग्रहकर्ता ने बुआ श्री की शरण गही। बुआ श्री ने खुद निराला जी से कहा- ''भैया! मुझे शक्ति पूजा सुन दो।'' निराला जी ने ''अच्छा,  इन लोगों ने तुम्हें वकील बना लिया, तब तो सुनानी ही पड़ेगी। उन्होंने अपने ओजस्वी स्वर में समा बाँध दिया। सभी श्रोता सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए।

खादी की साड़ी

महादेवी जी सादगी-शालीनता की प्रतिमूर्ति,  निराला जी के शब्दों में 'हिंदी के विशाल मंदिर की वीणापाणी' थीं।वे खादी की बसंती अथवा मैरून बार्डर वाली साड़ी पहनती थीं।  प्रेमचंद जी के पुत्र अमृत राय उन्हें प्रतिवर्ष जन्मदिन के उपहार स्वरूप खादी की साड़ी भेंट करते थे। उल्लेखनीय है की अमृत राय का विवाह महादेवी जी की अभिन्न सखी सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान के साथ बुआ श्री की पहल पर ही हुआ था। 

बिटिया काहे ब्याहते

बुआ श्री अपने पुत्रवत डॉ. रामजी पाण्डेय के परिवार को अपने साथ ही रखती थीं। उनके निकटस्थ लोगों में प्रसिद्ध पत्रकार उमाकांत मालवीय भी रहे। रामजी भाई की पुत्री के विवाह हेतु स्वयं महादेवी जी ने पहल की तथा यश मालवीय जी को जामाता चुना। विवाह का निमात्रण पत्र भी बुआ श्री ने खुद ही लिखा था। वर्ष १९८६ में यश जी होली की सुबह अमृत राय जी के घर पहुँच गए, वहाँ भाग मिली ठंडाई पीने के बाद सब महादेवी जी के घर पहुँचे। जमकर होली खेल चुके यश जी का चेहरा लाल-पीले-नीले रंगों से लिपा-पूत था, उस पर भाग का सुरूर, हँसी-मजाक होते होते यश जी ने हँसना शुरू किया तो रुकने का नाम ही न लें, ठेठ ग्रामीण ठहाके। बुआ श्री ने स्वयं भी हँसते हुई चुटकी ली '' पहले जाना होता ये रूप-रंग है तो अपनी बिटिया काहे ब्याहते?'' 

बुआ श्री ने हमेशा अपना जन्मोत्सव अंतरंग आत्मीय सरस्वती पुत्रों के के साथ ही मनाया। वे कभी किसी दिखावे के मोह में नहीं पड़ीं। होली का रंग पर्व किस तरह मनाया जाना चाहिए यह बुआ श्री के निवास पर हुए होली आयोजनों से सीखा जा सकता है।
*** 

मार्च २४, मुक्तिका, परिवार, पैरोडी, होली, भोजपुरी, सत श्लोकी दुर्गा

सलिल सृजन २४ मार्च
*
मुक्तिका
परिवार
*
चोट एक को, दर्द शेष को, जिनमें वे ही, हैं परिवार।
जहाँ रहें वे,उसी जगह हो, स्वर्ग करें सुख, सभी विहार।।
मेरा-तेरा, स्वार्थ नहीं हो, सबसे सबको, प्यार असीम।
सब सबका हित, रहें साधते, करें सभी का, सब उद्धार।।
नेह नर्मदा, रहे प्रवाहित, विमल सलिल की, धार अपार।
जो अवगाहे, वही सुखी हो, पाप मिटें सब, दें-पा प्यार।।
शूल फूल हों, पतझर सावन, दर्द हर्ष हो, संग न दूर।
हो मनभेद न, रहे एकता, मरुथल में भी, रहे बहार।।
मुझको वर दो, प्रभु बन पाए, मेरा भारत, घर-परिवार।
बने रवायत, जनसेवा कर, बने सियासत, हरि का द्वार।।
(मात्रिक सवैया, यति ८-८-८-७, पदांत गुरु लघु)
२४.३.२०२३
***
दोहा
है भवि शुचि तो कीजिए, खुश रहकर आनंद.
'सलिल' जीव संजीव हो, रचकर गाए छंद.
***
पैरोडी
'लेट इज बैटर दैन नेवर', कबहुँ नहीं से गैर भली 
होली पर दिवाली खातिर धोनी और सब मनई के 
मुट्ठी भर अबीर और बोतल भर ठंडाई ......

होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं
माना कि गीत ई पुरान बा
हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ

अब हमहूँ७३-के ऊपरे चलत, मग्गर ३७ का हौसला रखत बानी ..

भोजपुरी गीत : होली पर....

कईसे मनाईब होली ? हो धोनी !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ

बैटिंग के गईला त रनहू नऽ अईला
एक गिरउला ,तऽ दूसर पठऊला
कईसे चलाइलऽ चैनल चरचा
कोहली त धवन, रनहू कम दईला
निगली का भंग की गोली? हो धोनी !
मिलके मनाईब होली ?ऽऽऽऽऽ
ओवर में कम से कम चउका तऽ चाही
मौका बेमौका बाऽ ,छक्का तऽ चाही
बीस रनन का रउआ रे टोटा
सम्हरो न दुनिया में होवे हँसाई
रीती न रखियो झोली? हो राजा !
लड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ

मारे बँगलदेसीऽ रह-रह के बोली
मुँहझँऊसा मुँह की खाऽ बिसरा ठिठोली
दूध छठी का याद कराइल
अश्विन-जडेजा? कऽ टोली
बद लीनी बाजी अबोली हो राजा
भिड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ

जमके लगायल रे! चउआ-छक्का
कैच भयल गए ले के मुँह लटका
नानी स्टंपन ने याद कराइल
फूटा बजरिया में मटका
दै दिहिन पटकी सदा जय हो राजा
जम के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ

अरे! अईसे मनाईब होली हो राजा, 
अईसे मनाईब होली...
२४.३.२०१६
***
सत श्लोकी दुर्गा
हिंदी भावानुवाद
शिव बोले- हो सुलभ भक्त को, कार्य नियंता हो देवी!
एक उपाय प्रयत्न मात्र है, कार्य-सिद्धि की कला यही।।
देवी बोलीं- सुनें देव हे!, कला साधना उत्तम है।
स्नेह बहुत है मेरा तुम पर, स्तुति करूँ प्रकाशित मैं।।
ॐ मंत्र सत् श्लोकी दुर्गा, ऋषि ‌नारायण छंद अनुष्टुप।
देव कालिका रमा शारदा, दुर्गा हित हो पाठ नियोजित।।
ॐ चेतना ज्ञानी जन में, मात्र भगवती माँ ही हैं।
मोहित-आकर्षित करती हैं, मातु महामाया खुद ही।१।
भीति शेष जो है जीवों में, दुर्गा-स्मृति हर लेती,
स्मृति-मति हो स्वस्थ्य अगर तो, शुभ फल हरदम है देती।
कौन भीति दारिद्रय दुख हरे, अन्य न कोई है देवी।
कारण सबके उपकारों का, सदा आर्द्र चितवाली वे।२।
मंगलकारी मंगल करतीं, शिवा साधतीं हित सबका।
त्र्यंबका गौरी, शरणागत, नारायणी नमन तुमको।३।
दीन-आर्त जन जो शरणागत, परित्राण करतीं उनका।
सबकी पीड़ा हर लेती हो, नारायणी नमन तुमको।४।
सब रूपों में, ईश सभी की, करें समन्वित शक्ति सभी।
देवी भय न अस्त्र का किंचित्, दुर्गा देवि नमन तुमको।५।
रोग न शेष, तुष्ट हों तब ही, रुष्ट काम से, अभीष्ट सबका।
जो आश्रित वह दीन न होता, आश्रित पाता प्रेय अंत में।६।
सब बाधाओं को विनाशतीं, हैं अखिलेश्वरी तीन लोक में।
इसी तरह सब कार्य साधतीं, करें शत्रुओं का विनाश भी।७।
•••
चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२४.३.२०१४
***

शनिवार, 23 मार्च 2024

मार्च २२, लघुकथा, रैप सौंग, ब्रह्मोस मिसाइल, चित्र अलंकार, इब्नबतूता, सेनेटाइजर, कविता दिवस,

सलिल सृजन २२ मार्च
लघुकथा
समझदार
*
नगर में कोरोना पोसिटिव केस... खबर सुनते ही जिज्ञासा, चिंता और कौतूहल होना स्वाभाविक है। कुछ देर बाद समाचार मिला रोगी बेटा और उससे संक्रमित माँ चिकित्सकों से विवाद कर रहे हैं। फिर खबर आई की दोनों चिकित्सालय की व्यवस्थाओं से अंतुष्ट हैं। शुभचिंतकों ने सरकारी व्यवस्थाओं को कोसने में पल भर देर न की। माँ-बेटे अपने शिक्षित होने और उच्च संपर्कों की धौंस दिखाकर अस्पताल से निकल कई लोगों से मिले और अपनी शेखी बघारते रहे।
इस बीच किसी ने चुपचाप बनाया हुई वीडियो पोस्ट कर दिया। हैरत कि अस्पताल पूरी तरह साफ़ था, पंखे-ट्यूबलाइट, पलंग, चादर, तकिये नर्स, डॉक्टर आदि सब एकदम दुरुस्त, दुर्व्यवहार करते माँ-बेटे को विनम्रता से समझाने के बाद अन्य मरीज को देखने में व्यस्त डॉक्टर की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर निकलते माँ-बेटे।
अस्पताल प्रशासन ने पुलिस और कलेक्टर को सूचित किया। तुरंत गाड़ियां दौड़ीं, दोनों को पकड़ा गया और सख्त हिदायत देकर अस्पताल में भर्ती किया गया। तब भी दोनों सरकार को कोसते रहे किन्तु इस मध्य संक्रमित हो गए थे संपर्क में आये सैंकड़ों निर्दोष नागरिक जिन्हें खोजकर उनकी जाँच करना भूसे के ढेर में सुई खोजने की तरह है। पता चला माँ कॉलेज में प्रोफेसर और बेटा विदेश में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। दोनों बार-बार दुहाई दे रहे हैं कि कि वे समझदार हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए पर उनकी नासमझी देखकर प्रश्न उठता है की उन्हें कैसे कहा जाए समझदार?
***

विमर्श :
आज विशेष सावधानी बरतें
२४ घंटे घर में रहना है
'बीबी से सावधान'
मास्क नहीं हैलमेट धारण करें
बेलन, चिमटा, झाड़ू जैसे घातक अण्वास्त्रों को छिपा दें।
"बीबी कहे सो सत्य" के सनातन सिद्धांत का पालन करें।
चुपचाप सुनने और कुछ न कहने से कोरोना भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
इस महामंत्र का चार बार पाठ कर गृहणी को प्रणाम कर सुरक्षित रहें।
जान है तो जहान है।
२४ घंटे बाद फिर अपना आसमान है, फिर भरना उड़ान है।
कर्फ्यू वंदना
(रैप सौंग)
*
घर में घर कर
बाहर मत जा
बीबी जो दे
खुश होकर खा
ठेला-नुक्कड़
बिसरा भुख्खड़
बेमतलब की
बोल न बातें
हाँ में हाँ कर
पा सौगातें
ताँक-झाँक तज
भुला पड़ोसन
बीबी के संग
कर योगासन
चौबिस घंटे
तुझ पर भारी
काम न आए
प्यारे यारी
बन जा पप्पू
आग्याकारी
तभी बेअसर
हो बीमारी
बिसरा झप्पी
माँग न पप्पी
चूड़ी कंगन
करें न खनखन
कहे लिपिस्टिक
माँजो बर्तन
झाड़ू मारो
जरा ठीक से
पौंछा करना
बिना पीक के
कपड़े धोना
पर मत रोना
बाई न आई
तुम हो भाई
तुरुप के इक्के
बनकर छक्के
फल चाहे बिन
करो काम गिन
बीबी चालीसा
हँस पढ़ना
अपनी किस्मत
खुद ही गढ़ना
जब तक कहें न
किस मत करना
मिस को मिस कर
मन मत मरना
जान बचाना
जान बुलाना
मिल लड़ जाएँ
नैन झुकाना
कर फ्यू लेकिन
कई वार हैं
कर्फ्यू में
झुक रहो, सार है
बीबी बाबा बेबी की जय
बोल रहो घुस घर में निर्भय।।
२२-३-२०२०
***
विमर्श
ब्रह्मोस मिसाइल प्रक्षेपण गलती या ???
९ मार्च २०२२ को भारत की एक परीक्षण ब्रह्मोस मिसाइल (वारहेड के बिना) पाकिस्तान में १२४ कि.मी. अंदर मियां चन्नू में भारत की ब्रह्मोस मिसाइल गिरी। मिसाइल से पाकिस्तान में कोई जान माल का नुकसान नहीं हुआ।
-भारत की संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह गलती से चल गयी जिसकी जाँच (कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी) करवाई जा रही है ।
- सूत्रों के अनुसार असल मुद्दा कुछ और है। भारत जाँचना चाहता था कि पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली (एयर डिफेंस सिस्टम) कितना सतर्क और सुरक्षित है? पाकिस्तान के पास चीन से खरीदी गई HQ9 वायु सुरक्षा प्रणाली है। चीन का दावा है कि यह दुनिया की श्रेष्ठ वायु सुरक्षा प्रणाली है । भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल को खोज या रोक न पाने से पाकिस्तान और चीन की कलई खुल गयी है।
-चीन अपने कई मित्र देशों को HQ9 वायु सुरक्षा प्रणाली बेचना चाहता है। अब कोई भी समझदार देश चीन की यह वायु सुरक्षा प्रणाली खरीदना नहीं चाहेगा। भारत ने सिर्फ एक प्रहार से दुनिया को बता दिया है कि चीन की वायु सुरक्षा प्रणाली किसी काम की नहीं है।
- पाकिस्तान अपने रक्षा तंत्र और सेना की बहुत डींग मारता है। भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल १२४ किलोमीटर अंदर तक मिसाइलदाग कर सिद्ध कर दिया कि पाकिस्तान के पास प्रभावी वायु सुरक्षा प्रणाली नहीं है। बांगला देश युद्ध, करगिल युद्ध, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारत ने ब्रह्मोस के जरिए पाकिस्तान की सेना को फिर उसकी औकात बता दी है।
- इस कदम से चीन निर्मित वायु रक्षा प्रणाली की छवि ख़राब हुई है और उसके युद्धास्त्र उद्योग को भारी झटका लगा है। भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की लक्ष्य भेदन क्षमता सामने आते ही, इसे खरीदने के लिए कई देश आगे आ रहे हैं। अब भारत के युद्धास्त्र उत्पादन उद्योग की उन्नति सुनिश्चित है।
-फिलीपींस, वियतमान, ताइवान आदि भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदना चाहते हैं। ये तीनों देश चीन के पड़ोसी हैं। भारत ब्रह्मोस के माध्यम से चीन के खिलाफ उसके पड़ोसियों को मजबूत कर चीन की घेराबंदी कर सकेगा।
***
चित्र अलंकार : पिरामिड
*
है
खरा
सलिल
नहीं खोटा
इसके बिना
बेमानी है लोटा
मिटाता है पिपासा
करे सृष्टि को संप्राण
अकाल से दिलाता त्राण
हाथों को मलता पछताता
अहसान फरामोश कृतघ्न
आदमी में नहीं है समझदारी
खोदता रहा है खुद ही निज कब्र
क्यों और कब तक करे प्रकृति सब्र
कहते हैं ''विनाश काले विपरीत बुद्धि''
*
वर्ण पिरामिड
*
री तू!
कल सी!
बीते पल सी।
मधुरिम यादें
सुधि कोमल सी।
साकी प्याला हाला
बिन मधुबाला मन की
गाती गीत मधुर कोयल सी।
रीत न कलकल करे हमेशा ही
तेरी यादों की कलसी, मानो तुलसी
२२.३.२०२०
***
इब्नबतूता
*
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
नहीं किसी को शकल दिखाता
घर के अंदर बंद हुआ है
राम राम करता दूरी से
ज्यों पिंजरे में कोई सुआ है
गले मत मिला, हाथ मत मिलो
कुरता सिलता बिन धागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
सगा न कोई रहा किसी का
हाय न कोई गैर है
सबको पड़े जान के लाले
नहीं किसी की खैर है
सोना चाहे; नींद न आए
आँख न खुलती पर जागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
***
गीत
क्या होएगा?
*
इब्नबतूता
पूछे: 'कूता?
क्या होएगा?'
.
काय को रोना?
मूँ ढँक सोना
खुली आँख भी
सपने बोना
आयसोलेशन
परखे पैशन
दुनिया कमरे का कोना
येन-केन जो
जोड़ धरा है
सब खोएगा
.
मेहनतकश जो
तन के पक्के
रहे इरादे
जिनके सच्चे
व्यर्थ न भटकें
घर के बाहर
जिनके मन निर्मल
ज्यों बच्चे
बाल नहीं
बाँका होएगा
.
भगता क्योंहै?
डरता क्यों है?
बिन मारे ही
मरता क्यों है?
पैनिक मत कर
हाथ साफ रख
हाथ साफ कर अब मत प्यारे!
वह पाएगा
जो बोएगा।
२१-३-२०२०
***
विश्व कविता दिवस २२ मार्च पर
एक रचना
*
विश्व में कविता समाहित
या कविता में विश्व?
देखें कंकर में शंकर
या शंकर में प्रलयंकर
नाद ताल ध्वनि लय रस मिश्रित
शक्ति-भक्ति अभ्यंकर
अक्षर क्षर का गान करे जब
हँसें उषा सँग सविता
तभी जन्म ले कविता
शब्द अशब्द निशब्द हुए जब
अलंकार साकार हुए सब
बिंब प्रतीक मिथक मिल नर्तित
अर्चित चर्चित कविता हो तब
सत्-शिव का प्रतिमान रचे जब
मन मंदिर की सुषमा
शिव-सुंदर हो कविता
मन ही मन में मन की कहती
पीर मौन रह मन में तहती
नेह नर्मदा कलकल-कलरव
छप्-छपाक् लहरित हो बहती
गिरि-शिखरों से कूद-फलाँगे
उद्धारे जग-पतिता
युग वंदित हो कविता
***
कार्यशाला
बनाइए सेनेटाइजर:
सामग्री - १ लीटर स्प्रिट ( कीमत ११० रुपए)
२०० मि.ली. ग्लिसरीन (६० रुपए)
एक ढक्कन डिटोल का
पसंदीदा इत्र
विधि - पहले स्प्रिट व ग्लिसरीन को मिलाइये।
फिर डिटोल और इत्र मिला दीजिए।
मात्र २०० रुपए में १२०० मि.ली. सेनिटाइजर तैयार है।
बाजार में १०० मि.ली. सेनिटाइजर १५० रुपए में बिक रहा है।
आप फिटकरी से भी सेनेटाइजर बना सकते हैं।
१ लीटर पानी मे १०० ग्राम फिटकरी, 1 ढक्कन डिटोल, गाढ़ा करने के लिए ग्लिसरीन या एलोवरा मिलाकर सेनिटाइजर बना लें।
२१-३-२०२०
***
कविता दिवस
*
कविता कविता जप रहे,
नासमिटी है कौन?
पूछ रहीं श्रीमती जी,
हम भय से हैं मौन।
हम भय से हैं मौन,
न ताली आप बजाएँ।
दुर्गा काली हुई,
किस तरह जान बचाएँ।
हाथ जोड़, पड़ पैर,
मनाते खुश हो सविता।
लाख कहे मिथलेश,
ऩ लिखना हमको कविता।।
२२-३-२०१८
***
हाइकु गीत
*
लोकतंत्र में
मनमानी की छूट
सभी ने पाई।
*
सबको प्यारा
अपना दल-दल
कहते न्यारा।
बुरा शेष का
तुरत ख़तम हो
फिर पौबारा।
लाज लूटते
मिल जनगण की
कह भौजाई।
*
जिसने लूटा
वह कहता: 'तुम
सबने लूटा।
अवसर पा
लूटता देश, हर
नेता झूठा।
वादा करते
जुमला कहकर
जीभ चिढ़ाई।
*
खुद अपनी
मूरत बनवाते
शर्म बेच दी।
संसद ठप
भत्ते लें, लाज न
शेष है रही।
कर बढ़वा
मँहगाई सबने
खूब बढ़ाई।
***
***
द्विपदियाँ
सुबह उषा का पीछा करता, फिर संध्या से आँख मिला
रजनी के आँचल में छिपता, सूरज किससे करें गिला?
*
कांत सफलता पाते तब ही, रहे कांति जब साथ सदा
मिले श्रेय जब भी जीवन में, कांता की जयकार लिखें
​​***
दोहा सलिला
*
उसको ही रस-निधि मिले, जो होता रस-लीन।
पान न रस का अन्य को, करने दे रस-हीन।।
*
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान।
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान।।
*
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव।
नाद, थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव।।
*
रास न रस बिन हो सखे!, दरस-परस दे नित्य।
तरस रहा मन कर सरस, नीरस रुचे न सत्य।।
*
सावन-फागुन कह रहे, लड़े न मन का मीत।
गले मिले, रच कुछ नया, बढ़े जगत में प्रीत।।
*
सावन-फागुन कह रहे, लड़े न मन का मीत।
गले मिले, रच कुछ नया, बढ़े जगत में प्रीत।।
***
त्रिभंगी छंद:
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
***
हाइकु गीत
*
आया वसंत,
इन्द्रधनुषी हुए
दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत
हुए मोहित, सुर
मानव संत..
.
प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
.
पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
.
चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
.
प्रीत की रीत
जानकर न जाने
नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान?
'सलिल' वरदान
दें एकदंत..
***
मुक्तक
'दिग्गी राजा' भटक रहा है, 'योगी' को सिंहासन अर्पण
बैठ न गद्दी बिठलाता है, 'शाह' निराला करे समर्पण
आ 'अखिलेश' बधाई दें, हँस कौतुक से देखा 'नरेंद्र' ने
साइकिल-पंजा-हाथी का मिल जनगण ने कर डाला तर्पण
***
कुंडलिया
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा हँसें मन ही मन, राधा रूठी
*
कुंडलिया
कुंडल पहना कान में, कुंडलिनी ने आज
कान न देती, कान पर कुण्डलिनी लट साज
कुण्डलिनी लट साज, राज करती कुंडल पर
मौन कमंडल बैठ, भेजता हाथी को घर
पंजा-साइकिल सर धुनते, गिरते जा दलदल
खिला कमल हँस पड़ा, फन लो तीनों कुंडल
***
मुक्तिका
*
खर्चे अधिक आय है कम.
दिल रोता आँखें हैं नम..
*
पाला शौक तमाखू का.
बना मौत का फंदा यम्..
*
जो करता जग उजियारा
उस दीपक के नीचे तम..
*
सीमाओं की फ़िक्र नहीं.
ठोंक रहे संसद में ख़म..
*
जब पाया तो खुश न हुए.
खोया तो करते क्यों गम?
*
टन-टन रुचे न मन्दिर की.
रुचती कोठे की छम-छम..
*
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम..
२२-३-२०१७
***
फाग
.
राधे! आओ, कान्हा टेरें
लगा रहे पग-फेरे,
राधे! आओ कान्हा टेरें
.
मंद-मंद मुस्कायें सखियाँ
मंद-मंद मुस्कायें
मंद-मंद मुस्कायें,
राधे बाँकें नैन तरेरें
.
गूझा खांय, दिखायें ठेंगा,
गूझा खांय दिखायें
गूझा खांय दिखायें,
सब मिल रास रचायें घेरें
.
विजया घोल पिलायें छिप-छिप
विजया घोल पिलायें
विजया घोल पिलायें,
छिप-छिप खिला भंग के पेड़े
.
मलें अबीर कन्हैया चाहें
मलें अबीर कन्हैया
मलें अबीर कन्हैया चाहें
राधे रंग बिखेरें
ऊँच-नीच गए भूल सबै जन
ऊँच-नीच गए भूल
ऊँच-नीच गए भूल
गले मिल नचें जमुन माँ तीरे
***
होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
*
होली अनहोली न हो, रखिए इसका ध्यान.
बने केजरीवाल जो खाए भंग का पान..
खायें भंग का पान, मान का पान न छोड़ें.
छान पियें ठंडाई, पी गिलास भी तोड़ें..
कहे 'सलिल' कविराय, टेंट में खोंसे गोली.
मम्मी से मिल गले मनाये पप्पू होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोल ममता बातें.
माया भीतर ही भीतर करती हैं घातें..
भेंट मुलायम-लालू करते हँसी-ठिठोली .
नीतिश गोबर लिए मनाते जमकर होली..
*
होली में फीका पड़ा, सेवा का हर रंग.
माया को भायी सदा, सत्ता खातिर जंग..
सत्ता खातिर जंग, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
२२-३-२०१६
***
सामयिक फाग:
दिल्ली के रंग
*
दिल्ली के रंग रँगो गुइयाँ।
जुलुस मिलें दिन-रैन, लगें नारे कई बार सुनो गुइयाँ।।
जे एन यू में बसो कनैया, उगले ज़हर बचो गुइयाँ।
संसद में कालिया कई, चक्कर में नाँय फँसो गुइयाँ।।
मम्मी-पप्पू की बलिहारी, माथा ठोंक हँसो गुइयाँ।।
छप्पन इंची छाती पंचर, सूजा लाओ सियों गुइयाँ।।
पैले आप-आप कर रए ते, छूटी ट्रेन न रो गुइयाँ।।
नेताजी खों दाँव चूक रओ, माया माँय धँसो गुइयाँ।।
थाना फुँका बता रईं ममता, अपराधी छूटो गुइयाँ।।
सुसमा-ईरानी जब बोलें, चुप्पै-चाप भगो गुइयाँ।।
२२-३-२०१६
***

दोहा सलिला:
दोहा पिचकारी लिये
*
दोहा पिचकारी लिये,फेंक रहा है रंग.
बरजोरी कुंडलि करे, रोला कहे अभंग..
*
नैन मटक्का कर रहा, हाइकु होरी संग.
फागें ढोलक पीटती, झांझ-मंजीरा तंग..
*
नैन झुके, धड़कन बढ़ी, हुआ रंग बदरंग.
पनघट के गालों चढ़ा, खलिहानों का रंग..
*
चौपालों पर बह रही, प्रीत-प्यार की गंग.
सद्भावों की नर्मदा, बजा रही है चंग..
*
गले ईद से मिल रही, होली-पुलकित अंग.
क्रिसमस-दीवाली हुलस, नर्तित हैं निस्संग..
*
गुझिया मुँह मीठा करे, खाता जाये मलंग.
दाँत न खट्टे कर- कहे, दहीबड़े से भंग..
*
मटक-मटक मटका हुआ, जीवित हास्य प्रसंग.
मुग्ध, सुराही को तके, तन-मन हुए तुरंग..
*
बेलन से बोला पटा, लग रोटी के अंग.
आज लाज तज एक हैं, दोनों नंग-अनंग..
*
फुँकनी को छेड़े तवा, 'तू लग रही सुरंग'.
फुँकनी बोली: 'हाय रे! करिया लगे भुजंग'..
*
मादल-टिमकी में छिड़ी, महुआ पीने जंग.
'और-और' दोनों करें, एक-दूजे से मंग..
*
हाला-प्याला यों लगे, ज्यों तलवार-निहंग.
भावों के आवेश में, उड़ते गगन विहंग..
*
खटिया से नैना मिला, भरता माँग पलंग.
उसने बरजा तो कहे:, 'यही प्रीत का ढंग'..
*
भंग भवानी की कृपा, मच्छर हुआ मतंग.
पैर न धरती पर पड़ें, बेपर उड़े पतंग..
*
रंग पर चढ़ा अबीर या, है अबीर पर रंग.
बूझ न कोई पा रहा, सारी दुनिया दंग..
२२.३.२०१३
***
दोहा सलिला
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव.
नाद, थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव..
*
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान.
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान..
*
उसको ही रस-निधि मिले, जो होता रस-लीन.
पान न रस का अन्य को, करने दे रस-हीन..
२२.३.२०१०